Thursday, 28 April 2022

थप्पड़: मामू ने अदीबा के साथ क्या किया?

शाम ढलने को थी. इक्कादुक्का दुकानों में बिजली के बल्ब रोशन होने लगे थे. ऊन का आखिरी सिरा हाथ में आते ही अदीबा को धक्का सा लगा कि पता नहीं अब इस रंग की ऊन का गोला मिलेगा कि नहीं.

अदीबा ने कमरे की बत्ती जलाई और अपनी अम्मी को बता कर झटपट ऊन का गोला खरीदने निकल पड़ी.

जातेजाते अदीबा बोली, “अम्मी, ऊन खत्म हो गई है, लाने जा रही हूं, कहीं दुकान बंद न हो जाए.”

अम्मी ने कहा, “अच्छा, जा, पर जल्दी लौट आना, रात होने वाली है.”

लेकिन यह क्या. जहां सिर्फ दुकान जाने में ही आधा घंटा लगता है, वहां से ऊन खरीद कर आधा घंटा से पहले ही अदीबा वापस आ गई… यह कैसे?

मां ने बेटी के चेहरे को गौर से देखा. बेटी का चेहरा धुआंधुआं सा था और उस की सांसें तेजतेज चल रही थीं.

“क्या हुआ अदीबा, ऊन नहीं लाई?”

अदीबा ने रोते हुए अपनी अम्मी को जो आपबीती सुनाई तो अम्मी के होश उड़ गए.

अदीबा की आपबीती सुन कर अम्मी गुस्से से आगबबूला हो उठीं और उस नामुराद आदमी को तरहतरह की गालियां देने लगीं.

कुछ देर बाद जब अम्मी का गुस्सा ठंडा हुआ, तो उन्होंने कहना शुरू किया, “अब तुझे क्या बताऊं बेटी, यह मर्द जात होती ही ऐसी है. उन की नजरों में औरत का जिस्म बस मर्द की प्यास बुझाने का जरीया होता है.

“मेरे साथ भी ऐसा हो चुका है. वह भी एक दफा नहीं, बल्कि कईकई दफा,”
इतना कह कर अम्मी अपने पुराने दिनों के काले पन्ने पलटने लगीं…

अम्मी ने अदीबा को बताया, “जब मैं 5वीं जमात में थी, तब एक दिन मदरसे के मौलवी साहब ने मुझे अपने पास बुलाया और अपनी गोद में बिठा कर वे मेरे सीने पर हाथ फेरने लगे. वे अपना हाथ चलाते रहे और मुझे बहलाते रहे.

“मैं मासूम थी, इसलिए उन की इस गंदी हरकत को समझ न सकी. उन की इस गलत हरकत की वजह से मेरा सीना दर्द करने लगा था…”

हैरान अदीबा ने पूछा, “फिर क्या हुआ अम्मी?”

“उस जमाने में गलत और सही छूने का पता तो बड़े लोगों को भी ज्यादा नही था, मैं तो भला बच्ची थी. बहरहाल, छुट्टी मिलते ही मैं रोते हुए घर गई और अपनी अम्मी से सबकुछ साफसाफ बता दिया.

“फिर क्या था… अब्बू ने न सिर्फ मौलवी साहब की जबरदस्त पिटाई की, बल्कि उन्हें मदरसे से बाहर भी निकलवा दिया.

“इसी तरह एक बार, एक दिन मेरे दूर के रिश्ते के मामू अपनी 5 साल की बेटी के साथ हमारे घर मेहमान बन कर आए. वे तोहफे में ढेर सारी मिठाइयां और फल लाए थे.

“अपने रिश्ते के भाई की खातिरदारी में मेरी अम्मी ने मटन बिरयानी और चिकन कोरमा बनाया था. सब ने खुश हो कर खाया.

“अरसे बाद मिले भाईबहन अपने पुराने दिनों को याद करते रहे और मैं मामू की बेटी के साथ देर रात तक उछलकूद करती रही…”

यह बतातेबताते जब अदीबा की अम्मी सांस लेने के लिए ठहरीं, तो अदीबा ने बेसब्री से पूछा, “फिर क्या हुआ अम्मी?”

अम्मी ने कहना जारी रखा, “जैसे कि हर बच्चा आने वाले मेहमान के बच्चों के साथ सोना पसंद करता है, वैसा ही मैं ने भी किया और अपनी हमउम्र दोस्त के साथ मामू के बिस्तर पर ही सो गई.

“रात के किसी पहर में मेरी नींद तब खुली, जब मुझे एहसास हुआ कि मेरे तथाकथित मामू मेरी सलवार की डोरी खोल रहे हैं.

“मेरा हाथ फौरन सलवार की डोरी पर चला गया. डोरी खुल चुकी थी. मेरा हाथ अपने हाथ से टकराते ही तथाकथित मामू ने अपना हाथ तेजी से खींच लिया. मैं डर गई और जोरजोर से चिल्लाने लगी.

“यह चिल्लाना सुन कर मेरी अम्मी अपने कमरे से भागीभागी आईं और दरवाजा पीटने लगीं.

“तथाकथित मामू ने उठ कर दरवाजा खोला और अम्मी को देखते ही कहा, ‘अदीबा सपने में बड़बड़ा रही है…’

“अम्मी फौरन हालात की नजाकत भांप गईं और मेरा हाथ पकड़ कर अपने साथ ले चलीं. एक हाथ से सलवार पकड़े मैं थरथर कांपती उन के साथ चल पड़ी. इस बीच उन मामू की बेटी भी जाग चुकी थी और सारा तमाशा हैरत से देख रही थी.

“उस हादसे के बाद से हमेशाहमेशा के लिए उन तथाकथित मामू से हमारे परिवार का रिश्ता खत्म हो गया.”

अदीबा ने जोश में कहा, “अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ. ऐसे गंदे लोग रिश्तेदार के नाम पर बदनुमा दाग होते हैं.”

अम्मी जब यादों के झरोखों से वापस लौटीं, तो फिर कहने लगीं, “छोड़ो, अब इस किस्से को यहीं दफन करो वरना जितने मुंह उतनी बातें होंगी. लड़कियां सफेद चादर की तरह होती हैं, जिन पर दाग बहुत जल्दी लग जाते हैं, जो छुड़ाने से भी नहीं छूटते, इसलिए भूल कर भी किसी से इस बात का जिक्र मत करना.”

दरअसल, ऊन खरीदने के लिए जाते समय रास्ते में अदीबा को दूर के एक रिश्तेदार मिल गए थे. वे बातें करते हुए साथसाथ चलने लगे और चंद मिनटों में ही कुछ ज्यादा ही करीब होने की कोशिश करने लगे. अदीबा फासला बढ़ा कर चलना चाहती और वे फासला घटा कर चलना चाहते.

पहले तो वे अदीबा के साथ सलीके से बातचीत करते रहे, लेकिन जैसे ही गली में अंधेरा मिला, तो वे अपनी असलियत पर उतर आए.

उन का हाथ बारबार किसी न किसी बहाने अदीबा के सीने को छूने लगा. अदीबा उन की नीयत भांप गई, फिर बिना लिहाज के एक जोरदार थप्पड़ उन के चेहरे पर रसीद कर दिया कि वे बिलबिला उठे.

इस के बाद अदीबा ऊन का गोला खरीदने का इरादा छोड़ कर बीच रास्ते से ही घर वापस लौट आई.

बड़े मियां इस अचानक होने वाले हमले के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. उन के कानों में अचानक सीटियां सी बजने लगीं और आंखों के सामने गोलगोल तारे नाचने लगे. उन्होंने बिना इधरउधर देखे सामने वाली पतली गली से निकलना मुनासिब समझा.

यही वजह थी कि अदीबा जब घर में दाखिल हुई, तो उस का चेहरा धुआंधुआं था और सांसें तेजतेज चल रही थीं.

बहरहाल, इस तरह मांबेटी की बातचीत में कई परतें और कई गांठें खुलती चली गईं.

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शाम ढलने को थी. इक्कादुक्का दुकानों में बिजली के बल्ब रोशन होने लगे थे. ऊन का आखिरी सिरा हाथ में आते ही अदीबा को धक्का सा लगा कि पता नहीं अब इस रंग की ऊन का गोला मिलेगा कि नहीं.

अदीबा ने कमरे की बत्ती जलाई और अपनी अम्मी को बता कर झटपट ऊन का गोला खरीदने निकल पड़ी.

जातेजाते अदीबा बोली, “अम्मी, ऊन खत्म हो गई है, लाने जा रही हूं, कहीं दुकान बंद न हो जाए.”

अम्मी ने कहा, “अच्छा, जा, पर जल्दी लौट आना, रात होने वाली है.”

लेकिन यह क्या. जहां सिर्फ दुकान जाने में ही आधा घंटा लगता है, वहां से ऊन खरीद कर आधा घंटा से पहले ही अदीबा वापस आ गई… यह कैसे?

मां ने बेटी के चेहरे को गौर से देखा. बेटी का चेहरा धुआंधुआं सा था और उस की सांसें तेजतेज चल रही थीं.

“क्या हुआ अदीबा, ऊन नहीं लाई?”

अदीबा ने रोते हुए अपनी अम्मी को जो आपबीती सुनाई तो अम्मी के होश उड़ गए.

अदीबा की आपबीती सुन कर अम्मी गुस्से से आगबबूला हो उठीं और उस नामुराद आदमी को तरहतरह की गालियां देने लगीं.

कुछ देर बाद जब अम्मी का गुस्सा ठंडा हुआ, तो उन्होंने कहना शुरू किया, “अब तुझे क्या बताऊं बेटी, यह मर्द जात होती ही ऐसी है. उन की नजरों में औरत का जिस्म बस मर्द की प्यास बुझाने का जरीया होता है.

“मेरे साथ भी ऐसा हो चुका है. वह भी एक दफा नहीं, बल्कि कईकई दफा,”
इतना कह कर अम्मी अपने पुराने दिनों के काले पन्ने पलटने लगीं…

अम्मी ने अदीबा को बताया, “जब मैं 5वीं जमात में थी, तब एक दिन मदरसे के मौलवी साहब ने मुझे अपने पास बुलाया और अपनी गोद में बिठा कर वे मेरे सीने पर हाथ फेरने लगे. वे अपना हाथ चलाते रहे और मुझे बहलाते रहे.

“मैं मासूम थी, इसलिए उन की इस गंदी हरकत को समझ न सकी. उन की इस गलत हरकत की वजह से मेरा सीना दर्द करने लगा था…”

हैरान अदीबा ने पूछा, “फिर क्या हुआ अम्मी?”

“उस जमाने में गलत और सही छूने का पता तो बड़े लोगों को भी ज्यादा नही था, मैं तो भला बच्ची थी. बहरहाल, छुट्टी मिलते ही मैं रोते हुए घर गई और अपनी अम्मी से सबकुछ साफसाफ बता दिया.

“फिर क्या था… अब्बू ने न सिर्फ मौलवी साहब की जबरदस्त पिटाई की, बल्कि उन्हें मदरसे से बाहर भी निकलवा दिया.

“इसी तरह एक बार, एक दिन मेरे दूर के रिश्ते के मामू अपनी 5 साल की बेटी के साथ हमारे घर मेहमान बन कर आए. वे तोहफे में ढेर सारी मिठाइयां और फल लाए थे.

“अपने रिश्ते के भाई की खातिरदारी में मेरी अम्मी ने मटन बिरयानी और चिकन कोरमा बनाया था. सब ने खुश हो कर खाया.

“अरसे बाद मिले भाईबहन अपने पुराने दिनों को याद करते रहे और मैं मामू की बेटी के साथ देर रात तक उछलकूद करती रही…”

यह बतातेबताते जब अदीबा की अम्मी सांस लेने के लिए ठहरीं, तो अदीबा ने बेसब्री से पूछा, “फिर क्या हुआ अम्मी?”

अम्मी ने कहना जारी रखा, “जैसे कि हर बच्चा आने वाले मेहमान के बच्चों के साथ सोना पसंद करता है, वैसा ही मैं ने भी किया और अपनी हमउम्र दोस्त के साथ मामू के बिस्तर पर ही सो गई.

“रात के किसी पहर में मेरी नींद तब खुली, जब मुझे एहसास हुआ कि मेरे तथाकथित मामू मेरी सलवार की डोरी खोल रहे हैं.

“मेरा हाथ फौरन सलवार की डोरी पर चला गया. डोरी खुल चुकी थी. मेरा हाथ अपने हाथ से टकराते ही तथाकथित मामू ने अपना हाथ तेजी से खींच लिया. मैं डर गई और जोरजोर से चिल्लाने लगी.

“यह चिल्लाना सुन कर मेरी अम्मी अपने कमरे से भागीभागी आईं और दरवाजा पीटने लगीं.

“तथाकथित मामू ने उठ कर दरवाजा खोला और अम्मी को देखते ही कहा, ‘अदीबा सपने में बड़बड़ा रही है…’

“अम्मी फौरन हालात की नजाकत भांप गईं और मेरा हाथ पकड़ कर अपने साथ ले चलीं. एक हाथ से सलवार पकड़े मैं थरथर कांपती उन के साथ चल पड़ी. इस बीच उन मामू की बेटी भी जाग चुकी थी और सारा तमाशा हैरत से देख रही थी.

“उस हादसे के बाद से हमेशाहमेशा के लिए उन तथाकथित मामू से हमारे परिवार का रिश्ता खत्म हो गया.”

अदीबा ने जोश में कहा, “अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ. ऐसे गंदे लोग रिश्तेदार के नाम पर बदनुमा दाग होते हैं.”

अम्मी जब यादों के झरोखों से वापस लौटीं, तो फिर कहने लगीं, “छोड़ो, अब इस किस्से को यहीं दफन करो वरना जितने मुंह उतनी बातें होंगी. लड़कियां सफेद चादर की तरह होती हैं, जिन पर दाग बहुत जल्दी लग जाते हैं, जो छुड़ाने से भी नहीं छूटते, इसलिए भूल कर भी किसी से इस बात का जिक्र मत करना.”

दरअसल, ऊन खरीदने के लिए जाते समय रास्ते में अदीबा को दूर के एक रिश्तेदार मिल गए थे. वे बातें करते हुए साथसाथ चलने लगे और चंद मिनटों में ही कुछ ज्यादा ही करीब होने की कोशिश करने लगे. अदीबा फासला बढ़ा कर चलना चाहती और वे फासला घटा कर चलना चाहते.

पहले तो वे अदीबा के साथ सलीके से बातचीत करते रहे, लेकिन जैसे ही गली में अंधेरा मिला, तो वे अपनी असलियत पर उतर आए.

उन का हाथ बारबार किसी न किसी बहाने अदीबा के सीने को छूने लगा. अदीबा उन की नीयत भांप गई, फिर बिना लिहाज के एक जोरदार थप्पड़ उन के चेहरे पर रसीद कर दिया कि वे बिलबिला उठे.

इस के बाद अदीबा ऊन का गोला खरीदने का इरादा छोड़ कर बीच रास्ते से ही घर वापस लौट आई.

बड़े मियां इस अचानक होने वाले हमले के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. उन के कानों में अचानक सीटियां सी बजने लगीं और आंखों के सामने गोलगोल तारे नाचने लगे. उन्होंने बिना इधरउधर देखे सामने वाली पतली गली से निकलना मुनासिब समझा.

यही वजह थी कि अदीबा जब घर में दाखिल हुई, तो उस का चेहरा धुआंधुआं था और सांसें तेजतेज चल रही थीं.

बहरहाल, इस तरह मांबेटी की बातचीत में कई परतें और कई गांठें खुलती चली गईं.

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April 29, 2022 at 09:38AM

संतुलन: रोहित उस लड़की को खोने से क्यों डरता था?

झगड़ाशुरू कराने वाली बात बड़ी नहीं थी, पर बहसबाजी लंबी खिंच जाने से रोहित और उस के पिता के बीच की तकरार एकाएक विस्फोटक बिंदु पर पहुंच गई.

‘‘जोरू के गुलाम, तुझे अपनी मां और मेरी जरा भी फिक्र नहीं रही है. अब मुझे भी नहीं रखना है तुझे इस घर में,’’ ससुरजी की इस बात ने आग में घी का काम करते हुए रोहित के गुस्से को इतना बढ़ा दिया कि वे उसी समय अपने जानकार प्रौपर्टी डीलर से मिलने चले गए. मैं बहुत सुंदर हूं और रोहित मेरे ऊपर पूरी तरह लट्टू हैं. मेरी ससुराल वालों के अलावा उन के दोस्त और मेरे मायके वाले भी मानते हैं कि मैं उन्हें अपनी उंगलियों पर बड़ी आसानी से नचा सकती हूं. मेरे सासससुर ने अपनी छोटी बहू यानी मुझे कभी पसंद नहीं किया. वे दोनों हर किसी के सामने यह रोना रोते कि मैं ने उन के बेटे को अपने रूपजाल में फंसा कर मातापिता से दूर कर दिया है. वैसे मुझे पता था कि रोहित की घर से अलग हो जाने की धमकी से घबरा कर मेरी सास बिगड़ी बात संभालने के लिए जल्दी मुझे से मिलने मेरे कमरे  में आएंगी. गुस्से में घर से अलग कर देने की बात मुंह से निकालना अलग बात है, पर मेरे सासससुर जानते हैं कि हम दोनों के अलावा उन की देखभाल करने वाला और कोई नहीं है. ऊपरी मंजिल पर रह रहे बड़े भैया और भाभी मुझ से तो क्या, घर में किसी से भी ढंग से नहीं बोलते हैं.

मैं बहुत साधारण परिवार में पलीबढ़ी थी. इस में कोई शक नहीं कि अगर मैं बेहद सुंदर न होती, तो मुझ से शादी करने का विचार अमीर घर के बेटे रोहित के मन में कभी पैदा न होता. मेरे मातापिता ने बचपन से ही मेरे दिलोदिमाग में यह बात भर दी थी कि हर तरह की खुशियां और सुख पाना उन की परी सी खूबसूरत बेटी का पैदाइशी हक है. अपनी सुंदरता के बल पर मैं दुनिया पर राज करूंगी, किशोरावस्था में ही इस इच्छा ने मेरे मन के अंदर गहरी जड़ें जमा ली थीं. रोहित से मेरी पहली मुलाकात अपनी एक सहेली के भाई की शादी में हुई थी.वे जिस कार से उतरे उस का रंग और डिजाइन मुझे बहुत पसंद आया था. सहेली से जानकारी मिली कि वे अच्छी जौब कर रहे हैं. इस से उन से दोस्ती करने में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई थी. उन की आंखों में झांकते हुए मैं 2-3 बार बड़ी अदा से मुसकराई, तो वे फौरन मुझ में दिलचस्पी लेने लगे. मौका ढूंढ़ कर मुझ से बातें करने लगते, तो मैं 2-4 वाक्य बोल कर कहीं और चली जाती. मेरे शर्मीले स्वभाव ने उन्हें मेरे साथ दोस्ती बढ़ाने के लिए और ज्यादा उतावला कर दिया. उस रात विदा लेने से पहले उन्होंने मेरा फोन नंबर ले लिया. अगले दिन से ही हमारे बीच फोन पर बातें होने लगीं. सप्ताह भर बाद हम औफिस खत्म होने के बाद बाहर मिलने लगे.

हमारी चौथी मुलाकात एक बड़े पार्क में हुई. वहां एक सुनसान जगह का फायदा उठाते हुए उन्होंने अचानक मेरे होंठों से अपने होंठ जोड़ कर मुझे चूम लिया. अपनी भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाने के कारण मैं बहुत जोर से उन से लिपट गई. बाद में उन की बांहों के घेरे से बाहर आ कर जब मैं सुबकने लगी, तो उन की उलझन और बेचैनी बहुत ज्यादा बढ़ गई. बहुत पूछने पर भी न मैं ने उन्हें अपने आंसू बहाने का कारण बताया और न ही ज्यादा देर उन के साथ रुकी. पूरे 3 दिनों तक मैं ने उन से फोन पर बात नहीं की तो चौथे दिन शाम को वे मुझे मेरे औफिस के गेट के पास मेरा इंतजार करते नजर आए. उन के कुछ बोलने से पहले ही मैं ने उदास लहजे में कहा, ‘‘आई ऐम सौरी पर हमें अब आपस में नहीं मिलना चाहिए, रोहित.’’

‘‘पर क्यों? मुझे मेरी गलती तो बताओ?’’ वे बहुत परेशान नजर आ रहे थे.

‘‘तुम्हारी कोई गलती नहीं है.’’

‘‘तो मुझ से मिलना क्यों बंद कर रही हो?’’

