Monday, 30 May 2022

सहारा: उमाकांत के मन से बेटी के लिए कैसे मिटा संशय?

अपनी सहेली के विवाह समारोह में भाग लेने के बाद दीप्ति आलोकजी के साथ रात को 11 बजे वापस लौटी. जिस घर में वह पेइंग गेस्ट की तरह रहती थी उस के गेट के सामने अपने मातापिता को खड़े देख वह जोर से चौंक पड़ी क्योंकि वे दोनों बिना किसी पूर्व सूचना के कानपुर से दिल्ली आए थे.

‘‘मम्मी, पापा, आप दोनों ने आने की खबर क्यों नहीं दी?’’ कार से उतर कर बहुत खुश नजर आ रही दीप्ति अपनी मां गायत्री के गले लग गई.

‘‘हम ने सोचा इस बार अचानक पहुंच कर देखा जाए कि यहां तुम अकेली किस हाल में रह रही हो,’’ अपने पिता उमाकांत की आवाज में नाराजगी और रूखेपन के भावों को पढ़ दीप्ति मन ही मन बेचैन हो उठी.

‘‘मैं बहुत मजे में हूं, पापा,’’ उन की नाराजगी को नजरअंदाज करते हुए दीप्ति उमाकांत के भी गले लग गई.

आलोकजी इन दोनों से पहली बार मिल रहे थे. उन्होंने कार से बाहर आ कर अपना परिचय खुद ही दिया.

‘‘रात के 11 बजे कहां से आ रहे हैं आप दोनों?’’ उन से इस सवाल को पूछते हुए उमाकांत ने अपने होंठों पर नकली मुसकराहट सजा ली.

‘‘दीप्ति की पक्की सहेली अंजु की आज शादी थी. वह इस के औफिस में काम करती है. यह परेशान थी कि शादी से घर अकेली कैसे लौटेगी. मैं ने इस की परेशानी देख कर साथ चलने की जिम्मेदारी ले ली. अकेले लौटने का डर मन से दूर होते ही शादी में शामिल होने की इस की खुशी बढ़ गई. मुझे अच्छा लगा,’’ आलोकजी ने सहज भाव से मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अकेली लड़की के लिए रात को इतनी ज्यादा देर तक घर से बाहर रहना ठीक नहीं होता है, बेटी,’’ दीप्ति को सलाह देते हुए उमाकांत की आवाज में कुछ सख्ती के भाव उभरे.

दीप्ति के कुछ बोलने से पहले आलोकजी ने कहा, ‘‘उमाकांतजी, देर रात के समय दीप्ति को मैं कहीं अकेले आनेजाने नहीं देता हूं. इस मामले में आप दोनों को फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘मांबाप को जवान बेटी की चिंता होती ही है. आजकल किसी पर भी भरोसा करना ठीक नहीं है जनाब. अब मुझे इजाजत दीजिए. गुड नाइट,’’ कुछ रूखे से अंदाज में अपने मन की चिंता व्यक्त करने के बाद उमाकांत मुड़े और गेट की तरफ चलने को तैयार हो गए.

‘‘उमाकांतजी, कल इतवार को आप डिनर हमारे घर कर रहे हैं. मैं ‘न’ बिलकुल नहीं सुनूंगा,’’ आलोकजी ने दोस्ताना अंदाज में उन के कंधे पर हाथ रख कर उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दिया.

‘‘ओके,’’ बिना मुसकराए उन्होंने आलोकजी का निमंत्रण स्वीकार किया.

दीप्ति ने असहज भाव से मुसकराते हुए उन से विदा ली, ‘‘गुड नाइट, सर. मैं सुबह ठीक 9 बजे पहुंच जाऊंगी.’’

‘‘थैंक यू ऐंड गुड नाइट,’’ आलोकजी ने उस से हाथ मिलाने के बाद गायत्री को हाथ जोड़ कर नमस्ते किया और कार में बैठ गए.

उन्हें अपने घर पहुंचने में 5 मिनट लगे. अपनी पत्नी उषा की नजरों से वे अपने मन की बेचैनी छिपा नहीं पाए थे.

उषा की सवालिया नजरों के जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘दीप्ति के मातापिता कानपुर से आए हैं. उन्हें दीप्ति का मेरे साथ इतनी देर से वापस लौटना अच्छा नहीं लगा. मुझे लग रहा है कि वे दोनों इस कारण तरहतरह के सवाल पूछ कर उसे जरूर परेशान करेंगे.’’

‘‘उन्हें अपनी बेटी पर विश्वास करना चाहिए,’’ उषा ने अपनी राय जाहिर की.

‘‘उस के पिता मुझे तेज गुस्से वाले इंसान लगे हैं. मुझे उन का विश्वास जीतने के लिए कुछ और देर उन के साथ रुकना चाहिए था.’’

‘‘हम कल उन्हें घर बुला लेते हैं.’’

‘‘मैं ने दोनों को कल रात डिनर के लिए बुला लिया है.’’

‘‘गुड.’’

‘‘तुम सुबह अनिता और राकेश को भी कल डिनर यहीं करने के लिए फोन कर देना.’’

‘‘ओके.’’

कुछ देर बाद अमेरिका में रह रहे अपने बेटे अमित और बहू वंदना से बात कर के उन का मूड कुछ सही हुआ. वे दोनों अगले महीने घर आ रहे हैं, यह खबर सुन वे खुशी से झूम उठे थे.

कमरदर्द से परेशान उषा नींद की गोली लेने के बाद जल्दी सो गई थी. आलोकजी दीप्ति की फिक्र करते हुए कुछ देर तक करवटें बदलते रहे थे.

सुबह 9 बजे से कुछ मिनट पहले दीप्ति अपनी मां गायत्री के साथ उन के घर पहुंच गई. आलोकजी को इस कारण उस के साथ अकेले में बातें करने का मौका नहीं मिला.

वैसे उन्हें मांबेटी सहज नजर नहीं आ रही थीं. इस बात से उन्होंने अंदाजा लगाया कि बीती रात दीप्ति के साथ उस के मातापिता ने उसे डांटनेसमझाने का काम जरूर किया होगा.

उन तीनों को फिजियोथेरैपिस्ट के यहां से वापस लौटने में डेढ़ घंटा लगा. तब तक आलोकजी ने सब के लिए नाश्ता तैयार कर दिया था. लेकिन गायत्री ने सिर्फ चाय पी और अपने पति के पास जल्दी वापस लौटने के लिए दीप्ति से बारबार आग्रह करने लगी. वह अपनी मां के साथ जाने को उठ कर खड़ी तो जरूर हो गई पर उस के हावभाव साफ बता रहे थे कि उसे गायत्री का यों शोर मचाना अच्छा नहीं लगा था.

पिछली रात वह 2 बजे सो सकी थी. उस के मातापिता ने कल उसे डांटते हुए कहा था :

‘अपनी दौलत और मीठे व्यवहार के बल पर यह आलोक तुम्हें गुमराह कर रहा है. बड़ी उम्र के ऐसे चालाक पुरुषों के जवान लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसाने के किस्से किस ने नहीं सुने हैं.

‘तुम्हें इस इंसान से फौरन सारे संबंध तोड़ने होंगे, नहीं तो हम बोरियाबिस्तर बंधवा कर तुम्हें वापस कानपुर ले जाएंगे,’ उमाकांत ने उसे साफसाफ धमकी दे दी थी.

दीप्ति ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर वे दोनों कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थे. तब धीरेधीरे उस का गुस्सा भी बढ़ता गया था.

‘बिना सुबूत और बिना मुझ से कुछ पूछे आप दोनों मुझे कैसे चरित्रहीन समझ सकते हैं?’ दीप्ति जब अचानक गुस्से से फट पड़ी तब कहीं जा कर उस के मातापिता ने अपना सुर बदला था.

‘चल, मान लिया कि तू भी ठीक है और यह आलोकजी भी अच्छे इंसान हैं, पर दुनिया वालों की जबान तो कोई नहीं पकड़ सकता है, बेटी. हमारा समाज ऐसे बेमेल रिश्तों को न समझता है, न स्वीकार करता है. तुझे अपनी बेकार की बदनामी से बचना चाहिए,’ उसे यों समझाते हुए जब गायत्री एकाएक रो पड़ीं तो दीप्ति ने उन दोनों को किसी तरह की सफाई देना बंद कर दिया था.

‘कल आप दोनों आलोक सर और उन की पत्नी से मिल कर उन्हें समझने की कोशिश तो करो. अगर बाद में भी आप दोनों के दिलों में उन के प्रति भरोसा नहीं बना तो आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूंगी,’ यह आखिरी बात कह कर दीप्ति ने उन्हें गेस्ट रूम में सोने भेज दिया था.

सुबह जागने के बाद दीप्ति की अपने मातापिता से ज्यादा बातें नहीं हुईं. बस, दोनों पार्टियों के बीच तनाव भरी खामोशी लंबी खिंची थी.

वे तीनों रात को 8 बजे के करीब आलोकजी के घर पहुंचे. उन्होंने अपनी पत्नी के साथसाथ उन का परिचय रितु और शिखा नाम की 2 लड़कियों से भी कराया.

‘‘ये दोनों पहली मंजिल पर रहने वाली हमारी किराएदार हैं. आज इन के हाथ का बना स्वादिष्ठ खाना ही आप दोनों को खाने को मिलेगा,’’ उषा ने रितु और शिखा के हाथ प्यार से थाम कर उन की तारीफ की.

‘‘रितु को नई जौब मिल गई है. वह अगले महीने मुंबई जा रही है. तब दीप्ति ने यहीं मेरे साथ शिफ्ट होने का प्लान बनाया है,’’ यह सूचना दे कर शिखा ने दीप्ति को गले से लगा लिया था.

इस खबर को सुनने के बाद उमाकांत की आंखों में पैदा हुई चिढ़ और नाराजगी के भावों को आलोकजी ने साफ पढ़ा. उमाकांत के मन की टैंशन कम करने के लिए उन्होंने सहज भाव से कहा, ‘‘यह शिखा सोते हुए खर्राटे लेती है. शायद दीप्ति इस के साथ रूम शेयर न करना चाहे.’’

‘‘आलोक सर, मेरा सीक्रेट आप सब को क्यों बता रहे हैं?’’ शिखा ने नाराज होने का अभिनय करते हुए जब किसी छोटे बच्चे की तरह जमीन पर पांव पटके तो उमाकांत को छोड़ सभी जोर से हंस पड़े थे.

उमाकांत ने शुष्क स्वर में शिखा को बताया, ‘‘तुम्हें नई रूममेट ढूंढ़नी पड़ेगी क्योंकि दीप्ति तो बहुत जल्दी वापस कानपुर जा रही है.’’

‘‘अरे, कानपुर जाने का फैसला तुम ने कब किया, दीप्ति?’’ शिखा ने हैरान हो कर दीप्ति से सवाल किया.

‘‘पापा के इस फैसले की मुझे भी कोई जानकारी नहीं है,’’ दीप्ति ने थके से स्वर में उसे बताया और उषाजी का हाथ पकड़ कर रसोई की तरफ चल पड़ी.

‘‘अंकल, आप दीप्ति को कानपुर क्यों ले जा रहे हैं? क्या वहां उसे यहां जैसी अच्छी जौब मिलेगी?’’ उमाकांत के बगल में सोफे पर बैठती हुई शिखा ने सवाल पूछा.

‘‘वह?घर से दूर रहती है, इसलिए उस का कहीं रिश्ता पक्का करने में हमें दिक्कत आ रही है. वह जौब करेगी या नहीं, यह फैसला अब उस की भावी ससुराल वाले करेंगे,’’ उमाकांत अभी भी नाराज नजर आ रहे थे.

‘‘यह क्या बात हुई, अंकल? दीप्ति को तो बड़ी जल्दी प्रोमोशन मिलने वाला है. शादी करने के लिए उस की इतनी अच्छी जौब छुड़ाना गलत होगा,’’ शिखा को उन की बात पसंद नहीं आई थी.

‘‘अंकल, दीप्ति ने बहुत मेहनत कर के खुद को काबिल बनाया है. वह शादी होने के बाद जौब करे या न करे, यह फैसला उसी का होना चाहिए. आप को उस का रिश्ता उस घर में पक्का करना ही नहीं चाहिए जो जबरदस्ती उसे घर बिठाने की बात करें,’’ उमाकांत के सामने बैठती हुई रितु ने जोशीले अंदाज में अपनी राय व्यक्त की.

बहुत जल्दी ही उमाकांत ने खुद को इन दोनों लड़कियों के साथ बहस में उलझा हुआ पाया. दुनिया की ऊंचनीच समझाते हुए वे लड़कियों के लिए कैरियर से ज्यादा शादी को महत्त्वपूर्ण बता रहे थे.

उन्हें रितु और शिखा से यों बहस करने में मजा आ रहा है, यह इस बात से जाहिर था कि घंटे भर का वक्त गुजर जाने का उन्हें बिलकुल पता नहीं चला.

उन दोनों के साथ बातों में उलझे रहने का एक कारण यह भी था कि उन का मन एक तरफ चुपचाप बैठे आलोकजी से बात करने का बिलकुल नहीं कर रहा था.

गायत्री बहुत देर पहले रसोई में चली गई थी. वहां अपनी बेटी दीप्ति को उषा का कुशलता से काम में हाथ बटाते देख उन्हें यह समझ आ गया कि वह अकसर ऐसा करती रहती थी. दीप्ति को अच्छी तरह मालूम था कि वहां कौन सी चीज कहां रखी हुई थी.

उन्हें अपनी बेटी का उषा के साथ हंसनाबोलना अच्छा नहीं लग रहा था. दीप्ति, रितु और शिखा को इन लोगों ने अपने मीठे व्यवहार और दौलत की चमकदमक से फंसा लिया है, यह विचार बारबार उन के मन में उठ कर उन की चिंता बढ़ाए जा रहा था. किसी अनहोनी की आशंका से उन का मन बारबार कांप उठता था.

जब उषाजी ने उन के साथ हंसनेबोलने की कोशिश शुरू की तो और ज्यादा चिढ़ कर गायत्री ड्राइंगरूम में वापस लौट आईं. वे अपने पति की बगल में बैठी ही थीं कि किसी के द्वारा बाहर से बजाई गई घंटी की आवाज घर में गूंज उठी.

कुछ देर बाद आलोकजी एक युवती के साथ वापस लौटे और उमाकांत व गायत्री से उस का परिचय कराया, ‘‘यह मेरी बेटी अनिता है. आप दोनों से मिलाने के लिए मैं ने इसे खास तौर पर बुलाया है.’’

‘‘क्या अकेली आई हो?’’ अनिता के माथे पर लगे सिंदूर को देख कर गायत्री ने उस के नमस्ते का जवाब देने के बाद सवाल पूछा.

‘‘नहीं, राकेश साथ आए हैं. वे कार पार्क कर रहे हैं. दीप्ति तो बिलकुल आप की शक्लसूरत पर गई है, आंटी. इस उम्र में भी आप बड़ी अच्छी लग रही हैं,’’ अनिता के मुंह से अपनी तारीफ सुन गायत्री तो खुश हुईं पर उमाकांत को उस का अपनी पत्नी के साथ यों खुल जाना पसंद नहीं आया था.

‘‘उमाकांतजी, आप मेरे साथ पास की मार्किट तक चलिए. खाने के बाद मुंह मीठा करने के लिए रसमलाई ले आएं. दीप्ति ने बताया था कि आप को रसमलाई बहुत पसंद है,’’ बड़े अपनेपन से आलोकजी ने उमाकांत का हाथ पकड़ा और दरवाजे की तरफ चल पड़े.

उमाकांत को मजबूरन उन के साथ चलना पड़ा. वैसे सचाई तो यह थी कि उन का मन इस घर में बिलकुल नहीं लग रहा था.

घर से बाहर आते ही आलोकजी ने उन का परिचय अंदर प्रवेश कर रहे अपने दामाद से कराया, ‘‘ये मेरे दामाद राकेशजी हैं. शहर के नामी चार्टर्ड अकाउंटैंटों में इन की गिनती होती है. राकेशजी, ये दीप्ति के पिता उमाकांतजी हैं.’’

राकेश का परिचय जान कर उमाकांत को तेज झटका लगा था. उस ने अपने ससुर और उमाकांत दोनों के पैर छुए थे. उम्र में अपने से 8-10 साल छोटे राकेश से अपने पांव छुआना उन को बहुत अजीब लगा. उन्होंने बुदबुदा कर राकेश को आशीर्वाद सा दिया और बहुत बेचैनी महसूस करते हुए आगे बढ़ गए.

घर से कुछ दूर आ कर आलोकजी ने पहले एक गहरी सांस छोड़ी और फिर अशांत लहजे में उमाकांत को बताना शुरू किया, ‘‘अपने दिल पर लगे सब से गहरे जख्म को मैं आप को दिखाने जा रहा हूं. चार्टर्ड अकाउंटैंट बनने का सपना देखने वाली मेरी बेटी अनिता राकेश की फर्म में जौब करने गई थी. उन के बीच दिन पर दिन बढ़ते जा रहे दोस्ताना संबंध तब हमारे लिए भी गहरी चिंता का कारण बने थे, उमाकांतजी.

‘‘जब मेरी बेटी ने अपने से उम्र में 17 साल बड़े विधुर राकेश से शादी करने का फैसला हमें सुनाया तो हमारे पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. जिस आक्रोश, डर और चिंता को आप दोनों पतिपत्नी दीप्ति और मेरे बीच बने अच्छे संबंध को देख कर आज महसूस कर रहे हैं, उन्हें उषा और मैं भली प्रकार समझ सकते हैं क्योंकि हम इस राह पर से गुजर चुके हैं.

‘‘जिस पीड़ा को अनिता का बाप होने के कारण मैं झेल चुका हूं, वैसी पीड़ा आप को कभी नहीं भोगनी पड़ेगी, ऐसा वचन मैं आप को इस वक्त दे रहा हूं, उमाकांतजी. आप की बेटी का कैसा भी अहित मेरे हाथों कभी नहीं होगा.

