Sunday, 27 February 2022

चार आंखों का खेल: क्या संध्या उस खेल से बच पाई?

चार आंखों का खेल मेरी नजर में दुनिया का सब से रोमांचक व खूबसूरत खेल है (कम से कम शुरू में तो ऐसा ही लगता है). इस खेल की सब से अच्छी बात यही है कि जो चार आंखें यह खेल खेलती हैं, इस खेलके बारे में बस उन्हीं को पता होता है. उन के आसपास रहने वालों को इस खेल का अंदाजा ही नहीं हो पाता है. मैं भी इस खेल में लगभग 1 साल पहले शामिल हुई थी. यहां मुंबई में जुलाई में बारिश का मौसम था. सोसायटी के गार्डन के ट्रैक पर फिसलने का डर था. वैसे मुझे बाहर सड़कों पर सैर करना अच्छा नहीं लगता. ट्रैफिक, स्कूलबसों के हौर्न का शोर, भीड़भाड़ से दूर मुझे अपनी सोसायटी के शांत गार्डन में सैर करना ही अच्छा लगता.

हां, तो बारिश के ही एक दिन मैं घर से 20 मिनट दूर एक दूसरे बड़े गार्डन में सैर के लिए जा रही थी. वहीं सड़क पर वह अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखा रहा था. हम दोनों ने अचानक एकदूसरे को देखा. पहली बार आंखों से आंखें मिलते ही जो होना था, हो चुका था. यह शायद आंखों का ही दोष है. किसी की आंखों से किसी की आंखें मिल जाएं, तो फिर उस का कोई इलाज नहीं रहता. शायद इसी का नाम चार आंखों का खेल है.

हां, तो जब हम दोनों ने एकदूसरे को देखा तो कुछ हुआ. क्या, यह बताना उस पल का वर्णन करना, उस एहसास को शब्दों का रूप देना मुश्किल है. हां, इतना याद रहा कि उस पूरा दिन मैं चहकती रही, न घर आते हुए बसों के हौर्न बुरे लग रहे थे, न सड़क पर कुछ शोर सुनाई दे रहा था. सुबह के 7 बजे मैं हवा में उड़ती, चहकती घर लौट आई थी.

मेरे पति निखिल 9 बजे औफिस निकलते हैं. 22 वर्षीय बेटी कोमल कालेज के लिए 8 बजे निकलती है. मैं रोज की तरह कोमल को आवाज दे कर किचन संभालने में व्यस्त हो गई. दोनों के जाने के बाद मैं दिन भर एक अलग ही उत्साह में घिरी रही. अगले दिन भी मैं सैर करने के लिए फिर बाहर ही गई. वह फिर उसी जगह अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखा रहा था. हमारी आंखें फिर मिलीं, तनमन एक पुलक से भरते चले गए. फिर अगले 3-4 दिन मेरे सामने यह स्पष्ट हो गया कि उसे भी मेरा इंतजार रहता है. वह बारबार मुड़ कर उसी तरफ देखता है जहां से मैं उस रोड पर आती हूं. मैं ने उसे दूर से ही बारबार देखते देख लिया था.

चार आंखों का खेल बहुत ही खूबसूरती से शुरू हो गया था. दोनों खिलाड़ी शायद हर सुबह का बेचैनी से इंतजार करने लगे थे. मैं संडे को सैर पर कभी नहीं जाती थी, ब्रेक लेती थी, पर अब मैं संडे को भी जाने लगी तो निखिल ने टोका, ‘‘अरे, संध्या कहां…?’’

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‘‘सैर पर,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर आज तो संडे है?’’

‘‘आंख खुल गई है, तो चली ही जाती हूं. तुम आराम करो, मैं अभी आई,’’ कह मैं तेज कदमों से भागी सी उस रोड पर चली जा रही थी. देखा, आज उस का बेटा नहीं था. सोचा संडे है, सो रहा होगा. आज वह अपनी पत्नी के साथ सैर कर रहा था. मैं ने गौर से उस की पत्नी को देखा. मुझे वह अच्छी लगी, काफी सुंदर व स्मार्ट थी. उस ने मुझे देखा, पत्नी की नजरें बचा कर आज पहली बार वह मुसकरा भी दिया तो मुझे लगा संडे को आना जैसे सार्थक हो गया.

अब कुछ तो जरूर था हम दोनों के बीच जिस ने मुझे काफी बदल दिया था. सुबह के इंतजार में मैं पूरा दिन, शाम, रात बिताने लगी थी. 10 दिन में ही मैं कितना बदल गई थी. पूरा दिन यह एहसास कि रोज सुबह इस उम्र में भी कोई आप का इंतजार कर रहा होगा, इतना ही बहुत है रोमांचित होने के लिए.

