Tuesday, 1 June 2021

जमाना बदल गया : आकांक्षा को अपने नाम से क्यों परेशानी थी- भाग 4

एक दिन राजीव ताला लगाना भूल गए. मैं ने जो उसे खोल कर देखा तो सारे पत्र उस में थे. मुझे बहुत तेज गुस्सा आया. मैं ने राजीव को औफिस से आते ही कहा तो मुझे गालियां देने लगे और बुरी तरह से पिटाई भी की और बाहर से ताला लगा कर कहीं चले गए.फिर मैं ने पड़ोसियों को आवाज दी और बोली “मेरा पति मेरे सोते समय ताला लगा चले गए. अब उन के आने में देर हो रही है बच्चा रो रहा है. अब प्लीज आप ताला तोड़ दो.”

कोई सज्जन पुरुष थे. उन्होंने ताला तोड़ दिया तो मैं उन्हें शुक्रिया कह कर जयपुर आ गई. मम्मीपापा मुझे देख कर दंग रह गए. मेरी मम्मी को तो बहुत गुस्सा आया और वे खूब चिल्लाने लगीं. पापा मेरे सहनशील व्यक्ति थे.उन्होंने कहा,”आकांक्षा के ससुराल में सूचित कर देता हूं. ऐसे मामले में जल्दबाजी ठीक नहीं.”

ससुराल वालों ने अपनी बेटे की गलती को मानने के बदले मेरी सहनशीलता को दोष दिया. खैर, हम ने कुछ नहीं किया. पापा बोले,”ऐसी स्थिति में बेटी को हम बीएड करा कर पैरों पर खड़े कर देते हैं.”

मैं बीएड की तैयारी में लग गई. राजीव का पत्र आया कि तुम आ जाओ सब ठीक हो जाएगा. जब उन्हें पता चला कि मैं बीएड की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही हूं तो उन्होंने राजीव को हमारे घर पर भेजा. “अब मैं ठीक रहूंगा, तुम्हें कोई शिकायत का मौका नहीं दूंगा. तुम मेरे साथ आ जाओ. मैं तुम्हें नौकरी भी करने दूंगा,” राजीव कहने लगे.

मैं ने उन्हें कहा,”बगैर बीएड किए मैं यहां से नहीं जाऊंगी.” राजीव उस समय तो यहां से चले गए. फिर जहां नौकरी करते थे वहां के जिले में कोर्ट केस कर दिया,”मेरी पत्नी को मेरे साथ आ कर रहना चाहिए. मैं चाहता हूं वह मेरे साथ रहे.”

सब लोग कहने लगे, “वह इतना खराब तो नहीं है. उस ने कोई लांछन नहीं लगाया तुम्हारे ऊपर.” मेरे घर वालों ने भी कहा कि हम भी ठीकठाक ही जवाब दे देते हैं. ऐसे रिश्ते को तोड़ना ठीक नहीं है. एक बच्चा भी हो गया. मैं कोर्ट में गई. आमनेसामने देख कर समझौते की बात करने लगा. वकील भी बोले यही ठीक रहेगा. उस समय राजीव ने सारी बातें मान लीं.

तब सारे रिश्तेदारों ने मुझे समझाया. मेरी मम्मी तो ज्योतिष के चक्कर में पड़ गईं. बड़ेबड़े ज्योतिषाचार्य के पास गईं. सब ने कहा कि इस का यह उपचार करो, वह यज्ञ करो. यह दान दो वह दान दो. उस मंदिर में पूजा करो, वहां अर्चना करो…

जब तक मैं ने बीएड किया. मम्मी पूरे साल इन्हीं चक्करों में पड़ी रहीं और रुपयों को बरबाद करती रहीं. पापा बहुत नाराज होते. मम्मी कभीकभी उन से छिप कर ऐसे काम करने लगीं कि‌ मेरे मम्मीपापा में भी तकरार होने लगी. पंडितों और ज्योतिषियों ने मम्मी को कह दिया कि इन का डाइवोर्स कभी नहीं होगा. ये दोनों हमेशा साथ रहेंगे, तो मम्मी को विश्वास हो गया कि सब ठीक हो जाएगा.

मुझे लगता कि इन सब का कारण मैं ही हूं. मुझे खुद पर शर्म महसूस होती. फिर भी मैं राजीव के साथ जाने को तैयार नहीं थी. पर ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान…’ कुछ लोग भी बीच में पड़ कर मुझे समझौता करने के लिए मजबूर करने लगे.

