Tuesday, 1 September 2020

पहचान-भाग 3: रामलला चाचा के घर आने से बच्चे क्यों उत्साहित थे?

‘‘मगर सब की ‘नहीं’ ने हमारे मुंह पर ताला डाल दिया. रामलालजी को तो कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती. वे चुस्ती से, मुस्तैदी से और स्वयं अपनी समझ से हमारी मदद कर रहे थे, जैसे सचमुच इन के छोटे भाई हों. अखिलेश के लाख कहने पर भी उन्होंने उसे एक भी दिन अस्पताल में नहीं रुकने दिया. वे कहते, ‘‘इस की परीक्षा है, बेकार पढ़ाई का नुकसान होगा.’’

एक रोज जब हमेशा की तरह वे इन के लिए फल वगैरह ले आए तब मैं ने उन से फलों के पैसों के बारे में पूछा. सुनते ही वे बिगड़ गए, ‘‘भाभीजी, मैं ने तो आप लोगों को कभी पराया नहीं समझा. आप इस तरह की बात कह कर मेरी भावना को चोट न पहुंचाएं.’’

उन की इस बात से स्वयं अपनी ही कही एक बात मुझे कचोटने लगी, ‘बड़ा चाचा बना फिरता है बच्चों का. इतनी बार हमारे यहां खाता है पर यह नहीं कि बच्चों के लिए ही कुछ लेता आए.’ आज वे जो कुछ हमारे लिए, बच्चों के लिए कर रहे थे, क्या किसी नजदीकी रिश्तेदार से कम था. आज के जमाने में तो रिश्तेदार तक मुंह फेर लेते हैं.

रामलालजी के जाने के बाद यह भावविभोर हो कर बोले, ‘‘कितना करता है हमारे लिए. यह नहीं होता तो न जाने हमारा क्या हाल होता. उस रोज तो शायद मैं अस्पताल भी नहीं पहुंच पाता.’’

मेरे पास तो रामलालजी के विषय में बात करने के लिए शब्द ही नहीं थे. मैं ने उन्हें क्या समझा था और क्या निकले वे. मुझे इस व्यक्ति से इस कदर नफरत हो गई थी कि अकसर ही इन से पूछती, ‘‘आप की कैसे इस निपट गंवार से दोस्ती हो गई?’’

‘‘क्योंकि मैं इसे पहचानता हूं न अच्छी तरह. इस के मन में न तो किसी के लिए ईर्ष्या है न बदले की भावना.’’

‘‘यों कहिए न कि उन में प्रतिस्पर्धा की भावना नहीं है, इसी कारण तो पिछले वर्ष तरक्की नहीं ले पाए.’’

‘‘प्रतिस्पर्धा की भावना नहीं है, यह बात नहीं है पर लक्ष्य को गलत ढंग से प्राप्त करने की कामना नहीं है,’’ ये कहते.

‘‘आजकल ईमानदारी का ढोल पीटने से कुछ होता है भला. ये क्या जानें कि वरिष्ठों को कैसे प्रभावित किया जाता है, देहाती जो ठहरे.’’

‘‘सुजाता, मैं भी मध्यम वर्ग से आया हूं. इतना जरूर जानता हूं कि इंसानी जीवनमूल्य झूठी सफलताओं से बढ़ कर है.’’

इन की बात कितनी सही थी, इस बात का मुझे आज पता चला.

इन की हालत सुधरती जा रही थी. आखिर वह दिन भी आया जब इन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. रामलालजी टैक्सी ले आए और हमसब इन्हें ले कर घर आ गए. घर आते वक्त मुझे लग रहा था, जैसे मैं एक लंबा सफर कर के आई हूं. इस अनुभव ने मुझे बहुत कुछ सीखनेसमझने का मौका दिया. सच कहा है कि इंसान की सही पहचान मुसीबत के समय होती है.

अभी डाक्टर ने इन्हें 15 दिन पूर्ण आराम करने की सलाह दी थी. अत: ये पूरे आराम के साथ घर में बिस्तर पर पड़े रहते थे. उस रोज रामलालजी दफ्तर से सीधे घर आए.

‘‘कैसे हैं भैया अब?’’ उन्होंने हमेशा की तरह ठेठ ग्रामीण लहजे में पूछा.

‘‘ठीक हैं, आइए,’’ मैं ने उन का भरपूर स्वागत किया.

सुरभि बाहर खेलने जा रही थी. ‘‘अरे, रामलाल चाचा आए हैं, मैं थोड़ी देर बाद खेलने जाऊंगी,’’ वह बोली. अखिलेश कुछ पढ़ रहा था. वह भी बैठक में आ गया.

