Friday, 2 October 2020

सीमांत- भाग 3 : जिसे वह स्त्री का विकास मानती थी दरअसल वह क्या था

कारोबारी वार्त्तालाप में उस की वाक्पटुता का लोहा कंपनी के दूसरे अधिकारी भी मानते थे. इसी संबंध में एक विदेशी पार्टी के प्रतिनिधि के साथ सौदा पटाने का काम उसे सौंपा गया. कार्लटन होटल के एक वातानुकूलित शानदार कमरे में मोनिका जिस समय पहुंची, वहां कई लोग पहले से मौजूद थे. सभी भारी गद्दी वाले सोफों में धंसे बैठे हुए थे और उत्कंठा से एक हसीन व तेजतर्रार महिला की एक निगाह के लिए व्यग्र थे तथा बीचबीच में अपने बैग और फोल्डर्स खोल कर विज्ञापन, परचे आदि देखते, सजाते और पेश करने के लिए तैयार कर लेते.मोनिका समझ गई कि यह महिला मिस्टर स्टियक्स बांबेल की सचिव है. मिस्टर बांबेल एक विख्यात जरमन कंपनी के पार्टनर थे, जो कारोबार के लिए कई देशों का दौरा करने के क्रम में भारत आए थे. यह एक अच्छा मौका था उन कंपनियों के लिए, जो अपना माल जरमनी के बाजारों में पहुंचा देने के लिए उत्सुक थे.

महिला का नाम था मिस दवीदो. नाकनक्श बहुत तीखे. बहुत फिट बैठने तथा खूब फबने वाले कपड़े पहने मिस दवीदो बड़ी तेजी से अपने काम को अंजाम दे रही थी. अपनी बारी आने पर मोनिका ने अपनी कंपनी की विनिर्मितियों का सारा विज्ञापन साहित्य मिस दवीदो के सामने सजाते हुए रख दिया. मिस दवीदो एकएक कर के फर्राटे से वे सभी पढ़ती जाती और चमकते नैनों से मोनिका को देखती, सिर हिलाती जाती तथा हंसते या मुसकराते हुए अस्फुट स्वर में ‘चार्मिंग, मार्वेलस’ आदि कहती और बीचबीच में मोनिका के कंधे, पीठ पर हाथ भी थपथपाती जाती. मोनिका केवल मिस दवीदो के स्तर तक ही नहीं अटक जाना चाहती थी. वह उस व्यक्ति बांबेल को भी देखना चाहती थी, जिस की निजी सचिव इतनी खूबसूरत और तेजतर्रार थी. मिस दवीदो जैसे मन की बात पढ़ लेती थी. उस ने पास रखे फोन को उठा कर कुछ सांकेतिक भाषा में बात की, और फोन रखते हुए मोनिका से कहा, ‘‘आप मिस्टर बांबेल से भी मिल सकती हैं.’’ मिस्टर बांबेल का कक्ष छोटा था, पर खूब सजा हुआ था. उस की हर चीज के बेशकीमती होने का एहसास उस कक्ष में घुसते ही होने लगता था. आलीशान मेज और कुरसियां और जाने क्याक्या. सबकुछ आलीशान और उस का स्वयं का व्यक्तित्व भी कम न था. एक ऊंचा कद वाला पुरुष, जिस के अंगप्रत्यंग से आकर्षण की लाली फूटी पड़ती थी तथा चेहरे पर सौम्यता व सहजता थी. उस ने अपना गदीला हाथ मोनिका की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप से मिल कर बड़ी प्रसन्नता हुई, मिस मोनिका.’’

