Wednesday, 29 June 2022

सास की अलग घर से चले मिसाइल

यह मीटिंग सोसायटी के क्लब हाउस में हो रही थी. मीटिंग सिर्फ बहुओं की थी. अब आप कहेंगे कि इस में नया क्या है? सासबहू में तो सदियों से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. पीडि़त बहुएं तो घरघर मिल जाएंगी. हां, यह भी ठीक है. मगर ये बहुएं थोड़ा हट कर हैं. पढ़ीलिखी, अपडेट और सास से दूर पति संग अलग आशियाने में आजाद रहने वाली यानी इन की सासें परदेश में बसती हैं या यह भी कह सकते हैं कि ये सासूबाड़ी छोड़ कर परदेश में बसी हुई हैं. फिर दुख काहे का?

सास साथ नहीं रहतीं तो फिर कैसी टैंशन? यही तो बात है. ‘सासूमां साथ नहीं तो टैंशन नहीं’ लोग यही समझते हैं. घूमोफिरो मौज करो, जैसी मरजी वैसा जीने का नियम बनाओ. लेकिन जरा रूबी, सोनी, दीपा, स्वीटी, पल्लवी, सोनम, अर्चना, कनक… लंबी लिस्ट है. इन की दुखती रग पर हाथ रखो तो पता चलेगा कि सासें दूर रह कर भी कैसे इन पर हुक्म चलाती हैं और तब इन के दिल पर क्या बीतती है सहज अंदाजा लगा सकती हैं… त्राहित्राहि करती हैं ये बेचारियां. किस से करें फरियाद और कौन सुनेगा इन की फरियाद.

ये होपलैस बहुएं दूसरे शहरों में रहने वाली अपनी सासों से परेशान हो कर आज मीटिंग कर रही हैं. इस मीटिंग का धांसू आइडिया मिसेज अग्रवाल का है. वे यूएसए में रहती हैं. 2 साल बाद त्योहार पर भारत आईं है. होली मिलन समारोह में हंसीठट्ठे के बीच उन्होंने कुबूल किया, ‘‘यहीं से बैठेबैठे मेरी सास अपना शासन चलाती हैं. उफ, मैं तंग आ जाती हूं… कई बार लगता है सात समंदर पार रहने का कोई फायदा नहीं. बिंदी भले ही नहीं लगाती हूं, पर सास का हुक्म सिरमाथे पर लगा कर रहना पड़ता है.’’

हंसीमजाक में जो बात निकली तो दूर तक गई. मैडम सोनम ने ताड़ लिया कि मामला गड़बड़ है. अत: वे मिसेज अग्रवाल के पीछे पड़ गईं. उन्होंने उन से सास के कुछ राज भी उगलवा लिए. वे खुद भी दूसरे शहर में रहने वाली अपनी सासूमां से त्रस्त थीं. आरती अग्रवाल ने प्रस्ताव रखा, ‘‘कल हम लोग क्लब हाउस में मिलें और वहां अपनीअपनी बात रखें. हम सब मिल कर इस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश करें कि कैसे सासू मां की दखलंदाजी नहींनहीं तीरंदाजी से छुटकारा पाया जाए.’’

सोसायटी की लगभग सारी बहुएं मीटिंग में आ गई थीं. मिसेज अग्रवाल ने मोरचा संभाला, ‘‘अपनीअपनी सासूमां से त्रस्त फ्रैंड्स, आप सब को पता है कि हम यहां क्यों इकट्ठा हुए हैं? हमारे पास ज्यादा समय नहीं है, इसलिए सब बिना किसी लागलपेट के अपनीअपनी परेशानी यहां रखें और फिर मिलजुल कर समाधान ढूंढ़ने का प्रयास करें.

आप लोग जानती ही हैं कि मैं सात समंदर पार रहती हूं. पता है सासूमां की जिद की वजह से मुझे इस होली पर यहां आना पड़ा. वैसे यहां आ कर घरपरिवार के लोगों से मिलनाजुलना मुझे भी अच्छा लगता है लेकिन फ्रैंड्स इस बार मैं यहां इसलिए नहीं आना चाहती थी. क्योंकि मेरी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. डाक्टर ने 2-3 महीनों तक लंबी यात्रा करने से मना किया था.

सासूमां ने अपने बेटे को औफिस में बारबार फोन कर परेशान कर दिया कि देखो तनु सिर्फ बहाने बना रही है और कुछ नहीं. वह यहां आना ही नहीं चाहती. एक बार नहीं आएगी तो फिर हर बार नए बहाने बनाएगी. बेटे को जाने क्या पाठ पढ़ाया कि उन्होंने टिकट ले कर सीधे मुझे फरमान सुना दिया कि तुम्हें होली मां के साथ ही मनानी है.

इतना ही नहीं, सासूमां रोज वीडियो कौल कर के कोई न कोई हिदायत देती रहती हैं… कभी सुबहसुबह कहती हैं कि आज वृहस्पतिवार है. याद दिला रही हूं… तुम्हें तो कुछ याद रहता नहीं रहता … आज कपड़े मत धोना. और हां, सत्तू के पराठे मत बना लेना. तुम दोनों को बहुत पसंद हैं… जबतब बना लेती हो. वीडियो चैट में वे लंच बौक्स तक देखती हैं कि उस में सत्तू के परांठे तो नहीं हैं. मैं कितनी परेशान हूं बता नहीं सकती… ऐसीऐसी ऊलजलूल बातें करती हैं कि झेलना मुश्किल हो जाता है.

‘‘बेड़ा गर्क हो नैटवर्क कंपनियों का, जिन्होंने हमारी सासों के हाथों में फ्री नैटवर्करूपी मजबूत मिसाइल थमा दी है… क्या बताऊं यहां आने के 2 दिन पहले की बात है. हम लोग डिनर कर रहे थे. बड़े प्यार से इन्होंने खीरा, टमाटर और गाजर का सलाद काटा था. हम लोगों को यह सलाद बहुत पसंद है. सासूमां की नजर उस प्लेट पर पड़ गई. फिर क्या था उन्होंने उसी समय उसे वहां से यह कह कर हटवा दिया कि रात में ये ठंडी चीजें क्यों खा रहे हो तुम लोग? याद नहीं सोमू को पिछले साल डाक्टर ने रात में सलाद खाने से मना किया था… फिर से सर्दीवर्दी हो गई तो… और तब तक वीडियो चैट करती रहीं जब तक कि हमारा डिनर खत्म नहीं हो गया.’’

‘‘उफ,’’ सब के मुंह से एकसाथ निकला. यह सब की आह थी.

मिसेज अग्रवाल ने सब की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. जब सब की सांस में सांस आई तो अंकिता ने अपनी बात रखी, ‘‘मेरी सासूमां गांव में रहती हैं, जो अब आधाअधूरा शहर हो गया है. उन का फरमान है कि हर पर्वत्योहार वहीं आ कर उन के साथ मनाएं. शादी के 12 साल बीत गए हैं. यह सिलसिला जारी है. वहां जा कर त्योहार क्या मनाना, सारा दिन किचन में ही बीत जाता है.

‘‘अब बेटियां भी बड़ी हो रही हैं. वे वहां नहीं जाना चाहतीं. वहां हम लोग न तो अपनी पसंद का खा सकते हैं, न ही पहन सकते हैं और न ही मौजमस्ती कर सकते हैं. मैं किसी फैस्टिवल पर अपने हिसाब से घर सजाने के लिए तरस गई हूं. पति से कुछ कहती हूं तो कहते कि निभाना तो पड़ेगा ही. अब जब त्योहार आने वाला होता है, तो मन बुझ जाता है.

औफिस में ज्यादा काम होने की वजह से इस बार होली में इन्हें सिर्फ 2 दिन की छुट्टी मिलने वाली थी. मैं और मेरी बेटियां खुश थीं कि इस बार हम अपने मनमुताबिक होली मनाएंगे. लेकिन आप लोगों ने देखा है न कि सासूमां होली से सप्ताहभर पहले खुद आ गईं और मोरचा संभाल लिया.’’

एक बार फिर सब की आह फिजां में फैल गई.

अब रागिनी ने बड़े दुखी स्वर में राग छेड़ा, ‘‘2-3 महीने पहले की बात है. मेरी ससुराल में दूर के रिश्ते की चाची का निधन हो गया. हमारी शादी को 14 साल हो गए हैं. मैं ने 1 बार भी उन्हें नहीं देखा. यहां तक कि वे किसी शादीब्याह में भी नहीं आती थीं. उन के परलोक गमन के बाद सासूमां का संदेशा आया कि हमारे यहां का रिवाज है कि किसी की मौत के बाद 10वीं तक घर में रोटी नहीं बनती. दालसब्जी में छौंक नहीं लगता. हलदीहींग भी नहीं डालते यानी उबला खाना खाते हैं.

मैं ने पति से कहा कि हम ये सारी रस्में कैसे निभा पाएंगे? फिर बच्चों को स्कूल के लिए लंच ले जाना होता है. वे क्या ले जाएंगे, क्या खाएंगे? लेकिन न सास मानीं, न पति. मैं ने जिद ठानी तो पति ने ऐलान किया कि ठीक है, तुम खाना मत बनाओ. मैं खुद बनाऊंगा. अब बताइए मैं क्या करती? यही नहीं हमारी ससुराल में 10वीं के दिन सिर मुड़ाने का रिवाज है. इन्होंने खुद का तो सिर मुड़वाया ही, 7 साल के बेटे का भी मुंडन करवा दिया. वह रोता रहा कि मुझे अपने बाल नहीं कटवाने… मुझे स्कूल में नाटक में भाग लेना है. उन्होंने उस की एक नहीं सुनी…’’

‘‘हाय रे बेचारा बच्चा,’’ सब के मुंह से निकला.

कुछ पलों के लिए वातावरण में सन्नाटा छा गया. फिर स्वीटी की स्वरलहरी हवा में तैरने लगी, ‘‘मेरी सास छोटे शहर में रहती हैं. शादी को 2 साल ही हुए हैं और मैं उन की हिदायतों से परेशान हो गई हूं. आप लोग जानती ही हैं कि मैं प्रैगनैंट हूं. वे वहीं से फोन कर कहती हैं कि शाम के समय बाहर न निकलूं. शाम में बुरा साया गर्भस्त शिशु को नुकसान पहुंचा सकता है. मैं शाम को सैर करने के लिए तरस गई हूं.

‘‘न मैं किसी पार्टी में जा पाती हूं और न थिएटर या मौल में. पति शाम में आते हैं. वे बाहर ले जाना चाहते हैं, लेकिन इसी सोसायटी में रिश्ते की एक ननद रहती हैं. वे सासूमां को सारी इन्फौर्मेशन पहुंचा देती हैं और फिर सासूमां फोन पर मुझे डांटती हैं. पति की भी क्लास लगती है. इसलिए अब पति भी शाम के बाद कहीं नहीं ले जाते. अब तो किसी जरूरी चैकअप के लिए भी शाम में निकलने पर कांप जाती हूं कि न जाने सासूमां का कब कौन सा कहर टूट पड़े.’’

‘‘उफ,’’ एक तो प्रैगनैंट, उस पर सारा दिन घर में अकेली और शाम को दूर बैठी सास मिसाइल दागना शुरू कर देती हैं. लेकिन चारा क्या है.

1-1 कर सभी बहुएं अपनीअपनी मिसाइल रूपी सास का गुणगान करती गईं और साथ ही आह, ओह, हाय, उफ के साथ संवेदनशील खुसुरफुसुर भी करती रहीं. मीटिंग थी कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी और न ही कोई हल निकल पा रहा था.

अनीता भाभी बड़ी देर से सिर पर हाथ रख कर कुछ सोच रही थीं. तीर मारने वाले अंदाज में उठीं और बड़े जोश में हवा में हाथ लहरा कर बोलीं, ‘‘लेकिन हमारे पति तो अपनी मां को समझा सकते हैं न… अगर वे लोग उन्हें समझाएं तभी कुछ बात बने… चुगली करने वाले रिश्तेदारों को भी पाठ पढ़ाना पड़ेगा…’’

अभी वो कुछ और कहना चाहती थीं कि अचानक लेकिन कहतेकहते रुक गईं और मुख्य दरवाजे की ओर इशारा करने लगीं.

सब ने देखा सलोनी मिश्रा की सास अचानक प्रकट हो गई थीं. भारीभरकम डीलडौल, भराभरा गोलमटोल चेहरा, मोटीमोटी काली आंखें… हरदम अपने साथ छाता रखतीं, हर मौसम में. उस छाते को उन्होंने मिसेज अग्रवाल की ओर ऐसे ताना जैसे मिसाल छोड़ रही हों, ‘‘अरे ओ मैडम, सलोनी कहां है, बताएंगी? इतनी भीड़ में कहां खोजूं उसे… हम इतनी दूर से आए हैं और वह हम से आंखमिचौली खेल रही है… और तुम लोग यहां एकसाथ क्यों जमा हुई हैं. कोई साजिश रच रही हैं क्या? चलोचलो… कोई कामधाम है या नहीं?’’

सलोनी को ढूंढ़ती उन की आंखें ऐसे बाहर निकली जा रही थीं जैसे सब को खा जाएंगी. सलोनी ने तेजी से उठ कर सासूमां के पैर छुए और उन के साथ ही निकल गई.

मीटिंग में जैसे भूचाल आ गया हो. अब गु्रप में बंट कर बहुएं खुसुरफुसुर करने लगी थीं… मिसेज अग्रवाल कब कहां गायब हो गई किसी को पता ही नहीं चला. एक मिसाइल ही सब पर भारी पड़ गया.

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यह मीटिंग सोसायटी के क्लब हाउस में हो रही थी. मीटिंग सिर्फ बहुओं की थी. अब आप कहेंगे कि इस में नया क्या है? सासबहू में तो सदियों से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. पीडि़त बहुएं तो घरघर मिल जाएंगी. हां, यह भी ठीक है. मगर ये बहुएं थोड़ा हट कर हैं. पढ़ीलिखी, अपडेट और सास से दूर पति संग अलग आशियाने में आजाद रहने वाली यानी इन की सासें परदेश में बसती हैं या यह भी कह सकते हैं कि ये सासूबाड़ी छोड़ कर परदेश में बसी हुई हैं. फिर दुख काहे का?

सास साथ नहीं रहतीं तो फिर कैसी टैंशन? यही तो बात है. ‘सासूमां साथ नहीं तो टैंशन नहीं’ लोग यही समझते हैं. घूमोफिरो मौज करो, जैसी मरजी वैसा जीने का नियम बनाओ. लेकिन जरा रूबी, सोनी, दीपा, स्वीटी, पल्लवी, सोनम, अर्चना, कनक… लंबी लिस्ट है. इन की दुखती रग पर हाथ रखो तो पता चलेगा कि सासें दूर रह कर भी कैसे इन पर हुक्म चलाती हैं और तब इन के दिल पर क्या बीतती है सहज अंदाजा लगा सकती हैं… त्राहित्राहि करती हैं ये बेचारियां. किस से करें फरियाद और कौन सुनेगा इन की फरियाद.

ये होपलैस बहुएं दूसरे शहरों में रहने वाली अपनी सासों से परेशान हो कर आज मीटिंग कर रही हैं. इस मीटिंग का धांसू आइडिया मिसेज अग्रवाल का है. वे यूएसए में रहती हैं. 2 साल बाद त्योहार पर भारत आईं है. होली मिलन समारोह में हंसीठट्ठे के बीच उन्होंने कुबूल किया, ‘‘यहीं से बैठेबैठे मेरी सास अपना शासन चलाती हैं. उफ, मैं तंग आ जाती हूं… कई बार लगता है सात समंदर पार रहने का कोई फायदा नहीं. बिंदी भले ही नहीं लगाती हूं, पर सास का हुक्म सिरमाथे पर लगा कर रहना पड़ता है.’’

हंसीमजाक में जो बात निकली तो दूर तक गई. मैडम सोनम ने ताड़ लिया कि मामला गड़बड़ है. अत: वे मिसेज अग्रवाल के पीछे पड़ गईं. उन्होंने उन से सास के कुछ राज भी उगलवा लिए. वे खुद भी दूसरे शहर में रहने वाली अपनी सासूमां से त्रस्त थीं. आरती अग्रवाल ने प्रस्ताव रखा, ‘‘कल हम लोग क्लब हाउस में मिलें और वहां अपनीअपनी बात रखें. हम सब मिल कर इस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश करें कि कैसे सासू मां की दखलंदाजी नहींनहीं तीरंदाजी से छुटकारा पाया जाए.’’

