मैं उसी वक्त अपनी पैकिंग में लग गया. दरअसल, मैं ने कितनी ही गलतसही बातें उसे सुनाई हों लेकिन वह कभी भी अपनी जबान नहीं खोलती थी. आज पहली बार था जो मुझे बेहद नागवार गुजरा था. मुझे तैयार होता देख मांबेटी सकते में थीं. कुक्कू अब मुझ से काफी सहमी रहती और इस के लिए मैं पूरी तरह से प्रतीति को दोषी समझता था. पता नहीं क्यों कभी नहीं लगा कि मैं जो इतना उग्र हो जाता हूं उस का बच्ची पर कुछ तो असर होता होगा. कुक्कू किनारे खड़ी हो कर सुबकती हुई अनुनय करने लगी कि मैं न जाऊं.
प्रतीति के लिए यद्यपि ज्यादा मेरे करीब आना मुमकिन नहीं था फिर भी शारीरिक भाषा प्रखर करते हुए राह रोक कर खड़ी हो गई. मैं अपना बैग ले कर लगभग उसे धक्का देते हुए बाहर निकल गया.
आज सुबह से ही मेघों का बोलबाला कुछ ज्यादा था. कुहरे ने स्वस्थ, साफ आसमान को इस कदर ढक लिया था कि अगले कुछ पल बड़े असमंजस भरे थे. मैं बड़ा बेचैन था. मैं ने मोबाइल उठा लिया. सोचा, शहर में ही किसी परिचित को फोन लगाऊं. फिर मां को ही फोन घुमा दिया. मांपिताजी अभी भी उसी पुश्तैनी मकान में रह रहे हैं.
मां ने मेरा फोन पाते ही चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘क्या हुआ, मलय? 10 दिनों से रोज तुम्हारे घर फोन कर रही हूं. प्रतीति एक ही बात कह रही है कि तू औफिस के काम से बाहर गया है, इधर तुझे फोन लगाती हूं तो बंद रहता है या उठाता नहीं.’’
‘‘मैं घर से भाग आया हूं और कभी वापस नहीं जाऊंगा.’’
‘‘क्या? यह क्या बोल रहा है तू? कहां है तू?’’
‘‘गंगटोक, यह बात प्रतीति को बताने की जरूरत नहीं, उसे पता नहीं कि मैं कहां हूं.’’
‘‘लेकिन हुआ क्या? वह तो कितनी अच्छी लड़की है.’’
‘‘खबरदार जो गैर लड़की के लिए सिफारिश की तो, बेटा मैं तुम्हारा हूं, तुम मेरी ओर से बोलोगी, बस.’’
‘‘अरे, उस की गलती तो बता?’’
‘‘तुम्हें मैं क्या बताऊं, तुम रहती हो यहां, जो बताऊं? यह मेरा घर है, यहां सबकुछ मेरे अनुसार होगा. मेरी अनुमति के बिना एक पत्ता नहीं हिलेगा.’’
‘‘तू यह क्या कह रहा है? है तो तेरा ही सबकुछ, लेकिन शादी ऐसे निभती है क्या? पति को चाहिए कि पत्नी को वह उतना ही हक और सम्मान दे जितना वह पत्नी से चाहता है.’’
‘‘फिर तुम शुरू हो गईं ज्ञान बघारने. फोन रखो, मैं कहता हूं, फोन रखो.’’
फोन मैं ने काट दिया था और मैं अब किसी से बात नहीं करना चाहता था. बचपन में मेरे मांपिताजी जब अपनी मनमानी करते थे तो तब कोई सिखाने नहीं आया, अब मैं अपने हिसाब से क्यों नहीं चलूं.
मैं बहुत उद्विग्न महसूस कर रहा था. प्रतीति शांत और निश्चिंत कैसे थी? यह सच है कि छोटीछोटी बातों के लिए भी मैं उसे बुराभला कह जाता था, वह शांत रहती थी, यहां तक कि बेटी को हिदायत भी दे डालता था कि उस की मां अहंकारी, पागल और बहुत बुरी है. अगर वह अपनी मां से बातें करेगी तो मुझे खो देगी, प्रतीति मेरी ओर स्थिर दृष्टि से देखती हुई अपनी जगह खड़ी रहती थी. उस का यह शांत रूप मुझे और आक्रामक करता था, मैं अपनी तौहीन देख गालीगलौज पर उतर आता था यहां तक कि उसे मारने तक दौड़ता था. फिर वह शांत हो इतना ही कहती, ‘मुझ से जो गलतियां हुईं उस के लिए माफ करो.’ मैं झल्ला कर बात खत्म करता.