मोनिका के दिमाग में ‘मिस’ शब्द खटाक से बजा और उस का दायां हाथ बांबेल के हाथ की गरमी महसूस कर रहा था. उस शब्द और उस हाथ के द्वारा जैसे मोनिका का सारा व्यक्तित्व पिघल कर किसी दूसरे सांचे में ढाला जा रहा था. मोनिका उस के कहने पर कुरसी पर बैठ गई और अपने कागजपत्र निकालने लगी. पर बांबेल को वह सब देखने में रुचि न थी. बांबेल ने कहा, ‘‘पिछली बार जब मैं आया था तब आप मिस्टर बागला की कंपनी में नहीं थीं क्या? लेकिन हो भी तो गया बहुत अरसा. मैं 5 साल पहले आया था.’’ बांबेल की बात का उत्तर देते हुए मोनिका की आंखों के आगे अपने मैनेजिंग डायरैक्टर फकीरचंद बागला का नक्शा खिंच गया.

बांबेल ने कहा, ‘‘बागला को देखिए तो सब से पहले उस की तोंद पर ही निगाह जाएगी और फिर उस के सपाट, गंजे सिर पर,’’ बांबेल अपनी इस बात पर उसे मुसकराते देख खुद भी मुसकराया. फिर उस ने जाने कहां कौन सा बटन दबाया कि उस की बगल में झलमल करती शीशे की एक छोटी सी अलमारी उभर आई. उस में विदेशी मदिराओं की रंगबिरंगी बोतलें कोई आधी, कोई पूरी भरी हुई सजी थीं. साथ में कई आकारों के क्रिस्टल कांच के गिलास भी थे. मोनिका का दिमाग शांशां करने लगा. वह समझ चुकी थी कि बांबेल भी उन लोगों में से है जो नशे की गंदी आदत को अपने बिजनैस का जरूरी हिस्सा समझते हैं. उस की नजर उधर न उठी.

‘‘आप क्या लेंगी?’’ बांबेल ने पूछा.

‘‘धन्यवाद, कुछ नहीं.’’

‘‘ओहो, मौडेस्टी,’’ बांबेल ने खुले दिल से आमंत्रित करते हुए कहा, ‘‘आइए, हम व्यापारी हैं. साथसाथ एंजौय करना हमारे व्यापार का एक हिस्सा है. देखिए, अब न नहीं करना. आप के लिए बहुत हलका पैग बनाया है,’’ और इस बीच अपनी इच्छा से जो 2 गिलास उस ने तैयार कर लिए थे उन में से एक मोनिका के सामने बढ़ाया, ‘‘आइए, अपने स्वास्थ्य और खुशी के लिए एकदो पैग लें…’’ मोनिका थोड़ीथोड़ी सिप करते हुए भी चिंतित थी. वह माल के विज्ञापन साहित्य की ओर बारबार देखती और फिर कुछ निराश सी हो जाती. बांबेल ने उस की हालत की हंसी उड़ाई.

‘‘आप अपने माल की बिक्री के लिए चिंतित हैं, मिस मोनिका. हम लोगों का सब से बड़ा व्यापार है आपस में एकदूसरे को खरीदना. मालसामान की बात क्या है? वह तो बाजार में खपता है. लोगों को चीजों की जरूरत है, उन को देना हमारा काम है और जो उन्हें देना है, उसे आप सब से खरीदना भी हमारा काम है, इसलिए उस सब को तो हमें लेना ही है. लेकिन असली व्यापारिक सफलता है, हमारा आप का मेल, हमारा आप का एक दिलदिमाग होना.’’ बांबेल अपनी कुरसी से उठ गया था और कमरे की उस थोड़ी सी जगह में टहलने लगा था, ‘‘तुम अच्छी हो, मिस मोनिका, और बहुत अक्लमंद भी,’’ उस ने मोनिका के कंधों पर हाथ रखा और उठा लिया. फिर एक चक्कर में उस ने मोनिका के कंधे छूते हुए गले को सहलाया, ‘‘तुम सचमुच अक्लमंद लड़की हो,’’ बांबेल धीमेधीमे बोलता रहा, ‘‘उन्नति के लिए ‘इस हाथ दो, उस हाथ लो’ की नीति सब से अच्छी होती है, तुम निश्चित ही उन्नति करोगी, मोनिका.’’

