Monday, 1 June 2020

लंच बौक्स: 4-रश्मि अनिल की दोस्ती कितनी पुरानी थी ?

विवाह से पहले ही समाज की विभिन्न स्थितियों ने, लोगों की उस पर पड़ने वाली नजरों ने, समाज में स्त्रियों के प्रति होते जघन्य अपराधों ने, समाज में स्त्रियों के प्रति सम्मानहीनता की भावना ने, उस के अपने मातापिता ने, और खुद उस की विवेक बुद्धि ने रश्मि को समझा दिया था कि स्त्री होने का मतलब एक ही चीज है और कोई भी पुरुष उसी चीज की लालसा से स्त्री के पास आता है और स्त्री का एकमात्र काम उस चीज को बचाए रखना है.

उसे सिमोन डे बौयर की वह बात याद आती थी, जिस में उस ने बहुत अच्छे शब्दों में कहा था कि स्त्री जन्म नहीं लेती, उसे स्त्री बनाया जाता है.
पराए मर्दों को अपना दुश्मन समझना और एक तरह से घरघुसिया हो कर ही रह जाना, रश्मि को स्त्री का यही धर्म समझाया गया था, और यही उस ने अपना लिया था.

विवाह से पहले रश्मि अपने मातापिता के संरक्षण में सुरक्षित रही और विवाह के बाद उस ने अपने पति, बच्चों और रिश्तेदारों को ही अपना दायरा मान लिया.

उस ने देखा था कि अगर कोई स्त्री किसी पुरुष से हंस कर दो बातें भी कर लेती है, तो वह और दूसरे लोग भी उसे उस की  प्रेमिका समझने में देर नहीं लगाते. तुरंत बातें होने लगती हैं और यहां तक पहुंच जाती हैं कि दोनों में शारीरिक संबंध हैं.

स्त्री जहां पुरुषों में मित्रता, सहृदयता, उदारता, करुणा और अपनेपन की भावना तलाशती है, तो वहीं पुरुष की उस के रूपरंग, शरीर के आकारप्रकार पर ही नजर रहती है. अंतर बस इतना हो सकता है कि कुछ इस मामले में इतने निर्लज्ज होते हैं कि अपनी अंतिम भावनाओं को छिपाते नहीं हैं, और कुछ इतने संवेदनशील, इतने संकोची होते हैं कि अपनी भावनाओं का पता ही नहीं चलने देते.

लेकिन, कुलमिला कर दोनों प्रकार के लोगों का लक्ष्य एक ही होता है. जिस काम के लिए स्त्री को खुद को भावनात्मक रूप से तैयार करने की जरूरत होती है, उस के लिए पुरुष को केवल स्थान की जरूरत होती है.

ऐसा नहीं था कि रश्मि को पुरुषों का साथ पसंद नहीं था. हकीकत यह थी कि वह स्त्रियों के मुकाबले पुरुषों का साथ ज्यादा पसंद करती थी. उस ने स्त्रियों के व्यवहार में एक तरह की रूटीन बातें देखी थी. वे ही घिसीपिटी घरगृहस्थी की बातें या दफ्तर की गौसिप. वहां उसे स्वार्थपरता और संकीर्णता भी नजर आती थी.

वहीं, पुरुषों में यह स्वार्थपरता और संकीर्णता नजर नहीं आती थी, लेकिन वहां स्वार्थपरता और संकीर्णता के दूसरे ही मायने हो जाते थे. यही वजह थी कि वह इन चीजों से दूर ही रहती थी. उस ने अपने लिए एक ऐसा कवच जैसा बना लिया था, जिसे भेद पाना पुरुषों के लिए मुश्किल था.
रश्मि को ऐसी फिल्में भी पसंद नहीं आती थीं, जिस में स्त्री को केवल प्रदर्शन की वस्तु के रूप में दिखाया जाता, यानी उसे ज्यादातर हिंदी फिल्में पसंद नहीं आती थीं. उस की अकसर लोगों से खूब बहस हो जाती थी, जब वे स्त्री की कुशलता, बुद्धिमत्ता, कर्मठता आदि को मान्यता देने के बजाय इस बारे में बात करते थे कि स्त्री के आगे बढ़ने का कारण मुख्य रूप से उस का स्त्री होना ही है.