धीरेधीरे 1 महीना बीत गया. इस खेल के दोनों खिलाड़ी मुंह से कभी एक शब्द नहीं बोले थे. आंखें ही पूछती थीं, आंखें ही जवाब देती थीं.

एक दिन निखिल ने पूछा भी, ‘‘आजकल सोसायटी के गार्डन नहीं जा रही हो?’’

‘‘नहीं, फिसलने का डर रहता है.’’

‘‘पर तुम्हें तो सैर के समय बाहर का शोर अच्छा नहीं लगता?’’

‘‘हां, पर अब ठीक लग रहा है,’’ कहते हुए मन में थोड़ा अपराधबोध सा तो महसूस हुआ पर चूंकि इस खेल में मजा आने लगा था, इसलिए सिर झटक कर अगली सुबह का इंतजार करने लगी.

बारिश का मौसम खत्म हो गया था, पर मैं अब भी बाहर ही जा रही थी. अक्तूबर शुरू हो गया था. चार आंखों का खेल अब और भी रोमांचक हो चुका था. मैं उसे सिर्फ देखने के लिए बाहर का शोरगुल पसंद न होते हुए भी बाहर भागी चली जाती थी, पहले से ज्यादा तैयार, संजसंवर कर. नईनई टीशर्ट्स, ट्रैक पैंट में, स्टाइलिश शूज में, अपने शोल्डरकट बालों को कभी खुला छोड़ कर, कभी पोनीटेल बना कर, बढि़या परफ्यूम लगा कर षोडशी सी महसूस करती हुई भागी चली जाती थी. सैर तो हमेशा करती आई थी पर इतनी दिलकश सैर पहले कभी नहीं थी.

उस से आंखें मिलते ही कितने सवाल होते थे, आंखें ही जवाब देती थीं. कभी छुट्टी वाले दिन देर से जाने पर कभी अस्वस्थता के कारण नागा होता था, तो उस की आंखें एक शिकायत करती थीं, जिस का जवाब मैं आंखों में ही मुसकरा कर दे देती थी. कभी वह नहीं देखता था तो मैं उसे घूरती थी, वह भी मुसकरा देता था फिर. अजीब सा खेल था, बात करने की जरूरत ही नहीं थी. सुबह से देखने के बाद एक जादुई एहसास से घिरी रहती थी मैं. दिन भर न किसी बात पर गुस्सा आता था, न किसी बात से चिढ़ होती थी. शांत, खुश, मुसकराते हुए अपने घर के  काम निबटाती रहती थी.

निखिल हैरान थे. एक दिन कहने लगे, ‘‘अब तो बारिश भी गई, अब भी बाहर सैर करोगी?’’

‘‘हां, ज्यादा अच्छी और लंबी सैर हो जाती है, सालों से गार्डन में ही सैर कर के ऊब गई हूं.’’

‘‘ठीक है, जहां तुम्हें अच्छा लगे,’’ निखिल भी सैर पर जाते थे, पर जब मैं आ जाती थी, तब.

फिर कमरदर्द से संबंधित शारीरिक अस्वस्थता के कारण मुझे परेशानी होने लगी थी. सुबह 20 मिनट जाना, 20 मिनट आना, फिर आते ही नाश्ता, दोनों के टिफिन, मेरी परेशानी बढ़ रही थी. पहले मैं आधे घंटे में घर आ जाती थी. डाक्टर ने कुछ दिन सैर करने का समय कम करने के लिए कहा तो मैं बेचैन हो गई. मेरे तो रातदिन आजकल उसे सुबह देखने से जुड़े थे. उसे देखने का मतलब था सुबह उठ कर 20 मिनट चल कर जाना, 20 मिनट आना, 40 मिनट तो लगने ही थे. अपनी अस्वस्थता से मैं थकने लगी थी.

अब वहां जाने का नागा होने लगा था, क्योंकि आते ही किचन में मुझे 1 घंटा लगता ही था. मैं अब इतनी देर एकसाथ काम करती तो पूरा दिन मेरी तकलीफ बढ़ी रहती. अब क्या करूं? इतने दिनों से जो एक षोडशी की तरह उत्साहित, रोमांचित महसूस कर रही हूं, अब क्या होगा? सब छूट जाएगा?

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निखिल परेशान थे, मुझे समझा रहे थे, ‘‘इतने सालों से यहीं सैर कर रही हो न. अब सुबह सैर पर मत जाओ, तुम्हें और भी काम होते हैं. शाम को फ्री रहती हो, आराम से उस समय सैर पर चली जाया करो. सुबह सब एकसाथ करती हो तो तुम्हारी तकलीफ बढ़ जाती है.’’

