Friday, 26 March 2021

Short Stort: दकियानूसी मौडर्न   

घंटी की आवाज सुन कर अलका के दरवाजा खोलते ही नवागुंतक ने कहा, ‘‘नमस्कार, आप मुझे नहीं जानतीं, मेरा नाम पूनम है. मैं इसी अपार्टमैंट में रहती हूं.’’‘‘नमस्कार, मैं अलका, आइए,’’ कहते हुए अलका ने पूनम को अंदर आने का निमंत्रण दिया.

‘‘फिर कभी, आज जरा जल्दी में हूं. कल गुरुपूर्णिमा है, गुरुजी के आश्रम से गुरुजी के अनुयाई आए हैं. उन के सान्निध्य से लाभ उठाने के लिए गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हम ने घर में सत्संग का आयोजन किया है. उस के बाद महाप्रसाद की भी व्यवस्था है. आप सपरिवार आइएगा,’’ पूनम ने अलका से कहा.
‘‘सत्संग…’’ अलका ने वाक्य अधूरा छोड़ते हुए कहा.

‘‘हमारी गुरुमाता हैं, उन का मुंबई में आश्रम है. वे तो देशविदेश धर्म के प्रचारप्रसार के लिए जाती रहती हैं, लेकिन उन के अनुशासित शिष्य उन के काम को आगे बढ़ाते रहते हैं. हम उन के प्रवचन औडियो, वीडियो सीडी के जरिए दिखाते हैं. हम चाहते हैं ज्यादा से ज्यादा लोग गुरुमाई के विचारों को आत्मसात कर धर्मकर्म को अपनाएं. इस से उन के जीवन में सुख व शांति का प्रवाह होने के साथ उन का जीवन सफल होगा. यही नहीं दूसरों को भी उन के विचारों से अवगत करा कर उन के जीवन को भी सफल बनाने में सहयोग दें.’’

ये भी पढ़ें- Short story: और फिर भगवान भी गायब हो गए

ये भी पढ़ें-मदर्स डे स्पेशल: मेरी मां के नाम

अलका इस अपार्टमैंट में कुछ दिनों पहले आई थी. सो, अभी तक उस का किसी से ज्यादा परिचय नहीं हुआ था. पूनम के निमंत्रण पर सोच में पड़ गई. वह कभी सत्संग में नहीं गई थी. उस ने अपनी सासुमां को टीवी पर कई बाबाओं का सत्संग सुनते देखा था. सब की एक ही बातें. एक ही चालें. अपनी करनी के चलते जब आसाराम जेल गए तो सासुमां को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था. बारबार वे यही कहती रहीं कि उन को फंसाया गया है. कई बार उस ने उन्हें सचाई बतानी चाही, तो उन्होंने उसे धर्म, कर्म से विमुख की उपाधि से विभूषित कर उस का मुंह बंद कर दिया था. नतीजा यह हुआ कि वह उन की बातें चुपचाप सुनती रहती थी, लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती थी. वैसे भी, उस का मानना था जिस ने अपने मनमस्तिष्क के दरवाजे बंद कर रखे हैं, उस को समझा पाना बेहद कठिन है.

अलका को इन बाबाओं पर कोई विश्वास नहीं था, क्योंकि उसे लगता था कि ये आम भोलेभाले इंसानों को फंसा कर उन्हें कर्म से विमुख कर, अकर्मण्य बना कर सिर्फ धर्म की अफीम चटा कर ही जीवनरूपी नाव को वैतरणी पार करने के लिए विवश कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें- Short Story : मोको कहां ढूंढे रे बंदे

साधुसंन्यासियों से सदा दूर रहने वाली अलका को इस समय पूनम के आग्रह को ठुकरा पाना उचित नहीं लग रहा था. अब उसे यहीं रहना है, सो, जल में रह कर मगर से बैर लेना उचित नहीं है. यह सोच कर उस ने जाने का मन बना लिया था. वैसे भी, इस अपार्टमैंट वालों से मेलजोल बढ़ाने का सुनहरा अवसर वह खोना नहीं चाहती थी.