सोसायटी की लगभग सारी बहुएं मीटिंग में आ गई थीं. मिसेज अग्रवाल ने मोरचा संभाला, ‘‘अपनीअपनी सासूमां से त्रस्त फ्रैंड्स, आप सब को पता है कि हम यहां क्यों इकट्ठा हुए हैं? हमारे पास ज्यादा समय नहीं है, इसलिए सब बिना किसी लागलपेट के अपनीअपनी परेशानी यहां रखें और फिर मिलजुल कर समाधान ढूंढ़ने का प्रयास करें.

आप लोग जानती ही हैं कि मैं सात समंदर पार रहती हूं. पता है सासूमां की जिद की वजह से मुझे इस होली पर यहां आना पड़ा. वैसे यहां आ कर घरपरिवार के लोगों से मिलनाजुलना मुझे भी अच्छा लगता है लेकिन फ्रैंड्स इस बार मैं यहां इसलिए नहीं आना चाहती थी. क्योंकि मेरी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. डाक्टर ने 2-3 महीनों तक लंबी यात्रा करने से मना किया था.

सासूमां ने अपने बेटे को औफिस में बारबार फोन कर परेशान कर दिया कि देखो तनु सिर्फ बहाने बना रही है और कुछ नहीं. वह यहां आना ही नहीं चाहती. एक बार नहीं आएगी तो फिर हर बार नए बहाने बनाएगी. बेटे को जाने क्या पाठ पढ़ाया कि उन्होंने टिकट ले कर सीधे मुझे फरमान सुना दिया कि तुम्हें होली मां के साथ ही मनानी है.

इतना ही नहीं, सासूमां रोज वीडियो कौल कर के कोई न कोई हिदायत देती रहती हैं… कभी सुबहसुबह कहती हैं कि आज वृहस्पतिवार है. याद दिला रही हूं… तुम्हें तो कुछ याद रहता नहीं रहता … आज कपड़े मत धोना. और हां, सत्तू के पराठे मत बना लेना. तुम दोनों को बहुत पसंद हैं… जबतब बना लेती हो. वीडियो चैट में वे लंच बौक्स तक देखती हैं कि उस में सत्तू के परांठे तो नहीं हैं. मैं कितनी परेशान हूं बता नहीं सकती… ऐसीऐसी ऊलजलूल बातें करती हैं कि झेलना मुश्किल हो जाता है.

‘‘बेड़ा गर्क हो नैटवर्क कंपनियों का, जिन्होंने हमारी सासों के हाथों में फ्री नैटवर्करूपी मजबूत मिसाइल थमा दी है… क्या बताऊं यहां आने के 2 दिन पहले की बात है. हम लोग डिनर कर रहे थे. बड़े प्यार से इन्होंने खीरा, टमाटर और गाजर का सलाद काटा था. हम लोगों को यह सलाद बहुत पसंद है. सासूमां की नजर उस प्लेट पर पड़ गई. फिर क्या था उन्होंने उसी समय उसे वहां से यह कह कर हटवा दिया कि रात में ये ठंडी चीजें क्यों खा रहे हो तुम लोग? याद नहीं सोमू को पिछले साल डाक्टर ने रात में सलाद खाने से मना किया था… फिर से सर्दीवर्दी हो गई तो… और तब तक वीडियो चैट करती रहीं जब तक कि हमारा डिनर खत्म नहीं हो गया.’’

‘‘उफ,’’ सब के मुंह से एकसाथ निकला. यह सब की आह थी.

मिसेज अग्रवाल ने सब की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. जब सब की सांस में सांस आई तो अंकिता ने अपनी बात रखी, ‘‘मेरी सासूमां गांव में रहती हैं, जो अब आधाअधूरा शहर हो गया है. उन का फरमान है कि हर पर्वत्योहार वहीं आ कर उन के साथ मनाएं. शादी के 12 साल बीत गए हैं. यह सिलसिला जारी है. वहां जा कर त्योहार क्या मनाना, सारा दिन किचन में ही बीत जाता है.

‘‘अब बेटियां भी बड़ी हो रही हैं. वे वहां नहीं जाना चाहतीं. वहां हम लोग न तो अपनी पसंद का खा सकते हैं, न ही पहन सकते हैं और न ही मौजमस्ती कर सकते हैं. मैं किसी फैस्टिवल पर अपने हिसाब से घर सजाने के लिए तरस गई हूं. पति से कुछ कहती हूं तो कहते कि निभाना तो पड़ेगा ही. अब जब त्योहार आने वाला होता है, तो मन बुझ जाता है.

औफिस में ज्यादा काम होने की वजह से इस बार होली में इन्हें सिर्फ 2 दिन की छुट्टी मिलने वाली थी. मैं और मेरी बेटियां खुश थीं कि इस बार हम अपने मनमुताबिक होली मनाएंगे. लेकिन आप लोगों ने देखा है न कि सासूमां होली से सप्ताहभर पहले खुद आ गईं और मोरचा संभाल लिया.’’

एक बार फिर सब की आह फिजां में फैल गई.

अब रागिनी ने बड़े दुखी स्वर में राग छेड़ा, ‘‘2-3 महीने पहले की बात है. मेरी ससुराल में दूर के रिश्ते की चाची का निधन हो गया. हमारी शादी को 14 साल हो गए हैं. मैं ने 1 बार भी उन्हें नहीं देखा. यहां तक कि वे किसी शादीब्याह में भी नहीं आती थीं. उन के परलोक गमन के बाद सासूमां का संदेशा आया कि हमारे यहां का रिवाज है कि किसी की मौत के बाद 10वीं तक घर में रोटी नहीं बनती. दालसब्जी में छौंक नहीं लगता. हलदीहींग भी नहीं डालते यानी उबला खाना खाते हैं.

मैं ने पति से कहा कि हम ये सारी रस्में कैसे निभा पाएंगे? फिर बच्चों को स्कूल के लिए लंच ले जाना होता है. वे क्या ले जाएंगे, क्या खाएंगे? लेकिन न सास मानीं, न पति. मैं ने जिद ठानी तो पति ने ऐलान किया कि ठीक है, तुम खाना मत बनाओ. मैं खुद बनाऊंगा. अब बताइए मैं क्या करती? यही नहीं हमारी ससुराल में 10वीं के दिन सिर मुड़ाने का रिवाज है. इन्होंने खुद का तो सिर मुड़वाया ही, 7 साल के बेटे का भी मुंडन करवा दिया. वह रोता रहा कि मुझे अपने बाल नहीं कटवाने… मुझे स्कूल में नाटक में भाग लेना है. उन्होंने उस की एक नहीं सुनी…’’

‘‘हाय रे बेचारा बच्चा,’’ सब के मुंह से निकला.

कुछ पलों के लिए वातावरण में सन्नाटा छा गया. फिर स्वीटी की स्वरलहरी हवा में तैरने लगी, ‘‘मेरी सास छोटे शहर में रहती हैं. शादी को 2 साल ही हुए हैं और मैं उन की हिदायतों से परेशान हो गई हूं. आप लोग जानती ही हैं कि मैं प्रैगनैंट हूं. वे वहीं से फोन कर कहती हैं कि शाम के समय बाहर न निकलूं. शाम में बुरा साया गर्भस्त शिशु को नुकसान पहुंचा सकता है. मैं शाम को सैर करने के लिए तरस गई हूं.

‘‘न मैं किसी पार्टी में जा पाती हूं और न थिएटर या मौल में. पति शाम में आते हैं. वे बाहर ले जाना चाहते हैं, लेकिन इसी सोसायटी में रिश्ते की एक ननद रहती हैं. वे सासूमां को सारी इन्फौर्मेशन पहुंचा देती हैं और फिर सासूमां फोन पर मुझे डांटती हैं. पति की भी क्लास लगती है. इसलिए अब पति भी शाम के बाद कहीं नहीं ले जाते. अब तो किसी जरूरी चैकअप के लिए भी शाम में निकलने पर कांप जाती हूं कि न जाने सासूमां का कब कौन सा कहर टूट पड़े.’’

‘‘उफ,’’ एक तो प्रैगनैंट, उस पर सारा दिन घर में अकेली और शाम को दूर बैठी सास मिसाइल दागना शुरू कर देती हैं. लेकिन चारा क्या है.

1-1 कर सभी बहुएं अपनीअपनी मिसाइल रूपी सास का गुणगान करती गईं और साथ ही आह, ओह, हाय, उफ के साथ संवेदनशील खुसुरफुसुर भी करती रहीं. मीटिंग थी कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी और न ही कोई हल निकल पा रहा था.

अनीता भाभी बड़ी देर से सिर पर हाथ रख कर कुछ सोच रही थीं. तीर मारने वाले अंदाज में उठीं और बड़े जोश में हवा में हाथ लहरा कर बोलीं, ‘‘लेकिन हमारे पति तो अपनी मां को समझा सकते हैं न… अगर वे लोग उन्हें समझाएं तभी कुछ बात बने… चुगली करने वाले रिश्तेदारों को भी पाठ पढ़ाना पड़ेगा…’’

अभी वो कुछ और कहना चाहती थीं कि अचानक लेकिन कहतेकहते रुक गईं और मुख्य दरवाजे की ओर इशारा करने लगीं.

सब ने देखा सलोनी मिश्रा की सास अचानक प्रकट हो गई थीं. भारीभरकम डीलडौल, भराभरा गोलमटोल चेहरा, मोटीमोटी काली आंखें… हरदम अपने साथ छाता रखतीं, हर मौसम में. उस छाते को उन्होंने मिसेज अग्रवाल की ओर ऐसे ताना जैसे मिसाल छोड़ रही हों, ‘‘अरे ओ मैडम, सलोनी कहां है, बताएंगी? इतनी भीड़ में कहां खोजूं उसे… हम इतनी दूर से आए हैं और वह हम से आंखमिचौली खेल रही है… और तुम लोग यहां एकसाथ क्यों जमा हुई हैं. कोई साजिश रच रही हैं क्या? चलोचलो… कोई कामधाम है या नहीं?’’

सलोनी को ढूंढ़ती उन की आंखें ऐसे बाहर निकली जा रही थीं जैसे सब को खा जाएंगी. सलोनी ने तेजी से उठ कर सासूमां के पैर छुए और उन के साथ ही निकल गई.

मीटिंग में जैसे भूचाल आ गया हो. अब गु्रप में बंट कर बहुएं खुसुरफुसुर करने लगी थीं… मिसेज अग्रवाल कब कहां गायब हो गई किसी को पता ही नहीं चला. एक मिसाइल ही सब पर भारी पड़ गया.

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June 30, 2022 at 09:13AM

Tuesday, 28 June 2022

कैसे ये दिल के रिश्ते: क्या वाकई तन्वी के मन में धवल के प्रति सच्चा प्रेम था?

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June 29, 2022 at 10:17AM

कैसे ये दिल के रिश्ते- भाग 1: क्या वाकई तन्वी के मन में धवल के प्रति सच्चा प्रेम था?

रात के सन्नाटे में घड़ी की हलकी सी टिकटिक हथौड़े की चोट सी प्रतीत हो रही थी. मैं अंधेरे में बहुत देर से इधरउधर ताक रही थी. रोज का क्रम बन गया है अब यह. धवल इस दुनिया से क्या गया हमारी दुनिया ही वीरान हो गई. मैं ने प्रणव की ओर देखा, वह गहरी नींद सोए हुए थे.

प्रणव को जवान बेटे की मौत का गम न हो, ऐसी बात नहीं है. वे भी मेरी तरह भीतर से पूरी तरह टूट चुके हैं पर उन्हें अनिद्रा के रोग ने नहीं सताया है. वे रात को ठीक से सो लेते हैं, पर मुझे न दिन में चैन है न रात में. रहरह कर धवल की स्मृतियां विह्वल कर जाती हैं. बूढ़े मांबाप के लिए जवान बेटे की मौत से बढ़ कर दारुण दुख शायद ही कोई दूसरा हो.

एक साल पूरा हो चुका है धवल को गुजरे, पर अब तक हम सदमे से उबर नहीं सके हैं. पलंग के पास ही हमारी अटैचियां रखी हैं. सुबह हमें मुंबई चले जाना है हमेशा के लिए. वहां हमारा बड़ा बेटा वत्सल नौकरी करता है. वही हमें अपने साथ लिए जा रहा है.

अपना शहर छूटने के खयाल से जी न जाने कैसा होने लगा है. नया शहर, नए लोग, न जाने हम मुंबई के माहौल में ढल पाएंगे या नहीं. मुंबई ही क्या, वत्सल हमें किसी भी शहर में ले जाए, धवल की यादें हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगी.

बेटे की असामयिक मौत ने तो हमें तोड़ा ही, उस की मौत से भी अधिक दुखदायी थीं वे घटनाएं जिन के कारण हमें इस बुढ़ापे में खासी बदनामी और थूथू झेलनी पड़ी. बेटे का प्रेमविवाह इतना महंगा पड़ेगा, हम नहीं जानते थे. हम ही क्या, स्वयं धवल भी नहीं जानता होगा कि उस का प्यार हमें किन मुसीबतों में डालने वाला है.

धवल की आंखें मींचते ही तन्वी अपना यह रूप दिखाएगी, किस ने सोचा था. ?प्यार के इस घृणित रूप को देख कर हम व्यथित हैं. प्यार में बेवफाई और धोखाधड़ी के किस्से तो कई सुने थे पर जबरन गले पड़ी बेटे की प्रेमिका हमें इस तरह सताएगी, यह कल्पना नहीं कर सके.

तन्वी हमें शुरू से ही पसंद नहीं थी. सुंदर तो खैर वह बहुत थी पर उस के चेहरे पर कुंआरियों का सा भोलापन और लुनाई नहीं थी. चेहरा पकापका सा लगता था. यद्यपि मैं ने उस के बारे में ऐसीवैसी कोई बात नहीं सुनी थी पर मेरी अनुभवी निगाहें पहली मुलाकात में ही ताड़ गई थीं कि यह बहता पानी है.

धवल को समझाने में हमें खास मेहनत नहीं करनी पड़ी थी. तन्वी विजातीय थी. आर्थिक दृष्टि से भी उस का परिवार हमारे समकक्ष नहीं था. तन्वी के पिता मामूली से वकील थे. हम ने धवल को ऊंचनीच समझाई तो वह सरलता से मान गया और उस ने तन्वी से संबंध सीमित कर लिए थे.

उस समय तक मामला ज्यादा बढ़ा भी नहीं था. कालेज में ही पढ़ रहे थे वे दोनों. हम ने चैन की सांस ली थी कि चलो, बला टली, मगर बला इतनी आसानी से कहां टलनी थी.

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रात के सन्नाटे में घड़ी की हलकी सी टिकटिक हथौड़े की चोट सी प्रतीत हो रही थी. मैं अंधेरे में बहुत देर से इधरउधर ताक रही थी. रोज का क्रम बन गया है अब यह. धवल इस दुनिया से क्या गया हमारी दुनिया ही वीरान हो गई. मैं ने प्रणव की ओर देखा, वह गहरी नींद सोए हुए थे.

प्रणव को जवान बेटे की मौत का गम न हो, ऐसी बात नहीं है. वे भी मेरी तरह भीतर से पूरी तरह टूट चुके हैं पर उन्हें अनिद्रा के रोग ने नहीं सताया है. वे रात को ठीक से सो लेते हैं, पर मुझे न दिन में चैन है न रात में. रहरह कर धवल की स्मृतियां विह्वल कर जाती हैं. बूढ़े मांबाप के लिए जवान बेटे की मौत से बढ़ कर दारुण दुख शायद ही कोई दूसरा हो.

एक साल पूरा हो चुका है धवल को गुजरे, पर अब तक हम सदमे से उबर नहीं सके हैं. पलंग के पास ही हमारी अटैचियां रखी हैं. सुबह हमें मुंबई चले जाना है हमेशा के लिए. वहां हमारा बड़ा बेटा वत्सल नौकरी करता है. वही हमें अपने साथ लिए जा रहा है.

अपना शहर छूटने के खयाल से जी न जाने कैसा होने लगा है. नया शहर, नए लोग, न जाने हम मुंबई के माहौल में ढल पाएंगे या नहीं. मुंबई ही क्या, वत्सल हमें किसी भी शहर में ले जाए, धवल की यादें हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगी.

