Monday, 1 March 2021

Women’s Day Special: यात्रान्त-भाग 3

सुबह की ठंडक में प्लेटफौर्म पर चहलपहल न के बराबर थी. लगभग सन्नाटा ही पसरा था. उस का कंपार्टमैंट प्लेटफौर्म से थोड़ा दूर आ कर रुका था. काले पड़ते पीपल के पेड़ों की डालियों से छन कर आता आकाश का फीका सा उजाला था. उस के नीचे लेटे भिखारियों का झुंड कटेफटे कम्बलों में खुद को सिकोड़ कर तल्लीनता से सोया हुआ था और उन के पास दुम दबाए लेटे कुत्तों का रहरह कर चींचींयाना जारी था. सन्नाटे में सुराख करती आवाजें…चाय अदरक वाली चाय…गरमागरम चाय… वहीं पास में झाड़ू मारता आदमी.

कितने गहरे होते है इंतजार के रंग, सोचतेसोचते सुजाता ने मानो अपने हाथों को सांत्वना देते हुए आपस में कस लिया था.

तभी सामने से अनिरुद्ध आता दिखाई दिया. थकी सी चाल में उम्र की गंभीरता उतर आई थी. सुजाता को देखते ही उस के चेहरे पर एकसाथ कई भाव आजा रहे थे. अनिरुद्ध ने जिन नजरों से उसे देखा, वह पल वहीं का वहीं ठहर गया था. एक रिश्ता जो कभी अपना था, एक इतिहास. साथ जिया उम्र का एक खूबसूरत हिस्सा. आज पहचान के दूसरे छोर पर खड़ा था. उस ठिठके हुए पल को धकेलने की हिम्मत दोनों में नहीं थी. दोनों को ही समझ नहीं आ रहा था कि किस तरह व्यवहार करें.

‘‘मुझे आने में देर तो नहीं हुई?’’

‘‘कैसे हो?’’

‘‘तुम बिलकुल भी नहीं बदलीं.’’

“तुम भी तो…’’ कहतेकहते रुक गई थी सुजाता. बदल तो पहले ही चुका था. पर सुदर्शन, हंसमुख, आकर्षक से अनिरुद्ध की जगह यह वाला अनिरुद्ध…कैसा लगने लगा था…बाल तेजी से कम हो चुके थे. झुकेझुके से कंधे. अनिरुद्ध की धंस चुकी आंखों के इर्दगिर्द खिंच आए वीरानगी के दायरों की भाषा को पढ़ने की नाकाम कोशिश करती सुजाता.

‘‘यह क्या हाल बना लिया है तुम ने, कहां थे इतने साल?’’

वह पल…लगा जैसे सदियों से वह इसी पल की ही तो प्रतीक्षा कर रही थी. गहरी सांसों के साथ रुके हुए आसूं छलक ही उठे थे.

अनिरुद्ध, बस, उसे एकटक देखता ही जा रहा था. वह बमुश्किल हाथ आए इन बेशकीमती पलों को मुट्ठी में बंद कर लेना चाहता था.

अपने प्रश्न का जवाब न पा कर सुजाता को कुछ झेंप सी होने लगी थी और वह दूसरी तरफ देखती हुई मानो हवा में उड़ते तिनकों को इकट्ठा करने का असफल प्रयत्न कर रही थी.

स्टेशन पर पसरे सन्नाटे का दिमाग में चल रहे कोलाहल से कोई वास्ता न था.

दोनों ही वर्तमान में नहीं थे. यादों की रील जैसे हाथ से छूट कर पीछे की ओर भाग रही थी. चुप्पीभरी इस बोझिलता को तोड़ते हुए अनिरुद्ध पूछ बैठा था, ‘‘कैसी हो सुजाता? मैं कहता था न कि तुम बिलकुल भी न बदलोगी.’’

‘‘नहीं, नहीं. देखो, मैं अब थोड़ी थोड़ी फैलने लगी हूं. बालों में सफेदी भी आने लगी है. इन 22 सालों में बहुतकुछ बदला है.’’

फीकी हंसी के साथ उस की आवाज कहीं सुदूर यादों के भंवर से अटकअटक कर आ रही थी और फिर इको करती हुई उन के बीच कहीं गुम हो गई थी.

‘‘मुझे विश्वास था सुजाता, तुम जरूर आओगी.’’

‘‘विश्वास??? कितना विश्वास था मुझे इस शब्द पर अनिरुद्ध,’’  न चाहते हुए भी गुस्सा छलक ही पड़ा था जबकि उम्र तो अपनी गति से चल ही रही थी.

