Sunday, 7 March 2021

सिंदूर विच्छेद : अधीरा पर शक करना कितना भारी पड़ा-भाग 3

लेखिका- यामिनी नयन गुप्ता

जीतेजी अधीरा अपने दोनों बेटों से कह कर गई थी कि मैं मरूं तो मेरा तथाकथित पति मेरा अंतिम संस्कार ना करे. करना तो दूर, मेरा चेहरा भी ना देखे, मुझे छू भी ना सके और बेटों ने इस का पूरा मान रखा था.

अतीत के वे पल चलचित्र की भांति मनोज की आंखों में तैर उठे…

कुछ वर्ष शांति से बीते. मनोज का बिजनैस खूब तरक्की कर रहा था. दोनों बेटे भी पढ़लिख कर जौब करने लगे. सजल के लिए तो रिश्ते भी आने लगे थे. लंबे, आकर्षक दोनों बेटे तो अधीरा की आंखों के तारे थे. एक बडा़ फ्लैट भी खरीद लिया था दिल्ली में. दोनों बेटे वहीं रहते थे साथसाथ.

अकसर मनोज और अधीरा भी 1-2 दिन बच्चों के साथ रह आते थे.

सबकुछ ठीक चल रहा था. बच्चों की पढ़ाई और नौकरी के कारण कुछ वर्षों से अधीरा अकेली पड़ गई थी.मनोज अपने बिजनैस में बिजी रहता था और उस के शक्की स्वभाव के कारण अधीरा कहीं आतीजाती नहीं थी तो घर बैठेबैठे ही साहित्य में उसे रुचि हो आई थी.

काफी समय मिला तो कविताकहानी और लेखन में व्यस्त हो गई. मनोज भी देख कर खुश था कि घर बैठे ही वह अपना मन बहलाने लगी है.

‘अरे सजल बेटा, प्रगति मैदान में बुक फेयर लगा है. एक बार मुझे ले चलो.’

‘हां…हां…क्यों नहीं,’ दोनों बेटे अपनी मां की कोई बात नहीं टालते थे. कहने के साथ ही उस की सारी फरमाइशें पूरी करते थे. चाहे औनलाइन किताबें मंगानी हों या अधीरा के 45वें जन्मदिन पर उस का पसंदीदा 54 इंची प्लाज्मा टीवी घर में ला कर उसे आश्चर्यचकित कर देने का प्लान हो.

मनोज तो इतने दिन वहां रह नहीं सकता था. वह अपने शहर जबलपुर लौट गया.

6 फरवरी का दिन था जब अधीरा  सजल के साथ प्रगति मैदान गई थी.घर के बाहर की दुनिया और वह भी किताबों से लबालब देख कर उस की खुशी का पारावार ना था. वहां पहुंच कर सजल को भी कुछ दोस्त मिल गए. वह अधीरा को उस की पसंदीदा बुकस्टौल पर छोड़ कर कुछ देर के लिए चला गया.

‘अरे, अधीरा तुम…’ सामने से अधीरा की कुछ फेसबुक फ्रैंड्स चली आ रही थीं. उन से पहली बार मिलने का रोमांच ही अलग था.

‘हाय, तुम तो बहुत ही प्यारी हो अधीरा,’ प्रतिमा बोल पङी.

वह खुद भी कविताएं लिखती थी. कुछ काव्यसंग्रह भी आ गए थे उस के. पूनम, रेखा, तेजस सब मिल बैठीं तो सैल्फी का दौर चल पड़ा.

हंसतेखिलखिलाते चेहरों के साथ कितने ही फोटो खींच गए खूबसूरत यादें बनाने के लिए.

पास ही 22-23 साल के 2 नवयुवक सौरभ और प्रफुल्ल भी खड़े थे,’मैम,   आप बहुत अच्छी कविताएं लिखती हैं. बिलकुल दिल को छू जाती हैं.’

‘थैंक्स, तुम दोनों तो बिलकुल मेरे बेटे जैसे हो,” अधीरा कह उठी.

सब ने संगसाथ में खूब सैल्फी लीं. फोटो लेने के क्रम में दोनों लड़के और पूनम, प्रतिभा अधीरा के कुछ और करीब हो गए. प्रफुल्ल ने अधीरा के कांधे पर हाथ रख दिया. हंसीखुशी के पल कैमरे में कैद हो गए. अपने मनपसंद लेखकों की हस्ताक्षरित प्रति ले कर अधीरा बहुत खुश थी और दोनों बेटे उसे खुश देख कर खुश थे.

