बांबेल अपने प्रभावी स्वर में कहता रहा, ‘‘चीजों को उन के सही परिप्रेक्ष्य में देखिए, मिस मोनिका. आप नारियां अपनेआप को सदैव भोग्या के रूप में क्यों मानती हैं? पुरुष के समान ही आप भी मानव सृष्टि की एक प्रबल हस्ती हैं. उसी आधार पर अपने को भोक्ता के रूप में देखिए. दुनिया के इस नीलाम घर में आप स्वयं को हमेशा नीलाम पर चढ़ी हुई ही क्यों महसूस करती हैं? अपने को नीलाम की बोली बोलने वाले या चीजों को खरीदने वाले के रूप में क्यों नहीं पेश कर पाती हैं आप? इस संसार में जो खरीद सकता है, वही बलिष्ठ है, वही मुक्त है.’’ मोनिका की आंखें मुंदी हुई थीं. वह बांबेल की बांहों में बंधी हुई किसी कल्पना लोक में पहुंच गई थी तथा उस के गाढ़े चुंबन का वैसा ही प्रत्युत्तर दे रही थी. पूरे माहौल में एक रोमानी भीनी सुगंधि बसी थी. पर कुछ क्षणों में बांबेल ने बिलकुल व्यापारिक ढंग से अपने को अलग कर लिया और मोनिका के गालों को थपथपाता हुआ बोला, ‘‘हम लोग फिर कभी और खुलेरूप में मिलेंगे, बाय.’’
मोनिका की बुद्धि को जैसे नई दृष्टि प्रदान कर दी जरमन व्यवसायी ने. मोनिका ने अपनी मुक्ति के मार्ग में जैसे नया आलोक पा लिया हो. उस के पास शिक्षा थी, दक्षता थी, वाक्पटुता थी और थी सुंदरता. उस की महत्त्वाकांक्षा अब पंख लगा कर उड़ चली थी. धीरेधीरे उस कंपनी में मोनिका एक के बाद दूसरे उच्चपद पर प्रतिष्ठित होती गई. धाक जमाती गई. यहां तक कि वह भी मिस्टर बांबेल की भांति अनवरत अंतर्राष्ट्रीय दौरों पर रहने लगी. उस का एक पैर मुंबई में होता तो दूसरा कोलकाता में. यदि आज वह टोकियो जा रही है तो कल बेरूत, परसों न्यूयार्क और नरसों हैंबर्ग. अब वह भी कंपनी की एक डाइरैक्टर थी. फकीरचंद बागला मर चुका था. अब उस का लड़का नरेशचंद कंपनी का प्रबंध संचालक था. अवकाश के एक दिन मोनिका ने अपने विगत जीवन पर एक विहंगम दृष्टि डाली, एक आत्मचिंतन किया. इतने बड़े विलासपूर्ण फ्लैट में मोनिका अकेली ही रहती थी. कुछ नौकरनौकरानियां, जो हमेशा उस की आज्ञा का पालन करने को खड़े रहते, और कोई नहीं. अपनों के नाम पर उस के मित्र और सहकर्मी थे. उन के भतीजे, लड़के उसे आंटी कह लेते. यही एक आत्मीयता का संबोधन उसे सुनने को मिलता.
उस का उद्देश्य था मुक्ति. लेकिन कौन सी मुक्ति और किस से? उस ने पैर बाहर निकाले थे, पुरुष से मुक्ति का विधेय ले कर. लेकिन उस मुक्ति का स्वरूप क्या ऐसा ही होता है? उस ने तो नकल की है. उस ने वही किया है जो एक पुरुष करता. यानी उस का सारा प्रयत्न केवल पुरुष बनने तक सीमित रह गया. यहां तक कि उस ने अपने स्त्रीत्व का वह अंश भी दांव पर लगा दिया, जो स्त्री का एकमात्र मूलधन है. यह कैसी मुक्ति हुई स्त्री के लिए कि जिस की परिणति है केवल पुरुष तुल्य बन जाना. क्या यही इस मुक्ति की चरम सीमा है? यही सीमांत है?स्त्री ने किस मंतव्य को ले कर पुरुष से मुक्ति का नारा लगाया है. क्या पुरुष की जगह लेने के लिए? क्या पुरुष को अपदस्थ करने के लिए? क्या पुरुष को इस संसार से ढकेल कर किसी अतल गहराइयों में गिरा देने के लिए, ताकि वह अकेली रह जाए. यदि वह अकेली रह सकती है तो पुरुष की प्रेयसी बनने, विवाह करने की इच्छा क्यों? संतान की कामना क्यों? मातृत्व का स्वप्न क्यों?