मगर फिर भी इतने दिन होने को आए, मैं कहां हूं, उसे यह भी नहीं पता. 10 दिन पर मां को पता चला तो हो सकता है कि अब उसे पता चला हो लेकिन ये 10 दिन क्या उसे मेरी जरा भी परवा नहीं, बस खर्चे को पैसे उपलब्ध हो गए तो मेरी जरूरत ही नहीं? यही हैं उस के शादी के आदर्श?
भोर के 3 बजे अचानक एक एसएमएस की आवाज से हलकी सी तंद्रा उचट गई. औफिस से 15 दिन की छुट्टी ले कर आया था और बता कर भी कि मैं कहां जा रहा हूं लेकिन इतनी रात गए मुझे मेरे छुट्टी समाप्त होने की सूचना देंगे और जबकि अब भी 2 दिन बाकी हैं. एक क्षण को लगा कि मेरे किसी दोस्त ने अपनी नींद छोड़ कर कोई नौनवेज जोक मारा हो.
अनिच्छा के बावजूद मैं ने एसएमएस चैक किया. मुझ से लेटे हुए यह पढ़ा नहीं गया, मैं उठ बैठा. अपने चारों ओर रजाई को खींच कर ऐसे बैठा जैसे प्रतीति की बांहें मुझे अपने आगोश में बहुत दिनों बाद खींच रही हों.
‘‘प्रिय, और कितनी परीक्षा लोगे? अपनी तकलीफ सहने की शक्ति मैं ने जितनी बढ़ा ली है तुम में भी तकलीफ देने की क्षमता उतनी ही बढ़ती गई है. एक तुम्हारे भरोसे मैं अपनी पिछली सारी दुनिया त्याग कर तुम्हारे पास आ गई और तुम पता नहीं कौन से मन की भूलभुलैया में गुम हो कर मुझे और कुक्कू को छोड़ कर ही चल दिए. तुम कैसे कर सके ये सबकुछ? कुक्कू और मैं तुम्हारे हैं, मगर तुम तो बस खुद के ही हो कर रह गए. मैं जानती हूं कि तुम्हारी जिंदगी का पिछला इतिहास तुम्हें विचलित करता है लेकिन यह नहीं समझते कि इतिहास वर्तमान में हमेशा नहीं आता.’’
एसएमएस समाप्त नहीं हुआ था लेकिन प्रतीति के फोन से आया था. मैं इन बातों का गहराई से मंथन करता कि दूसरा एसएमएस आया. सोचा न जाने किस का हो, लेकिन मन यह सोच कर व्याकुल होने लगा कि न जाने प्रतीति आगे क्या कहना चाह रही होगी.
मैं ने मोबाइल अपनी आंखों के सामने रखा, प्रतीति ने आगे लिखा था, ‘‘तुम ने पुरानी प्रतिच्छवियों का रंग वर्तमान के जीते इंसानों के जीवन में इस तरह घोल दिया है कि सारी छवियां मिलजुल कर एकसार हो गई हैं और सब की पहचान ही विकृत हो गई है. तुम्हारे मन का पुराना संताप और विद्रोह मुझ से अपना प्रतिशोध ढूंढ़ने की कोशिश करता है, क्योंकि तुम्हारे आसपास मैं ही एक ऐसी हूं जो तुम्हारी होते हुए भी तुम्हारा अंश नहीं हूं जिस पर तुम अपना हक जता कर अपना गुस्सा मिटा सको. आज कुछ कड़वा सच बोल लेने दो, मलय, और सहा नहीं जाता.