मोनिका के ऊपर जैसे नशा छाता जा रहा था. पर अंतर में कहीं विवेक उसे बारबार कुरेद रहा था. मादकता में आकंठ निमग्न होने की दिशा में और आगे कदम बढ़ाने के पहले उस ने सवाल किया, ‘‘क्या आप मिस दवीदो को भी ऐसे व्यापारिक सौदे के लिए भेजते हैं?’’

‘‘हमें भेजना नहीं होता है. यह उस का कर्तव्य है,’’ बांबेल ने कहा.

‘‘ओह,’’ मोनिका ने होंठों में ही कहा. असल में वह अपने भीतर उस सामर्थ्य को संजो रही थी, अपने मनोसंस्कारों के उस कवच को तोड़ने का साहस तौल रही थी, जो उस की समझ में अन्य स्त्रियों की उन्नति की दिशा में अग्रसर होने से रोकते हैं.

‘‘आप इतनी झिझकती क्यों हैं?’’ बांबेल अपनी धीमी नशीली आवाज में बोला, ‘‘क्या आप सोचती हैं कि आप किसी के दबाव में हैं अथवा कि किसी मजबूरी में आप का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है?’’ तब तक बांबेल कई कदम आगे बढ़ गया था. मोनिका का जिस्म पत्ती की तरह कांप रहा था तथा आंखों के सामने सब धुंधला सा हो गया था. वह कमजोर हाथों से बांबेल के प्रश्नों का निवारण करती हुई, ‘‘मिस्टर बांबेल, मुझे सोचने का समय दें,’’ कहते हुए भी कहीं अंतर में इस भव्य विदेशी व्यक्तित्व के प्रति भीषण आकर्षण के बहाव में बही जा रही थी. साथ ही, अपने को समझाबुझा रही थी कि यदि स्त्री को सचमुच पुरुष के शासन से मुक्त होना है तो उसे अपनी अंत:प्रेरणा को आंतरिक प्रतिरोधों के चंगुल से छुड़ाना होगा.

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कारोबारी वार्त्तालाप में उस की वाक्पटुता का लोहा कंपनी के दूसरे अधिकारी भी मानते थे. इसी संबंध में एक विदेशी पार्टी के प्रतिनिधि के साथ सौदा पटाने का काम उसे सौंपा गया. कार्लटन होटल के एक वातानुकूलित शानदार कमरे में मोनिका जिस समय पहुंची, वहां कई लोग पहले से मौजूद थे. सभी भारी गद्दी वाले सोफों में धंसे बैठे हुए थे और उत्कंठा से एक हसीन व तेजतर्रार महिला की एक निगाह के लिए व्यग्र थे तथा बीचबीच में अपने बैग और फोल्डर्स खोल कर विज्ञापन, परचे आदि देखते, सजाते और पेश करने के लिए तैयार कर लेते.मोनिका समझ गई कि यह महिला मिस्टर स्टियक्स बांबेल की सचिव है. मिस्टर बांबेल एक विख्यात जरमन कंपनी के पार्टनर थे, जो कारोबार के लिए कई देशों का दौरा करने के क्रम में भारत आए थे. यह एक अच्छा मौका था उन कंपनियों के लिए, जो अपना माल जरमनी के बाजारों में पहुंचा देने के लिए उत्सुक थे.