रामलालजी अपने पुराने फौर्म में लौट आए. वही पुरानी घटनाएं, खेतखलिहान, जमीन, घर, गांव की बातें. पर आज उन का श्रोतावर्ग अपेक्षाकृत बड़ा था और बड़े ध्यान से उन की बातें सुन रहा था.

‘इतने संघर्षों को कैसे पार किया होगा इन्होंने अकेले ही? कैसे हर मोरचे पर खुद ही डटे होंगे? इन के चाचाओं ने इन के पिता की मृत्यु के बाद सारी जायदाद हड़प ली तो सड़क पर ही आ खड़े हुए थे बेचारे. उस सड़क से वापस घर तक जाने में कितना फासला तय करना पड़ा होगा.’ मेरे मन में उन के प्रति श्रद्धाभाव जाग उठा.

उन के सारे अनुभवों को मैं आज बिलकुल नई दृष्टि से देख रही थी. इतनी तकलीफें अकेले उठाईं. इसलिए वे सारी घटनाएं उन्हें हमेशा के लिए याद हो गईं. बहुत दिनों से रुका हुआ पानी जिस तरह निकलने का मार्ग पाते ही पूरे वेग से बह निकलता है, उसी तरह उन की सारी व्यथा इन से मिल कर और अपनत्व पा कर शब्दरूप में बह निकली. क्या इन के अनुभव हम सब के लिए अनमोल थाती नहीं थे?

‘‘चाचा, आप ने बेहद बहादुरी से अपने जीवन की यह लड़ाई खुद लड़ी. वक्त की नजाकत को समझते हुए आप ने अपनी शिक्षा भी पूरी की. मैं तो अभी भी डांटडपट के बगैर पढ़लिख नहीं पाता,’’ अखिलेश पूरे उत्साह व गंभीरता से कह रहा था.

‘‘हालात सब कुछ सिखा देते हैं, बेटे.’’

ये अर्थपूर्ण दृष्टि से मुझे देख रहे थे. वातावरण कुछ बोझिल हो गया था. हमारी चुप्पी से वे समझे कि हम लोग उन की बातों से बोर हो रहे हैं.  अत: उठने का उपक्रम करने लगे कि हठात मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘‘अभी बैठिए न भाई साहब, मैं आप के लिए एक गिलास मलाईदार चाय बना कर लाती हूं.’’

 

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‘‘मगर सब की ‘नहीं’ ने हमारे मुंह पर ताला डाल दिया. रामलालजी को तो कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती. वे चुस्ती से, मुस्तैदी से और स्वयं अपनी समझ से हमारी मदद कर रहे थे, जैसे सचमुच इन के छोटे भाई हों. अखिलेश के लाख कहने पर भी उन्होंने उसे एक भी दिन अस्पताल में नहीं रुकने दिया. वे कहते, ‘‘इस की परीक्षा है, बेकार पढ़ाई का नुकसान होगा.’’

एक रोज जब हमेशा की तरह वे इन के लिए फल वगैरह ले आए तब मैं ने उन से फलों के पैसों के बारे में पूछा. सुनते ही वे बिगड़ गए, ‘‘भाभीजी, मैं ने तो आप लोगों को कभी पराया नहीं समझा. आप इस तरह की बात कह कर मेरी भावना को चोट न पहुंचाएं.’’

उन की इस बात से स्वयं अपनी ही कही एक बात मुझे कचोटने लगी, ‘बड़ा चाचा बना फिरता है बच्चों का. इतनी बार हमारे यहां खाता है पर यह नहीं कि बच्चों के लिए ही कुछ लेता आए.’ आज वे जो कुछ हमारे लिए, बच्चों के लिए कर रहे थे, क्या किसी नजदीकी रिश्तेदार से कम था. आज के जमाने में तो रिश्तेदार तक मुंह फेर लेते हैं.

रामलालजी के जाने के बाद यह भावविभोर हो कर बोले, ‘‘कितना करता है हमारे लिए. यह नहीं होता तो न जाने हमारा क्या हाल होता. उस रोज तो शायद मैं अस्पताल भी नहीं पहुंच पाता.’’

मेरे पास तो रामलालजी के विषय में बात करने के लिए शब्द ही नहीं थे. मैं ने उन्हें क्या समझा था और क्या निकले वे. मुझे इस व्यक्ति से इस कदर नफरत हो गई थी कि अकसर ही इन से पूछती, ‘‘आप की कैसे इस निपट गंवार से दोस्ती हो गई?’’

‘‘क्योंकि मैं इसे पहचानता हूं न अच्छी तरह. इस के मन में न तो किसी के लिए ईर्ष्या है न बदले की भावना.’’