‘‘तुम्हारे मातापिता ने, जैसा कि तुम चिढ़तेकुढ़ते वक्त कहा करते थे, जो भी जीवन जिया उसे इतिहास में दफन करो. उस असामंजस्य का प्रतिकार तुम मेरे साथ प्रतिशोध ले कर क्यों करना चाहते हो? तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम को विद्रोह की घुटन में क्यों बदलने पर तुले हुए हो? प्रकृति के नियम से कुछ बातें मां और पत्नी होने के नाते हर स्त्री में समान होती हैं लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि किसी और का कर्मफल कोई और भुगते. प्रिय होने के कारण जो कदम तुम अपनी मां के लिए नहीं उठा पाए, पराए घर से आई होने के कारण वह प्रतिशोध तुम ने मुझ से लेने की ठानी. तब तुम टूटे हुए से घर में जुड़ेजुडे़ से थे और अब जुड़े हुए घर को तोड़ने पर आमादा हो.
‘‘समय की इच्छा थी कि हम एक हों और अब यह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर करता है कि हम आगे भी एक रहें. तुम्हें बेहद चाह कर टूट जाने के कगार पर खड़ी हूं. तुम्हारी बेटी को अपने पापा की, तुम्हारी बीवी को अपने पति की जरूरत है और तुम्हें कोई हक नहीं बनता कि तुम उस का सहारा और प्यार छीन लो.’’
टैक्स्ट पढ़तेपढ़ते मेरी आंखें बोझिल हो गई थीं, आंक रहा था मैं प्रतीति ज्यादा समझदार थी या मैं ज्यादा नासमझ. शायद अहंकार की वजह से मैं ने उसे कभी भाव नहीं देना चाहा. लेकिन आज जब मैं अपने अंतर्मन के साथ बिलकुल अकेला हूं, आसपास के वातावरण में स्वयं को सिद्ध करने की कोई जल्दबाजी नहीं है तो लगता है प्रतीति को मेरी नहीं बल्कि मुझे प्रतीति की जरूरत है. मेरे ठिगने अहंकार, आक्रोश और भावनात्मक प्रतिशोध की सुलगी हुई ज्वाला में प्रतीति के बरसते छींटों की जरूरत है.
मैं ने तत्काल फ्लाइट पकड़ी, एअरपोर्ट से घर पहुंचतेपहुंचते सुबह के 8 बज गए थे. मैं खुली खिड़की से घर के अंदर सब देख सकता था. कुक्कू स्कूल के लिए तैयार हो रही थी, दोनों बेहद बुझीबुझी सी अपना काम कर रही थीं. तैयार हो कर कुक्कू निकलने वाली थी, प्रतीति ने मेरी उपस्थिति से अनजान मुख्यद्वार खोला. मैं अचरज में था. मुझे देख कर उस के मुख पर जरा भी अचरज नहीं आया. जैसे कि उसे अपनी पैरवी पर बेहद यकीन हो.
उस ने मेरे हाथ से बैग लिया और भटक गए बच्चे के घर वापस आ जाने पर सब से पहले उसे सुरक्षित घर के अंदर ले जाने के एहसास से भरी हुई मुझे वह अंदर ले गई.
कुक्कू के शिकायती लहजे को भांप कर प्रतीति ने उस से कहा, ‘‘बेटी, आज खुशीखुशी स्कूल जाओ, वापस आ कर बातें करना, पापा को आराम करने दो.’’
कुक्कू के जाने के बाद घर में सन्नाटा छाने लगा. मैं जो हमेशा डराने में विश्वास करता था, आज खुद डर रहा था.
प्रतीति ने बैग उठा कर अंदर किया और बाथरूम की बालटी में पानी भरने लगी. मैं कुरसी पर चुप बैठा था, डरा वैसा ही जैसा कभी प्रतीति को मैं डरा देखता था. जाने कब मैं क्या बोल पड़ूं. क्या इलजाम लगा कर बच्ची के सामने उसे अपमानित करूं. मेरे पीछे आ कर खड़ी हो गई वह, मेरे सिर को सहलाते हुए कहा, ‘‘बाल रूखे लग रहे हैं, तेल लगा देती हूं.’’
मैं चुपचाप बैठा रहा.
प्रतीति ने बालों में तेल लगाते हुए कहा, ‘‘आज औफिस जाओगे? छुट्टियां तो कल खत्म होंगी.’’
मैं अवाक्, ‘‘तुम्हें कैसे पता?’’
‘‘क्यों न पता हो? मेरा पति कहीं चला जाए और मैं दफ्तर में खबर भी न लूं.’’