‘‘सच, तुम जरा भी नहीं बदली,’’ हताश सा अनिरुद्ध बुदबुदा उठा था.

‘‘हां, मैं जरा भी नहीं बदली. पर तुम? मुझे कितनी सरलता से झाड़पोंछ कर खुद से अलग कर दिया तुम ने. तुम्हारा प्यार दिखावा मात्र था. क्या मेरे प्रति कोई दायित्व नहीं था तुम्हारा. यह प्रश्न एक लावे की तरह मेरे जेहन में हर वक्त उबलता रहता है. जब भी मैं अकेली होती हूं, तुम्हारी याद…न याद करने से परे का हर पल सालता दर्द कभी चेतना से मिटा ही नहीं. मेरे जीवन के इस चमकीले एहसास को अंधेरे में बदलने का क्या हक था तुम को? एक तुम्हीं थे जो उस वक्त मेरी जिंदगी में रोशनी या अंधेरे का होना निश्चित या निर्धारित कर सकते थे. फिर क्यों तुम ने मुझे अंधेरे के स्याह गर्त में धकेल दिया था?’’

‘‘उसी का फल भुगत रहा हूं सुजाता. मैं कैंसर की आखिरी स्टेज के करीब हूं. आंतों का यह कैंसर नासूर की तरह मेरे शरीर पर तेजी से फैल रहा है. तुम्हें दिया हुआ दर्द अंदर ही अंदर तोड़ रहा है मुझे. तुम से मिलने के बाद शायद मरना आसान हो जाए. जैसा सोचा था वैसा जीवन जी नहीं पाया. यह मेरी नाकामी ही थी या फिर मेरी तकदीर जो मुझे हर बार सूरज दिखा कर परछाई थमा देती थी, जिस में मुझे मेरा ही अक्स जकड़ा हुआ बेबस व धूमिल नजर आता था. हो सके तो मुझे जीवन के इस आखिरी पड़ाव पर माफ कर देना. सिवा दुखों के कुछ भी तो नहीं दे पाया मैं,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने भरी आंखों व कांपते हाथों से उस का बेजान पसीजा हुआ हाथ थाम लिया था.

‘‘अनिरुद्ध, तुम ने मुझे बहुतकुछ दिया है, मेरे जीने की वजह. अगर वह वजह न होती तो मैं कब की इस दुनिया को अलविदा कह चुकी होती, हमारी बेटी शुभि.”

‘‘क्या?????’’

स्तब्ध, चकित, लुटापिटा सा खड़ा अनिरुद्ध. उस का सिर घूम गया, लगा, जैसे किसी ने उसे बालों से पकड़ कर उस के चेहरे को जलते अलाव के पास रख दिया हो. लड़खड़ा कर गिर ही गया होता अगर सुजाता ने संभाला न होता.

‘‘हां अनिरुद्ध, सिवा शादी के कोई और विकल्प नहीं था मेरे पास. इसीलिए दौड़ी चली आई थी तुम्हारे पास. और तुम ने एक बार भी नहीं पूछा कि आखिर ऐसी क्या बात है जो तुम अपने स्वभाव के विपरीत जा कर इतना बड़ा कदम उठाना चाहती हो?’’

‘‘तुम बता भी तो सकती थी सुजाता,’’ अनिरुद्ध की थकी आवाज में एक तल्ख़ी, एक तेजी आ चुकी थी.

‘‘क्या बताती, तुम से हमारे होने वाले बच्चे की भीख मांगती? तुम ने तो कह ही दिया था कि अब हम सिर्फ मित्र हो सकते हैं. सो, एक पिता का अधिकार कैसे मांगती तुम से. निखिल ने बिना कुछ कहे ही खुशीखुशी अजन्मे बच्चे को अपना लिया था. जो प्यारदुलार उसे तुम से मिलना चाहिए था वह उसे निखिल ने दिया और मैं ने तब भी सिर्फ प्रेम को ही चुना था और आज तक उसी एहसास को पूरी ईमानदारी से निभा रही हूं. तुम बेशक मेरे लिए कभी नहीं थे पर मेरा प्यार तुम्हारे लिए हमेशा रहेगा. अब तुम से कोई उम्मीद, शिकायत भी नहीं. तुम ने उसी पल से अकेला छोड़ दिया था मुझे. कोई खोजखबर लेने की चेष्टा तक नहीं की तुम ने. पर मैं ने कभी भी तुम्हें इस हाल में नहीं चाहा था. तुम्हारा अहित तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकती. तुम्हें शायद यह सब कभी भी न बताती पर आज इन हालात में तुम्हारा यह सब जानना जरूरी था.’’