मेरे पापा की हालत भी ठीक नहीं थी. उस का दोष भी मेरा भाई मुझ पर ही मढ़ना चाहता था. मेरा बीएड पूरा हो चुका था और राजीव ने अपना ट्रांसफर दूसरे प्रदेश में करा लिया था ताकि दोनों फैमिली का हस्तक्षेप ना रहे. मुझे नौकरी करने की परमिशन मिल गई थी. शाहर भी बड़ा था तो मैं ज्यादा कुछ बोल नहीं पाई.

वहां पर मुझे तुरंत नौकरी मिल गई.अच्छी नौकरी थी. मेरा बेटा भी मेरे साथ ही जाने लगा. पर राजीव अपनी हरकतों से बाज नहीं आए. हरएक बात पर लड़ाईझगड़ा करना, बातबात पर हाथ उठाना उन के लिए बड़ी बात नहीं थी.

अब मैं मां को पत्र लिख सकती थी. स्कूल जाने से मेरा मन भी बदल गया था. इन बातों को मैं ने बड़ा नहीं लिया. मैं ने भी सोचा कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. इस बीच मैं फिर प्रैगनैंट हो गई. एक बार तो गर्भपात करा दिया. जब दूसरी बार प्रैगनैंट हुई तो गर्भपात  कराने के लिए मैं ने ही मना कर दिया.

पापा को लगता कि मम्मी मुझे ससुराल में रहने नहीं देतीं. पर ऐसी बात नहीं थी. पापा और मम्मी के बीच में तकरारें होने लगीं. मम्मी मेरी बहुत चिंता करतीं. मुझे सर्विस करने की परमिशन तो दे दी पर जौइंट अकाउंट में पैसा जमा होता था, जिस में से मैं निकाल नहीं सकती. राजीव सब ले कर खर्च कर देते. मैं कुछ नहीं कर पाती.

मुझे अपने खर्चे के लिए उन के आगे हाथ फैलाना पड़ता. घर की सारी जरूरतें मेरी सैलरी से ही पूरा करते. कह दूं तो लड़ाईझगड़ा होता. जब डिलीवरी कराने की बात आई फिर पीहर ही गई. मांबाप तो मजबूर थे. एक बच्चा और पैदा हो गया. अब हम 4 लोग हो गए.

इस बीच पापा का देहांत हो गया. मम्मी पढ़ीलिखी सक्षम थीं पर भैया ने घर की बागडोर अपने हाथों में ले ली. मम्मी ऐसी परिस्थिति में डिप्रैशन में रहने लगीं. मुझे लगा ऐसी परिस्थिति में मैं यहां से चली जाऊं तो ज्यादा ठीक है. राजीव तो बुला ही रहे थे.

मैं ने मम्मी को कहा,”मम्मी, आप मेरी प्रेरणास्रोत हो. आप समझदार हो. मैं भी पढ़ीलिखी हूं. मैं अपनेआप को संभाल लूंगी. आप मेरी चिंता मत करो. मैं जा रही हूं. आप अपनेआप को संभालो.”

 

मम्मी धीरेधीरे मेरे अपनेआप को संभालने लगीं. पर मैं ने कोई भी शिकायत राजीव की मम्मी से नहीं की. मेरी तकलीफें दिनप्रतिदिन बढ़ती रहीं. राजीव का ट्रांसफर अलगअलग जगह पर होता रहा. मुझे कई बोल्ड स्टेप उठाने पड़े. मैं जहां जाती थी मुझे नौकरी आराम से मिल जाती थी. अतः नौकरी को ही अपना मनोरंजन समझ कर मैं बराबर काम करती रही.

राजीव तो वैसे ही रहे,”अभी तक झाड़ू नहीं लगी. आज सिर क्यों नहीं धोया? आज तो चौथ का व्रत है. तुम्हारे संस्कार ठीक नहीं. तुम्हारी मां ने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया, सुबह उठते ही पहले नहाना चाहिए, फिर रसोई में जाना चाहिए…”

अब मैं स्वयं 40 साल की हो गई थी. मेरी मम्मी के बारे में ही बोलते रहते हैं कि उन्होंने मुझे कुछ नहीं सिखाया. अब तो मेरी बहू आने के दिन आ रहे हैं. पर क्या करूं…मुझे 6:30 बजे सुबह स्कूल के लिए रवाना होना होता है. मैं नहाधो कर खाना बनाती तो पसीने से तरबतर हो जाती. ऐसी स्थिति में स्कूल जाना मुश्किल हो जाता. मगर यह बात उन के दिमाग में नहीं आती. घर में चाय के लिए दूध भले ही ना हो, बच्चे के लिए दूध ना हो पर एक लीटर दूध सोमवार को शिवमंदिर में चढ़ना चाहिए.