रात में खूब चाव से अधीरा ने बच्चों के पसंद का खाना बनाया. अगले दिन सुबह जबलपुर जाने के लिए अधीरा का ट्रेन में रिजर्वेशन करा दिया था बेटों ने. अकेले सफर करने के अवसर कम ही आए थे अधीरा के जीवन में.

पर वह रोमांचित थी. बेटों ने भी उस का हौंसला बढ़ाया,’मम्मी, आप अब अकेले आनाजाना शुरू करो. देखो सब महिलाएं अकेली कहांकहां हो आती हैं और दिल्ली के लिए तो बहुत सी सीधी ट्रेनें हैं.’

अगले दिन जबलपुर अपने घर पहुंच कर रात में अधीरा शौक से मनोज को अपने फोटो दिखाने लगी,’यह देखो मेरा फोटो, कवि सुरेंद्र के साथ… यह तसलीमा नसरीन के साथ… और यह मेरी फेसबुक फ्रैंड है और…’

‘यह तुम्हारे कांधे पर किस ने हाथ रखा है?’ मनोज ने पूछा.

अधीरा ने झट से फोटो आगे बढ़ा दी और उसे दूसरी फोटो दिखाने लगी.मनोज ने उस के हाथों से मोबाइल छीन लिया और फोटो स्लाइड कर के पूछने लगा,’यह लड़का कौन है और इस का हाथ कैसे आ गया तुम्हारे बदन पर?’

अविश्वास का फन ना केवल सिर उठा चुका था बल्कि जहरीली फुफकार भी मार रहा था. जिस बात से अधीरा बचना चाह रही थी वही हुआ…

‘तुम्हें वहां बुकफेयर देखने भेजा था मैं ने और तुम जा कर अपने यार के साथ ऐयाशी करने लगीं.’

‘प…प… पर वह तो मेरे बेटे की उम्र का है और हम तो पहली बार ही मिले थे.’

पर मनोज कुछ सुनने को तैयार नहीं था,’40 से ऊपर की उम्र हो गई तुम्हारी और अक्ल नाम की चीज नहीं है. बूढ़ी हो गई हो पर शौक जवानों के हैं.’

‘ओह…’

उस के कानों में जैसे पिघलता शीशा उङेल दिया गया हो. अधीरा रोरो कर रह गई. रातरात भर जागती रही थी. दिन में मुंह छिपाए पड़ी रहती थी. किस बात की सजा भुगत रही थी वह? एक औरत होने की? स्त्रीदेह ले कर पैदा होने की? स्त्रीदेह उस की पर मालिक है उस का पति मनोज? वह जब चाहे कठपुतली की तरह उसे नचाए…

अधीरा ने अपना फोन ही औफ कर के रख दिया. कुछ दिन बेटों से बात नहीं हुई तो तीसरे ही दिन बेटे घर आ पहुंचे. अधीरा की सूजी आंखें और उतरे चेहरे ने ही सब कहानी बयां कर दी.

मनोज अब भी अपने दंभ में बोले जा रहा था,’चरित्रहीन है, कुलटा है तुम्हारी मां.’

‘चुप रहिए,’ सजल चीख उठा.

‘आप के शक ने आप को अंधा कर दिया है पर मेरी मां को आप एक भी अपशब्द नहीं कहेंगे. मुझे मम्मी की सहेली मधु आंटी ने सब बता दिया है.

‘आप के शक का कोई इलाज नहीं है. इतनी समर्पित और प्रेम करने वाली पत्नी को आप ने जिंदा लाश बना कर रख दिया है,’ जवान बेटे का क्रोध देख कर मनोज ठंडा पड़ गया.

उधर अधीरा अपने दोनों जवान बेटों के सामने पति के मुंह से ऐसे लांक्षण सुन कर मानों शर्म से जमीन में गड़ी जा रही थी,’मैं क्यों न समा जाऊं धरती की गोद में? कब तक मैं देती रहूंगी अग्निपरीक्षा? अब कोई अग्निपरीक्षा नहीं…’

वह तङप कर बोल पङी एक दिन,’सजल, सारांश… मेरे बच्चो, अब मैं सफाई देतेदेते थक गई हूं. मैं मर जाऊं तो पति नाम के इस इंसान को मेरी मृतदेह को छूने मत देना और चेहरा भी मत देखने देना.

