‘‘कुछ नहीं. कुछ भी तो नहीं,’ झेंपते हुए मैं ने कहा और नमकदानी उठाने लगी. ‘असल में रीना की मम्मी आई थीं और उन्हें देख कर मुझे लगा कि कहीं रीना का परिवार न टूट जाए, मोनू का क्या होगा?’’ कहते हुए जब मैं ने अपने पति की ओर देखा तो उन का चेहरा बहुत शांत था. धीरेधीरे पूरी बात सुन कर वह बहुत गंभीर स्वर में बोले, ‘‘किसी के घर के अंदर क्या हो रहा है उस को तब तक जानने की कोशिश मत करो, जब तक वह स्वयं तुम्हें न बताए और एक कहावत याद रखना कि जब तक कोई मांगे नहीं सलाह व नमक मत दो वरना संबंधों व मुंह का जायका बिगड़ जाता है.’’
अपने पति की दोटूक राय मेरी समझ में आ गई और मैं ने फैसला किया कि अपने को इस मामले से दूर रखूंगी. इस बात से मुझे गहन शांति मिली और मैं भी आराम करने चली गई. फिर रीना के यहां क्या हुआ, मैं ने जानने की कोशिश नहीं की.
‘7 बज गए, अभी तक तुलसी नहीं आई.’ अपनेआप से बड़बड़ाते हुए मैं रसोई तक जा कर लौट आई, पूरा सिंक बरतनों से भरा हुआ था. ‘खुद साफ करूं कि और इंतजार करूं…’ की दुविधा बनी हुई थी. फिर सोचा, ‘अच्छा, साढ़े 7 तक देख लूं.’ सच है दूसरे के अधीन रहने में टैंशन तो झेलनी पड़ेगी पर सवा 7 पर ही तुलसी देवी के दर्शन हो गए. मैं क्रोध करने की स्थिति में तो थी नहीं, इसलिए जबरन मुसकराते हुए ही कहा, ‘‘क्या हो गया?’’
‘‘क्या बताऊं भाभीजी, बेटी के ससुराल गई थी, उसे छोड़ने गई और बस 2 घंटे रुक कर ही वापसी की बस पकड़ी. तब जा कर सब से पहले आप के घर आई हूं. और कहीं नहीं जाऊंगी क्योंकि भूख के मारे थकान और सिरदर्द भी है…’’
‘‘अरे, चाय बना दूं क्या?’’ मैं ने पसीजते हुए पूछा.
‘‘चाय के साथ 1-2 रोटी भी अगर हों तो दे दीजिए. पता है भाभीजी, मुझे मालूम था कि आप के घर रोटी जरूर मिल जाएगी क्योंकि आप खाना खुद जो बनाती हो, तो 1-2 रोटी ज्यादा ही बनाती होंगी. वरना आजकल तो घरों में खाना बनाने वाली बाई भी पहले ही पूछ लेती हैं कि कितनी रोटी खाओगे? मुझे तो बड़ा अजीब लगता है. मान लो बाद में और
1 रोटी खाने का जी करने लगे तो? अरे, ऐसे कहीं होता है. मनुहार कर के खिलाने से ही खाना अंग लगता है.’’
अपनी बाई के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर मुझे हंसी आने लगी पर बातबात में कितनी गहरी बात उस अनपढ़ औरत ने कह दी. खाने से पहले गिन कर रोटी बनाने की जो प्रथा अब चल पड़ी है उस से कभीकभी स्थिति कितनी हास्यास्पद हो जाती है, यह स्वयं मैं अपने न जाने कितने रिश्तेदारों के घर में देख चुकी हूं परंतु तुलसी से यह बात मैं कैसे कहती. इसलिए बात टालने के लिए मैं ने कहा, ‘‘पर यह तो बता कि तू बेटी के यहां इतनी कम देर क्यों रुकी? वहीं से खा कर क्यों नहीं चली?’’