‘‘इस महानगर में अनगिनत युवा पढ़ने और जौब करने आए हुए हैं. उन सब को अपने घर व घर वालों की बहुत याद आना स्वाभाविक ही है. घर से दूर अकेली रह रही लड़कियों के लिए बड़ी उम्र वाले किसी प्रभावशाली पुरुष के बहुत निकट हो जाने को समझना भी आसान है क्योंकि वह लड़की अपने पिता के साथ को परदेस में बहुत ‘मिस’ करती हैं.

‘‘जिन दिनों राकेश ने मेरी बेटी को अपने प्रेमजाल में फंसाया, उन दिनों उषा और मैं भी अपने बेटेबहू के पास रहने अमेरिका गए हुए थे. राकेश आज मेरा दामाद जरूर है लेकिन मेरे मन के एक हिस्से ने उसे भावनात्मक दृष्टि से अपरिपक्व अनिता को गुमराह करने के लिए आज भी पूरी तरह से माफ नहीं किया है.

‘‘मेरी पत्नी कमरदर्द के कारण अपाहिज सी हो गई है. बेटाबहू विदेश में हैं. हम दोनों को दीप्ति, रितु व शिखा का बहुत सहारा है. सुखदुख में ये बहुत काम आती हैं हमारे.

‘‘बदले में हम इन्हें घर के जैसा सुरक्षित व प्यार भरा परिवेश देने का प्रयास दिल से करते हैं. हम सब ने एकदूसरे को परिवार के सदस्यों की तरह से अपना लिया है. सगे रिश्तेदारों और पड़ोसियों से ज्यादा बड़ा सहारा बन गए हैं हम एकदूसरे के.

‘‘दीप्ति मुझ से बहुत प्रभावित है… मुझे अपना मार्गदर्शक मानती है…वह मेरे बहुत करीब है पर इस निकटता का मैं गलत फायदा कभी नहीं उठाऊंगा. दीप्ति की जिंदगी में आप मुझे अपनी जगह समझिए, उमाकांतजी.’’

आलोकजी का बोलतेबोलते गला भर आया था. उमाकांत ने रुक कर उन के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और बहुत भावुक हो कर बोले, ‘‘आलोकजी, मैं ने आप को बहुत गलत समझा है. अपनी नजरों में गिर कर मैं इस वक्त खुद को बहुत शर्मिंदा महसूस कर रहा हूं…मुझे माफ कर दीजिए, प्लीज.’’

वे दोनों एकदूसरे के गले लग गए. उन की आंखों से बह रहे आंसुओं ने सारी गलतफहमी दूर करते हुए आपसी विश्वास की जड़ों को सींच मजबूत कर दिया था.

The post सहारा: उमाकांत के मन से बेटी के लिए कैसे मिटा संशय? appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/QRDKsoi

अपनी सहेली के विवाह समारोह में भाग लेने के बाद दीप्ति आलोकजी के साथ रात को 11 बजे वापस लौटी. जिस घर में वह पेइंग गेस्ट की तरह रहती थी उस के गेट के सामने अपने मातापिता को खड़े देख वह जोर से चौंक पड़ी क्योंकि वे दोनों बिना किसी पूर्व सूचना के कानपुर से दिल्ली आए थे.

‘‘मम्मी, पापा, आप दोनों ने आने की खबर क्यों नहीं दी?’’ कार से उतर कर बहुत खुश नजर आ रही दीप्ति अपनी मां गायत्री के गले लग गई.

‘‘हम ने सोचा इस बार अचानक पहुंच कर देखा जाए कि यहां तुम अकेली किस हाल में रह रही हो,’’ अपने पिता उमाकांत की आवाज में नाराजगी और रूखेपन के भावों को पढ़ दीप्ति मन ही मन बेचैन हो उठी.

‘‘मैं बहुत मजे में हूं, पापा,’’ उन की नाराजगी को नजरअंदाज करते हुए दीप्ति उमाकांत के भी गले लग गई.

आलोकजी इन दोनों से पहली बार मिल रहे थे. उन्होंने कार से बाहर आ कर अपना परिचय खुद ही दिया.

‘‘रात के 11 बजे कहां से आ रहे हैं आप दोनों?’’ उन से इस सवाल को पूछते हुए उमाकांत ने अपने होंठों पर नकली मुसकराहट सजा ली.

‘‘दीप्ति की पक्की सहेली अंजु की आज शादी थी. वह इस के औफिस में काम करती है. यह परेशान थी कि शादी से घर अकेली कैसे लौटेगी. मैं ने इस की परेशानी देख कर साथ चलने की जिम्मेदारी ले ली. अकेले लौटने का डर मन से दूर होते ही शादी में शामिल होने की इस की खुशी बढ़ गई. मुझे अच्छा लगा,’’ आलोकजी ने सहज भाव से मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अकेली लड़की के लिए रात को इतनी ज्यादा देर तक घर से बाहर रहना ठीक नहीं होता है, बेटी,’’ दीप्ति को सलाह देते हुए उमाकांत की आवाज में कुछ सख्ती के भाव उभरे.

दीप्ति के कुछ बोलने से पहले आलोकजी ने कहा, ‘‘उमाकांतजी, देर रात के समय दीप्ति को मैं कहीं अकेले आनेजाने नहीं देता हूं. इस मामले में आप दोनों को फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘मांबाप को जवान बेटी की चिंता होती ही है. आजकल किसी पर भी भरोसा करना ठीक नहीं है जनाब. अब मुझे इजाजत दीजिए. गुड नाइट,’’ कुछ रूखे से अंदाज में अपने मन की चिंता व्यक्त करने के बाद उमाकांत मुड़े और गेट की तरफ चलने को तैयार हो गए.

‘‘उमाकांतजी, कल इतवार को आप डिनर हमारे घर कर रहे हैं. मैं ‘न’ बिलकुल नहीं सुनूंगा,’’ आलोकजी ने दोस्ताना अंदाज में उन के कंधे पर हाथ रख कर उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दिया.

‘‘ओके,’’ बिना मुसकराए उन्होंने आलोकजी का निमंत्रण स्वीकार किया.

दीप्ति ने असहज भाव से मुसकराते हुए उन से विदा ली, ‘‘गुड नाइट, सर. मैं सुबह ठीक 9 बजे पहुंच जाऊंगी.’’

‘‘थैंक यू ऐंड गुड नाइट,’’ आलोकजी ने उस से हाथ मिलाने के बाद गायत्री को हाथ जोड़ कर नमस्ते किया और कार में बैठ गए.

उन्हें अपने घर पहुंचने में 5 मिनट लगे. अपनी पत्नी उषा की नजरों से वे अपने मन की बेचैनी छिपा नहीं पाए थे.

उषा की सवालिया नजरों के जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘दीप्ति के मातापिता कानपुर से आए हैं. उन्हें दीप्ति का मेरे साथ इतनी देर से वापस लौटना अच्छा नहीं लगा. मुझे लग रहा है कि वे दोनों इस कारण तरहतरह के सवाल पूछ कर उसे जरूर परेशान करेंगे.’’

‘‘उन्हें अपनी बेटी पर विश्वास करना चाहिए,’’ उषा ने अपनी राय जाहिर की.

‘‘उस के पिता मुझे तेज गुस्से वाले इंसान लगे हैं. मुझे उन का विश्वास जीतने के लिए कुछ और देर उन के साथ रुकना चाहिए था.’’

‘‘हम कल उन्हें घर बुला लेते हैं.’’

‘‘मैं ने दोनों को कल रात डिनर के लिए बुला लिया है.’’

‘‘गुड.’’

‘‘तुम सुबह अनिता और राकेश को भी कल डिनर यहीं करने के लिए फोन कर देना.’’

‘‘ओके.’’

कुछ देर बाद अमेरिका में रह रहे अपने बेटे अमित और बहू वंदना से बात कर के उन का मूड कुछ सही हुआ. वे दोनों अगले महीने घर आ रहे हैं, यह खबर सुन वे खुशी से झूम उठे थे.

कमरदर्द से परेशान उषा नींद की गोली लेने के बाद जल्दी सो गई थी. आलोकजी दीप्ति की फिक्र करते हुए कुछ देर तक करवटें बदलते रहे थे.

सुबह 9 बजे से कुछ मिनट पहले दीप्ति अपनी मां गायत्री के साथ उन के घर पहुंच गई. आलोकजी को इस कारण उस के साथ अकेले में बातें करने का मौका नहीं मिला.

वैसे उन्हें मांबेटी सहज नजर नहीं आ रही थीं. इस बात से उन्होंने अंदाजा लगाया कि बीती रात दीप्ति के साथ उस के मातापिता ने उसे डांटनेसमझाने का काम जरूर किया होगा.

उन तीनों को फिजियोथेरैपिस्ट के यहां से वापस लौटने में डेढ़ घंटा लगा. तब तक आलोकजी ने सब के लिए नाश्ता तैयार कर दिया था. लेकिन गायत्री ने सिर्फ चाय पी और अपने पति के पास जल्दी वापस लौटने के लिए दीप्ति से बारबार आग्रह करने लगी. वह अपनी मां के साथ जाने को उठ कर खड़ी तो जरूर हो गई पर उस के हावभाव साफ बता रहे थे कि उसे गायत्री का यों शोर मचाना अच्छा नहीं लगा था.

पिछली रात वह 2 बजे सो सकी थी. उस के मातापिता ने कल उसे डांटते हुए कहा था :

‘अपनी दौलत और मीठे व्यवहार के बल पर यह आलोक तुम्हें गुमराह कर रहा है. बड़ी उम्र के ऐसे चालाक पुरुषों के जवान लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसाने के किस्से किस ने नहीं सुने हैं.

‘तुम्हें इस इंसान से फौरन सारे संबंध तोड़ने होंगे, नहीं तो हम बोरियाबिस्तर बंधवा कर तुम्हें वापस कानपुर ले जाएंगे,’ उमाकांत ने उसे साफसाफ धमकी दे दी थी.

दीप्ति ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर वे दोनों कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थे. तब धीरेधीरे उस का गुस्सा भी बढ़ता गया था.

‘बिना सुबूत और बिना मुझ से कुछ पूछे आप दोनों मुझे कैसे चरित्रहीन समझ सकते हैं?’ दीप्ति जब अचानक गुस्से से फट पड़ी तब कहीं जा कर उस के मातापिता ने अपना सुर बदला था.

‘चल, मान लिया कि तू भी ठीक है और यह आलोकजी भी अच्छे इंसान हैं, पर दुनिया वालों की जबान तो कोई नहीं पकड़ सकता है, बेटी. हमारा समाज ऐसे बेमेल रिश्तों को न समझता है, न स्वीकार करता है. तुझे अपनी बेकार की बदनामी से बचना चाहिए,’ उसे यों समझाते हुए जब गायत्री एकाएक रो पड़ीं तो दीप्ति ने उन दोनों को किसी तरह की सफाई देना बंद कर दिया था.

‘कल आप दोनों आलोक सर और उन की पत्नी से मिल कर उन्हें समझने की कोशिश तो करो. अगर बाद में भी आप दोनों के दिलों में उन के प्रति भरोसा नहीं बना तो आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूंगी,’ यह आखिरी बात कह कर दीप्ति ने उन्हें गेस्ट रूम में सोने भेज दिया था.

सुबह जागने के बाद दीप्ति की अपने मातापिता से ज्यादा बातें नहीं हुईं. बस, दोनों पार्टियों के बीच तनाव भरी खामोशी लंबी खिंची थी.

वे तीनों रात को 8 बजे के करीब आलोकजी के घर पहुंचे. उन्होंने अपनी पत्नी के साथसाथ उन का परिचय रितु और शिखा नाम की 2 लड़कियों से भी कराया.

‘‘ये दोनों पहली मंजिल पर रहने वाली हमारी किराएदार हैं. आज इन के हाथ का बना स्वादिष्ठ खाना ही आप दोनों को खाने को मिलेगा,’’ उषा ने रितु और शिखा के हाथ प्यार से थाम कर उन की तारीफ की.

‘‘रितु को नई जौब मिल गई है. वह अगले महीने मुंबई जा रही है. तब दीप्ति ने यहीं मेरे साथ शिफ्ट होने का प्लान बनाया है,’’ यह सूचना दे कर शिखा ने दीप्ति को गले से लगा लिया था.

इस खबर को सुनने के बाद उमाकांत की आंखों में पैदा हुई चिढ़ और नाराजगी के भावों को आलोकजी ने साफ पढ़ा. उमाकांत के मन की टैंशन कम करने के लिए उन्होंने सहज भाव से कहा, ‘‘यह शिखा सोते हुए खर्राटे लेती है. शायद दीप्ति इस के साथ रूम शेयर न करना चाहे.’’

‘‘आलोक सर, मेरा सीक्रेट आप सब को क्यों बता रहे हैं?’’ शिखा ने नाराज होने का अभिनय करते हुए जब किसी छोटे बच्चे की तरह जमीन पर पांव पटके तो उमाकांत को छोड़ सभी जोर से हंस पड़े थे.

उमाकांत ने शुष्क स्वर में शिखा को बताया, ‘‘तुम्हें नई रूममेट ढूंढ़नी पड़ेगी क्योंकि दीप्ति तो बहुत जल्दी वापस कानपुर जा रही है.’’

‘‘अरे, कानपुर जाने का फैसला तुम ने कब किया, दीप्ति?’’ शिखा ने हैरान हो कर दीप्ति से सवाल किया.

‘‘पापा के इस फैसले की मुझे भी कोई जानकारी नहीं है,’’ दीप्ति ने थके से स्वर में उसे बताया और उषाजी का हाथ पकड़ कर रसोई की तरफ चल पड़ी.

‘‘अंकल, आप दीप्ति को कानपुर क्यों ले जा रहे हैं? क्या वहां उसे यहां जैसी अच्छी जौब मिलेगी?’’ उमाकांत के बगल में सोफे पर बैठती हुई शिखा ने सवाल पूछा.

‘‘वह?घर से दूर रहती है, इसलिए उस का कहीं रिश्ता पक्का करने में हमें दिक्कत आ रही है. वह जौब करेगी या नहीं, यह फैसला अब उस की भावी ससुराल वाले करेंगे,’’ उमाकांत अभी भी नाराज नजर आ रहे थे.

‘‘यह क्या बात हुई, अंकल? दीप्ति को तो बड़ी जल्दी प्रोमोशन मिलने वाला है. शादी करने के लिए उस की इतनी अच्छी जौब छुड़ाना गलत होगा,’’ शिखा को उन की बात पसंद नहीं आई थी.

‘‘अंकल, दीप्ति ने बहुत मेहनत कर के खुद को काबिल बनाया है. वह शादी होने के बाद जौब करे या न करे, यह फैसला उसी का होना चाहिए. आप को उस का रिश्ता उस घर में पक्का करना ही नहीं चाहिए जो जबरदस्ती उसे घर बिठाने की बात करें,’’ उमाकांत के सामने बैठती हुई रितु ने जोशीले अंदाज में अपनी राय व्यक्त की.

बहुत जल्दी ही उमाकांत ने खुद को इन दोनों लड़कियों के साथ बहस में उलझा हुआ पाया. दुनिया की ऊंचनीच समझाते हुए वे लड़कियों के लिए कैरियर से ज्यादा शादी को महत्त्वपूर्ण बता रहे थे.

उन्हें रितु और शिखा से यों बहस करने में मजा आ रहा है, यह इस बात से जाहिर था कि घंटे भर का वक्त गुजर जाने का उन्हें बिलकुल पता नहीं चला.

उन दोनों के साथ बातों में उलझे रहने का एक कारण यह भी था कि उन का मन एक तरफ चुपचाप बैठे आलोकजी से बात करने का बिलकुल नहीं कर रहा था.

गायत्री बहुत देर पहले रसोई में चली गई थी. वहां अपनी बेटी दीप्ति को उषा का कुशलता से काम में हाथ बटाते देख उन्हें यह समझ आ गया कि वह अकसर ऐसा करती रहती थी. दीप्ति को अच्छी तरह मालूम था कि वहां कौन सी चीज कहां रखी हुई थी.

उन्हें अपनी बेटी का उषा के साथ हंसनाबोलना अच्छा नहीं लग रहा था. दीप्ति, रितु और शिखा को इन लोगों ने अपने मीठे व्यवहार और दौलत की चमकदमक से फंसा लिया है, यह विचार बारबार उन के मन में उठ कर उन की चिंता बढ़ाए जा रहा था. किसी अनहोनी की आशंका से उन का मन बारबार कांप उठता था.

जब उषाजी ने उन के साथ हंसनेबोलने की कोशिश शुरू की तो और ज्यादा चिढ़ कर गायत्री ड्राइंगरूम में वापस लौट आईं. वे अपने पति की बगल में बैठी ही थीं कि किसी के द्वारा बाहर से बजाई गई घंटी की आवाज घर में गूंज उठी.

कुछ देर बाद आलोकजी एक युवती के साथ वापस लौटे और उमाकांत व गायत्री से उस का परिचय कराया, ‘‘यह मेरी बेटी अनिता है. आप दोनों से मिलाने के लिए मैं ने इसे खास तौर पर बुलाया है.’’

‘‘क्या अकेली आई हो?’’ अनिता के माथे पर लगे सिंदूर को देख कर गायत्री ने उस के नमस्ते का जवाब देने के बाद सवाल पूछा.

‘‘नहीं, राकेश साथ आए हैं. वे कार पार्क कर रहे हैं. दीप्ति तो बिलकुल आप की शक्लसूरत पर गई है, आंटी. इस उम्र में भी आप बड़ी अच्छी लग रही हैं,’’ अनिता के मुंह से अपनी तारीफ सुन गायत्री तो खुश हुईं पर उमाकांत को उस का अपनी पत्नी के साथ यों खुल जाना पसंद नहीं आया था.

