Thursday, 4 March 2021

छितराया प्रतिबिंब : वह चाहकर भी अपनी बेटी का फोन क्यों नहीं उठा पा रहा था -भाग 3

मेरी जिंदगी में अकेलेपन का सफर काफी लंबा हो गया था. होस्टल की पढ़ाई के बीच दोस्तों के साथ मनमानी मौज अकेलेपन को भुलाने की या उस दर्द को फटेचिथड़ों में लपेट कर दबा देने की नाकाम कोशिश भले ही रही लेकिन मेरा नया मैं, हर वक्त मेरे पुरातन मैं से नजरें चुराए ही रहना पसंद करता था.

जीवनयुद्ध में अब कामयाब होने की बारी थी क्योंकि मैं अकेले जीतेजीते इतना परिपक्व हो गया था कि समझ सकता था कि इस के बिना मैं डूब जाऊंगा. मैं अपनेआप को खुश रखने वाली स्थायी चीजों की तलाश में था. मैं ने अपनी पढ़ाई पूरी की और पिताजी की कृपा से मुक्त होने को एक अदद नौकरी की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाएं देने लगा. ऐसा नहीं था कि इस उम्र में लड़कियों ने मेरी जिंदगी में आने की कोशिश न की हो. मैं रूप की दृष्टि से अपनी मां पर गया था, इसलिए भी दूसरों की नजरों में जल्दी पड़ जाना या विपरीत सैक्स का मेरे प्रति सहज मोह स्वाभाविक ही था. और इस मामले में मुझ में गजब का आत्मविश्वास था जिस के चलते मैं स्वयं कभी सम्मोहित नहीं होता था. इन सब के बावजूद शादी को ले कर जो धारणाएं मेरे दिल में थीं उस लिहाज से वे मात्र शरीर सुख के अलावा कुछ नहीं थीं. मगर क्या कहूं इन अच्छे घरों की मासूम लड़कियों को. आएदिन लड़के दिखे नहीं कि थाल में दिल सजा कर आ गईं समर्पण करने.

इस मामले में लड़के भी कम दिलदार नहीं थे. लेकिन मैं इस मामले में पक्का था. जवानी की दहलीज पर दहकती कामनाओं को दिल में पल रहे रोष और विद्रोह का रूप दे कर बस तत्पर था स्थायी सुख की तलाश में.
समय की धार में बह कर एक दिन मैं सरकारी नौकरी के ऊंचे ओहदे की बदौलत क्वार्टर, औफिस सबकुछ पा गया. एक खोखली सी, जैसा कि मेरा पुरातन मैं सोचता, जिंदगी बाहरी दुनिया के लिए बहारों सी खिल गई थी.
कुछ साल और गुजरे. मांपिताजी कभीकभी मेरे बंगले में आ कर रहते. लेकिन बदलते हुए भी बदलना जैसे मुझे आता ही नहीं था.

अब भी मां हर वक्त पिताजी को लगातार कुछ न कुछ सुनाती रहती थीं. शायद अब यह फोबिया की शक्ल ले चुका था. पिताजी ने सोचसमझ कर अपने होंठ सिल रखे थे. ‘हर बात अनसुनी कर दो ताकि सामने वाले को यह एहसास हो कि वह दीवारों से बातें कर रहा है’ की मानसिकता के बूते पर रिश्ते घिसट रहे थे. इन सब के बीच मैं दिनोंदिन ऊबा सा, चिढ़ा सा महसूस करता था, जिस से अब भी उन दोनों को कोई लेनादेना नहीं था.

आखिर मैं ने इस अकेलेपन से उबरने का और थोड़ा मनोरंजन का तरीका ढूंढ़ निकाला, जैसे कि यह कोई जड़ीबूटी या जादू हो. मैं ने दूर प्रदेश की एक रूमानी सूरत वाली गेहुंए रंग की धीर, स्थिर, उच्च शिक्षिता से विवाह कर लिया. तरहतरह की कलाओं में पारंगत, सुंदर, रूमानी और विदुषी बिलकुल मेरी मां की तरह.