या फिर कि स्त्री की आकांक्षा है कि पुरुष उस का गुलाम बन कर रहे. पुरुष की हस्ती को अपने इशारों पर नाचने वाली पुतली के रूप में ला कर, स्त्री उस से घर के, बाहर के सारे कामकाज, सारी टहल कराए, अपनी परिचर्चा में खड़ा रखे, अपनी मरजी से उठाएबैठाए. यह क्या स्त्री की किसी खिलंदड़ी प्रकृति का तकाजा है? या कि फिर घोर प्रतिकार के रूप स्त्री ऐसा चाहती है? यदि हां, तो किस का प्रतिकार? पुरुष के अन्यायों, अत्याचारों का? तो स्त्री अभी भी पुरुष विषयक विचारों से ही बंधी है, तो मुक्ति क्या हुई? आज कितने समय के बाद मोनिका को अपने पति की याद आई, साथ ही अपनी छोटी सी बच्ची ऋचा की भी. ‘डाक्टर सुधीर बूढ़े हो गए होंगे. ऋचा पढ़लिख कर कोई काम कर रही होगी, या फिर उस की शादी हो गई होगी.’ मुक्ति के नशे में मोनिका ने उन के बारे में जरा सा सोचना भी पराधीनता की बात मानी थी. सो, उस ने सच ही कभी भूले से भी उन की याद नहीं की, और यदि कभी कोई अंश उस के मन में उठा तो बलपूर्वक मन को मोड़ लिया. बड़े ही आत्मअनुशासन से उस ने ‘पुरुष से मुक्ति’ के व्रत का निर्वाह किया था परंतु आज उसे वह व्रत निरुद्देश्य और निष्फल लगने लगा था.
डाक्टर सुधीर अपने दवाखाने के बरामदे में एक आरामकुरसी पर लेटे हुए थे. एक स्वच्छ सफेद कुरता, हलकी महीन धोती तथा आंखों पर जामुनी रंग के फ्रेम का चश्मा. कुरसी के पास ही उन की चप्पलें पड़ी हुई थीं, उन की निगाह चारों ओर घूम रही थी. चुस्त, लेकिन सादे लिबास में एक हंसमुख लड़की, रोगियों की परीक्षा करती और नुसखे लिख रही थी. डाक्टर सुधीर के लिए, गंभीर रोगियों की अवस्था पर, ऋचा को सलाह देने का काम मात्र रह गया था. एकाएक उस स्थान पर एक भीनी खुशबू व्याप्त हो गई. अंतिम मरीज का नुसखा लिख कर उसे थमाते हुए ऋचा की और साथ ही सुधीर की नजर एकसाथ उठी. एक हलके रंग की मामूली साड़ी, सादी सी चप्पलें पहने हुए मोनिका द्वार पर आ कर खड़ी थी. ऋचा के मुख से फुसफुसाते स्वर में निकला ‘मां’ और वह दौड़ कर पिता के पीछे जा खड़ी हुई, जैसे मोनिका उसे पकड़ ले जाएगी.
सुधीर ने अपने चश्मे के भीतर आंखें फैला कर देखा, ‘‘मोनिका.’’ बहुत धीमे अस्फुट स्वर में निकला उन के मुंह से और नेत्रों में आंसू उमड़ने लगे.