‘‘उमाकांतजी, आप मेरे साथ पास की मार्किट तक चलिए. खाने के बाद मुंह मीठा करने के लिए रसमलाई ले आएं. दीप्ति ने बताया था कि आप को रसमलाई बहुत पसंद है,’’ बड़े अपनेपन से आलोकजी ने उमाकांत का हाथ पकड़ा और दरवाजे की तरफ चल पड़े.

उमाकांत को मजबूरन उन के साथ चलना पड़ा. वैसे सचाई तो यह थी कि उन का मन इस घर में बिलकुल नहीं लग रहा था.

घर से बाहर आते ही आलोकजी ने उन का परिचय अंदर प्रवेश कर रहे अपने दामाद से कराया, ‘‘ये मेरे दामाद राकेशजी हैं. शहर के नामी चार्टर्ड अकाउंटैंटों में इन की गिनती होती है. राकेशजी, ये दीप्ति के पिता उमाकांतजी हैं.’’

राकेश का परिचय जान कर उमाकांत को तेज झटका लगा था. उस ने अपने ससुर और उमाकांत दोनों के पैर छुए थे. उम्र में अपने से 8-10 साल छोटे राकेश से अपने पांव छुआना उन को बहुत अजीब लगा. उन्होंने बुदबुदा कर राकेश को आशीर्वाद सा दिया और बहुत बेचैनी महसूस करते हुए आगे बढ़ गए.

घर से कुछ दूर आ कर आलोकजी ने पहले एक गहरी सांस छोड़ी और फिर अशांत लहजे में उमाकांत को बताना शुरू किया, ‘‘अपने दिल पर लगे सब से गहरे जख्म को मैं आप को दिखाने जा रहा हूं. चार्टर्ड अकाउंटैंट बनने का सपना देखने वाली मेरी बेटी अनिता राकेश की फर्म में जौब करने गई थी. उन के बीच दिन पर दिन बढ़ते जा रहे दोस्ताना संबंध तब हमारे लिए भी गहरी चिंता का कारण बने थे, उमाकांतजी.

‘‘जब मेरी बेटी ने अपने से उम्र में 17 साल बड़े विधुर राकेश से शादी करने का फैसला हमें सुनाया तो हमारे पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. जिस आक्रोश, डर और चिंता को आप दोनों पतिपत्नी दीप्ति और मेरे बीच बने अच्छे संबंध को देख कर आज महसूस कर रहे हैं, उन्हें उषा और मैं भली प्रकार समझ सकते हैं क्योंकि हम इस राह पर से गुजर चुके हैं.

‘‘जिस पीड़ा को अनिता का बाप होने के कारण मैं झेल चुका हूं, वैसी पीड़ा आप को कभी नहीं भोगनी पड़ेगी, ऐसा वचन मैं आप को इस वक्त दे रहा हूं, उमाकांतजी. आप की बेटी का कैसा भी अहित मेरे हाथों कभी नहीं होगा.

‘‘इस महानगर में अनगिनत युवा पढ़ने और जौब करने आए हुए हैं. उन सब को अपने घर व घर वालों की बहुत याद आना स्वाभाविक ही है. घर से दूर अकेली रह रही लड़कियों के लिए बड़ी उम्र वाले किसी प्रभावशाली पुरुष के बहुत निकट हो जाने को समझना भी आसान है क्योंकि वह लड़की अपने पिता के साथ को परदेस में बहुत ‘मिस’ करती हैं.

‘‘जिन दिनों राकेश ने मेरी बेटी को अपने प्रेमजाल में फंसाया, उन दिनों उषा और मैं भी अपने बेटेबहू के पास रहने अमेरिका गए हुए थे. राकेश आज मेरा दामाद जरूर है लेकिन मेरे मन के एक हिस्से ने उसे भावनात्मक दृष्टि से अपरिपक्व अनिता को गुमराह करने के लिए आज भी पूरी तरह से माफ नहीं किया है.

‘‘मेरी पत्नी कमरदर्द के कारण अपाहिज सी हो गई है. बेटाबहू विदेश में हैं. हम दोनों को दीप्ति, रितु व शिखा का बहुत सहारा है. सुखदुख में ये बहुत काम आती हैं हमारे.

‘‘बदले में हम इन्हें घर के जैसा सुरक्षित व प्यार भरा परिवेश देने का प्रयास दिल से करते हैं. हम सब ने एकदूसरे को परिवार के सदस्यों की तरह से अपना लिया है. सगे रिश्तेदारों और पड़ोसियों से ज्यादा बड़ा सहारा बन गए हैं हम एकदूसरे के.

‘‘दीप्ति मुझ से बहुत प्रभावित है… मुझे अपना मार्गदर्शक मानती है…वह मेरे बहुत करीब है पर इस निकटता का मैं गलत फायदा कभी नहीं उठाऊंगा. दीप्ति की जिंदगी में आप मुझे अपनी जगह समझिए, उमाकांतजी.’’

आलोकजी का बोलतेबोलते गला भर आया था. उमाकांत ने रुक कर उन के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और बहुत भावुक हो कर बोले, ‘‘आलोकजी, मैं ने आप को बहुत गलत समझा है. अपनी नजरों में गिर कर मैं इस वक्त खुद को बहुत शर्मिंदा महसूस कर रहा हूं…मुझे माफ कर दीजिए, प्लीज.’’

वे दोनों एकदूसरे के गले लग गए. उन की आंखों से बह रहे आंसुओं ने सारी गलतफहमी दूर करते हुए आपसी विश्वास की जड़ों को सींच मजबूत कर दिया था.

The post सहारा: उमाकांत के मन से बेटी के लिए कैसे मिटा संशय? appeared first on Sarita Magazine.

May 31, 2022 at 09:00AM

Sunday, 29 May 2022

जातपांत की बिसात: मिसेज मालती का धर्म कैसे भ्रष्ट हुआ?

अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सचाई को सांप के मुंह में छछूंदर सा न उगलते बन रहा था न निगलते. उस का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे?

मिसेज मालती अग्निहोत्री ने घर आए मेहमानों का मुसकराते हुए स्वागत किया और उन्हें सोफ़े पर बैठने का इशारा करते हुए कहा–

“आइए, बैठिए.” फिर बालबच्चों के हाल चाल पूछे और किचन की ओर देख कर आवाज लगाई- “रवींद्र, जरा चायनाश्ता ले आओ और…” उन की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी की रवींद्र चायनाश्ते की ट्रे ले कर ड्राइंगरूम में प्रकट हो गया.

“अरे वाह, मालतीजी, आप का कुक तो बहुत ही एफ़िशिएंट है. बात पूरी होने के पहले ही चाय ले  आया,” मेहमान महिला ने प्रशंसनीय भाव से रवींद्र की ओर देखते हुए कहा.

“वह क्या है न मैडम, जब आप सोसाइटी में दाखिल हुए थे, तभी गार्ड का फोन आया यह बताने के लिए कि मेहमान आ गए हैं. बस, तभी हम ने चाय चढ़ा दी थी,” खीसें निपोरते हुए रवींद्र ने जवाब दिया और मालतीजी ने मुसकराते हुए उसे किचन में जाने का इशारा कर दिया.

मालतीजी के बड़े से घर में 3 पीढ़ियां एकसाथ रहती थीं. उन के सासससुर, उन के पति और  उन के 2 बच्चे. इस भरेपूरे परिवार को मालतीजी 3 नौकरों की मदद से चलाती थीं और बाकी समय अपने सोशल वर्क को देती थीं. रवींद्र के इलावा घर में 2 नौकरानियां थीं और ये सब उन के विला के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते थे.

रवींद्र की तारीफ उन का हर मेहमान करता था. उन की गृहस्थी की गाड़ी को निर्विघ्न चलाने में उस का बड़ा हाथ था. 10 वर्ष पहले पिता की असमय मौत और घर की आर्थिक स्थिति के जर्जर ढांचे ने उस के हाथ से स्कूल का बस्ता छीन कर कढ़ाईचमचा थमा दिया था.

मालतीजी को आज भी वह दिन याद है जब 12 साल के नन्हे से रवींद्र ने पहली बार उन के घर की घंटी बजाई थी. किचन में कुक को खाना बनाने के बारे में निर्देश देती मालतीजी ने नौकरानी को दरवाज़ा खोलने के लिए कहा था. कुछ देर में नौकरानी ने आ कर बताया था कि-

‘एक बच्चा आप की सहेली की नौकरानी के साथ आया है.’

‘ओहो, मैं तो भूल ही गई,’ वे माथे पर हाथ मार कर बोली थीं और उन्हें एक दिन पहले अपनी सहेली के साथ फोन पर हुई वार्त्ता याद हो आई थी जब उन की सहेली कह रही थी- ‘हैलो मालती, तुझ से कुछ बात करनी थी.’

‘हां बोल न, इतना क्या सोच रही है,’ मालती ने अपनेपन से कहा था.

‘वह मेरी मेड है न, मीरा,’ सहेली बोली.

‘हां, क्या हुआ उसे?’ मालती ने व्यग्रता से पूछा.

‘उसे कुछ नहीं हुआ, उस की बहन के पति का ऐक्सिडैंट में देहांत हो गया.’

‘ओ गौड, यह तो बहुत बुरा हुआ. वैसे कौनकौन हैं उस के परिवार में?’

‘परिवार में तो 12 साल का बेटा, 6 साल की बेटी और वह औरत खुद है. लेकिन कमाने वाला अकेला उस का पति ही था,’ सहेली ने बताया.

‘सो सैड, अब वह क्या करेगी?’ मालती ने संवेदना दर्शाते हुए पूछा था.

‘मैं सोच रही थी कि उसे और उस के बेटे को कहीं काम मिल जाता तो उन की जीवन की गाड़ी चल पड़ती,’ सहेली ने जरा सोच कर कहा.

‘बात तो ठीक है. और औरत तो चलो काम कर लेगी, लेकिन 12 साल का बच्चा भला क्या काम कर सकता है?’

‘वो, तू कह रही थी न, कि तेरा कुक बहुत बूढ़ा हो गया है, जल्दीजल्दी काम नहीं कर पाता लेकिन खाना तुम्हें उसी के हाथ का पसंद है?’ सहेली ने कहा.

‘हां यह तो है, लेकिन इस से बच्चे का क्या लेनादेना?’

‘क्यों न तू इस बच्चे को अपने कुक की मदद के लिए रख ले. धीरेधीरे जब तक वह रिटायर्ड होगा तब तक यह बच्चा उस से काम सीख लेगा.’

‘हां बात तो ठीक है, लेकिन तुझे तो पता है न, मेरे सासससुर जातपांत को कितना महत्त्व देते हैं. उन के रहते हुए तो हम हर किसी को किचन में घुसा नहीं सकते.’

‘उस की तू चिंता मत कर. ये लोग उच्च कोटि के ब्राह्मण हैं. यह परिवार बहुत ईमानदार और सरल है. इसीलिए तो मैं चिंतित हूं कि ब्राह्मण जात हैं ये, जाने कहां मारेमारे फिरेंगे.’

‘तू क्या उन्हें पर्सनली जानती है?’ मालती ने हैरानी से पूछा.

‘हांहां, कई बार मेरी मेड के साथ आते रहे हैं. लड़का भी बड़ा प्यारा बच्चा है. हाथ से दिए बिना किसी चीज को छूता तक नहीं है. उस की गारंटी तो मैं भी दे सकती हूं.’

‘ऐसी बात है, तो फिर ठीक है. तू उसे कल सुबह अपनी मेड के साथ मेरे यहां भेज देना. मैं बात कर लूंगी,’ मालतीजी ने हर तरह से आश्वस्त हो कर कहा.

एक दिन पहले कि ये सब बातें याद आते ही मालतीजी ने बच्चे को अंदर बुलवा लिया. फिर कुक को दी जाने वाली अपनी हिदायतों की लिस्ट खत्म कर के ड्राइंगरूम में सोफ़े पर आ कर बैठ गईं.

कुछ देर में एक सलोना सा भोलाभाला चेहरा उन के सामने आ खड़ा हुआ. साफसुथरे कपड़े और करीने से बने तेल लगे बाल देख कर उन्हें अच्छा लगा. अपनी बड़ीबड़ी आंखों में आश्चर्य और असमंजस के भाव लिए यह लड़का मालतीजी के दिल को भा गया था. उसे पास बुला कर उन्होंने प्यार से पूछा-

‘तुम्हारा नाम क्या है?’

‘रवींद्र, मां रवि बुलाती हैं,’ अपने पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदते हुए वह बोला.

‘खाना खाया?’ मालतीजी ने थोड़ा झुक कर उस की आंखों में झांकने की कोशिश करते पूछा.

‘सुबह चाय पी थी,’ उस ने एक बार नजर उठाई और फिर झुका ली.

‘काका, रवींद्र के लिए नाश्ता लाना,’ उन्होंने किचन की ओर देख कर अपने कुक को आवाज लगाई.

आलू के 2 परांठे और एक गिलास दूध खत्म करने में उसे कुछ ही मिनट लगे. मालतीजी ने उस के सिर पर हाथ फिराते हुए पूछा- ‘हमारे घर में रहोगे?’

‘हां,’ वह शरमा कर बोला. शायद उस की मां ने उसे पहले से सब समझा कर भेजा था.

‘ठीक है,’ मालतीजी ने उठते हुए कहा.

फिर अपने कुक को बुला कर उन्होंने रवींद्र को उस के सुपुर्द किया और उसे छोटेछोटे काम समझाने की हिदायत दे कर वे अपने काम में व्यस्त हो गईं.

उस की साफसफाई की आदत और हंसमुख स्वभाव ने जल्द ही घर में अपनी जगह बना ली. हालांकि शुरूशुरू में वह टमाटरप्याज काटने के अलावा कुछ खास मदद नहीं कर पाता था लेकिन धीरेधीरे वह न केवल घर के हर सदस्य के हिसाब से खाना बनाना सीख गया था बल्कि हर सदस्य के मिजाज को भी बखूबी समझने लगा था.

वक़्त के साथ किचन के काम का सारा भार बूढ़े होते कुक के हाथों से निकल कर जवान होते रवींद्र के कंधों पर आ गया था. अब तो कुक को रिटायर हुए कई साल हो चुके हैं और किचन में रवींद्र का एकछत्र राज है. यह काम वह सालों से अकेले ही बड़े सलीके से संभालता आ रहा है.

रवींद्र को अग्निहोत्री परिवार में आए एक अरसा हो चुका था. अब वह इस घर का सदस्य था. उस के बिना मालतीजी का किचन ऐसा था जैसे सिंदूर बिना सुहागन. 12 साल का मासूम बच्चा अब 22 साल के सजीले नौजवान में तबदील हो चुका था.

एक सुबह मालतीजी ने रवींद्र को बुलाया और उसे बताया कि अगले दिन सारा परिवार उन की बहन की बेटी की शादी में दूसरे शहर जा रहा है. सुबह नाश्ते के बाद सब निकलेंगे और 2 दिन बाद लौटेंगे. घर में वही सब से पुराना और जिम्मेदार व्यक्ति था, इसलिए घर का ध्यान रखना और किसी अनजान व्यक्ति को घर में न आने देना उसी की जिम्मेदारी थी.

इस खबर को सुनते ही रवींद्र के चेहरे पर एक हलकी सी मुसकान दौड़ गई जो मालती को बड़ी बेमौका लगी.  लेकिन अपने व्यस्त कार्यक्रम के चलते उन्होंने इस ओर कोई खास तवज्जुह नहीं दी. रवींद्र महीने में एक बार अपनी मां और बहन से मिलने जाता था, बाकी समय वह वहीं बना रहता था. उस के रहते मालती को कभी घर की चिंता नहीं करनी पड़ी थी.

2 दिनों बाद थकन से चूर अग्निहोत्री परिवार घर वापस लौटा. मालतीजी रवींद्र को चाय बनाने के लिए  कह कर अपने बैडरूम की ओर बढ़ गईं. वे अपने बैड पर बैठी ही थीं की उन की नजर अपने बैड के साइड में पड़े यूज़्ड कंडोम पर पड़ी तो वे ऐसे चौंक पड़ीं जैसे उन्हे सांप दिख गया हो. वे तुरंत बैड से उठ गईं और सिर पकड़ कर पास पड़ी कुरसी पर बैठ गईं. फिर खुद से ही बड़बड़ाईं-

‘ओह, यह क्या चल रहा है हमारे पीठपीछे… बैडरूम की चाबी रवींद्र के ही पास थी और कुछ दिनों से रवींद्र के रंगढंग कुछ बदले से लग रहे थे, तो यह करतूत तो उसी की है लेकिन उस के इतनी जल्दी पर निकल आएंगे, यह तो मैं ने कभी सोचा भी न था.’

फिर उन्होंने नौकरानी को आवाज लगाई और उसे तुरंत बैड की चादर, तकिए बदलने का आदेश दिया. नौकरानी ने सवालिया नजर बैड की साफ चादर पर डाली, फिर अपनी मालकिन पर डाली.

चादर बदलो, देख क्या रही हो.’ वे गुस्से में बोलीं.

फिर उन्होंने सोचा, चादर तो ये बदल देगी, लेकिन उस घटना को कौन बदलेगा जो उन की गैरहाजिरी में वहां घट चुकी थी.

मालती अपनी सासुमां के जितनी दकियानूसी और संकीर्ण विचारों वाली तो नहीं थी लेकिन इस तरह का उन्मुक्त सैक्स उन के संस्कारों के दायरे से भी बाहर था. जो पाप हो चुका है उस का वे क्या करें, समझ नहीं आ रहा था. काश, कंप्यूटर की तरह ज़िंदगी में भी कोई ‘अनडू’ का विकल्प होता.

वे रवींद्र को आवाज लगाने ही वाली थीं कि पूछूं तो सही कि उस की ये सब करने की हिम्मत कैसे हुई? उस ने यह पाप कर के अपने और हमारे कुल की मर्यादा को दांव पर कैसे लगा दिया? और ये बेशर्म लड़की कौन थी? और फिर अगर सब ठीक लगा तो उस की शादी ही करवा देंगी.