‘‘यों कहिए न कि उन में प्रतिस्पर्धा की भावना नहीं है, इसी कारण तो पिछले वर्ष तरक्की नहीं ले पाए.’’

‘‘प्रतिस्पर्धा की भावना नहीं है, यह बात नहीं है पर लक्ष्य को गलत ढंग से प्राप्त करने की कामना नहीं है,’’ ये कहते.

‘‘आजकल ईमानदारी का ढोल पीटने से कुछ होता है भला. ये क्या जानें कि वरिष्ठों को कैसे प्रभावित किया जाता है, देहाती जो ठहरे.’’

‘‘सुजाता, मैं भी मध्यम वर्ग से आया हूं. इतना जरूर जानता हूं कि इंसानी जीवनमूल्य झूठी सफलताओं से बढ़ कर है.’’

इन की बात कितनी सही थी, इस बात का मुझे आज पता चला.

इन की हालत सुधरती जा रही थी. आखिर वह दिन भी आया जब इन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. रामलालजी टैक्सी ले आए और हमसब इन्हें ले कर घर आ गए. घर आते वक्त मुझे लग रहा था, जैसे मैं एक लंबा सफर कर के आई हूं. इस अनुभव ने मुझे बहुत कुछ सीखनेसमझने का मौका दिया. सच कहा है कि इंसान की सही पहचान मुसीबत के समय होती है.

अभी डाक्टर ने इन्हें 15 दिन पूर्ण आराम करने की सलाह दी थी. अत: ये पूरे आराम के साथ घर में बिस्तर पर पड़े रहते थे. उस रोज रामलालजी दफ्तर से सीधे घर आए.

‘‘कैसे हैं भैया अब?’’ उन्होंने हमेशा की तरह ठेठ ग्रामीण लहजे में पूछा.

‘‘ठीक हैं, आइए,’’ मैं ने उन का भरपूर स्वागत किया.

सुरभि बाहर खेलने जा रही थी. ‘‘अरे, रामलाल चाचा आए हैं, मैं थोड़ी देर बाद खेलने जाऊंगी,’’ वह बोली. अखिलेश कुछ पढ़ रहा था. वह भी बैठक में आ गया.

रामलालजी अपने पुराने फौर्म में लौट आए. वही पुरानी घटनाएं, खेतखलिहान, जमीन, घर, गांव की बातें. पर आज उन का श्रोतावर्ग अपेक्षाकृत बड़ा था और बड़े ध्यान से उन की बातें सुन रहा था.

‘इतने संघर्षों को कैसे पार किया होगा इन्होंने अकेले ही? कैसे हर मोरचे पर खुद ही डटे होंगे? इन के चाचाओं ने इन के पिता की मृत्यु के बाद सारी जायदाद हड़प ली तो सड़क पर ही आ खड़े हुए थे बेचारे. उस सड़क से वापस घर तक जाने में कितना फासला तय करना पड़ा होगा.’ मेरे मन में उन के प्रति श्रद्धाभाव जाग उठा.

उन के सारे अनुभवों को मैं आज बिलकुल नई दृष्टि से देख रही थी. इतनी तकलीफें अकेले उठाईं. इसलिए वे सारी घटनाएं उन्हें हमेशा के लिए याद हो गईं. बहुत दिनों से रुका हुआ पानी जिस तरह निकलने का मार्ग पाते ही पूरे वेग से बह निकलता है, उसी तरह उन की सारी व्यथा इन से मिल कर और अपनत्व पा कर शब्दरूप में बह निकली. क्या इन के अनुभव हम सब के लिए अनमोल थाती नहीं थे?

‘‘चाचा, आप ने बेहद बहादुरी से अपने जीवन की यह लड़ाई खुद लड़ी. वक्त की नजाकत को समझते हुए आप ने अपनी शिक्षा भी पूरी की. मैं तो अभी भी डांटडपट के बगैर पढ़लिख नहीं पाता,’’ अखिलेश पूरे उत्साह व गंभीरता से कह रहा था.

‘‘हालात सब कुछ सिखा देते हैं, बेटे.’’

ये अर्थपूर्ण दृष्टि से मुझे देख रहे थे. वातावरण कुछ बोझिल हो गया था. हमारी चुप्पी से वे समझे कि हम लोग उन की बातों से बोर हो रहे हैं.  अत: उठने का उपक्रम करने लगे कि हठात मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘‘अभी बैठिए न भाई साहब, मैं आप के लिए एक गिलास मलाईदार चाय बना कर लाती हूं.’’

 

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September 02, 2020 at 10:00AM

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