मोनिका की आंखों से भी अश्रुधारा बह रही थी, जिस से उस के सामने की साड़ी कुछ भीग गई. ऋचा अपने पिता के बालों में उंगलियां फिराती हुई होंठ बिसूरती थी, बहुत चेष्टा कर के रोकने पर भी उस की सिसकियां निकल पड़ती थीं. मोनिका दुख के अत्यधिक भार से जैसे थक कर बरामदे में बैंच पर बैठ गई और अपने अंदर के हाहाकार को मुख में साड़ी ठूंस कर दवा देने की व्यर्थ कोशिश करती रही. सुधीर ने चंद मिनटों में अपने को स्वस्थ कर लिया, ‘‘क्या बात है, मोनिका? तुम पैदल ही आई हो क्या? गाड़ी पर क्यों नहीं आईं? या छोड़ दी है कहीं?’’
‘‘गाड़ी होटलों और पार्टियों में जाने के लिए है. आज तो घररूपी मंदिर में आई हूं.’’
‘‘बेटी, जरा एक कौफी तो बना लाना,’’ ऋचा से सुधीर ने कहा, ‘‘कुछ भी हो, मोनिका, मैं तुम्हें अपने अंतरतम से बधाई देता हूं. विकास के जिस रास्ते पर तुम अग्रसर हुईं, उस पर सच में सफलता प्राप्त की तुम ने. मैं उस से अपने को गौरवान्वित महसूस करता हूं.’’
‘‘वह इसलिए कि आप मेरे भीतर की सचाई को नहीं जानते,’’ मोनिका व्यथित स्वर में बोली, ‘‘जिसे आप विकास कहते हैं, एक स्त्री के लिए उस की संज्ञा हो जाती है, विक्रय. पुरुष के लिए जो व्यक्तित्व का विकास है, स्त्री के लिए वही है व्यक्तित्व का विक्रय. किसी ने मुझ से कहा कि खरीदने वाला ताकतवर होता है इस संसार में. लेकिन खरीदने के लिए कीमत अदा करनी होती है.’’ डाक्टर सुधीर अवाक् हो मोनिका का मुख देखते रहे.
‘‘आत्मविकास के जिस ध्येय को मैं ने आत्ममुक्ति से संयुक्त किया था, वह एक डरावने स्वप्न सा आ कर ठहर गया है. मैं आज बहुत अकेली हूं. कहने के लिए मैं होटलों में अच्छे से अच्छा खातीपीती हूं, हवाई जहाजों से सफर करती हूं, बड़ेबड़े लोगों से सरोकार रखती हूं, पर मैं बड़ी तृषित, बड़ी अतृप्त हूं. मुक्ति के नाम पर मैं ने अपने जीवन को रेगिस्तान बना लिया है,’’ मोनिका का गला इतना कहतेकहते रुंध गया था. वह बिलख पड़ी थी.
‘‘परंतु,’’ सुधीर ने सांत्वना के स्वर में कहा, ‘‘अभी भी हमारे मन में तुम्हारी जगह वैसी ही बनी हुई है. मैं हूं, तुम्हारी बेटी ऋचा.’’
‘‘इसी सहारे को ले कर तो मैं जिंदा हूं. वरना अभी तक तो कभी की मरखप गई होती.’’ तब तक ऋचा एक ट्रे में कौफी और कुछ बिस्कुट ले आई. मां के सामने एक छोटी सी मेज सरका कर ट्रे रखती हुई बोली, ‘‘लो, मां. कुछ ताजगी आ जाएगी.’’
ऋचा को भीगी, तृप्त आंखों से देखती हुई मोनिका ने कहा, ‘‘मेरी ताजगी, मेरी जिंदगी, जो कुछ भी है, वह तू है, मेरी बेटी. तुझे देख लिया मैं ने, बस, तरोताजा हो गई.’’ डाक्टर सुधीर के मुख पर अप्रसन्नता झलकी, कुछ कड़े स्वर में बोले, ‘‘यह क्या, मोनिका, ऋचा कितनी साध से ले आई है, और तुम इनकार कर रही हो.’’