‘‘खा कर?’’ रोटीचाय खातेखाते तुलसी आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगी, ‘‘बेटी के घर? अरे, हम तो बेटी के घर का पानी भी नहीं पीते. पराई के घर कौन खाएगा.’’
मैं निरुत्तर हो गई और फिर वही होने लगा जो मैं नहीं चाह रही थी. मेरे सामने रीना, उस की मम्मी तथा आज की घटना चलचित्र की भांति घूमने लगी. यह सच है कि इस रिवाज से अनेक दिक्कतें आई होंगी परंतु आज मुझे इस रिवाज का महत्त्व भी समझ में आने लगा कि बेटी के घर में जितना कम रुकोगे उतना ही उस के घर में हस्तक्षेप कम होगा. परिणामस्वरूप उसे नए परिवार व परिवेश में सामंजस्य बैठाने में सुविधा होगी, पारिवारिक नींव सुदृढ़ व मजबूत होगी जो उस के लिए ही लाभप्रद होगी. इसलिए पूरा नहीं तो मध्यम मार्ग निकाल कर इस रिवाज का पालन करने से कम से कम परिवार टूटने से तो बचेंगे.
उफ, फिर वही दूसरे के चक्कर में अपना चिंतन शुरू हो गया. अपनेआप पर झुंझलाती हुई मैं तुलसी के साथसाथ रसोई से बाहर आ कर मुख्यद्वार बंद करने के लिए बढ़ गई.
दिन गुजरते रहे और रीना का परिवार इसी प्रकार के घटनाक्रम के साथ हमारे पड़ोस को आबाद किए रहा. हम और वे दोनों ही इस सब के आदी हो ही रहे थे कि अचानक एक दिन जब कौलबैल बजी तो दरवाजा खोलने पर मैं चौंक पड़ी क्योंकि आज घंटी बजाने वाला रोहित था.
‘‘रोहित…तुम? अंदर आओ, बेटा. कहो, कैसे आना हुआ?’’
मेरी बोली में स्वाभाविक रूप से प्यार व अपनत्व का भाव आ गया क्योंकि हमेशा से ही मेरी सहानुभूति रोहित के साथ थी, सब के होते हुए भी वह बेचारा मुझे ‘अकेला’ ही लगता था. मेरे सवाल के जवाब में रोहित की आंखें भर आईं. लगता था कि जैसे शायद उसे मुझ में अपनी ‘मां’ महसूस होने लगी. समय की नाजुकता को महसूस कर मैं पानी लेने दौड़ी.
‘‘क्या हो गया, बेटा?’’ पानी देते हुए मैं ने बड़े संकोच से पूछा. अपने पतिदेव की सलाह मुझे याद थी और उसे मानने में ही भलाई थी.
पानी पी कर रोहित थोड़ा संभला और बोला, ‘‘आंटी, आज मुझे फैसला लेना है कि रीना के साथ रहना है या नहीं?’’
‘‘क्या कहा?’’ मैं बुरी तरह आशंकित होते हुए बोली.
‘‘रीना का प्रमोशन हो गया है. वह हैडमिस्ट्रैस बन गई है पर उसे स्कूल में ही रहना होगा क्योंकि बोर्डिंग के बच्चों को भी उसे ही देखना होगा. उस का वेतन भी बढ़ गया है और अन्य सुविधाएं भी मिलेंगी. आंटी, मैं भी बहुत खुश हूं रीना की तरक्की से किंतु यह जानते हुए भी कि स्कूल मैनेजमैंट मुझे वहां रहने की अनुमति नहीं देगा, रीना ने ‘हां’ कह दिया है. मोनू मेरे पास रहेगा और रीना की मम्मी दिन में मोनू को संभालेंगी, बाकी मुझे संभालना है,’’ रोहित भर्राए गले से बोला.
‘‘पर बेटा, तुम ऐसे बच्चे को कैसे संभाल लोगे और कब तक?’’ मैं आक्रोश भरे स्वर में बोली.