‘‘फिर तुम…’’
‘‘कुछ न कहो. तुम ने अपने हिसाब से सब को चलाने की कोशिश कर के देख ली. यह स्वाभाविक था कि मैं तुम्हारी खोजपरख करती. आगे की सोचो, मलय, पीछे का पीछा छोड़ो.’’
‘‘मैं थक चुका हूं.’’
‘‘तुम क्यों इतना चिंतित हो? सारी चिंता मुझ पर छोड़ो और तुम निश्ंिचत हो जाओ. जैसे कुक्कू मेरी जान है वैसे ही तुम मेरे सबकुछ हो. किस से खफा, किस की गलती? जो तुम हो वही तो हम हैं. तुम से अलग तो कुछ भी नहीं. अगर तुम्हें मेरी कुछ आदतें बुरी लगती हैं तो सरल उपाय है कि उन की लिस्ट बना कर मुझे दे दो, मैं ईमानदारी से उन्हें छोड़ने की पहल करूंगी. मगर स्थितियों को इतना गंभीर न बनाओ.’’
जरा चुहल करने का मन हुआ, कहा, ‘‘ईमानदारी से मुझे तो न छोड़ दोगी?’’
‘तुम्हें तो नहीं, हां तुम्हारी एक आदत छुड़ा कर ही दम लूंगी.’
‘‘तुम्हारी नकारात्मक सोच, और मनमुताबिक न होने को शत्रु भाव से ग्रहण करना, जिस की जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि. बुरा सोचोगे तो हर इंसान बुरा ही नजर आएगा. सब कुछ स्वीकार कर लो तो जीवन प्रेममय बन जाता है वरना कुक्कू के साथ भी वही इतिहास दोहराया जाएगा.’’
‘‘प्रतीति…’’ कह कर मैं ने उसे बाहुपाश में भर लिया.
सचाई को महसूस कराती गहरी गरम सांसें एकदूसरे में विलीन हो रही थीं. मैं ने प्रतीति को सीने से लगा कर उस का माथा चूम लिया. जिस खुशी की खोज में वादियों में भटक आया वह खुशी मेरे लिए मेरे घर में बैठी मेरा इंतजार कर रही थी.
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मैं उसी वक्त अपनी पैकिंग में लग गया. दरअसल, मैं ने कितनी ही गलतसही बातें उसे सुनाई हों लेकिन वह कभी भी अपनी जबान नहीं खोलती थी. आज पहली बार था जो मुझे बेहद नागवार गुजरा था. मुझे तैयार होता देख मांबेटी सकते में थीं. कुक्कू अब मुझ से काफी सहमी रहती और इस के लिए मैं पूरी तरह से प्रतीति को दोषी समझता था. पता नहीं क्यों कभी नहीं लगा कि मैं जो इतना उग्र हो जाता हूं उस का बच्ची पर कुछ तो असर होता होगा. कुक्कू किनारे खड़ी हो कर सुबकती हुई अनुनय करने लगी कि मैं न जाऊं.
प्रतीति के लिए यद्यपि ज्यादा मेरे करीब आना मुमकिन नहीं था फिर भी शारीरिक भाषा प्रखर करते हुए राह रोक कर खड़ी हो गई. मैं अपना बैग ले कर लगभग उसे धक्का देते हुए बाहर निकल गया.
आज सुबह से ही मेघों का बोलबाला कुछ ज्यादा था. कुहरे ने स्वस्थ, साफ आसमान को इस कदर ढक लिया था कि अगले कुछ पल बड़े असमंजस भरे थे. मैं बड़ा बेचैन था. मैं ने मोबाइल उठा लिया. सोचा, शहर में ही किसी परिचित को फोन लगाऊं. फिर मां को ही फोन घुमा दिया. मांपिताजी अभी भी उसी पुश्तैनी मकान में रह रहे हैं.
मां ने मेरा फोन पाते ही चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘क्या हुआ, मलय? 10 दिनों से रोज तुम्हारे घर फोन कर रही हूं. प्रतीति एक ही बात कह रही है कि तू औफिस के काम से बाहर गया है, इधर तुझे फोन लगाती हूं तो बंद रहता है या उठाता नहीं.’’
‘‘मैं घर से भाग आया हूं और कभी वापस नहीं जाऊंगा.’’
‘‘क्या? यह क्या बोल रहा है तू? कहां है तू?’’
‘‘गंगटोक, यह बात प्रतीति को बताने की जरूरत नहीं, उसे पता नहीं कि मैं कहां हूं.’’