उन की बातें सुन कर रश्मि अकसर सोचा करती थी कि अगर सिर्फ बुद्धिमत्ता, कर्मठता, कुशलता आदि ही ज्यादा महत्व की वस्तुएं हैं, तो स्त्रियां इतना सजतीसंवरती क्यों हैं? वे किस के लिए सोलह सिंगार कर के घर से बाहर निकलती हैं? ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि वे ऐसा अपने लिए ही करती हैं, क्योंकि सजनेधजने के बाद वे चाहती हैं कि लोग उन्हें देखें, उन की तारीफ करें, उन्हें पसंद करें.
खुद उसे भी अच्छे ढंग से रहना, बननासंवरना, अच्छे कपड़े पहनना पसंद आता था. लोग उसे देखें, पसंद करें, तारीफ करें, यह अच्छा लगता था. लेकिन इस सब के माध्यम से अगर पुरुष उस के साथ सिर्फ शारीरिक संबंध ही बनाना चाहते थे, तो यह उस की समझ के परे की बात थी. ऐसे में वह नरेश से कैसे बदला ले कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

नरेश के सामने अपनी अहमियत जताने के इरादे को अंजाम देने के लिए सब से पहले रश्मि को अनिल की याद आई.

रश्मि ने उसे फोन किया और उस के साथ अपनी दोस्ती को प्रेम में बदलने का निश्चय किया. दोनों एकदूसरे के साथ बाहर जाने लगे, जिस के द्वारा रश्मि यह दिखाना चाहती थी कि नरेश की तरह वह भी कर सकती है, उस के पास किसी तरह की कमी नहीं है.

इस संबंध में भी रश्मि ने अपनी सीमा को बनाए रखा. उस ने किसी तरह की लक्ष्मण रेखा पार नहीं की. और शायद यही कारण था कि यह संबंध बहुत आगे नहीं जाने वाला था.

एक बार ऐसा हुआ कि उस ने अनिल के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम बनाया. रश्मि तो वहां समय पर पहुंच गई, पर वह बिना कोई सूचना दिए नहीं आया.

रश्मि को आघात जैसा लगा. उस की समझ में नहीं आया कि इस धोखे को वह किस तरह से बरदाश्त करे.

जब रश्मि को कुछ और नहीं सूझा, तो उस ने बिना सोचेसमझे नरेश को फोन किया, सारी स्थिति बताई और कहा कि वह बहुत बेचैन है. वह उसे तुरंत आ कर ले जाए.

नरेश रश्मि को लेने चला गया. उस का मूड ठीक करने की नरेश ने भरसक कोशिश की. अच्छा खाना खिलाया और मौल में घुमाया. उस के लिए उपहार खरीदे. यहां तक कि उसे खुश करने के लिए अनिल को फोन भी किया.

नरेश के लिए इस सारे प्रसंग में आशा की एक किरण यह थी कि वह समझ रहा था कि इस घटना के बाद शायद अनिल के साथ रश्मि का मिलनाजुलना कम हो जाए.

हालांकि रश्मि द्वारा अनिल के लिए रोजरोज लंच लाने की बात उसे जंच नहीं रही थी. जब  रश्मि को छुट्टी लेनी पड़ती थी, ऐसे दिनों में वह नरेश से उस के लिए लंच ले जाने की पेशकश करती थी.

कहा जाता है कि पुरुष के दिल का रास्ता उस के पेट से हो कर गुजरता है. पता नहीं, यह बात यहां कितनी लागू होती है, लेकिन यह जरूर हुआ कि उन दोनों की प्रगाढ़ता बढ़ने लगी. वे अकसर बाहर मिलते, दफ्तर से घर पहुंचने पर फोन पर लंबीलंबी बातें होतीं.

रश्मि अनिल की एकएक चीज के बारे में पता करने की कोशिश करती और दूर रहते हुए भी उस की हर जरूरत का खयाल रखने की कोशिश करती. उसे सलाह देती, कोंचकोंच कर पूछती रहती थी कि खाना खाया कि नहीं?