सुबह 10 बजे से ही अपार्टमैंट में गहमागहमी शुरू हो गई. लगभग 11 बजे ढोलमंजीरों की आवाज सुनाई देने लगी. आवाज सुन कर घर का दरवाजा बंद कर वह पूनम के घर गई. वहां पूनम के अतिरिक्त कई अन्य स्त्रियां सुंदरसुंदर परिधानों में उपस्थित थीं, जबकि पुरुष बाहर खड़े थे, साधुओं के दल का इंतजार कर रहे थे.

ये भी पढ़ें-मदर्स डे स्पेशल: अम्मा बनते बाबूजी

कुछ ही देर में उस ने एक युवा को हाथ में चरणपादुकाएं तथा उस के पीछे भगवा वस्त्र पहने हुए लगभग 15-20 युवा युवकयुवती आते देखे. सभी लगभग 25 से 40 वर्ष की उम्र के होंगे. उन को देख कर अलका को आश्चर्य हुआ. जो उम्र किसी भी इंसान के कैरियर के लिए अत्यंत मूल्यवान होती है, उस उम्र में संन्यास लेना क्या उचित है? अभी वह सोच ही रही थी कि चरणपादुकाएं पकड़े युवक ने घर में प्रवेश किया. गृहस्वामिनी उस का स्वागत करते हुए उसे उस स्थान तक ले गई जहां गुरुमाई का एक बड़ा सा तैलीय चित्र एक लाल कपड़े वाले आसन पर रखा था. आगे वाले युवक ने चरणपादुकाएं आसन पर चित्र के सामने रख दीं.

ये भी पढ़ें-मैं पुरुष हूं : मिसेज मेहता ऐसा क्यों कह रही थी कि साड़ियां संस्कृति की निशानी है

दीप प्रज्ज्वलित कर सभी मेहमानों ने गुरुमाई के चित्र तथा चरणपादुका को फूलमालाएं पहना कर पूजा की. इस के बाद सभी लोगों ने अपनेअपने आसन ग्रहण किए. लगभग 2 घंटे तक पूजासत्संग चला. सब से पहले गुरुमाई की औडियो, वीडियो, सीडी द्वारा सभी अनुयाइयों को उन के संदेश सुनाए गए. आधा घंटा भजन चला तथा 10 मिनट का ध्यान व उस के बाद आरती हुई. आरती का थाल 50-100 रुपए के नोटों से भर गया था. आश्चर्य तो यह था कि किसी को 10-20 रुपए देने में आनाकानी करने वाली स्त्रियां थाल में बड़ेबड़े नोट डाल कर गर्वोन्मुक्त हो रही थीं.

आरती के बाद गुरुमाई का भोग लगा कर उन के शिष्यों को प्रसाद दिया गया. फिर दूसरे लोग महाप्रसाद के लिए बैठे. जो महिलाएं अभी आस्था से ओतप्रोत थीं, वही अब कपड़े, गहनों के साथ, सासबहू तो कुछ पतिपुराण पर भी आ गईं.एक महिला ने अपना परिचय देते हुए अलका का परिचय पूछा. अलका के परिचय देने के बाद उस महिला ने जिस ने अपना नाम अर्चना बताया था, कहा, ‘‘आप यहां नएनए आए हो. गृहप्रवेश की पूजा करा ली होगी. आप ने किसी को बुलाया नहीं?’’
उस की बात सुन कर कई दूसरी महिलाओं के चेहरे अलका की ओर घूमे.

‘‘अर्चना जी, मैं तथा आलोक इन सब में विश्वास नहीं करते. हमारे लिए तो हर दिन एकसमान है. जिस दिन हमें सुविधा लगी, उस दिन हम ने शिफ्ट कर लिया.’’‘‘अच्छा, विवाह तो शुभ मुहूर्त देख कर ही किया होगा,’’ अर्चना के बगल में बैठी शोभना ने पूछा.‘‘विवाह का फैसला तो मेरे तथा आलोक के मातापिता का था, किंतु गृहप्रवेश का हमारा अपना,’’ अलका ने शोभना की आंखों में व्यंग्नात्मक मुसकान देख कर कहा.
‘‘क्या गृहप्रवेश में आप के और भाईसाहब के मातापिता नहीं आए थे?’’ शोभना ने फिर पूछा.‘‘आए थे.’’
‘‘क्या उन्होंने विरोध नहीं किया?’’