22 बरस की चुप्पी नम हो कर रिसने लगी थी.

‘‘अब तो बड़ी हो गई होगी मेरी शुभि. कैसी दिखती है?’’

‘‘अब तो काफी बड़ी हो गई है, पूरे 21 साल की. जब हंसती है तो तुम्हारी ही तरह उस के गालों पर गड्ढे पड़ते हैं, वही तुम्हारा वाला बेपरवाह अंदाज. ढेरों बातें. एक बार जो बोलती है तो रुकती नहीं. उसे भी कौफी ही पसंद है. आदतों में बिलकुल तुम पर गई है शुभि.‘‘

बतातेबताते मुसकहट सी खिल गई थी सुजाता के चेहरे पर. और अनिरुद्ध का मन भीग गया था. भर्राई आवाज में सारा लाड़दुलार समेट कर इतना ही कह पाया था, ‘‘सुजाता, मेरी शुभि को एक अच्छा इंसान जरूर बनाना.’’

‘‘हां अनिरुद्ध, उस में सारे गुण अपने पिता निखिल के ही आए हैं, जीवन में वह जो चाहेगी वह बनेगी. पर मैं उसे कभी भी तुम्हारी तरह कायर इंसान नहीं बनने दूंगी.’’

सुजाता की तेज और निर्भीक दृष्टि का सामना कर पाना अब अनिरुद्ध के लिए मुश्किल हो गया था.

उधर ट्रेन की सीटी उम्र की दूरी को नापते तमाम जरूरी व गैरजरूरी प्रश्नों को समेटने का इशारा कर रही थी. स्टेशन का पसरा सन्नाटा अब उन दोनों के बीच जगह बनाने लगा था. सुजाता सधे मजबूत कदमों से वापस अपने कंपार्टमैंट की ओर पलटने लगी थी. बर्थ तक आतेआते सुजाता बेहद भावुक हो उठी थी.

अधूरे रिश्तों में अपूर्णता होते हुए भी आखिरकार कुछ बचा रह ही जाता है. किसी दर्द के भीतर तक हो कर गुजर जाने से वह भोग्य बन जाता है…बह जाता है… जब टीसें रिस जाती हैं तो जीवन आसान हो जाता है.

दो हाथ अलगअलग दिशाओं से दूर तक हिल रहे थे फिर कभी न मिलने के लिए.

 

 

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सुबह की ठंडक में प्लेटफौर्म पर चहलपहल न के बराबर थी. लगभग सन्नाटा ही पसरा था. उस का कंपार्टमैंट प्लेटफौर्म से थोड़ा दूर आ कर रुका था. काले पड़ते पीपल के पेड़ों की डालियों से छन कर आता आकाश का फीका सा उजाला था. उस के नीचे लेटे भिखारियों का झुंड कटेफटे कम्बलों में खुद को सिकोड़ कर तल्लीनता से सोया हुआ था और उन के पास दुम दबाए लेटे कुत्तों का रहरह कर चींचींयाना जारी था. सन्नाटे में सुराख करती आवाजें…चाय अदरक वाली चाय…गरमागरम चाय… वहीं पास में झाड़ू मारता आदमी.

कितने गहरे होते है इंतजार के रंग, सोचतेसोचते सुजाता ने मानो अपने हाथों को सांत्वना देते हुए आपस में कस लिया था.

तभी सामने से अनिरुद्ध आता दिखाई दिया. थकी सी चाल में उम्र की गंभीरता उतर आई थी. सुजाता को देखते ही उस के चेहरे पर एकसाथ कई भाव आजा रहे थे. अनिरुद्ध ने जिन नजरों से उसे देखा, वह पल वहीं का वहीं ठहर गया था. एक रिश्ता जो कभी अपना था, एक इतिहास. साथ जिया उम्र का एक खूबसूरत हिस्सा. आज पहचान के दूसरे छोर पर खड़ा था. उस ठिठके हुए पल को धकेलने की हिम्मत दोनों में नहीं थी. दोनों को ही समझ नहीं आ रहा था कि किस तरह व्यवहार करें.

‘‘मुझे आने में देर तो नहीं हुई?’’

‘‘कैसे हो?’’

‘‘तुम बिलकुल भी नहीं बदलीं.’’

“तुम भी तो…’’ कहतेकहते रुक गई थी सुजाता. बदल तो पहले ही चुका था. पर सुदर्शन, हंसमुख, आकर्षक से अनिरुद्ध की जगह यह वाला अनिरुद्ध…कैसा लगने लगा था…बाल तेजी से कम हो चुके थे. झुकेझुके से कंधे. अनिरुद्ध की धंस चुकी आंखों के इर्दगिर्द खिंच आए वीरानगी के दायरों की भाषा को पढ़ने की नाकाम कोशिश करती सुजाता.