बेटे की असामयिक मौत ने तो हमें तोड़ा ही, उस की मौत से भी अधिक दुखदायी थीं वे घटनाएं जिन के कारण हमें इस बुढ़ापे में खासी बदनामी और थूथू झेलनी पड़ी. बेटे का प्रेमविवाह इतना महंगा पड़ेगा, हम नहीं जानते थे. हम ही क्या, स्वयं धवल भी नहीं जानता होगा कि उस का प्यार हमें किन मुसीबतों में डालने वाला है.

धवल की आंखें मींचते ही तन्वी अपना यह रूप दिखाएगी, किस ने सोचा था. ?प्यार के इस घृणित रूप को देख कर हम व्यथित हैं. प्यार में बेवफाई और धोखाधड़ी के किस्से तो कई सुने थे पर जबरन गले पड़ी बेटे की प्रेमिका हमें इस तरह सताएगी, यह कल्पना नहीं कर सके.

तन्वी हमें शुरू से ही पसंद नहीं थी. सुंदर तो खैर वह बहुत थी पर उस के चेहरे पर कुंआरियों का सा भोलापन और लुनाई नहीं थी. चेहरा पकापका सा लगता था. यद्यपि मैं ने उस के बारे में ऐसीवैसी कोई बात नहीं सुनी थी पर मेरी अनुभवी निगाहें पहली मुलाकात में ही ताड़ गई थीं कि यह बहता पानी है.

धवल को समझाने में हमें खास मेहनत नहीं करनी पड़ी थी. तन्वी विजातीय थी. आर्थिक दृष्टि से भी उस का परिवार हमारे समकक्ष नहीं था. तन्वी के पिता मामूली से वकील थे. हम ने धवल को ऊंचनीच समझाई तो वह सरलता से मान गया और उस ने तन्वी से संबंध सीमित कर लिए थे.

उस समय तक मामला ज्यादा बढ़ा भी नहीं था. कालेज में ही पढ़ रहे थे वे दोनों. हम ने चैन की सांस ली थी कि चलो, बला टली, मगर बला इतनी आसानी से कहां टलनी थी.

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June 29, 2022 at 10:17AM

जातपांत की बिसात: मिसेज मालती का धर्म कैसे भ्रष्ट हुआ?

अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सचाई को सांप के मुंह में छछूंदर सा न उगलते बन रहा था न निगलते. उस का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे?

मिसेज मालती अग्निहोत्री ने घर आए मेहमानों का मुसकराते हुए स्वागत किया और उन्हें सोफ़े पर बैठने का इशारा करते हुए कहा–

“आइए, बैठिए.” फिर बालबच्चों के हाल चाल पूछे और किचन की ओर देख कर आवाज लगाई- “रवींद्र, जरा चायनाश्ता ले आओ और…” उन की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी की रवींद्र चायनाश्ते की ट्रे ले कर ड्राइंगरूम में प्रकट हो गया.

“अरे वाह, मालतीजी, आप का कुक तो बहुत ही एफ़िशिएंट है. बात पूरी होने के पहले ही चाय ले  आया,” मेहमान महिला ने प्रशंसनीय भाव से रवींद्र की ओर देखते हुए कहा.

“वह क्या है न मैडम, जब आप सोसाइटी में दाखिल हुए थे, तभी गार्ड का फोन आया यह बताने के लिए कि मेहमान आ गए हैं. बस, तभी हम ने चाय चढ़ा दी थी,” खीसें निपोरते हुए रवींद्र ने जवाब दिया और मालतीजी ने मुसकराते हुए उसे किचन में जाने का इशारा कर दिया.

मालतीजी के बड़े से घर में 3 पीढ़ियां एकसाथ रहती थीं. उन के सासससुर, उन के पति और  उन के 2 बच्चे. इस भरेपूरे परिवार को मालतीजी 3 नौकरों की मदद से चलाती थीं और बाकी समय अपने सोशल वर्क को देती थीं. रवींद्र के इलावा घर में 2 नौकरानियां थीं और ये सब उन के विला के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते थे.

रवींद्र की तारीफ उन का हर मेहमान करता था. उन की गृहस्थी की गाड़ी को निर्विघ्न चलाने में उस का बड़ा हाथ था. 10 वर्ष पहले पिता की असमय मौत और घर की आर्थिक स्थिति के जर्जर ढांचे ने उस के हाथ से स्कूल का बस्ता छीन कर कढ़ाईचमचा थमा दिया था.

मालतीजी को आज भी वह दिन याद है जब 12 साल के नन्हे से रवींद्र ने पहली बार उन के घर की घंटी बजाई थी. किचन में कुक को खाना बनाने के बारे में निर्देश देती मालतीजी ने नौकरानी को दरवाज़ा खोलने के लिए कहा था. कुछ देर में नौकरानी ने आ कर बताया था कि-

‘एक बच्चा आप की सहेली की नौकरानी के साथ आया है.’

‘ओहो, मैं तो भूल ही गई,’ वे माथे पर हाथ मार कर बोली थीं और उन्हें एक दिन पहले अपनी सहेली के साथ फोन पर हुई वार्त्ता याद हो आई थी जब उन की सहेली कह रही थी- ‘हैलो मालती, तुझ से कुछ बात करनी थी.’

‘हां बोल न, इतना क्या सोच रही है,’ मालती ने अपनेपन से कहा था.

‘वह मेरी मेड है न, मीरा,’ सहेली बोली.

‘हां, क्या हुआ उसे?’ मालती ने व्यग्रता से पूछा.

‘उसे कुछ नहीं हुआ, उस की बहन के पति का ऐक्सिडैंट में देहांत हो गया.’

‘ओ गौड, यह तो बहुत बुरा हुआ. वैसे कौनकौन हैं उस के परिवार में?’

‘परिवार में तो 12 साल का बेटा, 6 साल की बेटी और वह औरत खुद है. लेकिन कमाने वाला अकेला उस का पति ही था,’ सहेली ने बताया.

‘सो सैड, अब वह क्या करेगी?’ मालती ने संवेदना दर्शाते हुए पूछा था.

‘मैं सोच रही थी कि उसे और उस के बेटे को कहीं काम मिल जाता तो उन की जीवन की गाड़ी चल पड़ती,’ सहेली ने जरा सोच कर कहा.

‘बात तो ठीक है. और औरत तो चलो काम कर लेगी, लेकिन 12 साल का बच्चा भला क्या काम कर सकता है?’

‘वो, तू कह रही थी न, कि तेरा कुक बहुत बूढ़ा हो गया है, जल्दीजल्दी काम नहीं कर पाता लेकिन खाना तुम्हें उसी के हाथ का पसंद है?’ सहेली ने कहा.

‘हां यह तो है, लेकिन इस से बच्चे का क्या लेनादेना?’

‘क्यों न तू इस बच्चे को अपने कुक की मदद के लिए रख ले. धीरेधीरे जब तक वह रिटायर्ड होगा तब तक यह बच्चा उस से काम सीख लेगा.’

‘हां बात तो ठीक है, लेकिन तुझे तो पता है न, मेरे सासससुर जातपांत को कितना महत्त्व देते हैं. उन के रहते हुए तो हम हर किसी को किचन में घुसा नहीं सकते.’

‘उस की तू चिंता मत कर. ये लोग उच्च कोटि के ब्राह्मण हैं. यह परिवार बहुत ईमानदार और सरल है. इसीलिए तो मैं चिंतित हूं कि ब्राह्मण जात हैं ये, जाने कहां मारेमारे फिरेंगे.’

‘तू क्या उन्हें पर्सनली जानती है?’ मालती ने हैरानी से पूछा.

‘हांहां, कई बार मेरी मेड के साथ आते रहे हैं. लड़का भी बड़ा प्यारा बच्चा है. हाथ से दिए बिना किसी चीज को छूता तक नहीं है. उस की गारंटी तो मैं भी दे सकती हूं.’

‘ऐसी बात है, तो फिर ठीक है. तू उसे कल सुबह अपनी मेड के साथ मेरे यहां भेज देना. मैं बात कर लूंगी,’ मालतीजी ने हर तरह से आश्वस्त हो कर कहा.

एक दिन पहले कि ये सब बातें याद आते ही मालतीजी ने बच्चे को अंदर बुलवा लिया. फिर कुक को दी जाने वाली अपनी हिदायतों की लिस्ट खत्म कर के ड्राइंगरूम में सोफ़े पर आ कर बैठ गईं.

कुछ देर में एक सलोना सा भोलाभाला चेहरा उन के सामने आ खड़ा हुआ. साफसुथरे कपड़े और करीने से बने तेल लगे बाल देख कर उन्हें अच्छा लगा. अपनी बड़ीबड़ी आंखों में आश्चर्य और असमंजस के भाव लिए यह लड़का मालतीजी के दिल को भा गया था. उसे पास बुला कर उन्होंने प्यार से पूछा-

‘तुम्हारा नाम क्या है?’

‘रवींद्र, मां रवि बुलाती हैं,’ अपने पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदते हुए वह बोला.

‘खाना खाया?’ मालतीजी ने थोड़ा झुक कर उस की आंखों में झांकने की कोशिश करते पूछा.

‘सुबह चाय पी थी,’ उस ने एक बार नजर उठाई और फिर झुका ली.

‘काका, रवींद्र के लिए नाश्ता लाना,’ उन्होंने किचन की ओर देख कर अपने कुक को आवाज लगाई.

आलू के 2 परांठे और एक गिलास दूध खत्म करने में उसे कुछ ही मिनट लगे. मालतीजी ने उस के सिर पर हाथ फिराते हुए पूछा- ‘हमारे घर में रहोगे?’

‘हां,’ वह शरमा कर बोला. शायद उस की मां ने उसे पहले से सब समझा कर भेजा था.

‘ठीक है,’ मालतीजी ने उठते हुए कहा.

फिर अपने कुक को बुला कर उन्होंने रवींद्र को उस के सुपुर्द किया और उसे छोटेछोटे काम समझाने की हिदायत दे कर वे अपने काम में व्यस्त हो गईं.

उस की साफसफाई की आदत और हंसमुख स्वभाव ने जल्द ही घर में अपनी जगह बना ली. हालांकि शुरूशुरू में वह टमाटरप्याज काटने के अलावा कुछ खास मदद नहीं कर पाता था लेकिन धीरेधीरे वह न केवल घर के हर सदस्य के हिसाब से खाना बनाना सीख गया था बल्कि हर सदस्य के मिजाज को भी बखूबी समझने लगा था.

वक़्त के साथ किचन के काम का सारा भार बूढ़े होते कुक के हाथों से निकल कर जवान होते रवींद्र के कंधों पर आ गया था. अब तो कुक को रिटायर हुए कई साल हो चुके हैं और किचन में रवींद्र का एकछत्र राज है. यह काम वह सालों से अकेले ही बड़े सलीके से संभालता आ रहा है.

रवींद्र को अग्निहोत्री परिवार में आए एक अरसा हो चुका था. अब वह इस घर का सदस्य था. उस के बिना मालतीजी का किचन ऐसा था जैसे सिंदूर बिना सुहागन. 12 साल का मासूम बच्चा अब 22 साल के सजीले नौजवान में तबदील हो चुका था.

एक सुबह मालतीजी ने रवींद्र को बुलाया और उसे बताया कि अगले दिन सारा परिवार उन की बहन की बेटी की शादी में दूसरे शहर जा रहा है. सुबह नाश्ते के बाद सब निकलेंगे और 2 दिन बाद लौटेंगे. घर में वही सब से पुराना और जिम्मेदार व्यक्ति था, इसलिए घर का ध्यान रखना और किसी अनजान व्यक्ति को घर में न आने देना उसी की जिम्मेदारी थी.

इस खबर को सुनते ही रवींद्र के चेहरे पर एक हलकी सी मुसकान दौड़ गई जो मालती को बड़ी बेमौका लगी.  लेकिन अपने व्यस्त कार्यक्रम के चलते उन्होंने इस ओर कोई खास तवज्जुह नहीं दी. रवींद्र महीने में एक बार अपनी मां और बहन से मिलने जाता था, बाकी समय वह वहीं बना रहता था. उस के रहते मालती को कभी घर की चिंता नहीं करनी पड़ी थी.

2 दिनों बाद थकन से चूर अग्निहोत्री परिवार घर वापस लौटा. मालतीजी रवींद्र को चाय बनाने के लिए  कह कर अपने बैडरूम की ओर बढ़ गईं. वे अपने बैड पर बैठी ही थीं की उन की नजर अपने बैड के साइड में पड़े यूज़्ड कंडोम पर पड़ी तो वे ऐसे चौंक पड़ीं जैसे उन्हे सांप दिख गया हो. वे तुरंत बैड से उठ गईं और सिर पकड़ कर पास पड़ी कुरसी पर बैठ गईं. फिर खुद से ही बड़बड़ाईं-

‘ओह, यह क्या चल रहा है हमारे पीठपीछे… बैडरूम की चाबी रवींद्र के ही पास थी और कुछ दिनों से रवींद्र के रंगढंग कुछ बदले से लग रहे थे, तो यह करतूत तो उसी की है लेकिन उस के इतनी जल्दी पर निकल आएंगे, यह तो मैं ने कभी सोचा भी न था.’

फिर उन्होंने नौकरानी को आवाज लगाई और उसे तुरंत बैड की चादर, तकिए बदलने का आदेश दिया. नौकरानी ने सवालिया नजर बैड की साफ चादर पर डाली, फिर अपनी मालकिन पर डाली.

चादर बदलो, देख क्या रही हो.’ वे गुस्से में बोलीं.

फिर उन्होंने सोचा, चादर तो ये बदल देगी, लेकिन उस घटना को कौन बदलेगा जो उन की गैरहाजिरी में वहां घट चुकी थी.

मालती अपनी सासुमां के जितनी दकियानूसी और संकीर्ण विचारों वाली तो नहीं थी लेकिन इस तरह का उन्मुक्त सैक्स उन के संस्कारों के दायरे से भी बाहर था. जो पाप हो चुका है उस का वे क्या करें, समझ नहीं आ रहा था. काश, कंप्यूटर की तरह ज़िंदगी में भी कोई ‘अनडू’ का विकल्प होता.

वे रवींद्र को आवाज लगाने ही वाली थीं कि पूछूं तो सही कि उस की ये सब करने की हिम्मत कैसे हुई? उस ने यह पाप कर के अपने और हमारे कुल की मर्यादा को दांव पर कैसे लगा दिया? और ये बेशर्म लड़की कौन थी? और फिर अगर सब ठीक लगा तो उस की शादी ही करवा देंगी.

लेकिन फिर उन्होंने खुद को रोका और सोचा कि चूंकि यह पाप तो रवींद्र ने किया ही है, इस में तो कोई शक नहीं है, लेकिन यदि यह बात सीधेसीधे उस से पूछी गई, तो वह शायद सच न बताए और चौकन्ना भी हो जाए. ऐसे में बात की जड़ तक पहुंचना और भी मुश्किल हो जाएगा. इस से बेहतर तो यही होगा कि कुछ दिन अनजान बनने का नाटक करो और उसे अगली बार रंगेहाथ पकड़ो.

बस, फिर तो अगले दिन से मालती की तेज नजर रवींद्र के हर कदम पर रहने लगी. वह कब, किस से और क्या बात कर रहा है, ये सब मालती की नज़रों के कैमरे में हर समय कैद होता रहता.

एक दिन मालती अपनी बालकनी में बैठी शाम की चाय का आनंद ले रही थी. रवींद्र नीचे सब्जी लाने गया था. तभी उन की नजर नीचे पार्क में एक लड़की से बात करते हुए रवींद्र पर पड़ी.

उन्होंने तुरंत अपना दूर का चश्मा लगाया और लड़की को पहचानने की कोशिश करने लगीं. फिर लड़की को पहचानते हुए हैरानी से बोलीं-

‘यह तो सोसाइटी में झाड़ू लगाने वाली जमादारिन की बेटी है.’

जमादारिन की खूबसूरत बेटी को सोसाइटी में सभी लोग पहचानते थे लेकिन उस की खूबसूरती की गाज़ उन्हीं के घर पर गिरेगी, यह मालती ने कभी न सोचा था.

फिर उन्होंने खुद ही को समझाया, जरूरी तो नहीं कि यही वह लड़की हो. हो सकता है कोई और लड़की हो जो उन की गैरहाजिरी में उन के घर रवींद्र के साथ सोई थी और रवींद्र इस लड़की से ऐसे ही बातें कर रहा हो.