कुलमिला कर वह अनिल के लिए एक तरह से भौतिक और मानसिक दोनों तरह का संबल बनती चली गई. उधर रश्मि का पति, बेटा और बेटी, उस की मां, बहन, भाई, सहेलियां और बाकी दूसरे रिश्तेदार भी उस से हमेशा शिकायत करने लगे कि भई तू रहती कहां है? जब भी फोन करते हैं, तो तेरा फोन बिजी रहता है. तू हम से बहुत कम मिलती है.

जवाब में या तो रश्मि मुसकरा देती या इस का जवाब टाल देती, क्योंकि उसे पता था कि उस का ज्यादातर समय अब अनिल के लिए निर्धारित हो गया था, जिसे वह किसी को बता नहीं सकती थी.

नरेश को कुछ संदेह होने लगा था कि यह बात अब लंच ले जाने तक ही सीमित नहीं रही और आगे बढ़ चुकी है.

वह रश्मि पर संदेह नहीं करना चाहता था, लेकिन शायद उस दायरे में घुसने की कोशिश करने लगा था.

एक बार जब नरेश ने रश्मि को दफ्तर में फोन कर के बताया कि आज का लंच बहुत अच्छा था, तो रश्मि ने कहा कि हां, क्यों अच्छा नहीं होगा. आखिर किस की देखरेख में बनता है. और तुम ही नहीं, बहुत सारे लोग तारीफ करते हैं.

नरेश समझ गया कि उस का इशारा अपने बौस की तरफ था, लेकिन वह कुछ बोला नहीं. बोलता भी क्या.

एक बार नरेश का जन्मदिन था, तो उस ने देखा कि रश्मि रसोई में कुछ काम कर रही है और फोन पर बातें भी कर रही है.

यह देख नरेश को गुस्सा आ गया. वह चिल्ला कर बोला, “यह क्या मतलब है? किसी दिन तो हमारे लिए भी समय निकाल लिया करो.”

रश्मि ने फोन काट दिया. लेकिन, वह अपनी नाराजगी दिखाने से बाज नहीं आई. उस ने नरेश को सख्ती से कहा, “इस तरह की झल्लाहट ठीक नहीं है. अगर तुम्हें कोई चीज गलत लगती है, तो सीधेसीधे कह दो. मैं उसे तुरंत बंद कर दूंगी.”

नरेश को बात बदल कर कहना पड़ा, “भई, आज मेरा जन्मदिन है. आज का दिन तो मेरा अपना दिन है. इसलिए तुम्हारा सारा समय मेरे लिए होना चाहिए.”

और इस तरह से बात को रफादफा करने की कोशिश की, लेकिन इस का खमियाजा उसे कुछ दिन तक तो रश्मि को मनाने में लगाना पड़ा, क्योंकि इस बात से रश्मि का मन फिर से उखड़ गया था.

नरेश को सबक सिखाने के चक्कर में रश्मि अपने और अनिल के रिश्ते को खुद ही समझ नहीं पा रही थी. वह नरेश से बहुत प्यार करती थी, पर उसे सबक भी सिखाना चाहती थी. इसी उधेड़बुन में वह बीमार रहने लगी. उस ने कुछ दिनों के लिए औफिस से छुट्टी ले ली.

अब अनिल को लंच कैसे पहुंचाया जाए, यह समस्या उस के सामने खड़ी थी. उस ने नरेश को ही यह काम सौंपा. नरेश न चाहते हुए भी इस काम के लिए तैयार हो गया

अगली सुबह रश्मि ने खासतौर पर अनिल के लिए उस के मनपसंद रसगुल्ले बनाए और लंच में उस की पसंद की चीजें रखीं. जबकि नरेश के लिए साधारण लंच रखा. यह सब उसे जलाने के लिए किया था. नरेश ने अपनी चिढ़ छिपाते हुए स्थिति को संभालने की कोशिश की.

और फिर नरेश ने रश्मि को छेड़ने के लिए कहा, “क्या बात है, बहुत प्यार से बौस के लिए लंच लगाया जा रहा है. आज तो मैं इसे ले जाऊंगा.”

रश्मि ने नरेश की बात को मजाक समझ कर टाल दिया, लेकिन हंसीहंसी में जानबूझ कर नरेश बौस का ही लंच बौक्स ले कर चलता बना.

रश्मि रसोईघर में लौटी, तो उस ने देखा कि नरेश का लंच बौक्स वहीं पड़ा है और बौस का नदारद है.