पहले तो राजीव मुझे और बच्चों को भी साथ ले कर मंदिर जाते थे. वहां करीब 1 घंटा लगता. हम बुरी तरह थक जाते. फिर बहुत कह कर मना किया.मैं ने कहा, “आप को जो करना है करो, मैं मंदिर नहीं जाऊंगी.”

फिर ससुरजी ने कहा कि उस को नहीं जाना तो छोड़ दे. फिर इस से तो मुझे मुक्ति मिली.राजीव अब भी, जब मेरे बच्चे बड़ेबड़े हो गए यही कहते हैं,”मेरा दिया खाती हो, शर्म नहीं आती? निकल जा मेरे घर से.”

अब निकल कर कहां जाऊंगी? मेरे बच्चे पढ़ रहे हैं. उन को बीच मंझधार में छोड़ कर मैं कैसे जा सकती हूं? बच्चों को तो मम्मी की आवश्यकता है ना… मेरे भी अपने कर्तव्य हैं ना? मैं 1 बच्चे का खर्चा स्वयं वहन करती हूं. इस के बाद भी मेरी इंसल्ट करता रहता है.

मैं समाज से नहीं डरती. उसे जो कहना है कहे. मुझे अपने बच्चों की चिंता है. कोर्ट, केस, तलाक… इन सब के बीच में जो होशियार और होनहार बच्चे हैं उन का भविष्य मैं खराब नहीं करना चाहती. यही सोच कर मैं साथ रह रही हूं. जैसे ही मेरे बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे तो सोचती हूं मैं अलग हो जाऊंगी. उस समय भी मेरे लिए संभव होगा, यह मैं वक्त पर छोड़ती हूं…

बहुत से लोग कहते हैं कि आजकल ऐसा नहीं होता. पढ़ीलिखी आत्मनिर्भर लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता. अब मैं उन्हें क्या कहूं? अब भी समाज में ऐसी बहुत लड़कियां हैं जो खून के आंसू रोती हैं पर दुनिया में अपने को प्रसन्न दिखाती हैं. उसी में से मैं भी एक हूं. जब तक पितृसत्तात्मक समाज रहेगा लड़कियों के साथ ऐसा होता रहेगा

 

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एक दिन राजीव ताला लगाना भूल गए. मैं ने जो उसे खोल कर देखा तो सारे पत्र उस में थे. मुझे बहुत तेज गुस्सा आया. मैं ने राजीव को औफिस से आते ही कहा तो मुझे गालियां देने लगे और बुरी तरह से पिटाई भी की और बाहर से ताला लगा कर कहीं चले गए.फिर मैं ने पड़ोसियों को आवाज दी और बोली “मेरा पति मेरे सोते समय ताला लगा चले गए. अब उन के आने में देर हो रही है बच्चा रो रहा है. अब प्लीज आप ताला तोड़ दो.”

कोई सज्जन पुरुष थे. उन्होंने ताला तोड़ दिया तो मैं उन्हें शुक्रिया कह कर जयपुर आ गई. मम्मीपापा मुझे देख कर दंग रह गए. मेरी मम्मी को तो बहुत गुस्सा आया और वे खूब चिल्लाने लगीं. पापा मेरे सहनशील व्यक्ति थे.उन्होंने कहा,”आकांक्षा के ससुराल में सूचित कर देता हूं. ऐसे मामले में जल्दबाजी ठीक नहीं.”

ससुराल वालों ने अपनी बेटे की गलती को मानने के बदले मेरी सहनशीलता को दोष दिया. खैर, हम ने कुछ नहीं किया. पापा बोले,”ऐसी स्थिति में बेटी को हम बीएड करा कर पैरों पर खड़े कर देते हैं.”

मैं बीएड की तैयारी में लग गई. राजीव का पत्र आया कि तुम आ जाओ सब ठीक हो जाएगा. जब उन्हें पता चला कि मैं बीएड की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही हूं तो उन्होंने राजीव को हमारे घर पर भेजा. “अब मैं ठीक रहूंगा, तुम्हें कोई शिकायत का मौका नहीं दूंगा. तुम मेरे साथ आ जाओ. मैं तुम्हें नौकरी भी करने दूंगा,” राजीव कहने लगे.

मैं ने उन्हें कहा,”बगैर बीएड किए मैं यहां से नहीं जाऊंगी.” राजीव उस समय तो यहां से चले गए. फिर जहां नौकरी करते थे वहां के जिले में कोर्ट केस कर दिया,”मेरी पत्नी को मेरे साथ आ कर रहना चाहिए. मैं चाहता हूं वह मेरे साथ रहे.”