‘‘उस का कहना है कि वह मैनेजमैंट को राजी कर लेगी. क्या मैं नहीं जानता कि गर्ल्स कालेज का मैनेजमैंट मेरे कारण अपने नियमों को कभी नहीं बदलेगा. आंटी, रीना अपनी तरक्की के लिए कुछ भी कर सकती है. वह मोनू के 5 वर्ष का होने तक ऐसे ही मुझे बहलाती रहेगी और फिर उसे होस्टल में डाल कर मेरी तरफ मुड़ कर भी नहीं देखेगी. इसीलिए मैं ने भी फैसला ले लिया है कि मैं अब और उस का साथ नहीं दूंगा. वह अपनी मम्मी के बलबूते पर ऐसा कदम उठा रही है तो उन्हें ही अब पूरी तरह जिम्मेदारी को उठाने दीजिए. आज तक मैं ने मोनू के कारण सबकुछ सहा, पर अब नहीं. बिना बाप के भी तो बच्चे पलते हैं न,’’ कहते हुए रोहित की आंखें आंसुओं से भर आईं और चेहरे पर विद्रोह का भाव आ गया.
‘‘अरे बेटा, ऐसा मत करो,’’ कहते हुए मेरी आंखें भी नम हो गईं परंतु मैं अपने आग्रह में खोखलापन महसूस कर रही थी क्योंकि रोहित की जगह कोई भी स्वाभिमानी पुरुष ऐसा ही कदम उठाता.
‘‘तुम्हारे मातापिता नहीं आ सकते? उन के आने से तुम्हें भी अच्छा लगेगा,’’ कहते हुए मुझे एक आशा की किरण दिखाई दी.
‘‘हैं, सब हैं पर मैं उन से क्या कहूं? एक ही शहर में हम अलगअलग क्यों रह रहे हैं. अगर ऐसा ही था तो विवाह क्यों किया? मां का स्थान पिता से ऊपर है क्योंकि बच्चे को मां बेहतर तरीके से पाल सकती है, यह बात रीना क्यों नहीं सोचती? रीना विवाह से पहले से नौकरी कर रही है और मुझे कोई एतराज नहीं था इसीलिए विवाह किया. किंतु मोनू की उपेक्षा नहीं सही जाती. मैं ने भी सहयोग देने का भरसक प्रयास किया किंतु रीना की मम्मी के सामने मेरा किया हुआ रीना को नजर ही नहीं आता और अब वही मां रीना को सही रास्ता दिखाने की जगह उलटा उस के गलत निर्णय में साथ दे रही है. मैं तो सब सह लेता परंतु मोनू की दुर्गति मैं नहीं देख सकता इसलिए मैं अपना ट्रांसफर करवा कर जा रहा हूं,’’ कहतेकहते रोहित का चेहरा अत्यंत कठोर हो गया, ‘‘मैं आप को यह बताने आया था कि एक हफ्ते में हम घर खाली कर देंगे.’’
रोहित खड़ा हो गया और मैं निढाल सी उसे जाते हुए देखती रही. मेरा मन वेदना से भर आया और मन किया कि रोहित को रोक लूं पर ऐसा कर न सकी.
घर खाली हो गया और मेरे पड़ोस में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया.
‘‘अब थोड़ा देखभाल कर घर किराए पर देंगे वरना पड़ोस के वातावरण का प्रभाव अपने ऊपर भी पड़ता ही है,’’ कहते हुए मेरे पति ने मुझे पहले सतर्क कर दिया और इसी कारण बिना किराएदार के ही 6-7 महीने निकल गए. मैं ने भी अब धीरेधीरे रीना और रोहित के बारे में सोचना बंद कर दिया.
हमारी शादी की सालगिरह पड़ी तो मैं ने और मेरे पति ने ‘फन मौल’ में लंच व पिक्चर का प्रोग्राम बनाया.