यह देख रश्मि को नरेश पर बेहद गुस्सा आया कि देखो, बौस का लंच खुद खाने के चक्कर में अनिल क्या खाएगा, यह भी नहीं सोचा.

अगले दिन भी नरेश ने यही किया. यह देख रश्मि बेहद परेशान थी. वह सोचने लगी कि अब क्या वह बौस के लिए अपने पति का लंच बौक्स ले कर जाए.

वह तुरंत तैयार हो कर पति नरेश का लंच ले कर औफिस के लिए निकल पड़ी. वहां अनिल उसे देख कर बोला, ‘‘अरे, बीमारी की हालत में तुम क्यों औफिस आई हो?’’

इस पर रश्मि ने लंच न पहुंचाने के लिए माफी मांगी और पति नरेश वाला लंच बौक्स उसे दिया. अनिल ने बेहद हैरान होते हुए कहा, ‘‘माफी किसलिए…? लंच तो रोज नरेश दे कर जा रहे हैं.’’

अब रश्मि हैरानपरेशान थी. उस ने मन में सोचा कि फिर नरेश इतने दिनों से क्या खा रहे हैं ?

वह जानती थी कि नरेश बाहर का खाना नहीं खाते हैं, वह उसी समय नरेश के औफिस पहुंची. और वह लंच नरेश को भिजवाया. नरेश उसे बेहद प्यार करते हैं, उसे यह समझ में आ चुका था.

नाहक ही नादानी में वह उस से बदला लेने चली थी. एक अनिल था, जो उसे लेने तक नहीं आया और एक नरेश हैं, जो नाराज हो कर भी अपनी पत्नी का वादा निभा रहे हैं. एक उस का प्यार है, जो बदला चाहता है और पति नरेश नाराजगी भी खुद भूखे रह कर बड़े प्यार से निभा रहे हैं.

‘चाहने वाले तुम्हें और भी हैं,’’ जितना सहज हो कर नरेश कहते हैं, क्यों वह उस के लिए सहज नहीं हो पाई. आज उसे लंच बौक्स में प्यार की एक नई परिभाषा समझ में आई

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विवाह से पहले ही समाज की विभिन्न स्थितियों ने, लोगों की उस पर पड़ने वाली नजरों ने, समाज में स्त्रियों के प्रति होते जघन्य अपराधों ने, समाज में स्त्रियों के प्रति सम्मानहीनता की भावना ने, उस के अपने मातापिता ने, और खुद उस की विवेक बुद्धि ने रश्मि को समझा दिया था कि स्त्री होने का मतलब एक ही चीज है और कोई भी पुरुष उसी चीज की लालसा से स्त्री के पास आता है और स्त्री का एकमात्र काम उस चीज को बचाए रखना है.

उसे सिमोन डे बौयर की वह बात याद आती थी, जिस में उस ने बहुत अच्छे शब्दों में कहा था कि स्त्री जन्म नहीं लेती, उसे स्त्री बनाया जाता है.
पराए मर्दों को अपना दुश्मन समझना और एक तरह से घरघुसिया हो कर ही रह जाना, रश्मि को स्त्री का यही धर्म समझाया गया था, और यही उस ने अपना लिया था.

विवाह से पहले रश्मि अपने मातापिता के संरक्षण में सुरक्षित रही और विवाह के बाद उस ने अपने पति, बच्चों और रिश्तेदारों को ही अपना दायरा मान लिया.

उस ने देखा था कि अगर कोई स्त्री किसी पुरुष से हंस कर दो बातें भी कर लेती है, तो वह और दूसरे लोग भी उसे उस की  प्रेमिका समझने में देर नहीं लगाते. तुरंत बातें होने लगती हैं और यहां तक पहुंच जाती हैं कि दोनों में शारीरिक संबंध हैं.

स्त्री जहां पुरुषों में मित्रता, सहृदयता, उदारता, करुणा और अपनेपन की भावना तलाशती है, तो वहीं पुरुष की उस के रूपरंग, शरीर के आकारप्रकार पर ही नजर रहती है. अंतर बस इतना हो सकता है कि कुछ इस मामले में इतने निर्लज्ज होते हैं कि अपनी अंतिम भावनाओं को छिपाते नहीं हैं, और कुछ इतने संवेदनशील, इतने संकोची होते हैं कि अपनी भावनाओं का पता ही नहीं चलने देते.

