Thursday, 4 March 2021

छितराया प्रतिबिंब : वह चाहकर भी अपनी बेटी का फोन क्यों नहीं उठा पा रहा था -भाग 4

जब भी मुझे फुरसत मिलती, हम आपस में खेलते, बातें करते, लेकिन प्रतीति हमारे बीच आ जाती तो मैं मायूस हो जाता, कहीं कुक्कू का झुकाव उस की मां की तरफ हो जाए तो मैं अकेला रह जाऊंगा, मैं अपने पिता की तरह परिवार से दूर हो जाऊंगा. यह मेरे परिवार की बेटी है, मेरी बेटी है, मेरी अमानत. आखिर कुछ तो हो जो पूरी तरह से मेरा हो.

मैं अपनी मां को चाह कर भी हरदम अपने करीब न पा सका, जब देखो तब वे बस पिताजी को ले कर व्यस्त रहतीं. नहीं, मुझे सख्ती से प्रतीति को कुक्कू से दूर रखना होगा, उस का हर वक्त मेरे बच्चे को सहीगलत बताना, निर्देश देना मैं बरदाश्त नहीं कर पा रहा था.

ऐसा लगता था कि वह मुझे ही आदेश दे रही हो, अप्रत्यक्ष रूप से. बेहद चिढ़ होती है मुझे जब पत्नी पति को सीख दे. यही गलती मेरी मां ने कर के पिताजी को जिद्दी और असंतोषी बना दिया था, घर में अशांति की जड़ है पत्नी का स्वयं को ज्यादा समझना. और अब यही काम मेरी पत्नी कर रही थी. मेरी यह चिढ़ इतनी बढ़ गई थी कि अब प्रतीति की हर बात पर मैं बोल पड़ता. प्रतीति कहती, आओ कुक्कू, दूध पीओ. इधर आओ, ड्रैस बदल दूं, कापी निकालो, होमवर्क करना है, आदि.

मैं झल्ला पड़ता, ‘दिमाग नहीं है, बेवकूफ कहीं की. दिख नहीं रहा वह खेल रही है मेरे साथ, अभी कोई होमवर्क नहीं.’
‘दूध तो पीने दो?’
‘क्यों? तुम कहोगी तो हुक्म बजाना ही पड़ेगा? कोई जबरदस्ती है क्या? नहीं पीएगी अभी दूध, उस की जब मरजी होगी तभी पीएगी.’
उदासी और आश्चर्य से भर उठती प्रतीति. कहती, ‘4 साल की बच्ची की कभी दूध पीने की मरजी होगी भी.’
मैं बोलता, ‘नहीं होगी तो नहीं पीएगी, तुम बीच में मत बोलो.’
प्रतीति मारे हताशा के झल्ला पड़ती, ‘बीच में तो तुम पड़ रहे हो. मुझे समझने दो न उस की जरूरतों को.’
‘कोई जरूरत नहीं है तीसरे को बीच में बोलने की, जब मैं अपनी बेटी के साथ हूं, समझीं.’

प्रतीति अवाक् हो कर मेरा मुंह ताकती और मैं झल्ला कर उसे और नीचा दिखाने की, उस पर गुस्सा उतारने की कोशिश करता ताकि वह मेरी ओर देखती न रहे. उस का मेरी ओर इस तरह एकटक देखना मेरे गलत होने का एहसास दिलाता था और मुझे मेरा गलत साबित होना कतई पसंद नहीं था. मैं ने कमर कस ली कि उसे किसी भी कीमत पर इतना नहीं बढ़ने दूंगा कि वह मुझे समझाना शुरू करे.

मैं ने प्रतीति को हर बात पर डराना, दबाना शुरू कर दिया ताकि वह सहीगलत कुछ भी मुझे बता कर मेरी गलतियों का एहसास न करा पाए. धीरेधीरे मैं ने उस में ऐसे एहसास भर दिए कि अगर उस ने कभी भी किसी बात पर अपनी नापसंदगी जाहिर की तो उसे हमेशा के लिए यह घर छोड़ना होगा और यह नुसखा कारगर साबित हुआ. हो क्यों न, कितनी ही पढ़ीलिखी और समझदार भारतीय औरत हो, हर हाल में निभाने वाली मानसिकता उसे कई बार न बरदाश्त हो सकने वाली चीजों को बरदाश्त करने का हौसला दे देती है, प्रतीति की भी यह शक्ति कम मगर सहनशक्ति दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी. शारीरिक तौर पर वह ड्यूटी के लिहाज से शायद मुझे खुश रखती थी और ज्यादा अंत:स्थ तक प्रवेश करने की मैं भी जहमत नहीं उठाता था.