उन के बारबार पूछने पर मैं ने नजरें झुका कर जवाब दिया, ‘‘मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो रही हूं…तुम्हारे साथ नजदीकियां बढ़ती रहीं तो मैं अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख सकूंगी.’’

‘‘तुम कहना क्या चाह रही हो?’’ उन की आंखों में उलझन के भाव और ज्यादा बढ़ गए.

‘‘हम ऐसे ही मिलते रहे तो किसी भी दिन कुछ गलत घट जाएगा…तुम मुझे चीप लड़की समझो, यह सदमा मुझ से बरदाश्त नहीं होगा. साधारण से घर की यह लड़की तुम्हारे साथ जिंदगी गुजारने के सपने नहीं देख सकती है. तुम मुझ से न मिला करो, प्लीज,’’ भरे गले से अपनी बात कह कर मैं कुछ दूरी पर इंतजार कर रही अपनी सहेली की तरफ चल पड़ी. बाद में रोहित ने बारबार फोन कर के मुझे फिर से मिलना शुरू करने के लिए राजी कर लिया. मेरी हंसीखुशी उन के लिए दिनबदिन ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती चली गई. मेरे रंगरूप का जादू उन के सिर चढ़ कर ऐसा बोला कि महीने भर बाद ही उन के घर वाले हमारे घर रिश्ता पक्का करने आ पहुंचे. उस दिन हुई पहली मुलाकात में ही मुझे साफ एहसास हो गया कि यह रिश्ता उन के परिवार वालों को पसंद नहीं था. मेरी शादी को करीब 6 महीने हो चुके हैं और अब तक मेरे सासससुर और जेठजेठानी की मेरे प्रति नापसंदगी अपनी जगह कायम है. अपने पिता से झगड़ा करने के बाद रोहित को घर से बाहर गए 5 मिनट भी नहीं हुए होंगे कि सासूमां मेरे कमरे में आ पहुंचीं. उन की झिझक और बेचैनी को देख कर कोई भी कह सकता था कि बात करने के लिए मेरे पास आना उन्हें अपमानित महसूस करा रहा है.

मेरे सामने झुकना उन की मजबूरी थी. उन का अपनी बड़ी बहू नेहा से 36 का आंकड़ा था, क्योंकि बेहद अमीर बाप की बेटी होने के कारण वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझती थी. मेरे सामने बैठते ही सासूमां मुझे समझाने लगीं, ‘‘ घर में छोटीबड़ी खटपट, तकरार तो चलती रहती है, पर तू रोहित को समझाना कि वह घर छोड़ कर जाने की बात मन से बिलकुल निकाल दे.’’ मैं ने बेबस से लहजे में जवाब दिया, ‘‘मम्मी, आप तो जानती ही हैं कि वे कितने जिद्दी इनसान हैं. मैं उन्हें घर से अलग होने से कब तक रोक सकूंगी? आप पापा को भी समझाओ कि वे घर से निकाल देने की धमकी तो बिलकुल न दिया करें.’’

‘‘उन्हें तो तब तक अक्ल नहीं आएगी जब तक गुस्से के कारण उन के दिमाग की कोई नस नहीं फट जाएगी.’’ ‘‘ऐसी बातें मुंह से न निकालिए, प्लीज,’’ मेरा मन ससुरजी के अपाहिज हो जाने की बात सोच कर ही बेचैनी और घबराहट का शिकार हो उठा था. कुछ देर तक अपनी व ससुरजी की गिरती सेहत के दुखड़े सुनाने के बाद सासूजी चली गईं. हम घर से अलग नहीं होंगे, मुझ से ऐसा आश्वासन पा कर उन की चिंता काफी हद तक कम हो गई थी. उस रात मुझे साथ ले कर रोहित अपने दोस्त की शादी की सालगिरह की पार्टी में जाना चाहते थे. उन का यह कार्यक्रम खटाई में पड़ गया, क्योंकि ससुरजी को सुबह से 5-6 बार उलटियां हो चुकी थीं. औफिस से आने के बाद जब उन्होंने मेरे जल्दी तैयार होने के लिए शोर मचाया, तो घर में क्लेश शुरू हो गया और बात धीरेधीरे बढ़ती चली गई.

सचाई यही है कि कुछ कारणों से मैं खुद भी रोहित के दोस्त द्वारा दी जा रही कौकटेल पार्टी में नहीं जाना चाहती थी. आज मैं जिंदगी के उसी मुकाम पर हूं जहां होने के सपने मैं हमेशा देखती आई हूं. संयोग से मैं ने जिस ऐशोआराम भरी जिंदगी को पाया है, उसे नासमझी के कारण खो देने का मेरा कोई इरादा नहीं था. रोहित की एक निशा भाभी हैं, जिन के अपने पति सौरभ के साथ संबंध बहुत खराब चल रहे हैं. उन के बीच तलाक हो कर रहेगा, ऐसा सब का मानना है. मैं ने पिछली कुछ पार्टियों में नोट किया कि फ्लर्ट करने में एक्सपर्ट निशा भाभी रोहित को बहुत लिफ्ट दे रही हैं. यह सभी जानते हैं कि एक बार बहक गए कदमों को वापस राह पर लाना आसान नहीं होता है. रोहित को निशा से दूर रखने के महत्त्व को मैं अपने अनुभव से बखूबी समझती हूं, क्योंकि अपने पहले प्रेमी समीर को मैं खुद अब तक पूरी तरह से नहीं भुला पाई हूं.

वह मेरी सहेली शिखा का बड़ा भाई था. मैं 12वीं कक्षा की परीक्षा की तैयारी करने उन के घर पढ़ने जाती थी. मेरी खूबसूरती ने उसे जल्दी मेरा दीवाना बना दिया. उस की स्मार्टनैस भी मेरे दिल को भा गई. उन के घर में कभीकभी हमें एकांत में बिताने को 5-10 मिनट भी मिल जाते थे. इस छोटे से समय में ही उस के जिस्म से उठने वाली महक मुझे पागल कर देती थी. उस के हाथों का स्पर्श मेरे तनमन को मदहोश कर मेरे पूरे वजूद में अजीब सी ज्वाला भर देता था. एक रविवार की सुबह जब उस की मां बाजार जाने को निकलीं. मां के बाहर जाते ही समीर बाहर से घर लौट आया. हमें कुछ देर की मौजमस्ती करने के लिए किसी तरह का खतरा नजर नहीं आया, तो हम बहुत उत्तेजित हो आपस में लिपट गए. फिर गड़बड़ यह हुई कि उस की मां पर्स भूल जाने के कारण घर से कुछ दूर जा कर ही लौट आई थीं. दरवाजा खोलने के बाद समीर और मैं अपनी उखड़ी सांसों और मन की घबराहट को उन की अनुभवी नजरों से छिपा नहीं पाए थे. उन्होंने मुझे उसी वक्त घर भेज दिया और कुछ देर बाद आ कर मां से मेरी शिकायत कर दी. इस घटना का नतीजा यह हुआ कि मेरी शिखा से दोस्ती टूट गई और अपने मातापिता की नजरों में मैं ने अपनी इज्जत गंवा दी.

कच्ची उम्र में समीर के साथ प्यार का चक्कर चलाने की मूर्खता कर मैं ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी. मेरे सजनेसंवरने पर भी पूरी तरह से पाबंदी लग गई. मां की रातदिन की टोकाटाकी और पापा का मुझ से सीधे मुंह बात न करना मुझे बहुत दुखी करता था.  उन कठिन दिनों से गुजरते हुए एक सबक मैं अच्छी तरह सीख गई कि अगर मेरी ऐशोआराम की जिंदगी जीने की इच्छा और सारे सपने पूरे नहीं हुए तो जीने का मजा बिलकुल नहीं आएगा. घुटघुट कर जीने से बचने के लिए मुझे फौरन अपनी छवि सुधारना बहुत जरूरी था. ‘‘केवल सुंदर होने से काम नहीं चलता है. सूरत के साथ सीरत भी अच्छी होनी चाहिए,’’

मां से रातदिन मिलने वाली चेतावनी को मैं ने हमेशा के लिए गांठ बांध कर अपने को सुधार लेने का संकल्प उसी समय कर लिया. तभी से अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाई, उलझन और मुसीबत से सबक ले कर मैं खुद को बदलती आई हूं. रोहित के विवाहेत्तर संबंध न बन जाएं, इस डर के अलावा एक और डर मुझे परेशान करता था. उन्हें सप्ताह में 1-2 बार ड्रिंक करने का शौक है. आज भी उन के गुस्से को बहुत ज्यादा बढ़ाने का यही मुख्य कारण था कि दोस्तों के साथ शराब पीने का मौका उन के हाथ से निकल गया. मेरे लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि अगर हम अलग मकान में रहने चले गए, तो दोस्तों के साथ उन का पीनापिलाना बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा. समीर वाले किस्से के बाद मेरी मां मेरे साथ बहुत सख्त हो गई थीं. उन की उस सख्ती के चलते मेरे कदम फिर कभी नहीं भटके थे. यहां मेरे सासससुर मां वाली भूमिका निभा रहे थे. रोहित और मुझे नियंत्रण में रख कर वे दोनों एक तरह से हमारा भला ही कर रहे थे. अब मुझे यह बात समझ में आने लगी थी.

पिछले दिनों तक मैं घर से अलग हो जाने की जरूर सोचती थी, पर अब इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मैं ने ऐसा करने का इरादा बदल दिया है. रोहित 2 घंटे बाद जब लौटे, तब भी उन की आंखों में तेज गुस्सा साफ झलक रहा था. फिर भी मैं ने रोहित को अपनी बात कहने का फैसला किया. उन्हें कुछ कहने का मौका दिए बिना मैंने आंखों में आंसू भर कर भावुक लहजे में पूछा, ‘‘तुम मुझे सब की नजरों में क्यों गिराना चाहते हो?’’

‘‘मैं ने ऐसा क्या किया है?’’ उन्होंने गुस्से से भर कर पूछा.

‘‘टैंशन के कारण पापा को ढंग से सांस लेने में दिक्कत हो रही है. आपसी लड़ाईझगड़े की वजह से उन्हें कभी कुछ हो गया, तो मैं समाज में इज्जत से सिर उठा कर कभी नहीं जी सकूंगी.’’

‘‘वे लोग बात ही ऐसी गलत करते हैं…पार्टी में न जाने दे कर सारा मूड खराब कर दिया.’’

‘‘पार्टी में जाने का गम मत मनाओ, मैं हूं न आप का मूड ठीक करने के लिए,’’ मैं ने उन के बालों को प्यार से सहलाना शुरू कर दिया.

‘‘तुम तो हो ही लाखों में एक जानेमन.’’

‘‘तो अपनी इस लाखों में एक जानेमन की छोटी सी बात मानेंगे?’’

‘‘जरूर मानूंगा.’’ मेरी सुंदरता मेरी बहुत बड़ी ताकत है और अब इसी के बल पर मैं सारे रिश्तों के बीच अच्छा संतुलन और घर में हंसीखुशी का माहौल बनाना चाहती हूं. इस दिशा में काफी सोचविचार करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि सासससुर के साथ अपने रिश्ते सुधार कर उन्हें मजबूत बनाना मेरे हित के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है. अपने इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मैं ने रोहित के कान के पास मुंह ले जा कर प्यार भरे लहजे में पूछा, ‘‘क्या मैं तुम्हें कभी किसी भी बात से नाराज हो कर सोने देती हूं?’’

‘‘कभी नहीं और आज भी मत सोने देना,’’ उन के होंठों पर एक शरारती मुसकान उभरी.

‘‘आज आप भी मेरी इस अच्छी आदत को अपनाने का वादा मुझ से करो.’’

‘‘लो, कर लिया वादा.’’

‘‘तो अब चलो मेरे साथ.’’

‘‘कहां?’’

‘‘अपने मम्मीपापा के पास.’’

‘‘उन के पास किसलिए चलूं?’’

‘‘आप उन के साथ कुछ देर ढंग से बातें कर लोगे, तो ही वे दोनों चैन से सो पाएंगे.’’

‘‘नहीं,’’ यह मैं नहीं…

मैं ने झुक कर पहले रोहित के होंठों पर प्यार भरा चुंबन अंकित किया और फिर उन की आंखों में प्यार से झांकते हुए मोहक स्वर में बोली, ‘‘प्लीज, मेरी खुशी की खातिर आप को यह काम करना ही पड़ेगा. आप मेरी बात मानेंगे न?’’ तुम्हारी बात कैसे टाल सकता हूं ब्यूटीफुल चलो,’’ रोमांटिक अंदाज में मेरा हाथ चूमने के बाद जब वे फौरन अपने मातापिता के पास जाने को उठ खड़े हुए, तो मैं मन ही मन विजयीभाव से मुसकराते हुए उन के गले लग गई.

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झगड़ाशुरू कराने वाली बात बड़ी नहीं थी, पर बहसबाजी लंबी खिंच जाने से रोहित और उस के पिता के बीच की तकरार एकाएक विस्फोटक बिंदु पर पहुंच गई.

‘‘जोरू के गुलाम, तुझे अपनी मां और मेरी जरा भी फिक्र नहीं रही है. अब मुझे भी नहीं रखना है तुझे इस घर में,’’ ससुरजी की इस बात ने आग में घी का काम करते हुए रोहित के गुस्से को इतना बढ़ा दिया कि वे उसी समय अपने जानकार प्रौपर्टी डीलर से मिलने चले गए. मैं बहुत सुंदर हूं और रोहित मेरे ऊपर पूरी तरह लट्टू हैं. मेरी ससुराल वालों के अलावा उन के दोस्त और मेरे मायके वाले भी मानते हैं कि मैं उन्हें अपनी उंगलियों पर बड़ी आसानी से नचा सकती हूं. मेरे सासससुर ने अपनी छोटी बहू यानी मुझे कभी पसंद नहीं किया. वे दोनों हर किसी के सामने यह रोना रोते कि मैं ने उन के बेटे को अपने रूपजाल में फंसा कर मातापिता से दूर कर दिया है. वैसे मुझे पता था कि रोहित की घर से अलग हो जाने की धमकी से घबरा कर मेरी सास बिगड़ी बात संभालने के लिए जल्दी मुझे से मिलने मेरे कमरे  में आएंगी. गुस्से में घर से अलग कर देने की बात मुंह से निकालना अलग बात है, पर मेरे सासससुर जानते हैं कि हम दोनों के अलावा उन की देखभाल करने वाला और कोई नहीं है. ऊपरी मंजिल पर रह रहे बड़े भैया और भाभी मुझ से तो क्या, घर में किसी से भी ढंग से नहीं बोलते हैं.

मैं बहुत साधारण परिवार में पलीबढ़ी थी. इस में कोई शक नहीं कि अगर मैं बेहद सुंदर न होती, तो मुझ से शादी करने का विचार अमीर घर के बेटे रोहित के मन में कभी पैदा न होता. मेरे मातापिता ने बचपन से ही मेरे दिलोदिमाग में यह बात भर दी थी कि हर तरह की खुशियां और सुख पाना उन की परी सी खूबसूरत बेटी का पैदाइशी हक है. अपनी सुंदरता के बल पर मैं दुनिया पर राज करूंगी, किशोरावस्था में ही इस इच्छा ने मेरे मन के अंदर गहरी जड़ें जमा ली थीं. रोहित से मेरी पहली मुलाकात अपनी एक सहेली के भाई की शादी में हुई थी.वे जिस कार से उतरे उस का रंग और डिजाइन मुझे बहुत पसंद आया था. सहेली से जानकारी मिली कि वे अच्छी जौब कर रहे हैं. इस से उन से दोस्ती करने में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई थी. उन की आंखों में झांकते हुए मैं 2-3 बार बड़ी अदा से मुसकराई, तो वे फौरन मुझ में दिलचस्पी लेने लगे. मौका ढूंढ़ कर मुझ से बातें करने लगते, तो मैं 2-4 वाक्य बोल कर कहीं और चली जाती. मेरे शर्मीले स्वभाव ने उन्हें मेरे साथ दोस्ती बढ़ाने के लिए और ज्यादा उतावला कर दिया. उस रात विदा लेने से पहले उन्होंने मेरा फोन नंबर ले लिया. अगले दिन से ही हमारे बीच फोन पर बातें होने लगीं. सप्ताह भर बाद हम औफिस खत्म होने के बाद बाहर मिलने लगे.

हमारी चौथी मुलाकात एक बड़े पार्क में हुई. वहां एक सुनसान जगह का फायदा उठाते हुए उन्होंने अचानक मेरे होंठों से अपने होंठ जोड़ कर मुझे चूम लिया. अपनी भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाने के कारण मैं बहुत जोर से उन से लिपट गई. बाद में उन की बांहों के घेरे से बाहर आ कर जब मैं सुबकने लगी, तो उन की उलझन और बेचैनी बहुत ज्यादा बढ़ गई. बहुत पूछने पर भी न मैं ने उन्हें अपने आंसू बहाने का कारण बताया और न ही ज्यादा देर उन के साथ रुकी. पूरे 3 दिनों तक मैं ने उन से फोन पर बात नहीं की तो चौथे दिन शाम को वे मुझे मेरे औफिस के गेट के पास मेरा इंतजार करते नजर आए. उन के कुछ बोलने से पहले ही मैं ने उदास लहजे में कहा, ‘‘आई ऐम सौरी पर हमें अब आपस में नहीं मिलना चाहिए, रोहित.’’

‘‘पर क्यों? मुझे मेरी गलती तो बताओ?’’ वे बहुत परेशान नजर आ रहे थे.

‘‘तुम्हारी कोई गलती नहीं है.’’

‘‘तो मुझ से मिलना क्यों बंद कर रही हो?’’

उन के बारबार पूछने पर मैं ने नजरें झुका कर जवाब दिया, ‘‘मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो रही हूं…तुम्हारे साथ नजदीकियां बढ़ती रहीं तो मैं अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख सकूंगी.’’

‘‘तुम कहना क्या चाह रही हो?’’ उन की आंखों में उलझन के भाव और ज्यादा बढ़ गए.

‘‘हम ऐसे ही मिलते रहे तो किसी भी दिन कुछ गलत घट जाएगा…तुम मुझे चीप लड़की समझो, यह सदमा मुझ से बरदाश्त नहीं होगा. साधारण से घर की यह लड़की तुम्हारे साथ जिंदगी गुजारने के सपने नहीं देख सकती है. तुम मुझ से न मिला करो, प्लीज,’’ भरे गले से अपनी बात कह कर मैं कुछ दूरी पर इंतजार कर रही अपनी सहेली की तरफ चल पड़ी. बाद में रोहित ने बारबार फोन कर के मुझे फिर से मिलना शुरू करने के लिए राजी कर लिया. मेरी हंसीखुशी उन के लिए दिनबदिन ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती चली गई. मेरे रंगरूप का जादू उन के सिर चढ़ कर ऐसा बोला कि महीने भर बाद ही उन के घर वाले हमारे घर रिश्ता पक्का करने आ पहुंचे. उस दिन हुई पहली मुलाकात में ही मुझे साफ एहसास हो गया कि यह रिश्ता उन के परिवार वालों को पसंद नहीं था. मेरी शादी को करीब 6 महीने हो चुके हैं और अब तक मेरे सासससुर और जेठजेठानी की मेरे प्रति नापसंदगी अपनी जगह कायम है. अपने पिता से झगड़ा करने के बाद रोहित को घर से बाहर गए 5 मिनट भी नहीं हुए होंगे कि सासूमां मेरे कमरे में आ पहुंचीं. उन की झिझक और बेचैनी को देख कर कोई भी कह सकता था कि बात करने के लिए मेरे पास आना उन्हें अपमानित महसूस करा रहा है.

मेरे सामने झुकना उन की मजबूरी थी. उन का अपनी बड़ी बहू नेहा से 36 का आंकड़ा था, क्योंकि बेहद अमीर बाप की बेटी होने के कारण वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझती थी. मेरे सामने बैठते ही सासूमां मुझे समझाने लगीं, ‘‘ घर में छोटीबड़ी खटपट, तकरार तो चलती रहती है, पर तू रोहित को समझाना कि वह घर छोड़ कर जाने की बात मन से बिलकुल निकाल दे.’’ मैं ने बेबस से लहजे में जवाब दिया, ‘‘मम्मी, आप तो जानती ही हैं कि वे कितने जिद्दी इनसान हैं. मैं उन्हें घर से अलग होने से कब तक रोक सकूंगी? आप पापा को भी समझाओ कि वे घर से निकाल देने की धमकी तो बिलकुल न दिया करें.’’