लेकिन फिर उन्होंने खुद को रोका और सोचा कि चूंकि यह पाप तो रवींद्र ने किया ही है, इस में तो कोई शक नहीं है, लेकिन यदि यह बात सीधेसीधे उस से पूछी गई, तो वह शायद सच न बताए और चौकन्ना भी हो जाए. ऐसे में बात की जड़ तक पहुंचना और भी मुश्किल हो जाएगा. इस से बेहतर तो यही होगा कि कुछ दिन अनजान बनने का नाटक करो और उसे अगली बार रंगेहाथ पकड़ो.

बस, फिर तो अगले दिन से मालती की तेज नजर रवींद्र के हर कदम पर रहने लगी. वह कब, किस से और क्या बात कर रहा है, ये सब मालती की नज़रों के कैमरे में हर समय कैद होता रहता.

एक दिन मालती अपनी बालकनी में बैठी शाम की चाय का आनंद ले रही थी. रवींद्र नीचे सब्जी लाने गया था. तभी उन की नजर नीचे पार्क में एक लड़की से बात करते हुए रवींद्र पर पड़ी.

उन्होंने तुरंत अपना दूर का चश्मा लगाया और लड़की को पहचानने की कोशिश करने लगीं. फिर लड़की को पहचानते हुए हैरानी से बोलीं-

‘यह तो सोसाइटी में झाड़ू लगाने वाली जमादारिन की बेटी है.’

जमादारिन की खूबसूरत बेटी को सोसाइटी में सभी लोग पहचानते थे लेकिन उस की खूबसूरती की गाज़ उन्हीं के घर पर गिरेगी, यह मालती ने कभी न सोचा था.

फिर उन्होंने खुद ही को समझाया, जरूरी तो नहीं कि यही वह लड़की हो. हो सकता है कोई और लड़की हो जो उन की गैरहाजिरी में उन के घर रवींद्र के साथ सोई थी और रवींद्र इस लड़की से ऐसे ही बातें कर रहा हो.

इंसान की फितरत भी कितनी अजीब है, जो बात उस की पसंद के दायरे से बाहर होती है उसे वह अपनी सोच के दायरे में भी नहीं आने देना चाहता. फिर चाहे वह सारी संभावनाओं सहित उस के सामने ही क्यों न खड़ी हो.

अब रवींद्र के बहकते कदमों का खुलासा तो हो ही चुका था, लेकिन समस्या उस के बहकते कदमों से ज्यादा यह थी कि लड़की कौन है? अगर कहीं वह जमादारिन की लड़की के साथ सोया है और उन का सारा परिवार आज भी उसी के हाथ का बना खाना कहा रहा है, तब उन के उच्च कुल के धर्म का क्या होगा?

क्या उन का धर्म भ्रष्ट हो चुका है? यही सब सोचसोच कर मालती का सिर दर्द से फटने लगा था. अब उन से रुका न गया और उन्होंने ने सारी बात अपने पति को जा बताई और फिलहाल अम्माजी से छिपाने की प्रार्थना की.

मामला संगीन था. दांव पर पैसा या फिर जान नहीं लगी थी. दांव पर लगा था उन का धर्म. उच्च कुलीन ब्राह्मण होने का जो दर्प सारे अग्निहोत्री परिवार के माथे पर दमकता था, वह आज खतरे में था.

अब रवींद्र के कदमों पर दो नहीं चार आंखों का पहरा लग गया था. लेकिन रवींद्र के बाजार जा कर सौदासुल्फ लाने के समय पर कैसे नजर रखी जाए, इस का इलाज अग्निहोत्री दंपती खोज ही रहे थे कि उस की जरूरत ही न पड़ी.

सारे सचझूठ, सारी मानना और अवमाननाओं पर फुलस्टौप लगाता रवींद्र अगले ही दिन उस जमादारिन की बेटी के साथ वरमाला पहने उन के द्वार पर आ खड़ा हुआ.

अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सांप के मुंह में छछूंदर सा इस सचाई को न उगलते बन रहा था न निगलते.

अब मामला पानी की तरह साफ था. रवींद्र को घर से निकालना तो लाजिमी था. लेकिन एक जमादारिन की बेटी के साथ उन के बैड पर सोना और फिर उन्हीं हाथों से उन के परिवार के लिए खाना बनाना, इस पाप का निवारण कैसे होगा…

काश, इस सचाई को भी वे बैड की चादर की तरह बदल पातीं.

उन का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था, लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे? जल्द ही यह बात खुल जाएगी और फिर उन की बिरादरी वाले उन का जीना हराम कर देंगे. बिरादरी में उन का उठनाबैठना बंद कर देंगे. कल को उन के बच्चों के रिश्ते करने में प्रौब्लम  खड़ी करेंगे.

‘ओह, अब हम क्या करें?’ यह सोचसोच कर उन का दिमाग घूम रहा था लेकिन समाधान कहीं दूरदूर तक नज़र नहीं आ रहा था.

क्या यह समस्या सच में रवींद्र की शादी से जुड़ी थी या अग्निहोत्री परिवार की जातपांत की ओछी सोच से?

यह समस्या किसी एक अग्निहोत्री परिवार या किसी एक रवींद्र की नहीं है. यह समस्या है हमारे पढेलिखे समाज के बीच पलती सड़ीगली धार्मिक मान्यताओं की. 21वीं सदी के इस तथाकथित आधुनिक व विकसित समाज की, जो चांद पर पहुंचना तो चाहता है लेकिन जमीनी दलदल से अपने पांव निकालना नहीं चाहता.

यह समस्या जुड़ी है सोकौल्ड स्वर्णों से, जो दलितों के विकास का नारा तो लगा सकते है लेकिन उन को अपने बराबर बिठा नहीं सकते. वे उन्हें उठाना तो चाहते हैं, लेकिन सिर्फ उतना ही जितना स्वर्णों से दबे रहते हुए संभव है.

यह समस्या शुरू होती है हमारी सदियों पुरानी वर्णव्यवस्था से और आ कर रुकती है एक बहुत बड़े प्रश्नचिन्ह पर कि आखिर क्या है दलितों का विकास और क्या मतलब है समानता के अधिकार का? इंसान और इंसान के बीच यह फर्क आखिर कब तक बना रहेगा और क्यों?

The post जातपांत की बिसात: मिसेज मालती का धर्म कैसे भ्रष्ट हुआ? appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/q4rejXG

अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सचाई को सांप के मुंह में छछूंदर सा न उगलते बन रहा था न निगलते. उस का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे?

मिसेज मालती अग्निहोत्री ने घर आए मेहमानों का मुसकराते हुए स्वागत किया और उन्हें सोफ़े पर बैठने का इशारा करते हुए कहा–

“आइए, बैठिए.” फिर बालबच्चों के हाल चाल पूछे और किचन की ओर देख कर आवाज लगाई- “रवींद्र, जरा चायनाश्ता ले आओ और…” उन की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी की रवींद्र चायनाश्ते की ट्रे ले कर ड्राइंगरूम में प्रकट हो गया.

“अरे वाह, मालतीजी, आप का कुक तो बहुत ही एफ़िशिएंट है. बात पूरी होने के पहले ही चाय ले  आया,” मेहमान महिला ने प्रशंसनीय भाव से रवींद्र की ओर देखते हुए कहा.

“वह क्या है न मैडम, जब आप सोसाइटी में दाखिल हुए थे, तभी गार्ड का फोन आया यह बताने के लिए कि मेहमान आ गए हैं. बस, तभी हम ने चाय चढ़ा दी थी,” खीसें निपोरते हुए रवींद्र ने जवाब दिया और मालतीजी ने मुसकराते हुए उसे किचन में जाने का इशारा कर दिया.

मालतीजी के बड़े से घर में 3 पीढ़ियां एकसाथ रहती थीं. उन के सासससुर, उन के पति और  उन के 2 बच्चे. इस भरेपूरे परिवार को मालतीजी 3 नौकरों की मदद से चलाती थीं और बाकी समय अपने सोशल वर्क को देती थीं. रवींद्र के इलावा घर में 2 नौकरानियां थीं और ये सब उन के विला के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते थे.

रवींद्र की तारीफ उन का हर मेहमान करता था. उन की गृहस्थी की गाड़ी को निर्विघ्न चलाने में उस का बड़ा हाथ था. 10 वर्ष पहले पिता की असमय मौत और घर की आर्थिक स्थिति के जर्जर ढांचे ने उस के हाथ से स्कूल का बस्ता छीन कर कढ़ाईचमचा थमा दिया था.

मालतीजी को आज भी वह दिन याद है जब 12 साल के नन्हे से रवींद्र ने पहली बार उन के घर की घंटी बजाई थी. किचन में कुक को खाना बनाने के बारे में निर्देश देती मालतीजी ने नौकरानी को दरवाज़ा खोलने के लिए कहा था. कुछ देर में नौकरानी ने आ कर बताया था कि-

‘एक बच्चा आप की सहेली की नौकरानी के साथ आया है.’

‘ओहो, मैं तो भूल ही गई,’ वे माथे पर हाथ मार कर बोली थीं और उन्हें एक दिन पहले अपनी सहेली के साथ फोन पर हुई वार्त्ता याद हो आई थी जब उन की सहेली कह रही थी- ‘हैलो मालती, तुझ से कुछ बात करनी थी.’

‘हां बोल न, इतना क्या सोच रही है,’ मालती ने अपनेपन से कहा था.

‘वह मेरी मेड है न, मीरा,’ सहेली बोली.

‘हां, क्या हुआ उसे?’ मालती ने व्यग्रता से पूछा.

‘उसे कुछ नहीं हुआ, उस की बहन के पति का ऐक्सिडैंट में देहांत हो गया.’

‘ओ गौड, यह तो बहुत बुरा हुआ. वैसे कौनकौन हैं उस के परिवार में?’

‘परिवार में तो 12 साल का बेटा, 6 साल की बेटी और वह औरत खुद है. लेकिन कमाने वाला अकेला उस का पति ही था,’ सहेली ने बताया.

‘सो सैड, अब वह क्या करेगी?’ मालती ने संवेदना दर्शाते हुए पूछा था.

‘मैं सोच रही थी कि उसे और उस के बेटे को कहीं काम मिल जाता तो उन की जीवन की गाड़ी चल पड़ती,’ सहेली ने जरा सोच कर कहा.

‘बात तो ठीक है. और औरत तो चलो काम कर लेगी, लेकिन 12 साल का बच्चा भला क्या काम कर सकता है?’

‘वो, तू कह रही थी न, कि तेरा कुक बहुत बूढ़ा हो गया है, जल्दीजल्दी काम नहीं कर पाता लेकिन खाना तुम्हें उसी के हाथ का पसंद है?’ सहेली ने कहा.

‘हां यह तो है, लेकिन इस से बच्चे का क्या लेनादेना?’

‘क्यों न तू इस बच्चे को अपने कुक की मदद के लिए रख ले. धीरेधीरे जब तक वह रिटायर्ड होगा तब तक यह बच्चा उस से काम सीख लेगा.’

‘हां बात तो ठीक है, लेकिन तुझे तो पता है न, मेरे सासससुर जातपांत को कितना महत्त्व देते हैं. उन के रहते हुए तो हम हर किसी को किचन में घुसा नहीं सकते.’

‘उस की तू चिंता मत कर. ये लोग उच्च कोटि के ब्राह्मण हैं. यह परिवार बहुत ईमानदार और सरल है. इसीलिए तो मैं चिंतित हूं कि ब्राह्मण जात हैं ये, जाने कहां मारेमारे फिरेंगे.’

‘तू क्या उन्हें पर्सनली जानती है?’ मालती ने हैरानी से पूछा.

‘हांहां, कई बार मेरी मेड के साथ आते रहे हैं. लड़का भी बड़ा प्यारा बच्चा है. हाथ से दिए बिना किसी चीज को छूता तक नहीं है. उस की गारंटी तो मैं भी दे सकती हूं.’

‘ऐसी बात है, तो फिर ठीक है. तू उसे कल सुबह अपनी मेड के साथ मेरे यहां भेज देना. मैं बात कर लूंगी,’ मालतीजी ने हर तरह से आश्वस्त हो कर कहा.

एक दिन पहले कि ये सब बातें याद आते ही मालतीजी ने बच्चे को अंदर बुलवा लिया. फिर कुक को दी जाने वाली अपनी हिदायतों की लिस्ट खत्म कर के ड्राइंगरूम में सोफ़े पर आ कर बैठ गईं.

कुछ देर में एक सलोना सा भोलाभाला चेहरा उन के सामने आ खड़ा हुआ. साफसुथरे कपड़े और करीने से बने तेल लगे बाल देख कर उन्हें अच्छा लगा. अपनी बड़ीबड़ी आंखों में आश्चर्य और असमंजस के भाव लिए यह लड़का मालतीजी के दिल को भा गया था. उसे पास बुला कर उन्होंने प्यार से पूछा-

‘तुम्हारा नाम क्या है?’

‘रवींद्र, मां रवि बुलाती हैं,’ अपने पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदते हुए वह बोला.

‘खाना खाया?’ मालतीजी ने थोड़ा झुक कर उस की आंखों में झांकने की कोशिश करते पूछा.

‘सुबह चाय पी थी,’ उस ने एक बार नजर उठाई और फिर झुका ली.

‘काका, रवींद्र के लिए नाश्ता लाना,’ उन्होंने किचन की ओर देख कर अपने कुक को आवाज लगाई.

आलू के 2 परांठे और एक गिलास दूध खत्म करने में उसे कुछ ही मिनट लगे. मालतीजी ने उस के सिर पर हाथ फिराते हुए पूछा- ‘हमारे घर में रहोगे?’

‘हां,’ वह शरमा कर बोला. शायद उस की मां ने उसे पहले से सब समझा कर भेजा था.

‘ठीक है,’ मालतीजी ने उठते हुए कहा.

फिर अपने कुक को बुला कर उन्होंने रवींद्र को उस के सुपुर्द किया और उसे छोटेछोटे काम समझाने की हिदायत दे कर वे अपने काम में व्यस्त हो गईं.

उस की साफसफाई की आदत और हंसमुख स्वभाव ने जल्द ही घर में अपनी जगह बना ली. हालांकि शुरूशुरू में वह टमाटरप्याज काटने के अलावा कुछ खास मदद नहीं कर पाता था लेकिन धीरेधीरे वह न केवल घर के हर सदस्य के हिसाब से खाना बनाना सीख गया था बल्कि हर सदस्य के मिजाज को भी बखूबी समझने लगा था.

वक़्त के साथ किचन के काम का सारा भार बूढ़े होते कुक के हाथों से निकल कर जवान होते रवींद्र के कंधों पर आ गया था. अब तो कुक को रिटायर हुए कई साल हो चुके हैं और किचन में रवींद्र का एकछत्र राज है. यह काम वह सालों से अकेले ही बड़े सलीके से संभालता आ रहा है.

रवींद्र को अग्निहोत्री परिवार में आए एक अरसा हो चुका था. अब वह इस घर का सदस्य था. उस के बिना मालतीजी का किचन ऐसा था जैसे सिंदूर बिना सुहागन. 12 साल का मासूम बच्चा अब 22 साल के सजीले नौजवान में तबदील हो चुका था.

एक सुबह मालतीजी ने रवींद्र को बुलाया और उसे बताया कि अगले दिन सारा परिवार उन की बहन की बेटी की शादी में दूसरे शहर जा रहा है. सुबह नाश्ते के बाद सब निकलेंगे और 2 दिन बाद लौटेंगे. घर में वही सब से पुराना और जिम्मेदार व्यक्ति था, इसलिए घर का ध्यान रखना और किसी अनजान व्यक्ति को घर में न आने देना उसी की जिम्मेदारी थी.

इस खबर को सुनते ही रवींद्र के चेहरे पर एक हलकी सी मुसकान दौड़ गई जो मालती को बड़ी बेमौका लगी.  लेकिन अपने व्यस्त कार्यक्रम के चलते उन्होंने इस ओर कोई खास तवज्जुह नहीं दी. रवींद्र महीने में एक बार अपनी मां और बहन से मिलने जाता था, बाकी समय वह वहीं बना रहता था. उस के रहते मालती को कभी घर की चिंता नहीं करनी पड़ी थी.

2 दिनों बाद थकन से चूर अग्निहोत्री परिवार घर वापस लौटा. मालतीजी रवींद्र को चाय बनाने के लिए  कह कर अपने बैडरूम की ओर बढ़ गईं. वे अपने बैड पर बैठी ही थीं की उन की नजर अपने बैड के साइड में पड़े यूज़्ड कंडोम पर पड़ी तो वे ऐसे चौंक पड़ीं जैसे उन्हे सांप दिख गया हो. वे तुरंत बैड से उठ गईं और सिर पकड़ कर पास पड़ी कुरसी पर बैठ गईं. फिर खुद से ही बड़बड़ाईं-

‘ओह, यह क्या चल रहा है हमारे पीठपीछे… बैडरूम की चाबी रवींद्र के ही पास थी और कुछ दिनों से रवींद्र के रंगढंग कुछ बदले से लग रहे थे, तो यह करतूत तो उसी की है लेकिन उस के इतनी जल्दी पर निकल आएंगे, यह तो मैं ने कभी सोचा भी न था.’

फिर उन्होंने नौकरानी को आवाज लगाई और उसे तुरंत बैड की चादर, तकिए बदलने का आदेश दिया. नौकरानी ने सवालिया नजर बैड की साफ चादर पर डाली, फिर अपनी मालकिन पर डाली.

चादर बदलो, देख क्या रही हो.’ वे गुस्से में बोलीं.

फिर उन्होंने सोचा, चादर तो ये बदल देगी, लेकिन उस घटना को कौन बदलेगा जो उन की गैरहाजिरी में वहां घट चुकी थी.