दिन गुजरते जा रहे थे, कुक्कू बड़ी होती जा रही थी.

ज्योंज्यों मेरा आधिपत्य बढ़ता जा रहा था, प्रतीति अपनेआप में सिमटती जा रही थी. हमारा रिश्ता सिकुड़ता जा रहा था. कुक्कू अचंभित, हैरान दोराहे पर चलती जा रही थी.

मैं कुक्कू को अकसर पढ़ाने बैठता और कुक्कू की गलतियों के लिए मुझे उस की मां को सुनाने का अच्छा मौका मिलता. प्रतीति चुपचाप सुनती रहती और मैं बेटी के सामने खराब हो जाने के डर से प्रतीति पर उलटेसीधे इलजाम लगाना शुरू करता ताकि कुक्कू अपनी मां को बुरा समझे. इन सब से मैं क्या पाता था या मेरी कौन सी चाहत पूरी होती थी, मैं खुद भी नहीं समझ पाता. हां, इतना अवश्य था कि मेरा भूखा पुरातन ‘मैं’ थोड़ा सांस लेता, पुष्ट होता, संतुष्ट होता. बचपन में मैं रात के साढ़े 3 बजे से भोर 5 बजे तक यही सोचता रहता कि मांपिताजी दोनों साथसाथ एक ही घर में रहते ही क्यों हैं? सोचता, ये अगर अलगअलग हो जाएं तो मैं मां के साथ रहूंगा और तीनों भाइयों को पिताजी के साथ भेज दूंगा. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. जिंदगी हिचकोले खाती चलती रही, साथ वह सिलसिला भी.

मगर अब मैं पूरी क्षमता में हूं कि पुरानी गलतियों को सुधार लूं. अब न तो मैं घर में किसी औरत को हायतौबा मचाने दूंगा और न ही घर में अशांति का महाभारत छिड़ने दूंगा. रोजरोज के क्लेश से बेहतर है अलगाव…अलगाव… अलगाव.

प्रतीति शारीरिक और मानसिक भाषा द्वारा कितनी ही समझाने की कोशिश करती, मुझे लगता वह मुझे उल्लू बना रही है, मुझे धोखा दे कर अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रही है. मैं जिद से भर उठता, न मानने की जिद से, उसे नीचा दिखाने की जिद से, बातबात पर उस की गलतियां ढूंढ़ कर उस को गलत साबित करने की जिद से, जो शायद हमारे संसार में नहीं था. उस पुरानी कहानी को काल्पनिक रूप से हमारे संसार पर प्रतिबिंबित कर बचपन की उन बिसूरती यादों को सही करने की जिद से, भर उठता था मैं.

छठी में पढ़ने वाली कुक्कू का रिजल्ट आया था. कक्षा में प्रथम आने वाली कुक्कू किसी तरह पास हो कर 7वीं में पहुंची थी, मैं उस का रिपोर्टकार्ड देख कर अपनेआप को रोक नहीं पाया, घर में मेरे काफी देर बवाल मचाने के बाद जब प्रतीति से रहा नहीं गया तो वह मुझ से उलझ ही पड़ी. प्रतीति अपनेआप में बड़बड़ाती हुई कहने लगी, ‘दूभर कर दिया है जीना. कहीं अकेले बैठ कर सोचो कि शादी के बाद मेरे सारे सपनों को कैसे तुम ने हथौड़े मारमार कर तोड़ा, कहीं चैन की सांस नहीं लेने दी. हमेशा मुझ पर गलत तोहमतें लगाईं और मैं ने कभी उन का सही तरीके से विरोध तक नहीं किया. सब उलटेसीधे इलजामों को अपने दिल में दबा कर घुटती रही, लेकिन कर्तव्य से कभी मैं ने मुंह नहीं फेरा. काउंसिलिंग की बात से चिढ़ होती है, लेकिन खुद सोचो कि हम पर…’

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जब भी मुझे फुरसत मिलती, हम आपस में खेलते, बातें करते, लेकिन प्रतीति हमारे बीच आ जाती तो मैं मायूस हो जाता, कहीं कुक्कू का झुकाव उस की मां की तरफ हो जाए तो मैं अकेला रह जाऊंगा, मैं अपने पिता की तरह परिवार से दूर हो जाऊंगा. यह मेरे परिवार की बेटी है, मेरी बेटी है, मेरी अमानत. आखिर कुछ तो हो जो पूरी तरह से मेरा हो.