‘‘नहीं,’’ कह कर अलका ने बेकार की चलती बहस को खत्म करने की कोशिश की.‘‘शुभ समय देख कर किया हर काम अच्छा होता है वरना बाद में परेशानी आती है,’’ शोभना की बात सुन कर उस की पड़ोसिन रूचि भी कह उठी.अलका ने किसी की भी बात का उत्तर देना अब उचित नहीं समझा. वैसे भी, उन लोगों की बात का क्या उत्तर देना जो अपनी सोच में इतने जकड़े हों कि दूसरों की बात व्यर्थ लगे.पूनम के घर हर सोमवार, शाम को 7 से 8 बजे सत्संग होता था. 10 मिनट के ध्यान के समय वह दरवाजे के बाहर आ कर खड़ी हो जाती, जिस से वह हर आनेजाने वाले पर निगाह रख कर ध्यान करने वालों का ध्यान भंग होने से बचा सके. इस सत्संग में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की भागीदारी होती थी वह भी उन महिलाओं की जो स्वयं को अत्याधुनिक मानती थीं. कुछ तो जौब भी करती थीं. पूनम स्वयं महिला विद्यालय में रसायनशास्त्र की प्रवक्ता थी, इस के बावजूद उस की इतनी अंधभक्ति अलका को आश्चर्यचकित कर रही थी.

इस से अधिक आश्चर्य तो अलका को तब हुआ जब उस की पड़ोसिन रुचि ने उसे अपार्टमैंट में चल रही ‘सुंदरकांड किटी’ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रण दिया. महिलाओं की सामान्य किटी तो उस ने सुनी थी, पर ‘सुंदरकांड किटी…’ वह सोच ही रही थी कि रुचि ने कहा, ‘‘अलकाजी, इस किटी में सुंदरकांड के पाठ के साथ सामान्य किटी की तरह ही आयोजक को आए अतिथियों के लिए खानपान का भी आयोजन करना होता है. इस बहाने धर्मकर्म के साथ हम महिलाएं अपना मनोरंजन भी कर लेती हैं.’’अलका ने रुचि को नम्रतापूर्वक मना कर दिया था. लखनऊ में जेठ के महीने का हर मंगल ‘बड़ा मंगल’ माना जाता है. हर मंगल को किसी न किसी के घर से भंडारे का न्योता आ जाता. सुंदरकांड के साथ खानेपीने की अच्छीखासी व्यवस्था रहती थी.

प्रारंभ में अलका सामाजिकता निभाने चली जाती थी, किंतु धीरेधीरे उसे इन आयोजनों में अरुचि होने लगी. आस्था मन की चीज है, न कि दिखाने की. यही कारण था कि हर आयोजन उसे उस के करने वाले की प्रतिष्ठा का द्योतक लगने लगा था. आखिरकार, पहनावे से आधुनिक व विचारों से दकियानूसी महिलाओं का अपनी आस्था का भौंड़ा प्रदर्शन कर दूसरों को नीचा दिखाने को आतुर रहना उसे पसंद न था इसलिए ऐसी महिलाओं से उस ने दूरी बना लेना ही बेहतर समझा.नतीजा यह हुआ कि धीरेधीरे आस्था के रंग में डूबी महिलाओं ने उसे नास्तिक की उपाधि से विभूषित कर उस का सामाजिक बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया. लेकिन, उस ने उन की इस मनोवृत्ति को भी सहजता से लिया. कम से कम अब उसे ऐसे आयोजनों में सम्मिलित न हो पाने पर बहाना बनाने से मुक्ति मिल गई थी.