इंसान की फितरत भी कितनी अजीब है, जो बात उस की पसंद के दायरे से बाहर होती है उसे वह अपनी सोच के दायरे में भी नहीं आने देना चाहता. फिर चाहे वह सारी संभावनाओं सहित उस के सामने ही क्यों न खड़ी हो.

अब रवींद्र के बहकते कदमों का खुलासा तो हो ही चुका था, लेकिन समस्या उस के बहकते कदमों से ज्यादा यह थी कि लड़की कौन है? अगर कहीं वह जमादारिन की लड़की के साथ सोया है और उन का सारा परिवार आज भी उसी के हाथ का बना खाना कहा रहा है, तब उन के उच्च कुल के धर्म का क्या होगा?

क्या उन का धर्म भ्रष्ट हो चुका है? यही सब सोचसोच कर मालती का सिर दर्द से फटने लगा था. अब उन से रुका न गया और उन्होंने ने सारी बात अपने पति को जा बताई और फिलहाल अम्माजी से छिपाने की प्रार्थना की.

मामला संगीन था. दांव पर पैसा या फिर जान नहीं लगी थी. दांव पर लगा था उन का धर्म. उच्च कुलीन ब्राह्मण होने का जो दर्प सारे अग्निहोत्री परिवार के माथे पर दमकता था, वह आज खतरे में था.

अब रवींद्र के कदमों पर दो नहीं चार आंखों का पहरा लग गया था. लेकिन रवींद्र के बाजार जा कर सौदासुल्फ लाने के समय पर कैसे नजर रखी जाए, इस का इलाज अग्निहोत्री दंपती खोज ही रहे थे कि उस की जरूरत ही न पड़ी.

सारे सचझूठ, सारी मानना और अवमाननाओं पर फुलस्टौप लगाता रवींद्र अगले ही दिन उस जमादारिन की बेटी के साथ वरमाला पहने उन के द्वार पर आ खड़ा हुआ.

अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सांप के मुंह में छछूंदर सा इस सचाई को न उगलते बन रहा था न निगलते.

अब मामला पानी की तरह साफ था. रवींद्र को घर से निकालना तो लाजिमी था. लेकिन एक जमादारिन की बेटी के साथ उन के बैड पर सोना और फिर उन्हीं हाथों से उन के परिवार के लिए खाना बनाना, इस पाप का निवारण कैसे होगा…

काश, इस सचाई को भी वे बैड की चादर की तरह बदल पातीं.

उन का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था, लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे? जल्द ही यह बात खुल जाएगी और फिर उन की बिरादरी वाले उन का जीना हराम कर देंगे. बिरादरी में उन का उठनाबैठना बंद कर देंगे. कल को उन के बच्चों के रिश्ते करने में प्रौब्लम  खड़ी करेंगे.

‘ओह, अब हम क्या करें?’ यह सोचसोच कर उन का दिमाग घूम रहा था लेकिन समाधान कहीं दूरदूर तक नज़र नहीं आ रहा था.

क्या यह समस्या सच में रवींद्र की शादी से जुड़ी थी या अग्निहोत्री परिवार की जातपांत की ओछी सोच से?

यह समस्या किसी एक अग्निहोत्री परिवार या किसी एक रवींद्र की नहीं है. यह समस्या है हमारे पढेलिखे समाज के बीच पलती सड़ीगली धार्मिक मान्यताओं की. 21वीं सदी के इस तथाकथित आधुनिक व विकसित समाज की, जो चांद पर पहुंचना तो चाहता है लेकिन जमीनी दलदल से अपने पांव निकालना नहीं चाहता.

यह समस्या जुड़ी है सोकौल्ड स्वर्णों से, जो दलितों के विकास का नारा तो लगा सकते है लेकिन उन को अपने बराबर बिठा नहीं सकते. वे उन्हें उठाना तो चाहते हैं, लेकिन सिर्फ उतना ही जितना स्वर्णों से दबे रहते हुए संभव है.

यह समस्या शुरू होती है हमारी सदियों पुरानी वर्णव्यवस्था से और आ कर रुकती है एक बहुत बड़े प्रश्नचिन्ह पर कि आखिर क्या है दलितों का विकास और क्या मतलब है समानता के अधिकार का? इंसान और इंसान के बीच यह फर्क आखिर कब तक बना रहेगा और क्यों?

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अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सचाई को सांप के मुंह में छछूंदर सा न उगलते बन रहा था न निगलते. उस का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे?

मिसेज मालती अग्निहोत्री ने घर आए मेहमानों का मुसकराते हुए स्वागत किया और उन्हें सोफ़े पर बैठने का इशारा करते हुए कहा–

“आइए, बैठिए.” फिर बालबच्चों के हाल चाल पूछे और किचन की ओर देख कर आवाज लगाई- “रवींद्र, जरा चायनाश्ता ले आओ और…” उन की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी की रवींद्र चायनाश्ते की ट्रे ले कर ड्राइंगरूम में प्रकट हो गया.

“अरे वाह, मालतीजी, आप का कुक तो बहुत ही एफ़िशिएंट है. बात पूरी होने के पहले ही चाय ले  आया,” मेहमान महिला ने प्रशंसनीय भाव से रवींद्र की ओर देखते हुए कहा.

“वह क्या है न मैडम, जब आप सोसाइटी में दाखिल हुए थे, तभी गार्ड का फोन आया यह बताने के लिए कि मेहमान आ गए हैं. बस, तभी हम ने चाय चढ़ा दी थी,” खीसें निपोरते हुए रवींद्र ने जवाब दिया और मालतीजी ने मुसकराते हुए उसे किचन में जाने का इशारा कर दिया.

मालतीजी के बड़े से घर में 3 पीढ़ियां एकसाथ रहती थीं. उन के सासससुर, उन के पति और  उन के 2 बच्चे. इस भरेपूरे परिवार को मालतीजी 3 नौकरों की मदद से चलाती थीं और बाकी समय अपने सोशल वर्क को देती थीं. रवींद्र के इलावा घर में 2 नौकरानियां थीं और ये सब उन के विला के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते थे.

रवींद्र की तारीफ उन का हर मेहमान करता था. उन की गृहस्थी की गाड़ी को निर्विघ्न चलाने में उस का बड़ा हाथ था. 10 वर्ष पहले पिता की असमय मौत और घर की आर्थिक स्थिति के जर्जर ढांचे ने उस के हाथ से स्कूल का बस्ता छीन कर कढ़ाईचमचा थमा दिया था.

मालतीजी को आज भी वह दिन याद है जब 12 साल के नन्हे से रवींद्र ने पहली बार उन के घर की घंटी बजाई थी. किचन में कुक को खाना बनाने के बारे में निर्देश देती मालतीजी ने नौकरानी को दरवाज़ा खोलने के लिए कहा था. कुछ देर में नौकरानी ने आ कर बताया था कि-

‘एक बच्चा आप की सहेली की नौकरानी के साथ आया है.’

‘ओहो, मैं तो भूल ही गई,’ वे माथे पर हाथ मार कर बोली थीं और उन्हें एक दिन पहले अपनी सहेली के साथ फोन पर हुई वार्त्ता याद हो आई थी जब उन की सहेली कह रही थी- ‘हैलो मालती, तुझ से कुछ बात करनी थी.’

‘हां बोल न, इतना क्या सोच रही है,’ मालती ने अपनेपन से कहा था.

‘वह मेरी मेड है न, मीरा,’ सहेली बोली.

‘हां, क्या हुआ उसे?’ मालती ने व्यग्रता से पूछा.

‘उसे कुछ नहीं हुआ, उस की बहन के पति का ऐक्सिडैंट में देहांत हो गया.’

‘ओ गौड, यह तो बहुत बुरा हुआ. वैसे कौनकौन हैं उस के परिवार में?’

‘परिवार में तो 12 साल का बेटा, 6 साल की बेटी और वह औरत खुद है. लेकिन कमाने वाला अकेला उस का पति ही था,’ सहेली ने बताया.

‘सो सैड, अब वह क्या करेगी?’ मालती ने संवेदना दर्शाते हुए पूछा था.

‘मैं सोच रही थी कि उसे और उस के बेटे को कहीं काम मिल जाता तो उन की जीवन की गाड़ी चल पड़ती,’ सहेली ने जरा सोच कर कहा.

‘बात तो ठीक है. और औरत तो चलो काम कर लेगी, लेकिन 12 साल का बच्चा भला क्या काम कर सकता है?’

‘वो, तू कह रही थी न, कि तेरा कुक बहुत बूढ़ा हो गया है, जल्दीजल्दी काम नहीं कर पाता लेकिन खाना तुम्हें उसी के हाथ का पसंद है?’ सहेली ने कहा.

‘हां यह तो है, लेकिन इस से बच्चे का क्या लेनादेना?’

‘क्यों न तू इस बच्चे को अपने कुक की मदद के लिए रख ले. धीरेधीरे जब तक वह रिटायर्ड होगा तब तक यह बच्चा उस से काम सीख लेगा.’

‘हां बात तो ठीक है, लेकिन तुझे तो पता है न, मेरे सासससुर जातपांत को कितना महत्त्व देते हैं. उन के रहते हुए तो हम हर किसी को किचन में घुसा नहीं सकते.’

‘उस की तू चिंता मत कर. ये लोग उच्च कोटि के ब्राह्मण हैं. यह परिवार बहुत ईमानदार और सरल है. इसीलिए तो मैं चिंतित हूं कि ब्राह्मण जात हैं ये, जाने कहां मारेमारे फिरेंगे.’

‘तू क्या उन्हें पर्सनली जानती है?’ मालती ने हैरानी से पूछा.

‘हांहां, कई बार मेरी मेड के साथ आते रहे हैं. लड़का भी बड़ा प्यारा बच्चा है. हाथ से दिए बिना किसी चीज को छूता तक नहीं है. उस की गारंटी तो मैं भी दे सकती हूं.’

‘ऐसी बात है, तो फिर ठीक है. तू उसे कल सुबह अपनी मेड के साथ मेरे यहां भेज देना. मैं बात कर लूंगी,’ मालतीजी ने हर तरह से आश्वस्त हो कर कहा.

एक दिन पहले कि ये सब बातें याद आते ही मालतीजी ने बच्चे को अंदर बुलवा लिया. फिर कुक को दी जाने वाली अपनी हिदायतों की लिस्ट खत्म कर के ड्राइंगरूम में सोफ़े पर आ कर बैठ गईं.

कुछ देर में एक सलोना सा भोलाभाला चेहरा उन के सामने आ खड़ा हुआ. साफसुथरे कपड़े और करीने से बने तेल लगे बाल देख कर उन्हें अच्छा लगा. अपनी बड़ीबड़ी आंखों में आश्चर्य और असमंजस के भाव लिए यह लड़का मालतीजी के दिल को भा गया था. उसे पास बुला कर उन्होंने प्यार से पूछा-

‘तुम्हारा नाम क्या है?’

‘रवींद्र, मां रवि बुलाती हैं,’ अपने पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदते हुए वह बोला.

‘खाना खाया?’ मालतीजी ने थोड़ा झुक कर उस की आंखों में झांकने की कोशिश करते पूछा.

‘सुबह चाय पी थी,’ उस ने एक बार नजर उठाई और फिर झुका ली.

‘काका, रवींद्र के लिए नाश्ता लाना,’ उन्होंने किचन की ओर देख कर अपने कुक को आवाज लगाई.

आलू के 2 परांठे और एक गिलास दूध खत्म करने में उसे कुछ ही मिनट लगे. मालतीजी ने उस के सिर पर हाथ फिराते हुए पूछा- ‘हमारे घर में रहोगे?’

‘हां,’ वह शरमा कर बोला. शायद उस की मां ने उसे पहले से सब समझा कर भेजा था.

‘ठीक है,’ मालतीजी ने उठते हुए कहा.

फिर अपने कुक को बुला कर उन्होंने रवींद्र को उस के सुपुर्द किया और उसे छोटेछोटे काम समझाने की हिदायत दे कर वे अपने काम में व्यस्त हो गईं.

उस की साफसफाई की आदत और हंसमुख स्वभाव ने जल्द ही घर में अपनी जगह बना ली. हालांकि शुरूशुरू में वह टमाटरप्याज काटने के अलावा कुछ खास मदद नहीं कर पाता था लेकिन धीरेधीरे वह न केवल घर के हर सदस्य के हिसाब से खाना बनाना सीख गया था बल्कि हर सदस्य के मिजाज को भी बखूबी समझने लगा था.

वक़्त के साथ किचन के काम का सारा भार बूढ़े होते कुक के हाथों से निकल कर जवान होते रवींद्र के कंधों पर आ गया था. अब तो कुक को रिटायर हुए कई साल हो चुके हैं और किचन में रवींद्र का एकछत्र राज है. यह काम वह सालों से अकेले ही बड़े सलीके से संभालता आ रहा है.

रवींद्र को अग्निहोत्री परिवार में आए एक अरसा हो चुका था. अब वह इस घर का सदस्य था. उस के बिना मालतीजी का किचन ऐसा था जैसे सिंदूर बिना सुहागन. 12 साल का मासूम बच्चा अब 22 साल के सजीले नौजवान में तबदील हो चुका था.

एक सुबह मालतीजी ने रवींद्र को बुलाया और उसे बताया कि अगले दिन सारा परिवार उन की बहन की बेटी की शादी में दूसरे शहर जा रहा है. सुबह नाश्ते के बाद सब निकलेंगे और 2 दिन बाद लौटेंगे. घर में वही सब से पुराना और जिम्मेदार व्यक्ति था, इसलिए घर का ध्यान रखना और किसी अनजान व्यक्ति को घर में न आने देना उसी की जिम्मेदारी थी.

इस खबर को सुनते ही रवींद्र के चेहरे पर एक हलकी सी मुसकान दौड़ गई जो मालती को बड़ी बेमौका लगी.  लेकिन अपने व्यस्त कार्यक्रम के चलते उन्होंने इस ओर कोई खास तवज्जुह नहीं दी. रवींद्र महीने में एक बार अपनी मां और बहन से मिलने जाता था, बाकी समय वह वहीं बना रहता था. उस के रहते मालती को कभी घर की चिंता नहीं करनी पड़ी थी.

2 दिनों बाद थकन से चूर अग्निहोत्री परिवार घर वापस लौटा. मालतीजी रवींद्र को चाय बनाने के लिए  कह कर अपने बैडरूम की ओर बढ़ गईं. वे अपने बैड पर बैठी ही थीं की उन की नजर अपने बैड के साइड में पड़े यूज़्ड कंडोम पर पड़ी तो वे ऐसे चौंक पड़ीं जैसे उन्हे सांप दिख गया हो. वे तुरंत बैड से उठ गईं और सिर पकड़ कर पास पड़ी कुरसी पर बैठ गईं. फिर खुद से ही बड़बड़ाईं-

‘ओह, यह क्या चल रहा है हमारे पीठपीछे… बैडरूम की चाबी रवींद्र के ही पास थी और कुछ दिनों से रवींद्र के रंगढंग कुछ बदले से लग रहे थे, तो यह करतूत तो उसी की है लेकिन उस के इतनी जल्दी पर निकल आएंगे, यह तो मैं ने कभी सोचा भी न था.’

फिर उन्होंने नौकरानी को आवाज लगाई और उसे तुरंत बैड की चादर, तकिए बदलने का आदेश दिया. नौकरानी ने सवालिया नजर बैड की साफ चादर पर डाली, फिर अपनी मालकिन पर डाली.

चादर बदलो, देख क्या रही हो.’ वे गुस्से में बोलीं.

फिर उन्होंने सोचा, चादर तो ये बदल देगी, लेकिन उस घटना को कौन बदलेगा जो उन की गैरहाजिरी में वहां घट चुकी थी.

मालती अपनी सासुमां के जितनी दकियानूसी और संकीर्ण विचारों वाली तो नहीं थी लेकिन इस तरह का उन्मुक्त सैक्स उन के संस्कारों के दायरे से भी बाहर था. जो पाप हो चुका है उस का वे क्या करें, समझ नहीं आ रहा था. काश, कंप्यूटर की तरह ज़िंदगी में भी कोई ‘अनडू’ का विकल्प होता.

वे रवींद्र को आवाज लगाने ही वाली थीं कि पूछूं तो सही कि उस की ये सब करने की हिम्मत कैसे हुई? उस ने यह पाप कर के अपने और हमारे कुल की मर्यादा को दांव पर कैसे लगा दिया? और ये बेशर्म लड़की कौन थी? और फिर अगर सब ठीक लगा तो उस की शादी ही करवा देंगी.