महिला का नाम था मिस दवीदो. नाकनक्श बहुत तीखे. बहुत फिट बैठने तथा खूब फबने वाले कपड़े पहने मिस दवीदो बड़ी तेजी से अपने काम को अंजाम दे रही थी. अपनी बारी आने पर मोनिका ने अपनी कंपनी की विनिर्मितियों का सारा विज्ञापन साहित्य मिस दवीदो के सामने सजाते हुए रख दिया. मिस दवीदो एकएक कर के फर्राटे से वे सभी पढ़ती जाती और चमकते नैनों से मोनिका को देखती, सिर हिलाती जाती तथा हंसते या मुसकराते हुए अस्फुट स्वर में ‘चार्मिंग, मार्वेलस’ आदि कहती और बीचबीच में मोनिका के कंधे, पीठ पर हाथ भी थपथपाती जाती. मोनिका केवल मिस दवीदो के स्तर तक ही नहीं अटक जाना चाहती थी. वह उस व्यक्ति बांबेल को भी देखना चाहती थी, जिस की निजी सचिव इतनी खूबसूरत और तेजतर्रार थी. मिस दवीदो जैसे मन की बात पढ़ लेती थी. उस ने पास रखे फोन को उठा कर कुछ सांकेतिक भाषा में बात की, और फोन रखते हुए मोनिका से कहा, ‘‘आप मिस्टर बांबेल से भी मिल सकती हैं.’’ मिस्टर बांबेल का कक्ष छोटा था, पर खूब सजा हुआ था. उस की हर चीज के बेशकीमती होने का एहसास उस कक्ष में घुसते ही होने लगता था. आलीशान मेज और कुरसियां और जाने क्याक्या. सबकुछ आलीशान और उस का स्वयं का व्यक्तित्व भी कम न था. एक ऊंचा कद वाला पुरुष, जिस के अंगप्रत्यंग से आकर्षण की लाली फूटी पड़ती थी तथा चेहरे पर सौम्यता व सहजता थी. उस ने अपना गदीला हाथ मोनिका की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप से मिल कर बड़ी प्रसन्नता हुई, मिस मोनिका.’’

मोनिका के दिमाग में ‘मिस’ शब्द खटाक से बजा और उस का दायां हाथ बांबेल के हाथ की गरमी महसूस कर रहा था. उस शब्द और उस हाथ के द्वारा जैसे मोनिका का सारा व्यक्तित्व पिघल कर किसी दूसरे सांचे में ढाला जा रहा था. मोनिका उस के कहने पर कुरसी पर बैठ गई और अपने कागजपत्र निकालने लगी. पर बांबेल को वह सब देखने में रुचि न थी. बांबेल ने कहा, ‘‘पिछली बार जब मैं आया था तब आप मिस्टर बागला की कंपनी में नहीं थीं क्या? लेकिन हो भी तो गया बहुत अरसा. मैं 5 साल पहले आया था.’’ बांबेल की बात का उत्तर देते हुए मोनिका की आंखों के आगे अपने मैनेजिंग डायरैक्टर फकीरचंद बागला का नक्शा खिंच गया.

बांबेल ने कहा, ‘‘बागला को देखिए तो सब से पहले उस की तोंद पर ही निगाह जाएगी और फिर उस के सपाट, गंजे सिर पर,’’ बांबेल अपनी इस बात पर उसे मुसकराते देख खुद भी मुसकराया. फिर उस ने जाने कहां कौन सा बटन दबाया कि उस की बगल में झलमल करती शीशे की एक छोटी सी अलमारी उभर आई. उस में विदेशी मदिराओं की रंगबिरंगी बोतलें कोई आधी, कोई पूरी भरी हुई सजी थीं. साथ में कई आकारों के क्रिस्टल कांच के गिलास भी थे. मोनिका का दिमाग शांशां करने लगा. वह समझ चुकी थी कि बांबेल भी उन लोगों में से है जो नशे की गंदी आदत को अपने बिजनैस का जरूरी हिस्सा समझते हैं. उस की नजर उधर न उठी.

‘‘आप क्या लेंगी?’’ बांबेल ने पूछा.

‘‘धन्यवाद, कुछ नहीं.’’