‘‘नाराज न हों, डाक्टर साहब,’’ मोनिका ने नम्रता से कहा, ‘‘यहां की सभी वस्तुएं मेरे लिए अनमोल हैं, परंतु उन्हें छूने का अधिकार मैं खो चुकी हूं. जब अवसर आएगा, तब मैं उन्हें माथे पर चढ़ा कर कृतार्थ हो लूंगी,’’ कहती हुई मोनिका उठ खड़ी हुई, ‘‘अब चलती हूं, बेटी. असह्य वेदना उभरउभर कर मेरी छाती को फाड़े डाल रही थी, सो उसे पति के सामने निवेदन करने आ गई और जी हलका कर लिया.’’
डाक्टर सुधीर ने कहा, ‘‘जब उस जीवन से इतनी दुखी हो तो हमारे बीच ही आ जाओ.’’
‘‘हां, मां,’’ ऋचा ने भी उत्सुकता से कहा, ‘‘हमारे लिए बड़े आनंद की बात होगी.’’‘‘नहीं, बेटी, वह पाखंड अब मुझ से न होगा,’’ मोनिका पछताती हुई बोली, ‘‘जो शाखा किसी विशाल वृक्ष से विलग हो कर उड़ चली थी, हवा उसे अपने झकोरों से जर्जर करती हुई अभी ऊपर ही ऊपर ठहराए हुए है, नीचे नहीं आने देती. वह हवाओं का खिलौना मात्र बन कर रह गई है,’’ कहते हुए मोनिका मन की अतीव वेदना के प्रवाह में फिर फफक कर रो पड़ी, ‘‘मुझे क्षमा कर दे, बेटी.’’ और शिथिल पांवों से धीमेधीमे मोनिका बरामदे की सीढि़यां उतर गई. मनोव्यथा से कांपते डाक्टर सुधीर के कमजोर कंधों को अपने दोनों हाथों से कस कर दबाए उन की बेटी ऋचा बड़ी देर तक सिसकती रही.
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बांबेल अपने प्रभावी स्वर में कहता रहा, ‘‘चीजों को उन के सही परिप्रेक्ष्य में देखिए, मिस मोनिका. आप नारियां अपनेआप को सदैव भोग्या के रूप में क्यों मानती हैं? पुरुष के समान ही आप भी मानव सृष्टि की एक प्रबल हस्ती हैं. उसी आधार पर अपने को भोक्ता के रूप में देखिए. दुनिया के इस नीलाम घर में आप स्वयं को हमेशा नीलाम पर चढ़ी हुई ही क्यों महसूस करती हैं? अपने को नीलाम की बोली बोलने वाले या चीजों को खरीदने वाले के रूप में क्यों नहीं पेश कर पाती हैं आप? इस संसार में जो खरीद सकता है, वही बलिष्ठ है, वही मुक्त है.’’ मोनिका की आंखें मुंदी हुई थीं. वह बांबेल की बांहों में बंधी हुई किसी कल्पना लोक में पहुंच गई थी तथा उस के गाढ़े चुंबन का वैसा ही प्रत्युत्तर दे रही थी. पूरे माहौल में एक रोमानी भीनी सुगंधि बसी थी. पर कुछ क्षणों में बांबेल ने बिलकुल व्यापारिक ढंग से अपने को अलग कर लिया और मोनिका के गालों को थपथपाता हुआ बोला, ‘‘हम लोग फिर कभी और खुलेरूप में मिलेंगे, बाय.’’