‘हो सके तो इतना कर के मेरे दूध का कर्ज चुका देना…’

उस दिन से अधीरा ने मनोज को पति के सिंहासन से उतार कर जमीन पर ला पटका.

समय बीतता गया. करवाचौथ आदि सब त्याग दिया अधीरा ने.

2 वर्षों के अंतराल पर दोनों बेटों का धूमधाम से विवाह कर दिया. सभी पारिवारिक और सामाजिक दायित्व बखूबी निभाए अधीरा ने पर मन में चरित्रहीनता की जो फांस चुभी थी  वह अब शहतीर बन गई थी.

एक रात वह सोई फिर कभी ना जागने के लिए.

कितनी बातें थीं जिन्हें साझा करने की जरूरत थी, कितने खुले घावों को सिला जाना था, कितनी खरोचों पर मोहब्बत के फाहे रखे जाने थे…पर घड़ी की टिकटिक ने नए घाव दिए..कितनाकितना हंसना था…कितनाकितना रोना… पर बेरहम वक्त ने उन्हें मुहलत न दी…पलक झपकी और पल गायब…

वहां उपस्थित लोगों के रूदन से मनोज अपने वर्तमान में लौट आया.

“हाय, क्या मैं अंतिम समय में अपनी जीवनसाथी का चेहरा भी नहीं देख सकूंगा…”

अधीरा का चिरनिद्रा में लीन चेहरा शांत था जैसे तमाम जिल्लत और रुसवाई से मुक्ति पा गई हो.

अधीरा की बहनें, सखियां और दोनों जिठानी तेज स्वर में रो रही थीं.  सजल अपने हाथों में मिट्टी का घड़ा ले कर जा रहा था. सारांश और परिवार के कुछ अन्य पुरुष अर्थी को कांधा दे कर ले जा रहे थे.

जिस अर्धांगिनी को वह हमेशा परपुरुष के नाम के साथ जोड़ कर उस का चरित्रहरण करता रहा उसे ही आज गैरपुरूष कांधा दे रहे थे पर मनोज के लिए ही वर्जित था अधीरा को छूना तक भी.

अविश्वास, शक का फुफकारता नाग मनोज के मन में आज निर्जीव सा पड़ा है और जीतेजी इसी लाश को ढोते रहना है उसे अब ताउम्र.

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लेखिका- यामिनी नयन गुप्ता

जीतेजी अधीरा अपने दोनों बेटों से कह कर गई थी कि मैं मरूं तो मेरा तथाकथित पति मेरा अंतिम संस्कार ना करे. करना तो दूर, मेरा चेहरा भी ना देखे, मुझे छू भी ना सके और बेटों ने इस का पूरा मान रखा था.

अतीत के वे पल चलचित्र की भांति मनोज की आंखों में तैर उठे…

कुछ वर्ष शांति से बीते. मनोज का बिजनैस खूब तरक्की कर रहा था. दोनों बेटे भी पढ़लिख कर जौब करने लगे. सजल के लिए तो रिश्ते भी आने लगे थे. लंबे, आकर्षक दोनों बेटे तो अधीरा की आंखों के तारे थे. एक बडा़ फ्लैट भी खरीद लिया था दिल्ली में. दोनों बेटे वहीं रहते थे साथसाथ.

अकसर मनोज और अधीरा भी 1-2 दिन बच्चों के साथ रह आते थे.

सबकुछ ठीक चल रहा था. बच्चों की पढ़ाई और नौकरी के कारण कुछ वर्षों से अधीरा अकेली पड़ गई थी.मनोज अपने बिजनैस में बिजी रहता था और उस के शक्की स्वभाव के कारण अधीरा कहीं आतीजाती नहीं थी तो घर बैठेबैठे ही साहित्य में उसे रुचि हो आई थी.

काफी समय मिला तो कविताकहानी और लेखन में व्यस्त हो गई. मनोज भी देख कर खुश था कि घर बैठे ही वह अपना मन बहलाने लगी है.

‘अरे सजल बेटा, प्रगति मैदान में बुक फेयर लगा है. एक बार मुझे ले चलो.’

‘हां…हां…क्यों नहीं,’ दोनों बेटे अपनी मां की कोई बात नहीं टालते थे. कहने के साथ ही उस की सारी फरमाइशें पूरी करते थे. चाहे औनलाइन किताबें मंगानी हों या अधीरा के 45वें जन्मदिन पर उस का पसंदीदा 54 इंची प्लाज्मा टीवी घर में ला कर उसे आश्चर्यचकित कर देने का प्लान हो.