लेकिन फिर उन्होंने खुद को रोका और सोचा कि चूंकि यह पाप तो रवींद्र ने किया ही है, इस में तो कोई शक नहीं है, लेकिन यदि यह बात सीधेसीधे उस से पूछी गई, तो वह शायद सच न बताए और चौकन्ना भी हो जाए. ऐसे में बात की जड़ तक पहुंचना और भी मुश्किल हो जाएगा. इस से बेहतर तो यही होगा कि कुछ दिन अनजान बनने का नाटक करो और उसे अगली बार रंगेहाथ पकड़ो.

बस, फिर तो अगले दिन से मालती की तेज नजर रवींद्र के हर कदम पर रहने लगी. वह कब, किस से और क्या बात कर रहा है, ये सब मालती की नज़रों के कैमरे में हर समय कैद होता रहता.

एक दिन मालती अपनी बालकनी में बैठी शाम की चाय का आनंद ले रही थी. रवींद्र नीचे सब्जी लाने गया था. तभी उन की नजर नीचे पार्क में एक लड़की से बात करते हुए रवींद्र पर पड़ी.

उन्होंने तुरंत अपना दूर का चश्मा लगाया और लड़की को पहचानने की कोशिश करने लगीं. फिर लड़की को पहचानते हुए हैरानी से बोलीं-

‘यह तो सोसाइटी में झाड़ू लगाने वाली जमादारिन की बेटी है.’

जमादारिन की खूबसूरत बेटी को सोसाइटी में सभी लोग पहचानते थे लेकिन उस की खूबसूरती की गाज़ उन्हीं के घर पर गिरेगी, यह मालती ने कभी न सोचा था.

फिर उन्होंने खुद ही को समझाया, जरूरी तो नहीं कि यही वह लड़की हो. हो सकता है कोई और लड़की हो जो उन की गैरहाजिरी में उन के घर रवींद्र के साथ सोई थी और रवींद्र इस लड़की से ऐसे ही बातें कर रहा हो.

इंसान की फितरत भी कितनी अजीब है, जो बात उस की पसंद के दायरे से बाहर होती है उसे वह अपनी सोच के दायरे में भी नहीं आने देना चाहता. फिर चाहे वह सारी संभावनाओं सहित उस के सामने ही क्यों न खड़ी हो.

अब रवींद्र के बहकते कदमों का खुलासा तो हो ही चुका था, लेकिन समस्या उस के बहकते कदमों से ज्यादा यह थी कि लड़की कौन है? अगर कहीं वह जमादारिन की लड़की के साथ सोया है और उन का सारा परिवार आज भी उसी के हाथ का बना खाना कहा रहा है, तब उन के उच्च कुल के धर्म का क्या होगा?

क्या उन का धर्म भ्रष्ट हो चुका है? यही सब सोचसोच कर मालती का सिर दर्द से फटने लगा था. अब उन से रुका न गया और उन्होंने ने सारी बात अपने पति को जा बताई और फिलहाल अम्माजी से छिपाने की प्रार्थना की.

मामला संगीन था. दांव पर पैसा या फिर जान नहीं लगी थी. दांव पर लगा था उन का धर्म. उच्च कुलीन ब्राह्मण होने का जो दर्प सारे अग्निहोत्री परिवार के माथे पर दमकता था, वह आज खतरे में था.

अब रवींद्र के कदमों पर दो नहीं चार आंखों का पहरा लग गया था. लेकिन रवींद्र के बाजार जा कर सौदासुल्फ लाने के समय पर कैसे नजर रखी जाए, इस का इलाज अग्निहोत्री दंपती खोज ही रहे थे कि उस की जरूरत ही न पड़ी.

सारे सचझूठ, सारी मानना और अवमाननाओं पर फुलस्टौप लगाता रवींद्र अगले ही दिन उस जमादारिन की बेटी के साथ वरमाला पहने उन के द्वार पर आ खड़ा हुआ.

अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सांप के मुंह में छछूंदर सा इस सचाई को न उगलते बन रहा था न निगलते.

अब मामला पानी की तरह साफ था. रवींद्र को घर से निकालना तो लाजिमी था. लेकिन एक जमादारिन की बेटी के साथ उन के बैड पर सोना और फिर उन्हीं हाथों से उन के परिवार के लिए खाना बनाना, इस पाप का निवारण कैसे होगा…

काश, इस सचाई को भी वे बैड की चादर की तरह बदल पातीं.

उन का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था, लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे? जल्द ही यह बात खुल जाएगी और फिर उन की बिरादरी वाले उन का जीना हराम कर देंगे. बिरादरी में उन का उठनाबैठना बंद कर देंगे. कल को उन के बच्चों के रिश्ते करने में प्रौब्लम  खड़ी करेंगे.

‘ओह, अब हम क्या करें?’ यह सोचसोच कर उन का दिमाग घूम रहा था लेकिन समाधान कहीं दूरदूर तक नज़र नहीं आ रहा था.

क्या यह समस्या सच में रवींद्र की शादी से जुड़ी थी या अग्निहोत्री परिवार की जातपांत की ओछी सोच से?

यह समस्या किसी एक अग्निहोत्री परिवार या किसी एक रवींद्र की नहीं है. यह समस्या है हमारे पढेलिखे समाज के बीच पलती सड़ीगली धार्मिक मान्यताओं की. 21वीं सदी के इस तथाकथित आधुनिक व विकसित समाज की, जो चांद पर पहुंचना तो चाहता है लेकिन जमीनी दलदल से अपने पांव निकालना नहीं चाहता.

यह समस्या जुड़ी है सोकौल्ड स्वर्णों से, जो दलितों के विकास का नारा तो लगा सकते है लेकिन उन को अपने बराबर बिठा नहीं सकते. वे उन्हें उठाना तो चाहते हैं, लेकिन सिर्फ उतना ही जितना स्वर्णों से दबे रहते हुए संभव है.

यह समस्या शुरू होती है हमारी सदियों पुरानी वर्णव्यवस्था से और आ कर रुकती है एक बहुत बड़े प्रश्नचिन्ह पर कि आखिर क्या है दलितों का विकास और क्या मतलब है समानता के अधिकार का? इंसान और इंसान के बीच यह फर्क आखिर कब तक बना रहेगा और क्यों?

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June 29, 2022 at 10:00AM

सूर्यकिरण: एक शर्त पर की थी मीना ने नितिश से शादी

मीना और नितीश की गृहस्थी में अचानक तूफान आ गया था. दोनों के विवाह को मात्र 1 साल हुआ था. आधुनिक जीवन की जरूरतें पूरी करते हुए दोनों 45 वसंत देख चुके थे. पहले उच्चशिक्षा प्राप्त करने की धुन, फिर ऊंची नौकरी और फिर गुणदोषों की परख व मूल्यांकन करने के फेर में एक के बाद एक प्रस्तावों को ठुकराने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वह रुकने का नाम ही नहीं लेता था.

मीना के मातापिता जो पहले अपनी मेधावी बेटी की उपलब्धियों का बखान करते नहीं थकते थे. अब अचानक चिंताग्रस्त हो उठे थे.

बड़ी मुश्किल से गुणदोषों, सामाजिक स्तर आदि का मिलान कर के कुछ नवयुवकों को उन्होंने मीना से मिलने को तैयार भी कर लिया था, पर मीना पर तो एक दूसरी ही धुन सवार थी.मीना छूटते ही अजीब सा प्रश्न पूछ बैठती थी, ‘‘आप को बच्चे पसंद हैं या नहीं?’’

ज्यादातर भावी वर, मीना की आशा के विपरीत बच्चों को पसंद तो करते ही थे, अपने परिवार के लिए उन का होना जरूरी भी मानते थे. मगर यही स्वीकारोक्ति मीना को भड़काने के लिए काफी होती थी और संबंध बनने से पहले ही उस के पूर्वाग्रहों की भेंट चढ़ जाता था.

नितीश से अपनी पहली मुलाकात उसे आज भी अच्छी तरह याद हैं. चुस्तदुरुस्त और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले नितीश को देखते ही वह प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी. पर उच्चशिक्षा और ऊंची नौकरी ने उस के आत्मविश्वास को गर्व की कगार तक पहुंचा दिया था. वैसे भी वह नारी अधिकारों के प्रति बेहद सजग थी. छुईमुई सी बनी रहने वाली युवतियों से उसे बड़ी कोफ्त होती थी. इसलिए नितीश को देखते ही उस ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी.

‘‘आशा है पत्रों के माध्यम से आप को मेरे बारे में पूरी जानकारी मिल गई होगी?’’ मीना अपने खास अंदाज में बोली थी.

‘‘जी, हां,’’ नितीश उसे ऊपर से नीचे तक निहारते हुए बोला था.

मीना मन ही मन भुनभुना रही थी कि ऐसे घूर रहा है मानो कभी लड़की नहीं देखी हो, पर मुंह से कुछ नहीं बोली थी.

‘‘आप अपने संबंध में कुछ और बताना चाहती है? मौन अंतत: नितीश ने ही तोड़ा था.

‘‘हां, क्यों नहीं. शायद आप जानना चाहें कि मैं ने अब तक विवाह क्यों नहीं किया?’’

‘‘जी हां, अवश्य.’’

‘‘तो सुनिए, मेरे कंधों पर न तो पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ था और न ही कोई अन्य मजबूरी पर अपना भविष्य बनाने के लिए कड़ा परिश्रम किया है मैं ने.’’

‘‘जी हां, सब समझ गया मैं. आप अपने मातापिता की इकलौती संतान हैं. पिता जानेमाने व्यापारी हैं, फिर पारिवारिक समस्याओं का तो प्रश्न ही नहीं उठता. पर मैं इतना खुशहाल नहीं रहा. पिता की लंबी बीमारी के कारण छोटे भाई और बहन के पालनपोषण, पढ़ाईलिखाई, विवाह आदि के बीच इतना समय ही नहीं मिला कि अपने बारे में सोच सकूं.’’

‘‘चलिए जब आप ने स्वयं को मानसिक रूप से विवाह के लिए तैयार कर ही लिया है, तो आप ने यह भी सोच लिया होगा कि आप अपनी भावी पत्नी में किन गुणों को देखना चाहेंगे.’’

‘‘किसी विशेष गुण की चाह नहीं है मुझे. हां, ऐसी पत्नी की चाह जरूर है जो मुझे मेरे सभी गुणोंअवगुणों के साथ अपना सके,’’ नितीश भोलेपन से मुसकराया तो मीना देखती ही रह गई थी. कुछ ऐसा ही व्यक्ति उस के कल्पनालोक में भी था.

‘‘आप के विचार जान कर खुशी हुई पर आप को नहीं लगता कि जीवन साथ बिताने का निर्णय लेने से पहले कुछ और विषयों पर विस्तार से बात करना जरूरी है?’’ मीना कुछ संकुचित स्वर में बोली.

‘‘मैं हर विषय पर विस्तार से बात करने को तैयार हूं. पूछिए क्या जानना चाहती हैं आप?’’

‘‘हम दोनों ने सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ा परिश्रम किया है, पर जब 2 सफल व्यक्ति एक ही छत के नीचे रहें तो कई अप्रत्याशित समस्याएं सामने आ सकती है.’’

‘‘शायद.’’

‘‘शायद नहीं, वास्तविकता यही है,’’ मीना झुंझला गई थी.

‘‘मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई समस्या आ सकती है जिसे हम दोनों मिल कर सुलझा न सकें.’’

‘‘सुन कर अच्छा लगा, पर विवाह के बाद घर का काम कौन करेगा?’’

‘‘हम दोनों मिल कर करेंगे. मेरा दृढ़ विश्वास है कि विवाह नाम की संस्था में पतिपत्नी को समान अधिकार मिलने चाहिए,’’ नितीश ने तत्परता से उत्तर दिया.

‘‘और बच्चे?’’

‘‘बच्चे? कौन से बच्चे?’’

‘‘बनिए मत, बच्चों की जिम्मेदारी कौन संभालेगा?’’ ‘‘इस संबंध में तो कभी सोचा ही नहीं मैं ने.’’

‘‘तो अब सोच लीजिए. शतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह छिपाने से तो समस्या हल नहीं हो जाएगी.’’

‘‘मैं बहस के लिए तैयार हूं महोदया,’’ नितीश नाटकीय अंदाज में बोल कर हंस पड़ा.

‘‘तो सुनिए मुझे बच्चे बिलकुल पसंद नहीं हैं या यों कहिए कि मैं बच्चों से नफरत करती हूं.’’

‘‘क्या कह रही हैं आप? उन भोलभाले मासूमों ने आप का क्या बिगाड़ा है.’’

‘‘इन मासूमों की भोली सूरत पर न जाइए. ये मातापिता के जीवन को कुछ इस तरह

जकड़ लेते हैं कि उन्हें जीवन की हर अच्छी चीज को त्याग देना पड़ता है.’’

‘‘मैं आप से सहमत हूं पर फिर भी लोग संतान की कामना करते हैं,’’ नितीश ने तर्क दिया.

‘‘करते होंगे, पर मुझे नहीं लगता कि मैं अपनी नौकरी के साथ आप के बच्चों के पालनपोषण का भार उठा सकूं. मुझे तो उन के नाम से ही झुरझुरी आने लगती है.’’

‘‘आप बोलती रहिए आप की बातों से मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही है.’’

‘‘जरा सोचिए, दोगुनी कमाई और 2 सफल व्यक्ति साथ रहें तो जीवन में आनंद ही आनंद है, पर मैं ने अपने कई मित्रों को बच्चों के चक्कर में रोतेबिलखते देखा है. अच्छा क्या आप बता सकते हैं कि केवल मानव शिशु ही क्यों रोते हैं? मैं ने जानवर या चिडि़या के बच्चों को कभी रोते नहीं देखा,’’ मीना ने अपनी बात समाप्त की.

‘‘आप ठीक कहती हैं. मैं आप से पूर्णतया सहमत हूं, पर परिवार में बच्चे की जगह कोई तोता या कुत्ता नहीं ले सकता.’’

‘‘तो फिर इस समस्या को कैसे सुलझाएंगे आप?’’

‘‘मैं एक समय में एक समस्या सुलझाने में विश्वास करता हूं. पहली समस्या विवाह करने की है. फैसला यह करना है कि हम दोनों एक ही छत के नीचे साथ रह सकते हैं या नहीं. बच्चे जब आएंगे तब देखा जाएगा. अभी से इस झमेले में पड़ने की क्या जरूरत है?’’ नितीश गंभीर स्वर में बोला.

‘‘पर मेरे लिए यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है. मैं किसी भी कीमत पर अपने भविष्य से समझौता नहीं कर सकती. नारीजीवन की सार्थकता केवल मां बनने में है, मैं ऐसा नहीं मानती.’’

‘‘मेरे लिए कोई समस्या नहीं है. अब वह समय तो रहा नहीं जब बच्चे बुढ़ापे की लाठी होते थे. इसलिए यदि आप शादी के बाद परिवार की वृद्धि में विश्वास नहीं करतीं तो मुझे कोई समस्या नहीं है,’’ नितीश ने मानो फैसला सुना दिया.

मीना कुछ देर मौन रही. कोई उस की सारी शर्तों को मान कर उस से विवाह की स्वीकृति देगा ऐसा तो उस ने कभी सोचा भी नहीं था. फिर भी मन में ऊहापोह की स्थिति थी. नितीश सचमुच ऐसा ही है या केवल दिखावा कर रहा है और विवाह के बाद उस का कोई दूसरा ही रूप सामने आएगा.

मगर अनिर्णय की स्थिति अधिक देर तक नहीं रही. सच तो यह था कि उस के विवाह को ले कर घर में पसरा तनाव सारी सीमाएं लांघ गया था. अपने लिए न सही पर मातापिता की खुशी के लिए वह शादी करने को तैयार थी.

मीना की मां ममता तथा पिता प्रकाश बड़ी बेचैनी से मीना और नितीश के फैसले की प्रतीक्षा कर रहे थे. नितीश के मातापिता भी यही चाहते थे कि किसी तरह वह शादी के लिए हां कर दे तो वे चैन की सांस लें.

जैसे ही नितीश और मीना ने विवाह के लिए सहमति जताई तो घर में मानो नई जान पड़ गई. ममता तो मीना के विवाह की आशा ही त्याग चुकी थीं. उन्हें पहले तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ और जब हुआ तो वे फफक उठीं. ‘‘ये तो खुशी के आंसू है,’’ ममता झट आंसू पोंछ कर अतिथिसत्कार में जुट गई थीं.