मोनिका की बुद्धि को जैसे नई दृष्टि प्रदान कर दी जरमन व्यवसायी ने. मोनिका ने अपनी मुक्ति के मार्ग में जैसे नया आलोक पा लिया हो. उस के पास शिक्षा थी, दक्षता थी, वाक्पटुता थी और थी सुंदरता. उस की महत्त्वाकांक्षा अब पंख लगा कर उड़ चली थी. धीरेधीरे उस कंपनी में मोनिका एक के बाद दूसरे उच्चपद पर प्रतिष्ठित होती गई. धाक जमाती गई. यहां तक कि वह भी मिस्टर बांबेल की भांति अनवरत अंतर्राष्ट्रीय दौरों पर रहने लगी. उस का एक पैर मुंबई में होता तो दूसरा कोलकाता में. यदि आज वह टोकियो जा रही है तो कल बेरूत, परसों न्यूयार्क और नरसों हैंबर्ग. अब वह भी कंपनी की एक डाइरैक्टर थी. फकीरचंद बागला मर चुका था. अब उस का लड़का नरेशचंद कंपनी का प्रबंध संचालक था. अवकाश के एक दिन मोनिका ने अपने विगत जीवन पर एक विहंगम दृष्टि डाली, एक आत्मचिंतन किया. इतने बड़े विलासपूर्ण फ्लैट में मोनिका अकेली ही रहती थी. कुछ नौकरनौकरानियां, जो हमेशा उस की आज्ञा का पालन करने को खड़े रहते, और कोई नहीं. अपनों के नाम पर उस के मित्र और सहकर्मी थे. उन के भतीजे, लड़के उसे आंटी कह लेते. यही एक आत्मीयता का संबोधन उसे सुनने को मिलता.
उस का उद्देश्य था मुक्ति. लेकिन कौन सी मुक्ति और किस से? उस ने पैर बाहर निकाले थे, पुरुष से मुक्ति का विधेय ले कर. लेकिन उस मुक्ति का स्वरूप क्या ऐसा ही होता है? उस ने तो नकल की है. उस ने वही किया है जो एक पुरुष करता. यानी उस का सारा प्रयत्न केवल पुरुष बनने तक सीमित रह गया. यहां तक कि उस ने अपने स्त्रीत्व का वह अंश भी दांव पर लगा दिया, जो स्त्री का एकमात्र मूलधन है. यह कैसी मुक्ति हुई स्त्री के लिए कि जिस की परिणति है केवल पुरुष तुल्य बन जाना. क्या यही इस मुक्ति की चरम सीमा है? यही सीमांत है?स्त्री ने किस मंतव्य को ले कर पुरुष से मुक्ति का नारा लगाया है. क्या पुरुष की जगह लेने के लिए? क्या पुरुष को अपदस्थ करने के लिए? क्या पुरुष को इस संसार से ढकेल कर किसी अतल गहराइयों में गिरा देने के लिए, ताकि वह अकेली रह जाए. यदि वह अकेली रह सकती है तो पुरुष की प्रेयसी बनने, विवाह करने की इच्छा क्यों? संतान की कामना क्यों? मातृत्व का स्वप्न क्यों?
या फिर कि स्त्री की आकांक्षा है कि पुरुष उस का गुलाम बन कर रहे. पुरुष की हस्ती को अपने इशारों पर नाचने वाली पुतली के रूप में ला कर, स्त्री उस से घर के, बाहर के सारे कामकाज, सारी टहल कराए, अपनी परिचर्चा में खड़ा रखे, अपनी मरजी से उठाएबैठाए. यह क्या स्त्री की किसी खिलंदड़ी प्रकृति का तकाजा है? या कि फिर घोर प्रतिकार के रूप स्त्री ऐसा चाहती है? यदि हां, तो किस का प्रतिकार? पुरुष के अन्यायों, अत्याचारों का? तो स्त्री अभी भी पुरुष विषयक विचारों से ही बंधी है, तो मुक्ति क्या हुई? आज कितने समय के बाद मोनिका को अपने पति की याद आई, साथ ही अपनी छोटी सी बच्ची ऋचा की भी. ‘डाक्टर सुधीर बूढ़े हो गए होंगे. ऋचा पढ़लिख कर कोई काम कर रही होगी, या फिर उस की शादी हो गई होगी.’ मुक्ति के नशे में मोनिका ने उन के बारे में जरा सा सोचना भी पराधीनता की बात मानी थी. सो, उस ने सच ही कभी भूले से भी उन की याद नहीं की, और यदि कभी कोई अंश उस के मन में उठा तो बलपूर्वक मन को मोड़ लिया. बड़े ही आत्मअनुशासन से उस ने ‘पुरुष से मुक्ति’ के व्रत का निर्वाह किया था परंतु आज उसे वह व्रत निरुद्देश्य और निष्फल लगने लगा था.