‘‘उन्हें तो तब तक अक्ल नहीं आएगी जब तक गुस्से के कारण उन के दिमाग की कोई नस नहीं फट जाएगी.’’ ‘‘ऐसी बातें मुंह से न निकालिए, प्लीज,’’ मेरा मन ससुरजी के अपाहिज हो जाने की बात सोच कर ही बेचैनी और घबराहट का शिकार हो उठा था. कुछ देर तक अपनी व ससुरजी की गिरती सेहत के दुखड़े सुनाने के बाद सासूजी चली गईं. हम घर से अलग नहीं होंगे, मुझ से ऐसा आश्वासन पा कर उन की चिंता काफी हद तक कम हो गई थी. उस रात मुझे साथ ले कर रोहित अपने दोस्त की शादी की सालगिरह की पार्टी में जाना चाहते थे. उन का यह कार्यक्रम खटाई में पड़ गया, क्योंकि ससुरजी को सुबह से 5-6 बार उलटियां हो चुकी थीं. औफिस से आने के बाद जब उन्होंने मेरे जल्दी तैयार होने के लिए शोर मचाया, तो घर में क्लेश शुरू हो गया और बात धीरेधीरे बढ़ती चली गई.

सचाई यही है कि कुछ कारणों से मैं खुद भी रोहित के दोस्त द्वारा दी जा रही कौकटेल पार्टी में नहीं जाना चाहती थी. आज मैं जिंदगी के उसी मुकाम पर हूं जहां होने के सपने मैं हमेशा देखती आई हूं. संयोग से मैं ने जिस ऐशोआराम भरी जिंदगी को पाया है, उसे नासमझी के कारण खो देने का मेरा कोई इरादा नहीं था. रोहित की एक निशा भाभी हैं, जिन के अपने पति सौरभ के साथ संबंध बहुत खराब चल रहे हैं. उन के बीच तलाक हो कर रहेगा, ऐसा सब का मानना है. मैं ने पिछली कुछ पार्टियों में नोट किया कि फ्लर्ट करने में एक्सपर्ट निशा भाभी रोहित को बहुत लिफ्ट दे रही हैं. यह सभी जानते हैं कि एक बार बहक गए कदमों को वापस राह पर लाना आसान नहीं होता है. रोहित को निशा से दूर रखने के महत्त्व को मैं अपने अनुभव से बखूबी समझती हूं, क्योंकि अपने पहले प्रेमी समीर को मैं खुद अब तक पूरी तरह से नहीं भुला पाई हूं.

वह मेरी सहेली शिखा का बड़ा भाई था. मैं 12वीं कक्षा की परीक्षा की तैयारी करने उन के घर पढ़ने जाती थी. मेरी खूबसूरती ने उसे जल्दी मेरा दीवाना बना दिया. उस की स्मार्टनैस भी मेरे दिल को भा गई. उन के घर में कभीकभी हमें एकांत में बिताने को 5-10 मिनट भी मिल जाते थे. इस छोटे से समय में ही उस के जिस्म से उठने वाली महक मुझे पागल कर देती थी. उस के हाथों का स्पर्श मेरे तनमन को मदहोश कर मेरे पूरे वजूद में अजीब सी ज्वाला भर देता था. एक रविवार की सुबह जब उस की मां बाजार जाने को निकलीं. मां के बाहर जाते ही समीर बाहर से घर लौट आया. हमें कुछ देर की मौजमस्ती करने के लिए किसी तरह का खतरा नजर नहीं आया, तो हम बहुत उत्तेजित हो आपस में लिपट गए. फिर गड़बड़ यह हुई कि उस की मां पर्स भूल जाने के कारण घर से कुछ दूर जा कर ही लौट आई थीं. दरवाजा खोलने के बाद समीर और मैं अपनी उखड़ी सांसों और मन की घबराहट को उन की अनुभवी नजरों से छिपा नहीं पाए थे. उन्होंने मुझे उसी वक्त घर भेज दिया और कुछ देर बाद आ कर मां से मेरी शिकायत कर दी. इस घटना का नतीजा यह हुआ कि मेरी शिखा से दोस्ती टूट गई और अपने मातापिता की नजरों में मैं ने अपनी इज्जत गंवा दी.

कच्ची उम्र में समीर के साथ प्यार का चक्कर चलाने की मूर्खता कर मैं ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी. मेरे सजनेसंवरने पर भी पूरी तरह से पाबंदी लग गई. मां की रातदिन की टोकाटाकी और पापा का मुझ से सीधे मुंह बात न करना मुझे बहुत दुखी करता था.  उन कठिन दिनों से गुजरते हुए एक सबक मैं अच्छी तरह सीख गई कि अगर मेरी ऐशोआराम की जिंदगी जीने की इच्छा और सारे सपने पूरे नहीं हुए तो जीने का मजा बिलकुल नहीं आएगा. घुटघुट कर जीने से बचने के लिए मुझे फौरन अपनी छवि सुधारना बहुत जरूरी था. ‘‘केवल सुंदर होने से काम नहीं चलता है. सूरत के साथ सीरत भी अच्छी होनी चाहिए,’’

मां से रातदिन मिलने वाली चेतावनी को मैं ने हमेशा के लिए गांठ बांध कर अपने को सुधार लेने का संकल्प उसी समय कर लिया. तभी से अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाई, उलझन और मुसीबत से सबक ले कर मैं खुद को बदलती आई हूं. रोहित के विवाहेत्तर संबंध न बन जाएं, इस डर के अलावा एक और डर मुझे परेशान करता था. उन्हें सप्ताह में 1-2 बार ड्रिंक करने का शौक है. आज भी उन के गुस्से को बहुत ज्यादा बढ़ाने का यही मुख्य कारण था कि दोस्तों के साथ शराब पीने का मौका उन के हाथ से निकल गया. मेरे लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि अगर हम अलग मकान में रहने चले गए, तो दोस्तों के साथ उन का पीनापिलाना बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा. समीर वाले किस्से के बाद मेरी मां मेरे साथ बहुत सख्त हो गई थीं. उन की उस सख्ती के चलते मेरे कदम फिर कभी नहीं भटके थे. यहां मेरे सासससुर मां वाली भूमिका निभा रहे थे. रोहित और मुझे नियंत्रण में रख कर वे दोनों एक तरह से हमारा भला ही कर रहे थे. अब मुझे यह बात समझ में आने लगी थी.

पिछले दिनों तक मैं घर से अलग हो जाने की जरूर सोचती थी, पर अब इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मैं ने ऐसा करने का इरादा बदल दिया है. रोहित 2 घंटे बाद जब लौटे, तब भी उन की आंखों में तेज गुस्सा साफ झलक रहा था. फिर भी मैं ने रोहित को अपनी बात कहने का फैसला किया. उन्हें कुछ कहने का मौका दिए बिना मैंने आंखों में आंसू भर कर भावुक लहजे में पूछा, ‘‘तुम मुझे सब की नजरों में क्यों गिराना चाहते हो?’’

‘‘मैं ने ऐसा क्या किया है?’’ उन्होंने गुस्से से भर कर पूछा.

‘‘टैंशन के कारण पापा को ढंग से सांस लेने में दिक्कत हो रही है. आपसी लड़ाईझगड़े की वजह से उन्हें कभी कुछ हो गया, तो मैं समाज में इज्जत से सिर उठा कर कभी नहीं जी सकूंगी.’’

‘‘वे लोग बात ही ऐसी गलत करते हैं…पार्टी में न जाने दे कर सारा मूड खराब कर दिया.’’

‘‘पार्टी में जाने का गम मत मनाओ, मैं हूं न आप का मूड ठीक करने के लिए,’’ मैं ने उन के बालों को प्यार से सहलाना शुरू कर दिया.

‘‘तुम तो हो ही लाखों में एक जानेमन.’’

‘‘तो अपनी इस लाखों में एक जानेमन की छोटी सी बात मानेंगे?’’

‘‘जरूर मानूंगा.’’ मेरी सुंदरता मेरी बहुत बड़ी ताकत है और अब इसी के बल पर मैं सारे रिश्तों के बीच अच्छा संतुलन और घर में हंसीखुशी का माहौल बनाना चाहती हूं. इस दिशा में काफी सोचविचार करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि सासससुर के साथ अपने रिश्ते सुधार कर उन्हें मजबूत बनाना मेरे हित के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है. अपने इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मैं ने रोहित के कान के पास मुंह ले जा कर प्यार भरे लहजे में पूछा, ‘‘क्या मैं तुम्हें कभी किसी भी बात से नाराज हो कर सोने देती हूं?’’

‘‘कभी नहीं और आज भी मत सोने देना,’’ उन के होंठों पर एक शरारती मुसकान उभरी.

‘‘आज आप भी मेरी इस अच्छी आदत को अपनाने का वादा मुझ से करो.’’

‘‘लो, कर लिया वादा.’’

‘‘तो अब चलो मेरे साथ.’’

‘‘कहां?’’

‘‘अपने मम्मीपापा के पास.’’

‘‘उन के पास किसलिए चलूं?’’

‘‘आप उन के साथ कुछ देर ढंग से बातें कर लोगे, तो ही वे दोनों चैन से सो पाएंगे.’’

‘‘नहीं,’’ यह मैं नहीं…

मैं ने झुक कर पहले रोहित के होंठों पर प्यार भरा चुंबन अंकित किया और फिर उन की आंखों में प्यार से झांकते हुए मोहक स्वर में बोली, ‘‘प्लीज, मेरी खुशी की खातिर आप को यह काम करना ही पड़ेगा. आप मेरी बात मानेंगे न?’’ तुम्हारी बात कैसे टाल सकता हूं ब्यूटीफुल चलो,’’ रोमांटिक अंदाज में मेरा हाथ चूमने के बाद जब वे फौरन अपने मातापिता के पास जाने को उठ खड़े हुए, तो मैं मन ही मन विजयीभाव से मुसकराते हुए उन के गले लग गई.

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April 29, 2022 at 09:00AM

Wednesday, 27 April 2022

अंतिम प्रयाण: अपनों और परायों का दो मुंहा चेहरा

विनायक के चेहरे को तिरछी नजरों से ताकती हुई परिता पिता से संवाद साध रही थी कि यह देखो पापा, अच्छा ही हुआ वरना आप अपनों और परायों का यह दोमुंहा चेहरा सहन न कर पाते. मैं और मम्मी  इन लोगों के बीच अब कैसे रहूं? और फिर उस ने सुधा की ओर देखा.

आखिर विनायक ने अंतिम सांस ली. बगल में उन का हाथ थामे बैठी सुधा, आंखें बंद किए लगातार मृत्युंजय जाप कर रही थी. पुनीत और परिता सजल आंखों से 15वां अध्याय गुनगुना रहे थे. विनायक इस सब के बिलकुल खिलाफ थे. खिलाफ तो इस सब के सुधा भी थी लेकिन जगहंसाई से बचने के लिए उसे यह ढोंग करना पड़ रहा था. जैसा विनायक का सात्विक, सत्यनिष्ठ, शांत जीवन था वैसा ही उन की शांत मृत्यु और वैसा ही उन का स्थितिप्रज्ञ परिवार, जिस ने पूरी स्वस्थता के साथ यह आघात सहने का मनोबल बना रखा था. इस के पीछे भी विनायक और सुधा के ही विचार थे.

दोनों ही देश की प्रतिष्ठत यूनिवर्सिटी में विज्ञान शाखा के पूर्व प्राध्यापक होने के कारण हमेशा सत्य की खोज में रत, स्पष्टवक्ता, समाज और परिवार में व्ववहार के नाम पर चलने वाले दंभ के सामने विरोध कर क्रांतिकारी कदम उठाने में हमेशा आगे रहे. उन से मिलने वाले किसी भी व्यक्ति को यही लगता था कि जीवन की सभी वास्तविकताओं और चढ़ावउतार को तटस्थताभाव से समझने वाले और पचाने वाला यह दंपती धर्म में कम, मानवता व कर्म में ज्यादा जीता है. शायद इसीलिए विनायक को अच्छा लगे, उन के व्यक्तित्व पर जमे, इस तरह पूरे परिवार ने मोक्षमार्ग के प्रयाण के समय आंसू गिराए बिना खुद को संभाला और निभाया.

खबर मिलते ही सगेसंबंधी, पड़ोसी, यारदोस्त, कलेज के साथी जुटने लगे थे. अंतिम प्रयाण की तैयारियां होने लगी थीं. पुनीत और परिता के फोन बजने लगे थे. फोन विनायक के दूर के मौसेरे भाई हरीश का था, “अरे, मुझे तो अभीअभी पता चला. प्रकृति जो करे, वही ठीक है. वैसे तो कुछ भी नहीं था न उन्हें? कैसे हो गया यह? बेटा, हिम्मत से काम लेना. मैं तो बेंगलुरु से अभी पहुंच नहीं सकता, पर कोई काम हो, कह देना, जरा भी संकोच मत करना.”

“जी अंकल, नहींनहीं, कोई बात नहीं. बस, अचानक सांस भारी हुई. पापा की इच्छानुसार किसी तरह का कोई लौकिक रीतिरिवाज नहीं रखा, इसलिए परेशान मत होइए.”

“सुधा भाभी को संभालना. अब तो घर में तुम्हीं सब से बड़े हो. परिता तो अभी छोटी है. मुझे विश्वास है, तुम संभाल लोगे. बाकी और बोलो, नया क्या है. मजे में हो न?” और फोन कट गया.

पुनीत एकटक फोन को ताकता रहा. ‘नया क्या है, मजे में हो न? नया क्या है मजे में हो न?’ कान के परदे पर ये शब्द गूंजते रहे. बाप को खोए अभी कुछ ही घंटे हुए हैं. उन का पार्थिव शरीर अभी सामने पड़ा है. इस हालत में भला कोई मजे में हो सकता है? यह नया कहा जाएगा? इस तरह के सवाल? मन को धक्का लगा.

अब पुनीत ने मां की ओर नजर दौडाई. गजब स्वस्थ हैं मम्मी. लगातार गुनगुना कर रही हैं, पापा की ऊर्ध्वगति के लिए, अपनी वेदना को छिपा कर. तभी मिसेज तिवारी आंटी आईं. इस्त्री की हुई साड़ी में, दोनों हाथ जोड़े, “सुधा, यह क्या हो गया? मुझे तो प्रोफैसर शशांक से पता चला. अब तुम इन दोनों को देखो. इन की हिम्मत तो तुम्हीं हो अब. किसी भी तरह की कोई जरूरत हो तो कहना. खाने की चिंता मत करना. कालेज की कैंटीन में कह दिया है. अभी कुछ दिनों तक घर में लोगों का आनाजाना लगा रहेगा न. सागसब्जी तो कुछ नहीं चाहिए?”

सुधा मिसेस तिवारी के चल रहे नौनस्टौप लैक्चर को नतमस्तक हो कर सुन रही थी, “देखो, चाहोगी तो यह सब तुम्हें घरबैठे मिल जाएगा. ऐसी तमाम ऐप हैं. मैं तो इस महामारी के दौर में औनलाइन ही और्डर करती हूं. 3-4 घंटों में सब्जी आ जाती है.” तभी बगल में बैठी तारा बूआ ने आंख पोंछते हुए धीरे से कहा, “हांहां, बहुत अच्छी सर्विस है उन की. उस में डिस्काउंट स्कीम भी चलती रहती है. परवल और भिंडी एकदम ताजी और आर्गेनिक.”

मिसेज तिवारी अब बूआ की ओर घूम कर फुसफुसाती हुई बोलीं, “उस में आप कौन्टैक्ट ऐड कर के फायदा भी ले सकती हैं. आप अपना नंबर दीजिए, मैं आप को ऐड…”

वहीं पास में बैठे पुनीत और परिता स्तब्ध हो कर एकदूसरे को देख रहे थे. यह स्थान और समय सचमुच सागसब्जी की ऐप के संवाद के लिए था. ऐसे मौके की तो छोड़ो, सामान्य संयोगों पर भी मम्मी इस तरह के माहौल का जोरदार बहिष्कार करतीं. पर इस समय, ऐसे मौके पर एक सामान्य महिला की तरह चुपचाप बैठी सभी का मुंह ताक रही थीं. भाईबहन कभी एकदूसरे का तो कभी मां का तो कभी बातें करने वालों का मुंह ताक रहे थे.

अभी सभी थोड़ा सामन्य हुए थे कि रविंद्र ताऊ पुनीत के पास आ कर बोले, “ए पुनीत, विनय भैया का एक कुरतापायजामा दो. जल्दीजल्दी में मैं ने तौलिया तो ले लिया, पर श्मशान से लौट कर नहाने के बाद बदलने के लिए कपड़े साथ लाना भूल गया. और अब तो विनय भैया के कपड़ों की जरूरत ही क्या है. अरे हां, पिछले महीने फैशन वेयर से उन्होंने जो कुरतापायजामा खरीदा था, उसे ही ले आना.”

रविंद्र विनायक के सगे बड़े भाई थे. पुनीत ने झटके से रविंद्र की ओर देखा. बड़ेबुजुर्ग हैं, इसलिए लिहाज करने के अलावा और क्या विकल्प हो सकता था? बड़ी बूआ कनक 2-4 अन्य बुजुर्ग महिलाओं के बीच बैठी सुधा से फरमा रही थीं, “ऐसे में तुम्हें रहने में अकेलापन लगेगा. कहो तो मैं एकाध महीने रुक जाऊं? वैसे भी हमें क्या काम है. मंदिर में बैठी रहूं या तुम्हारे घर में, क्या फर्क पड़ता है. व्रतउपवास तो मैं करती नहीं. हां, मेरे लिए अलग खाना बनाने का थोड़ा झंझट जरूर रहेगा. तुम्हारा भी मन लगा रहेगा और भजनसत्संग भी होता रहेगा. अब तो तुम्हें भी इसी में हमेशाहमेशा के लिए मन लगाना होगा.”

सुधा शून्यभाव से चुपचाप अपने चारों ओर बुढ़ियों को ताकती रही. उन सब की बातें सुन कर वह थक गई हो, इस तरह निसास छोड़ती रही. उसी समय कोने में दीवार से टेक लगाए बैठे मनोज मोबाइल पर जोरजोर से बातें करते हुए आगे खिसके, “हांहां, सुनाई दे रहा है. वहां तो इस समय देररात होगी? ले बात कर पुनीत से.” इस के बाद पुनीत को फोन पकड़ाते हुए कहा, “ले, बात कर, दीपक है स्काइप पर. तेरे लिए ही जाग रहा है. फर्ज निभाने में मेरा दीपक जरा भी पीछे नहीं रहता. बहुत व्यावहारिक है. ले जरा बात कर ले और थोड़ा अंतिमदर्शन भी करा देना. मोबाइल की स्क्रीन विनायक मौसा की ओर घुमा देना. हमारे दीपक को परिवार से बहुत लगाव है.” इतना कह कर मनोज ने गर्वभरी नजरों से वहां बैठे लोगों की ओर देखा.

पुनीत को एकाएक झिझक सी हुई. जबरदस्ती हाथ में पकड़ाए गए मोबाइल को ले कर वह दूसरे कमरे में चला गया. बात कर के वह वापस आया तो अंतिमयात्रा के लिए मंत्रोच्चार और विधि हो रही थी. विनायक के पार्थिव शरीर को फूलों से सजाया जा रहा था. परिता बाप की विदाई और उस समय चल रही आसपास की विषमताओं को पचाने का असफल प्रयास कर रही थी.  तभी धीरे से खिसक कर धीरेंद्र ने कहा, “विश्वास ही नहीं हो रहा कि विनय मामा हम सब को छोड़ कर चले गए. मैं सब संभाल लूंगा, हां. मैं तुम्हारा भाई हूं न. मैं वह क्या कह रहा था कि कोई उतावल नहीं है, फिर भी आगेपीछे पुनीत के कान में बात डाल देना. इन फूलों और बाकी चीजों को मिला कर 3 हजार रुपए हुए हैं. कोई उतावल नहीं है. मामा को कितने अच्छे से सजाया है न, जैसे अभी उठ कर बोलने लगेंगे. चेहरे पर तेज तो देखो. श्मशान से आने के बाद खाने की क्या व्यवस्था की है? मैं वह क्या कह रहा था कि कहो तो पंडित के ढाबे पर फोन कर दूं. हमारी जानपहचान है पंडित से. उस के यहां का खाना बहुत टेस्टी होता है.”

धीरेंद्र की बातों से परिता की आंखों में आंसू आ गए. “पापा… यह किस तरह के लोगों के बीच छोड़ कर चले गए हो. आप तो समाज की सोच को बदलना चाहते थे, यहां तो इन के मन में मौत के बजाय ढाबे के टेस्टी खाने की परवा ज्यादा है.” मन में उठ रहे आक्रोश को वह आंसुओं में बहा रही थी.

