Tuesday, 1 June 2021

जमाना बदल गया : आकांक्षा को अपने नाम से क्यों परेशानी थी- भाग 3

मैं ने कहा, “मुझे छत पर जाने नहीं देते. सब लोग कपड़े छत पर सुखाते हैं और मुझे कहते हैं कि अपने देवर को दे दो वह सूखा देगा. मम्मी बताओ तो अंडरगारमैंट्स अपने जवान देवर को कैसे देती फैलाने?” मेरे सासससुर कहते हैं कि अब तेरा घर यही है. अब तू पीहर नहीं जाएगी. बहुत रह लिया पीहर में.”

मेरी मम्मी सुन कर बहुत रोईं.मेरे मम्मीपापा मुझे जान से भी ज्यादा चाहते थे. पापा तो मुझे आकांक्षा भी नहीं बुलाते आकांक्षाजी कहते थे. उन्होंने हमेशा मुझे प्रेम, प्यार और इज्जत से रखा.

जब मैं पीहर आती तो मेरे ससुरजी मेरे पर्स की तलाशी लेते और कहते कि हमारे घर से क्या ले जा रही हो? उन के घर में कुछ भी नहीं था जो मैं साथ ले जाती. और ले भी क्यों जाती क्योंकि पीहर में कोई कमी नहीं थी.

एक दिन तो मुझे बहुत तेज गुस्सा आया. जैसे ही उन्होंने कहा कि पर्स दो तो मैं ने कह दिया, “पापाजी, आप तो बहू से घूंघट करवाते हो. फिर आप कैसे बहू के पर्स को खोल कर देख सकते हो? हमें अपने पर्स में सैनिटरी पैड्स भी रखना पड़ता है… हम आप को दिखाएं?”

सास अनपढ़ थीं. उन को कुछ समझ में नहीं आता. वह भी ससुर से उलटा चुगली करती थीं. ससुरजी हमेशा लड़ने को तैयार रहते थे. इस बीच ऐसा हुआ कि मेरे दूर के मामाजी, जो जयपुर में ही रहते थे, मेरे ससुरजी उन की औफिस में पहुंच गए.

उन से बोले,”आप की भांजी देवरों के अंडरवियर नहीं धोती.” मामाजी भौंचक्के रह गए. मामाजी ने सिर्फ इतना कहा, “साहब, छोटी बात को बड़ा मत कीजिए? अभी तो वह 20 साल की ही है. घर में लाड़प्यार से पलीबङी बच्ची है. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.”

शाम को मामाजी घर आए. उन्होंने पूछा,”बिटिया आकांक्षा कैसी है?” “बहुत बढ़िया,”मम्मी बोलीं. पापा से पूछा. उन का भी यही जवाब था. तब वे बोले, “मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा? मैं तो जब आप से पूछता हूं कि आकांक्षा कैसी है सब बढ़िया कहते हो. आज आकांक्षा के ससुरजी मेरे औफिस आए. वे जो भी वह कह रहे थे बहुत हास्यास्पद था. आप क्यों छिपा रहे हो?”

अब फटने की बारी पापा की थी,”मैं ने तो पहले ही कहा था ये लोग बेकार आदमी हैं. आप की बहन मानी नहीं और अपनी जिद पर अड़ी रही. आज मेरी लड़की तकलीफ में है. अब हम क्या कर सकते हैं? “20 साल की लड़की 12 लोगों का खाना बनाती है और उस से उम्मीद की जाती है कि पूरे घर की साफसफाई, झाड़ूपोंछा वही लगाए, पूरे घर वालों के कपड़े धोए, देवरों को पढ़ाए.

“ससुर अफसर तो थे साथ में पत्नी के नाम से इंश्योरैंस का काम भी करते थे. पत्नी तो पढ़ीलिखी नहीं थी अतः उस का काम भी आकांक्षा से कराना चाहते हैं. इस के अलावा उस को कालेज भी जाना पङता है अपनी पढ़ाई पूरी करने.”

मेरी मम्मी परेशान होतीं और कहतीं, “मैं बात करूं?” पापा कहते, “ऐसे तो संबंध बिगड़ जाएगा. हर बात की तुम्हें जल्दी पड़ी रहती है. शादी की भी जल्दी थी अब बात करने की भी जल्दी है.” और लोगों ने भी मम्मी को समझाया कि जल्दबाजी मत करो. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.