दोनों ही पक्ष जल्द शादी के इच्छुक थे. पहले ही इतनी देर हो चुकी थी. अब 1 दिन की देरी भी उन के लिए अंसहनीय थी.

हफ्ते भर के अंदर ही शादी संपन्न हो गई. शादी के बाद मीना और नितीश जिस आनंदमय स्थिति में थे वैसा आमतौर पर किस्सेकहानियों में होता होगा. मधुयामिनी से लौटी मीना के चेहरे पर अनोखी चमक देख कर उस के मातापिता भी पुलकित हो उठे थे.

मगर जीवन सदा सीधी राह पर ही तो नहीं चला करता. अचानक मीना की सेहत बिगड़ने लगी. वह बुझी सी रहने लगी. दूसरों को भी प्रेरित करने वाली ऊर्जा मानो खो सी हो गई थी.

तबीयत सुधरते न देख नितीश उसे डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर ने जब नए मेहमान के आने का शुभ समाचार सुनाया तो मीना का व्यवहार सर्वथा अप्रत्याशित था. वह अपनी सुधबुध खो बैठी. डाक्टर बड़े प्रयत्न से उसे होश में लाईं तो चीखचिल्ला कर मीना ने पूरा नर्सिंगहोम सिर पर उठा लिया. आसपास के लोग डाक्टर रमोला के कक्ष की ओर कुछ इस तरह दौड़ आए मानो कोई अनहोनी घट गईर् हो.

‘‘इस तरह संयम खोने से कोई भी समस्या हल नहीं होगी मीनाजी. मैं ने तो सोचा था कि आप यह शुभ समाचार सुन कर फूली नहीं समाएंगी. खुद को संभालिए. मैं ने ऐसे व्यवहार की आशा तो सपने में भी नहीं की थी. डाक्टर रमोला मीना को समझाने का प्रयत्न कर रही थीं. मगर मीना तो एक ही रट लगाए थी कि वह किसी भी कीमत पर इस अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाना चाहती थी.’’

‘‘माफ कीजिए, मैं आप को इस आयु में गर्भपात की सलाह नहीं दूंगी.’’

‘‘मैं आप की सलाह नहीं मांग रही…बहुत नम्रता से कहूं तो अनुरोध कर रही हूं. आप को दोगुनी या तिगुनी फीस भी देने को तैयार हूं.’’

‘‘माफ कीजिए, मैं किसी कीमत पर यह काम कभी न करूंगी और न ही आप को गर्भपात करवाने की सलाह दूंगी.’’

‘‘आप क्या समझती हैं कि शहर में और कोई डाक्टर नहीं है? चलो कहीं और चलते हैं,’’ मीना बड़े तैश में नितीश के साथ डाक्टर रमोला के कक्ष से बाहर निकल गई.

‘‘मेरे विचार से पहले घर चलते है. सोचसमझ कर फैसला करेंगे कि क्या और कैसे करना है? किस डाक्टर के पास जाना है,’’ कार में बैठते ही नितीश ने सुझाव दिया.

‘‘मैं सब समझती हूं. तुम सब की मिलीभगत है. तुम चाहते ही नहीं कि मैं इस मुसीबत से छुटकारा पा सकूं.’’

‘‘क्या कह रही हो मीना? लगता है 1 साल बाद भी तुम मुझे समझ नहीं सकीं. मुझे तुम्हारे स्वास्थ्य की चिंता है. मैं ने तुम्हारे और अपने मातापिता को सूचित कर दिया है. कोई फैसला लेने से पहले सलाह आवश्यक है.’’

‘‘किस से पूछ कर सूचित किया तुम ने? मुझे तो लगता है कि डाक्टर रमोला के कान भी तुम ने ही भरे थे. सब पुरुष एकजैसे होते हैं. साफ क्यों नहीं कहते कि तुम मेरी ग्रोथ से जलते हो. इसीलिए राह में रोड़े अटका रहे हो,’’ मीना एक ही सांस में बोल गई.

मीना का रोनाधोना न जाने कब तक चलता पर तभी उस की मां ममता का फोन आ गया. उन्होंने सख्त हिदायत दी कि वे पहली गाड़ी से पहुंच रही हैं. तब तक धैर्य से काम लो.

मीना छटपटा कर रह गई. वह समझ गई कि इस मुसीबत से निकल पाना आसान नहीं होगा.

दूसरे दिन सवेरे तक घर में मेहमानों की भीड़ लग गई थी. सब ने एकमत से घोषणा कर दी कि कुदरत के इस वरदान को अभिशाप में बदलने का मीना  को कोई अधिकार नहीं.

मीना मनमसोस कर रह गई. फिर भी उस ने निर्णय किया कि अवसर मिलते ही वह इस मुसीबत से छुटकारा अवश्य पा लेगी.

लाख चाहने पर भी मीना को अवसर नहीं मिल रहा था. उस के तथा नितीश के मातापिता एक पल के लिए भी उसे अकेला नहीं छोड़ते थे.

उस की मां ममता ने तो बच्चे को पालने का भार अपने कंधों पर लेने की घोषणा भी कर दी थी. फिर भला नितीश की मां कब पीछे रहने वाली थीं. उन्होंने भी अपने सहयोग का आश्वासन दे डाला था.

अब मीना बेचैनी से उस पल का इंतजार कर रही थी जब बच्चे के जन्म के साथ ही उसे इस शारीरिक तथा मानसिक यातना से छुटकारा मिलेगा. वह अकसर नितीश से परिहास करती कि नारी के साथ तो कुदरत ने भी पक्षपात किया है. तभी तो सारी असुविधाएं नारी के ही हिस्से आई हैं.

समय आने पर बच्चे का जन्म हुआ. सब कुछ ठीकठाक निबट गया तो सब ने राहत की सांस ली.

बच्चे को गोद में लेते हुए ममता तो रो ही पड़ी, ‘‘आज 35-36 साल बाद घर में बच्चे की किलकारियां गूजेंगी. कुदरत इतनी प्रसन्नता देगी, मैं ने तो इस की कल्पना भी नहीं की थी,’’ वे भरे गले से बोलीं.

‘‘यह तो बिलकुल अपने दादाजी पर गया है. वैसे तीखे नैननक्श, वैसा ही रोबीला चेहरा. तुम लोगों ने इस का नाम क्या सोचा है? नितीश की मां बच्चे को दुलारते हुए बोलीं.

‘‘आप लोग ही पालोगे इसे, नाम भी आप ही सोच लेना,’’ नितीश ने शिशु को गोद में ले कर ध्यान से देखा.

मीना कुतूहल से सारा दृश्य देख रही थी. वह बिस्तर पर बैठी थी. नितीश ने बच्चा उस के हाथों में दे दिया.

मीना को लगा मानो पूरे शरीर में बिजली दौड़ गईर् हो. उस ने बच्चे की बंद आंखों पर उंगलियां फेरी, छोटेछोटे हाथों की उंगलियां खोलने का प्रयत्न किया और नन्हे से तलवों को प्यार से सहलाया.

मीना को पहली बार आभास हुआ कि वह इस नन्ही सी जान को स्वयं से दूर करने की बात सोच भी नहीं सकती. उस ने शिशु को कलेजे से लगा लिया. और फिर उस कोमल, मीठे स्पर्शसुख में भीगती चली गई जिसे शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता था. दूर खड़ा नितीश मीना के चेहरे के बदलते भावों को देख कर ही सब कुछ समझ गया था जैसे दूर क्षितिज से पहली सूर्यकिरण अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हो.

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मीना और नितीश की गृहस्थी में अचानक तूफान आ गया था. दोनों के विवाह को मात्र 1 साल हुआ था. आधुनिक जीवन की जरूरतें पूरी करते हुए दोनों 45 वसंत देख चुके थे. पहले उच्चशिक्षा प्राप्त करने की धुन, फिर ऊंची नौकरी और फिर गुणदोषों की परख व मूल्यांकन करने के फेर में एक के बाद एक प्रस्तावों को ठुकराने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वह रुकने का नाम ही नहीं लेता था.

मीना के मातापिता जो पहले अपनी मेधावी बेटी की उपलब्धियों का बखान करते नहीं थकते थे. अब अचानक चिंताग्रस्त हो उठे थे.

बड़ी मुश्किल से गुणदोषों, सामाजिक स्तर आदि का मिलान कर के कुछ नवयुवकों को उन्होंने मीना से मिलने को तैयार भी कर लिया था, पर मीना पर तो एक दूसरी ही धुन सवार थी.मीना छूटते ही अजीब सा प्रश्न पूछ बैठती थी, ‘‘आप को बच्चे पसंद हैं या नहीं?’’

ज्यादातर भावी वर, मीना की आशा के विपरीत बच्चों को पसंद तो करते ही थे, अपने परिवार के लिए उन का होना जरूरी भी मानते थे. मगर यही स्वीकारोक्ति मीना को भड़काने के लिए काफी होती थी और संबंध बनने से पहले ही उस के पूर्वाग्रहों की भेंट चढ़ जाता था.

नितीश से अपनी पहली मुलाकात उसे आज भी अच्छी तरह याद हैं. चुस्तदुरुस्त और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले नितीश को देखते ही वह प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी. पर उच्चशिक्षा और ऊंची नौकरी ने उस के आत्मविश्वास को गर्व की कगार तक पहुंचा दिया था. वैसे भी वह नारी अधिकारों के प्रति बेहद सजग थी. छुईमुई सी बनी रहने वाली युवतियों से उसे बड़ी कोफ्त होती थी. इसलिए नितीश को देखते ही उस ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी.

‘‘आशा है पत्रों के माध्यम से आप को मेरे बारे में पूरी जानकारी मिल गई होगी?’’ मीना अपने खास अंदाज में बोली थी.

‘‘जी, हां,’’ नितीश उसे ऊपर से नीचे तक निहारते हुए बोला था.

मीना मन ही मन भुनभुना रही थी कि ऐसे घूर रहा है मानो कभी लड़की नहीं देखी हो, पर मुंह से कुछ नहीं बोली थी.

‘‘आप अपने संबंध में कुछ और बताना चाहती है? मौन अंतत: नितीश ने ही तोड़ा था.

‘‘हां, क्यों नहीं. शायद आप जानना चाहें कि मैं ने अब तक विवाह क्यों नहीं किया?’’

‘‘जी हां, अवश्य.’’

‘‘तो सुनिए, मेरे कंधों पर न तो पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ था और न ही कोई अन्य मजबूरी पर अपना भविष्य बनाने के लिए कड़ा परिश्रम किया है मैं ने.’’

‘‘जी हां, सब समझ गया मैं. आप अपने मातापिता की इकलौती संतान हैं. पिता जानेमाने व्यापारी हैं, फिर पारिवारिक समस्याओं का तो प्रश्न ही नहीं उठता. पर मैं इतना खुशहाल नहीं रहा. पिता की लंबी बीमारी के कारण छोटे भाई और बहन के पालनपोषण, पढ़ाईलिखाई, विवाह आदि के बीच इतना समय ही नहीं मिला कि अपने बारे में सोच सकूं.’’

‘‘चलिए जब आप ने स्वयं को मानसिक रूप से विवाह के लिए तैयार कर ही लिया है, तो आप ने यह भी सोच लिया होगा कि आप अपनी भावी पत्नी में किन गुणों को देखना चाहेंगे.’’

‘‘किसी विशेष गुण की चाह नहीं है मुझे. हां, ऐसी पत्नी की चाह जरूर है जो मुझे मेरे सभी गुणोंअवगुणों के साथ अपना सके,’’ नितीश भोलेपन से मुसकराया तो मीना देखती ही रह गई थी. कुछ ऐसा ही व्यक्ति उस के कल्पनालोक में भी था.

‘‘आप के विचार जान कर खुशी हुई पर आप को नहीं लगता कि जीवन साथ बिताने का निर्णय लेने से पहले कुछ और विषयों पर विस्तार से बात करना जरूरी है?’’ मीना कुछ संकुचित स्वर में बोली.

‘‘मैं हर विषय पर विस्तार से बात करने को तैयार हूं. पूछिए क्या जानना चाहती हैं आप?’’

‘‘हम दोनों ने सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ा परिश्रम किया है, पर जब 2 सफल व्यक्ति एक ही छत के नीचे रहें तो कई अप्रत्याशित समस्याएं सामने आ सकती है.’’

‘‘शायद.’’

‘‘शायद नहीं, वास्तविकता यही है,’’ मीना झुंझला गई थी.

‘‘मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई समस्या आ सकती है जिसे हम दोनों मिल कर सुलझा न सकें.’’

‘‘सुन कर अच्छा लगा, पर विवाह के बाद घर का काम कौन करेगा?’’

‘‘हम दोनों मिल कर करेंगे. मेरा दृढ़ विश्वास है कि विवाह नाम की संस्था में पतिपत्नी को समान अधिकार मिलने चाहिए,’’ नितीश ने तत्परता से उत्तर दिया.

‘‘और बच्चे?’’

‘‘बच्चे? कौन से बच्चे?’’

‘‘बनिए मत, बच्चों की जिम्मेदारी कौन संभालेगा?’’ ‘‘इस संबंध में तो कभी सोचा ही नहीं मैं ने.’’

‘‘तो अब सोच लीजिए. शतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह छिपाने से तो समस्या हल नहीं हो जाएगी.’’

‘‘मैं बहस के लिए तैयार हूं महोदया,’’ नितीश नाटकीय अंदाज में बोल कर हंस पड़ा.

‘‘तो सुनिए मुझे बच्चे बिलकुल पसंद नहीं हैं या यों कहिए कि मैं बच्चों से नफरत करती हूं.’’

‘‘क्या कह रही हैं आप? उन भोलभाले मासूमों ने आप का क्या बिगाड़ा है.’’

‘‘इन मासूमों की भोली सूरत पर न जाइए. ये मातापिता के जीवन को कुछ इस तरह

जकड़ लेते हैं कि उन्हें जीवन की हर अच्छी चीज को त्याग देना पड़ता है.’’

‘‘मैं आप से सहमत हूं पर फिर भी लोग संतान की कामना करते हैं,’’ नितीश ने तर्क दिया.

‘‘करते होंगे, पर मुझे नहीं लगता कि मैं अपनी नौकरी के साथ आप के बच्चों के पालनपोषण का भार उठा सकूं. मुझे तो उन के नाम से ही झुरझुरी आने लगती है.’’

‘‘आप बोलती रहिए आप की बातों से मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही है.’’

‘‘जरा सोचिए, दोगुनी कमाई और 2 सफल व्यक्ति साथ रहें तो जीवन में आनंद ही आनंद है, पर मैं ने अपने कई मित्रों को बच्चों के चक्कर में रोतेबिलखते देखा है. अच्छा क्या आप बता सकते हैं कि केवल मानव शिशु ही क्यों रोते हैं? मैं ने जानवर या चिडि़या के बच्चों को कभी रोते नहीं देखा,’’ मीना ने अपनी बात समाप्त की.

‘‘आप ठीक कहती हैं. मैं आप से पूर्णतया सहमत हूं, पर परिवार में बच्चे की जगह कोई तोता या कुत्ता नहीं ले सकता.’’

‘‘तो फिर इस समस्या को कैसे सुलझाएंगे आप?’’

‘‘मैं एक समय में एक समस्या सुलझाने में विश्वास करता हूं. पहली समस्या विवाह करने की है. फैसला यह करना है कि हम दोनों एक ही छत के नीचे साथ रह सकते हैं या नहीं. बच्चे जब आएंगे तब देखा जाएगा. अभी से इस झमेले में पड़ने की क्या जरूरत है?’’ नितीश गंभीर स्वर में बोला.

‘‘पर मेरे लिए यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है. मैं किसी भी कीमत पर अपने भविष्य से समझौता नहीं कर सकती. नारीजीवन की सार्थकता केवल मां बनने में है, मैं ऐसा नहीं मानती.’’

‘‘मेरे लिए कोई समस्या नहीं है. अब वह समय तो रहा नहीं जब बच्चे बुढ़ापे की लाठी होते थे. इसलिए यदि आप शादी के बाद परिवार की वृद्धि में विश्वास नहीं करतीं तो मुझे कोई समस्या नहीं है,’’ नितीश ने मानो फैसला सुना दिया.