लेकिन, कुलमिला कर दोनों प्रकार के लोगों का लक्ष्य एक ही होता है. जिस काम के लिए स्त्री को खुद को भावनात्मक रूप से तैयार करने की जरूरत होती है, उस के लिए पुरुष को केवल स्थान की जरूरत होती है.

ऐसा नहीं था कि रश्मि को पुरुषों का साथ पसंद नहीं था. हकीकत यह थी कि वह स्त्रियों के मुकाबले पुरुषों का साथ ज्यादा पसंद करती थी. उस ने स्त्रियों के व्यवहार में एक तरह की रूटीन बातें देखी थी. वे ही घिसीपिटी घरगृहस्थी की बातें या दफ्तर की गौसिप. वहां उसे स्वार्थपरता और संकीर्णता भी नजर आती थी.

वहीं, पुरुषों में यह स्वार्थपरता और संकीर्णता नजर नहीं आती थी, लेकिन वहां स्वार्थपरता और संकीर्णता के दूसरे ही मायने हो जाते थे. यही वजह थी कि वह इन चीजों से दूर ही रहती थी. उस ने अपने लिए एक ऐसा कवच जैसा बना लिया था, जिसे भेद पाना पुरुषों के लिए मुश्किल था.
रश्मि को ऐसी फिल्में भी पसंद नहीं आती थीं, जिस में स्त्री को केवल प्रदर्शन की वस्तु के रूप में दिखाया जाता, यानी उसे ज्यादातर हिंदी फिल्में पसंद नहीं आती थीं. उस की अकसर लोगों से खूब बहस हो जाती थी, जब वे स्त्री की कुशलता, बुद्धिमत्ता, कर्मठता आदि को मान्यता देने के बजाय इस बारे में बात करते थे कि स्त्री के आगे बढ़ने का कारण मुख्य रूप से उस का स्त्री होना ही है.

उन की बातें सुन कर रश्मि अकसर सोचा करती थी कि अगर सिर्फ बुद्धिमत्ता, कर्मठता, कुशलता आदि ही ज्यादा महत्व की वस्तुएं हैं, तो स्त्रियां इतना सजतीसंवरती क्यों हैं? वे किस के लिए सोलह सिंगार कर के घर से बाहर निकलती हैं? ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि वे ऐसा अपने लिए ही करती हैं, क्योंकि सजनेधजने के बाद वे चाहती हैं कि लोग उन्हें देखें, उन की तारीफ करें, उन्हें पसंद करें.
खुद उसे भी अच्छे ढंग से रहना, बननासंवरना, अच्छे कपड़े पहनना पसंद आता था. लोग उसे देखें, पसंद करें, तारीफ करें, यह अच्छा लगता था. लेकिन इस सब के माध्यम से अगर पुरुष उस के साथ सिर्फ शारीरिक संबंध ही बनाना चाहते थे, तो यह उस की समझ के परे की बात थी. ऐसे में वह नरेश से कैसे बदला ले कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

नरेश के सामने अपनी अहमियत जताने के इरादे को अंजाम देने के लिए सब से पहले रश्मि को अनिल की याद आई.

रश्मि ने उसे फोन किया और उस के साथ अपनी दोस्ती को प्रेम में बदलने का निश्चय किया. दोनों एकदूसरे के साथ बाहर जाने लगे, जिस के द्वारा रश्मि यह दिखाना चाहती थी कि नरेश की तरह वह भी कर सकती है, उस के पास किसी तरह की कमी नहीं है.

इस संबंध में भी रश्मि ने अपनी सीमा को बनाए रखा. उस ने किसी तरह की लक्ष्मण रेखा पार नहीं की. और शायद यही कारण था कि यह संबंध बहुत आगे नहीं जाने वाला था.

एक बार ऐसा हुआ कि उस ने अनिल के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम बनाया. रश्मि तो वहां समय पर पहुंच गई, पर वह बिना कोई सूचना दिए नहीं आया.

रश्मि को आघात जैसा लगा. उस की समझ में नहीं आया कि इस धोखे को वह किस तरह से बरदाश्त करे.