मैं अपनी मां को चाह कर भी हरदम अपने करीब न पा सका, जब देखो तब वे बस पिताजी को ले कर व्यस्त रहतीं. नहीं, मुझे सख्ती से प्रतीति को कुक्कू से दूर रखना होगा, उस का हर वक्त मेरे बच्चे को सहीगलत बताना, निर्देश देना मैं बरदाश्त नहीं कर पा रहा था.

ऐसा लगता था कि वह मुझे ही आदेश दे रही हो, अप्रत्यक्ष रूप से. बेहद चिढ़ होती है मुझे जब पत्नी पति को सीख दे. यही गलती मेरी मां ने कर के पिताजी को जिद्दी और असंतोषी बना दिया था, घर में अशांति की जड़ है पत्नी का स्वयं को ज्यादा समझना. और अब यही काम मेरी पत्नी कर रही थी. मेरी यह चिढ़ इतनी बढ़ गई थी कि अब प्रतीति की हर बात पर मैं बोल पड़ता. प्रतीति कहती, आओ कुक्कू, दूध पीओ. इधर आओ, ड्रैस बदल दूं, कापी निकालो, होमवर्क करना है, आदि.

मैं झल्ला पड़ता, ‘दिमाग नहीं है, बेवकूफ कहीं की. दिख नहीं रहा वह खेल रही है मेरे साथ, अभी कोई होमवर्क नहीं.’
‘दूध तो पीने दो?’
‘क्यों? तुम कहोगी तो हुक्म बजाना ही पड़ेगा? कोई जबरदस्ती है क्या? नहीं पीएगी अभी दूध, उस की जब मरजी होगी तभी पीएगी.’
उदासी और आश्चर्य से भर उठती प्रतीति. कहती, ‘4 साल की बच्ची की कभी दूध पीने की मरजी होगी भी.’
मैं बोलता, ‘नहीं होगी तो नहीं पीएगी, तुम बीच में मत बोलो.’
प्रतीति मारे हताशा के झल्ला पड़ती, ‘बीच में तो तुम पड़ रहे हो. मुझे समझने दो न उस की जरूरतों को.’
‘कोई जरूरत नहीं है तीसरे को बीच में बोलने की, जब मैं अपनी बेटी के साथ हूं, समझीं.’

प्रतीति अवाक् हो कर मेरा मुंह ताकती और मैं झल्ला कर उसे और नीचा दिखाने की, उस पर गुस्सा उतारने की कोशिश करता ताकि वह मेरी ओर देखती न रहे. उस का मेरी ओर इस तरह एकटक देखना मेरे गलत होने का एहसास दिलाता था और मुझे मेरा गलत साबित होना कतई पसंद नहीं था. मैं ने कमर कस ली कि उसे किसी भी कीमत पर इतना नहीं बढ़ने दूंगा कि वह मुझे समझाना शुरू करे.

मैं ने प्रतीति को हर बात पर डराना, दबाना शुरू कर दिया ताकि वह सहीगलत कुछ भी मुझे बता कर मेरी गलतियों का एहसास न करा पाए. धीरेधीरे मैं ने उस में ऐसे एहसास भर दिए कि अगर उस ने कभी भी किसी बात पर अपनी नापसंदगी जाहिर की तो उसे हमेशा के लिए यह घर छोड़ना होगा और यह नुसखा कारगर साबित हुआ. हो क्यों न, कितनी ही पढ़ीलिखी और समझदार भारतीय औरत हो, हर हाल में निभाने वाली मानसिकता उसे कई बार न बरदाश्त हो सकने वाली चीजों को बरदाश्त करने का हौसला दे देती है, प्रतीति की भी यह शक्ति कम मगर सहनशक्ति दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी. शारीरिक तौर पर वह ड्यूटी के लिहाज से शायद मुझे खुश रखती थी और ज्यादा अंत:स्थ तक प्रवेश करने की मैं भी जहमत नहीं उठाता था.