डाक्टर ने भी निखिल की बात पर सहमति जताई थी. पर मैं नहीं मानी. एक अजीब सी मनोदशा थी मेरी. शारीरिक रूप से आराम की जरूरत थी पर दिल को आराम उसे देखने से ही मिलता था. मैं उसे देखने के लिए बाहर जाती रही. पर अब नागे बहुत होते थे.

उस का बेटा अब तक साइकिल सीख चुका था. अब वह अकेला ही वहां दिखता था. चार आंखों का खेल जारी था. अपनी हैल्थ की चिंता न करते हुए मैं बाहर ही जाती रही.

पहली जनवरी की सुबह पहली बार उस ने मेरे पास से गुजरते हुए ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बोला. मैं ने भी अपने कदम धीरे करते हुए ‘थैंक्स, सेम टू यू’ कहा, इतने दिनों के खेल में शब्दों ने पहली बार भाग लिया था. मन मयूर प्रफुल्लित हो कर नाच उठा.

अब मेरी तबीयत खराब भी रहती तो मैं निखिल और कोमल से छिपा लेती. दोनों के जाने के बाद दर्द से बेहाल हो कर घंटो बैड पर लेटी रहती. कोमल बेटी है, बिना बताए भी चेहरा देख कर मेरे दर्द का अंदाजा उसे हो जाता था, तो कहती थी, ‘‘मौम, आप को स्ट्रैस लेने से मना किया है डाक्टर ने. आप मौर्निंग वाक पर नहीं जाएंगी, अब आप शाम की सैर पर ही जाना.’’

पर मैं नहीं मानी, क्योंकि मैं तो दुनिया के सब से दिलकश खेल की खिलाड़ी थी.

मई का महीना आया तो मेरे मन की उथलपुथल बढ़ गई. मई में मैं ने हमेशा शाम की ही सैर की थी. मुझे जरा भी गरमी बरदाश्त नहीं है. 8-10 दिन तो मैं गई. मुंबई की चिपचिपी गरमी से सुबह ही बेहाल, पसीनेपसीने लौटती. आ कर कभी नीबू पानी पीती, तो कभी आते ही एसी में बैठ जाती पर कितनी देर बैठ सकती थी. किचन के काम तो सब से जरूरी थे सुबह.

इस गरमी ने तो मेरे मन के भाव ही बदल दिए. इस बार की गरमी तो इस चार आंखों के खेल का सब से महत्त्वपूर्ण पड़ाव बन कर सामने आई. बहुत कोशिश करने पर भी मैं गरमी में सुबह सैर पर रोज नहीं जा पाई. छुट्टी वाले दिन चली जाती, क्योंकि जब आते ही किचन में नहीं जाना पड़ता था. उसे देखने के मोह पर गरमी की तपिश भारी पड़ने लगी थी. पसीना पोंछती जाती. उसे देख कर जब वापस आती, तब यह सोचती कि नहीं, अब नहीं जाऊंगी. बहुत गरमी है. मैं कोई षोडशी थोड़े ही हूं कि अपने किसी आशिक को देखने सुबहसुबह भागी जाऊं. अरे, मैं एक मैच्योर औरत हूं, पति है, बेटी है और इतने महीनों से हासिल क्या हुआ? न मुझे उस से कोई अफेयर चलाना है, न मतलब रखना है किसी तरह का. जो हुआ, बस हो गया. इस का कोई महत्त्व थोड़े ही है. जैसेजैसे गरमी बढ़ रही थी, मेरी अक्ल ठिकाने आ रही थी.

सारा उत्साह, रोमांच हवा हो रहा था. गरमी, कमरदर्द और सुबह के कामों ने मिल कर मुझे इस खेल में धराशायी कर दिया था. दिल तो अब भी वहीं उसी पार्क के रोड पर जाने के लिए उकसाता था पर दिमाग अब दिल पर हावी होने लगा था.

मन में कहीं कुछ टूटा तो था पर खुद को समझा लिया था कि ठीक है, लाइफ है, होता है ऐसा कभीकभी. यह उम्र, यह समय, ये जिम्मेदारियां शायद इस खेल के लिए नहीं हैं.

चार आंखों के इस खेल में मैं ने अपनी हार स्वीकार ली थी और पहले की तरह अपनी सोसायटी के गार्डन में ही शाम की सैर पर जाना शुरू कर दिया था.