‘‘चलो, स्पैंसर का भी चक्कर लगा लें, क्या पता कुछ नई चीज देखने को मिले,’’ कहते हुए मैं अपने पति को स्पैंसर की ओर ले गई. अंदर मैं ने नए प्रोडक्ट्स पर नजर डालनी शुरू की कि अचानक देखा कि सेल्समैन एक बच्चे को बुरी तरह डांट रहा है और पास ही एक महिला उन दोनों के बीचबचाव की मुद्रा में खड़ी है. जिज्ञासु स्वभाव होने के कारण मैं उधर ही बढ़ चली. मुझे पता था कि मेरे पति भी मजबूरी में मेरे पीछेपीछे आ रहे होंगे. पास जा कर देखा तो एक सुखद आश्चर्य से मैं चिल्लाई, ‘‘अरे मोनू?’’
‘‘तब तक महिला ने भी पलट कर देखा. उस के चेहरे पर, मुझे देख कर अत्यंत राहत व खुशी का भाव आया, वे मोनू की नानी यानी रीना की मम्मी थीं.
‘‘देखिए, भाभीजी, मोनू से जरा कैचप की शीशी क्या फूट गई इन्होंने तमाशा मचा दिया, जबकि मैं कह रही हूं कि मैं पेमैंट कर दूंगी.’’
‘‘अरे पेमैंट तो आप करेंगी ही पर आप अपने बच्चे की करतूत देख कर उसे टोकने के बजाय ऐसे दुलार कर रही हैं मानो उस ने कोई तारीफ का काम किया हो. मैं ने रोका तो बदतमीजी कर रहा है,’’ सेल्समैन ने अत्यंत गुस्से से कहा.
अपमान से रीना की मम्मी की आंखों में आंसू आ गए पर अपनेआप को नियंत्रण कर उन्होंने सेल्समैन से माफी मांगते हुए मोनू को काउंटर की ओर घसीटना प्रारंभ कर दिया. अडि़यल मोनू उन की कलाई पर काटने लगा. यही होना था, मातापिता से अलग हुआ बच्चा अपना विद्रोह कहीं तो निकालेगा, मैं अपनेआप को रोक न सकी और बोल ही पड़ी, ‘‘रीना बिलकुल नहीं आ पाती क्या?’’
‘‘अरे भाभीजी, इतनी जिम्मेदारी की नौकरी कर रही है, बारबार कैसे आएगी, हमारा तो दामाद बिलकुल खोटा और गैरजिम्मेदार निकला,’’ कहतेकहते उन की आवाज में अत्यंत रोष का भाव आ गया.
‘‘आप ने उस को जिम्मेदारी उठाने का अवसर ही कहां दिया? जबजब रीना को जरूरत पड़ी आप ने अपने सहारे की ‘बैसाखी’ पकड़ा दी तो वह बेचारा सहारा कैसे बन पाता?’’ कहतेकहते मैं ने रोहित से हुआ पूरा वार्त्तालाप रीना की मम्मी को सुना दिया, ‘‘अरे, वह बेचारा तो सबकुछ करने को तैयार था पर आप ने उन दोनों को एकदूसरे को समझने कहां दिया? याद रखिएगा बहनजी, आप रीना को सहारा नहीं दे रहीं वरन बैसाखी पकड़ा कर उसे हमेशा के लिए अपाहिज बना रही हैं, जिस की वजह से मोनू का व्यक्तित्व कुंठित हो जाएगा.’’
रीना की मम्मी के चेहरे पर पश्चात्ताप के स्पष्ट भाव देख मेरे मन को यह तसल्ली मिली कि अब अवश्य ही ये अपनी बेटी के घर को जोड़ने का प्रयास करेंगी और मैं तो यही चाहूंगी कि उन का यह प्रयास अवश्य सफल हो ताकि कैरियर बनाने की अंधी दौड़ को छोड़ रीना, रोहित व मोनू के जीवन में आया खालीपन दूर करने का प्रयास करे.
‘‘अब चलो,’’ मेरे पति ने मुसकराते हुए, शांत स्वर में कहा, ‘‘आज तुम्हारी सलाह से यदि यह परिवार जुड़ जाता है तो मैं भी यही कहूंगा कि कभीकभी बिना मांगे ही सही, सही सलाह दे दिया करो.’’