‘‘ओहो, मौडेस्टी,’’ बांबेल ने खुले दिल से आमंत्रित करते हुए कहा, ‘‘आइए, हम व्यापारी हैं. साथसाथ एंजौय करना हमारे व्यापार का एक हिस्सा है. देखिए, अब न नहीं करना. आप के लिए बहुत हलका पैग बनाया है,’’ और इस बीच अपनी इच्छा से जो 2 गिलास उस ने तैयार कर लिए थे उन में से एक मोनिका के सामने बढ़ाया, ‘‘आइए, अपने स्वास्थ्य और खुशी के लिए एकदो पैग लें…’’ मोनिका थोड़ीथोड़ी सिप करते हुए भी चिंतित थी. वह माल के विज्ञापन साहित्य की ओर बारबार देखती और फिर कुछ निराश सी हो जाती. बांबेल ने उस की हालत की हंसी उड़ाई.

‘‘आप अपने माल की बिक्री के लिए चिंतित हैं, मिस मोनिका. हम लोगों का सब से बड़ा व्यापार है आपस में एकदूसरे को खरीदना. मालसामान की बात क्या है? वह तो बाजार में खपता है. लोगों को चीजों की जरूरत है, उन को देना हमारा काम है और जो उन्हें देना है, उसे आप सब से खरीदना भी हमारा काम है, इसलिए उस सब को तो हमें लेना ही है. लेकिन असली व्यापारिक सफलता है, हमारा आप का मेल, हमारा आप का एक दिलदिमाग होना.’’ बांबेल अपनी कुरसी से उठ गया था और कमरे की उस थोड़ी सी जगह में टहलने लगा था, ‘‘तुम अच्छी हो, मिस मोनिका, और बहुत अक्लमंद भी,’’ उस ने मोनिका के कंधों पर हाथ रखा और उठा लिया. फिर एक चक्कर में उस ने मोनिका के कंधे छूते हुए गले को सहलाया, ‘‘तुम सचमुच अक्लमंद लड़की हो,’’ बांबेल धीमेधीमे बोलता रहा, ‘‘उन्नति के लिए ‘इस हाथ दो, उस हाथ लो’ की नीति सब से अच्छी होती है, तुम निश्चित ही उन्नति करोगी, मोनिका.’’

मोनिका के ऊपर जैसे नशा छाता जा रहा था. पर अंतर में कहीं विवेक उसे बारबार कुरेद रहा था. मादकता में आकंठ निमग्न होने की दिशा में और आगे कदम बढ़ाने के पहले उस ने सवाल किया, ‘‘क्या आप मिस दवीदो को भी ऐसे व्यापारिक सौदे के लिए भेजते हैं?’’

‘‘हमें भेजना नहीं होता है. यह उस का कर्तव्य है,’’ बांबेल ने कहा.

‘‘ओह,’’ मोनिका ने होंठों में ही कहा. असल में वह अपने भीतर उस सामर्थ्य को संजो रही थी, अपने मनोसंस्कारों के उस कवच को तोड़ने का साहस तौल रही थी, जो उस की समझ में अन्य स्त्रियों की उन्नति की दिशा में अग्रसर होने से रोकते हैं.

‘‘आप इतनी झिझकती क्यों हैं?’’ बांबेल अपनी धीमी नशीली आवाज में बोला, ‘‘क्या आप सोचती हैं कि आप किसी के दबाव में हैं अथवा कि किसी मजबूरी में आप का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है?’’ तब तक बांबेल कई कदम आगे बढ़ गया था. मोनिका का जिस्म पत्ती की तरह कांप रहा था तथा आंखों के सामने सब धुंधला सा हो गया था. वह कमजोर हाथों से बांबेल के प्रश्नों का निवारण करती हुई, ‘‘मिस्टर बांबेल, मुझे सोचने का समय दें,’’ कहते हुए भी कहीं अंतर में इस भव्य विदेशी व्यक्तित्व के प्रति भीषण आकर्षण के बहाव में बही जा रही थी. साथ ही, अपने को समझाबुझा रही थी कि यदि स्त्री को सचमुच पुरुष के शासन से मुक्त होना है तो उसे अपनी अंत:प्रेरणा को आंतरिक प्रतिरोधों के चंगुल से छुड़ाना होगा.

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October 03, 2020 at 10:00AM

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