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चार आंखों का खेल मेरी नजर में दुनिया का सब से रोमांचक व खूबसूरत खेल है (कम से कम शुरू में तो ऐसा ही लगता है). इस खेल की सब से अच्छी बात यही है कि जो चार आंखें यह खेल खेलती हैं, इस खेलके बारे में बस उन्हीं को पता होता है. उन के आसपास रहने वालों को इस खेल का अंदाजा ही नहीं हो पाता है. मैं भी इस खेल में लगभग 1 साल पहले शामिल हुई थी. यहां मुंबई में जुलाई में बारिश का मौसम था. सोसायटी के गार्डन के ट्रैक पर फिसलने का डर था. वैसे मुझे बाहर सड़कों पर सैर करना अच्छा नहीं लगता. ट्रैफिक, स्कूलबसों के हौर्न का शोर, भीड़भाड़ से दूर मुझे अपनी सोसायटी के शांत गार्डन में सैर करना ही अच्छा लगता.

हां, तो बारिश के ही एक दिन मैं घर से 20 मिनट दूर एक दूसरे बड़े गार्डन में सैर के लिए जा रही थी. वहीं सड़क पर वह अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखा रहा था. हम दोनों ने अचानक एकदूसरे को देखा. पहली बार आंखों से आंखें मिलते ही जो होना था, हो चुका था. यह शायद आंखों का ही दोष है. किसी की आंखों से किसी की आंखें मिल जाएं, तो फिर उस का कोई इलाज नहीं रहता. शायद इसी का नाम चार आंखों का खेल है.

हां, तो जब हम दोनों ने एकदूसरे को देखा तो कुछ हुआ. क्या, यह बताना उस पल का वर्णन करना, उस एहसास को शब्दों का रूप देना मुश्किल है. हां, इतना याद रहा कि उस पूरा दिन मैं चहकती रही, न घर आते हुए बसों के हौर्न बुरे लग रहे थे, न सड़क पर कुछ शोर सुनाई दे रहा था. सुबह के 7 बजे मैं हवा में उड़ती, चहकती घर लौट आई थी.

मेरे पति निखिल 9 बजे औफिस निकलते हैं. 22 वर्षीय बेटी कोमल कालेज के लिए 8 बजे निकलती है. मैं रोज की तरह कोमल को आवाज दे कर किचन संभालने में व्यस्त हो गई. दोनों के जाने के बाद मैं दिन भर एक अलग ही उत्साह में घिरी रही. अगले दिन भी मैं सैर करने के लिए फिर बाहर ही गई. वह फिर उसी जगह अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखा रहा था. हमारी आंखें फिर मिलीं, तनमन एक पुलक से भरते चले गए. फिर अगले 3-4 दिन मेरे सामने यह स्पष्ट हो गया कि उसे भी मेरा इंतजार रहता है. वह बारबार मुड़ कर उसी तरफ देखता है जहां से मैं उस रोड पर आती हूं. मैं ने उसे दूर से ही बारबार देखते देख लिया था.

चार आंखों का खेल बहुत ही खूबसूरती से शुरू हो गया था. दोनों खिलाड़ी शायद हर सुबह का बेचैनी से इंतजार करने लगे थे. मैं संडे को सैर पर कभी नहीं जाती थी, ब्रेक लेती थी, पर अब मैं संडे को भी जाने लगी तो निखिल ने टोका, ‘‘अरे, संध्या कहां…?’’

ये भी पढ़ें- पहेली: जब अमित की जिंदगी में हुई कनिका की एंट्री

‘‘सैर पर,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर आज तो संडे है?’’

‘‘आंख खुल गई है, तो चली ही जाती हूं. तुम आराम करो, मैं अभी आई,’’ कह मैं तेज कदमों से भागी सी उस रोड पर चली जा रही थी. देखा, आज उस का बेटा नहीं था. सोचा संडे है, सो रहा होगा. आज वह अपनी पत्नी के साथ सैर कर रहा था. मैं ने गौर से उस की पत्नी को देखा. मुझे वह अच्छी लगी, काफी सुंदर व स्मार्ट थी. उस ने मुझे देखा, पत्नी की नजरें बचा कर आज पहली बार वह मुसकरा भी दिया तो मुझे लगा संडे को आना जैसे सार्थक हो गया.

अब कुछ तो जरूर था हम दोनों के बीच जिस ने मुझे काफी बदल दिया था. सुबह के इंतजार में मैं पूरा दिन, शाम, रात बिताने लगी थी. 10 दिन में ही मैं कितना बदल गई थी. पूरा दिन यह एहसास कि रोज सुबह इस उम्र में भी कोई आप का इंतजार कर रहा होगा, इतना ही बहुत है रोमांचित होने के लिए.

धीरेधीरे 1 महीना बीत गया. इस खेल के दोनों खिलाड़ी मुंह से कभी एक शब्द नहीं बोले थे. आंखें ही पूछती थीं, आंखें ही जवाब देती थीं.