सब से बड़ी बात तो सासससुर को छोड़ो, मेरा पति सरकारी नौकरी को छोड़ कर निजी कंपनी में नौकरी कर ली. इतने में मैं प्रैगनैंट हो गई. मेरी तबीयत खराब रहने लगी. ऊपर से पढ़ाई और काम करना बहुत मुश्किल हो गया. पीहर वालों की प्रेरणा से किसी प्रकार से मैं ने परीक्षा की तैयारी की. पूरा समय था जब मैं ने ऐग्जाम दिया.

बहुत मुश्किल से गरमी के दिनों में भी ऐग्जाम देने जाती थी. खैर परीक्षा खत्म होने के हफ्ते दिन बाद बेटा पैदा हुआ. उस के पहले मेरे सास ही नहीं पति और देवर भी कहते थे कि हमारे घर में लड़की होने का रिवाज नहीं है. हमारे घर तो लड़के ही होते हैं. लड़कियां चाहिए भी नहीं.

इन बातों को सुन कर मुझे बहुत घबराहट होती थी. मैं मम्मी से कहती,”मम्मी, यदि लड़की हो जाए तो ये लोग लड़ाई करेंगे?” मम्मी परेशान हो जातीं. मुझे पीहर आने नहीं दे रहे थे पर मैं जिद कर के आ गई थी.

बेटा हुआ तो उन्हें सूचित किया. 5 मिनट के लिए सासूमां आईं.इस के पहले मम्मी ने मेरी जन्मपत्री पंडितजी को दिखाए. उन्होंने बहुत सारे उपचार बताए. मम्मी ने सब पर खर्चा किया. पर उस से कुछ नहीं हुआ. कोई और आया नहीं. ना कोई खर्चा किया, ना कोई फंक्शन. मम्मीपापा ने ही सारे खर्चे उठाए. मुझे विदा करते समय भी मम्मी ने बहुत कुछ दिया.

मम्मी नौकरी करती थीं, बावजूद छुट्टी ले कर सबकुछ करना पड़ा, जिस का मुझे बहुत दुख हुआ. ससुराल वाले आ कर मुझे ले कर गए. बच्चा रोता तो उस को ले कर पति मुझे खड़े रहने को बोलते. ठंड में मैं बिना कपड़े के ही खड़ी रहती. इन परिस्थितियों में राजीव का ट्रांसफर छोटे गांव में हो गया. वे मुझे वहां ले कर गए.

यह ट्रांसफर राजीव ने जानबूझ कर कराया था ताकि मैं दूरदर्शन और आकाशवाणी में ना जा सकूं. वहां रोज मुझ से लड़ाई करते. सुबह ठंड के दिनों में 4 बजे उठ कर नहाने को कहते. ‘आज चौथ का व्रत है,’ ‘आज पूर्णमासी है,’ ‘आज एकादशी है…’ रोज कुछ ना कुछ होता और मुझे व्रत रखने को मजबूर करते.

मुझे बहुत ऐसिडिटी होती थी. डाक्टर ने मुझे खाली पेट रहने को मना किया. पर मैं क्या कर सकती थी. “हमारे यहां तो सारी औरतें रखती हैं. तुम कोई अनोखी हो क्या? तुम्हें अपने पढ़ाई का घमंड है.” मैं जब भी अपनी मम्मी को चिट्ठी  लिखती, तो राजीव कहते कि मैं पोस्ट कर दूंगा. मुझे लगता वह कर देंगे, मगर मम्मी ने मुझे बताया कि उन के पास कोई चिट्ठी ही नहीं आई.

मम्मी कोई चिट्ठी भेजतीं तो औफिस के पते पर पोस्ट करने को कहा जाता. मैं ने कहा कि घर के पते पर मंगाओ तो राजीव कहते कि यहां पर ठीक से पोस्टमैन नहीं आता. मम्मी की पत्रों को भी मुझे नहीं दिया जाता. मेरी पत्रों को भी ऐसा संदूक में बंद कर के ताला लगा जाते. इस का तो मुझे पता ही नहीं था.