जब रश्मि को कुछ और नहीं सूझा, तो उस ने बिना सोचेसमझे नरेश को फोन किया, सारी स्थिति बताई और कहा कि वह बहुत बेचैन है. वह उसे तुरंत आ कर ले जाए.

नरेश रश्मि को लेने चला गया. उस का मूड ठीक करने की नरेश ने भरसक कोशिश की. अच्छा खाना खिलाया और मौल में घुमाया. उस के लिए उपहार खरीदे. यहां तक कि उसे खुश करने के लिए अनिल को फोन भी किया.

नरेश के लिए इस सारे प्रसंग में आशा की एक किरण यह थी कि वह समझ रहा था कि इस घटना के बाद शायद अनिल के साथ रश्मि का मिलनाजुलना कम हो जाए.

हालांकि रश्मि द्वारा अनिल के लिए रोजरोज लंच लाने की बात उसे जंच नहीं रही थी. जब  रश्मि को छुट्टी लेनी पड़ती थी, ऐसे दिनों में वह नरेश से उस के लिए लंच ले जाने की पेशकश करती थी.

कहा जाता है कि पुरुष के दिल का रास्ता उस के पेट से हो कर गुजरता है. पता नहीं, यह बात यहां कितनी लागू होती है, लेकिन यह जरूर हुआ कि उन दोनों की प्रगाढ़ता बढ़ने लगी. वे अकसर बाहर मिलते, दफ्तर से घर पहुंचने पर फोन पर लंबीलंबी बातें होतीं.

रश्मि अनिल की एकएक चीज के बारे में पता करने की कोशिश करती और दूर रहते हुए भी उस की हर जरूरत का खयाल रखने की कोशिश करती. उसे सलाह देती, कोंचकोंच कर पूछती रहती थी कि खाना खाया कि नहीं?

कुलमिला कर वह अनिल के लिए एक तरह से भौतिक और मानसिक दोनों तरह का संबल बनती चली गई. उधर रश्मि का पति, बेटा और बेटी, उस की मां, बहन, भाई, सहेलियां और बाकी दूसरे रिश्तेदार भी उस से हमेशा शिकायत करने लगे कि भई तू रहती कहां है? जब भी फोन करते हैं, तो तेरा फोन बिजी रहता है. तू हम से बहुत कम मिलती है.

जवाब में या तो रश्मि मुसकरा देती या इस का जवाब टाल देती, क्योंकि उसे पता था कि उस का ज्यादातर समय अब अनिल के लिए निर्धारित हो गया था, जिसे वह किसी को बता नहीं सकती थी.

नरेश को कुछ संदेह होने लगा था कि यह बात अब लंच ले जाने तक ही सीमित नहीं रही और आगे बढ़ चुकी है.

वह रश्मि पर संदेह नहीं करना चाहता था, लेकिन शायद उस दायरे में घुसने की कोशिश करने लगा था.

एक बार जब नरेश ने रश्मि को दफ्तर में फोन कर के बताया कि आज का लंच बहुत अच्छा था, तो रश्मि ने कहा कि हां, क्यों अच्छा नहीं होगा. आखिर किस की देखरेख में बनता है. और तुम ही नहीं, बहुत सारे लोग तारीफ करते हैं.

नरेश समझ गया कि उस का इशारा अपने बौस की तरफ था, लेकिन वह कुछ बोला नहीं. बोलता भी क्या.

एक बार नरेश का जन्मदिन था, तो उस ने देखा कि रश्मि रसोई में कुछ काम कर रही है और फोन पर बातें भी कर रही है.

यह देख नरेश को गुस्सा आ गया. वह चिल्ला कर बोला, “यह क्या मतलब है? किसी दिन तो हमारे लिए भी समय निकाल लिया करो.”

रश्मि ने फोन काट दिया. लेकिन, वह अपनी नाराजगी दिखाने से बाज नहीं आई. उस ने नरेश को सख्ती से कहा, “इस तरह की झल्लाहट ठीक नहीं है. अगर तुम्हें कोई चीज गलत लगती है, तो सीधेसीधे कह दो. मैं उसे तुरंत बंद कर दूंगी.”