‘‘लेकिन हुआ क्या? वह तो कितनी अच्छी लड़की है.’’
‘‘खबरदार जो गैर लड़की के लिए सिफारिश की तो, बेटा मैं तुम्हारा हूं, तुम मेरी ओर से बोलोगी, बस.’’
‘‘अरे, उस की गलती तो बता?’’
‘‘तुम्हें मैं क्या बताऊं, तुम रहती हो यहां, जो बताऊं? यह मेरा घर है, यहां सबकुछ मेरे अनुसार होगा. मेरी अनुमति के बिना एक पत्ता नहीं हिलेगा.’’
‘‘तू यह क्या कह रहा है? है तो तेरा ही सबकुछ, लेकिन शादी ऐसे निभती है क्या? पति को चाहिए कि पत्नी को वह उतना ही हक और सम्मान दे जितना वह पत्नी से चाहता है.’’
‘‘फिर तुम शुरू हो गईं ज्ञान बघारने. फोन रखो, मैं कहता हूं, फोन रखो.’’
फोन मैं ने काट दिया था और मैं अब किसी से बात नहीं करना चाहता था. बचपन में मेरे मांपिताजी जब अपनी मनमानी करते थे तो तब कोई सिखाने नहीं आया, अब मैं अपने हिसाब से क्यों नहीं चलूं.
मैं बहुत उद्विग्न महसूस कर रहा था. प्रतीति शांत और निश्चिंत कैसे थी? यह सच है कि छोटीछोटी बातों के लिए भी मैं उसे बुराभला कह जाता था, वह शांत रहती थी, यहां तक कि बेटी को हिदायत भी दे डालता था कि उस की मां अहंकारी, पागल और बहुत बुरी है. अगर वह अपनी मां से बातें करेगी तो मुझे खो देगी, प्रतीति मेरी ओर स्थिर दृष्टि से देखती हुई अपनी जगह खड़ी रहती थी. उस का यह शांत रूप मुझे और आक्रामक करता था, मैं अपनी तौहीन देख गालीगलौज पर उतर आता था यहां तक कि उसे मारने तक दौड़ता था. फिर वह शांत हो इतना ही कहती, ‘मुझ से जो गलतियां हुईं उस के लिए माफ करो.’ मैं झल्ला कर बात खत्म करता.
मगर फिर भी इतने दिन होने को आए, मैं कहां हूं, उसे यह भी नहीं पता. 10 दिन पर मां को पता चला तो हो सकता है कि अब उसे पता चला हो लेकिन ये 10 दिन क्या उसे मेरी जरा भी परवा नहीं, बस खर्चे को पैसे उपलब्ध हो गए तो मेरी जरूरत ही नहीं? यही हैं उस के शादी के आदर्श?
भोर के 3 बजे अचानक एक एसएमएस की आवाज से हलकी सी तंद्रा उचट गई. औफिस से 15 दिन की छुट्टी ले कर आया था और बता कर भी कि मैं कहां जा रहा हूं लेकिन इतनी रात गए मुझे मेरे छुट्टी समाप्त होने की सूचना देंगे और जबकि अब भी 2 दिन बाकी हैं. एक क्षण को लगा कि मेरे किसी दोस्त ने अपनी नींद छोड़ कर कोई नौनवेज जोक मारा हो.
अनिच्छा के बावजूद मैं ने एसएमएस चैक किया. मुझ से लेटे हुए यह पढ़ा नहीं गया, मैं उठ बैठा. अपने चारों ओर रजाई को खींच कर ऐसे बैठा जैसे प्रतीति की बांहें मुझे अपने आगोश में बहुत दिनों बाद खींच रही हों.
‘‘प्रिय, और कितनी परीक्षा लोगे? अपनी तकलीफ सहने की शक्ति मैं ने जितनी बढ़ा ली है तुम में भी तकलीफ देने की क्षमता उतनी ही बढ़ती गई है. एक तुम्हारे भरोसे मैं अपनी पिछली सारी दुनिया त्याग कर तुम्हारे पास आ गई और तुम पता नहीं कौन से मन की भूलभुलैया में गुम हो कर मुझे और कुक्कू को छोड़ कर ही चल दिए. तुम कैसे कर सके ये सबकुछ? कुक्कू और मैं तुम्हारे हैं, मगर तुम तो बस खुद के ही हो कर रह गए. मैं जानती हूं कि तुम्हारी जिंदगी का पिछला इतिहास तुम्हें विचलित करता है लेकिन यह नहीं समझते कि इतिहास वर्तमान में हमेशा नहीं आता.’’