‘‘यह क्या हाल बना लिया है तुम ने, कहां थे इतने साल?’’

वह पल…लगा जैसे सदियों से वह इसी पल की ही तो प्रतीक्षा कर रही थी. गहरी सांसों के साथ रुके हुए आसूं छलक ही उठे थे.

अनिरुद्ध, बस, उसे एकटक देखता ही जा रहा था. वह बमुश्किल हाथ आए इन बेशकीमती पलों को मुट्ठी में बंद कर लेना चाहता था.

अपने प्रश्न का जवाब न पा कर सुजाता को कुछ झेंप सी होने लगी थी और वह दूसरी तरफ देखती हुई मानो हवा में उड़ते तिनकों को इकट्ठा करने का असफल प्रयत्न कर रही थी.

स्टेशन पर पसरे सन्नाटे का दिमाग में चल रहे कोलाहल से कोई वास्ता न था.

दोनों ही वर्तमान में नहीं थे. यादों की रील जैसे हाथ से छूट कर पीछे की ओर भाग रही थी. चुप्पीभरी इस बोझिलता को तोड़ते हुए अनिरुद्ध पूछ बैठा था, ‘‘कैसी हो सुजाता? मैं कहता था न कि तुम बिलकुल भी न बदलोगी.’’

‘‘नहीं, नहीं. देखो, मैं अब थोड़ी थोड़ी फैलने लगी हूं. बालों में सफेदी भी आने लगी है. इन 22 सालों में बहुतकुछ बदला है.’’

फीकी हंसी के साथ उस की आवाज कहीं सुदूर यादों के भंवर से अटकअटक कर आ रही थी और फिर इको करती हुई उन के बीच कहीं गुम हो गई थी.

‘‘मुझे विश्वास था सुजाता, तुम जरूर आओगी.’’

‘‘विश्वास??? कितना विश्वास था मुझे इस शब्द पर अनिरुद्ध,’’  न चाहते हुए भी गुस्सा छलक ही पड़ा था जबकि उम्र तो अपनी गति से चल ही रही थी.

‘‘सच, तुम जरा भी नहीं बदली,’’ हताश सा अनिरुद्ध बुदबुदा उठा था.

‘‘हां, मैं जरा भी नहीं बदली. पर तुम? मुझे कितनी सरलता से झाड़पोंछ कर खुद से अलग कर दिया तुम ने. तुम्हारा प्यार दिखावा मात्र था. क्या मेरे प्रति कोई दायित्व नहीं था तुम्हारा. यह प्रश्न एक लावे की तरह मेरे जेहन में हर वक्त उबलता रहता है. जब भी मैं अकेली होती हूं, तुम्हारी याद…न याद करने से परे का हर पल सालता दर्द कभी चेतना से मिटा ही नहीं. मेरे जीवन के इस चमकीले एहसास को अंधेरे में बदलने का क्या हक था तुम को? एक तुम्हीं थे जो उस वक्त मेरी जिंदगी में रोशनी या अंधेरे का होना निश्चित या निर्धारित कर सकते थे. फिर क्यों तुम ने मुझे अंधेरे के स्याह गर्त में धकेल दिया था?’’

‘‘उसी का फल भुगत रहा हूं सुजाता. मैं कैंसर की आखिरी स्टेज के करीब हूं. आंतों का यह कैंसर नासूर की तरह मेरे शरीर पर तेजी से फैल रहा है. तुम्हें दिया हुआ दर्द अंदर ही अंदर तोड़ रहा है मुझे. तुम से मिलने के बाद शायद मरना आसान हो जाए. जैसा सोचा था वैसा जीवन जी नहीं पाया. यह मेरी नाकामी ही थी या फिर मेरी तकदीर जो मुझे हर बार सूरज दिखा कर परछाई थमा देती थी, जिस में मुझे मेरा ही अक्स जकड़ा हुआ बेबस व धूमिल नजर आता था. हो सके तो मुझे जीवन के इस आखिरी पड़ाव पर माफ कर देना. सिवा दुखों के कुछ भी तो नहीं दे पाया मैं,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने भरी आंखों व कांपते हाथों से उस का बेजान पसीजा हुआ हाथ थाम लिया था.

‘‘अनिरुद्ध, तुम ने मुझे बहुतकुछ दिया है, मेरे जीने की वजह. अगर वह वजह न होती तो मैं कब की इस दुनिया को अलविदा कह चुकी होती, हमारी बेटी शुभि.”