नरेश को बात बदल कर कहना पड़ा, “भई, आज मेरा जन्मदिन है. आज का दिन तो मेरा अपना दिन है. इसलिए तुम्हारा सारा समय मेरे लिए होना चाहिए.”

और इस तरह से बात को रफादफा करने की कोशिश की, लेकिन इस का खमियाजा उसे कुछ दिन तक तो रश्मि को मनाने में लगाना पड़ा, क्योंकि इस बात से रश्मि का मन फिर से उखड़ गया था.

नरेश को सबक सिखाने के चक्कर में रश्मि अपने और अनिल के रिश्ते को खुद ही समझ नहीं पा रही थी. वह नरेश से बहुत प्यार करती थी, पर उसे सबक भी सिखाना चाहती थी. इसी उधेड़बुन में वह बीमार रहने लगी. उस ने कुछ दिनों के लिए औफिस से छुट्टी ले ली.

अब अनिल को लंच कैसे पहुंचाया जाए, यह समस्या उस के सामने खड़ी थी. उस ने नरेश को ही यह काम सौंपा. नरेश न चाहते हुए भी इस काम के लिए तैयार हो गया

अगली सुबह रश्मि ने खासतौर पर अनिल के लिए उस के मनपसंद रसगुल्ले बनाए और लंच में उस की पसंद की चीजें रखीं. जबकि नरेश के लिए साधारण लंच रखा. यह सब उसे जलाने के लिए किया था. नरेश ने अपनी चिढ़ छिपाते हुए स्थिति को संभालने की कोशिश की.

और फिर नरेश ने रश्मि को छेड़ने के लिए कहा, “क्या बात है, बहुत प्यार से बौस के लिए लंच लगाया जा रहा है. आज तो मैं इसे ले जाऊंगा.”

रश्मि ने नरेश की बात को मजाक समझ कर टाल दिया, लेकिन हंसीहंसी में जानबूझ कर नरेश बौस का ही लंच बौक्स ले कर चलता बना.

रश्मि रसोईघर में लौटी, तो उस ने देखा कि नरेश का लंच बौक्स वहीं पड़ा है और बौस का नदारद है.

यह देख रश्मि को नरेश पर बेहद गुस्सा आया कि देखो, बौस का लंच खुद खाने के चक्कर में अनिल क्या खाएगा, यह भी नहीं सोचा.

अगले दिन भी नरेश ने यही किया. यह देख रश्मि बेहद परेशान थी. वह सोचने लगी कि अब क्या वह बौस के लिए अपने पति का लंच बौक्स ले कर जाए.

वह तुरंत तैयार हो कर पति नरेश का लंच ले कर औफिस के लिए निकल पड़ी. वहां अनिल उसे देख कर बोला, ‘‘अरे, बीमारी की हालत में तुम क्यों औफिस आई हो?’’

इस पर रश्मि ने लंच न पहुंचाने के लिए माफी मांगी और पति नरेश वाला लंच बौक्स उसे दिया. अनिल ने बेहद हैरान होते हुए कहा, ‘‘माफी किसलिए…? लंच तो रोज नरेश दे कर जा रहे हैं.’’

अब रश्मि हैरानपरेशान थी. उस ने मन में सोचा कि फिर नरेश इतने दिनों से क्या खा रहे हैं ?

वह जानती थी कि नरेश बाहर का खाना नहीं खाते हैं, वह उसी समय नरेश के औफिस पहुंची. और वह लंच नरेश को भिजवाया. नरेश उसे बेहद प्यार करते हैं, उसे यह समझ में आ चुका था.

नाहक ही नादानी में वह उस से बदला लेने चली थी. एक अनिल था, जो उसे लेने तक नहीं आया और एक नरेश हैं, जो नाराज हो कर भी अपनी पत्नी का वादा निभा रहे हैं. एक उस का प्यार है, जो बदला चाहता है और पति नरेश नाराजगी भी खुद भूखे रह कर बड़े प्यार से निभा रहे हैं.

‘चाहने वाले तुम्हें और भी हैं,’’ जितना सहज हो कर नरेश कहते हैं, क्यों वह उस के लिए सहज नहीं हो पाई. आज उसे लंच बौक्स में प्यार की एक नई परिभाषा समझ में आई

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June 02, 2020 at 10:00AM

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