पुनीत ने बहन को सांत्वना देने के लिए उस के सिर पर हाथ फेरा. उसी समय सुन॔दा आंटी एकाएक चिल्लाती हुई आईं और ध्यानमुद्रा में बैठी सुधा को बांहों में भर लिया. अपनी जेठानी के इस आवेगभरे हमले से सुधा हिल उठी. वे जोरजोर से कहने लगीं, “सुधा, यह क्या हो गया. मेरा प्यारा देवर हम सब को दगा दे गया. रो ले सुधा, रो ले. इस तरह गुमसुम बैठी रहेगी तो पत्थर हो जाएगी. फिर इन दोनों को कौन देखेगा?” थोड़ा खंखार कर गला साफ किया तो सुनंदा की आवाज थोड़ा स्पष्ट हुई. अब उन की बात पुनीत और परिता की भी समझ में आने लगी.

उन्होंने आगे कहा, “विधि का विधान तो देखो, अभी हम दोनों ने शादी की 50वीं वर्षगांठ मनाई है. तुम्हारे जेठ तो 75 पार कर गए और यह तो उन से कितने छोटे थे, फिर भी पहले चले गए.” आवाज की खनक और तरीके में छिपा राजी वाला मर्म स्पष्ट झलक रहा था, “पीकू मुझ से कह रहा था कि दादी, यह कैसा हुआ?  आप ओल्डर हैं तब भी कपल हैं. पर सुधा दादी तो आप से छोटी हैं, फिर भी विडो हो गईं, ऐसा कैसे?”

पुनीत मुट्ठी भींच कर लौन में खड़े लोगों की ओर बढ़ गया. परिता विनायक के निश्चेत चेहरे को तिरछी नजरों से ताकते हुए मन ही मन पिता से संवाद साध रही थी, ‘यह देखो, पापा, सुन रहे हो न? अच्छा ही हुआ, आप यह सब देखने के लिए यहां नहीं हो. आप चले गए, यही अच्छा है. वरना आप अपनों और परायों का यह दोमुंहा चेहरा सहन न कर पाते. इन लोगों की यह मानसिकता आप कैसे सह पाते. पापा, आप को तो छुटकारा मिल गया, अब मैं, मम्मी  इन लोगों के बीच कैसे रह पाऊंगी?’ और विनायक के चेहरे से नजर हटा कर लाचारी से मां सुधा की ओर देखा.

ठीक उसी समय सुनंदा बैठैबैठे बड़बड़ाती रहीं और पलभर में खुद को संभाल कर अगलबगल, आगेपीछे देखने लगीं, जैसे अदृश्य धक्का मारने वाली को खोज रही हों. और यह देख लेने वाली परिता उधर से नजर हटा कर पिता की सजी देह को ध्यान से देखने लगी.

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विनायक के चेहरे को तिरछी नजरों से ताकती हुई परिता पिता से संवाद साध रही थी कि यह देखो पापा, अच्छा ही हुआ वरना आप अपनों और परायों का यह दोमुंहा चेहरा सहन न कर पाते. मैं और मम्मी  इन लोगों के बीच अब कैसे रहूं? और फिर उस ने सुधा की ओर देखा.

आखिर विनायक ने अंतिम सांस ली. बगल में उन का हाथ थामे बैठी सुधा, आंखें बंद किए लगातार मृत्युंजय जाप कर रही थी. पुनीत और परिता सजल आंखों से 15वां अध्याय गुनगुना रहे थे. विनायक इस सब के बिलकुल खिलाफ थे. खिलाफ तो इस सब के सुधा भी थी लेकिन जगहंसाई से बचने के लिए उसे यह ढोंग करना पड़ रहा था. जैसा विनायक का सात्विक, सत्यनिष्ठ, शांत जीवन था वैसा ही उन की शांत मृत्यु और वैसा ही उन का स्थितिप्रज्ञ परिवार, जिस ने पूरी स्वस्थता के साथ यह आघात सहने का मनोबल बना रखा था. इस के पीछे भी विनायक और सुधा के ही विचार थे.

दोनों ही देश की प्रतिष्ठत यूनिवर्सिटी में विज्ञान शाखा के पूर्व प्राध्यापक होने के कारण हमेशा सत्य की खोज में रत, स्पष्टवक्ता, समाज और परिवार में व्ववहार के नाम पर चलने वाले दंभ के सामने विरोध कर क्रांतिकारी कदम उठाने में हमेशा आगे रहे. उन से मिलने वाले किसी भी व्यक्ति को यही लगता था कि जीवन की सभी वास्तविकताओं और चढ़ावउतार को तटस्थताभाव से समझने वाले और पचाने वाला यह दंपती धर्म में कम, मानवता व कर्म में ज्यादा जीता है. शायद इसीलिए विनायक को अच्छा लगे, उन के व्यक्तित्व पर जमे, इस तरह पूरे परिवार ने मोक्षमार्ग के प्रयाण के समय आंसू गिराए बिना खुद को संभाला और निभाया.

खबर मिलते ही सगेसंबंधी, पड़ोसी, यारदोस्त, कलेज के साथी जुटने लगे थे. अंतिम प्रयाण की तैयारियां होने लगी थीं. पुनीत और परिता के फोन बजने लगे थे. फोन विनायक के दूर के मौसेरे भाई हरीश का था, “अरे, मुझे तो अभीअभी पता चला. प्रकृति जो करे, वही ठीक है. वैसे तो कुछ भी नहीं था न उन्हें? कैसे हो गया यह? बेटा, हिम्मत से काम लेना. मैं तो बेंगलुरु से अभी पहुंच नहीं सकता, पर कोई काम हो, कह देना, जरा भी संकोच मत करना.”

“जी अंकल, नहींनहीं, कोई बात नहीं. बस, अचानक सांस भारी हुई. पापा की इच्छानुसार किसी तरह का कोई लौकिक रीतिरिवाज नहीं रखा, इसलिए परेशान मत होइए.”

“सुधा भाभी को संभालना. अब तो घर में तुम्हीं सब से बड़े हो. परिता तो अभी छोटी है. मुझे विश्वास है, तुम संभाल लोगे. बाकी और बोलो, नया क्या है. मजे में हो न?” और फोन कट गया.

पुनीत एकटक फोन को ताकता रहा. ‘नया क्या है, मजे में हो न? नया क्या है मजे में हो न?’ कान के परदे पर ये शब्द गूंजते रहे. बाप को खोए अभी कुछ ही घंटे हुए हैं. उन का पार्थिव शरीर अभी सामने पड़ा है. इस हालत में भला कोई मजे में हो सकता है? यह नया कहा जाएगा? इस तरह के सवाल? मन को धक्का लगा.

अब पुनीत ने मां की ओर नजर दौडाई. गजब स्वस्थ हैं मम्मी. लगातार गुनगुना कर रही हैं, पापा की ऊर्ध्वगति के लिए, अपनी वेदना को छिपा कर. तभी मिसेज तिवारी आंटी आईं. इस्त्री की हुई साड़ी में, दोनों हाथ जोड़े, “सुधा, यह क्या हो गया? मुझे तो प्रोफैसर शशांक से पता चला. अब तुम इन दोनों को देखो. इन की हिम्मत तो तुम्हीं हो अब. किसी भी तरह की कोई जरूरत हो तो कहना. खाने की चिंता मत करना. कालेज की कैंटीन में कह दिया है. अभी कुछ दिनों तक घर में लोगों का आनाजाना लगा रहेगा न. सागसब्जी तो कुछ नहीं चाहिए?”

सुधा मिसेस तिवारी के चल रहे नौनस्टौप लैक्चर को नतमस्तक हो कर सुन रही थी, “देखो, चाहोगी तो यह सब तुम्हें घरबैठे मिल जाएगा. ऐसी तमाम ऐप हैं. मैं तो इस महामारी के दौर में औनलाइन ही और्डर करती हूं. 3-4 घंटों में सब्जी आ जाती है.” तभी बगल में बैठी तारा बूआ ने आंख पोंछते हुए धीरे से कहा, “हांहां, बहुत अच्छी सर्विस है उन की. उस में डिस्काउंट स्कीम भी चलती रहती है. परवल और भिंडी एकदम ताजी और आर्गेनिक.”

मिसेज तिवारी अब बूआ की ओर घूम कर फुसफुसाती हुई बोलीं, “उस में आप कौन्टैक्ट ऐड कर के फायदा भी ले सकती हैं. आप अपना नंबर दीजिए, मैं आप को ऐड…”

वहीं पास में बैठे पुनीत और परिता स्तब्ध हो कर एकदूसरे को देख रहे थे. यह स्थान और समय सचमुच सागसब्जी की ऐप के संवाद के लिए था. ऐसे मौके की तो छोड़ो, सामान्य संयोगों पर भी मम्मी इस तरह के माहौल का जोरदार बहिष्कार करतीं. पर इस समय, ऐसे मौके पर एक सामान्य महिला की तरह चुपचाप बैठी सभी का मुंह ताक रही थीं. भाईबहन कभी एकदूसरे का तो कभी मां का तो कभी बातें करने वालों का मुंह ताक रहे थे.

अभी सभी थोड़ा सामन्य हुए थे कि रविंद्र ताऊ पुनीत के पास आ कर बोले, “ए पुनीत, विनय भैया का एक कुरतापायजामा दो. जल्दीजल्दी में मैं ने तौलिया तो ले लिया, पर श्मशान से लौट कर नहाने के बाद बदलने के लिए कपड़े साथ लाना भूल गया. और अब तो विनय भैया के कपड़ों की जरूरत ही क्या है. अरे हां, पिछले महीने फैशन वेयर से उन्होंने जो कुरतापायजामा खरीदा था, उसे ही ले आना.”

रविंद्र विनायक के सगे बड़े भाई थे. पुनीत ने झटके से रविंद्र की ओर देखा. बड़ेबुजुर्ग हैं, इसलिए लिहाज करने के अलावा और क्या विकल्प हो सकता था? बड़ी बूआ कनक 2-4 अन्य बुजुर्ग महिलाओं के बीच बैठी सुधा से फरमा रही थीं, “ऐसे में तुम्हें रहने में अकेलापन लगेगा. कहो तो मैं एकाध महीने रुक जाऊं? वैसे भी हमें क्या काम है. मंदिर में बैठी रहूं या तुम्हारे घर में, क्या फर्क पड़ता है. व्रतउपवास तो मैं करती नहीं. हां, मेरे लिए अलग खाना बनाने का थोड़ा झंझट जरूर रहेगा. तुम्हारा भी मन लगा रहेगा और भजनसत्संग भी होता रहेगा. अब तो तुम्हें भी इसी में हमेशाहमेशा के लिए मन लगाना होगा.”

सुधा शून्यभाव से चुपचाप अपने चारों ओर बुढ़ियों को ताकती रही. उन सब की बातें सुन कर वह थक गई हो, इस तरह निसास छोड़ती रही. उसी समय कोने में दीवार से टेक लगाए बैठे मनोज मोबाइल पर जोरजोर से बातें करते हुए आगे खिसके, “हांहां, सुनाई दे रहा है. वहां तो इस समय देररात होगी? ले बात कर पुनीत से.” इस के बाद पुनीत को फोन पकड़ाते हुए कहा, “ले, बात कर, दीपक है स्काइप पर. तेरे लिए ही जाग रहा है. फर्ज निभाने में मेरा दीपक जरा भी पीछे नहीं रहता. बहुत व्यावहारिक है. ले जरा बात कर ले और थोड़ा अंतिमदर्शन भी करा देना. मोबाइल की स्क्रीन विनायक मौसा की ओर घुमा देना. हमारे दीपक को परिवार से बहुत लगाव है.” इतना कह कर मनोज ने गर्वभरी नजरों से वहां बैठे लोगों की ओर देखा.

पुनीत को एकाएक झिझक सी हुई. जबरदस्ती हाथ में पकड़ाए गए मोबाइल को ले कर वह दूसरे कमरे में चला गया. बात कर के वह वापस आया तो अंतिमयात्रा के लिए मंत्रोच्चार और विधि हो रही थी. विनायक के पार्थिव शरीर को फूलों से सजाया जा रहा था. परिता बाप की विदाई और उस समय चल रही आसपास की विषमताओं को पचाने का असफल प्रयास कर रही थी.  तभी धीरे से खिसक कर धीरेंद्र ने कहा, “विश्वास ही नहीं हो रहा कि विनय मामा हम सब को छोड़ कर चले गए. मैं सब संभाल लूंगा, हां. मैं तुम्हारा भाई हूं न. मैं वह क्या कह रहा था कि कोई उतावल नहीं है, फिर भी आगेपीछे पुनीत के कान में बात डाल देना. इन फूलों और बाकी चीजों को मिला कर 3 हजार रुपए हुए हैं. कोई उतावल नहीं है. मामा को कितने अच्छे से सजाया है न, जैसे अभी उठ कर बोलने लगेंगे. चेहरे पर तेज तो देखो. श्मशान से आने के बाद खाने की क्या व्यवस्था की है? मैं वह क्या कह रहा था कि कहो तो पंडित के ढाबे पर फोन कर दूं. हमारी जानपहचान है पंडित से. उस के यहां का खाना बहुत टेस्टी होता है.”

धीरेंद्र की बातों से परिता की आंखों में आंसू आ गए. “पापा… यह किस तरह के लोगों के बीच छोड़ कर चले गए हो. आप तो समाज की सोच को बदलना चाहते थे, यहां तो इन के मन में मौत के बजाय ढाबे के टेस्टी खाने की परवा ज्यादा है.” मन में उठ रहे आक्रोश को वह आंसुओं में बहा रही थी.

पुनीत ने बहन को सांत्वना देने के लिए उस के सिर पर हाथ फेरा. उसी समय सुन॔दा आंटी एकाएक चिल्लाती हुई आईं और ध्यानमुद्रा में बैठी सुधा को बांहों में भर लिया. अपनी जेठानी के इस आवेगभरे हमले से सुधा हिल उठी. वे जोरजोर से कहने लगीं, “सुधा, यह क्या हो गया. मेरा प्यारा देवर हम सब को दगा दे गया. रो ले सुधा, रो ले. इस तरह गुमसुम बैठी रहेगी तो पत्थर हो जाएगी. फिर इन दोनों को कौन देखेगा?” थोड़ा खंखार कर गला साफ किया तो सुनंदा की आवाज थोड़ा स्पष्ट हुई. अब उन की बात पुनीत और परिता की भी समझ में आने लगी.

उन्होंने आगे कहा, “विधि का विधान तो देखो, अभी हम दोनों ने शादी की 50वीं वर्षगांठ मनाई है. तुम्हारे जेठ तो 75 पार कर गए और यह तो उन से कितने छोटे थे, फिर भी पहले चले गए.” आवाज की खनक और तरीके में छिपा राजी वाला मर्म स्पष्ट झलक रहा था, “पीकू मुझ से कह रहा था कि दादी, यह कैसा हुआ?  आप ओल्डर हैं तब भी कपल हैं. पर सुधा दादी तो आप से छोटी हैं, फिर भी विडो हो गईं, ऐसा कैसे?”

पुनीत मुट्ठी भींच कर लौन में खड़े लोगों की ओर बढ़ गया. परिता विनायक के निश्चेत चेहरे को तिरछी नजरों से ताकते हुए मन ही मन पिता से संवाद साध रही थी, ‘यह देखो, पापा, सुन रहे हो न? अच्छा ही हुआ, आप यह सब देखने के लिए यहां नहीं हो. आप चले गए, यही अच्छा है. वरना आप अपनों और परायों का यह दोमुंहा चेहरा सहन न कर पाते. इन लोगों की यह मानसिकता आप कैसे सह पाते. पापा, आप को तो छुटकारा मिल गया, अब मैं, मम्मी  इन लोगों के बीच कैसे रह पाऊंगी?’ और विनायक के चेहरे से नजर हटा कर लाचारी से मां सुधा की ओर देखा.

ठीक उसी समय सुनंदा बैठैबैठे बड़बड़ाती रहीं और पलभर में खुद को संभाल कर अगलबगल, आगेपीछे देखने लगीं, जैसे अदृश्य धक्का मारने वाली को खोज रही हों. और यह देख लेने वाली परिता उधर से नजर हटा कर पिता की सजी देह को ध्यान से देखने लगी.

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April 28, 2022 at 09:19AM

आधी तस्वीर: क्या मनशा भैया को माफ कर पाई?

भैया के लिए मनशा के मन में जो शक बैठ गया उसे वह जीवनभर हटा न सकी. मन की अदालत में भी वह उन्हें माफ न कर सकी.

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भैया के लिए मनशा के मन में जो शक बैठ गया उसे वह जीवनभर हटा न सकी. मन की अदालत में भी वह उन्हें माफ न कर सकी.

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April 28, 2022 at 09:17AM

आधी तस्वीर- भाग 1: क्या मनशा भैया को माफ कर पाई?

वह दरवाजे के पास आ कर रुक गई थी. एक क्षण उन बंद दरवाजों को देखा. महसूस किया कि हृदय की धड़कन कुछ तेज हो गई है. चेहरे पर शायद कोई भाव हलकी छाया ले कर आया. एक विषाद की रेखा खिंची और आंखें कुछ नम हो गईं. साड़ी का पल्लू संभालते हुए हाथ घंटी के बटन पर गया तो उस में थोड़ा कंपन स्पष्ट झलक रहा था. जब तक रीता ने आ कर द्वार खोला, उसे कुछ क्षण मिल गए अपने को संभालने के लिए, ‘‘अरे, मनशा दीदी आप?’’ आश्चर्य से रीता की आंखें खुली रह गईं.

‘‘हां, मैं ही हूं. क्यों यकीन नहीं हो रहा?’’

‘‘यह बात नहीं, पर आप के इधर आने की आशा नहीं थी.’’

‘‘आशा…’’ मनशा आगे नहीं बोली. लगा जैसे शब्द अटक गए हैं.

दोनों चल कर ड्राइंगरूम में आ गईं. कालीन में उस का पांव उलझा, तो रीता ने उसे सहारा दे दिया. उस से लगे झटके से स्मृति की एक खिड़की सहसा खुल गई. उस दिन भी इसी तरह सूने घर में घंटी पर रवि ने दरवाजा खोला था और अपनी बांहों का सहारा दे कर वह जब उसे ड्राइंगरूम में लाया था तो मनशा का पांव कालीन में उलझ गया था. वह गिरने ही वाली थी कि रवि ने उसे संभाल लिया था. ‘बस, इसी तरह संभाले रहना,’ उस के यही शब्द थे जिस पर रवि ने गरदन हिलाहिला कर स्वीकृति दी थी और उसे आश्वस्त किया था. उसे सोफे पर बैठा कर रवि ने अपलक निशब्द उसे कितनी देर तक निहार कर कहा था, ‘तुम्हें चुपचाप देखने की इच्छा कई बार हुई है. इस में एक विचित्र से आनंद का अनुभव होता है, सच.’

मनशा को लगा 20-22 वर्ष बाद रीता उसी घटना को दोहरा रही है और वह उस की चुप्पी और सूनी खाली नजरों को सहन नहीं कर पा रही है. ‘‘क्या बात है, रीता? इतनी अजनबी तो मत बनो कि मुझे डर लगे.’’

‘‘नहीं दीदी, यह बात नहीं. बहुत दिनों से आप को देखा नहीं न, वही कसर पूरी कर रही थी.’’ फिर थोड़ा हंस कर बोली, ‘‘वैसे 20-22 वर्ष अजनबी बनने के लिए काफी होते हैं. लोग सबकुछ भूल जाते हैं और दुनिया भी बदल जाती है.’’

‘‘नहीं, रीता, कोई कुछ नहीं भूलता. सिर्फ याद का एहसास नहीं करा पाता और इस विवशता में सब जीते हैं. उस से कुछ लाभ नहीं मिलता सिवा मानसिक अशांति के,’’ मनशा बोली.

‘‘अच्छा, दीदी, घर पर सब कैसे हैं?’’

‘‘पहले चाय या कौफी तो पिलाओ, बातें फिर कर लेंगे,’’ वह हंसी.

‘‘ओह सौरी, यह तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा,’’ और रीता हंसती हुई उठ कर चली गई.

मनशा थोड़ी राहत महसूस करने लगी. जाने क्यों वातावरण में उसे एक बोझिलपन महसूस होने लगा था. वह उठ कर सामने के कमरे की ओर बढ़ने लगी. विचारों की कडि़यां जुड़ती चली गईं. 20 वर्षों बाद वह इस घर में आई है. जीवन का सारा काम ही तब से जाने कैसा हो गया था. ऐसा लगता कि मन की भीतरी तहों में दबी सारी कोमल भावनाएं समाप्त सी हो गई हैं. वर्तमान की चढ़ती परत अतीत को धीरेधीरे दबा गई थी. रवि संसार से उठ गया था और भैया भी. केवल उन से छुई स्मृतियां ही शेष रह गई थीं.