डाक्टर सुधीर अपने दवाखाने के बरामदे में एक आरामकुरसी पर लेटे हुए थे. एक स्वच्छ सफेद कुरता, हलकी महीन धोती तथा आंखों पर जामुनी रंग के फ्रेम का चश्मा. कुरसी के पास ही उन की चप्पलें पड़ी हुई थीं, उन की निगाह चारों ओर घूम रही थी. चुस्त, लेकिन सादे लिबास में एक हंसमुख लड़की, रोगियों की परीक्षा करती और नुसखे लिख रही थी. डाक्टर सुधीर के लिए, गंभीर रोगियों की अवस्था पर, ऋचा को सलाह देने का काम मात्र रह गया था. एकाएक उस स्थान पर एक भीनी खुशबू व्याप्त हो गई. अंतिम मरीज का नुसखा लिख कर उसे थमाते हुए ऋचा की और साथ ही सुधीर की नजर एकसाथ उठी. एक हलके रंग की मामूली साड़ी, सादी सी चप्पलें पहने हुए मोनिका द्वार पर आ कर खड़ी थी. ऋचा के मुख से फुसफुसाते स्वर में निकला ‘मां’ और वह दौड़ कर पिता के पीछे जा खड़ी हुई, जैसे मोनिका उसे पकड़ ले जाएगी.
सुधीर ने अपने चश्मे के भीतर आंखें फैला कर देखा, ‘‘मोनिका.’’ बहुत धीमे अस्फुट स्वर में निकला उन के मुंह से और नेत्रों में आंसू उमड़ने लगे.
मोनिका की आंखों से भी अश्रुधारा बह रही थी, जिस से उस के सामने की साड़ी कुछ भीग गई. ऋचा अपने पिता के बालों में उंगलियां फिराती हुई होंठ बिसूरती थी, बहुत चेष्टा कर के रोकने पर भी उस की सिसकियां निकल पड़ती थीं. मोनिका दुख के अत्यधिक भार से जैसे थक कर बरामदे में बैंच पर बैठ गई और अपने अंदर के हाहाकार को मुख में साड़ी ठूंस कर दवा देने की व्यर्थ कोशिश करती रही. सुधीर ने चंद मिनटों में अपने को स्वस्थ कर लिया, ‘‘क्या बात है, मोनिका? तुम पैदल ही आई हो क्या? गाड़ी पर क्यों नहीं आईं? या छोड़ दी है कहीं?’’
‘‘गाड़ी होटलों और पार्टियों में जाने के लिए है. आज तो घररूपी मंदिर में आई हूं.’’
‘‘बेटी, जरा एक कौफी तो बना लाना,’’ ऋचा से सुधीर ने कहा, ‘‘कुछ भी हो, मोनिका, मैं तुम्हें अपने अंतरतम से बधाई देता हूं. विकास के जिस रास्ते पर तुम अग्रसर हुईं, उस पर सच में सफलता प्राप्त की तुम ने. मैं उस से अपने को गौरवान्वित महसूस करता हूं.’’
‘‘वह इसलिए कि आप मेरे भीतर की सचाई को नहीं जानते,’’ मोनिका व्यथित स्वर में बोली, ‘‘जिसे आप विकास कहते हैं, एक स्त्री के लिए उस की संज्ञा हो जाती है, विक्रय. पुरुष के लिए जो व्यक्तित्व का विकास है, स्त्री के लिए वही है व्यक्तित्व का विक्रय. किसी ने मुझ से कहा कि खरीदने वाला ताकतवर होता है इस संसार में. लेकिन खरीदने के लिए कीमत अदा करनी होती है.’’ डाक्टर सुधीर अवाक् हो मोनिका का मुख देखते रहे.