एक दिन निखिल ने पूछा भी, ‘‘आजकल सोसायटी के गार्डन नहीं जा रही हो?’’

‘‘नहीं, फिसलने का डर रहता है.’’

‘‘पर तुम्हें तो सैर के समय बाहर का शोर अच्छा नहीं लगता?’’

‘‘हां, पर अब ठीक लग रहा है,’’ कहते हुए मन में थोड़ा अपराधबोध सा तो महसूस हुआ पर चूंकि इस खेल में मजा आने लगा था, इसलिए सिर झटक कर अगली सुबह का इंतजार करने लगी.

बारिश का मौसम खत्म हो गया था, पर मैं अब भी बाहर ही जा रही थी. अक्तूबर शुरू हो गया था. चार आंखों का खेल अब और भी रोमांचक हो चुका था. मैं उसे सिर्फ देखने के लिए बाहर का शोरगुल पसंद न होते हुए भी बाहर भागी चली जाती थी, पहले से ज्यादा तैयार, संजसंवर कर. नईनई टीशर्ट्स, ट्रैक पैंट में, स्टाइलिश शूज में, अपने शोल्डरकट बालों को कभी खुला छोड़ कर, कभी पोनीटेल बना कर, बढि़या परफ्यूम लगा कर षोडशी सी महसूस करती हुई भागी चली जाती थी. सैर तो हमेशा करती आई थी पर इतनी दिलकश सैर पहले कभी नहीं थी.

उस से आंखें मिलते ही कितने सवाल होते थे, आंखें ही जवाब देती थीं. कभी छुट्टी वाले दिन देर से जाने पर कभी अस्वस्थता के कारण नागा होता था, तो उस की आंखें एक शिकायत करती थीं, जिस का जवाब मैं आंखों में ही मुसकरा कर दे देती थी. कभी वह नहीं देखता था तो मैं उसे घूरती थी, वह भी मुसकरा देता था फिर. अजीब सा खेल था, बात करने की जरूरत ही नहीं थी. सुबह से देखने के बाद एक जादुई एहसास से घिरी रहती थी मैं. दिन भर न किसी बात पर गुस्सा आता था, न किसी बात से चिढ़ होती थी. शांत, खुश, मुसकराते हुए अपने घर के  काम निबटाती रहती थी.

निखिल हैरान थे. एक दिन कहने लगे, ‘‘अब तो बारिश भी गई, अब भी बाहर सैर करोगी?’’

‘‘हां, ज्यादा अच्छी और लंबी सैर हो जाती है, सालों से गार्डन में ही सैर कर के ऊब गई हूं.’’

‘‘ठीक है, जहां तुम्हें अच्छा लगे,’’ निखिल भी सैर पर जाते थे, पर जब मैं आ जाती थी, तब.

फिर कमरदर्द से संबंधित शारीरिक अस्वस्थता के कारण मुझे परेशानी होने लगी थी. सुबह 20 मिनट जाना, 20 मिनट आना, फिर आते ही नाश्ता, दोनों के टिफिन, मेरी परेशानी बढ़ रही थी. पहले मैं आधे घंटे में घर आ जाती थी. डाक्टर ने कुछ दिन सैर करने का समय कम करने के लिए कहा तो मैं बेचैन हो गई. मेरे तो रातदिन आजकल उसे सुबह देखने से जुड़े थे. उसे देखने का मतलब था सुबह उठ कर 20 मिनट चल कर जाना, 20 मिनट आना, 40 मिनट तो लगने ही थे. अपनी अस्वस्थता से मैं थकने लगी थी.

अब वहां जाने का नागा होने लगा था, क्योंकि आते ही किचन में मुझे 1 घंटा लगता ही था. मैं अब इतनी देर एकसाथ काम करती तो पूरा दिन मेरी तकलीफ बढ़ी रहती. अब क्या करूं? इतने दिनों से जो एक षोडशी की तरह उत्साहित, रोमांचित महसूस कर रही हूं, अब क्या होगा? सब छूट जाएगा?

ये भी पढ़ें- स्वयंवर: मीता ने आखिर पति के रूप में किस को चुना

निखिल परेशान थे, मुझे समझा रहे थे, ‘‘इतने सालों से यहीं सैर कर रही हो न. अब सुबह सैर पर मत जाओ, तुम्हें और भी काम होते हैं. शाम को फ्री रहती हो, आराम से उस समय सैर पर चली जाया करो. सुबह सब एकसाथ करती हो तो तुम्हारी तकलीफ बढ़ जाती है.’’