मीना कुछ देर मौन रही. कोई उस की सारी शर्तों को मान कर उस से विवाह की स्वीकृति देगा ऐसा तो उस ने कभी सोचा भी नहीं था. फिर भी मन में ऊहापोह की स्थिति थी. नितीश सचमुच ऐसा ही है या केवल दिखावा कर रहा है और विवाह के बाद उस का कोई दूसरा ही रूप सामने आएगा.

मगर अनिर्णय की स्थिति अधिक देर तक नहीं रही. सच तो यह था कि उस के विवाह को ले कर घर में पसरा तनाव सारी सीमाएं लांघ गया था. अपने लिए न सही पर मातापिता की खुशी के लिए वह शादी करने को तैयार थी.

मीना की मां ममता तथा पिता प्रकाश बड़ी बेचैनी से मीना और नितीश के फैसले की प्रतीक्षा कर रहे थे. नितीश के मातापिता भी यही चाहते थे कि किसी तरह वह शादी के लिए हां कर दे तो वे चैन की सांस लें.

जैसे ही नितीश और मीना ने विवाह के लिए सहमति जताई तो घर में मानो नई जान पड़ गई. ममता तो मीना के विवाह की आशा ही त्याग चुकी थीं. उन्हें पहले तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ और जब हुआ तो वे फफक उठीं. ‘‘ये तो खुशी के आंसू है,’’ ममता झट आंसू पोंछ कर अतिथिसत्कार में जुट गई थीं.

दोनों ही पक्ष जल्द शादी के इच्छुक थे. पहले ही इतनी देर हो चुकी थी. अब 1 दिन की देरी भी उन के लिए अंसहनीय थी.

हफ्ते भर के अंदर ही शादी संपन्न हो गई. शादी के बाद मीना और नितीश जिस आनंदमय स्थिति में थे वैसा आमतौर पर किस्सेकहानियों में होता होगा. मधुयामिनी से लौटी मीना के चेहरे पर अनोखी चमक देख कर उस के मातापिता भी पुलकित हो उठे थे.

मगर जीवन सदा सीधी राह पर ही तो नहीं चला करता. अचानक मीना की सेहत बिगड़ने लगी. वह बुझी सी रहने लगी. दूसरों को भी प्रेरित करने वाली ऊर्जा मानो खो सी हो गई थी.

तबीयत सुधरते न देख नितीश उसे डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर ने जब नए मेहमान के आने का शुभ समाचार सुनाया तो मीना का व्यवहार सर्वथा अप्रत्याशित था. वह अपनी सुधबुध खो बैठी. डाक्टर बड़े प्रयत्न से उसे होश में लाईं तो चीखचिल्ला कर मीना ने पूरा नर्सिंगहोम सिर पर उठा लिया. आसपास के लोग डाक्टर रमोला के कक्ष की ओर कुछ इस तरह दौड़ आए मानो कोई अनहोनी घट गईर् हो.

‘‘इस तरह संयम खोने से कोई भी समस्या हल नहीं होगी मीनाजी. मैं ने तो सोचा था कि आप यह शुभ समाचार सुन कर फूली नहीं समाएंगी. खुद को संभालिए. मैं ने ऐसे व्यवहार की आशा तो सपने में भी नहीं की थी. डाक्टर रमोला मीना को समझाने का प्रयत्न कर रही थीं. मगर मीना तो एक ही रट लगाए थी कि वह किसी भी कीमत पर इस अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाना चाहती थी.’’

‘‘माफ कीजिए, मैं आप को इस आयु में गर्भपात की सलाह नहीं दूंगी.’’

‘‘मैं आप की सलाह नहीं मांग रही…बहुत नम्रता से कहूं तो अनुरोध कर रही हूं. आप को दोगुनी या तिगुनी फीस भी देने को तैयार हूं.’’

‘‘माफ कीजिए, मैं किसी कीमत पर यह काम कभी न करूंगी और न ही आप को गर्भपात करवाने की सलाह दूंगी.’’

‘‘आप क्या समझती हैं कि शहर में और कोई डाक्टर नहीं है? चलो कहीं और चलते हैं,’’ मीना बड़े तैश में नितीश के साथ डाक्टर रमोला के कक्ष से बाहर निकल गई.

‘‘मेरे विचार से पहले घर चलते है. सोचसमझ कर फैसला करेंगे कि क्या और कैसे करना है? किस डाक्टर के पास जाना है,’’ कार में बैठते ही नितीश ने सुझाव दिया.

‘‘मैं सब समझती हूं. तुम सब की मिलीभगत है. तुम चाहते ही नहीं कि मैं इस मुसीबत से छुटकारा पा सकूं.’’

‘‘क्या कह रही हो मीना? लगता है 1 साल बाद भी तुम मुझे समझ नहीं सकीं. मुझे तुम्हारे स्वास्थ्य की चिंता है. मैं ने तुम्हारे और अपने मातापिता को सूचित कर दिया है. कोई फैसला लेने से पहले सलाह आवश्यक है.’’

‘‘किस से पूछ कर सूचित किया तुम ने? मुझे तो लगता है कि डाक्टर रमोला के कान भी तुम ने ही भरे थे. सब पुरुष एकजैसे होते हैं. साफ क्यों नहीं कहते कि तुम मेरी ग्रोथ से जलते हो. इसीलिए राह में रोड़े अटका रहे हो,’’ मीना एक ही सांस में बोल गई.

मीना का रोनाधोना न जाने कब तक चलता पर तभी उस की मां ममता का फोन आ गया. उन्होंने सख्त हिदायत दी कि वे पहली गाड़ी से पहुंच रही हैं. तब तक धैर्य से काम लो.

मीना छटपटा कर रह गई. वह समझ गई कि इस मुसीबत से निकल पाना आसान नहीं होगा.

दूसरे दिन सवेरे तक घर में मेहमानों की भीड़ लग गई थी. सब ने एकमत से घोषणा कर दी कि कुदरत के इस वरदान को अभिशाप में बदलने का मीना  को कोई अधिकार नहीं.

मीना मनमसोस कर रह गई. फिर भी उस ने निर्णय किया कि अवसर मिलते ही वह इस मुसीबत से छुटकारा अवश्य पा लेगी.

लाख चाहने पर भी मीना को अवसर नहीं मिल रहा था. उस के तथा नितीश के मातापिता एक पल के लिए भी उसे अकेला नहीं छोड़ते थे.

उस की मां ममता ने तो बच्चे को पालने का भार अपने कंधों पर लेने की घोषणा भी कर दी थी. फिर भला नितीश की मां कब पीछे रहने वाली थीं. उन्होंने भी अपने सहयोग का आश्वासन दे डाला था.

अब मीना बेचैनी से उस पल का इंतजार कर रही थी जब बच्चे के जन्म के साथ ही उसे इस शारीरिक तथा मानसिक यातना से छुटकारा मिलेगा. वह अकसर नितीश से परिहास करती कि नारी के साथ तो कुदरत ने भी पक्षपात किया है. तभी तो सारी असुविधाएं नारी के ही हिस्से आई हैं.

समय आने पर बच्चे का जन्म हुआ. सब कुछ ठीकठाक निबट गया तो सब ने राहत की सांस ली.

बच्चे को गोद में लेते हुए ममता तो रो ही पड़ी, ‘‘आज 35-36 साल बाद घर में बच्चे की किलकारियां गूजेंगी. कुदरत इतनी प्रसन्नता देगी, मैं ने तो इस की कल्पना भी नहीं की थी,’’ वे भरे गले से बोलीं.

‘‘यह तो बिलकुल अपने दादाजी पर गया है. वैसे तीखे नैननक्श, वैसा ही रोबीला चेहरा. तुम लोगों ने इस का नाम क्या सोचा है? नितीश की मां बच्चे को दुलारते हुए बोलीं.

‘‘आप लोग ही पालोगे इसे, नाम भी आप ही सोच लेना,’’ नितीश ने शिशु को गोद में ले कर ध्यान से देखा.

मीना कुतूहल से सारा दृश्य देख रही थी. वह बिस्तर पर बैठी थी. नितीश ने बच्चा उस के हाथों में दे दिया.

मीना को लगा मानो पूरे शरीर में बिजली दौड़ गईर् हो. उस ने बच्चे की बंद आंखों पर उंगलियां फेरी, छोटेछोटे हाथों की उंगलियां खोलने का प्रयत्न किया और नन्हे से तलवों को प्यार से सहलाया.

मीना को पहली बार आभास हुआ कि वह इस नन्ही सी जान को स्वयं से दूर करने की बात सोच भी नहीं सकती. उस ने शिशु को कलेजे से लगा लिया. और फिर उस कोमल, मीठे स्पर्शसुख में भीगती चली गई जिसे शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता था. दूर खड़ा नितीश मीना के चेहरे के बदलते भावों को देख कर ही सब कुछ समझ गया था जैसे दूर क्षितिज से पहली सूर्यकिरण अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हो.

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June 29, 2022 at 10:00AM

वो बांझ औरत: शिखा के बच्चे वर्तिका को क्यों चाहने लगे?

‘‘अरे, ऐसे उदास क्यों बैठी हो?’’ उदास बैठी शिखा के कंधे पर हाथ रखते हुए अभय ने पूछा. अपने मनोभावों को छिपाते हुए शिखा हड़बड़ा कर उठी, ‘‘कुछ नहीं, ऐसे ही बैठी थी. आप के लिए चाय बना दूं?’’

शिखा के माथे पर खिंची लकीरों को देख कर अभय को अंदाजा तो हो गया था कि कोई तो विशेष घटना घटित हुई है. अभय ने रसोईघर में शिखा के पास जा कर प्यार से पूछा, ‘‘शिखा, तुम्हारे चेहरे पर उदासी मुझे अच्छी नहीं लगती. क्या बात है, बताओ न?’’ अभय के प्रेमपूर्ण स्पर्श ने जैसे उस के तपते मन पर बर्फ सी रख दी.

शिखा की आंखें पिघल उठीं, ‘‘क्या मैं इस कलंक से मुक्त नहीं हो सकती, अभय?’’

अभय उस के दिल की बात समझ गया. उसे सोफे पर बैठाया. खुद ही दोनों की चाय कप में पलट कर लाया और फिर प्रेम से पूछा, ‘‘क्या हो गया आज जो तुम्हारा दिल इतना भर आया है? क्या घर से फोन आया था?’’ शिखा ने न में सिर हिला दिया. अभय के बारबार पूछने पर आंखों में रुकी नदी बहने ही लगी, ‘‘शाम को तुम्हारे आने से पहले वर्तिका के घर बच्चों के लिए इडलीसांभर ले कर गई थी…’’

‘‘अच्छा, फिर?’’

‘‘वर्तिका भाईसाहब से कह रही थी कि आज सुबह उस मनहूस बांझ का मुंह देख कर गए थे इसलिए सब काम बिगड़ गया,’’ इतना कहते ही वह अभय से लिपट कर रोने लगी.

‘‘इतनी छोटी बात कर दी भाभीजी ने…’’ अभय भी अब थोड़ा गंभीर

हो चला.

आंसू पोंछते हुए वह आगे बोली, ‘‘सुबह औफिस जाने से पहले मैं ने भाईसाहब के प्रोजैक्ट के बारे में पूछा था. वह बड़ा प्रोजैक्ट उन के हाथों से निकल गया.’’

‘‘ओह, तो इस में तुम्हारा क्या दोष?’’ अभय शिखा को सीने से लगा कर शांत करने का प्रयास करने लगा. आज तक वह खुद को और उस को अपशब्दों की आग से बचाने की कोशिश ही करता रहा है.

‘‘अभय, मैं वापस जा रही थी कि वर्तिका की आवाज आई कि कौन है तो बच्चे धीमे से बोले कि अरे, वही पड़ोस वाली मनहूस आंटी थीं. ये शब्द मुझे भीतर तक छलनी कर गए,’’ फिर पुरानी बातें याद कर के शिखा रोतेरोते ही सो गई.

शिखा की शादी हुए 8 सावन बीत चुके थे लेकिन उस की गोद हरी नहीं हुई थी. संतानसुख पाने के लिए उन्होंने कितने ही जतन किए पर कुदरत की इच्छा के सामने दोनों असहाय हो गए. एक तो पारिवारिक दुख से वैसे ही आदमी अधमरा हो जाता है, उस पर इंसान भी इंसान को दर्द देने में पीछे नहीं रहता है. अपने कसबे की छोटी सोच के तानों से बचने के लिए ही वे दोनों इस अनजान शहर में आ कर बस गए थे. यहां हर समय लोग दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दखलंदाजी नहीं करते थे.

निजी जीवन में अधिक ताकझांक से मुक्त वे दोनों शांति से जी रहे थे. लेकिन इस घटना ने उन का यह भ्रम भी तोड़ दिया. जाहिर है, इस घटना के बाद से शिखा ने वर्तिका से बोलचाल बंद कर दी. उस के मन में घृणा के अंकुर फूट चुके थे.

ऐसे ही दिन बीत रहे थे कि कोरोना महामारी ने पूरे विश्व में कुहराम मचा दिया. लौकडाउन की जीवनचर्या ने अवसाद को चरम पर पहुंचा दिया था. चारदीवारी के भीतर घुटन के क्षणों से कुछ मुक्ति मिली ही थी कि कोविड की दूसरी लहर ने महाविनाश शुरू कर दिया. बोरियत से बचने के लिए शिखा औनलाइन हौबी क्लास में अपना समय व्यतीत करती थी. उस समय अभय वर्क फ्रौम होम के कारण घर पर ही रहता था.

एक दिन शाम को घर की घंटी बजी.

‘इस समय कौन होगा…’ यह

सोचते हुए अभय ने दरवाजा खोला. बाहर वर्तिका का पति पारस बहुत अधिक परेशान मुद्रा में खड़ा था, ‘‘क्या हुआ भाईसाहब, सब खैरियत?’’ अभय ने उन की परेशानी की रेखाएं पढ़ते हुए पूछा.

‘‘भाईसाहब, वर्तिका का औक्सीजन लैवल बहुत डाउन हो गया है, उसे अस्पताल में भरती कराने जा रहा हूं.’’

‘‘अरे, जल्दी कीजिए. बताइए मैं भी चलूं?’’ अभय ने अपना मास्क ठीक करते हुए कहा.

पारस ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब घर में दोनों बच्चे अकेले हैं, आप और भाभीजी उन का ध्यान रखिएगा.’’

‘‘जी जरूर, आप निश्ंिचत रहिए. भाभीजी को जल्दी अस्पताल पहुंचाइए.’’

अंदर शिखा दोनों की बातचीत सुन रही थी. पारस के जाते ही उस ने तुरंत अभय को टोका, ‘‘आप भी कितने नासमझ बनते हैं. वर्तिका को कोरोना है. घर के सभी सदस्य संदेह के घेरे में हैं. हम क्या मदद कर सकते हैं?’’

‘‘अरे, ऐसी समस्या आई है, मदद तो करनी ही होगी.’’

‘‘अपने दुनियाभर के रईस रिश्तेदारों का गाना गाते हैं, उन्हीं को बुला लें न.’’

‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो, इस लौकडाउन में कोरोना के डर से कौन रिश्तेदार आ जाएगा?’’

शिखा का तो रत्तीभर मन नहीं था लेकिन अभय की नाराजगी के आगे उस की एक नहीं चली. वह फोन पर पारस से कुशलक्षेम पूछता, वह भी शिखा को बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था.

2 दिन ही बीत पाए थे कि पारस की रिपोर्ट भी कोरोना पौजिटिव आ गई. अब तो स्थिति बहुत खराब हो गई.

कोई रिश्तेदार मदद को आ नहीं पाया. उन के दोनों बच्चों दिव्यांश और सृष्टि की देखरेख की जिम्मेदारी अभय ने ले ली. शिखा को यह सब फूटी आंख नहीं सुहा रहा था. इसी कारण दोनों के बीच तल्खियां भी बढ़ गई थीं.

शिखा जब भी दोनों बच्चों का खाना पैक करती तो उस के घृणास्पद हावभाव से अभय का मन खिन्न हो जाता. वह वर्तिका को निशाना बना कर कुछ न कुछ बड़बड़ाती ही रहती. इसी कारण बच्चों की रिपोर्ट नैगेटिव होने के बावजूद अभय उन को घर नहीं लाया.