मालती अपनी सासुमां के जितनी दकियानूसी और संकीर्ण विचारों वाली तो नहीं थी लेकिन इस तरह का उन्मुक्त सैक्स उन के संस्कारों के दायरे से भी बाहर था. जो पाप हो चुका है उस का वे क्या करें, समझ नहीं आ रहा था. काश, कंप्यूटर की तरह ज़िंदगी में भी कोई ‘अनडू’ का विकल्प होता.

वे रवींद्र को आवाज लगाने ही वाली थीं कि पूछूं तो सही कि उस की ये सब करने की हिम्मत कैसे हुई? उस ने यह पाप कर के अपने और हमारे कुल की मर्यादा को दांव पर कैसे लगा दिया? और ये बेशर्म लड़की कौन थी? और फिर अगर सब ठीक लगा तो उस की शादी ही करवा देंगी.

लेकिन फिर उन्होंने खुद को रोका और सोचा कि चूंकि यह पाप तो रवींद्र ने किया ही है, इस में तो कोई शक नहीं है, लेकिन यदि यह बात सीधेसीधे उस से पूछी गई, तो वह शायद सच न बताए और चौकन्ना भी हो जाए. ऐसे में बात की जड़ तक पहुंचना और भी मुश्किल हो जाएगा. इस से बेहतर तो यही होगा कि कुछ दिन अनजान बनने का नाटक करो और उसे अगली बार रंगेहाथ पकड़ो.

बस, फिर तो अगले दिन से मालती की तेज नजर रवींद्र के हर कदम पर रहने लगी. वह कब, किस से और क्या बात कर रहा है, ये सब मालती की नज़रों के कैमरे में हर समय कैद होता रहता.

एक दिन मालती अपनी बालकनी में बैठी शाम की चाय का आनंद ले रही थी. रवींद्र नीचे सब्जी लाने गया था. तभी उन की नजर नीचे पार्क में एक लड़की से बात करते हुए रवींद्र पर पड़ी.

उन्होंने तुरंत अपना दूर का चश्मा लगाया और लड़की को पहचानने की कोशिश करने लगीं. फिर लड़की को पहचानते हुए हैरानी से बोलीं-

‘यह तो सोसाइटी में झाड़ू लगाने वाली जमादारिन की बेटी है.’

जमादारिन की खूबसूरत बेटी को सोसाइटी में सभी लोग पहचानते थे लेकिन उस की खूबसूरती की गाज़ उन्हीं के घर पर गिरेगी, यह मालती ने कभी न सोचा था.

फिर उन्होंने खुद ही को समझाया, जरूरी तो नहीं कि यही वह लड़की हो. हो सकता है कोई और लड़की हो जो उन की गैरहाजिरी में उन के घर रवींद्र के साथ सोई थी और रवींद्र इस लड़की से ऐसे ही बातें कर रहा हो.

इंसान की फितरत भी कितनी अजीब है, जो बात उस की पसंद के दायरे से बाहर होती है उसे वह अपनी सोच के दायरे में भी नहीं आने देना चाहता. फिर चाहे वह सारी संभावनाओं सहित उस के सामने ही क्यों न खड़ी हो.

अब रवींद्र के बहकते कदमों का खुलासा तो हो ही चुका था, लेकिन समस्या उस के बहकते कदमों से ज्यादा यह थी कि लड़की कौन है? अगर कहीं वह जमादारिन की लड़की के साथ सोया है और उन का सारा परिवार आज भी उसी के हाथ का बना खाना कहा रहा है, तब उन के उच्च कुल के धर्म का क्या होगा?

क्या उन का धर्म भ्रष्ट हो चुका है? यही सब सोचसोच कर मालती का सिर दर्द से फटने लगा था. अब उन से रुका न गया और उन्होंने ने सारी बात अपने पति को जा बताई और फिलहाल अम्माजी से छिपाने की प्रार्थना की.

मामला संगीन था. दांव पर पैसा या फिर जान नहीं लगी थी. दांव पर लगा था उन का धर्म. उच्च कुलीन ब्राह्मण होने का जो दर्प सारे अग्निहोत्री परिवार के माथे पर दमकता था, वह आज खतरे में था.

अब रवींद्र के कदमों पर दो नहीं चार आंखों का पहरा लग गया था. लेकिन रवींद्र के बाजार जा कर सौदासुल्फ लाने के समय पर कैसे नजर रखी जाए, इस का इलाज अग्निहोत्री दंपती खोज ही रहे थे कि उस की जरूरत ही न पड़ी.

सारे सचझूठ, सारी मानना और अवमाननाओं पर फुलस्टौप लगाता रवींद्र अगले ही दिन उस जमादारिन की बेटी के साथ वरमाला पहने उन के द्वार पर आ खड़ा हुआ.

अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सांप के मुंह में छछूंदर सा इस सचाई को न उगलते बन रहा था न निगलते.

अब मामला पानी की तरह साफ था. रवींद्र को घर से निकालना तो लाजिमी था. लेकिन एक जमादारिन की बेटी के साथ उन के बैड पर सोना और फिर उन्हीं हाथों से उन के परिवार के लिए खाना बनाना, इस पाप का निवारण कैसे होगा…

काश, इस सचाई को भी वे बैड की चादर की तरह बदल पातीं.

उन का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था, लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे? जल्द ही यह बात खुल जाएगी और फिर उन की बिरादरी वाले उन का जीना हराम कर देंगे. बिरादरी में उन का उठनाबैठना बंद कर देंगे. कल को उन के बच्चों के रिश्ते करने में प्रौब्लम  खड़ी करेंगे.

‘ओह, अब हम क्या करें?’ यह सोचसोच कर उन का दिमाग घूम रहा था लेकिन समाधान कहीं दूरदूर तक नज़र नहीं आ रहा था.

क्या यह समस्या सच में रवींद्र की शादी से जुड़ी थी या अग्निहोत्री परिवार की जातपांत की ओछी सोच से?

यह समस्या किसी एक अग्निहोत्री परिवार या किसी एक रवींद्र की नहीं है. यह समस्या है हमारे पढेलिखे समाज के बीच पलती सड़ीगली धार्मिक मान्यताओं की. 21वीं सदी के इस तथाकथित आधुनिक व विकसित समाज की, जो चांद पर पहुंचना तो चाहता है लेकिन जमीनी दलदल से अपने पांव निकालना नहीं चाहता.

यह समस्या जुड़ी है सोकौल्ड स्वर्णों से, जो दलितों के विकास का नारा तो लगा सकते है लेकिन उन को अपने बराबर बिठा नहीं सकते. वे उन्हें उठाना तो चाहते हैं, लेकिन सिर्फ उतना ही जितना स्वर्णों से दबे रहते हुए संभव है.

यह समस्या शुरू होती है हमारी सदियों पुरानी वर्णव्यवस्था से और आ कर रुकती है एक बहुत बड़े प्रश्नचिन्ह पर कि आखिर क्या है दलितों का विकास और क्या मतलब है समानता के अधिकार का? इंसान और इंसान के बीच यह फर्क आखिर कब तक बना रहेगा और क्यों?

The post जातपांत की बिसात: मिसेज मालती का धर्म कैसे भ्रष्ट हुआ? appeared first on Sarita Magazine.

May 30, 2022 at 10:17AM

कायनात मुस्कुरा उठी: पराग की मनोदशा आखिर क्यों बिगड़ी?

बरसों से सजा पोते की शादी का ख्वाब वाकई आज सच होने जा रहा था. तभी फिजां में स्वरलहरी गूंज उठी. उन्हें लगा कि उन के साथसाथ पूरी कायनात मुसकरा रही थी. क्या तानी पराग की मनःस्थिति सुधार पाने में कामयाब हो पाई? पराग की मनःस्थिति आखिर क्यों बिगड़ी?

The post कायनात मुस्कुरा उठी: पराग की मनोदशा आखिर क्यों बिगड़ी? appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/YDGzvce

बरसों से सजा पोते की शादी का ख्वाब वाकई आज सच होने जा रहा था. तभी फिजां में स्वरलहरी गूंज उठी. उन्हें लगा कि उन के साथसाथ पूरी कायनात मुसकरा रही थी. क्या तानी पराग की मनःस्थिति सुधार पाने में कामयाब हो पाई? पराग की मनःस्थिति आखिर क्यों बिगड़ी?

The post कायनात मुस्कुरा उठी: पराग की मनोदशा आखिर क्यों बिगड़ी? appeared first on Sarita Magazine.

May 30, 2022 at 10:11AM

कायनात मुस्कुरा उठी- भाग 1: पराग की मनोदशा आखिर क्यों बिगड़ी?

“दादाजी, दादाजी, आप भी चलिए न हमारे साथ. हम दोनों के साथ डांस करिए न, प्लीज दादाजी,” नलिनजी के पोते की मंगेतर तानी ने अपनी शादी के उपलक्ष्य में आयोजित संगीत संध्या के प्रोग्राम में अपना डांस बीच में छोड़ कर स्टेज से नीचे आ कर अपने होने वाले दादा ससुर को अपने और अपने मंगेतर पराग के साथ नाचने के लिए कहा.

“अरे बेटा तुम लोग नाचो.  मैं तुम लोगों को देख कर ही खुश हो रहा हूं यहां बैठेबैठे. जाओ बेटा स्टेज पर जाओ,” दादाजी ने तानी को बेहद लाड़ से पुचकारते  हुए कहा.

तभी उन का पोता पराग  स्टेज के नीचे दादाजी के पास आया और  डांस करने के लिए उन से इसरार करने लगा, “दादाजी, आप स्टेज पर नहीं आएंगे तो मैं भी डांस नहीं करूंगा, हां… ”

“अरे बेटा, तुम दोनों को साथसाथ नाचते देख मेरी आत्मा तृप्त हो गई. अब इन बूढ़ी हड्डियों में दम नहीं रहा बेटा. तुम दोनों डांस करो.  मुझे तुम दोनों को एकसाथ डांस करते देख कर बेहद  खुशी मिल रही है.”

“नहीं, आज आप भी हम दोनों के साथ डांस करेंगे,” कहते हुए पराग ने दादाजी का हाथ पकड़ कर जबरदस्ती उन्हें उठा दिया और उन्हें सहारा देते हुए स्टेज पर ले गया.

पराग और तानी दोनों दादाजी का एकएक हाथ पकड़ गोला बना कर एक मधुर गाने की धुन पर डांस करने लगे.

आज उन की खुशी की इंतिहा नहीं थी. आज उन के एकमात्र पोते पराग की सगाई और संगीत संध्या का प्रोग्राम था. कल उस की शादी होने वाली थी.

इतनी आपदाओंविपदाओं के बाद आज यह दिन आया था, यही सब सोचतेसोचते उन की आंखों की कोरें भीग  आईं, और दस मिनट पराग और तानी के साथ उलटेसीधे हाथपैर चला कर वह स्टेज से नीचे आ गए.

आज के खुशनुमा मौके पर उन्हें पराग के मृत पिता नमन, मां संजना और बड़े भाई संकल्प की याद शिद्दत से आ रही थी. कलेजे में तीखी हूक उठी, “काश, आज वे तीनों जिंदा होते तो समां ही कुछ और होता,” यह सोचतेसोचते उन के गले में रुलाई उमड़ी और वह सुबकने से खुद को नहीं रोक पाए.

उन्हें यों आंसू बहाते देख तानी और पराग उन के पास आए और उन्हें चुप करा कर वह उन के साथ ही बैठ गए और प्रोग्राम खत्म होने तक बैठे रहे. उन दोनों ने उन के साथ ही खाना खाया.

रात के बारह बजने आए. प्रोग्राम और खानापीना खत्म होने के बाद सब लोग घर वापस आ गए. तानी  और पराग उन्हें उन के पलंग पर सुलाने आए, ‘दादाजी, आप थक गए होंगे. अब आप सो जाइए, सुबह मिलते हैं,” कहते हुए उन दोनों ने उन्हें चादर ओढ़ाई और कहा, “लव यू दादाजी, गुड नाइट,” और दोनों कमरे के बाहर आ गए.

आज उन्हें पराग के पिता यानी अपने मृत बेटे नमन की याद बुरी तरह सता रही थी. न जाने कब अनायास ही उन का मन पुरानी स्मृतियों के बीहड़ में भटकने लगा, उन्हें भान न हुआ.

नमन उन का लाड़ला एकलौता बेटा था. न जाने कितने मंदिरोंमजारों की चौखट पर मनौतियों के बाद शादी के पांच वर्षों बाद उन की गोद में आया था.

उसे दिनोंदिन बढ़ता देख वे दोनों पतिपत्नी ह्रदय की भीतरी तह तक तृप्त हो जाते. वह था भी इतना अच्छा कि वे दोनों उस की बड़ाई करते नहीं थकते. कुशाग्र बुद्धि का था, तो पहली बार में सीए की सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली, और सीए बन कर एक बड़ी एमएनसी में लग गया.

पतिपत्नी जबजब बेटे का मुंह देखते, उन्हें लगता कि उन के किसी जन्म के पुण्य प्रताप से उन्हें उस जैसी संतान मिली.

उस की नौकरी लगने के 2 वर्षों बाद उन्होंने बड़े ही लाड़चाव से बेटे की पसंद की शादी की. उन की बहू संजना भी सीए थी, और  नमन के साथ ही नौकरी करती थी. बेटेबहू की साक्षात रामसीता की जोड़ी देख दोनों पतिपत्नी फूले न समाते.

उन की आशा के अनुरूप बहू भी बेहद संस्कारी, गुणी  और समझदार निकली.  घर जोड़ कर चलने वाली थी. उस के दो बेटे हुए. 2-2 पोतों को अपने आंगन में खेलते देख नलिनजी और उन की पत्नी ईश्वर का लाखलाख शुक्रिया अदा करते.

वक्त के साथ पोते बड़े  हुए. दोनों ही मातापिता के नक्शेकदम पर चलते सीए बनने की पढ़ाई कर रहे थे.

वह दिन उन की जिंदगी का एक यादगार दिन था, जिस दिन बड़े पोते संकल्प के सीए की फाइनल परीक्षा का परिणाम आया. उस ने पहली ही बार में सीए क्लीयर कर लिया था.

वह अपने हर परिचित, जानने वाले के सामने पोते की इस सफलता का बखान करते नहीं अघाते. लेकिन उन्हें क्या पता था कि उन के सुख पर उन की अपनी नजर ही डाका डालेगी.

उन्हें लेशमात्र भी संदेह नहीं था कि पिछले जन्मों के कुछ बुरे कर्म भी उन के खाते में दर्ज थे, जिन का हिसाब उन्हें इस जन्म में चुकाना था.

उन की जिंदगी का वह मनहूस दिन उन के जेहन में आज भी यों ताजा था, जैसे कल की ही बात हो.

वह पत्नी के साथ अपने रिटायरमेंट तक सप्तपुरी यानी सात पवित्र शहरों की यात्रा कर चुके थे. अब उन की चार धामों की यात्रा की प्रबल इच्छा थी. उन्होंने बड़े पोते संकल्प से कह रखा था कि वे दोनों उस की नौकरी लगने पर पहली तनख्वाह से चार धामों की यात्रा करना चाहेंगे.

उन दिनों चारों धामों की 16 दिनों की यात्रा के लिए एक विशेष ट्रेन चलती थी. दादादादी की इच्छा का मान रखते हुए संकल्प ने अपनी पहली तनख्वाह से उन दोनों  के लिए इस ट्रेन यात्रा की टिकट खरीद कर दी. वे दोनों अपने एक भतीजे के साथ हंसीखुशी यात्रा कर आए.

राजस्थान में प्रचलित जनआस्था के अनुरूप सप्तपुरी और चार धामों की यात्रा के बाद जयपुर के पवित्र गलता कुंड में बिना स्नान किए तीर्थयात्रियों की तीर्थयात्रा अधूरी मानी जाती थी.

तो एक छुट्टी के दिन वे दोनों पतिपत्नी पूरे परिवार के साथ गलता कुंड में स्नान के लिए तड़के सुबह गलताजी पहुंचे. पहले उन्होंने वहां के सभी मंदिरों के दर्शन किए.

“संकल्प भैया, नैचुरल ब्यूटी  में तो यह जगह बेजोड़ है, लेकिन ये जगहजगह मंदिरों की दीवारों का उखड़ता पलस्तर और यहांवहां फैली गंदगी ने यहां घूमने का सारा मजा किरकिरा कर दिया.”

“यह तो है, यह जगह इतनी सुंदर है पराग कि अगर इस की ढंग से मेंटीनेंस की जाए, तो यह जयपुर के एक बेहतरीन टूरिस्ट स्पौट में बदल सकता है.”

“देखो भैया, वो फौरेनर कैसे उस बंदर को अपने कंधों पर बैठा कर फोटो खिंचवा रही है. ओह, यहां के बंदर बहुत दोस्ताना हैं.”

“हां, देखो वह बंदर तो उस लड़की से हैंड शेक कर रहा है,” तभी संकल्प ने तनिक मुसकराते हुए कहा.

तभी दादाजी बोले, “चलो, अब मंदिरों के दर्शन तो कर लिए, अब गलता कुंड में नहा लें. चलो बच्चो.”

लेकिन किसी को क्या खबर थी कि गलता कुंड में साक्षात महाकाल उन्हें अपने शिकंजे में कसने के लिए घात लगाए बैठा था.

उन्हें यदि लेशमात्र भी संदेह होता कि जीवनमृत्यु के अंतहीन चक्र से मुक्ति पाने के लिए गलता कुंड में लगाई गई डुबकी उन के अशेष दुखों का निमित्त बनेगी तो वह सपने में भी वहां जाने का खयाल तक न करते, लेकिन यमराज तो शायद उन के घर पर अपनी काली छाया का ग्रहण लगा चुके थे.

वह पत्नी सहित अपने बेटे, बहू और पोतों के साथ राम नाम जपते हुए गलता कुंड में उतरे.