रवि के साथ जीवन को जोड़ने का सपना सहसा टूट गया था. घटनाएं रहस्य के आवरण में धुंधलाती गई थीं. प्रभात के साथ जीवन चलने लगा-इच्छाअनिच्छा से अभी भी चल ही रहा है. उन एकदो वर्षों में जो जीवन उसे जीना था उस की मीठी महक को संजो कर रखने की कामना के बावजूद उस ने उसे भूलना चाहा था. वह अपनेआप से लड़ती भी रही कि बीते हुए उन क्षणों से अपना नाता तोड़ ले और नए तानेबाने में अपने को खपा कर सबकुछ भुला दे, पर वह ऊपरी तौर पर ही अपने को समर्थ बना सकी थी, भीतर की आग बुझी नहीं. 20 वर्षों के अंतराल के बाद भी नहीं.

आज ज्वालामुखी की तरह धधक उठने के एहसास से ही वह आश्चर्यचकित हो सिहर उठी थी. क्या 20 वर्षों बाद भी ऐसा लग सकता है कि घटनाएं अभीअभी बीती हैं, जैसे वह इस कमरे में कलपरसों ही आ कर गई है, जैसे अभी रवि कमरे का दरवाजा खोल कर प्रकट हो जाएगा. उस की आंखें भर आईं. वह भारी कदमों से कमरे की ओर बढ़ गई.

कोई खास परिवर्तन नहीं था. सामने छोटी मेज पर वह तसवीर उसी फ्रेम में वैसी ही थी. कागज पुराना हो गया था पर रवि का चेहरा उतनी ही ताजगी से पूर्ण था. जनता पार्क के फौआरे के सामने उस ने रवि के साथ यह फोटो खिंचवाई थी. रवि की बांह उस की बांह से आगे आ गई थी और मनशा की साड़ी का आंचल उस की पैंट पर गया था. ठीक बीच से जब रवि ने तसवीर को काटा था तो एक में उस की बांह का भाग रह गया और इस में उस की साड़ी का आंचल रह गया.

2-3 वाक्य कमरे में फिर प्रतिध्वनित हुए, ‘मैं ने तुम्हारा आंचल थामा है मनशा और तुम्हें बांहों का सहारा दिया है. अपनी शादी के दिन इसे फिर जोड़ कर एक कर देंगे.’ वह कितनी देर तक रवि के कंधे पर सिर टिका सपनों की दुनिया में खोई रही थी उस दिन.

उन्होंने एमए में साथसाथ प्रवेश किया था. भाषा विज्ञान के पीरियड में प्रोफैसर के कमरे में अकसर रवि और मनशा साथ बैठते. कभी उन की आपस में कुहनी छू जाती तो कभी बांह. सिहरन की प्रतिक्रिया दोनों ओर होती और फिर धीरेधीरे यह अच्छा लगने लगा. तभी रवि मनशा के बड़े भैया से मिला और फिर तो उस का मनशा के घर में बराबर आनाजाना होने लगा. तुषार से घनिष्ठता बढ़ने के साथसाथ मनशा से भी अलग से संबंध विकसित होते चले गए. वह पहले से अधिक भावुक और गंभीर रहने लगी, अधिक एकांतप्रिय और खोईखोई सी दिखाई देने लगी.

अपने में आए इस परिवर्तन से मनशा खुद भी असुविधा महसूस करने लगी क्योंकि उस का संपर्क का दायरा सिमट कर उस पर और रवि पर केंद्रित हो गया था. कानों में रवि के वाक्य ही प्रतिध्वनित होते रहते थे, जिन्होंने सपनों की एक दुनिया बसा दी थी. ‘वे कौन से संस्कार होते हैं जो दो प्राणियों को इस तरह जोड़ देते हैं कि दूसरे के बिना जीवन निरर्थक लगने लगता है. ‘तुम्हें मेरे साथ देख कर नियति की नीयत न खराब हो जाए. सच, इसीलिए मैं ने उस चित्र के 2 भाग कर दिए.’ रवि के कंधे पर सिर रखे वह घंटों उस के हृदय की धड़कन को महसूस करती रही. उस की धड़कन से सिर्फ एक ही आवाज निकलती रही, मनशा…मनशा…मनशा.

वे क्षण उसे आज भी याद हैं जैसे बीते थे. सामने बालसमंद झील का नीला जल बूढ़ी पहाडि़यों की युवा चट्टानों से अठखेलियां कर रहा था. रहरह कर मछलियां छपाक से छलांग लगातीं और पेट की रोशनी में चमक कर विलीन हो जातीं. झील की सारी सतह पर चलने वाला यह दृश्य किसी नववधू की चुनरी में चमकने वाले सितारों की झिलमिल सा लग रहा था. बांध पर बने महल के सामने बड़े प्लेटफौर्म पर बैंचें लगी हुई थीं. मनशा का हाथ रवि के हाथ में था. उसे सहलातेसहलाते ही उस ने कहा था, ‘मनशा, समय ठहर क्यों नहीं जाता है?’

मनशा ने एक बहुत ही मधुर दृष्टि से उसे देख कर दूसरे हाथ की उंगली उस के होंठों पर रख दी थी, ‘नहीं, रवि, समय के ठहरने की कामना मत करो. ठहराव में जीवन नहीं होता, शून्य होता है और शून्य-नहीं, वहां कुछ नहीं होता.’

रवि हंस पड़ा था, ‘साहित्य का अध्ययन करतेकरते तुम दार्शनिक भी हो गई हो.’

न जाने ऐसे कितने दृश्यखंड समय की भित्ती पर बनते गए और अपनी स्मृतियां मानसपटल पर छोड़ते गए. बीते हुए एकएक क्षण की स्मृति में जीने में इतना ही समय फिर बीत जाएगा और जब इन क्षणों का अंत आएगा तब? क्या फिर से उस अंत को झेला जा सकता है? क्या कभी कोई ऐसी सामर्थ्य जुटा पाएगा, जीवन के कटु और यथार्थ सत्य को फिर से जी सकने की, उस का सामना करने की? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, इसीलिए जीवन की नियति ऐसी नहीं हुई. चलतेचलते ही जीवन की दिशा और धारा मुड़ जाती हैं या अवरुद्ध हो जाती हैं. हम कल्पना भी नहीं कर पाते कि सत्य घटित होने लगता है.

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वह दरवाजे के पास आ कर रुक गई थी. एक क्षण उन बंद दरवाजों को देखा. महसूस किया कि हृदय की धड़कन कुछ तेज हो गई है. चेहरे पर शायद कोई भाव हलकी छाया ले कर आया. एक विषाद की रेखा खिंची और आंखें कुछ नम हो गईं. साड़ी का पल्लू संभालते हुए हाथ घंटी के बटन पर गया तो उस में थोड़ा कंपन स्पष्ट झलक रहा था. जब तक रीता ने आ कर द्वार खोला, उसे कुछ क्षण मिल गए अपने को संभालने के लिए, ‘‘अरे, मनशा दीदी आप?’’ आश्चर्य से रीता की आंखें खुली रह गईं.

‘‘हां, मैं ही हूं. क्यों यकीन नहीं हो रहा?’’

‘‘यह बात नहीं, पर आप के इधर आने की आशा नहीं थी.’’

‘‘आशा…’’ मनशा आगे नहीं बोली. लगा जैसे शब्द अटक गए हैं.

दोनों चल कर ड्राइंगरूम में आ गईं. कालीन में उस का पांव उलझा, तो रीता ने उसे सहारा दे दिया. उस से लगे झटके से स्मृति की एक खिड़की सहसा खुल गई. उस दिन भी इसी तरह सूने घर में घंटी पर रवि ने दरवाजा खोला था और अपनी बांहों का सहारा दे कर वह जब उसे ड्राइंगरूम में लाया था तो मनशा का पांव कालीन में उलझ गया था. वह गिरने ही वाली थी कि रवि ने उसे संभाल लिया था. ‘बस, इसी तरह संभाले रहना,’ उस के यही शब्द थे जिस पर रवि ने गरदन हिलाहिला कर स्वीकृति दी थी और उसे आश्वस्त किया था. उसे सोफे पर बैठा कर रवि ने अपलक निशब्द उसे कितनी देर तक निहार कर कहा था, ‘तुम्हें चुपचाप देखने की इच्छा कई बार हुई है. इस में एक विचित्र से आनंद का अनुभव होता है, सच.’

मनशा को लगा 20-22 वर्ष बाद रीता उसी घटना को दोहरा रही है और वह उस की चुप्पी और सूनी खाली नजरों को सहन नहीं कर पा रही है. ‘‘क्या बात है, रीता? इतनी अजनबी तो मत बनो कि मुझे डर लगे.’’

‘‘नहीं दीदी, यह बात नहीं. बहुत दिनों से आप को देखा नहीं न, वही कसर पूरी कर रही थी.’’ फिर थोड़ा हंस कर बोली, ‘‘वैसे 20-22 वर्ष अजनबी बनने के लिए काफी होते हैं. लोग सबकुछ भूल जाते हैं और दुनिया भी बदल जाती है.’’

‘‘नहीं, रीता, कोई कुछ नहीं भूलता. सिर्फ याद का एहसास नहीं करा पाता और इस विवशता में सब जीते हैं. उस से कुछ लाभ नहीं मिलता सिवा मानसिक अशांति के,’’ मनशा बोली.

‘‘अच्छा, दीदी, घर पर सब कैसे हैं?’’

‘‘पहले चाय या कौफी तो पिलाओ, बातें फिर कर लेंगे,’’ वह हंसी.

‘‘ओह सौरी, यह तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा,’’ और रीता हंसती हुई उठ कर चली गई.

मनशा थोड़ी राहत महसूस करने लगी. जाने क्यों वातावरण में उसे एक बोझिलपन महसूस होने लगा था. वह उठ कर सामने के कमरे की ओर बढ़ने लगी. विचारों की कडि़यां जुड़ती चली गईं. 20 वर्षों बाद वह इस घर में आई है. जीवन का सारा काम ही तब से जाने कैसा हो गया था. ऐसा लगता कि मन की भीतरी तहों में दबी सारी कोमल भावनाएं समाप्त सी हो गई हैं. वर्तमान की चढ़ती परत अतीत को धीरेधीरे दबा गई थी. रवि संसार से उठ गया था और भैया भी. केवल उन से छुई स्मृतियां ही शेष रह गई थीं.

रवि के साथ जीवन को जोड़ने का सपना सहसा टूट गया था. घटनाएं रहस्य के आवरण में धुंधलाती गई थीं. प्रभात के साथ जीवन चलने लगा-इच्छाअनिच्छा से अभी भी चल ही रहा है. उन एकदो वर्षों में जो जीवन उसे जीना था उस की मीठी महक को संजो कर रखने की कामना के बावजूद उस ने उसे भूलना चाहा था. वह अपनेआप से लड़ती भी रही कि बीते हुए उन क्षणों से अपना नाता तोड़ ले और नए तानेबाने में अपने को खपा कर सबकुछ भुला दे, पर वह ऊपरी तौर पर ही अपने को समर्थ बना सकी थी, भीतर की आग बुझी नहीं. 20 वर्षों के अंतराल के बाद भी नहीं.

आज ज्वालामुखी की तरह धधक उठने के एहसास से ही वह आश्चर्यचकित हो सिहर उठी थी. क्या 20 वर्षों बाद भी ऐसा लग सकता है कि घटनाएं अभीअभी बीती हैं, जैसे वह इस कमरे में कलपरसों ही आ कर गई है, जैसे अभी रवि कमरे का दरवाजा खोल कर प्रकट हो जाएगा. उस की आंखें भर आईं. वह भारी कदमों से कमरे की ओर बढ़ गई.

कोई खास परिवर्तन नहीं था. सामने छोटी मेज पर वह तसवीर उसी फ्रेम में वैसी ही थी. कागज पुराना हो गया था पर रवि का चेहरा उतनी ही ताजगी से पूर्ण था. जनता पार्क के फौआरे के सामने उस ने रवि के साथ यह फोटो खिंचवाई थी. रवि की बांह उस की बांह से आगे आ गई थी और मनशा की साड़ी का आंचल उस की पैंट पर गया था. ठीक बीच से जब रवि ने तसवीर को काटा था तो एक में उस की बांह का भाग रह गया और इस में उस की साड़ी का आंचल रह गया.

2-3 वाक्य कमरे में फिर प्रतिध्वनित हुए, ‘मैं ने तुम्हारा आंचल थामा है मनशा और तुम्हें बांहों का सहारा दिया है. अपनी शादी के दिन इसे फिर जोड़ कर एक कर देंगे.’ वह कितनी देर तक रवि के कंधे पर सिर टिका सपनों की दुनिया में खोई रही थी उस दिन.

उन्होंने एमए में साथसाथ प्रवेश किया था. भाषा विज्ञान के पीरियड में प्रोफैसर के कमरे में अकसर रवि और मनशा साथ बैठते. कभी उन की आपस में कुहनी छू जाती तो कभी बांह. सिहरन की प्रतिक्रिया दोनों ओर होती और फिर धीरेधीरे यह अच्छा लगने लगा. तभी रवि मनशा के बड़े भैया से मिला और फिर तो उस का मनशा के घर में बराबर आनाजाना होने लगा. तुषार से घनिष्ठता बढ़ने के साथसाथ मनशा से भी अलग से संबंध विकसित होते चले गए. वह पहले से अधिक भावुक और गंभीर रहने लगी, अधिक एकांतप्रिय और खोईखोई सी दिखाई देने लगी.

अपने में आए इस परिवर्तन से मनशा खुद भी असुविधा महसूस करने लगी क्योंकि उस का संपर्क का दायरा सिमट कर उस पर और रवि पर केंद्रित हो गया था. कानों में रवि के वाक्य ही प्रतिध्वनित होते रहते थे, जिन्होंने सपनों की एक दुनिया बसा दी थी. ‘वे कौन से संस्कार होते हैं जो दो प्राणियों को इस तरह जोड़ देते हैं कि दूसरे के बिना जीवन निरर्थक लगने लगता है. ‘तुम्हें मेरे साथ देख कर नियति की नीयत न खराब हो जाए. सच, इसीलिए मैं ने उस चित्र के 2 भाग कर दिए.’ रवि के कंधे पर सिर रखे वह घंटों उस के हृदय की धड़कन को महसूस करती रही. उस की धड़कन से सिर्फ एक ही आवाज निकलती रही, मनशा…मनशा…मनशा.

वे क्षण उसे आज भी याद हैं जैसे बीते थे. सामने बालसमंद झील का नीला जल बूढ़ी पहाडि़यों की युवा चट्टानों से अठखेलियां कर रहा था. रहरह कर मछलियां छपाक से छलांग लगातीं और पेट की रोशनी में चमक कर विलीन हो जातीं. झील की सारी सतह पर चलने वाला यह दृश्य किसी नववधू की चुनरी में चमकने वाले सितारों की झिलमिल सा लग रहा था. बांध पर बने महल के सामने बड़े प्लेटफौर्म पर बैंचें लगी हुई थीं. मनशा का हाथ रवि के हाथ में था. उसे सहलातेसहलाते ही उस ने कहा था, ‘मनशा, समय ठहर क्यों नहीं जाता है?’

मनशा ने एक बहुत ही मधुर दृष्टि से उसे देख कर दूसरे हाथ की उंगली उस के होंठों पर रख दी थी, ‘नहीं, रवि, समय के ठहरने की कामना मत करो. ठहराव में जीवन नहीं होता, शून्य होता है और शून्य-नहीं, वहां कुछ नहीं होता.’

रवि हंस पड़ा था, ‘साहित्य का अध्ययन करतेकरते तुम दार्शनिक भी हो गई हो.’

न जाने ऐसे कितने दृश्यखंड समय की भित्ती पर बनते गए और अपनी स्मृतियां मानसपटल पर छोड़ते गए. बीते हुए एकएक क्षण की स्मृति में जीने में इतना ही समय फिर बीत जाएगा और जब इन क्षणों का अंत आएगा तब? क्या फिर से उस अंत को झेला जा सकता है? क्या कभी कोई ऐसी सामर्थ्य जुटा पाएगा, जीवन के कटु और यथार्थ सत्य को फिर से जी सकने की, उस का सामना करने की? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, इसीलिए जीवन की नियति ऐसी नहीं हुई. चलतेचलते ही जीवन की दिशा और धारा मुड़ जाती हैं या अवरुद्ध हो जाती हैं. हम कल्पना भी नहीं कर पाते कि सत्य घटित होने लगता है.

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April 28, 2022 at 09:16AM

विरासत: क्यों कठघरे में खड़ा था विनय

कई दिनों से एक बात मन में बारबार उठ रही है कि इनसान को शायद अपने कर्मों का फल इस जीवन में ही भोगना पड़ता है. यह बात नहीं है कि मैं टैलीविजन में आने वाले क्राइम और भक्तिप्रधान कार्यक्रमों से प्रभावित हो गया हूं. यह भी नहीं है कि धर्मग्रंथों का पाठ करने लगा हूं, न ही किसी बाबा का भक्त बना हूं. यह भी नहीं कि पश्चात्ताप की महत्ता नए सिरे में समझ आ गई हो.

दरअसल, बात यह है कि इन दिनों मेरी सुपुत्री राशि का मेलजोल अपने सहकर्मी रमन के साथ काफी बढ़ गया है. मेरी चिंता का विषय रमन का शादीशुदा होना है. राशि एक निजी बैंक में मैनेजर के पद पर कार्यरत है. रमन सीनियर मैनेजर है. मेरी बेटी अपने काम में काफी होशियार है. परंतु रमन के साथ उस की नजदीकी मेरी घबराहट को डर में बदल रही थी. मेरी पत्नी शोभा बेटे के पास न्यू जर्सी गई थी. अब वहां फोन कर के दोनों को क्या बताता. स्थिति का सामना मुझे स्वयं ही करना था. आज मेरा अतीत मुझे अपने सामने खड़ा दिखाई दे रहा था…

मेरा मुजफ्फर नगर में नया नया तबादला हुआ था. परिवार दिल्ली में ही छोड़ दिया था.  वैसे भी शोभा उस समय गर्भवती थी. वरुण भी बहुत छोटा था और शोभा का अपना परिवार भी वहीं था. इसलिए मैं ने उन को यहां लाना उचित नहीं समझा था. वैसे भी 2 साल बाद मुझे दोबारा पोस्टिंग मिल ही जानी थी.

गांधी कालोनी में एक घर किराए पर ले लिया था मैं ने. वहां से मेरा बैंक भी पास पड़ता था. पड़ोस में भी एक नया परिवार आया था. एक औरत और तीसरी या चौथी में पढ़ने वाले 2 जुड़वां लड़के. मेरे बैंक में काम करने वाले रमेश बाबू उसी महल्ले में रहते थे. उन से ही पता चला था कि वह औरत विधवा है. हमारे बैंक में ही उस के पति काम करते थे. कुछ साल पहले बीमारी की वजह से उन का देहांत हो गया था. उन्हीं की जगह उस औरत को नौकरी मिली थी. पहले अपनी ससुराल में रहती थी, परंतु पिछले महीने ही उन के तानों से तंग आ कर यहां रहने आई थी.

‘‘बच कर रहना विनयजी, बड़ी चालू औरत है. हाथ भी नहीं रखने देती,’’ जातेजाते रमेश बाबू यह बताना नहीं भूले थे. शायद उन की कोशिश का परिणाम अच्छा नहीं रहा होगा. इसीलिए मुझे सावधान करना उन्होंने अपना परम कर्तव्य समझा.

सौजन्य हमें विरासत में मिला है और पड़ोसियों के प्रति स्नेह और सहयोग की भावना हमारी अपनी कमाई है. इन तीनों गुणों का हम पुरुषवर्ग पूरी ईमानदारी से जतन तब और भी करते हैं जब पड़ोस में एक सुंदर स्त्री रहती हो. इसलिए पहला मौका मिलते ही मैं ने उसे अपने सौजन्य से अभिभूत कर दिया.

औफिस से लौट कर मैं ने देखा वह सीढि़यों पर बैठ हुई थी.

‘‘आप यहां क्यों बैठी हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी… सर… मेरी चाभी कहीं गिर कई है, बच्चे आने वाले हैं… समझ नहीं आ रहा क्या करूं?’’

‘‘आप परेशान न हों, आओ मेरे घर में आ जाओ.’’

‘‘जी…?’’

‘‘मेरा मतलब है आप अंदर चल कर बैठिए. तब तक मैं चाभी बनाने वाले को ले कर आता हूं.’’