The post Short Stort: दकियानूसी मौडर्न    appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/2NYkegL

घंटी की आवाज सुन कर अलका के दरवाजा खोलते ही नवागुंतक ने कहा, ‘‘नमस्कार, आप मुझे नहीं जानतीं, मेरा नाम पूनम है. मैं इसी अपार्टमैंट में रहती हूं.’’‘‘नमस्कार, मैं अलका, आइए,’’ कहते हुए अलका ने पूनम को अंदर आने का निमंत्रण दिया.

‘‘फिर कभी, आज जरा जल्दी में हूं. कल गुरुपूर्णिमा है, गुरुजी के आश्रम से गुरुजी के अनुयाई आए हैं. उन के सान्निध्य से लाभ उठाने के लिए गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हम ने घर में सत्संग का आयोजन किया है. उस के बाद महाप्रसाद की भी व्यवस्था है. आप सपरिवार आइएगा,’’ पूनम ने अलका से कहा.
‘‘सत्संग…’’ अलका ने वाक्य अधूरा छोड़ते हुए कहा.

‘‘हमारी गुरुमाता हैं, उन का मुंबई में आश्रम है. वे तो देशविदेश धर्म के प्रचारप्रसार के लिए जाती रहती हैं, लेकिन उन के अनुशासित शिष्य उन के काम को आगे बढ़ाते रहते हैं. हम उन के प्रवचन औडियो, वीडियो सीडी के जरिए दिखाते हैं. हम चाहते हैं ज्यादा से ज्यादा लोग गुरुमाई के विचारों को आत्मसात कर धर्मकर्म को अपनाएं. इस से उन के जीवन में सुख व शांति का प्रवाह होने के साथ उन का जीवन सफल होगा. यही नहीं दूसरों को भी उन के विचारों से अवगत करा कर उन के जीवन को भी सफल बनाने में सहयोग दें.’’

ये भी पढ़ें- Short story: और फिर भगवान भी गायब हो गए

ये भी पढ़ें-मदर्स डे स्पेशल: मेरी मां के नाम

अलका इस अपार्टमैंट में कुछ दिनों पहले आई थी. सो, अभी तक उस का किसी से ज्यादा परिचय नहीं हुआ था. पूनम के निमंत्रण पर सोच में पड़ गई. वह कभी सत्संग में नहीं गई थी. उस ने अपनी सासुमां को टीवी पर कई बाबाओं का सत्संग सुनते देखा था. सब की एक ही बातें. एक ही चालें. अपनी करनी के चलते जब आसाराम जेल गए तो सासुमां को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था. बारबार वे यही कहती रहीं कि उन को फंसाया गया है. कई बार उस ने उन्हें सचाई बतानी चाही, तो उन्होंने उसे धर्म, कर्म से विमुख की उपाधि से विभूषित कर उस का मुंह बंद कर दिया था. नतीजा यह हुआ कि वह उन की बातें चुपचाप सुनती रहती थी, लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती थी. वैसे भी, उस का मानना था जिस ने अपने मनमस्तिष्क के दरवाजे बंद कर रखे हैं, उस को समझा पाना बेहद कठिन है.

अलका को इन बाबाओं पर कोई विश्वास नहीं था, क्योंकि उसे लगता था कि ये आम भोलेभाले इंसानों को फंसा कर उन्हें कर्म से विमुख कर, अकर्मण्य बना कर सिर्फ धर्म की अफीम चटा कर ही जीवनरूपी नाव को वैतरणी पार करने के लिए विवश कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें- Short Story : मोको कहां ढूंढे रे बंदे

साधुसंन्यासियों से सदा दूर रहने वाली अलका को इस समय पूनम के आग्रह को ठुकरा पाना उचित नहीं लग रहा था. अब उसे यहीं रहना है, सो, जल में रह कर मगर से बैर लेना उचित नहीं है. यह सोच कर उस ने जाने का मन बना लिया था. वैसे भी, इस अपार्टमैंट वालों से मेलजोल बढ़ाने का सुनहरा अवसर वह खोना नहीं चाहती थी.