गलता कुंड में नहाने उतरी उन के बेटे नमन की पत्नी, उन की इकलौती बहू का पांव देखते ही देखते फिसल गया और वह न जाने कैसे कुंड के गहरे पानी में चली गई, और पानी में डूबने लगी.

पत्नी को असहाय पानी में हाथपैर मारते देख पहले उन का बेटा नमन गहरे पानी की ओर बढ़ा, लेकिन  वह भी अपना संतुलन खो बैठा और गहरे पानी में डूबने लगा.

मां और पापा दोनों को डूबता देख उन का बड़ा बेटा संकल्प हिम्मत कर उन्हें बचाने गहरे पानी में उतरा, लेकिन कुंड की गहराई उसे भी देखतेदेखते लील गई.

यह सब देख वे दोनों पतिपत्नी घबराहट और दहशत से चीखपुकार मचाने लगे.

पराग, उन का छोटा पोता उन दोनों को चीखतेचिल्लाते देख उन्हें समझातेबुझाते किनारे पर ले गया, और उन्हें तसल्ली देने  लगा कि “संकल्प भैया को तैरना आता है, इसलिए वह मम्मापापा को बचा कर ले आएगा”, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था.

मोक्ष पाने की कामना से किए गए इस स्नान ने उन्हें और उन की पत्नी के लिए इसी धरती पर साक्षात नर्क के द्वार खोल दिए.

पलभर पहले हंसतेचहकते तीन प्राणी लाश बन कर लौटे.

अपनी आंखों के सामने एकलौते बेटे, बहू और जवान पोते की मृत्यु देखने के संताप से बढ़ कर शायद कोई दुख नहीं.

तीनतीन संतानों को खो कर वह और पत्नी पत्थर के बन कर रह गए. इस गम से पत्नी ने खाट पकड़ ली और इस सदमे से वह साल के भीतर ही भगवान को प्यारी हो गई.

दादाजी ने एकमात्र बचे  छोटे पोते को अपने सीने से लगा लिया. बेटा, बहू और एक पोते को खोने के बाद अब पराग ही उन के जीने का एकमात्र सहारा था.

इधर पलक झपकते ही मां, पापा और बड़े भाई को खो कर पराग अर्धविक्षिप्त सा हो गया. वह दिनदिन भर अपने कमरे में बैठा शून्य में ताकता. न उसे खानेपीने की सुध रहती, न नहानेधोने या पढ़ाई करने की. रातों को नींद न आती. दादाजी उसे अपने कलेजे से लगा कर थपकियां देते हुए सुलाने की लाख कोशिश करते, लेकिन वह एक घड़ी भी सो न पाता.

उसे सुकून मिलता तो महज अपनी गर्लफ्रैंड तानी के साथ. वह उस के घर के सामने रहने वाले एक परिवार की बेटी थी.

वे दोनों बचपन से एकसाथ पलेबढ़े थे. इस दुर्घटना के महज एक सप्ताह बाद ही उन दोनों को सीए फाइनल का एग्जाम देना था.

तानी ने तो सीए का फाइनल एग्जाम दिया और उस ने पहली ही बार में उत्तीर्ण कर लिया, लेकिन घर में तीनतीन मौतों के बाद पराग की मानसिक हालत ऐसी न थी कि वह परीक्षा दे पाता. तो उस ने उस बार सीए फाइनल एग्जाम नहीं दिया.

The post कायनात मुस्कुरा उठी- भाग 1: पराग की मनोदशा आखिर क्यों बिगड़ी? appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/FXGyYPL

“दादाजी, दादाजी, आप भी चलिए न हमारे साथ. हम दोनों के साथ डांस करिए न, प्लीज दादाजी,” नलिनजी के पोते की मंगेतर तानी ने अपनी शादी के उपलक्ष्य में आयोजित संगीत संध्या के प्रोग्राम में अपना डांस बीच में छोड़ कर स्टेज से नीचे आ कर अपने होने वाले दादा ससुर को अपने और अपने मंगेतर पराग के साथ नाचने के लिए कहा.

“अरे बेटा तुम लोग नाचो.  मैं तुम लोगों को देख कर ही खुश हो रहा हूं यहां बैठेबैठे. जाओ बेटा स्टेज पर जाओ,” दादाजी ने तानी को बेहद लाड़ से पुचकारते  हुए कहा.

तभी उन का पोता पराग  स्टेज के नीचे दादाजी के पास आया और  डांस करने के लिए उन से इसरार करने लगा, “दादाजी, आप स्टेज पर नहीं आएंगे तो मैं भी डांस नहीं करूंगा, हां… ”

“अरे बेटा, तुम दोनों को साथसाथ नाचते देख मेरी आत्मा तृप्त हो गई. अब इन बूढ़ी हड्डियों में दम नहीं रहा बेटा. तुम दोनों डांस करो.  मुझे तुम दोनों को एकसाथ डांस करते देख कर बेहद  खुशी मिल रही है.”

“नहीं, आज आप भी हम दोनों के साथ डांस करेंगे,” कहते हुए पराग ने दादाजी का हाथ पकड़ कर जबरदस्ती उन्हें उठा दिया और उन्हें सहारा देते हुए स्टेज पर ले गया.

पराग और तानी दोनों दादाजी का एकएक हाथ पकड़ गोला बना कर एक मधुर गाने की धुन पर डांस करने लगे.

आज उन की खुशी की इंतिहा नहीं थी. आज उन के एकमात्र पोते पराग की सगाई और संगीत संध्या का प्रोग्राम था. कल उस की शादी होने वाली थी.

इतनी आपदाओंविपदाओं के बाद आज यह दिन आया था, यही सब सोचतेसोचते उन की आंखों की कोरें भीग  आईं, और दस मिनट पराग और तानी के साथ उलटेसीधे हाथपैर चला कर वह स्टेज से नीचे आ गए.

आज के खुशनुमा मौके पर उन्हें पराग के मृत पिता नमन, मां संजना और बड़े भाई संकल्प की याद शिद्दत से आ रही थी. कलेजे में तीखी हूक उठी, “काश, आज वे तीनों जिंदा होते तो समां ही कुछ और होता,” यह सोचतेसोचते उन के गले में रुलाई उमड़ी और वह सुबकने से खुद को नहीं रोक पाए.

उन्हें यों आंसू बहाते देख तानी और पराग उन के पास आए और उन्हें चुप करा कर वह उन के साथ ही बैठ गए और प्रोग्राम खत्म होने तक बैठे रहे. उन दोनों ने उन के साथ ही खाना खाया.

रात के बारह बजने आए. प्रोग्राम और खानापीना खत्म होने के बाद सब लोग घर वापस आ गए. तानी  और पराग उन्हें उन के पलंग पर सुलाने आए, ‘दादाजी, आप थक गए होंगे. अब आप सो जाइए, सुबह मिलते हैं,” कहते हुए उन दोनों ने उन्हें चादर ओढ़ाई और कहा, “लव यू दादाजी, गुड नाइट,” और दोनों कमरे के बाहर आ गए.

आज उन्हें पराग के पिता यानी अपने मृत बेटे नमन की याद बुरी तरह सता रही थी. न जाने कब अनायास ही उन का मन पुरानी स्मृतियों के बीहड़ में भटकने लगा, उन्हें भान न हुआ.

नमन उन का लाड़ला एकलौता बेटा था. न जाने कितने मंदिरोंमजारों की चौखट पर मनौतियों के बाद शादी के पांच वर्षों बाद उन की गोद में आया था.

उसे दिनोंदिन बढ़ता देख वे दोनों पतिपत्नी ह्रदय की भीतरी तह तक तृप्त हो जाते. वह था भी इतना अच्छा कि वे दोनों उस की बड़ाई करते नहीं थकते. कुशाग्र बुद्धि का था, तो पहली बार में सीए की सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली, और सीए बन कर एक बड़ी एमएनसी में लग गया.

पतिपत्नी जबजब बेटे का मुंह देखते, उन्हें लगता कि उन के किसी जन्म के पुण्य प्रताप से उन्हें उस जैसी संतान मिली.

उस की नौकरी लगने के 2 वर्षों बाद उन्होंने बड़े ही लाड़चाव से बेटे की पसंद की शादी की. उन की बहू संजना भी सीए थी, और  नमन के साथ ही नौकरी करती थी. बेटेबहू की साक्षात रामसीता की जोड़ी देख दोनों पतिपत्नी फूले न समाते.

उन की आशा के अनुरूप बहू भी बेहद संस्कारी, गुणी  और समझदार निकली.  घर जोड़ कर चलने वाली थी. उस के दो बेटे हुए. 2-2 पोतों को अपने आंगन में खेलते देख नलिनजी और उन की पत्नी ईश्वर का लाखलाख शुक्रिया अदा करते.

वक्त के साथ पोते बड़े  हुए. दोनों ही मातापिता के नक्शेकदम पर चलते सीए बनने की पढ़ाई कर रहे थे.

वह दिन उन की जिंदगी का एक यादगार दिन था, जिस दिन बड़े पोते संकल्प के सीए की फाइनल परीक्षा का परिणाम आया. उस ने पहली ही बार में सीए क्लीयर कर लिया था.

वह अपने हर परिचित, जानने वाले के सामने पोते की इस सफलता का बखान करते नहीं अघाते. लेकिन उन्हें क्या पता था कि उन के सुख पर उन की अपनी नजर ही डाका डालेगी.

उन्हें लेशमात्र भी संदेह नहीं था कि पिछले जन्मों के कुछ बुरे कर्म भी उन के खाते में दर्ज थे, जिन का हिसाब उन्हें इस जन्म में चुकाना था.

उन की जिंदगी का वह मनहूस दिन उन के जेहन में आज भी यों ताजा था, जैसे कल की ही बात हो.

वह पत्नी के साथ अपने रिटायरमेंट तक सप्तपुरी यानी सात पवित्र शहरों की यात्रा कर चुके थे. अब उन की चार धामों की यात्रा की प्रबल इच्छा थी. उन्होंने बड़े पोते संकल्प से कह रखा था कि वे दोनों उस की नौकरी लगने पर पहली तनख्वाह से चार धामों की यात्रा करना चाहेंगे.

उन दिनों चारों धामों की 16 दिनों की यात्रा के लिए एक विशेष ट्रेन चलती थी. दादादादी की इच्छा का मान रखते हुए संकल्प ने अपनी पहली तनख्वाह से उन दोनों  के लिए इस ट्रेन यात्रा की टिकट खरीद कर दी. वे दोनों अपने एक भतीजे के साथ हंसीखुशी यात्रा कर आए.

राजस्थान में प्रचलित जनआस्था के अनुरूप सप्तपुरी और चार धामों की यात्रा के बाद जयपुर के पवित्र गलता कुंड में बिना स्नान किए तीर्थयात्रियों की तीर्थयात्रा अधूरी मानी जाती थी.

तो एक छुट्टी के दिन वे दोनों पतिपत्नी पूरे परिवार के साथ गलता कुंड में स्नान के लिए तड़के सुबह गलताजी पहुंचे. पहले उन्होंने वहां के सभी मंदिरों के दर्शन किए.

“संकल्प भैया, नैचुरल ब्यूटी  में तो यह जगह बेजोड़ है, लेकिन ये जगहजगह मंदिरों की दीवारों का उखड़ता पलस्तर और यहांवहां फैली गंदगी ने यहां घूमने का सारा मजा किरकिरा कर दिया.”

“यह तो है, यह जगह इतनी सुंदर है पराग कि अगर इस की ढंग से मेंटीनेंस की जाए, तो यह जयपुर के एक बेहतरीन टूरिस्ट स्पौट में बदल सकता है.”

“देखो भैया, वो फौरेनर कैसे उस बंदर को अपने कंधों पर बैठा कर फोटो खिंचवा रही है. ओह, यहां के बंदर बहुत दोस्ताना हैं.”

“हां, देखो वह बंदर तो उस लड़की से हैंड शेक कर रहा है,” तभी संकल्प ने तनिक मुसकराते हुए कहा.

तभी दादाजी बोले, “चलो, अब मंदिरों के दर्शन तो कर लिए, अब गलता कुंड में नहा लें. चलो बच्चो.”

लेकिन किसी को क्या खबर थी कि गलता कुंड में साक्षात महाकाल उन्हें अपने शिकंजे में कसने के लिए घात लगाए बैठा था.

उन्हें यदि लेशमात्र भी संदेह होता कि जीवनमृत्यु के अंतहीन चक्र से मुक्ति पाने के लिए गलता कुंड में लगाई गई डुबकी उन के अशेष दुखों का निमित्त बनेगी तो वह सपने में भी वहां जाने का खयाल तक न करते, लेकिन यमराज तो शायद उन के घर पर अपनी काली छाया का ग्रहण लगा चुके थे.

वह पत्नी सहित अपने बेटे, बहू और पोतों के साथ राम नाम जपते हुए गलता कुंड में उतरे.

गलता कुंड में नहाने उतरी उन के बेटे नमन की पत्नी, उन की इकलौती बहू का पांव देखते ही देखते फिसल गया और वह न जाने कैसे कुंड के गहरे पानी में चली गई, और पानी में डूबने लगी.

पत्नी को असहाय पानी में हाथपैर मारते देख पहले उन का बेटा नमन गहरे पानी की ओर बढ़ा, लेकिन  वह भी अपना संतुलन खो बैठा और गहरे पानी में डूबने लगा.

मां और पापा दोनों को डूबता देख उन का बड़ा बेटा संकल्प हिम्मत कर उन्हें बचाने गहरे पानी में उतरा, लेकिन कुंड की गहराई उसे भी देखतेदेखते लील गई.

यह सब देख वे दोनों पतिपत्नी घबराहट और दहशत से चीखपुकार मचाने लगे.

पराग, उन का छोटा पोता उन दोनों को चीखतेचिल्लाते देख उन्हें समझातेबुझाते किनारे पर ले गया, और उन्हें तसल्ली देने  लगा कि “संकल्प भैया को तैरना आता है, इसलिए वह मम्मापापा को बचा कर ले आएगा”, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था.

मोक्ष पाने की कामना से किए गए इस स्नान ने उन्हें और उन की पत्नी के लिए इसी धरती पर साक्षात नर्क के द्वार खोल दिए.

पलभर पहले हंसतेचहकते तीन प्राणी लाश बन कर लौटे.

अपनी आंखों के सामने एकलौते बेटे, बहू और जवान पोते की मृत्यु देखने के संताप से बढ़ कर शायद कोई दुख नहीं.

तीनतीन संतानों को खो कर वह और पत्नी पत्थर के बन कर रह गए. इस गम से पत्नी ने खाट पकड़ ली और इस सदमे से वह साल के भीतर ही भगवान को प्यारी हो गई.

दादाजी ने एकमात्र बचे  छोटे पोते को अपने सीने से लगा लिया. बेटा, बहू और एक पोते को खोने के बाद अब पराग ही उन के जीने का एकमात्र सहारा था.

इधर पलक झपकते ही मां, पापा और बड़े भाई को खो कर पराग अर्धविक्षिप्त सा हो गया. वह दिनदिन भर अपने कमरे में बैठा शून्य में ताकता. न उसे खानेपीने की सुध रहती, न नहानेधोने या पढ़ाई करने की. रातों को नींद न आती. दादाजी उसे अपने कलेजे से लगा कर थपकियां देते हुए सुलाने की लाख कोशिश करते, लेकिन वह एक घड़ी भी सो न पाता.

उसे सुकून मिलता तो महज अपनी गर्लफ्रैंड तानी के साथ. वह उस के घर के सामने रहने वाले एक परिवार की बेटी थी.

वे दोनों बचपन से एकसाथ पलेबढ़े थे. इस दुर्घटना के महज एक सप्ताह बाद ही उन दोनों को सीए फाइनल का एग्जाम देना था.

तानी ने तो सीए का फाइनल एग्जाम दिया और उस ने पहली ही बार में उत्तीर्ण कर लिया, लेकिन घर में तीनतीन मौतों के बाद पराग की मानसिक हालत ऐसी न थी कि वह परीक्षा दे पाता. तो उस ने उस बार सीए फाइनल एग्जाम नहीं दिया.

The post कायनात मुस्कुरा उठी- भाग 1: पराग की मनोदशा आखिर क्यों बिगड़ी? appeared first on Sarita Magazine.

May 30, 2022 at 10:10AM

खुदकुशी: जब मेरे सामने आ गया वो खौफनाक मंजर

मेरी नजरें पंखे की ओर थीं. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे मैं पंखे से झूल रहा हूं और कमरे के अंदर मेरी पत्नी चीख रही है. धीरेधीरे उस की चीख दूर होती जा रही थी. सालों के बाद आज मुझे उस झुग्गी बस्ती की बहुत याद आ रही थी जहां मैं ने 20-22 साल अपने बच्चों के साथ गुजारे थे.

मेरे पड़ोसी साथी चमनलाल की धुंधली तसवीर आंखों के सामने घूम रही थी. वह मेरी खोली के ठीक सामने आ कर रहने लगा था. उसी दिन से वह मेरा सच्चा यार बन गया था. उस के छोटेबड़े कई बच्चे थे. समय का पंछी तेजी से पंख फैलाए उड़ता जा रहा था. देखते ही देखते बच्चे बड़े हो गए. चमनलाल का बड़ा बेटा जो 20-22 साल का था, बुरी संगत में पड़ कर आवारागर्दी करने लगा. घर में हुड़दंग मचाता. छोटे भाईबहनों को हर समय मारतापीटता.

चमनलाल उसे समझाबुझा कर थक चुका था. मैं ने भी कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. जब भी चमनलाल से इस बारे में बात होती तो मैं उसे ही कुसूरवार मान कर लंबाचौड़ा भाषण झाड़ता. शायद उस के जख्म पर मरहम लगाने के बजाय और हरा कर देता.