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‘‘कुछ नहीं. कुछ भी तो नहीं,’ झेंपते हुए मैं ने कहा और नमकदानी उठाने लगी. ‘असल में रीना की मम्मी आई थीं और उन्हें देख कर मुझे लगा कि कहीं रीना का परिवार न टूट जाए, मोनू का क्या होगा?’’ कहते हुए जब मैं ने अपने पति की ओर देखा तो उन का चेहरा बहुत शांत था. धीरेधीरे पूरी बात सुन कर वह बहुत गंभीर स्वर में बोले, ‘‘किसी के घर के अंदर क्या हो रहा है उस को तब तक जानने की कोशिश मत करो, जब तक वह स्वयं तुम्हें न बताए और एक कहावत याद रखना कि जब तक कोई मांगे नहीं सलाह व नमक मत दो वरना संबंधों व मुंह का जायका बिगड़ जाता है.’’
अपने पति की दोटूक राय मेरी समझ में आ गई और मैं ने फैसला किया कि अपने को इस मामले से दूर रखूंगी. इस बात से मुझे गहन शांति मिली और मैं भी आराम करने चली गई. फिर रीना के यहां क्या हुआ, मैं ने जानने की कोशिश नहीं की.
‘7 बज गए, अभी तक तुलसी नहीं आई.’ अपनेआप से बड़बड़ाते हुए मैं रसोई तक जा कर लौट आई, पूरा सिंक बरतनों से भरा हुआ था. ‘खुद साफ करूं कि और इंतजार करूं…’ की दुविधा बनी हुई थी. फिर सोचा, ‘अच्छा, साढ़े 7 तक देख लूं.’ सच है दूसरे के अधीन रहने में टैंशन तो झेलनी पड़ेगी पर सवा 7 पर ही तुलसी देवी के दर्शन हो गए. मैं क्रोध करने की स्थिति में तो थी नहीं, इसलिए जबरन मुसकराते हुए ही कहा, ‘‘क्या हो गया?’’
‘‘क्या बताऊं भाभीजी, बेटी के ससुराल गई थी, उसे छोड़ने गई और बस 2 घंटे रुक कर ही वापसी की बस पकड़ी. तब जा कर सब से पहले आप के घर आई हूं. और कहीं नहीं जाऊंगी क्योंकि भूख के मारे थकान और सिरदर्द भी है…’’
‘‘अरे, चाय बना दूं क्या?’’ मैं ने पसीजते हुए पूछा.
‘‘चाय के साथ 1-2 रोटी भी अगर हों तो दे दीजिए. पता है भाभीजी, मुझे मालूम था कि आप के घर रोटी जरूर मिल जाएगी क्योंकि आप खाना खुद जो बनाती हो, तो 1-2 रोटी ज्यादा ही बनाती होंगी. वरना आजकल तो घरों में खाना बनाने वाली बाई भी पहले ही पूछ लेती हैं कि कितनी रोटी खाओगे? मुझे तो बड़ा अजीब लगता है. मान लो बाद में और
1 रोटी खाने का जी करने लगे तो? अरे, ऐसे कहीं होता है. मनुहार कर के खिलाने से ही खाना अंग लगता है.’’
अपनी बाई के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर मुझे हंसी आने लगी पर बातबात में कितनी गहरी बात उस अनपढ़ औरत ने कह दी. खाने से पहले गिन कर रोटी बनाने की जो प्रथा अब चल पड़ी है उस से कभीकभी स्थिति कितनी हास्यास्पद हो जाती है, यह स्वयं मैं अपने न जाने कितने रिश्तेदारों के घर में देख चुकी हूं परंतु तुलसी से यह बात मैं कैसे कहती. इसलिए बात टालने के लिए मैं ने कहा, ‘‘पर यह तो बता कि तू बेटी के यहां इतनी कम देर क्यों रुकी? वहीं से खा कर क्यों नहीं चली?’’
‘‘खा कर?’’ रोटीचाय खातेखाते तुलसी आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगी, ‘‘बेटी के घर? अरे, हम तो बेटी के घर का पानी भी नहीं पीते. पराई के घर कौन खाएगा.’’