सुबह 10 बजे से ही अपार्टमैंट में गहमागहमी शुरू हो गई. लगभग 11 बजे ढोलमंजीरों की आवाज सुनाई देने लगी. आवाज सुन कर घर का दरवाजा बंद कर वह पूनम के घर गई. वहां पूनम के अतिरिक्त कई अन्य स्त्रियां सुंदरसुंदर परिधानों में उपस्थित थीं, जबकि पुरुष बाहर खड़े थे, साधुओं के दल का इंतजार कर रहे थे.

ये भी पढ़ें-मदर्स डे स्पेशल: अम्मा बनते बाबूजी

कुछ ही देर में उस ने एक युवा को हाथ में चरणपादुकाएं तथा उस के पीछे भगवा वस्त्र पहने हुए लगभग 15-20 युवा युवकयुवती आते देखे. सभी लगभग 25 से 40 वर्ष की उम्र के होंगे. उन को देख कर अलका को आश्चर्य हुआ. जो उम्र किसी भी इंसान के कैरियर के लिए अत्यंत मूल्यवान होती है, उस उम्र में संन्यास लेना क्या उचित है? अभी वह सोच ही रही थी कि चरणपादुकाएं पकड़े युवक ने घर में प्रवेश किया. गृहस्वामिनी उस का स्वागत करते हुए उसे उस स्थान तक ले गई जहां गुरुमाई का एक बड़ा सा तैलीय चित्र एक लाल कपड़े वाले आसन पर रखा था. आगे वाले युवक ने चरणपादुकाएं आसन पर चित्र के सामने रख दीं.

ये भी पढ़ें-मैं पुरुष हूं : मिसेज मेहता ऐसा क्यों कह रही थी कि साड़ियां संस्कृति की निशानी है

दीप प्रज्ज्वलित कर सभी मेहमानों ने गुरुमाई के चित्र तथा चरणपादुका को फूलमालाएं पहना कर पूजा की. इस के बाद सभी लोगों ने अपनेअपने आसन ग्रहण किए. लगभग 2 घंटे तक पूजासत्संग चला. सब से पहले गुरुमाई की औडियो, वीडियो, सीडी द्वारा सभी अनुयाइयों को उन के संदेश सुनाए गए. आधा घंटा भजन चला तथा 10 मिनट का ध्यान व उस के बाद आरती हुई. आरती का थाल 50-100 रुपए के नोटों से भर गया था. आश्चर्य तो यह था कि किसी को 10-20 रुपए देने में आनाकानी करने वाली स्त्रियां थाल में बड़ेबड़े नोट डाल कर गर्वोन्मुक्त हो रही थीं.

आरती के बाद गुरुमाई का भोग लगा कर उन के शिष्यों को प्रसाद दिया गया. फिर दूसरे लोग महाप्रसाद के लिए बैठे. जो महिलाएं अभी आस्था से ओतप्रोत थीं, वही अब कपड़े, गहनों के साथ, सासबहू तो कुछ पतिपुराण पर भी आ गईं.एक महिला ने अपना परिचय देते हुए अलका का परिचय पूछा. अलका के परिचय देने के बाद उस महिला ने जिस ने अपना नाम अर्चना बताया था, कहा, ‘‘आप यहां नएनए आए हो. गृहप्रवेश की पूजा करा ली होगी. आप ने किसी को बुलाया नहीं?’’
उस की बात सुन कर कई दूसरी महिलाओं के चेहरे अलका की ओर घूमे.

‘‘अर्चना जी, मैं तथा आलोक इन सब में विश्वास नहीं करते. हमारे लिए तो हर दिन एकसमान है. जिस दिन हमें सुविधा लगी, उस दिन हम ने शिफ्ट कर लिया.’’‘‘अच्छा, विवाह तो शुभ मुहूर्त देख कर ही किया होगा,’’ अर्चना के बगल में बैठी शोभना ने पूछा.‘‘विवाह का फैसला तो मेरे तथा आलोक के मातापिता का था, किंतु गृहप्रवेश का हमारा अपना,’’ अलका ने शोभना की आंखों में व्यंग्नात्मक मुसकान देख कर कहा.
‘‘क्या गृहप्रवेश में आप के और भाईसाहब के मातापिता नहीं आए थे?’’ शोभना ने फिर पूछा.‘‘आए थे.’’
‘‘क्या उन्होंने विरोध नहीं किया?’’