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मैं ने कहा, “मुझे छत पर जाने नहीं देते. सब लोग कपड़े छत पर सुखाते हैं और मुझे कहते हैं कि अपने देवर को दे दो वह सूखा देगा. मम्मी बताओ तो अंडरगारमैंट्स अपने जवान देवर को कैसे देती फैलाने?” मेरे सासससुर कहते हैं कि अब तेरा घर यही है. अब तू पीहर नहीं जाएगी. बहुत रह लिया पीहर में.”

मेरी मम्मी सुन कर बहुत रोईं.मेरे मम्मीपापा मुझे जान से भी ज्यादा चाहते थे. पापा तो मुझे आकांक्षा भी नहीं बुलाते आकांक्षाजी कहते थे. उन्होंने हमेशा मुझे प्रेम, प्यार और इज्जत से रखा.

जब मैं पीहर आती तो मेरे ससुरजी मेरे पर्स की तलाशी लेते और कहते कि हमारे घर से क्या ले जा रही हो? उन के घर में कुछ भी नहीं था जो मैं साथ ले जाती. और ले भी क्यों जाती क्योंकि पीहर में कोई कमी नहीं थी.

एक दिन तो मुझे बहुत तेज गुस्सा आया. जैसे ही उन्होंने कहा कि पर्स दो तो मैं ने कह दिया, “पापाजी, आप तो बहू से घूंघट करवाते हो. फिर आप कैसे बहू के पर्स को खोल कर देख सकते हो? हमें अपने पर्स में सैनिटरी पैड्स भी रखना पड़ता है… हम आप को दिखाएं?”

सास अनपढ़ थीं. उन को कुछ समझ में नहीं आता. वह भी ससुर से उलटा चुगली करती थीं. ससुरजी हमेशा लड़ने को तैयार रहते थे. इस बीच ऐसा हुआ कि मेरे दूर के मामाजी, जो जयपुर में ही रहते थे, मेरे ससुरजी उन की औफिस में पहुंच गए.

उन से बोले,”आप की भांजी देवरों के अंडरवियर नहीं धोती.” मामाजी भौंचक्के रह गए. मामाजी ने सिर्फ इतना कहा, “साहब, छोटी बात को बड़ा मत कीजिए? अभी तो वह 20 साल की ही है. घर में लाड़प्यार से पलीबङी बच्ची है. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.”

शाम को मामाजी घर आए. उन्होंने पूछा,”बिटिया आकांक्षा कैसी है?” “बहुत बढ़िया,”मम्मी बोलीं. पापा से पूछा. उन का भी यही जवाब था. तब वे बोले, “मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा? मैं तो जब आप से पूछता हूं कि आकांक्षा कैसी है सब बढ़िया कहते हो. आज आकांक्षा के ससुरजी मेरे औफिस आए. वे जो भी वह कह रहे थे बहुत हास्यास्पद था. आप क्यों छिपा रहे हो?”

अब फटने की बारी पापा की थी,”मैं ने तो पहले ही कहा था ये लोग बेकार आदमी हैं. आप की बहन मानी नहीं और अपनी जिद पर अड़ी रही. आज मेरी लड़की तकलीफ में है. अब हम क्या कर सकते हैं? “20 साल की लड़की 12 लोगों का खाना बनाती है और उस से उम्मीद की जाती है कि पूरे घर की साफसफाई, झाड़ूपोंछा वही लगाए, पूरे घर वालों के कपड़े धोए, देवरों को पढ़ाए.

“ससुर अफसर तो थे साथ में पत्नी के नाम से इंश्योरैंस का काम भी करते थे. पत्नी तो पढ़ीलिखी नहीं थी अतः उस का काम भी आकांक्षा से कराना चाहते हैं. इस के अलावा उस को कालेज भी जाना पङता है अपनी पढ़ाई पूरी करने.”

मेरी मम्मी परेशान होतीं और कहतीं, “मैं बात करूं?” पापा कहते, “ऐसे तो संबंध बिगड़ जाएगा. हर बात की तुम्हें जल्दी पड़ी रहती है. शादी की भी जल्दी थी अब बात करने की भी जल्दी है.” और लोगों ने भी मम्मी को समझाया कि जल्दबाजी मत करो. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.