मैं निरुत्तर हो गई और फिर वही होने लगा जो मैं नहीं चाह रही थी. मेरे सामने रीना, उस की मम्मी तथा आज की घटना चलचित्र की भांति घूमने लगी. यह सच है कि इस रिवाज से अनेक दिक्कतें आई होंगी परंतु आज मुझे इस रिवाज का महत्त्व भी समझ में आने लगा कि बेटी के घर में जितना कम रुकोगे उतना ही उस के घर में हस्तक्षेप कम होगा. परिणामस्वरूप उसे नए परिवार व परिवेश में सामंजस्य बैठाने में सुविधा होगी, पारिवारिक नींव सुदृढ़ व मजबूत होगी जो उस के लिए ही लाभप्रद होगी. इसलिए पूरा नहीं तो मध्यम मार्ग निकाल कर इस रिवाज का पालन करने से कम से कम परिवार टूटने से तो बचेंगे.
उफ, फिर वही दूसरे के चक्कर में अपना चिंतन शुरू हो गया. अपनेआप पर झुंझलाती हुई मैं तुलसी के साथसाथ रसोई से बाहर आ कर मुख्यद्वार बंद करने के लिए बढ़ गई.
दिन गुजरते रहे और रीना का परिवार इसी प्रकार के घटनाक्रम के साथ हमारे पड़ोस को आबाद किए रहा. हम और वे दोनों ही इस सब के आदी हो ही रहे थे कि अचानक एक दिन जब कौलबैल बजी तो दरवाजा खोलने पर मैं चौंक पड़ी क्योंकि आज घंटी बजाने वाला रोहित था.
‘‘रोहित…तुम? अंदर आओ, बेटा. कहो, कैसे आना हुआ?’’
मेरी बोली में स्वाभाविक रूप से प्यार व अपनत्व का भाव आ गया क्योंकि हमेशा से ही मेरी सहानुभूति रोहित के साथ थी, सब के होते हुए भी वह बेचारा मुझे ‘अकेला’ ही लगता था. मेरे सवाल के जवाब में रोहित की आंखें भर आईं. लगता था कि जैसे शायद उसे मुझ में अपनी ‘मां’ महसूस होने लगी. समय की नाजुकता को महसूस कर मैं पानी लेने दौड़ी.
‘‘क्या हो गया, बेटा?’’ पानी देते हुए मैं ने बड़े संकोच से पूछा. अपने पतिदेव की सलाह मुझे याद थी और उसे मानने में ही भलाई थी.
पानी पी कर रोहित थोड़ा संभला और बोला, ‘‘आंटी, आज मुझे फैसला लेना है कि रीना के साथ रहना है या नहीं?’’
‘‘क्या कहा?’’ मैं बुरी तरह आशंकित होते हुए बोली.
‘‘रीना का प्रमोशन हो गया है. वह हैडमिस्ट्रैस बन गई है पर उसे स्कूल में ही रहना होगा क्योंकि बोर्डिंग के बच्चों को भी उसे ही देखना होगा. उस का वेतन भी बढ़ गया है और अन्य सुविधाएं भी मिलेंगी. आंटी, मैं भी बहुत खुश हूं रीना की तरक्की से किंतु यह जानते हुए भी कि स्कूल मैनेजमैंट मुझे वहां रहने की अनुमति नहीं देगा, रीना ने ‘हां’ कह दिया है. मोनू मेरे पास रहेगा और रीना की मम्मी दिन में मोनू को संभालेंगी, बाकी मुझे संभालना है,’’ रोहित भर्राए गले से बोला.
‘‘पर बेटा, तुम ऐसे बच्चे को कैसे संभाल लोगे और कब तक?’’ मैं आक्रोश भरे स्वर में बोली.