‘‘नहीं,’’ कह कर अलका ने बेकार की चलती बहस को खत्म करने की कोशिश की.‘‘शुभ समय देख कर किया हर काम अच्छा होता है वरना बाद में परेशानी आती है,’’ शोभना की बात सुन कर उस की पड़ोसिन रूचि भी कह उठी.अलका ने किसी की भी बात का उत्तर देना अब उचित नहीं समझा. वैसे भी, उन लोगों की बात का क्या उत्तर देना जो अपनी सोच में इतने जकड़े हों कि दूसरों की बात व्यर्थ लगे.पूनम के घर हर सोमवार, शाम को 7 से 8 बजे सत्संग होता था. 10 मिनट के ध्यान के समय वह दरवाजे के बाहर आ कर खड़ी हो जाती, जिस से वह हर आनेजाने वाले पर निगाह रख कर ध्यान करने वालों का ध्यान भंग होने से बचा सके. इस सत्संग में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की भागीदारी होती थी वह भी उन महिलाओं की जो स्वयं को अत्याधुनिक मानती थीं. कुछ तो जौब भी करती थीं. पूनम स्वयं महिला विद्यालय में रसायनशास्त्र की प्रवक्ता थी, इस के बावजूद उस की इतनी अंधभक्ति अलका को आश्चर्यचकित कर रही थी.

इस से अधिक आश्चर्य तो अलका को तब हुआ जब उस की पड़ोसिन रुचि ने उसे अपार्टमैंट में चल रही ‘सुंदरकांड किटी’ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रण दिया. महिलाओं की सामान्य किटी तो उस ने सुनी थी, पर ‘सुंदरकांड किटी…’ वह सोच ही रही थी कि रुचि ने कहा, ‘‘अलकाजी, इस किटी में सुंदरकांड के पाठ के साथ सामान्य किटी की तरह ही आयोजक को आए अतिथियों के लिए खानपान का भी आयोजन करना होता है. इस बहाने धर्मकर्म के साथ हम महिलाएं अपना मनोरंजन भी कर लेती हैं.’’अलका ने रुचि को नम्रतापूर्वक मना कर दिया था. लखनऊ में जेठ के महीने का हर मंगल ‘बड़ा मंगल’ माना जाता है. हर मंगल को किसी न किसी के घर से भंडारे का न्योता आ जाता. सुंदरकांड के साथ खानेपीने की अच्छीखासी व्यवस्था रहती थी.

प्रारंभ में अलका सामाजिकता निभाने चली जाती थी, किंतु धीरेधीरे उसे इन आयोजनों में अरुचि होने लगी. आस्था मन की चीज है, न कि दिखाने की. यही कारण था कि हर आयोजन उसे उस के करने वाले की प्रतिष्ठा का द्योतक लगने लगा था. आखिरकार, पहनावे से आधुनिक व विचारों से दकियानूसी महिलाओं का अपनी आस्था का भौंड़ा प्रदर्शन कर दूसरों को नीचा दिखाने को आतुर रहना उसे पसंद न था इसलिए ऐसी महिलाओं से उस ने दूरी बना लेना ही बेहतर समझा.नतीजा यह हुआ कि धीरेधीरे आस्था के रंग में डूबी महिलाओं ने उसे नास्तिक की उपाधि से विभूषित कर उस का सामाजिक बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया. लेकिन, उस ने उन की इस मनोवृत्ति को भी सहजता से लिया. कम से कम अब उसे ऐसे आयोजनों में सम्मिलित न हो पाने पर बहाना बनाने से मुक्ति मिल गई थी.

The post Short Stort: दकियानूसी मौडर्न    appeared first on Sarita Magazine.

March 27, 2021 at 10:00AM

No comments:

Post a Comment