‘‘जी, मैं यहीं इंतजार कर लूंगी.’’

‘‘जैसी आप की मरजी.’’

थोड़ी देर बाद रचनाजी के घर की चाभी बन गई और मैं उन के घर में बैठ कर चाय पी रहा था. आधे घंटे बाद उन के बच्चे भी आ गए. दोनों मेरे बेटे वरुण की ही उम्र के थे. पल भर में ही मैं ने उन का दिल जीत लिया.

जितना समय मैं ने शायद अपने बेटे को नहीं दिया था उस से कहीं ज्यादा मैं अखिल और निखिल को देने लगा था. उन के साथ क्रिकेट खेलना, पढ़ाई में उन की सहायता करना,

रविवार को उन्हें ले कर मंडी की चाट खाने का तो जैसे नियम बन गया था. रचनाजी अब रचना हो गई थीं. अब किसी भी फैसले में रचना के लिए मेरी अनुमति महत्त्वपूर्ण हो गई थी. इसीलिए मेरे समझाने पर उस ने अपने दोनों बेटों को स्कूल के बाकी बच्चों के साथ पिकनिक पर भेज दिया था.

सरकारी बैंक में काम हो न हो हड़ताल तो होती ही रहती है. हमारे बैंक में भी 2 दिन की हड़ताल थी, इसलिए उस दिन मैं घर पर ही था. अमूमन छुट्टी के दिन मैं रचना के घर ही खाना खाता था. परंतु उस रोज बात कुछ अलग थी. घर में दोनों बच्चे नहीं थे.

‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं रचना?’’

‘‘अरे विनयजी अब क्या आप को भी आने से पहले इजाजत लेनी पड़ेगी?’’

खाना खा कर दोनों टीवी देखने लगे. थोड़ी देर बाद मुझे लगा रचना कुछ असहज सी है.

‘‘क्या हुआ रचना, तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

‘‘कुछ नहीं, बस थोड़ा सिरदर्द है.’’

अपनी जगह से उठ कर मैं उस का सिर दबाने लगा. सिर दबातेदबाते मेरे हाथ उस के कंधे तक पहुंच गए. उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं. हम किसी और ही दुनिया में खोने लगे. थोड़ी देर बाद रचना ने मना करने के लिए मुंह खोला तो मैं ने आगे बढ़ कर उस के होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

उस के बाद रचना ने आंखें नहीं खोलीं. मैं धीरेधीरे उस के करीब आता चला गया. कहीं कोई संकोच नहीं था दोनों के बीच जैसे हमारे शरीर सालों से मिलना चाहते हों. दिल ने दिल की आवाज सुन ली थी, शरीर ने शरीर की भाषा पहचान ली थी.

उस के कानों के पास जा कर मैं धीरे से फुसफुसाया, ‘‘प्लीज, आंखें न खोलना तुम… आज बंद आंखों में मैं समाया हूं…’’

न जाने कितनी देर हम दोनों एकदूसरे की बांहों में बंधे चुपचाप लेटे रहे दोनों के बीच की खामोशी को मैं ने ही तोड़ा, ‘‘मुझ से नाराज तो नहीं हो तुम?’’

‘‘नहीं, परंतु अपनेआप से हूं… आप शादीशुदा हैं और…’’

‘‘रचना, शोभा से मेरी शादी महज एक समझौता है जो हमारे परिवारों के बीच हुआ था. बस उसे ही निभा रहा हूं… प्रेम क्या होता है यह मैं ने तुम से मिलने के बाद ही जाना.’’

‘‘परंतु… विवाह…’’

‘‘रचना… क्या 7 फेरे प्रेम को जन्म दे सकते हैं? 7 फेरों के बाद पतिपत्नी के बीच सैक्स का होना तो तय है, परंतु प्रेम का नहीं. क्या तुम्हें पछतावा हो रहा है रचना?’’

‘‘प्रेम शक्ति देता है, कमजोर नहीं करता. हां, वासना पछतावा उत्पन्न करती है. जिस पुरुष से मैं ने विवाह किया, उसे केवल अपना शरीर दिया. परंतु मेरे दिल तक तो वह कभी पहुंच ही नहीं पाया. फिर जितने भी पुरुष मिले उन की गंदी नजरों ने उन्हें मेरे दिल तक आने ही नहीं दिया. परंतु आप ने मुझे एक शरीर से ज्यादा एक इनसान समझा. इसीलिए वह पुराना संस्कार, जिसे अपने खून में पाला था कि विवाहेतर संबंध नहीं बनाना, आज टूट गया. शायद आज मैं समाज के अनुसार चरित्रहीन हो गई.’’

फिर कई दिन बीत गए, हम दोनों के संबंध और प्रगाढ़ होते जा रहे थे. मौका मिलते ही हम काफी समय साथ बिताते. एकसाथ घूमनाफिरना, शौपिंग करना, फिल्म देखना और फिर घर आ कर अखिल और निखिल के सोने के बाद एकदूसरे की बांहों में खो जाना दिनचर्या में शामिल हो गया था. औफिस में भी दोनों के बीच आंखों ही आंखों में प्रेम की बातें होती रहती थीं.

बीचबीच में मैं अपने घर आ जाता और शोभा के लिए और दोनों बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार भी ले जाता. राशि का भी जन्म हो चुका था. देखते ही देखते 2 साल बीत गए. अब शोभा मुझ पर तबादला करवा लेने का दबाव डालने लगी थी. इधर रचना भी हमारे रिश्ते का नाम तलाशने लगी थी. मैं अब इन दोनों औरतों को नहीं संभाल पा रहा था. 2 नावों की सवारी में डूबने का खतरा लगातार बना रहता है. अब समय आ गया था किसी एक नाव में उतर जाने का.

रचना से मुझे वह मिला जो मुझे शोभा से कभी नहीं मिल पाया था, परंतु यह भी सत्य था कि जो मुझे शोभा के साथ रहने में मिलता वह मुझे रचना के साथ कभी नहीं मिल पाता और वह था मेरे बच्चे और सामाजिक सम्मान. यह सब कुछ सोच कर मैं ने तबादले के लिए आवेदन कर दिया.

‘‘तुम दिल्ली जा रहे हो?’’

रचना को पता चल गया था, हालांकि मैं ने पूरी कोशिश की थी उस से यह बात छिपाने की. बोला, ‘‘हां. वह जाना तो था ही…’’

‘‘और मुझे बताने की जरूरत भी नहीं समझी…’’

‘‘देखो रचना मैं इस रिश्ते को खत्म करना चाहता हूं.’’

‘‘पर तुम तो कहते थे कि तुम मुझ से प्रेम करते हो?’’

‘‘हां करता था, परंतु अब…’’

‘‘अब नहीं करते?’’

‘‘तब मैं होश में नहीं था, अब हूं.’’

‘‘तुम कहते थे शोभा मान जाएगी… तुम मुझ से भी शादी करोगे… अब क्या हो गया?’’

‘‘तुम पागल हो गई हो क्या? एक पत्नी के रहते क्या मैं दूसरी शादी कर सकता हूं?’’

‘‘मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी? क्या जो हमारे बीच था वह महज.’’

‘‘रचना… देखो मैं ने तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती नहीं की, जो भी हुआ उस में तुम्हारी भी मरजी शामिल थी.’’

‘‘तुम मुझे छोड़ने का निर्णय ले रहे हो… ठीक है मैं समझ सकती हूं… तुम्हारी पत्नी है, बच्चे हैं. दुख मुझे इस बात का है कि तुम ने मुझे एक बार भी बताना जरूरी नहीं समझा. अगर मुझे पता नहीं चलता तो तुम शायद मुझे बिना बताए ही चले जाते. क्या मेरे प्रेम को इतने सम्मान की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी?’’

‘‘तुम्हें मुझ से किसी तरह की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी.’’

‘‘मतलब तुम ने मेरा इस्तेमाल किया और अब मन भर जाने पर मुझे…’’

‘‘हां किया जाओ क्या कर लोगी… मैं ने मजा किया तो क्या तुम ने नहीं किया? पूरी कीमत चुकाई है मैं ने. बताऊं तुम्हें कितना खर्चा किया है मैं ने तुम्हारे ऊपर?’’

कितना नीचे गिर गया था मैं… कैसे बोल गया था मैं वह सब. यह मैं भी जानता था कि रचना ने कभी खुद पर या अपने बच्चों पर ज्यादा खर्च नहीं करने दिया था. उस के अकेलेपन को भरने का दिखावा करतेकरते मैं ने उसी का फायदा उठा लिया था.

‘‘मैं तुम्हें बताऊंगी कि मैं क्या कर सकती हूं… आज जो तुम ने मेरे साथ किया है वह किसी और लड़की के साथ न करो, इस के लिए तुम्हें सजा मिलनी जरूरी है… तुम जैसा इनसान कभी नहीं सुधरेगा… मुझे शर्म आ रही है कि मैं ने तुम से प्यार किया.’’

उस के बाद रचना ने मुझ पर रेप का केस कर दिया. केस की बात सुनते ही शोभा और मेरी ससुराल वाले और परिवार वाले सभी मुजफ्फर नगर आ गए. मैं ने रोरो कर शोभा से माफी मांगी.

‘‘अगर मैं किसी और पुरुष के साथ संबंध बना कर तुम से माफी की उम्मीद करती तो क्या तुम मुझे माफ कर देते विनय?’’

मैं एकदम चुप रहा. क्या जवाब देता.

‘‘चुप क्यों हो बोलो?’’

‘‘शायद नहीं.’’

‘‘शायद… हा… हा… हा… यकीनन तुम मुझे माफ नहीं करते. पुरुष जब बेवफाई करता है तो समाज स्त्री से उसे माफ कर आगे बढ़ने की उम्मीद करता है. परंतु जब यही गलती एक स्त्री से होती है, तो समाज उसे कईर् नाम दे डालता है. जिस स्त्री से मुझे नफरत होनी चाहिए थी. मुझे उस पर दया भी आ रही थी और गर्व भी हो रहा था, क्योंकि इस पुरुष दंभी समाज को चुनौती देने की कोशिश उस ने की थी.’’

‘‘तो तुम मुझे माफ नहीं…’’

‘‘मैं उस के जैसी साहसी नहीं हूं… लेकिन एक बात याद रखना तुम्हें माफ एक मां कर रही है एक पत्नी और एक स्त्री के अपराधी तुम हमेशा रहोगे.’’

शर्म से गरदन झुक गई थी मेरी.

पूरा महल्ला रचना पर थूथू कर रहा था. वैसे भी हमारा समाज कमजोर को हमेशा दबाता रहा है… फिर एक अकेली, जवान विधवा के चरित्र पर उंगली उठाना बहुत आसान था. उन सभी लोगों ने रचना के खिलाफ गवाही दी जिन के प्रस्ताव को उस ने कभी न कभी ठुकराया था.

अदालतमें रचना केस हार गई थी. जज ने उस पर मुझे बदनाम करने का इलजाम लगाया. अपने शरीर को स्वयं परपुरुष को सौंपने वाली स्त्री सही कैसे हो सकती थी और वह भी तब जब वह गरीब हो?

रचना के पास न शक्ति बची थी और न पैसे, जो वह केस हाई कोर्ट ले जाती. उस शहर में भी उस का कुछ नहीं बचा था. अपने बेटों को ले कर वह शहर छोड़ कर चली गई. जिस दिन वह जा रही थी मुझ से मिलने आई थी.

‘‘आज जो भी मेरे साथ हुआ है वह एक मृगतृष्णा के पीछे भागने की सजा है. मुझे तो मेरी मूर्खता की सजा मिल गई है और मैं जा रही हूं, परंतु तुम से एक ही प्रार्थना है कि अपने इस फरेब की विरासत अपने बच्चों में मत बांटना.’’

चली गई थी वह. मैं भी अपने परिवार के साथ दिल्ली आ गया था. मेरे और शोभा के बीच जो खालीपन आया था वह कभी नहीं भर पाया. सही कहा था उस ने एक पत्नी ने मुझे कभी माफ नहीं किया था. मैं भी कहां स्वयं को माफ कर पाया और न ही भुला पाया था रचना को.

किसी भी रिश्ते में मैं वफादारी नहीं निभा पाया था. और आज मेरा अतीत मेरे सामने खड़ा हो कर मुझ पर हंस रहा था. जो मैं ने आज से कई साल पहले एक स्त्री के साथ किया था वही मेरी बेटी के साथ होने जा रहा था.

नहीं मैं राशि के साथ ऐसा नहीं होने दूंगा. उस से बात करूंगा, उसे समझाऊंगा. वह मेरी बेटी है समझ जाएगी. नहीं मानी तो उस रमन से मिलूंगा, उस के परिवार से मिलूंगा, परंतु मुझे पूरा यकीन था ऐसी नौबत नहीं आएगी… राशि समझदार है मेरी बात समझ जाएगी.

उस के कमरे के पास पहुंचा ही था तो देखा वह अपने किसी दोस्त से वीडियो चैट कर रही थी. उन की बातों में रमन का जिक्र सुन कर मैं वहीं ठिठक गया.

‘‘तेरे और रमन सर के बीच क्या चल रहा है?’’

‘‘वही जो इस उम्र में चलता है… हा… हा… हा…’’

‘‘तुझे शायद पता नहीं कि वे शादीशुदा हैं?’’

‘‘पता है.’’

‘‘फिर भी…’’

‘‘राशि, देख यार जो इनसान अपनी पत्नी के साथ वफादार नहीं है वह तेरे साथ क्या होगा? क्या पता कल तुझे छोड़ कर…’’

‘‘ही… ही… मुझे लड़के नहीं, मैं लड़कों को छोड़ती हूं.’’

‘‘तू समझ नहीं रही…’’

‘‘यार अब वह मुरगा खुद कटने को तैयार बैठा है तो फिर मेरी क्या गलती? उसे लगता है कि मैं उस के प्यार में डूब गई हूं, परंतु उसे यह नहीं पता कि वह सिर्फ मेरे लिए एक सीढ़ी है, जिस का इस्तेमाल कर के मुझे आगे बढ़ना है. जिस दिन उस ने मेरे और मेरे सपने के बीच आने की सोची उसी दिन उस पर रेप का केस ठोक दूंगी और तुझे तो पता है ऐसे केसेज में कोर्ट भी लड़की के पक्ष में फैसला सुनाता है,’’ और फिर हंसी का सम्मिलित स्वर सुनाई दिया.

सीने में तेज दर्द के साथ मैं वहीं गिर पड़ा. मेरे कानों में रचना की आवाज गूंज रही थी कि अपने फरेब की विरासत अपने बच्चों में मत बांटना… अपने फरेब की विरासत अपने बच्चों में मत बांटना, परंतु विरासत तो बंट चुकी थी.

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कई दिनों से एक बात मन में बारबार उठ रही है कि इनसान को शायद अपने कर्मों का फल इस जीवन में ही भोगना पड़ता है. यह बात नहीं है कि मैं टैलीविजन में आने वाले क्राइम और भक्तिप्रधान कार्यक्रमों से प्रभावित हो गया हूं. यह भी नहीं है कि धर्मग्रंथों का पाठ करने लगा हूं, न ही किसी बाबा का भक्त बना हूं. यह भी नहीं कि पश्चात्ताप की महत्ता नए सिरे में समझ आ गई हो.

दरअसल, बात यह है कि इन दिनों मेरी सुपुत्री राशि का मेलजोल अपने सहकर्मी रमन के साथ काफी बढ़ गया है. मेरी चिंता का विषय रमन का शादीशुदा होना है. राशि एक निजी बैंक में मैनेजर के पद पर कार्यरत है. रमन सीनियर मैनेजर है. मेरी बेटी अपने काम में काफी होशियार है. परंतु रमन के साथ उस की नजदीकी मेरी घबराहट को डर में बदल रही थी. मेरी पत्नी शोभा बेटे के पास न्यू जर्सी गई थी. अब वहां फोन कर के दोनों को क्या बताता. स्थिति का सामना मुझे स्वयं ही करना था. आज मेरा अतीत मुझे अपने सामने खड़ा दिखाई दे रहा था…

मेरा मुजफ्फर नगर में नया नया तबादला हुआ था. परिवार दिल्ली में ही छोड़ दिया था.  वैसे भी शोभा उस समय गर्भवती थी. वरुण भी बहुत छोटा था और शोभा का अपना परिवार भी वहीं था. इसलिए मैं ने उन को यहां लाना उचित नहीं समझा था. वैसे भी 2 साल बाद मुझे दोबारा पोस्टिंग मिल ही जानी थी.

गांधी कालोनी में एक घर किराए पर ले लिया था मैं ने. वहां से मेरा बैंक भी पास पड़ता था. पड़ोस में भी एक नया परिवार आया था. एक औरत और तीसरी या चौथी में पढ़ने वाले 2 जुड़वां लड़के. मेरे बैंक में काम करने वाले रमेश बाबू उसी महल्ले में रहते थे. उन से ही पता चला था कि वह औरत विधवा है. हमारे बैंक में ही उस के पति काम करते थे. कुछ साल पहले बीमारी की वजह से उन का देहांत हो गया था. उन्हीं की जगह उस औरत को नौकरी मिली थी. पहले अपनी ससुराल में रहती थी, परंतु पिछले महीने ही उन के तानों से तंग आ कर यहां रहने आई थी.

‘‘बच कर रहना विनयजी, बड़ी चालू औरत है. हाथ भी नहीं रखने देती,’’ जातेजाते रमेश बाबू यह बताना नहीं भूले थे. शायद उन की कोशिश का परिणाम अच्छा नहीं रहा होगा. इसीलिए मुझे सावधान करना उन्होंने अपना परम कर्तव्य समझा.

सौजन्य हमें विरासत में मिला है और पड़ोसियों के प्रति स्नेह और सहयोग की भावना हमारी अपनी कमाई है. इन तीनों गुणों का हम पुरुषवर्ग पूरी ईमानदारी से जतन तब और भी करते हैं जब पड़ोस में एक सुंदर स्त्री रहती हो. इसलिए पहला मौका मिलते ही मैं ने उसे अपने सौजन्य से अभिभूत कर दिया.

औफिस से लौट कर मैं ने देखा वह सीढि़यों पर बैठ हुई थी.

‘‘आप यहां क्यों बैठी हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी… सर… मेरी चाभी कहीं गिर कई है, बच्चे आने वाले हैं… समझ नहीं आ रहा क्या करूं?’’

‘‘आप परेशान न हों, आओ मेरे घर में आ जाओ.’’

‘‘जी…?’’

‘‘मेरा मतलब है आप अंदर चल कर बैठिए. तब तक मैं चाभी बनाने वाले को ले कर आता हूं.’’

‘‘जी, मैं यहीं इंतजार कर लूंगी.’’

‘‘जैसी आप की मरजी.’’

थोड़ी देर बाद रचनाजी के घर की चाभी बन गई और मैं उन के घर में बैठ कर चाय पी रहा था. आधे घंटे बाद उन के बच्चे भी आ गए. दोनों मेरे बेटे वरुण की ही उम्र के थे. पल भर में ही मैं ने उन का दिल जीत लिया.

जितना समय मैं ने शायद अपने बेटे को नहीं दिया था उस से कहीं ज्यादा मैं अखिल और निखिल को देने लगा था. उन के साथ क्रिकेट खेलना, पढ़ाई में उन की सहायता करना,

रविवार को उन्हें ले कर मंडी की चाट खाने का तो जैसे नियम बन गया था. रचनाजी अब रचना हो गई थीं. अब किसी भी फैसले में रचना के लिए मेरी अनुमति महत्त्वपूर्ण हो गई थी. इसीलिए मेरे समझाने पर उस ने अपने दोनों बेटों को स्कूल के बाकी बच्चों के साथ पिकनिक पर भेज दिया था.

सरकारी बैंक में काम हो न हो हड़ताल तो होती ही रहती है. हमारे बैंक में भी 2 दिन की हड़ताल थी, इसलिए उस दिन मैं घर पर ही था. अमूमन छुट्टी के दिन मैं रचना के घर ही खाना खाता था. परंतु उस रोज बात कुछ अलग थी. घर में दोनों बच्चे नहीं थे.

‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं रचना?’’

‘‘अरे विनयजी अब क्या आप को भी आने से पहले इजाजत लेनी पड़ेगी?’’

खाना खा कर दोनों टीवी देखने लगे. थोड़ी देर बाद मुझे लगा रचना कुछ असहज सी है.

‘‘क्या हुआ रचना, तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

‘‘कुछ नहीं, बस थोड़ा सिरदर्द है.’’