डाक्टर ने भी निखिल की बात पर सहमति जताई थी. पर मैं नहीं मानी. एक अजीब सी मनोदशा थी मेरी. शारीरिक रूप से आराम की जरूरत थी पर दिल को आराम उसे देखने से ही मिलता था. मैं उसे देखने के लिए बाहर जाती रही. पर अब नागे बहुत होते थे.

उस का बेटा अब तक साइकिल सीख चुका था. अब वह अकेला ही वहां दिखता था. चार आंखों का खेल जारी था. अपनी हैल्थ की चिंता न करते हुए मैं बाहर ही जाती रही.

पहली जनवरी की सुबह पहली बार उस ने मेरे पास से गुजरते हुए ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बोला. मैं ने भी अपने कदम धीरे करते हुए ‘थैंक्स, सेम टू यू’ कहा, इतने दिनों के खेल में शब्दों ने पहली बार भाग लिया था. मन मयूर प्रफुल्लित हो कर नाच उठा.

अब मेरी तबीयत खराब भी रहती तो मैं निखिल और कोमल से छिपा लेती. दोनों के जाने के बाद दर्द से बेहाल हो कर घंटो बैड पर लेटी रहती. कोमल बेटी है, बिना बताए भी चेहरा देख कर मेरे दर्द का अंदाजा उसे हो जाता था, तो कहती थी, ‘‘मौम, आप को स्ट्रैस लेने से मना किया है डाक्टर ने. आप मौर्निंग वाक पर नहीं जाएंगी, अब आप शाम की सैर पर ही जाना.’’

पर मैं नहीं मानी, क्योंकि मैं तो दुनिया के सब से दिलकश खेल की खिलाड़ी थी.

मई का महीना आया तो मेरे मन की उथलपुथल बढ़ गई. मई में मैं ने हमेशा शाम की ही सैर की थी. मुझे जरा भी गरमी बरदाश्त नहीं है. 8-10 दिन तो मैं गई. मुंबई की चिपचिपी गरमी से सुबह ही बेहाल, पसीनेपसीने लौटती. आ कर कभी नीबू पानी पीती, तो कभी आते ही एसी में बैठ जाती पर कितनी देर बैठ सकती थी. किचन के काम तो सब से जरूरी थे सुबह.

इस गरमी ने तो मेरे मन के भाव ही बदल दिए. इस बार की गरमी तो इस चार आंखों के खेल का सब से महत्त्वपूर्ण पड़ाव बन कर सामने आई. बहुत कोशिश करने पर भी मैं गरमी में सुबह सैर पर रोज नहीं जा पाई. छुट्टी वाले दिन चली जाती, क्योंकि जब आते ही किचन में नहीं जाना पड़ता था. उसे देखने के मोह पर गरमी की तपिश भारी पड़ने लगी थी. पसीना पोंछती जाती. उसे देख कर जब वापस आती, तब यह सोचती कि नहीं, अब नहीं जाऊंगी. बहुत गरमी है. मैं कोई षोडशी थोड़े ही हूं कि अपने किसी आशिक को देखने सुबहसुबह भागी जाऊं. अरे, मैं एक मैच्योर औरत हूं, पति है, बेटी है और इतने महीनों से हासिल क्या हुआ? न मुझे उस से कोई अफेयर चलाना है, न मतलब रखना है किसी तरह का. जो हुआ, बस हो गया. इस का कोई महत्त्व थोड़े ही है. जैसेजैसे गरमी बढ़ रही थी, मेरी अक्ल ठिकाने आ रही थी.

सारा उत्साह, रोमांच हवा हो रहा था. गरमी, कमरदर्द और सुबह के कामों ने मिल कर मुझे इस खेल में धराशायी कर दिया था. दिल तो अब भी वहीं उसी पार्क के रोड पर जाने के लिए उकसाता था पर दिमाग अब दिल पर हावी होने लगा था.

मन में कहीं कुछ टूटा तो था पर खुद को समझा लिया था कि ठीक है, लाइफ है, होता है ऐसा कभीकभी. यह उम्र, यह समय, ये जिम्मेदारियां शायद इस खेल के लिए नहीं हैं.

चार आंखों के इस खेल में मैं ने अपनी हार स्वीकार ली थी और पहले की तरह अपनी सोसायटी के गार्डन में ही शाम की सैर पर जाना शुरू कर दिया था.

The post चार आंखों का खेल: क्या संध्या उस खेल से बच पाई? appeared first on Sarita Magazine.