अभय ने अगले दिन स्वयं पर नियंत्रण करते हुए शिखा से बच्चों को घर लाने का अनुरोध किया. उस ने उस की मनोदशा समझते हुए प्यार से समझाया, ‘‘देखो शिखा, हमारे कर्म हमारे साथ हैं और दूसरे के उस के साथ. हमें अपने खाते में अच्छी चीजें रखनी हैं या दूसरों की तरह कंकड़पत्थर…’’

शिखा ने अभय की बात का जवाब नहीं दिया. अभय ने मोबाइल में दिव्यांश और सृष्टि का वीडियो दिखाया जिस में वे मम्मीपापा से रोते हुए प्यार जता रहे थे और जल्दी सही होने की मनोकामना कर रहे थे उस वीडियो को देखने के बाद शिखा एकदम चुप हो गई और चुपचाप खाना बनाने लगी. उस रात वह सही से सो नहीं पाई. अंतर्मन के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का आपस में टकराव होता रहा. इसी द्वंद्व में वह कब सो गई, उसे पता ही न चला.

सुबह पता चला कि वर्तिका की सांसें उस का साथ छोड़ चुकी थीं. शिखा को दिल में धक्का सा लगा. वर्तिका और उस के परिवार के सब सदस्यों के चेहरे एकएक कर के सामने आते और उन के अंतस को उद्वेलित कर के चले जाते.

पारस के बड़े भाईसाहब आ चुके थे. दिव्यांश और सृष्टि की रोने की आवाजें बाहर से ही सुनाई देनी शुरू हो गई थीं. शिखा ने बिलखते हुए बच्चों का रुदन देखा तो अंदर तक सिहर गई. 9 साल का दिव्यांश और 4 साल की सृष्टि बिना मां के कैसे रहेंगे… वह सोचती ही रही. काल की क्रूर आंधी यहीं नहीं ठहरी. 2 दिनों बाद ही पारस का भी हृदयगति रुकने से देहांत हो गया. इस खबर के साथ ही शिखा का दिल बैठ गया. अचानक से हुए इस घटनाक्रम में अतीत चलचित्र की भांति उस की आंखों के सामने चलने लगा. वर्तिका और पारस के साथ बिताए स्नेहपूर्ण 3 सालों के दृश्य आंखों के आगे आते और धुआं हो जाते. बस, एक दुर्भावना ने इस सौहार्दपूर्ण संबंध को फीका कर दिया था.

बच्चों को अपने मातापिता से आखिरी समय मिलना भी नसीब न हो सका. संवेदनाओं में डूबी शिखा निकलतेबैठते खिड़की से वर्तिका के घर को ही ताकती रही. शाम को उदासीभरी खामोशी तोड़ते हुए उस ने भरी आंखों से अभय को देखा और कहा, ‘‘अभय, वर्तिका के परिवार पर जो बीती उस ने मेरा मन बहुत झकझोर दिया है.’’

‘‘क्या कर सकते हैं, हम सब बेबस हैं,’’ अभय ने आंखें बंद करते हुए कहा.

‘‘अभय, मैं ने बहुत सोचा तो पाया कि अब उन बच्चों का कोई भविष्य नहीं है.’’

‘‘शिखा, ज्यादा परेशान मत हो. हमारे बस में कुछ नहीं.’’ शिखा चुप हो गई.

‘‘क्या कहना चाहती हो तुम? क्या हम उन दोनों बच्चों को हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकते?’’ अभय यह सुन कर अवाक रह गया. शिखा की तरफ से इतने बड़े फैसले पर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था. कानूनीतौर से हो पाए या नहीं लेकिन मैं उन दोनों बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह से उठाने को तैयार हूं, उन की मां की तरह. आप घर वालों से बात कर के देखिए.

अभय एकटक शिखा का ममताभरा चेहरा देखता ही रह गया. शिखा की आंखों से करुणा का झरना फूट पड़ा था, जो उस के पथरीले विचारों को पूरी तरह भिगो चुका था. आज तो अभय की आंखों में भी पानी की बूंदें उतरने लगीं. समय की गरम आंच में शिखा के मन के सभी बुरे भाव जल चुके थे. अब उस के आंचल में केवल ममता ही ममता भरी थी, जिस ने उसे 2 बच्चों की मां बना दिया था.

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‘‘अरे, ऐसे उदास क्यों बैठी हो?’’ उदास बैठी शिखा के कंधे पर हाथ रखते हुए अभय ने पूछा. अपने मनोभावों को छिपाते हुए शिखा हड़बड़ा कर उठी, ‘‘कुछ नहीं, ऐसे ही बैठी थी. आप के लिए चाय बना दूं?’’

शिखा के माथे पर खिंची लकीरों को देख कर अभय को अंदाजा तो हो गया था कि कोई तो विशेष घटना घटित हुई है. अभय ने रसोईघर में शिखा के पास जा कर प्यार से पूछा, ‘‘शिखा, तुम्हारे चेहरे पर उदासी मुझे अच्छी नहीं लगती. क्या बात है, बताओ न?’’ अभय के प्रेमपूर्ण स्पर्श ने जैसे उस के तपते मन पर बर्फ सी रख दी.

शिखा की आंखें पिघल उठीं, ‘‘क्या मैं इस कलंक से मुक्त नहीं हो सकती, अभय?’’

अभय उस के दिल की बात समझ गया. उसे सोफे पर बैठाया. खुद ही दोनों की चाय कप में पलट कर लाया और फिर प्रेम से पूछा, ‘‘क्या हो गया आज जो तुम्हारा दिल इतना भर आया है? क्या घर से फोन आया था?’’ शिखा ने न में सिर हिला दिया. अभय के बारबार पूछने पर आंखों में रुकी नदी बहने ही लगी, ‘‘शाम को तुम्हारे आने से पहले वर्तिका के घर बच्चों के लिए इडलीसांभर ले कर गई थी…’’

‘‘अच्छा, फिर?’’

‘‘वर्तिका भाईसाहब से कह रही थी कि आज सुबह उस मनहूस बांझ का मुंह देख कर गए थे इसलिए सब काम बिगड़ गया,’’ इतना कहते ही वह अभय से लिपट कर रोने लगी.

‘‘इतनी छोटी बात कर दी भाभीजी ने…’’ अभय भी अब थोड़ा गंभीर

हो चला.

आंसू पोंछते हुए वह आगे बोली, ‘‘सुबह औफिस जाने से पहले मैं ने भाईसाहब के प्रोजैक्ट के बारे में पूछा था. वह बड़ा प्रोजैक्ट उन के हाथों से निकल गया.’’

‘‘ओह, तो इस में तुम्हारा क्या दोष?’’ अभय शिखा को सीने से लगा कर शांत करने का प्रयास करने लगा. आज तक वह खुद को और उस को अपशब्दों की आग से बचाने की कोशिश ही करता रहा है.

‘‘अभय, मैं वापस जा रही थी कि वर्तिका की आवाज आई कि कौन है तो बच्चे धीमे से बोले कि अरे, वही पड़ोस वाली मनहूस आंटी थीं. ये शब्द मुझे भीतर तक छलनी कर गए,’’ फिर पुरानी बातें याद कर के शिखा रोतेरोते ही सो गई.

शिखा की शादी हुए 8 सावन बीत चुके थे लेकिन उस की गोद हरी नहीं हुई थी. संतानसुख पाने के लिए उन्होंने कितने ही जतन किए पर कुदरत की इच्छा के सामने दोनों असहाय हो गए. एक तो पारिवारिक दुख से वैसे ही आदमी अधमरा हो जाता है, उस पर इंसान भी इंसान को दर्द देने में पीछे नहीं रहता है. अपने कसबे की छोटी सोच के तानों से बचने के लिए ही वे दोनों इस अनजान शहर में आ कर बस गए थे. यहां हर समय लोग दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दखलंदाजी नहीं करते थे.

निजी जीवन में अधिक ताकझांक से मुक्त वे दोनों शांति से जी रहे थे. लेकिन इस घटना ने उन का यह भ्रम भी तोड़ दिया. जाहिर है, इस घटना के बाद से शिखा ने वर्तिका से बोलचाल बंद कर दी. उस के मन में घृणा के अंकुर फूट चुके थे.

ऐसे ही दिन बीत रहे थे कि कोरोना महामारी ने पूरे विश्व में कुहराम मचा दिया. लौकडाउन की जीवनचर्या ने अवसाद को चरम पर पहुंचा दिया था. चारदीवारी के भीतर घुटन के क्षणों से कुछ मुक्ति मिली ही थी कि कोविड की दूसरी लहर ने महाविनाश शुरू कर दिया. बोरियत से बचने के लिए शिखा औनलाइन हौबी क्लास में अपना समय व्यतीत करती थी. उस समय अभय वर्क फ्रौम होम के कारण घर पर ही रहता था.

एक दिन शाम को घर की घंटी बजी.

‘इस समय कौन होगा…’ यह

सोचते हुए अभय ने दरवाजा खोला. बाहर वर्तिका का पति पारस बहुत अधिक परेशान मुद्रा में खड़ा था, ‘‘क्या हुआ भाईसाहब, सब खैरियत?’’ अभय ने उन की परेशानी की रेखाएं पढ़ते हुए पूछा.

‘‘भाईसाहब, वर्तिका का औक्सीजन लैवल बहुत डाउन हो गया है, उसे अस्पताल में भरती कराने जा रहा हूं.’’

‘‘अरे, जल्दी कीजिए. बताइए मैं भी चलूं?’’ अभय ने अपना मास्क ठीक करते हुए कहा.

पारस ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब घर में दोनों बच्चे अकेले हैं, आप और भाभीजी उन का ध्यान रखिएगा.’’

‘‘जी जरूर, आप निश्ंिचत रहिए. भाभीजी को जल्दी अस्पताल पहुंचाइए.’’

अंदर शिखा दोनों की बातचीत सुन रही थी. पारस के जाते ही उस ने तुरंत अभय को टोका, ‘‘आप भी कितने नासमझ बनते हैं. वर्तिका को कोरोना है. घर के सभी सदस्य संदेह के घेरे में हैं. हम क्या मदद कर सकते हैं?’’

‘‘अरे, ऐसी समस्या आई है, मदद तो करनी ही होगी.’’

‘‘अपने दुनियाभर के रईस रिश्तेदारों का गाना गाते हैं, उन्हीं को बुला लें न.’’

‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो, इस लौकडाउन में कोरोना के डर से कौन रिश्तेदार आ जाएगा?’’

शिखा का तो रत्तीभर मन नहीं था लेकिन अभय की नाराजगी के आगे उस की एक नहीं चली. वह फोन पर पारस से कुशलक्षेम पूछता, वह भी शिखा को बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था.

2 दिन ही बीत पाए थे कि पारस की रिपोर्ट भी कोरोना पौजिटिव आ गई. अब तो स्थिति बहुत खराब हो गई.

कोई रिश्तेदार मदद को आ नहीं पाया. उन के दोनों बच्चों दिव्यांश और सृष्टि की देखरेख की जिम्मेदारी अभय ने ले ली. शिखा को यह सब फूटी आंख नहीं सुहा रहा था. इसी कारण दोनों के बीच तल्खियां भी बढ़ गई थीं.

शिखा जब भी दोनों बच्चों का खाना पैक करती तो उस के घृणास्पद हावभाव से अभय का मन खिन्न हो जाता. वह वर्तिका को निशाना बना कर कुछ न कुछ बड़बड़ाती ही रहती. इसी कारण बच्चों की रिपोर्ट नैगेटिव होने के बावजूद अभय उन को घर नहीं लाया.

अभय ने अगले दिन स्वयं पर नियंत्रण करते हुए शिखा से बच्चों को घर लाने का अनुरोध किया. उस ने उस की मनोदशा समझते हुए प्यार से समझाया, ‘‘देखो शिखा, हमारे कर्म हमारे साथ हैं और दूसरे के उस के साथ. हमें अपने खाते में अच्छी चीजें रखनी हैं या दूसरों की तरह कंकड़पत्थर…’’

शिखा ने अभय की बात का जवाब नहीं दिया. अभय ने मोबाइल में दिव्यांश और सृष्टि का वीडियो दिखाया जिस में वे मम्मीपापा से रोते हुए प्यार जता रहे थे और जल्दी सही होने की मनोकामना कर रहे थे उस वीडियो को देखने के बाद शिखा एकदम चुप हो गई और चुपचाप खाना बनाने लगी. उस रात वह सही से सो नहीं पाई. अंतर्मन के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का आपस में टकराव होता रहा. इसी द्वंद्व में वह कब सो गई, उसे पता ही न चला.

सुबह पता चला कि वर्तिका की सांसें उस का साथ छोड़ चुकी थीं. शिखा को दिल में धक्का सा लगा. वर्तिका और उस के परिवार के सब सदस्यों के चेहरे एकएक कर के सामने आते और उन के अंतस को उद्वेलित कर के चले जाते.

पारस के बड़े भाईसाहब आ चुके थे. दिव्यांश और सृष्टि की रोने की आवाजें बाहर से ही सुनाई देनी शुरू हो गई थीं. शिखा ने बिलखते हुए बच्चों का रुदन देखा तो अंदर तक सिहर गई. 9 साल का दिव्यांश और 4 साल की सृष्टि बिना मां के कैसे रहेंगे… वह सोचती ही रही. काल की क्रूर आंधी यहीं नहीं ठहरी. 2 दिनों बाद ही पारस का भी हृदयगति रुकने से देहांत हो गया. इस खबर के साथ ही शिखा का दिल बैठ गया. अचानक से हुए इस घटनाक्रम में अतीत चलचित्र की भांति उस की आंखों के सामने चलने लगा. वर्तिका और पारस के साथ बिताए स्नेहपूर्ण 3 सालों के दृश्य आंखों के आगे आते और धुआं हो जाते. बस, एक दुर्भावना ने इस सौहार्दपूर्ण संबंध को फीका कर दिया था.

बच्चों को अपने मातापिता से आखिरी समय मिलना भी नसीब न हो सका. संवेदनाओं में डूबी शिखा निकलतेबैठते खिड़की से वर्तिका के घर को ही ताकती रही. शाम को उदासीभरी खामोशी तोड़ते हुए उस ने भरी आंखों से अभय को देखा और कहा, ‘‘अभय, वर्तिका के परिवार पर जो बीती उस ने मेरा मन बहुत झकझोर दिया है.’’

‘‘क्या कर सकते हैं, हम सब बेबस हैं,’’ अभय ने आंखें बंद करते हुए कहा.

‘‘अभय, मैं ने बहुत सोचा तो पाया कि अब उन बच्चों का कोई भविष्य नहीं है.’’

‘‘शिखा, ज्यादा परेशान मत हो. हमारे बस में कुछ नहीं.’’ शिखा चुप हो गई.

‘‘क्या कहना चाहती हो तुम? क्या हम उन दोनों बच्चों को हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकते?’’ अभय यह सुन कर अवाक रह गया. शिखा की तरफ से इतने बड़े फैसले पर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था. कानूनीतौर से हो पाए या नहीं लेकिन मैं उन दोनों बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह से उठाने को तैयार हूं, उन की मां की तरह. आप घर वालों से बात कर के देखिए.

अभय एकटक शिखा का ममताभरा चेहरा देखता ही रह गया. शिखा की आंखों से करुणा का झरना फूट पड़ा था, जो उस के पथरीले विचारों को पूरी तरह भिगो चुका था. आज तो अभय की आंखों में भी पानी की बूंदें उतरने लगीं. समय की गरम आंच में शिखा के मन के सभी बुरे भाव जल चुके थे. अब उस के आंचल में केवल ममता ही ममता भरी थी, जिस ने उसे 2 बच्चों की मां बना दिया था.

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June 29, 2022 at 09:59AM

Monday, 27 June 2022

ऐनी तुम कहां हो: आखिर ऐनी का क्या संदेश था?

एसएमएस की रिंग आई. न्यू मैसेज था. नादान ऐनी. ऐनी का नंबर कालेज के एक प्रोफैसर के मोबाइल में इसी नाम से सेव था. वे इनबौक्स में गए, देखा, उन्हें लगा, ऐनी के चंद शब्दों को उन्होंने एक ही पल में लाखों बार पढ़ डाला हो. आखिर, संदेश था क्या…

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एसएमएस की रिंग आई. न्यू मैसेज था. नादान ऐनी. ऐनी का नंबर कालेज के एक प्रोफैसर के मोबाइल में इसी नाम से सेव था. वे इनबौक्स में गए, देखा, उन्हें लगा, ऐनी के चंद शब्दों को उन्होंने एक ही पल में लाखों बार पढ़ डाला हो. आखिर, संदेश था क्या…

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June 28, 2022 at 10:20AM