अपनी जगह से उठ कर मैं उस का सिर दबाने लगा. सिर दबातेदबाते मेरे हाथ उस के कंधे तक पहुंच गए. उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं. हम किसी और ही दुनिया में खोने लगे. थोड़ी देर बाद रचना ने मना करने के लिए मुंह खोला तो मैं ने आगे बढ़ कर उस के होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

उस के बाद रचना ने आंखें नहीं खोलीं. मैं धीरेधीरे उस के करीब आता चला गया. कहीं कोई संकोच नहीं था दोनों के बीच जैसे हमारे शरीर सालों से मिलना चाहते हों. दिल ने दिल की आवाज सुन ली थी, शरीर ने शरीर की भाषा पहचान ली थी.

उस के कानों के पास जा कर मैं धीरे से फुसफुसाया, ‘‘प्लीज, आंखें न खोलना तुम… आज बंद आंखों में मैं समाया हूं…’’

न जाने कितनी देर हम दोनों एकदूसरे की बांहों में बंधे चुपचाप लेटे रहे दोनों के बीच की खामोशी को मैं ने ही तोड़ा, ‘‘मुझ से नाराज तो नहीं हो तुम?’’

‘‘नहीं, परंतु अपनेआप से हूं… आप शादीशुदा हैं और…’’

‘‘रचना, शोभा से मेरी शादी महज एक समझौता है जो हमारे परिवारों के बीच हुआ था. बस उसे ही निभा रहा हूं… प्रेम क्या होता है यह मैं ने तुम से मिलने के बाद ही जाना.’’

‘‘परंतु… विवाह…’’

‘‘रचना… क्या 7 फेरे प्रेम को जन्म दे सकते हैं? 7 फेरों के बाद पतिपत्नी के बीच सैक्स का होना तो तय है, परंतु प्रेम का नहीं. क्या तुम्हें पछतावा हो रहा है रचना?’’

‘‘प्रेम शक्ति देता है, कमजोर नहीं करता. हां, वासना पछतावा उत्पन्न करती है. जिस पुरुष से मैं ने विवाह किया, उसे केवल अपना शरीर दिया. परंतु मेरे दिल तक तो वह कभी पहुंच ही नहीं पाया. फिर जितने भी पुरुष मिले उन की गंदी नजरों ने उन्हें मेरे दिल तक आने ही नहीं दिया. परंतु आप ने मुझे एक शरीर से ज्यादा एक इनसान समझा. इसीलिए वह पुराना संस्कार, जिसे अपने खून में पाला था कि विवाहेतर संबंध नहीं बनाना, आज टूट गया. शायद आज मैं समाज के अनुसार चरित्रहीन हो गई.’’

फिर कई दिन बीत गए, हम दोनों के संबंध और प्रगाढ़ होते जा रहे थे. मौका मिलते ही हम काफी समय साथ बिताते. एकसाथ घूमनाफिरना, शौपिंग करना, फिल्म देखना और फिर घर आ कर अखिल और निखिल के सोने के बाद एकदूसरे की बांहों में खो जाना दिनचर्या में शामिल हो गया था. औफिस में भी दोनों के बीच आंखों ही आंखों में प्रेम की बातें होती रहती थीं.

बीचबीच में मैं अपने घर आ जाता और शोभा के लिए और दोनों बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार भी ले जाता. राशि का भी जन्म हो चुका था. देखते ही देखते 2 साल बीत गए. अब शोभा मुझ पर तबादला करवा लेने का दबाव डालने लगी थी. इधर रचना भी हमारे रिश्ते का नाम तलाशने लगी थी. मैं अब इन दोनों औरतों को नहीं संभाल पा रहा था. 2 नावों की सवारी में डूबने का खतरा लगातार बना रहता है. अब समय आ गया था किसी एक नाव में उतर जाने का.

रचना से मुझे वह मिला जो मुझे शोभा से कभी नहीं मिल पाया था, परंतु यह भी सत्य था कि जो मुझे शोभा के साथ रहने में मिलता वह मुझे रचना के साथ कभी नहीं मिल पाता और वह था मेरे बच्चे और सामाजिक सम्मान. यह सब कुछ सोच कर मैं ने तबादले के लिए आवेदन कर दिया.

‘‘तुम दिल्ली जा रहे हो?’’

रचना को पता चल गया था, हालांकि मैं ने पूरी कोशिश की थी उस से यह बात छिपाने की. बोला, ‘‘हां. वह जाना तो था ही…’’

‘‘और मुझे बताने की जरूरत भी नहीं समझी…’’

‘‘देखो रचना मैं इस रिश्ते को खत्म करना चाहता हूं.’’

‘‘पर तुम तो कहते थे कि तुम मुझ से प्रेम करते हो?’’

‘‘हां करता था, परंतु अब…’’

‘‘अब नहीं करते?’’

‘‘तब मैं होश में नहीं था, अब हूं.’’

‘‘तुम कहते थे शोभा मान जाएगी… तुम मुझ से भी शादी करोगे… अब क्या हो गया?’’

‘‘तुम पागल हो गई हो क्या? एक पत्नी के रहते क्या मैं दूसरी शादी कर सकता हूं?’’

‘‘मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी? क्या जो हमारे बीच था वह महज.’’

‘‘रचना… देखो मैं ने तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती नहीं की, जो भी हुआ उस में तुम्हारी भी मरजी शामिल थी.’’

‘‘तुम मुझे छोड़ने का निर्णय ले रहे हो… ठीक है मैं समझ सकती हूं… तुम्हारी पत्नी है, बच्चे हैं. दुख मुझे इस बात का है कि तुम ने मुझे एक बार भी बताना जरूरी नहीं समझा. अगर मुझे पता नहीं चलता तो तुम शायद मुझे बिना बताए ही चले जाते. क्या मेरे प्रेम को इतने सम्मान की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी?’’

‘‘तुम्हें मुझ से किसी तरह की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी.’’

‘‘मतलब तुम ने मेरा इस्तेमाल किया और अब मन भर जाने पर मुझे…’’

‘‘हां किया जाओ क्या कर लोगी… मैं ने मजा किया तो क्या तुम ने नहीं किया? पूरी कीमत चुकाई है मैं ने. बताऊं तुम्हें कितना खर्चा किया है मैं ने तुम्हारे ऊपर?’’

कितना नीचे गिर गया था मैं… कैसे बोल गया था मैं वह सब. यह मैं भी जानता था कि रचना ने कभी खुद पर या अपने बच्चों पर ज्यादा खर्च नहीं करने दिया था. उस के अकेलेपन को भरने का दिखावा करतेकरते मैं ने उसी का फायदा उठा लिया था.

‘‘मैं तुम्हें बताऊंगी कि मैं क्या कर सकती हूं… आज जो तुम ने मेरे साथ किया है वह किसी और लड़की के साथ न करो, इस के लिए तुम्हें सजा मिलनी जरूरी है… तुम जैसा इनसान कभी नहीं सुधरेगा… मुझे शर्म आ रही है कि मैं ने तुम से प्यार किया.’’

उस के बाद रचना ने मुझ पर रेप का केस कर दिया. केस की बात सुनते ही शोभा और मेरी ससुराल वाले और परिवार वाले सभी मुजफ्फर नगर आ गए. मैं ने रोरो कर शोभा से माफी मांगी.

‘‘अगर मैं किसी और पुरुष के साथ संबंध बना कर तुम से माफी की उम्मीद करती तो क्या तुम मुझे माफ कर देते विनय?’’

मैं एकदम चुप रहा. क्या जवाब देता.

‘‘चुप क्यों हो बोलो?’’

‘‘शायद नहीं.’’

‘‘शायद… हा… हा… हा… यकीनन तुम मुझे माफ नहीं करते. पुरुष जब बेवफाई करता है तो समाज स्त्री से उसे माफ कर आगे बढ़ने की उम्मीद करता है. परंतु जब यही गलती एक स्त्री से होती है, तो समाज उसे कईर् नाम दे डालता है. जिस स्त्री से मुझे नफरत होनी चाहिए थी. मुझे उस पर दया भी आ रही थी और गर्व भी हो रहा था, क्योंकि इस पुरुष दंभी समाज को चुनौती देने की कोशिश उस ने की थी.’’

‘‘तो तुम मुझे माफ नहीं…’’

‘‘मैं उस के जैसी साहसी नहीं हूं… लेकिन एक बात याद रखना तुम्हें माफ एक मां कर रही है एक पत्नी और एक स्त्री के अपराधी तुम हमेशा रहोगे.’’

शर्म से गरदन झुक गई थी मेरी.

पूरा महल्ला रचना पर थूथू कर रहा था. वैसे भी हमारा समाज कमजोर को हमेशा दबाता रहा है… फिर एक अकेली, जवान विधवा के चरित्र पर उंगली उठाना बहुत आसान था. उन सभी लोगों ने रचना के खिलाफ गवाही दी जिन के प्रस्ताव को उस ने कभी न कभी ठुकराया था.

अदालतमें रचना केस हार गई थी. जज ने उस पर मुझे बदनाम करने का इलजाम लगाया. अपने शरीर को स्वयं परपुरुष को सौंपने वाली स्त्री सही कैसे हो सकती थी और वह भी तब जब वह गरीब हो?

रचना के पास न शक्ति बची थी और न पैसे, जो वह केस हाई कोर्ट ले जाती. उस शहर में भी उस का कुछ नहीं बचा था. अपने बेटों को ले कर वह शहर छोड़ कर चली गई. जिस दिन वह जा रही थी मुझ से मिलने आई थी.

‘‘आज जो भी मेरे साथ हुआ है वह एक मृगतृष्णा के पीछे भागने की सजा है. मुझे तो मेरी मूर्खता की सजा मिल गई है और मैं जा रही हूं, परंतु तुम से एक ही प्रार्थना है कि अपने इस फरेब की विरासत अपने बच्चों में मत बांटना.’’

चली गई थी वह. मैं भी अपने परिवार के साथ दिल्ली आ गया था. मेरे और शोभा के बीच जो खालीपन आया था वह कभी नहीं भर पाया. सही कहा था उस ने एक पत्नी ने मुझे कभी माफ नहीं किया था. मैं भी कहां स्वयं को माफ कर पाया और न ही भुला पाया था रचना को.

किसी भी रिश्ते में मैं वफादारी नहीं निभा पाया था. और आज मेरा अतीत मेरे सामने खड़ा हो कर मुझ पर हंस रहा था. जो मैं ने आज से कई साल पहले एक स्त्री के साथ किया था वही मेरी बेटी के साथ होने जा रहा था.

नहीं मैं राशि के साथ ऐसा नहीं होने दूंगा. उस से बात करूंगा, उसे समझाऊंगा. वह मेरी बेटी है समझ जाएगी. नहीं मानी तो उस रमन से मिलूंगा, उस के परिवार से मिलूंगा, परंतु मुझे पूरा यकीन था ऐसी नौबत नहीं आएगी… राशि समझदार है मेरी बात समझ जाएगी.

उस के कमरे के पास पहुंचा ही था तो देखा वह अपने किसी दोस्त से वीडियो चैट कर रही थी. उन की बातों में रमन का जिक्र सुन कर मैं वहीं ठिठक गया.

‘‘तेरे और रमन सर के बीच क्या चल रहा है?’’

‘‘वही जो इस उम्र में चलता है… हा… हा… हा…’’

‘‘तुझे शायद पता नहीं कि वे शादीशुदा हैं?’’

‘‘पता है.’’

‘‘फिर भी…’’

‘‘राशि, देख यार जो इनसान अपनी पत्नी के साथ वफादार नहीं है वह तेरे साथ क्या होगा? क्या पता कल तुझे छोड़ कर…’’

‘‘ही… ही… मुझे लड़के नहीं, मैं लड़कों को छोड़ती हूं.’’

‘‘तू समझ नहीं रही…’’

‘‘यार अब वह मुरगा खुद कटने को तैयार बैठा है तो फिर मेरी क्या गलती? उसे लगता है कि मैं उस के प्यार में डूब गई हूं, परंतु उसे यह नहीं पता कि वह सिर्फ मेरे लिए एक सीढ़ी है, जिस का इस्तेमाल कर के मुझे आगे बढ़ना है. जिस दिन उस ने मेरे और मेरे सपने के बीच आने की सोची उसी दिन उस पर रेप का केस ठोक दूंगी और तुझे तो पता है ऐसे केसेज में कोर्ट भी लड़की के पक्ष में फैसला सुनाता है,’’ और फिर हंसी का सम्मिलित स्वर सुनाई दिया.

सीने में तेज दर्द के साथ मैं वहीं गिर पड़ा. मेरे कानों में रचना की आवाज गूंज रही थी कि अपने फरेब की विरासत अपने बच्चों में मत बांटना… अपने फरेब की विरासत अपने बच्चों में मत बांटना, परंतु विरासत तो बंट चुकी थी.

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April 28, 2022 at 09:00AM

बिनब्याही मां: नीलम की रातों की नींद क्यों हराम हो गई

Writer- 

सर्दी की खिलीखिली सी दोपहर में जैसे ही स्कूल की छुट्टी की घंटी बजी, मैं और मेरी सहेली सुजाता रोज की तरह स्कूल से बाहर आ गए. स्कूल के गेट के बाहर छोटेछोटे दुकानदारों ने अपनी अस्थायी दुकानें सड़क के किनारे, ठेले पर और साइकिल के पीछे लगे कैरियर पर बंधे लकड़ी के डब्बों में सजा रखी थीं, जिन में बच्चों को आकर्षित करने के लिए तरहतरह की टौफियां, चाट, सस्ती गेंदें व खिलौने के अलावा पेनकौपी भी थीं.

मैं ने एक साइकिल वाले से अपना पसंदीदा खट्टामीठा चूरन लिया और सुजाता के साथ रेलवे लाइन की ओर बढ़ गई. सुजाता बारबार मेरी ओर बेचैनी से देख रही थी, लेकिन कुछ बोल नहीं रही थी. रेलवे लाइन पार करने के बाद आखिरकार उस से रहा नहीं गया और उस ने मुझ से पूछा, “नीलम, सुना है, आज तेरी विकास से लड़ाई हो गई थी?”

“हां, तो उस में कौन सी नई बात है. अकसर होती है, पर बाद में दोस्ती भी तो हो जाती है,” मैं ने लापरवाही से चूरन की पुड़िया से उंगली में चूरन ले कर चाटते हुए कहा.

“बात तो कुछ नहीं, लेकिन मुझे पता चला कि उस ने तेरे हाथ पर काट भी लिया था,” उस ने बहुत रहस्यात्मक ढंग से कहा, तो मैं ने उस की ओर सवालिया निगाह से देखा और फिर अपने हाथ को देखा, जहां उस ने काटा था, अब तो वहां कोई निशान भी नहीं दिख रहा था.

ये भी पढ़ें- स्पेनिश मौस: क्या गीता अपनी गृहस्थी बचा पाई?

“तो क्या हुआ? अब तो ठीक है सब. मैं ने भी उस के 2 बार काटा बदले में,” मैं ने शेखी बघारते हुए उसे बताया, जबकि मैं खुद डेढ़ पसली की थी. 10 साल की उम्र के हिसाब से मैं काफी दुबली थी, जबकि मेरी हमउम्र सहेलियां मुझ से बड़ी दिखती थीं.

मेरी सहेली ने बेचारगी से मेरी ओर देखा, “नीलम, लड़ाई तो होती है, पर विकास ने तुझे काटा, यह सही नहीं हुआ.”

“क्यों…?” अचानक मुझे लगा, शायद उसे मेरी चोट की चिंता हो रही है. आखिर मेरी पक्की सहेली जो थी वह.

“अरे बुद्धू, मुझे कुछ नहीं हुआ. देख, अब तो दिख तक नहीं रहा कि उस ने मुझे कहां पर काटा था,” हंसते हुए मैं ने अपना हाथ उस के सामने कर दिया.

सुजाता ने मेरा हाथ झटक दिया, “तुझे सच में नहीं पता क्या कुछ?”

मैं ने इनकार में सिर हिला दिया.

“तो सुन, मेरी बूआ ने बताया था कि अगर लड़का किसी लड़की को काट लेता है, तो उस के बच्चा हो जाता है. अब समझ आया कुछ,” सुजाता ने अपनी आंखें गोल करते हुए मुझ से कहा.

‘ हें… तू सच कह रही है क्या सुजाता?’ मेरी स्थिति तो सांप सूंघने जैसी हो गई. मैं अविश्वास से उसे देख रही थी, लेकिन उस ने दोबारा से वही बात कही. उस की बूआ ने उसे बताया है, तब तो यह बात सच ही होगी. बड़े लोग सब जानते हैं. मेरी आंखों में डर भर गया.

घर आ कर मैं बहुत बेचैन हो गई. मैं ने बस्ता एक तरफ रखा और कच्चे आंगन में पड़ी चारपाई पर बैठ गई.  ‘क्या करूं… मम्मी को बताऊं या नहीं. मेरी तो कोई गलती भी नहीं थी.’

मम्मीपापा मुझे और मेरे भाई को ज्यादा टीवी नहीं देखने देते थे, पर मैं ने कुछ फिल्में देखी थीं, जिन में से 1-2 में मैं ने देखा था कि बिनब्याही मां को कितना कुछ सहना पड़ता है. अड़ोसपड़ोस के लोग खूब ताने देते हैं.

मुझे बहुत डर लग रहा था कि पता चलने पर मम्मीपापा बहुत पिटाई करेंगे, कहीं घर से निकाल दिया तो मैं कहां जाऊंगी. किसी रिश्तेदार के घर गई तो वे भी कितने दिन रखेंगे और सच पता चलने पर धक्के मार कर मुझे निकाल देंगे.

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“अरे, कब से स्कूल से आ कर बैठी है, कपड़े बदल कर रोटी खा ले, मुझे पड़ोस में कीर्तन में जाना है,” मम्मी की आवाज सुन कर मैं बेमन से उठी और हैंडपंप के पास भरी रखी बालटी से पानी ले कर हाथपैर धो कर अंदर जा कर स्कूल ड्रैस बदल कर नीली फ्राक पहन ली.

खाना खा कर मैं वापस चारपाई पर लेट गई. शाम को सुजाता खेलने के लिए बुलाने आई, लेकिन मुझे उदास देख कर वह मेरे पास बैठ गई.

“अब क्या होगा नीलम? मम्मी को बताया तू ने?”

“नहीं, हिम्मत ही नहीं हुई,” इतनी देर से रुके मेरे आंसू गालों पर लुढ़कने लगे.

“पर, बताना तो पड़ेगा, वरना जब तेरा पेट बड़ा होने लगेगा तब तो उन्हें पता चल ही जाएगा, फिर…?” सुजाता के कहने पर मैं और भी परेशान हो गई.

रात में मैं ने शीशे में खुद को ध्यान से देखा कि कहीं मेरा पेट निकलने तो नहीं लगा, लेकिन अभी तक तो सब ठीक था.

अगले दिन स्कूल में बेचैनी से मैं विकास के आने का इंतजार करने लगी. आखिर उसी के कारण तो मैं इस परेशानी में थी.

सुजाता ने मुझे बहुत सहानुभूति से देखते हुए मेरा हाथ पकड़ रखा था. इस समय मुझे वह अपनी सब से बड़ी शुभचिंतक लग रही थी.

क्लास में विकास के आते ही उस ने मेरा हाथ दबाया और आंखों ही आंखों में मुझे उस से बात करने का इशारा करती हुई अपनी क्लास में चली गई.

मैं विकास से बात करने के लिए आगे बढ़ी, तभी उस का कोई दोस्त आ गया और उसके बाद टीचर आ गईं.

इंटरवल में विकास को मैं ने इशारे से स्कूल के गार्डन में उस जगह बुलाया, जहां थोड़ा सुनसान था.

विकास के आते ही मैं ने गुस्से में उसे एक झापड़ मारा और कहा, “तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी, मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं बची,” इतना कह कर मैं रोने लगी. वह भी पलट कर मुझे थप्पड़ मारने वाला था, पर मुझे रोते देख कर वह रुक गया और चिल्ला कर बोला, “क्या बकवास कर रही हो?”

मैं ने उसे सारी बात बता दी. यह सुन कर वह भी सोच में पड़ गया. बोला, “अरे यार, अभी तो मैं खुद बच्चा हूं. कुछ कमाता भी नहीं हूं. मेरे घर वाले भी मुझे बहुत मारेंगे, अगर यह सब उन को पता चला. पर सच में अगर मुझे यह पता होता तो मैं तुझे नहीं काटता.” उसे बहुत अफसोस हो रहा था.

“एक बात बता, तू ने उस किट से टैस्ट किया क्या प्रेगनेंसी का? ”

“कैसी किट…? और मैं इसे कहां से लाऊंगी?”