नौकरी के शुरुआती साल थे. सुंदर और समझदार पत्नी पा कर मैं घर की ओर से बेफिक्र हो गया था. मैं उसे चाहता था और मेरे चाहने भर से ही वह मुझ पर बिछबिछ जाती थी और यह एहसास जब मेरे लिए काफी था तो उसे पाने की जद्दोजहद कहीं बाकी ही नहीं रही.

इधर, नौकरी में मैं ऊंचे ओहदे पर था. अधीनस्थ मानते थे, सलाह लेते थे, मैं अपने अधिकार का भरपूर प्रयोग कर रहा था. अब तक का जीवन जो अकेलेपन की मायूसी में डूबा था, मेरे काम और तकनीकी बुद्धि की प्रखरता से प्रतिष्ठा की रोशनी से भर गया था. मेरा शारीरिक आकर्षण 30 की उम्र में उफान पर था, आत्मविश्वास चरम पर था, इसलिए मेरा सारा ध्यान बाहरी दुनिया पर केंद्रित था.

मैं एक रौबभरी दमदार जिंदगी का मालिक था, जिस में धीरेधीरे अतीत की हताशाओं पर जीत हासिल करने का दंभ भर रहा था. अतीत का एकांत मेरे पुरातन ‘मैं’ के साथ चमकदमक वाली दुनिया के किसी एक अंधेरे कोने में दुबक कर शिद्दत के साथ मेरा इंतजार कर रहा होता, लेकिन मैं उसे अनदेखा कर के अपनी दुनिया में व्यस्त होता जा रहा था. इसी बीच हमारी जिंदगी में बेटी कुक्कू आ गई. उस के आने के बाद मेरे अंतस्थल में ऐसी और कई परतें उभरीं जिन्हें अब तक मैं नहीं जानता था.

मेरे पिता ने हम बच्चों से दूरी बना कर हमारी नजरों में अपनेआप को जितना बुरा बनाया था और मेरी मां के पिताजी पर चीखनेचिल्लाने से उन की जो छवि हमारी नजरों में बनी थी, मैं अपनी कुक्कू के लिए कतई वह नहीं बनना चाहता था. मैं कुक्कू को पूरी तरह हासिल करने और उस की मां की तरफ झुकाव को बरदाश्त न कर पाने की ज्वाला से कब भरता जा रहा था, न तो मुझे ही पता चला और न ही कुक्कू को.

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मेरी जिंदगी में अकेलेपन का सफर काफी लंबा हो गया था. होस्टल की पढ़ाई के बीच दोस्तों के साथ मनमानी मौज अकेलेपन को भुलाने की या उस दर्द को फटेचिथड़ों में लपेट कर दबा देने की नाकाम कोशिश भले ही रही लेकिन मेरा नया मैं, हर वक्त मेरे पुरातन मैं से नजरें चुराए ही रहना पसंद करता था.

जीवनयुद्ध में अब कामयाब होने की बारी थी क्योंकि मैं अकेले जीतेजीते इतना परिपक्व हो गया था कि समझ सकता था कि इस के बिना मैं डूब जाऊंगा. मैं अपनेआप को खुश रखने वाली स्थायी चीजों की तलाश में था. मैं ने अपनी पढ़ाई पूरी की और पिताजी की कृपा से मुक्त होने को एक अदद नौकरी की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाएं देने लगा. ऐसा नहीं था कि इस उम्र में लड़कियों ने मेरी जिंदगी में आने की कोशिश न की हो. मैं रूप की दृष्टि से अपनी मां पर गया था, इसलिए भी दूसरों की नजरों में जल्दी पड़ जाना या विपरीत सैक्स का मेरे प्रति सहज मोह स्वाभाविक ही था. और इस मामले में मुझ में गजब का आत्मविश्वास था जिस के चलते मैं स्वयं कभी सम्मोहित नहीं होता था. इन सब के बावजूद शादी को ले कर जो धारणाएं मेरे दिल में थीं उस लिहाज से वे मात्र शरीर सुख के अलावा कुछ नहीं थीं. मगर क्या कहूं इन अच्छे घरों की मासूम लड़कियों को. आएदिन लड़के दिखे नहीं कि थाल में दिल सजा कर आ गईं समर्पण करने.