एसएमएस समाप्त नहीं हुआ था लेकिन प्रतीति के फोन से आया था. मैं इन बातों का गहराई से मंथन करता कि दूसरा एसएमएस आया. सोचा न जाने किस का हो, लेकिन मन यह सोच कर व्याकुल होने लगा कि न जाने प्रतीति आगे क्या कहना चाह रही होगी.
मैं ने मोबाइल अपनी आंखों के सामने रखा, प्रतीति ने आगे लिखा था, ‘‘तुम ने पुरानी प्रतिच्छवियों का रंग वर्तमान के जीते इंसानों के जीवन में इस तरह घोल दिया है कि सारी छवियां मिलजुल कर एकसार हो गई हैं और सब की पहचान ही विकृत हो गई है. तुम्हारे मन का पुराना संताप और विद्रोह मुझ से अपना प्रतिशोध ढूंढ़ने की कोशिश करता है, क्योंकि तुम्हारे आसपास मैं ही एक ऐसी हूं जो तुम्हारी होते हुए भी तुम्हारा अंश नहीं हूं जिस पर तुम अपना हक जता कर अपना गुस्सा मिटा सको. आज कुछ कड़वा सच बोल लेने दो, मलय, और सहा नहीं जाता.
‘‘तुम्हारे मातापिता ने, जैसा कि तुम चिढ़तेकुढ़ते वक्त कहा करते थे, जो भी जीवन जिया उसे इतिहास में दफन करो. उस असामंजस्य का प्रतिकार तुम मेरे साथ प्रतिशोध ले कर क्यों करना चाहते हो? तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम को विद्रोह की घुटन में क्यों बदलने पर तुले हुए हो? प्रकृति के नियम से कुछ बातें मां और पत्नी होने के नाते हर स्त्री में समान होती हैं लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि किसी और का कर्मफल कोई और भुगते. प्रिय होने के कारण जो कदम तुम अपनी मां के लिए नहीं उठा पाए, पराए घर से आई होने के कारण वह प्रतिशोध तुम ने मुझ से लेने की ठानी. तब तुम टूटे हुए से घर में जुड़ेजुडे़ से थे और अब जुड़े हुए घर को तोड़ने पर आमादा हो.
‘‘समय की इच्छा थी कि हम एक हों और अब यह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर करता है कि हम आगे भी एक रहें. तुम्हें बेहद चाह कर टूट जाने के कगार पर खड़ी हूं. तुम्हारी बेटी को अपने पापा की, तुम्हारी बीवी को अपने पति की जरूरत है और तुम्हें कोई हक नहीं बनता कि तुम उस का सहारा और प्यार छीन लो.’’
टैक्स्ट पढ़तेपढ़ते मेरी आंखें बोझिल हो गई थीं, आंक रहा था मैं प्रतीति ज्यादा समझदार थी या मैं ज्यादा नासमझ. शायद अहंकार की वजह से मैं ने उसे कभी भाव नहीं देना चाहा. लेकिन आज जब मैं अपने अंतर्मन के साथ बिलकुल अकेला हूं, आसपास के वातावरण में स्वयं को सिद्ध करने की कोई जल्दबाजी नहीं है तो लगता है प्रतीति को मेरी नहीं बल्कि मुझे प्रतीति की जरूरत है. मेरे ठिगने अहंकार, आक्रोश और भावनात्मक प्रतिशोध की सुलगी हुई ज्वाला में प्रतीति के बरसते छींटों की जरूरत है.
मैं ने तत्काल फ्लाइट पकड़ी, एअरपोर्ट से घर पहुंचतेपहुंचते सुबह के 8 बज गए थे. मैं खुली खिड़की से घर के अंदर सब देख सकता था. कुक्कू स्कूल के लिए तैयार हो रही थी, दोनों बेहद बुझीबुझी सी अपना काम कर रही थीं. तैयार हो कर कुक्कू निकलने वाली थी, प्रतीति ने मेरी उपस्थिति से अनजान मुख्यद्वार खोला. मैं अचरज में था. मुझे देख कर उस के मुख पर जरा भी अचरज नहीं आया. जैसे कि उसे अपनी पैरवी पर बेहद यकीन हो.