मनोज तो इतने दिन वहां रह नहीं सकता था. वह अपने शहर जबलपुर लौट गया.

6 फरवरी का दिन था जब अधीरा  सजल के साथ प्रगति मैदान गई थी.घर के बाहर की दुनिया और वह भी किताबों से लबालब देख कर उस की खुशी का पारावार ना था. वहां पहुंच कर सजल को भी कुछ दोस्त मिल गए. वह अधीरा को उस की पसंदीदा बुकस्टौल पर छोड़ कर कुछ देर के लिए चला गया.

‘अरे, अधीरा तुम…’ सामने से अधीरा की कुछ फेसबुक फ्रैंड्स चली आ रही थीं. उन से पहली बार मिलने का रोमांच ही अलग था.

‘हाय, तुम तो बहुत ही प्यारी हो अधीरा,’ प्रतिमा बोल पङी.

वह खुद भी कविताएं लिखती थी. कुछ काव्यसंग्रह भी आ गए थे उस के. पूनम, रेखा, तेजस सब मिल बैठीं तो सैल्फी का दौर चल पड़ा.

हंसतेखिलखिलाते चेहरों के साथ कितने ही फोटो खींच गए खूबसूरत यादें बनाने के लिए.

पास ही 22-23 साल के 2 नवयुवक सौरभ और प्रफुल्ल भी खड़े थे,’मैम,   आप बहुत अच्छी कविताएं लिखती हैं. बिलकुल दिल को छू जाती हैं.’

‘थैंक्स, तुम दोनों तो बिलकुल मेरे बेटे जैसे हो,” अधीरा कह उठी.

सब ने संगसाथ में खूब सैल्फी लीं. फोटो लेने के क्रम में दोनों लड़के और पूनम, प्रतिभा अधीरा के कुछ और करीब हो गए. प्रफुल्ल ने अधीरा के कांधे पर हाथ रख दिया. हंसीखुशी के पल कैमरे में कैद हो गए. अपने मनपसंद लेखकों की हस्ताक्षरित प्रति ले कर अधीरा बहुत खुश थी और दोनों बेटे उसे खुश देख कर खुश थे.

रात में खूब चाव से अधीरा ने बच्चों के पसंद का खाना बनाया. अगले दिन सुबह जबलपुर जाने के लिए अधीरा का ट्रेन में रिजर्वेशन करा दिया था बेटों ने. अकेले सफर करने के अवसर कम ही आए थे अधीरा के जीवन में.

पर वह रोमांचित थी. बेटों ने भी उस का हौंसला बढ़ाया,’मम्मी, आप अब अकेले आनाजाना शुरू करो. देखो सब महिलाएं अकेली कहांकहां हो आती हैं और दिल्ली के लिए तो बहुत सी सीधी ट्रेनें हैं.’

अगले दिन जबलपुर अपने घर पहुंच कर रात में अधीरा शौक से मनोज को अपने फोटो दिखाने लगी,’यह देखो मेरा फोटो, कवि सुरेंद्र के साथ… यह तसलीमा नसरीन के साथ… और यह मेरी फेसबुक फ्रैंड है और…’

‘यह तुम्हारे कांधे पर किस ने हाथ रखा है?’ मनोज ने पूछा.

अधीरा ने झट से फोटो आगे बढ़ा दी और उसे दूसरी फोटो दिखाने लगी.मनोज ने उस के हाथों से मोबाइल छीन लिया और फोटो स्लाइड कर के पूछने लगा,’यह लड़का कौन है और इस का हाथ कैसे आ गया तुम्हारे बदन पर?’

अविश्वास का फन ना केवल सिर उठा चुका था बल्कि जहरीली फुफकार भी मार रहा था. जिस बात से अधीरा बचना चाह रही थी वही हुआ…

‘तुम्हें वहां बुकफेयर देखने भेजा था मैं ने और तुम जा कर अपने यार के साथ ऐयाशी करने लगीं.’

‘प…प… पर वह तो मेरे बेटे की उम्र का है और हम तो पहली बार ही मिले थे.’

पर मनोज कुछ सुनने को तैयार नहीं था,’40 से ऊपर की उम्र हो गई तुम्हारी और अक्ल नाम की चीज नहीं है. बूढ़ी हो गई हो पर शौक जवानों के हैं.’