सुहानी शाम थी. सभी अपनेअपने कामों में मसरूफ थे. तभी पता चला कि चमनलाल की बेटी अपने महल्ले के एक लड़के के साथ भाग गई. चमनलाल हांफताकांपता सा मेरे पास आया और यह खबर सुनाई तो उस के जख्म पर नमक छिड़कते हुए मैं बोला, ‘‘कैसे बाप हो? अपने बच्चों की जरा भी फिक्र नहीं करते. कुछ खोजखबर ली या नहीं? चलो साथ चल कर ढूंढ़ें. कम से कम थाने में तो गुमशुदगी की रिपोर्ट करा ही दें.’’

चमनलाल चुपचाप खड़ा मेरी ओर देखता रहा. मैं ने उस का हाथ पकड़ कर खींचा लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ. मैं ने अपनी पत्नी से जब यह कहा तो वह रोनी सूरत बना कर बोली, ‘‘गरीब अपनी बेटी के हाथों में मेहंदी लगाए या उस के अरमानों की अर्थी उठाए…’’

मैं अपनी पत्नी का मुंह देखता रह गया, कुछ बोल नहीं पाया. जंगल की आग की तरह यह खबर फैल गई. लोग तरहतरह के लांछन लगाने लगे. जिस के मुंह में दांत भी नहीं थे, वह भी अफवाहें उड़ाने और चमनलाल को बदनाम कर के मजा लूट रहा था. किसी ने भी एक गरीब लाचार बाप के दर्द को समझने की कोशिश नहीं की. किसी ने आ कर हमदर्दी के दो शब्द नहीं बोले.

चमनलाल अंदर ही अंदर टूट गया था. उस ने चिंताओं के समंदर से निकलने के लिए शराब पीना शुरू कर दिया. गम कम होने के बजाय और बढ़ता गया. घर की सुखशांति छिन गई. रोज शाम को वह नशे की हालत में घर आता और घर से चीखपुकार, गालीगलौज, लड़ाईझगड़ा शुरू हो जाता. चमनलाल जैसा हंसमुख आदमी अब पत्नी को पीटने भी लगा था. वह गंदीगंदी गालियां बकता था.

इधर, मिल में हड़ताल हो गई थी. दूसरे मजदूरों के साथसाथ चमनलाल की गृहस्थी का पत्ता धीरेधीरे पीला होने लगा था. आधी रात को चमनलाल ने मेरा दरवाजा खटखटाया. मेरे बच्चे सो रहे थे. मैं ने दरवाजा खोला और चमनलाल को बदहवास देखा तो घबरा गया.

‘‘क्या बात है चमनलाल?’’ मैं ने हैरानी से पूछा. चमनलाल उस वक्त बिलकुल भी नशे में नहीं था. वह रोनी सूरत बना कर बोला, ‘‘मेरा बड़ा बेटा दूसरी जात की लड़की को ब्याह लाया है और उसे इसी घर में रखना चाहता है लेकिन मैं उसे इस घर में नहीं रहने दे सकता.’’

मैं ने कहा, ‘‘उसे कहा नहीं कि दूसरी जगह ले कर रखे?’’ ‘‘नहीं, वह इसी घर में रहना चाहता है. मेरी उस से बहुत देर तक तूतू मैंमैं हो चुकी है,’’ चमनलाल बोला. मैं ने कहा, ‘‘रात में हंगामा खड़ा मत करो. अभी सो जाओ. सुबह देखेंगे.’’

अगली सुबह मैं जरा देर से उठा. बाहर भीड़ जमा थी. मैं हड़बड़ा कर उठा. बाहर का सीन बड़ा भयावह था. चमनलाल की पंखे से लटकी हुई लाश देख कर मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

उस के बाद से पुलिस का आनाजाना शुरू हो गया. कभी भी, किसी भी समय आती और लोगों से पूछताछ कर के लौट जाती. चमनलाल की मौत से लोग दुखी थे वहीं पुलिस से तंग आ गए थे. मेरे मन में कई बुरे विचार करवट लेते रहे. क्या चमनलाल ने खुदकुशी की थी या किसी ने उस की… फिर… किस ने…? कई सवाल थे जिन्होंने मेरी नींद चुरा ली थी.

मेरी पत्नी और बच्चे डरेसहमे थे. पुलिस बारबार आती और एक ही सवाल दोहराती. हम लोग इस हरकत से परेशान हो गए थे. इस बेजारी के चलते और बच्चों की जिद पर मैं उस महल्ले को छोड़ कर दूसरे शहर चला गया और उस कड़वी यादों को भुलाने की कोशिश करने लगा.

लेकिन सालों बाद चमनलाल की याद और उस की रोनी सूरत आंखों के सामने घूमने लगी. उस का दर्द आज मुझे महसूस होने लगा, क्योंकि आज मेरी बड़ी बेटी पड़ोसी के अवारा लड़के के साथ… वह मेरी… नाक कटा गई थी. मैं खुद को कितना मजबूर महसूस कर रहा था. आज मैं चमनलाल की जगह खुद को पंखे से लटका हुआ देख रहा था.

The post खुदकुशी: जब मेरे सामने आ गया वो खौफनाक मंजर appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/kUjTzno

मेरी नजरें पंखे की ओर थीं. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे मैं पंखे से झूल रहा हूं और कमरे के अंदर मेरी पत्नी चीख रही है. धीरेधीरे उस की चीख दूर होती जा रही थी. सालों के बाद आज मुझे उस झुग्गी बस्ती की बहुत याद आ रही थी जहां मैं ने 20-22 साल अपने बच्चों के साथ गुजारे थे.

मेरे पड़ोसी साथी चमनलाल की धुंधली तसवीर आंखों के सामने घूम रही थी. वह मेरी खोली के ठीक सामने आ कर रहने लगा था. उसी दिन से वह मेरा सच्चा यार बन गया था. उस के छोटेबड़े कई बच्चे थे. समय का पंछी तेजी से पंख फैलाए उड़ता जा रहा था. देखते ही देखते बच्चे बड़े हो गए. चमनलाल का बड़ा बेटा जो 20-22 साल का था, बुरी संगत में पड़ कर आवारागर्दी करने लगा. घर में हुड़दंग मचाता. छोटे भाईबहनों को हर समय मारतापीटता.

चमनलाल उसे समझाबुझा कर थक चुका था. मैं ने भी कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. जब भी चमनलाल से इस बारे में बात होती तो मैं उसे ही कुसूरवार मान कर लंबाचौड़ा भाषण झाड़ता. शायद उस के जख्म पर मरहम लगाने के बजाय और हरा कर देता.

सुहानी शाम थी. सभी अपनेअपने कामों में मसरूफ थे. तभी पता चला कि चमनलाल की बेटी अपने महल्ले के एक लड़के के साथ भाग गई. चमनलाल हांफताकांपता सा मेरे पास आया और यह खबर सुनाई तो उस के जख्म पर नमक छिड़कते हुए मैं बोला, ‘‘कैसे बाप हो? अपने बच्चों की जरा भी फिक्र नहीं करते. कुछ खोजखबर ली या नहीं? चलो साथ चल कर ढूंढ़ें. कम से कम थाने में तो गुमशुदगी की रिपोर्ट करा ही दें.’’

चमनलाल चुपचाप खड़ा मेरी ओर देखता रहा. मैं ने उस का हाथ पकड़ कर खींचा लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ. मैं ने अपनी पत्नी से जब यह कहा तो वह रोनी सूरत बना कर बोली, ‘‘गरीब अपनी बेटी के हाथों में मेहंदी लगाए या उस के अरमानों की अर्थी उठाए…’’

मैं अपनी पत्नी का मुंह देखता रह गया, कुछ बोल नहीं पाया. जंगल की आग की तरह यह खबर फैल गई. लोग तरहतरह के लांछन लगाने लगे. जिस के मुंह में दांत भी नहीं थे, वह भी अफवाहें उड़ाने और चमनलाल को बदनाम कर के मजा लूट रहा था. किसी ने भी एक गरीब लाचार बाप के दर्द को समझने की कोशिश नहीं की. किसी ने आ कर हमदर्दी के दो शब्द नहीं बोले.

चमनलाल अंदर ही अंदर टूट गया था. उस ने चिंताओं के समंदर से निकलने के लिए शराब पीना शुरू कर दिया. गम कम होने के बजाय और बढ़ता गया. घर की सुखशांति छिन गई. रोज शाम को वह नशे की हालत में घर आता और घर से चीखपुकार, गालीगलौज, लड़ाईझगड़ा शुरू हो जाता. चमनलाल जैसा हंसमुख आदमी अब पत्नी को पीटने भी लगा था. वह गंदीगंदी गालियां बकता था.

इधर, मिल में हड़ताल हो गई थी. दूसरे मजदूरों के साथसाथ चमनलाल की गृहस्थी का पत्ता धीरेधीरे पीला होने लगा था. आधी रात को चमनलाल ने मेरा दरवाजा खटखटाया. मेरे बच्चे सो रहे थे. मैं ने दरवाजा खोला और चमनलाल को बदहवास देखा तो घबरा गया.

‘‘क्या बात है चमनलाल?’’ मैं ने हैरानी से पूछा. चमनलाल उस वक्त बिलकुल भी नशे में नहीं था. वह रोनी सूरत बना कर बोला, ‘‘मेरा बड़ा बेटा दूसरी जात की लड़की को ब्याह लाया है और उसे इसी घर में रखना चाहता है लेकिन मैं उसे इस घर में नहीं रहने दे सकता.’’

मैं ने कहा, ‘‘उसे कहा नहीं कि दूसरी जगह ले कर रखे?’’ ‘‘नहीं, वह इसी घर में रहना चाहता है. मेरी उस से बहुत देर तक तूतू मैंमैं हो चुकी है,’’ चमनलाल बोला. मैं ने कहा, ‘‘रात में हंगामा खड़ा मत करो. अभी सो जाओ. सुबह देखेंगे.’’

अगली सुबह मैं जरा देर से उठा. बाहर भीड़ जमा थी. मैं हड़बड़ा कर उठा. बाहर का सीन बड़ा भयावह था. चमनलाल की पंखे से लटकी हुई लाश देख कर मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

उस के बाद से पुलिस का आनाजाना शुरू हो गया. कभी भी, किसी भी समय आती और लोगों से पूछताछ कर के लौट जाती. चमनलाल की मौत से लोग दुखी थे वहीं पुलिस से तंग आ गए थे. मेरे मन में कई बुरे विचार करवट लेते रहे. क्या चमनलाल ने खुदकुशी की थी या किसी ने उस की… फिर… किस ने…? कई सवाल थे जिन्होंने मेरी नींद चुरा ली थी.

मेरी पत्नी और बच्चे डरेसहमे थे. पुलिस बारबार आती और एक ही सवाल दोहराती. हम लोग इस हरकत से परेशान हो गए थे. इस बेजारी के चलते और बच्चों की जिद पर मैं उस महल्ले को छोड़ कर दूसरे शहर चला गया और उस कड़वी यादों को भुलाने की कोशिश करने लगा.

लेकिन सालों बाद चमनलाल की याद और उस की रोनी सूरत आंखों के सामने घूमने लगी. उस का दर्द आज मुझे महसूस होने लगा, क्योंकि आज मेरी बड़ी बेटी पड़ोसी के अवारा लड़के के साथ… वह मेरी… नाक कटा गई थी. मैं खुद को कितना मजबूर महसूस कर रहा था. आज मैं चमनलाल की जगह खुद को पंखे से लटका हुआ देख रहा था.

The post खुदकुशी: जब मेरे सामने आ गया वो खौफनाक मंजर appeared first on Sarita Magazine.

May 30, 2022 at 09:00AM

Saturday, 28 May 2022

वो बांझ औरत: शिखा के बच्चे वर्तिका को क्यों चाहने लगे?

‘‘अरे, ऐसे उदास क्यों बैठी हो?’’ उदास बैठी शिखा के कंधे पर हाथ रखते हुए अभय ने पूछा. अपने मनोभावों को छिपाते हुए शिखा हड़बड़ा कर उठी, ‘‘कुछ नहीं, ऐसे ही बैठी थी. आप के लिए चाय बना दूं?’’

शिखा के माथे पर खिंची लकीरों को देख कर अभय को अंदाजा तो हो गया था कि कोई तो विशेष घटना घटित हुई है. अभय ने रसोईघर में शिखा के पास जा कर प्यार से पूछा, ‘‘शिखा, तुम्हारे चेहरे पर उदासी मुझे अच्छी नहीं लगती. क्या बात है, बताओ न?’’ अभय के प्रेमपूर्ण स्पर्श ने जैसे उस के तपते मन पर बर्फ सी रख दी.

शिखा की आंखें पिघल उठीं, ‘‘क्या मैं इस कलंक से मुक्त नहीं हो सकती, अभय?’’

अभय उस के दिल की बात समझ गया. उसे सोफे पर बैठाया. खुद ही दोनों की चाय कप में पलट कर लाया और फिर प्रेम से पूछा, ‘‘क्या हो गया आज जो तुम्हारा दिल इतना भर आया है? क्या घर से फोन आया था?’’ शिखा ने न में सिर हिला दिया. अभय के बारबार पूछने पर आंखों में रुकी नदी बहने ही लगी, ‘‘शाम को तुम्हारे आने से पहले वर्तिका के घर बच्चों के लिए इडलीसांभर ले कर गई थी…’’

‘‘अच्छा, फिर?’’

‘‘वर्तिका भाईसाहब से कह रही थी कि आज सुबह उस मनहूस बांझ का मुंह देख कर गए थे इसलिए सब काम बिगड़ गया,’’ इतना कहते ही वह अभय से लिपट कर रोने लगी.

‘‘इतनी छोटी बात कर दी भाभीजी ने…’’ अभय भी अब थोड़ा गंभीर

हो चला.

आंसू पोंछते हुए वह आगे बोली, ‘‘सुबह औफिस जाने से पहले मैं ने भाईसाहब के प्रोजैक्ट के बारे में पूछा था. वह बड़ा प्रोजैक्ट उन के हाथों से निकल गया.’’

‘‘ओह, तो इस में तुम्हारा क्या दोष?’’ अभय शिखा को सीने से लगा कर शांत करने का प्रयास करने लगा. आज तक वह खुद को और उस को अपशब्दों की आग से बचाने की कोशिश ही करता रहा है.

‘‘अभय, मैं वापस जा रही थी कि वर्तिका की आवाज आई कि कौन है तो बच्चे धीमे से बोले कि अरे, वही पड़ोस वाली मनहूस आंटी थीं. ये शब्द मुझे भीतर तक छलनी कर गए,’’ फिर पुरानी बातें याद कर के शिखा रोतेरोते ही सो गई.

शिखा की शादी हुए 8 सावन बीत चुके थे लेकिन उस की गोद हरी नहीं हुई थी. संतानसुख पाने के लिए उन्होंने कितने ही जतन किए पर कुदरत की इच्छा के सामने दोनों असहाय हो गए. एक तो पारिवारिक दुख से वैसे ही आदमी अधमरा हो जाता है, उस पर इंसान भी इंसान को दर्द देने में पीछे नहीं रहता है. अपने कसबे की छोटी सोच के तानों से बचने के लिए ही वे दोनों इस अनजान शहर में आ कर बस गए थे. यहां हर समय लोग दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दखलंदाजी नहीं करते थे.

निजी जीवन में अधिक ताकझांक से मुक्त वे दोनों शांति से जी रहे थे. लेकिन इस घटना ने उन का यह भ्रम भी तोड़ दिया. जाहिर है, इस घटना के बाद से शिखा ने वर्तिका से बोलचाल बंद कर दी. उस के मन में घृणा के अंकुर फूट चुके थे.

ऐसे ही दिन बीत रहे थे कि कोरोना महामारी ने पूरे विश्व में कुहराम मचा दिया. लौकडाउन की जीवनचर्या ने अवसाद को चरम पर पहुंचा दिया था. चारदीवारी के भीतर घुटन के क्षणों से कुछ मुक्ति मिली ही थी कि कोविड की दूसरी लहर ने महाविनाश शुरू कर दिया. बोरियत से बचने के लिए शिखा औनलाइन हौबी क्लास में अपना समय व्यतीत करती थी. उस समय अभय वर्क फ्रौम होम के कारण घर पर ही रहता था.

एक दिन शाम को घर की घंटी बजी.

‘इस समय कौन होगा…’ यह

सोचते हुए अभय ने दरवाजा खोला. बाहर वर्तिका का पति पारस बहुत अधिक परेशान मुद्रा में खड़ा था, ‘‘क्या हुआ भाईसाहब, सब खैरियत?’’ अभय ने उन की परेशानी की रेखाएं पढ़ते हुए पूछा.

‘‘भाईसाहब, वर्तिका का औक्सीजन लैवल बहुत डाउन हो गया है, उसे अस्पताल में भरती कराने जा रहा हूं.’’

‘‘अरे, जल्दी कीजिए. बताइए मैं भी चलूं?’’ अभय ने अपना मास्क ठीक करते हुए कहा.

पारस ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब घर में दोनों बच्चे अकेले हैं, आप और भाभीजी उन का ध्यान रखिएगा.’’

‘‘जी जरूर, आप निश्ंिचत रहिए. भाभीजी को जल्दी अस्पताल पहुंचाइए.’’

अंदर शिखा दोनों की बातचीत सुन रही थी. पारस के जाते ही उस ने तुरंत अभय को टोका, ‘‘आप भी कितने नासमझ बनते हैं. वर्तिका को कोरोना है. घर के सभी सदस्य संदेह के घेरे में हैं. हम क्या मदद कर सकते हैं?’’

‘‘अरे, ऐसी समस्या आई है, मदद तो करनी ही होगी.’’

‘‘अपने दुनियाभर के रईस रिश्तेदारों का गाना गाते हैं, उन्हीं को बुला लें न.’’

‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो, इस लौकडाउन में कोरोना के डर से कौन रिश्तेदार आ जाएगा?’’

शिखा का तो रत्तीभर मन नहीं था लेकिन अभय की नाराजगी के आगे उस की एक नहीं चली. वह फोन पर पारस से कुशलक्षेम पूछता, वह भी शिखा को बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था.