सब से बड़ी बात तो सासससुर को छोड़ो, मेरा पति सरकारी नौकरी को छोड़ कर निजी कंपनी में नौकरी कर ली. इतने में मैं प्रैगनैंट हो गई. मेरी तबीयत खराब रहने लगी. ऊपर से पढ़ाई और काम करना बहुत मुश्किल हो गया. पीहर वालों की प्रेरणा से किसी प्रकार से मैं ने परीक्षा की तैयारी की. पूरा समय था जब मैं ने ऐग्जाम दिया.

बहुत मुश्किल से गरमी के दिनों में भी ऐग्जाम देने जाती थी. खैर परीक्षा खत्म होने के हफ्ते दिन बाद बेटा पैदा हुआ. उस के पहले मेरे सास ही नहीं पति और देवर भी कहते थे कि हमारे घर में लड़की होने का रिवाज नहीं है. हमारे घर तो लड़के ही होते हैं. लड़कियां चाहिए भी नहीं.

इन बातों को सुन कर मुझे बहुत घबराहट होती थी. मैं मम्मी से कहती,”मम्मी, यदि लड़की हो जाए तो ये लोग लड़ाई करेंगे?” मम्मी परेशान हो जातीं. मुझे पीहर आने नहीं दे रहे थे पर मैं जिद कर के आ गई थी.

बेटा हुआ तो उन्हें सूचित किया. 5 मिनट के लिए सासूमां आईं.इस के पहले मम्मी ने मेरी जन्मपत्री पंडितजी को दिखाए. उन्होंने बहुत सारे उपचार बताए. मम्मी ने सब पर खर्चा किया. पर उस से कुछ नहीं हुआ. कोई और आया नहीं. ना कोई खर्चा किया, ना कोई फंक्शन. मम्मीपापा ने ही सारे खर्चे उठाए. मुझे विदा करते समय भी मम्मी ने बहुत कुछ दिया.

मम्मी नौकरी करती थीं, बावजूद छुट्टी ले कर सबकुछ करना पड़ा, जिस का मुझे बहुत दुख हुआ. ससुराल वाले आ कर मुझे ले कर गए. बच्चा रोता तो उस को ले कर पति मुझे खड़े रहने को बोलते. ठंड में मैं बिना कपड़े के ही खड़ी रहती. इन परिस्थितियों में राजीव का ट्रांसफर छोटे गांव में हो गया. वे मुझे वहां ले कर गए.

यह ट्रांसफर राजीव ने जानबूझ कर कराया था ताकि मैं दूरदर्शन और आकाशवाणी में ना जा सकूं. वहां रोज मुझ से लड़ाई करते. सुबह ठंड के दिनों में 4 बजे उठ कर नहाने को कहते. ‘आज चौथ का व्रत है,’ ‘आज पूर्णमासी है,’ ‘आज एकादशी है…’ रोज कुछ ना कुछ होता और मुझे व्रत रखने को मजबूर करते.

मुझे बहुत ऐसिडिटी होती थी. डाक्टर ने मुझे खाली पेट रहने को मना किया. पर मैं क्या कर सकती थी. “हमारे यहां तो सारी औरतें रखती हैं. तुम कोई अनोखी हो क्या? तुम्हें अपने पढ़ाई का घमंड है.” मैं जब भी अपनी मम्मी को चिट्ठी  लिखती, तो राजीव कहते कि मैं पोस्ट कर दूंगा. मुझे लगता वह कर देंगे, मगर मम्मी ने मुझे बताया कि उन के पास कोई चिट्ठी ही नहीं आई.

मम्मी कोई चिट्ठी भेजतीं तो औफिस के पते पर पोस्ट करने को कहा जाता. मैं ने कहा कि घर के पते पर मंगाओ तो राजीव कहते कि यहां पर ठीक से पोस्टमैन नहीं आता. मम्मी की पत्रों को भी मुझे नहीं दिया जाता. मेरी पत्रों को भी ऐसा संदूक में बंद कर के ताला लगा जाते. इस का तो मुझे पता ही नहीं था.

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May 31, 2021 at 10:00AM

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