सब लोग कहने लगे, “वह इतना खराब तो नहीं है. उस ने कोई लांछन नहीं लगाया तुम्हारे ऊपर.” मेरे घर वालों ने भी कहा कि हम भी ठीकठाक ही जवाब दे देते हैं. ऐसे रिश्ते को तोड़ना ठीक नहीं है. एक बच्चा भी हो गया. मैं कोर्ट में गई. आमनेसामने देख कर समझौते की बात करने लगा. वकील भी बोले यही ठीक रहेगा. उस समय राजीव ने सारी बातें मान लीं.

तब सारे रिश्तेदारों ने मुझे समझाया. मेरी मम्मी तो ज्योतिष के चक्कर में पड़ गईं. बड़ेबड़े ज्योतिषाचार्य के पास गईं. सब ने कहा कि इस का यह उपचार करो, वह यज्ञ करो. यह दान दो वह दान दो. उस मंदिर में पूजा करो, वहां अर्चना करो…

जब तक मैं ने बीएड किया. मम्मी पूरे साल इन्हीं चक्करों में पड़ी रहीं और रुपयों को बरबाद करती रहीं. पापा बहुत नाराज होते. मम्मी कभीकभी उन से छिप कर ऐसे काम करने लगीं कि‌ मेरे मम्मीपापा में भी तकरार होने लगी. पंडितों और ज्योतिषियों ने मम्मी को कह दिया कि इन का डाइवोर्स कभी नहीं होगा. ये दोनों हमेशा साथ रहेंगे, तो मम्मी को विश्वास हो गया कि सब ठीक हो जाएगा.

मुझे लगता कि इन सब का कारण मैं ही हूं. मुझे खुद पर शर्म महसूस होती. फिर भी मैं राजीव के साथ जाने को तैयार नहीं थी. पर ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान…’ कुछ लोग भी बीच में पड़ कर मुझे समझौता करने के लिए मजबूर करने लगे.

मेरे पापा की हालत भी ठीक नहीं थी. उस का दोष भी मेरा भाई मुझ पर ही मढ़ना चाहता था. मेरा बीएड पूरा हो चुका था और राजीव ने अपना ट्रांसफर दूसरे प्रदेश में करा लिया था ताकि दोनों फैमिली का हस्तक्षेप ना रहे. मुझे नौकरी करने की परमिशन मिल गई थी. शाहर भी बड़ा था तो मैं ज्यादा कुछ बोल नहीं पाई.

वहां पर मुझे तुरंत नौकरी मिल गई.अच्छी नौकरी थी. मेरा बेटा भी मेरे साथ ही जाने लगा. पर राजीव अपनी हरकतों से बाज नहीं आए. हरएक बात पर लड़ाईझगड़ा करना, बातबात पर हाथ उठाना उन के लिए बड़ी बात नहीं थी.

अब मैं मां को पत्र लिख सकती थी. स्कूल जाने से मेरा मन भी बदल गया था. इन बातों को मैं ने बड़ा नहीं लिया. मैं ने भी सोचा कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. इस बीच मैं फिर प्रैगनैंट हो गई. एक बार तो गर्भपात करा दिया. जब दूसरी बार प्रैगनैंट हुई तो गर्भपात  कराने के लिए मैं ने ही मना कर दिया.

पापा को लगता कि मम्मी मुझे ससुराल में रहने नहीं देतीं. पर ऐसी बात नहीं थी. पापा और मम्मी के बीच में तकरारें होने लगीं. मम्मी मेरी बहुत चिंता करतीं. मुझे सर्विस करने की परमिशन तो दे दी पर जौइंट अकाउंट में पैसा जमा होता था, जिस में से मैं निकाल नहीं सकती. राजीव सब ले कर खर्च कर देते. मैं कुछ नहीं कर पाती.

मुझे अपने खर्चे के लिए उन के आगे हाथ फैलाना पड़ता. घर की सारी जरूरतें मेरी सैलरी से ही पूरा करते. कह दूं तो लड़ाईझगड़ा होता. जब डिलीवरी कराने की बात आई फिर पीहर ही गई. मांबाप तो मजबूर थे. एक बच्चा और पैदा हो गया. अब हम 4 लोग हो गए.