इस मामले में लड़के भी कम दिलदार नहीं थे. लेकिन मैं इस मामले में पक्का था. जवानी की दहलीज पर दहकती कामनाओं को दिल में पल रहे रोष और विद्रोह का रूप दे कर बस तत्पर था स्थायी सुख की तलाश में.
समय की धार में बह कर एक दिन मैं सरकारी नौकरी के ऊंचे ओहदे की बदौलत क्वार्टर, औफिस सबकुछ पा गया. एक खोखली सी, जैसा कि मेरा पुरातन मैं सोचता, जिंदगी बाहरी दुनिया के लिए बहारों सी खिल गई थी.
कुछ साल और गुजरे. मांपिताजी कभीकभी मेरे बंगले में आ कर रहते. लेकिन बदलते हुए भी बदलना जैसे मुझे आता ही नहीं था.

अब भी मां हर वक्त पिताजी को लगातार कुछ न कुछ सुनाती रहती थीं. शायद अब यह फोबिया की शक्ल ले चुका था. पिताजी ने सोचसमझ कर अपने होंठ सिल रखे थे. ‘हर बात अनसुनी कर दो ताकि सामने वाले को यह एहसास हो कि वह दीवारों से बातें कर रहा है’ की मानसिकता के बूते पर रिश्ते घिसट रहे थे. इन सब के बीच मैं दिनोंदिन ऊबा सा, चिढ़ा सा महसूस करता था, जिस से अब भी उन दोनों को कोई लेनादेना नहीं था.

आखिर मैं ने इस अकेलेपन से उबरने का और थोड़ा मनोरंजन का तरीका ढूंढ़ निकाला, जैसे कि यह कोई जड़ीबूटी या जादू हो. मैं ने दूर प्रदेश की एक रूमानी सूरत वाली गेहुंए रंग की धीर, स्थिर, उच्च शिक्षिता से विवाह कर लिया. तरहतरह की कलाओं में पारंगत, सुंदर, रूमानी और विदुषी बिलकुल मेरी मां की तरह.

नौकरी के शुरुआती साल थे. सुंदर और समझदार पत्नी पा कर मैं घर की ओर से बेफिक्र हो गया था. मैं उसे चाहता था और मेरे चाहने भर से ही वह मुझ पर बिछबिछ जाती थी और यह एहसास जब मेरे लिए काफी था तो उसे पाने की जद्दोजहद कहीं बाकी ही नहीं रही.

इधर, नौकरी में मैं ऊंचे ओहदे पर था. अधीनस्थ मानते थे, सलाह लेते थे, मैं अपने अधिकार का भरपूर प्रयोग कर रहा था. अब तक का जीवन जो अकेलेपन की मायूसी में डूबा था, मेरे काम और तकनीकी बुद्धि की प्रखरता से प्रतिष्ठा की रोशनी से भर गया था. मेरा शारीरिक आकर्षण 30 की उम्र में उफान पर था, आत्मविश्वास चरम पर था, इसलिए मेरा सारा ध्यान बाहरी दुनिया पर केंद्रित था.

मैं एक रौबभरी दमदार जिंदगी का मालिक था, जिस में धीरेधीरे अतीत की हताशाओं पर जीत हासिल करने का दंभ भर रहा था. अतीत का एकांत मेरे पुरातन ‘मैं’ के साथ चमकदमक वाली दुनिया के किसी एक अंधेरे कोने में दुबक कर शिद्दत के साथ मेरा इंतजार कर रहा होता, लेकिन मैं उसे अनदेखा कर के अपनी दुनिया में व्यस्त होता जा रहा था. इसी बीच हमारी जिंदगी में बेटी कुक्कू आ गई. उस के आने के बाद मेरे अंतस्थल में ऐसी और कई परतें उभरीं जिन्हें अब तक मैं नहीं जानता था.

मेरे पिता ने हम बच्चों से दूरी बना कर हमारी नजरों में अपनेआप को जितना बुरा बनाया था और मेरी मां के पिताजी पर चीखनेचिल्लाने से उन की जो छवि हमारी नजरों में बनी थी, मैं अपनी कुक्कू के लिए कतई वह नहीं बनना चाहता था. मैं कुक्कू को पूरी तरह हासिल करने और उस की मां की तरफ झुकाव को बरदाश्त न कर पाने की ज्वाला से कब भरता जा रहा था, न तो मुझे ही पता चला और न ही कुक्कू को.

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March 05, 2021 at 10:00AM

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