‘‘उस का कहना है कि वह मैनेजमैंट को राजी कर लेगी. क्या मैं नहीं जानता कि गर्ल्स कालेज का मैनेजमैंट मेरे कारण अपने नियमों को कभी नहीं बदलेगा. आंटी, रीना अपनी तरक्की के लिए कुछ भी कर सकती है. वह मोनू के 5 वर्ष का होने तक ऐसे ही मुझे बहलाती रहेगी और फिर उसे होस्टल में डाल कर मेरी तरफ मुड़ कर भी नहीं देखेगी. इसीलिए मैं ने भी फैसला ले लिया है कि मैं अब और उस का साथ नहीं दूंगा. वह अपनी मम्मी के बलबूते पर ऐसा कदम उठा रही है तो उन्हें ही अब पूरी तरह जिम्मेदारी को उठाने दीजिए. आज तक मैं ने मोनू के कारण सबकुछ सहा, पर अब नहीं. बिना बाप के भी तो बच्चे पलते हैं न,’’ कहते हुए रोहित की आंखें आंसुओं से भर आईं और चेहरे पर विद्रोह का भाव आ गया.
‘‘अरे बेटा, ऐसा मत करो,’’ कहते हुए मेरी आंखें भी नम हो गईं परंतु मैं अपने आग्रह में खोखलापन महसूस कर रही थी क्योंकि रोहित की जगह कोई भी स्वाभिमानी पुरुष ऐसा ही कदम उठाता.
‘‘तुम्हारे मातापिता नहीं आ सकते? उन के आने से तुम्हें भी अच्छा लगेगा,’’ कहते हुए मुझे एक आशा की किरण दिखाई दी.
‘‘हैं, सब हैं पर मैं उन से क्या कहूं? एक ही शहर में हम अलगअलग क्यों रह रहे हैं. अगर ऐसा ही था तो विवाह क्यों किया? मां का स्थान पिता से ऊपर है क्योंकि बच्चे को मां बेहतर तरीके से पाल सकती है, यह बात रीना क्यों नहीं सोचती? रीना विवाह से पहले से नौकरी कर रही है और मुझे कोई एतराज नहीं था इसीलिए विवाह किया. किंतु मोनू की उपेक्षा नहीं सही जाती. मैं ने भी सहयोग देने का भरसक प्रयास किया किंतु रीना की मम्मी के सामने मेरा किया हुआ रीना को नजर ही नहीं आता और अब वही मां रीना को सही रास्ता दिखाने की जगह उलटा उस के गलत निर्णय में साथ दे रही है. मैं तो सब सह लेता परंतु मोनू की दुर्गति मैं नहीं देख सकता इसलिए मैं अपना ट्रांसफर करवा कर जा रहा हूं,’’ कहतेकहते रोहित का चेहरा अत्यंत कठोर हो गया, ‘‘मैं आप को यह बताने आया था कि एक हफ्ते में हम घर खाली कर देंगे.’’
रोहित खड़ा हो गया और मैं निढाल सी उसे जाते हुए देखती रही. मेरा मन वेदना से भर आया और मन किया कि रोहित को रोक लूं पर ऐसा कर न सकी.
घर खाली हो गया और मेरे पड़ोस में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया.
‘‘अब थोड़ा देखभाल कर घर किराए पर देंगे वरना पड़ोस के वातावरण का प्रभाव अपने ऊपर भी पड़ता ही है,’’ कहते हुए मेरे पति ने मुझे पहले सतर्क कर दिया और इसी कारण बिना किराएदार के ही 6-7 महीने निकल गए. मैं ने भी अब धीरेधीरे रीना और रोहित के बारे में सोचना बंद कर दिया.
हमारी शादी की सालगिरह पड़ी तो मैं ने और मेरे पति ने ‘फन मौल’ में लंच व पिक्चर का प्रोग्राम बनाया.