‘‘क्या?????’’

स्तब्ध, चकित, लुटापिटा सा खड़ा अनिरुद्ध. उस का सिर घूम गया, लगा, जैसे किसी ने उसे बालों से पकड़ कर उस के चेहरे को जलते अलाव के पास रख दिया हो. लड़खड़ा कर गिर ही गया होता अगर सुजाता ने संभाला न होता.

‘‘हां अनिरुद्ध, सिवा शादी के कोई और विकल्प नहीं था मेरे पास. इसीलिए दौड़ी चली आई थी तुम्हारे पास. और तुम ने एक बार भी नहीं पूछा कि आखिर ऐसी क्या बात है जो तुम अपने स्वभाव के विपरीत जा कर इतना बड़ा कदम उठाना चाहती हो?’’

‘‘तुम बता भी तो सकती थी सुजाता,’’ अनिरुद्ध की थकी आवाज में एक तल्ख़ी, एक तेजी आ चुकी थी.

‘‘क्या बताती, तुम से हमारे होने वाले बच्चे की भीख मांगती? तुम ने तो कह ही दिया था कि अब हम सिर्फ मित्र हो सकते हैं. सो, एक पिता का अधिकार कैसे मांगती तुम से. निखिल ने बिना कुछ कहे ही खुशीखुशी अजन्मे बच्चे को अपना लिया था. जो प्यारदुलार उसे तुम से मिलना चाहिए था वह उसे निखिल ने दिया और मैं ने तब भी सिर्फ प्रेम को ही चुना था और आज तक उसी एहसास को पूरी ईमानदारी से निभा रही हूं. तुम बेशक मेरे लिए कभी नहीं थे पर मेरा प्यार तुम्हारे लिए हमेशा रहेगा. अब तुम से कोई उम्मीद, शिकायत भी नहीं. तुम ने उसी पल से अकेला छोड़ दिया था मुझे. कोई खोजखबर लेने की चेष्टा तक नहीं की तुम ने. पर मैं ने कभी भी तुम्हें इस हाल में नहीं चाहा था. तुम्हारा अहित तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकती. तुम्हें शायद यह सब कभी भी न बताती पर आज इन हालात में तुम्हारा यह सब जानना जरूरी था.’’

22 बरस की चुप्पी नम हो कर रिसने लगी थी.

‘‘अब तो बड़ी हो गई होगी मेरी शुभि. कैसी दिखती है?’’

‘‘अब तो काफी बड़ी हो गई है, पूरे 21 साल की. जब हंसती है तो तुम्हारी ही तरह उस के गालों पर गड्ढे पड़ते हैं, वही तुम्हारा वाला बेपरवाह अंदाज. ढेरों बातें. एक बार जो बोलती है तो रुकती नहीं. उसे भी कौफी ही पसंद है. आदतों में बिलकुल तुम पर गई है शुभि.‘‘

बतातेबताते मुसकहट सी खिल गई थी सुजाता के चेहरे पर. और अनिरुद्ध का मन भीग गया था. भर्राई आवाज में सारा लाड़दुलार समेट कर इतना ही कह पाया था, ‘‘सुजाता, मेरी शुभि को एक अच्छा इंसान जरूर बनाना.’’

‘‘हां अनिरुद्ध, उस में सारे गुण अपने पिता निखिल के ही आए हैं, जीवन में वह जो चाहेगी वह बनेगी. पर मैं उसे कभी भी तुम्हारी तरह कायर इंसान नहीं बनने दूंगी.’’

सुजाता की तेज और निर्भीक दृष्टि का सामना कर पाना अब अनिरुद्ध के लिए मुश्किल हो गया था.

उधर ट्रेन की सीटी उम्र की दूरी को नापते तमाम जरूरी व गैरजरूरी प्रश्नों को समेटने का इशारा कर रही थी. स्टेशन का पसरा सन्नाटा अब उन दोनों के बीच जगह बनाने लगा था. सुजाता सधे मजबूत कदमों से वापस अपने कंपार्टमैंट की ओर पलटने लगी थी. बर्थ तक आतेआते सुजाता बेहद भावुक हो उठी थी.

अधूरे रिश्तों में अपूर्णता होते हुए भी आखिरकार कुछ बचा रह ही जाता है. किसी दर्द के भीतर तक हो कर गुजर जाने से वह भोग्य बन जाता है…बह जाता है… जब टीसें रिस जाती हैं तो जीवन आसान हो जाता है.

दो हाथ अलगअलग दिशाओं से दूर तक हिल रहे थे फिर कभी न मिलने के लिए.

 

 

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March 02, 2021 at 10:00AM

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