इस बीच पापा का देहांत हो गया. मम्मी पढ़ीलिखी सक्षम थीं पर भैया ने घर की बागडोर अपने हाथों में ले ली. मम्मी ऐसी परिस्थिति में डिप्रैशन में रहने लगीं. मुझे लगा ऐसी परिस्थिति में मैं यहां से चली जाऊं तो ज्यादा ठीक है. राजीव तो बुला ही रहे थे.

मैं ने मम्मी को कहा,”मम्मी, आप मेरी प्रेरणास्रोत हो. आप समझदार हो. मैं भी पढ़ीलिखी हूं. मैं अपनेआप को संभाल लूंगी. आप मेरी चिंता मत करो. मैं जा रही हूं. आप अपनेआप को संभालो.”

 

मम्मी धीरेधीरे मेरे अपनेआप को संभालने लगीं. पर मैं ने कोई भी शिकायत राजीव की मम्मी से नहीं की. मेरी तकलीफें दिनप्रतिदिन बढ़ती रहीं. राजीव का ट्रांसफर अलगअलग जगह पर होता रहा. मुझे कई बोल्ड स्टेप उठाने पड़े. मैं जहां जाती थी मुझे नौकरी आराम से मिल जाती थी. अतः नौकरी को ही अपना मनोरंजन समझ कर मैं बराबर काम करती रही.

राजीव तो वैसे ही रहे,”अभी तक झाड़ू नहीं लगी. आज सिर क्यों नहीं धोया? आज तो चौथ का व्रत है. तुम्हारे संस्कार ठीक नहीं. तुम्हारी मां ने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया, सुबह उठते ही पहले नहाना चाहिए, फिर रसोई में जाना चाहिए…”

अब मैं स्वयं 40 साल की हो गई थी. मेरी मम्मी के बारे में ही बोलते रहते हैं कि उन्होंने मुझे कुछ नहीं सिखाया. अब तो मेरी बहू आने के दिन आ रहे हैं. पर क्या करूं…मुझे 6:30 बजे सुबह स्कूल के लिए रवाना होना होता है. मैं नहाधो कर खाना बनाती तो पसीने से तरबतर हो जाती. ऐसी स्थिति में स्कूल जाना मुश्किल हो जाता. मगर यह बात उन के दिमाग में नहीं आती. घर में चाय के लिए दूध भले ही ना हो, बच्चे के लिए दूध ना हो पर एक लीटर दूध सोमवार को शिवमंदिर में चढ़ना चाहिए.

पहले तो राजीव मुझे और बच्चों को भी साथ ले कर मंदिर जाते थे. वहां करीब 1 घंटा लगता. हम बुरी तरह थक जाते. फिर बहुत कह कर मना किया.मैं ने कहा, “आप को जो करना है करो, मैं मंदिर नहीं जाऊंगी.”

फिर ससुरजी ने कहा कि उस को नहीं जाना तो छोड़ दे. फिर इस से तो मुझे मुक्ति मिली.राजीव अब भी, जब मेरे बच्चे बड़ेबड़े हो गए यही कहते हैं,”मेरा दिया खाती हो, शर्म नहीं आती? निकल जा मेरे घर से.”

अब निकल कर कहां जाऊंगी? मेरे बच्चे पढ़ रहे हैं. उन को बीच मंझधार में छोड़ कर मैं कैसे जा सकती हूं? बच्चों को तो मम्मी की आवश्यकता है ना… मेरे भी अपने कर्तव्य हैं ना? मैं 1 बच्चे का खर्चा स्वयं वहन करती हूं. इस के बाद भी मेरी इंसल्ट करता रहता है.

मैं समाज से नहीं डरती. उसे जो कहना है कहे. मुझे अपने बच्चों की चिंता है. कोर्ट, केस, तलाक… इन सब के बीच में जो होशियार और होनहार बच्चे हैं उन का भविष्य मैं खराब नहीं करना चाहती. यही सोच कर मैं साथ रह रही हूं. जैसे ही मेरे बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे तो सोचती हूं मैं अलग हो जाऊंगी. उस समय भी मेरे लिए संभव होगा, यह मैं वक्त पर छोड़ती हूं…

बहुत से लोग कहते हैं कि आजकल ऐसा नहीं होता. पढ़ीलिखी आत्मनिर्भर लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता. अब मैं उन्हें क्या कहूं? अब भी समाज में ऐसी बहुत लड़कियां हैं जो खून के आंसू रोती हैं पर दुनिया में अपने को प्रसन्न दिखाती हैं. उसी में से मैं भी एक हूं. जब तक पितृसत्तात्मक समाज रहेगा लड़कियों के साथ ऐसा होता रहेगा

 

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June 01, 2021 at 10:00AM

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