“अरे यार, टीवी में कितना तो विज्ञापन आता है. तुम ने देखा नहीं क्या…?” विकास झल्ला गया. बोला, “किसी भी मैडिकल शाप पर मिल जाएगी.”

“हां. और जैसे मैं ले ही आऊंगी… सुनो विकास, तुम्हारे कारण मैं इस मुसीबत में पड़ी हूं, अब तुम्हें ही यह सब करना होगा.”

“ठीक है, मेरे दोस्त का भाई एक मैडिकल की दुकान पर काम करता है. मैं उन से कह दूंगा लाने को.”

“इस का मतलब यह कि तुम अपने दोस्त को भी यह बताओगे. सब को पता चल जाएगा, कितनी बदनामी होगी,” कहते हुए मैं फिर से रोने लगी.

“अरे यार, तू न ये रोनाधोना मत कर. कुछ भी कह दूंगा. वैसे भी ऐसे समय में खुश रहना चाहिए.”

मेरे कुछ पूछने से पहले ही वह मुंह बना कर बोला, “ऐसा टीवी में और फिल्मों में कहते सुना है मैं ने.”

“सुनो न , तुम अपने घर वालों से बात करो,” देखी गई फिल्मों के आधार पर मुझे शादी ही एकमात्र उपाय लग रही थी. हालांकि विकास का चपटी नाक वाला चेहरा मुझे बिलकुल पसंद नहीं था और ऊपर से उसे जब देखो तब जुकाम हो जाता था, लेकिन अभी और कोई चारा नहीं था.

खैर, हम दोनों इंटरवल खत्म होने की घंटी बजने तक यही बात करते रहे कि घर में कैसे क्या कहेंगे. फिर यह तय हुआ कि पहले एक बार किट ले कर टैस्ट कर लेते हैं. यदि रिपोर्ट पौजिटिव आती है, तो विकास अपने घर वालों से बात कर के उन को मेरे घर बात करने भेजेगा.

क्लास में आ कर मैं ने कविता को भी यह सब बता दिया था. उसे भी यही उपाय सही लगा.

स्कूल की छुट्टी के बाद जब मैं और कविता घर जा रहे थे, तभी विकास ने पीछे से आवाज दे कर रोका. मैं ने मुड़ कर देखा, तो वह भागता हुआ आ रहा था.

“सुनो, यह इमली लाया था मैं तुम्हारे लिए, टीवी में देखा है…” कहते हुए वह जितना शरमा रहा था, उस से कहीं ज्यादा मैं जमीन में गढ़ी जा रही थी. कविता ने कुहनी मार कर कहा, “देख, कितना ध्यान रख रहा है तेरा. अब ये तुझ से कभी नहीं लड़ेगा.”

घर आ कर मैं ने कागज में लिपटी इमली को खाने की कोशिश की, पर मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं हुई. वैसे भी मुझे इमली की जगह चूरन ज्यादा पसंद था, ‘लेकिन, टीवी में तो देखा है…’

दोपहर तक मेरी कल्पना डर में बदल गई कि कहीं किट की रिपोर्ट पौजिटिव आई तो क्या होगा. घर वालों को विकास के मम्मीपापा के आने पर सब पता तो चल ही जाएगा. अगर वे शादी के लिए नहीं माने तब क्या होगा? मेरी आंखों के आगे एक फिल्म का दृश्य आ गया, जहां एक लड़की  परिवार की इज्जत बचाने के लिए खुद को खत्म कर लेती है.

“नहीं… नहीं, मैं मरना नहीं चाहती,” घबरा कर मैं ने अपने दोनों हाथ अपनी आंखों पर रख लिए.

“कुछ भी हो, कैसी भी बात हो, अपने मम्मीपापा से नहीं छिपाना. वे बड़े हैं… नाराज हो सकते हैं, पर तुम्हें उस मुश्किल से भी वही निकालेंगे,” अचानक मेरे दिमाग में टीचर की बताई बात आ गई, जब वे क्लास में हम सभी से बातें कर रही थीं. मैं ने हिम्मत जुटाई और आखिरकार मम्मी को सब बताने का फैसला कर लिया.

“दादी, आप मेरे साथ जरा अंदर चलो न मम्मी के पास,” दादी की चिरौरी करते हुए मैं ने कहा.

“का हुई गवा…? कोउन्हों बदमासी की हो क्या?” दादी के झुर्रीदार गाल उन की मुसकान से भर गए.

“आप चलो तो सही,” मैं दादी की लाठी पकड़ कर उन को जबरदस्ती अंदर कमरे में ले आई, ताकि मम्मी की मार से दादी बचा सकें.

“मम्मी, मुझे कुछ कहना है. आप बैठ जाओ पहले,” मेरे कहने पर मम्मी हाथ का काम छोड़ कर कुरसी पर बैठ गईं. दादी पहले ही तख्त पर बैठ चुकी थीं.

थूक गटक कर अटकतेअटकते आंखें झुका कर मैं ने उन से कहा, “मुझे माफ कर दीजिए, मैं…” और फिर मैं ने सिर झुकाएझुकाए उन से अपनी बात कहनी शुरू की. उन की आंखों की चुभन मैं महसूस कर रही थी.

मेरी बात खत्म होने के पहले ही मम्मी और दादी आशा के विपरीत जोरजोर से हंसने लगीं, “तुझे किस ने बताया कि काटने से बच्चा हो जाता है.”

“होता है मम्मी, सुजाता की बुआ ने उसे बताया था,” मैं ने दादीमम्मी की बुद्धि पर तरस खाते हुए कहा.

“ऐसा कुछ नहीं होता. मेरे भी 2 बच्चे यानी तेरे पापा और बूआ हैं और तेरी मम्मी की भी 3 बेटियां हैं.”

“काटने से नहीं होते तो कैसे होते हैं?” मैं समझ ही नहीं पा रही थी.

“बड़ी हो कर जान जाओगी. जाओ खेलो,” मम्मी ने हंसते हुए कहा, तो मेरी जान में जान आई. ‘यानी, सब ठीक है. कल बताऊंगी इस सुजाता की बच्ची को.’

मैं खुश थी कि अब विकास से मुझे शादी नहीं करनी पड़ेगी और मुझे यकीन था कि वह भी मुझ से शादी नहीं करना चाहता होगा.

‘पर काटने से बच्चे नहीं होते तो फिर…?’ सवाल अब भी अनुत्तरित था.

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Writer- 

सर्दी की खिलीखिली सी दोपहर में जैसे ही स्कूल की छुट्टी की घंटी बजी, मैं और मेरी सहेली सुजाता रोज की तरह स्कूल से बाहर आ गए. स्कूल के गेट के बाहर छोटेछोटे दुकानदारों ने अपनी अस्थायी दुकानें सड़क के किनारे, ठेले पर और साइकिल के पीछे लगे कैरियर पर बंधे लकड़ी के डब्बों में सजा रखी थीं, जिन में बच्चों को आकर्षित करने के लिए तरहतरह की टौफियां, चाट, सस्ती गेंदें व खिलौने के अलावा पेनकौपी भी थीं.

मैं ने एक साइकिल वाले से अपना पसंदीदा खट्टामीठा चूरन लिया और सुजाता के साथ रेलवे लाइन की ओर बढ़ गई. सुजाता बारबार मेरी ओर बेचैनी से देख रही थी, लेकिन कुछ बोल नहीं रही थी. रेलवे लाइन पार करने के बाद आखिरकार उस से रहा नहीं गया और उस ने मुझ से पूछा, “नीलम, सुना है, आज तेरी विकास से लड़ाई हो गई थी?”

“हां, तो उस में कौन सी नई बात है. अकसर होती है, पर बाद में दोस्ती भी तो हो जाती है,” मैं ने लापरवाही से चूरन की पुड़िया से उंगली में चूरन ले कर चाटते हुए कहा.

“बात तो कुछ नहीं, लेकिन मुझे पता चला कि उस ने तेरे हाथ पर काट भी लिया था,” उस ने बहुत रहस्यात्मक ढंग से कहा, तो मैं ने उस की ओर सवालिया निगाह से देखा और फिर अपने हाथ को देखा, जहां उस ने काटा था, अब तो वहां कोई निशान भी नहीं दिख रहा था.

ये भी पढ़ें- स्पेनिश मौस: क्या गीता अपनी गृहस्थी बचा पाई?

“तो क्या हुआ? अब तो ठीक है सब. मैं ने भी उस के 2 बार काटा बदले में,” मैं ने शेखी बघारते हुए उसे बताया, जबकि मैं खुद डेढ़ पसली की थी. 10 साल की उम्र के हिसाब से मैं काफी दुबली थी, जबकि मेरी हमउम्र सहेलियां मुझ से बड़ी दिखती थीं.

मेरी सहेली ने बेचारगी से मेरी ओर देखा, “नीलम, लड़ाई तो होती है, पर विकास ने तुझे काटा, यह सही नहीं हुआ.”

“क्यों…?” अचानक मुझे लगा, शायद उसे मेरी चोट की चिंता हो रही है. आखिर मेरी पक्की सहेली जो थी वह.

“अरे बुद्धू, मुझे कुछ नहीं हुआ. देख, अब तो दिख तक नहीं रहा कि उस ने मुझे कहां पर काटा था,” हंसते हुए मैं ने अपना हाथ उस के सामने कर दिया.

सुजाता ने मेरा हाथ झटक दिया, “तुझे सच में नहीं पता क्या कुछ?”

मैं ने इनकार में सिर हिला दिया.

“तो सुन, मेरी बूआ ने बताया था कि अगर लड़का किसी लड़की को काट लेता है, तो उस के बच्चा हो जाता है. अब समझ आया कुछ,” सुजाता ने अपनी आंखें गोल करते हुए मुझ से कहा.

‘ हें… तू सच कह रही है क्या सुजाता?’ मेरी स्थिति तो सांप सूंघने जैसी हो गई. मैं अविश्वास से उसे देख रही थी, लेकिन उस ने दोबारा से वही बात कही. उस की बूआ ने उसे बताया है, तब तो यह बात सच ही होगी. बड़े लोग सब जानते हैं. मेरी आंखों में डर भर गया.

घर आ कर मैं बहुत बेचैन हो गई. मैं ने बस्ता एक तरफ रखा और कच्चे आंगन में पड़ी चारपाई पर बैठ गई.  ‘क्या करूं… मम्मी को बताऊं या नहीं. मेरी तो कोई गलती भी नहीं थी.’

मम्मीपापा मुझे और मेरे भाई को ज्यादा टीवी नहीं देखने देते थे, पर मैं ने कुछ फिल्में देखी थीं, जिन में से 1-2 में मैं ने देखा था कि बिनब्याही मां को कितना कुछ सहना पड़ता है. अड़ोसपड़ोस के लोग खूब ताने देते हैं.

मुझे बहुत डर लग रहा था कि पता चलने पर मम्मीपापा बहुत पिटाई करेंगे, कहीं घर से निकाल दिया तो मैं कहां जाऊंगी. किसी रिश्तेदार के घर गई तो वे भी कितने दिन रखेंगे और सच पता चलने पर धक्के मार कर मुझे निकाल देंगे.

ये भी पढ़ें- सुधरा संबंध: निलेश और उस की पत्नी क्यों अलग हो गए?

“अरे, कब से स्कूल से आ कर बैठी है, कपड़े बदल कर रोटी खा ले, मुझे पड़ोस में कीर्तन में जाना है,” मम्मी की आवाज सुन कर मैं बेमन से उठी और हैंडपंप के पास भरी रखी बालटी से पानी ले कर हाथपैर धो कर अंदर जा कर स्कूल ड्रैस बदल कर नीली फ्राक पहन ली.

खाना खा कर मैं वापस चारपाई पर लेट गई. शाम को सुजाता खेलने के लिए बुलाने आई, लेकिन मुझे उदास देख कर वह मेरे पास बैठ गई.

“अब क्या होगा नीलम? मम्मी को बताया तू ने?”

“नहीं, हिम्मत ही नहीं हुई,” इतनी देर से रुके मेरे आंसू गालों पर लुढ़कने लगे.

“पर, बताना तो पड़ेगा, वरना जब तेरा पेट बड़ा होने लगेगा तब तो उन्हें पता चल ही जाएगा, फिर…?” सुजाता के कहने पर मैं और भी परेशान हो गई.

रात में मैं ने शीशे में खुद को ध्यान से देखा कि कहीं मेरा पेट निकलने तो नहीं लगा, लेकिन अभी तक तो सब ठीक था.

अगले दिन स्कूल में बेचैनी से मैं विकास के आने का इंतजार करने लगी. आखिर उसी के कारण तो मैं इस परेशानी में थी.

सुजाता ने मुझे बहुत सहानुभूति से देखते हुए मेरा हाथ पकड़ रखा था. इस समय मुझे वह अपनी सब से बड़ी शुभचिंतक लग रही थी.

क्लास में विकास के आते ही उस ने मेरा हाथ दबाया और आंखों ही आंखों में मुझे उस से बात करने का इशारा करती हुई अपनी क्लास में चली गई.

मैं विकास से बात करने के लिए आगे बढ़ी, तभी उस का कोई दोस्त आ गया और उसके बाद टीचर आ गईं.

इंटरवल में विकास को मैं ने इशारे से स्कूल के गार्डन में उस जगह बुलाया, जहां थोड़ा सुनसान था.

विकास के आते ही मैं ने गुस्से में उसे एक झापड़ मारा और कहा, “तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी, मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं बची,” इतना कह कर मैं रोने लगी. वह भी पलट कर मुझे थप्पड़ मारने वाला था, पर मुझे रोते देख कर वह रुक गया और चिल्ला कर बोला, “क्या बकवास कर रही हो?”

मैं ने उसे सारी बात बता दी. यह सुन कर वह भी सोच में पड़ गया. बोला, “अरे यार, अभी तो मैं खुद बच्चा हूं. कुछ कमाता भी नहीं हूं. मेरे घर वाले भी मुझे बहुत मारेंगे, अगर यह सब उन को पता चला. पर सच में अगर मुझे यह पता होता तो मैं तुझे नहीं काटता.” उसे बहुत अफसोस हो रहा था.

“एक बात बता, तू ने उस किट से टैस्ट किया क्या प्रेगनेंसी का? ”

“कैसी किट…? और मैं इसे कहां से लाऊंगी?”

“अरे यार, टीवी में कितना तो विज्ञापन आता है. तुम ने देखा नहीं क्या…?” विकास झल्ला गया. बोला, “किसी भी मैडिकल शाप पर मिल जाएगी.”

“हां. और जैसे मैं ले ही आऊंगी… सुनो विकास, तुम्हारे कारण मैं इस मुसीबत में पड़ी हूं, अब तुम्हें ही यह सब करना होगा.”

“ठीक है, मेरे दोस्त का भाई एक मैडिकल की दुकान पर काम करता है. मैं उन से कह दूंगा लाने को.”

“इस का मतलब यह कि तुम अपने दोस्त को भी यह बताओगे. सब को पता चल जाएगा, कितनी बदनामी होगी,” कहते हुए मैं फिर से रोने लगी.

“अरे यार, तू न ये रोनाधोना मत कर. कुछ भी कह दूंगा. वैसे भी ऐसे समय में खुश रहना चाहिए.”

मेरे कुछ पूछने से पहले ही वह मुंह बना कर बोला, “ऐसा टीवी में और फिल्मों में कहते सुना है मैं ने.”

“सुनो न , तुम अपने घर वालों से बात करो,” देखी गई फिल्मों के आधार पर मुझे शादी ही एकमात्र उपाय लग रही थी. हालांकि विकास का चपटी नाक वाला चेहरा मुझे बिलकुल पसंद नहीं था और ऊपर से उसे जब देखो तब जुकाम हो जाता था, लेकिन अभी और कोई चारा नहीं था.

खैर, हम दोनों इंटरवल खत्म होने की घंटी बजने तक यही बात करते रहे कि घर में कैसे क्या कहेंगे. फिर यह तय हुआ कि पहले एक बार किट ले कर टैस्ट कर लेते हैं. यदि रिपोर्ट पौजिटिव आती है, तो विकास अपने घर वालों से बात कर के उन को मेरे घर बात करने भेजेगा.

क्लास में आ कर मैं ने कविता को भी यह सब बता दिया था. उसे भी यही उपाय सही लगा.

स्कूल की छुट्टी के बाद जब मैं और कविता घर जा रहे थे, तभी विकास ने पीछे से आवाज दे कर रोका. मैं ने मुड़ कर देखा, तो वह भागता हुआ आ रहा था.

“सुनो, यह इमली लाया था मैं तुम्हारे लिए, टीवी में देखा है…” कहते हुए वह जितना शरमा रहा था, उस से कहीं ज्यादा मैं जमीन में गढ़ी जा रही थी. कविता ने कुहनी मार कर कहा, “देख, कितना ध्यान रख रहा है तेरा. अब ये तुझ से कभी नहीं लड़ेगा.”

घर आ कर मैं ने कागज में लिपटी इमली को खाने की कोशिश की, पर मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं हुई. वैसे भी मुझे इमली की जगह चूरन ज्यादा पसंद था, ‘लेकिन, टीवी में तो देखा है…’

दोपहर तक मेरी कल्पना डर में बदल गई कि कहीं किट की रिपोर्ट पौजिटिव आई तो क्या होगा. घर वालों को विकास के मम्मीपापा के आने पर सब पता तो चल ही जाएगा. अगर वे शादी के लिए नहीं माने तब क्या होगा? मेरी आंखों के आगे एक फिल्म का दृश्य आ गया, जहां एक लड़की  परिवार की इज्जत बचाने के लिए खुद को खत्म कर लेती है.

“नहीं… नहीं, मैं मरना नहीं चाहती,” घबरा कर मैं ने अपने दोनों हाथ अपनी आंखों पर रख लिए.

“कुछ भी हो, कैसी भी बात हो, अपने मम्मीपापा से नहीं छिपाना. वे बड़े हैं… नाराज हो सकते हैं, पर तुम्हें उस मुश्किल से भी वही निकालेंगे,” अचानक मेरे दिमाग में टीचर की बताई बात आ गई, जब वे क्लास में हम सभी से बातें कर रही थीं. मैं ने हिम्मत जुटाई और आखिरकार मम्मी को सब बताने का फैसला कर लिया.

“दादी, आप मेरे साथ जरा अंदर चलो न मम्मी के पास,” दादी की चिरौरी करते हुए मैं ने कहा.

“का हुई गवा…? कोउन्हों बदमासी की हो क्या?” दादी के झुर्रीदार गाल उन की मुसकान से भर गए.

“आप चलो तो सही,” मैं दादी की लाठी पकड़ कर उन को जबरदस्ती अंदर कमरे में ले आई, ताकि मम्मी की मार से दादी बचा सकें.

“मम्मी, मुझे कुछ कहना है. आप बैठ जाओ पहले,” मेरे कहने पर मम्मी हाथ का काम छोड़ कर कुरसी पर बैठ गईं. दादी पहले ही तख्त पर बैठ चुकी थीं.

थूक गटक कर अटकतेअटकते आंखें झुका कर मैं ने उन से कहा, “मुझे माफ कर दीजिए, मैं…” और फिर मैं ने सिर झुकाएझुकाए उन से अपनी बात कहनी शुरू की. उन की आंखों की चुभन मैं महसूस कर रही थी.

मेरी बात खत्म होने के पहले ही मम्मी और दादी आशा के विपरीत जोरजोर से हंसने लगीं, “तुझे किस ने बताया कि काटने से बच्चा हो जाता है.”

“होता है मम्मी, सुजाता की बुआ ने उसे बताया था,” मैं ने दादीमम्मी की बुद्धि पर तरस खाते हुए कहा.

“ऐसा कुछ नहीं होता. मेरे भी 2 बच्चे यानी तेरे पापा और बूआ हैं और तेरी मम्मी की भी 3 बेटियां हैं.”

“काटने से नहीं होते तो कैसे होते हैं?” मैं समझ ही नहीं पा रही थी.

“बड़ी हो कर जान जाओगी. जाओ खेलो,” मम्मी ने हंसते हुए कहा, तो मेरी जान में जान आई. ‘यानी, सब ठीक है. कल बताऊंगी इस सुजाता की बच्ची को.’

मैं खुश थी कि अब विकास से मुझे शादी नहीं करनी पड़ेगी और मुझे यकीन था कि वह भी मुझ से शादी नहीं करना चाहता होगा.

‘पर काटने से बच्चे नहीं होते तो फिर…?’ सवाल अब भी अनुत्तरित था.

The post बिनब्याही मां: नीलम की रातों की नींद क्यों हराम हो गई appeared first on Sarita Magazine.

April 28, 2022 at 09:00AM