दिन गुजरते जा रहे थे, कुक्कू बड़ी होती जा रही थी.

ज्योंज्यों मेरा आधिपत्य बढ़ता जा रहा था, प्रतीति अपनेआप में सिमटती जा रही थी. हमारा रिश्ता सिकुड़ता जा रहा था. कुक्कू अचंभित, हैरान दोराहे पर चलती जा रही थी.

मैं कुक्कू को अकसर पढ़ाने बैठता और कुक्कू की गलतियों के लिए मुझे उस की मां को सुनाने का अच्छा मौका मिलता. प्रतीति चुपचाप सुनती रहती और मैं बेटी के सामने खराब हो जाने के डर से प्रतीति पर उलटेसीधे इलजाम लगाना शुरू करता ताकि कुक्कू अपनी मां को बुरा समझे. इन सब से मैं क्या पाता था या मेरी कौन सी चाहत पूरी होती थी, मैं खुद भी नहीं समझ पाता. हां, इतना अवश्य था कि मेरा भूखा पुरातन ‘मैं’ थोड़ा सांस लेता, पुष्ट होता, संतुष्ट होता. बचपन में मैं रात के साढ़े 3 बजे से भोर 5 बजे तक यही सोचता रहता कि मांपिताजी दोनों साथसाथ एक ही घर में रहते ही क्यों हैं? सोचता, ये अगर अलगअलग हो जाएं तो मैं मां के साथ रहूंगा और तीनों भाइयों को पिताजी के साथ भेज दूंगा. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. जिंदगी हिचकोले खाती चलती रही, साथ वह सिलसिला भी.

मगर अब मैं पूरी क्षमता में हूं कि पुरानी गलतियों को सुधार लूं. अब न तो मैं घर में किसी औरत को हायतौबा मचाने दूंगा और न ही घर में अशांति का महाभारत छिड़ने दूंगा. रोजरोज के क्लेश से बेहतर है अलगाव…अलगाव… अलगाव.

प्रतीति शारीरिक और मानसिक भाषा द्वारा कितनी ही समझाने की कोशिश करती, मुझे लगता वह मुझे उल्लू बना रही है, मुझे धोखा दे कर अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रही है. मैं जिद से भर उठता, न मानने की जिद से, उसे नीचा दिखाने की जिद से, बातबात पर उस की गलतियां ढूंढ़ कर उस को गलत साबित करने की जिद से, जो शायद हमारे संसार में नहीं था. उस पुरानी कहानी को काल्पनिक रूप से हमारे संसार पर प्रतिबिंबित कर बचपन की उन बिसूरती यादों को सही करने की जिद से, भर उठता था मैं.

छठी में पढ़ने वाली कुक्कू का रिजल्ट आया था. कक्षा में प्रथम आने वाली कुक्कू किसी तरह पास हो कर 7वीं में पहुंची थी, मैं उस का रिपोर्टकार्ड देख कर अपनेआप को रोक नहीं पाया, घर में मेरे काफी देर बवाल मचाने के बाद जब प्रतीति से रहा नहीं गया तो वह मुझ से उलझ ही पड़ी. प्रतीति अपनेआप में बड़बड़ाती हुई कहने लगी, ‘दूभर कर दिया है जीना. कहीं अकेले बैठ कर सोचो कि शादी के बाद मेरे सारे सपनों को कैसे तुम ने हथौड़े मारमार कर तोड़ा, कहीं चैन की सांस नहीं लेने दी. हमेशा मुझ पर गलत तोहमतें लगाईं और मैं ने कभी उन का सही तरीके से विरोध तक नहीं किया. सब उलटेसीधे इलजामों को अपने दिल में दबा कर घुटती रही, लेकिन कर्तव्य से कभी मैं ने मुंह नहीं फेरा. काउंसिलिंग की बात से चिढ़ होती है, लेकिन खुद सोचो कि हम पर…’

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March 05, 2021 at 10:00AM

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