‘‘आत्मविकास के जिस ध्येय को मैं ने आत्ममुक्ति से संयुक्त किया था, वह एक डरावने स्वप्न सा आ कर ठहर गया है. मैं आज बहुत अकेली हूं. कहने के लिए मैं होटलों में अच्छे से अच्छा खातीपीती हूं, हवाई जहाजों से सफर करती हूं, बड़ेबड़े लोगों से सरोकार रखती हूं, पर मैं बड़ी तृषित, बड़ी अतृप्त हूं. मुक्ति के नाम पर मैं ने अपने जीवन को रेगिस्तान बना लिया है,’’ मोनिका का गला इतना कहतेकहते रुंध गया था. वह बिलख पड़ी थी.
‘‘परंतु,’’ सुधीर ने सांत्वना के स्वर में कहा, ‘‘अभी भी हमारे मन में तुम्हारी जगह वैसी ही बनी हुई है. मैं हूं, तुम्हारी बेटी ऋचा.’’
‘‘इसी सहारे को ले कर तो मैं जिंदा हूं. वरना अभी तक तो कभी की मरखप गई होती.’’ तब तक ऋचा एक ट्रे में कौफी और कुछ बिस्कुट ले आई. मां के सामने एक छोटी सी मेज सरका कर ट्रे रखती हुई बोली, ‘‘लो, मां. कुछ ताजगी आ जाएगी.’’
ऋचा को भीगी, तृप्त आंखों से देखती हुई मोनिका ने कहा, ‘‘मेरी ताजगी, मेरी जिंदगी, जो कुछ भी है, वह तू है, मेरी बेटी. तुझे देख लिया मैं ने, बस, तरोताजा हो गई.’’ डाक्टर सुधीर के मुख पर अप्रसन्नता झलकी, कुछ कड़े स्वर में बोले, ‘‘यह क्या, मोनिका, ऋचा कितनी साध से ले आई है, और तुम इनकार कर रही हो.’’
‘‘नाराज न हों, डाक्टर साहब,’’ मोनिका ने नम्रता से कहा, ‘‘यहां की सभी वस्तुएं मेरे लिए अनमोल हैं, परंतु उन्हें छूने का अधिकार मैं खो चुकी हूं. जब अवसर आएगा, तब मैं उन्हें माथे पर चढ़ा कर कृतार्थ हो लूंगी,’’ कहती हुई मोनिका उठ खड़ी हुई, ‘‘अब चलती हूं, बेटी. असह्य वेदना उभरउभर कर मेरी छाती को फाड़े डाल रही थी, सो उसे पति के सामने निवेदन करने आ गई और जी हलका कर लिया.’’
डाक्टर सुधीर ने कहा, ‘‘जब उस जीवन से इतनी दुखी हो तो हमारे बीच ही आ जाओ.’’
‘‘हां, मां,’’ ऋचा ने भी उत्सुकता से कहा, ‘‘हमारे लिए बड़े आनंद की बात होगी.’’‘‘नहीं, बेटी, वह पाखंड अब मुझ से न होगा,’’ मोनिका पछताती हुई बोली, ‘‘जो शाखा किसी विशाल वृक्ष से विलग हो कर उड़ चली थी, हवा उसे अपने झकोरों से जर्जर करती हुई अभी ऊपर ही ऊपर ठहराए हुए है, नीचे नहीं आने देती. वह हवाओं का खिलौना मात्र बन कर रह गई है,’’ कहते हुए मोनिका मन की अतीव वेदना के प्रवाह में फिर फफक कर रो पड़ी, ‘‘मुझे क्षमा कर दे, बेटी.’’ और शिथिल पांवों से धीमेधीमे मोनिका बरामदे की सीढि़यां उतर गई. मनोव्यथा से कांपते डाक्टर सुधीर के कमजोर कंधों को अपने दोनों हाथों से कस कर दबाए उन की बेटी ऋचा बड़ी देर तक सिसकती रही.
The post सीमांत- भाग 4 : जिसे वह स्त्री का विकास मानती थी दरअसल वह क्या था appeared first on Sarita Magazine.
October 03, 2020 at 10:00AM
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