उस ने मेरे हाथ से बैग लिया और भटक गए बच्चे के घर वापस आ जाने पर सब से पहले उसे सुरक्षित घर के अंदर ले जाने के एहसास से भरी हुई मुझे वह अंदर ले गई.
कुक्कू के शिकायती लहजे को भांप कर प्रतीति ने उस से कहा, ‘‘बेटी, आज खुशीखुशी स्कूल जाओ, वापस आ कर बातें करना, पापा को आराम करने दो.’’
कुक्कू के जाने के बाद घर में सन्नाटा छाने लगा. मैं जो हमेशा डराने में विश्वास करता था, आज खुद डर रहा था.
प्रतीति ने बैग उठा कर अंदर किया और बाथरूम की बालटी में पानी भरने लगी. मैं कुरसी पर चुप बैठा था, डरा वैसा ही जैसा कभी प्रतीति को मैं डरा देखता था. जाने कब मैं क्या बोल पड़ूं. क्या इलजाम लगा कर बच्ची के सामने उसे अपमानित करूं. मेरे पीछे आ कर खड़ी हो गई वह, मेरे सिर को सहलाते हुए कहा, ‘‘बाल रूखे लग रहे हैं, तेल लगा देती हूं.’’
मैं चुपचाप बैठा रहा.
प्रतीति ने बालों में तेल लगाते हुए कहा, ‘‘आज औफिस जाओगे? छुट्टियां तो कल खत्म होंगी.’’
मैं अवाक्, ‘‘तुम्हें कैसे पता?’’
‘‘क्यों न पता हो? मेरा पति कहीं चला जाए और मैं दफ्तर में खबर भी न लूं.’’
‘‘फिर तुम…’’
‘‘कुछ न कहो. तुम ने अपने हिसाब से सब को चलाने की कोशिश कर के देख ली. यह स्वाभाविक था कि मैं तुम्हारी खोजपरख करती. आगे की सोचो, मलय, पीछे का पीछा छोड़ो.’’
‘‘मैं थक चुका हूं.’’
‘‘तुम क्यों इतना चिंतित हो? सारी चिंता मुझ पर छोड़ो और तुम निश्ंिचत हो जाओ. जैसे कुक्कू मेरी जान है वैसे ही तुम मेरे सबकुछ हो. किस से खफा, किस की गलती? जो तुम हो वही तो हम हैं. तुम से अलग तो कुछ भी नहीं. अगर तुम्हें मेरी कुछ आदतें बुरी लगती हैं तो सरल उपाय है कि उन की लिस्ट बना कर मुझे दे दो, मैं ईमानदारी से उन्हें छोड़ने की पहल करूंगी. मगर स्थितियों को इतना गंभीर न बनाओ.’’
जरा चुहल करने का मन हुआ, कहा, ‘‘ईमानदारी से मुझे तो न छोड़ दोगी?’’
‘तुम्हें तो नहीं, हां तुम्हारी एक आदत छुड़ा कर ही दम लूंगी.’
‘‘तुम्हारी नकारात्मक सोच, और मनमुताबिक न होने को शत्रु भाव से ग्रहण करना, जिस की जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि. बुरा सोचोगे तो हर इंसान बुरा ही नजर आएगा. सब कुछ स्वीकार कर लो तो जीवन प्रेममय बन जाता है वरना कुक्कू के साथ भी वही इतिहास दोहराया जाएगा.’’
‘‘प्रतीति…’’ कह कर मैं ने उसे बाहुपाश में भर लिया.
सचाई को महसूस कराती गहरी गरम सांसें एकदूसरे में विलीन हो रही थीं. मैं ने प्रतीति को सीने से लगा कर उस का माथा चूम लिया. जिस खुशी की खोज में वादियों में भटक आया वह खुशी मेरे लिए मेरे घर में बैठी मेरा इंतजार कर रही थी.
The post छितराया प्रतिबिंब : वह चाहकर भी अपनी बेटी का फोन क्यों नहीं उठा पा रहा था -भाग 5 appeared first on Sarita Magazine.
March 05, 2021 at 10:00AM
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