‘ओह…’

उस के कानों में जैसे पिघलता शीशा उङेल दिया गया हो. अधीरा रोरो कर रह गई. रातरात भर जागती रही थी. दिन में मुंह छिपाए पड़ी रहती थी. किस बात की सजा भुगत रही थी वह? एक औरत होने की? स्त्रीदेह ले कर पैदा होने की? स्त्रीदेह उस की पर मालिक है उस का पति मनोज? वह जब चाहे कठपुतली की तरह उसे नचाए…

अधीरा ने अपना फोन ही औफ कर के रख दिया. कुछ दिन बेटों से बात नहीं हुई तो तीसरे ही दिन बेटे घर आ पहुंचे. अधीरा की सूजी आंखें और उतरे चेहरे ने ही सब कहानी बयां कर दी.

मनोज अब भी अपने दंभ में बोले जा रहा था,’चरित्रहीन है, कुलटा है तुम्हारी मां.’

‘चुप रहिए,’ सजल चीख उठा.

‘आप के शक ने आप को अंधा कर दिया है पर मेरी मां को आप एक भी अपशब्द नहीं कहेंगे. मुझे मम्मी की सहेली मधु आंटी ने सब बता दिया है.

‘आप के शक का कोई इलाज नहीं है. इतनी समर्पित और प्रेम करने वाली पत्नी को आप ने जिंदा लाश बना कर रख दिया है,’ जवान बेटे का क्रोध देख कर मनोज ठंडा पड़ गया.

उधर अधीरा अपने दोनों जवान बेटों के सामने पति के मुंह से ऐसे लांक्षण सुन कर मानों शर्म से जमीन में गड़ी जा रही थी,’मैं क्यों न समा जाऊं धरती की गोद में? कब तक मैं देती रहूंगी अग्निपरीक्षा? अब कोई अग्निपरीक्षा नहीं…’

वह तङप कर बोल पङी एक दिन,’सजल, सारांश… मेरे बच्चो, अब मैं सफाई देतेदेते थक गई हूं. मैं मर जाऊं तो पति नाम के इस इंसान को मेरी मृतदेह को छूने मत देना और चेहरा भी मत देखने देना.

‘हो सके तो इतना कर के मेरे दूध का कर्ज चुका देना…’

उस दिन से अधीरा ने मनोज को पति के सिंहासन से उतार कर जमीन पर ला पटका.

समय बीतता गया. करवाचौथ आदि सब त्याग दिया अधीरा ने.

2 वर्षों के अंतराल पर दोनों बेटों का धूमधाम से विवाह कर दिया. सभी पारिवारिक और सामाजिक दायित्व बखूबी निभाए अधीरा ने पर मन में चरित्रहीनता की जो फांस चुभी थी  वह अब शहतीर बन गई थी.

एक रात वह सोई फिर कभी ना जागने के लिए.

कितनी बातें थीं जिन्हें साझा करने की जरूरत थी, कितने खुले घावों को सिला जाना था, कितनी खरोचों पर मोहब्बत के फाहे रखे जाने थे…पर घड़ी की टिकटिक ने नए घाव दिए..कितनाकितना हंसना था…कितनाकितना रोना… पर बेरहम वक्त ने उन्हें मुहलत न दी…पलक झपकी और पल गायब…

वहां उपस्थित लोगों के रूदन से मनोज अपने वर्तमान में लौट आया.

“हाय, क्या मैं अंतिम समय में अपनी जीवनसाथी का चेहरा भी नहीं देख सकूंगा…”

अधीरा का चिरनिद्रा में लीन चेहरा शांत था जैसे तमाम जिल्लत और रुसवाई से मुक्ति पा गई हो.

अधीरा की बहनें, सखियां और दोनों जिठानी तेज स्वर में रो रही थीं.  सजल अपने हाथों में मिट्टी का घड़ा ले कर जा रहा था. सारांश और परिवार के कुछ अन्य पुरुष अर्थी को कांधा दे कर ले जा रहे थे.

जिस अर्धांगिनी को वह हमेशा परपुरुष के नाम के साथ जोड़ कर उस का चरित्रहरण करता रहा उसे ही आज गैरपुरूष कांधा दे रहे थे पर मनोज के लिए ही वर्जित था अधीरा को छूना तक भी.

अविश्वास, शक का फुफकारता नाग मनोज के मन में आज निर्जीव सा पड़ा है और जीतेजी इसी लाश को ढोते रहना है उसे अब ताउम्र.

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March 08, 2021 at 10:00AM

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