‘‘चलो, स्पैंसर का भी चक्कर लगा लें, क्या पता कुछ नई चीज देखने को मिले,’’ कहते हुए मैं अपने पति को स्पैंसर की ओर ले गई. अंदर मैं ने नए प्रोडक्ट्स पर नजर डालनी शुरू की कि अचानक देखा कि सेल्समैन एक बच्चे को बुरी तरह डांट रहा है और पास ही एक महिला उन दोनों के बीचबचाव की मुद्रा में खड़ी है. जिज्ञासु स्वभाव होने के कारण मैं उधर ही बढ़ चली. मुझे पता था कि मेरे पति भी मजबूरी में मेरे पीछेपीछे आ रहे होंगे. पास जा कर देखा तो एक सुखद आश्चर्य से मैं चिल्लाई, ‘‘अरे मोनू?’’
‘‘तब तक महिला ने भी पलट कर देखा. उस के चेहरे पर, मुझे देख कर अत्यंत राहत व खुशी का भाव आया, वे मोनू की नानी यानी रीना की मम्मी थीं.
‘‘देखिए, भाभीजी, मोनू से जरा कैचप की शीशी क्या फूट गई इन्होंने तमाशा मचा दिया, जबकि मैं कह रही हूं कि मैं पेमैंट कर दूंगी.’’
‘‘अरे पेमैंट तो आप करेंगी ही पर आप अपने बच्चे की करतूत देख कर उसे टोकने के बजाय ऐसे दुलार कर रही हैं मानो उस ने कोई तारीफ का काम किया हो. मैं ने रोका तो बदतमीजी कर रहा है,’’ सेल्समैन ने अत्यंत गुस्से से कहा.
अपमान से रीना की मम्मी की आंखों में आंसू आ गए पर अपनेआप को नियंत्रण कर उन्होंने सेल्समैन से माफी मांगते हुए मोनू को काउंटर की ओर घसीटना प्रारंभ कर दिया. अडि़यल मोनू उन की कलाई पर काटने लगा. यही होना था, मातापिता से अलग हुआ बच्चा अपना विद्रोह कहीं तो निकालेगा, मैं अपनेआप को रोक न सकी और बोल ही पड़ी, ‘‘रीना बिलकुल नहीं आ पाती क्या?’’
‘‘अरे भाभीजी, इतनी जिम्मेदारी की नौकरी कर रही है, बारबार कैसे आएगी, हमारा तो दामाद बिलकुल खोटा और गैरजिम्मेदार निकला,’’ कहतेकहते उन की आवाज में अत्यंत रोष का भाव आ गया.
‘‘आप ने उस को जिम्मेदारी उठाने का अवसर ही कहां दिया? जबजब रीना को जरूरत पड़ी आप ने अपने सहारे की ‘बैसाखी’ पकड़ा दी तो वह बेचारा सहारा कैसे बन पाता?’’ कहतेकहते मैं ने रोहित से हुआ पूरा वार्त्तालाप रीना की मम्मी को सुना दिया, ‘‘अरे, वह बेचारा तो सबकुछ करने को तैयार था पर आप ने उन दोनों को एकदूसरे को समझने कहां दिया? याद रखिएगा बहनजी, आप रीना को सहारा नहीं दे रहीं वरन बैसाखी पकड़ा कर उसे हमेशा के लिए अपाहिज बना रही हैं, जिस की वजह से मोनू का व्यक्तित्व कुंठित हो जाएगा.’’
रीना की मम्मी के चेहरे पर पश्चात्ताप के स्पष्ट भाव देख मेरे मन को यह तसल्ली मिली कि अब अवश्य ही ये अपनी बेटी के घर को जोड़ने का प्रयास करेंगी और मैं तो यही चाहूंगी कि उन का यह प्रयास अवश्य सफल हो ताकि कैरियर बनाने की अंधी दौड़ को छोड़ रीना, रोहित व मोनू के जीवन में आया खालीपन दूर करने का प्रयास करे.
‘‘अब चलो,’’ मेरे पति ने मुसकराते हुए, शांत स्वर में कहा, ‘‘आज तुम्हारी सलाह से यदि यह परिवार जुड़ जाता है तो मैं भी यही कहूंगा कि कभीकभी बिना मांगे ही सही, सही सलाह दे दिया करो.’’
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March 06, 2021 at 10:00AM
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