2 दिन ही बीत पाए थे कि पारस की रिपोर्ट भी कोरोना पौजिटिव आ गई. अब तो स्थिति बहुत खराब हो गई.

कोई रिश्तेदार मदद को आ नहीं पाया. उन के दोनों बच्चों दिव्यांश और सृष्टि की देखरेख की जिम्मेदारी अभय ने ले ली. शिखा को यह सब फूटी आंख नहीं सुहा रहा था. इसी कारण दोनों के बीच तल्खियां भी बढ़ गई थीं.

शिखा जब भी दोनों बच्चों का खाना पैक करती तो उस के घृणास्पद हावभाव से अभय का मन खिन्न हो जाता. वह वर्तिका को निशाना बना कर कुछ न कुछ बड़बड़ाती ही रहती. इसी कारण बच्चों की रिपोर्ट नैगेटिव होने के बावजूद अभय उन को घर नहीं लाया.

अभय ने अगले दिन स्वयं पर नियंत्रण करते हुए शिखा से बच्चों को घर लाने का अनुरोध किया. उस ने उस की मनोदशा समझते हुए प्यार से समझाया, ‘‘देखो शिखा, हमारे कर्म हमारे साथ हैं और दूसरे के उस के साथ. हमें अपने खाते में अच्छी चीजें रखनी हैं या दूसरों की तरह कंकड़पत्थर…’’

शिखा ने अभय की बात का जवाब नहीं दिया. अभय ने मोबाइल में दिव्यांश और सृष्टि का वीडियो दिखाया जिस में वे मम्मीपापा से रोते हुए प्यार जता रहे थे और जल्दी सही होने की मनोकामना कर रहे थे उस वीडियो को देखने के बाद शिखा एकदम चुप हो गई और चुपचाप खाना बनाने लगी. उस रात वह सही से सो नहीं पाई. अंतर्मन के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का आपस में टकराव होता रहा. इसी द्वंद्व में वह कब सो गई, उसे पता ही न चला.

सुबह पता चला कि वर्तिका की सांसें उस का साथ छोड़ चुकी थीं. शिखा को दिल में धक्का सा लगा. वर्तिका और उस के परिवार के सब सदस्यों के चेहरे एकएक कर के सामने आते और उन के अंतस को उद्वेलित कर के चले जाते.

पारस के बड़े भाईसाहब आ चुके थे. दिव्यांश और सृष्टि की रोने की आवाजें बाहर से ही सुनाई देनी शुरू हो गई थीं. शिखा ने बिलखते हुए बच्चों का रुदन देखा तो अंदर तक सिहर गई. 9 साल का दिव्यांश और 4 साल की सृष्टि बिना मां के कैसे रहेंगे… वह सोचती ही रही. काल की क्रूर आंधी यहीं नहीं ठहरी. 2 दिनों बाद ही पारस का भी हृदयगति रुकने से देहांत हो गया. इस खबर के साथ ही शिखा का दिल बैठ गया. अचानक से हुए इस घटनाक्रम में अतीत चलचित्र की भांति उस की आंखों के सामने चलने लगा. वर्तिका और पारस के साथ बिताए स्नेहपूर्ण 3 सालों के दृश्य आंखों के आगे आते और धुआं हो जाते. बस, एक दुर्भावना ने इस सौहार्दपूर्ण संबंध को फीका कर दिया था.

बच्चों को अपने मातापिता से आखिरी समय मिलना भी नसीब न हो सका. संवेदनाओं में डूबी शिखा निकलतेबैठते खिड़की से वर्तिका के घर को ही ताकती रही. शाम को उदासीभरी खामोशी तोड़ते हुए उस ने भरी आंखों से अभय को देखा और कहा, ‘‘अभय, वर्तिका के परिवार पर जो बीती उस ने मेरा मन बहुत झकझोर दिया है.’’

‘‘क्या कर सकते हैं, हम सब बेबस हैं,’’ अभय ने आंखें बंद करते हुए कहा.

‘‘अभय, मैं ने बहुत सोचा तो पाया कि अब उन बच्चों का कोई भविष्य नहीं है.’’

‘‘शिखा, ज्यादा परेशान मत हो. हमारे बस में कुछ नहीं.’’ शिखा चुप हो गई.

‘‘क्या कहना चाहती हो तुम? क्या हम उन दोनों बच्चों को हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकते?’’ अभय यह सुन कर अवाक रह गया. शिखा की तरफ से इतने बड़े फैसले पर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था. कानूनीतौर से हो पाए या नहीं लेकिन मैं उन दोनों बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह से उठाने को तैयार हूं, उन की मां की तरह. आप घर वालों से बात कर के देखिए.

अभय एकटक शिखा का ममताभरा चेहरा देखता ही रह गया. शिखा की आंखों से करुणा का झरना फूट पड़ा था, जो उस के पथरीले विचारों को पूरी तरह भिगो चुका था. आज तो अभय की आंखों में भी पानी की बूंदें उतरने लगीं. समय की गरम आंच में शिखा के मन के सभी बुरे भाव जल चुके थे. अब उस के आंचल में केवल ममता ही ममता भरी थी, जिस ने उसे 2 बच्चों की मां बना दिया था.

The post वो बांझ औरत: शिखा के बच्चे वर्तिका को क्यों चाहने लगे? appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/JvY8Bcb

‘‘अरे, ऐसे उदास क्यों बैठी हो?’’ उदास बैठी शिखा के कंधे पर हाथ रखते हुए अभय ने पूछा. अपने मनोभावों को छिपाते हुए शिखा हड़बड़ा कर उठी, ‘‘कुछ नहीं, ऐसे ही बैठी थी. आप के लिए चाय बना दूं?’’

शिखा के माथे पर खिंची लकीरों को देख कर अभय को अंदाजा तो हो गया था कि कोई तो विशेष घटना घटित हुई है. अभय ने रसोईघर में शिखा के पास जा कर प्यार से पूछा, ‘‘शिखा, तुम्हारे चेहरे पर उदासी मुझे अच्छी नहीं लगती. क्या बात है, बताओ न?’’ अभय के प्रेमपूर्ण स्पर्श ने जैसे उस के तपते मन पर बर्फ सी रख दी.

शिखा की आंखें पिघल उठीं, ‘‘क्या मैं इस कलंक से मुक्त नहीं हो सकती, अभय?’’

अभय उस के दिल की बात समझ गया. उसे सोफे पर बैठाया. खुद ही दोनों की चाय कप में पलट कर लाया और फिर प्रेम से पूछा, ‘‘क्या हो गया आज जो तुम्हारा दिल इतना भर आया है? क्या घर से फोन आया था?’’ शिखा ने न में सिर हिला दिया. अभय के बारबार पूछने पर आंखों में रुकी नदी बहने ही लगी, ‘‘शाम को तुम्हारे आने से पहले वर्तिका के घर बच्चों के लिए इडलीसांभर ले कर गई थी…’’

‘‘अच्छा, फिर?’’

‘‘वर्तिका भाईसाहब से कह रही थी कि आज सुबह उस मनहूस बांझ का मुंह देख कर गए थे इसलिए सब काम बिगड़ गया,’’ इतना कहते ही वह अभय से लिपट कर रोने लगी.

‘‘इतनी छोटी बात कर दी भाभीजी ने…’’ अभय भी अब थोड़ा गंभीर

हो चला.

आंसू पोंछते हुए वह आगे बोली, ‘‘सुबह औफिस जाने से पहले मैं ने भाईसाहब के प्रोजैक्ट के बारे में पूछा था. वह बड़ा प्रोजैक्ट उन के हाथों से निकल गया.’’

‘‘ओह, तो इस में तुम्हारा क्या दोष?’’ अभय शिखा को सीने से लगा कर शांत करने का प्रयास करने लगा. आज तक वह खुद को और उस को अपशब्दों की आग से बचाने की कोशिश ही करता रहा है.

‘‘अभय, मैं वापस जा रही थी कि वर्तिका की आवाज आई कि कौन है तो बच्चे धीमे से बोले कि अरे, वही पड़ोस वाली मनहूस आंटी थीं. ये शब्द मुझे भीतर तक छलनी कर गए,’’ फिर पुरानी बातें याद कर के शिखा रोतेरोते ही सो गई.

शिखा की शादी हुए 8 सावन बीत चुके थे लेकिन उस की गोद हरी नहीं हुई थी. संतानसुख पाने के लिए उन्होंने कितने ही जतन किए पर कुदरत की इच्छा के सामने दोनों असहाय हो गए. एक तो पारिवारिक दुख से वैसे ही आदमी अधमरा हो जाता है, उस पर इंसान भी इंसान को दर्द देने में पीछे नहीं रहता है. अपने कसबे की छोटी सोच के तानों से बचने के लिए ही वे दोनों इस अनजान शहर में आ कर बस गए थे. यहां हर समय लोग दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दखलंदाजी नहीं करते थे.

निजी जीवन में अधिक ताकझांक से मुक्त वे दोनों शांति से जी रहे थे. लेकिन इस घटना ने उन का यह भ्रम भी तोड़ दिया. जाहिर है, इस घटना के बाद से शिखा ने वर्तिका से बोलचाल बंद कर दी. उस के मन में घृणा के अंकुर फूट चुके थे.

ऐसे ही दिन बीत रहे थे कि कोरोना महामारी ने पूरे विश्व में कुहराम मचा दिया. लौकडाउन की जीवनचर्या ने अवसाद को चरम पर पहुंचा दिया था. चारदीवारी के भीतर घुटन के क्षणों से कुछ मुक्ति मिली ही थी कि कोविड की दूसरी लहर ने महाविनाश शुरू कर दिया. बोरियत से बचने के लिए शिखा औनलाइन हौबी क्लास में अपना समय व्यतीत करती थी. उस समय अभय वर्क फ्रौम होम के कारण घर पर ही रहता था.

एक दिन शाम को घर की घंटी बजी.

‘इस समय कौन होगा…’ यह

सोचते हुए अभय ने दरवाजा खोला. बाहर वर्तिका का पति पारस बहुत अधिक परेशान मुद्रा में खड़ा था, ‘‘क्या हुआ भाईसाहब, सब खैरियत?’’ अभय ने उन की परेशानी की रेखाएं पढ़ते हुए पूछा.

‘‘भाईसाहब, वर्तिका का औक्सीजन लैवल बहुत डाउन हो गया है, उसे अस्पताल में भरती कराने जा रहा हूं.’’

‘‘अरे, जल्दी कीजिए. बताइए मैं भी चलूं?’’ अभय ने अपना मास्क ठीक करते हुए कहा.

पारस ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब घर में दोनों बच्चे अकेले हैं, आप और भाभीजी उन का ध्यान रखिएगा.’’

‘‘जी जरूर, आप निश्ंिचत रहिए. भाभीजी को जल्दी अस्पताल पहुंचाइए.’’

अंदर शिखा दोनों की बातचीत सुन रही थी. पारस के जाते ही उस ने तुरंत अभय को टोका, ‘‘आप भी कितने नासमझ बनते हैं. वर्तिका को कोरोना है. घर के सभी सदस्य संदेह के घेरे में हैं. हम क्या मदद कर सकते हैं?’’

‘‘अरे, ऐसी समस्या आई है, मदद तो करनी ही होगी.’’

‘‘अपने दुनियाभर के रईस रिश्तेदारों का गाना गाते हैं, उन्हीं को बुला लें न.’’

‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो, इस लौकडाउन में कोरोना के डर से कौन रिश्तेदार आ जाएगा?’’

शिखा का तो रत्तीभर मन नहीं था लेकिन अभय की नाराजगी के आगे उस की एक नहीं चली. वह फोन पर पारस से कुशलक्षेम पूछता, वह भी शिखा को बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था.

2 दिन ही बीत पाए थे कि पारस की रिपोर्ट भी कोरोना पौजिटिव आ गई. अब तो स्थिति बहुत खराब हो गई.

कोई रिश्तेदार मदद को आ नहीं पाया. उन के दोनों बच्चों दिव्यांश और सृष्टि की देखरेख की जिम्मेदारी अभय ने ले ली. शिखा को यह सब फूटी आंख नहीं सुहा रहा था. इसी कारण दोनों के बीच तल्खियां भी बढ़ गई थीं.

शिखा जब भी दोनों बच्चों का खाना पैक करती तो उस के घृणास्पद हावभाव से अभय का मन खिन्न हो जाता. वह वर्तिका को निशाना बना कर कुछ न कुछ बड़बड़ाती ही रहती. इसी कारण बच्चों की रिपोर्ट नैगेटिव होने के बावजूद अभय उन को घर नहीं लाया.

अभय ने अगले दिन स्वयं पर नियंत्रण करते हुए शिखा से बच्चों को घर लाने का अनुरोध किया. उस ने उस की मनोदशा समझते हुए प्यार से समझाया, ‘‘देखो शिखा, हमारे कर्म हमारे साथ हैं और दूसरे के उस के साथ. हमें अपने खाते में अच्छी चीजें रखनी हैं या दूसरों की तरह कंकड़पत्थर…’’

शिखा ने अभय की बात का जवाब नहीं दिया. अभय ने मोबाइल में दिव्यांश और सृष्टि का वीडियो दिखाया जिस में वे मम्मीपापा से रोते हुए प्यार जता रहे थे और जल्दी सही होने की मनोकामना कर रहे थे उस वीडियो को देखने के बाद शिखा एकदम चुप हो गई और चुपचाप खाना बनाने लगी. उस रात वह सही से सो नहीं पाई. अंतर्मन के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का आपस में टकराव होता रहा. इसी द्वंद्व में वह कब सो गई, उसे पता ही न चला.

सुबह पता चला कि वर्तिका की सांसें उस का साथ छोड़ चुकी थीं. शिखा को दिल में धक्का सा लगा. वर्तिका और उस के परिवार के सब सदस्यों के चेहरे एकएक कर के सामने आते और उन के अंतस को उद्वेलित कर के चले जाते.

पारस के बड़े भाईसाहब आ चुके थे. दिव्यांश और सृष्टि की रोने की आवाजें बाहर से ही सुनाई देनी शुरू हो गई थीं. शिखा ने बिलखते हुए बच्चों का रुदन देखा तो अंदर तक सिहर गई. 9 साल का दिव्यांश और 4 साल की सृष्टि बिना मां के कैसे रहेंगे… वह सोचती ही रही. काल की क्रूर आंधी यहीं नहीं ठहरी. 2 दिनों बाद ही पारस का भी हृदयगति रुकने से देहांत हो गया. इस खबर के साथ ही शिखा का दिल बैठ गया. अचानक से हुए इस घटनाक्रम में अतीत चलचित्र की भांति उस की आंखों के सामने चलने लगा. वर्तिका और पारस के साथ बिताए स्नेहपूर्ण 3 सालों के दृश्य आंखों के आगे आते और धुआं हो जाते. बस, एक दुर्भावना ने इस सौहार्दपूर्ण संबंध को फीका कर दिया था.

बच्चों को अपने मातापिता से आखिरी समय मिलना भी नसीब न हो सका. संवेदनाओं में डूबी शिखा निकलतेबैठते खिड़की से वर्तिका के घर को ही ताकती रही. शाम को उदासीभरी खामोशी तोड़ते हुए उस ने भरी आंखों से अभय को देखा और कहा, ‘‘अभय, वर्तिका के परिवार पर जो बीती उस ने मेरा मन बहुत झकझोर दिया है.’’

‘‘क्या कर सकते हैं, हम सब बेबस हैं,’’ अभय ने आंखें बंद करते हुए कहा.

‘‘अभय, मैं ने बहुत सोचा तो पाया कि अब उन बच्चों का कोई भविष्य नहीं है.’’

‘‘शिखा, ज्यादा परेशान मत हो. हमारे बस में कुछ नहीं.’’ शिखा चुप हो गई.

‘‘क्या कहना चाहती हो तुम? क्या हम उन दोनों बच्चों को हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकते?’’ अभय यह सुन कर अवाक रह गया. शिखा की तरफ से इतने बड़े फैसले पर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था. कानूनीतौर से हो पाए या नहीं लेकिन मैं उन दोनों बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह से उठाने को तैयार हूं, उन की मां की तरह. आप घर वालों से बात कर के देखिए.

अभय एकटक शिखा का ममताभरा चेहरा देखता ही रह गया. शिखा की आंखों से करुणा का झरना फूट पड़ा था, जो उस के पथरीले विचारों को पूरी तरह भिगो चुका था. आज तो अभय की आंखों में भी पानी की बूंदें उतरने लगीं. समय की गरम आंच में शिखा के मन के सभी बुरे भाव जल चुके थे. अब उस के आंचल में केवल ममता ही ममता भरी थी, जिस ने उसे 2 बच्चों की मां बना दिया था.

The post वो बांझ औरत: शिखा के बच्चे वर्तिका को क्यों चाहने लगे? appeared first on Sarita Magazine.

May 28, 2022 at 09:59AM

Friday, 27 May 2022

माफी: क्या सुमन भाभी के मुस्कुराहट के पीछे जहर छिपा था?

सुमन भाभी के प्रति अंजलि के मन में नफरत भर गई थी, इसीलिए बरसों बाद भी आज उन का अपनत्वभरा व्यवहार अंजलि को चालाकी व मतलबभरा नजर आ रहा था. क्या सच में उन की मीठी मुसकराहट के पीछे जहर छिपा था?

The post माफी: क्या सुमन भाभी के मुस्कुराहट के पीछे जहर छिपा था? appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/lqn4rSR

सुमन भाभी के प्रति अंजलि के मन में नफरत भर गई थी, इसीलिए बरसों बाद भी आज उन का अपनत्वभरा व्यवहार अंजलि को चालाकी व मतलबभरा नजर आ रहा था. क्या सच में उन की मीठी मुसकराहट के पीछे जहर छिपा था?

The post माफी: क्या सुमन भाभी के मुस्कुराहट के पीछे जहर छिपा था? appeared first on Sarita Magazine.

May 28, 2022 at 09:54AM