February 28, 2022 at 12:53PM

Saturday, 26 February 2022

आखिरी इच्छा: क्या थी पूनम की आखिरी इच्छा

Writer- धीरज राणा भायला

मैं अपने ही शहर में होने के बावजूद 1 माह बाद अपने घर में दाखिल हुआ था. पूरे 30 दिन मैं ने दीप्ति के साथ लिवइन में उस के छोटे से घर में बिताया था. इस 1 महीने मैं बेहद खुश रहा था जैसे मन की मुराद पूरी हो गई हो. दीप्ति औफिस में मेरी कुलीग थी. हालांकि उस की उम्र मुझ से 5 साल कम थी मगर वह इतनी खूबसूरत थी कि मैं उस से प्रेम करने लगा था और 1 हफ्ते के मुख्तसर से वक्त में हम ने साथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं. यह अलग बात है कि शादी होने से पहले ही लिवइन में एकदूसरे के साथ रहने का हमारा यह फैसला जिहादी था.

शादी में एकमात्र और गंभीर समस्या मेरी पहली पत्नी पूनम थी, जिस से मैं ने 10 साल पहले ठीक इसी तरह से प्रेमविवाह किया था और 1 साल बाद ही मुझे वह औरत इतनी बोर लगने लगी थी कि मैं ने उस की तरफ ध्यान देना ही छोड़ दिया था. अगले 9 सालों तक हमारे बीच रिश्ते कुछ ऐसे रहे जैसे किसी मजबूरी के तहत 2 यात्री किसी 1 ही सीट पर यात्रा करने को विवश हों.

आज घर लौटने के पीछे दीप्ति का आग्रह बड़ी वजह थी. उस ने कहा था कि लिवइन में रहने से अच्छा है कि मैं जा कर पत्नी से तलाक की बात करूं और जैसे भी हो उसे राजी करूं. मुझे विश्वास नहीं था कि तलाक की बात पर वह राजी होगी. आखिर हमारा 8 साल का बेटा वह सूत्र था जिस की वजह से वह मुझ से आज तक बंधी हुई थी और मुझे लगता था कि यह बंधन अब मजबूत होता जा रहा था. बावजूद इस के कि पत्नी का मेरे जीवन मे कोई महत्त्व शेष न था.

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घर में दाखिल होते ही उस ने मुझे पानी का गिलास दिया और कुछ पलों बाद चाय बना कर ले लाई. चाय पीते हुए तलाक का जिक्र करना मुझे जल्दबाजी लगी इसलिए मैं ने रात होने तक इंतजार करने का फैसला किया.

वह मेरे आने से शायद बहुत खुश हुई थी. हालांकि उस की खुशी कभी चेहरे पर दिखाई नहीं देती थी. उस के काम से उस के खुश होने का एहसास करने की मुझे आदत सी हो गई थी.आज उस ने खाना मेरी पसंद का बनाया था. मैं सोफे पर बैठा मोबाइल पर गेम खेल रहा था जब उस ने बिन कहे खाना ला कर वहीं परोस दिया.

“तुम से कुछ जरूरी बात करनी थी, 2 मिनट पास बैठो,” वह खाना दे कर जाने लगी तो मैं ने कहा. वह बिना कुछ कहे बगल वाली कुरसी पर बैठ गई. यह दिखाने के लिए कि हालात सामान्य थे मैं इत्मिनान से खाना खाने लगा.

“पिछले 10 सालों से हमारे बीच कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा है. हम एकदूसरे के साथ जबरन बंधे से हैं. मैं चाहता हूं कि हम तलाक ले कर एकदूसरे से आजाद हो जाएं. तुम्हारा क्या विचार है,” बहुत हिम्मत कर के एक सांस में मैं ने दिल की बात कह दी. फिर उस के हावभाव को जांचने के लिए उस के चेहरे की ओर देखा. ऐसा लगा जैसे वह किसी गंभीर बीमारी से जूझ रही हो.

चेहरे पर फीकी सी हंसी ला कर उस ने मेरी आंखों से आंखें मिलाईं तो उन आंखों में भी मुझे दूर तक एक सूनापन नजर आया, जिसे देख कर एक पल के लिए दिमाग सन्न रह गया. फिर अगले ही पल दीप्ति का खयाल आते ही जैसे सब भूल बैठा.

“आप की खुशी से बड़ी मेरे लिए कोई बात भला क्या हो सकती है? अगर इसी में आप की खुशी है तो यही सही,” कहते हुए उस का चेहरा उदास हो गया.

“तो फिर मैं वकील से बात कर लेता हूं ताकि वे जरूरी कागजात तैयार कर सकें. संभव है कि 20 दिनों में हम आजाद होंगे.”

“मगर मेरी एक छोटी सी शर्त है…”

“क्या चाहिए तुम्हें?” मुझे लगा कि जैसा मैं समझ रहा था उतनी आसानी से मामला हल न होगा.

“मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. मैं तो बस इतना चाहती हूं कि जब तक तलाक नहीं हो जाता हम उसी तरह साथ रहें जैसे शादी के पहले 20 दिनों में रहे थे. यह मेरी आखिरी इच्छा है.”

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“आखिरी इच्छा?”

“तलाक के बाद तो आप के लिए मैं मर ही जाऊंगी न,” उस ने कहा तो उस का खूबसरत चेहरा सिकुड़ सा गया. बहुत कुछ बदलीबदली सी.

मैं मन ही मन खुश हुआ कि मांगा भी तो क्या, बस 20 दिन. इतने दिनों को तो जेल की सजा समझ कर भी काट सकता था.

फोन कर के औफिस से मैं ने 10 दिनों की छुट्टी ली. फिर दीप्ति को भी फोन पर खुशखबरी सुनाने के साथ ही वकील से बात करने को कह दिया. अब मैं फिल्म के एक पात्र की तरह अभिनय करने के लिए तैयार था.

अभिनय को सशक्त और वास्तविक बनाने के लिए कभी रसोई में काम करती पत्नी को पीछे से बांहों में भर लेता, कभी उसे बांहों में उठा कर बैडरूम में ले आता. वह बरतन साफ कर रही होती तो मैं झाड़ू लगाने लग जाता. वह आटा गूंध रही होती तो सामने बैठ कर अपलक निहारता रहता.

इन सब क्रियाओं के बाद भी लगता कि उस के भीतर कुछ टूट रहा था.जैसे जीने की उमंग मर रही थी. 3 दिनों में ही मुझे एहसास होने लगा था कि अब खुशी और गम के उस के लिए वे मायने नहीं रह गए थे जो तब थे जब हम ने शादी की थी.

एक दिन सुबह वह उठने लगी तो पैरों पर खड़े होते ही ऐसे लड़खड़ाई कि बैड का किनारा हाथ में न आया होता तो गिर गई होती. हालांकि मैं उस के साथ सो भी रहा था मगर मात्र अभिनय के बतौर. वह लड़खड़ाई तो मेरा अभिनय भी जैसे लड़खड़ाया था.

“तुम ठीक हो पूनम?” हालचाल पूछने की बिलकुल नीयत न होने के बावजूद नितांत अपनेपन से दिल की आवाज निकली.

“हां, मैं बिलकुल ठीक हूं. बस, नींद पूरी तरह खुली नहीं थी इसलिए लड़खड़ा गई थी,” फिर कुछ याद करते हुए उस ने पूछा,”वकील से बात हो गई?”

“हां, फोन कर दिया था उसे.”

“आप वकील न ही करते. बेवजह पैसे खर्च होंगे आप के. अगर मैं वैसे ही छोड़ कर चली जाऊं तो?”

मैं जैसे सिहर उठा. जाने क्यों मुझे लगा कि उस के कहने का आशय वह नहीं था जो मैं समझ रहा था. उस ने 20 दिन साथ रहने की शर्त रखते हुए भी क्यों कहा था कि यह मेरी आखिरी इच्छा है?

उस रोज वह दिनभर काम में लगी रही और मैं उस की बातों को मन ही मन दिमाग मे तौलता रहा. दोपहर को उस ने खाना लगाया तो मैं ने साथ बैठ कर खाने का आग्रह किया. अब मेरी अभिनय कला जवाब दे रही थी. मैं ने एक निवाला अपने हाथ से उस के मुंह में रखा. हम ने ठीक शादी के पहले दिनों की तरह एकदूसरे को खाना खिलाया. खाना खत्म कर के वह बरतन ले जाने लगी तो मैं ने उसे रोक दिया,”राहुल को होस्टल से बुला लूं? 2-4 दिन साथ रह लेगा.”

“क्या जरूरत है? फोन पर बात तो हो ही जाती है.”

“डाक्टर के पास चलें?”

उस ने सूनी आंखों से मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैं ने उस की किसी दुखती रग को छेड़ दिया हो.

“नहीं, मैं तो बिलकुल ठीक हूं,” इतना कह कर वह चली गई. मैं भी उस के पीछे किचन में आ गया. उस ने बरतन सिंक में डाल दिए तो मैं ने उसे प्यार से बांहों में उठा लिया. इस हरकत को मैं रोज करता आ रहा था लेकिन वह अभिनय था. आज कुछ अपनेपन और प्यार से उठाया तो एहसास हुआ कि उस का वजन भी बहुत कम हो गया था. उसे बांहों में उठाए ला कर बैडरूम में बैड पर लिटा दिया. मैं ने आज 10 साल बाद उसे उसी तरह भरपूर प्यार किया जैसे शादी के पहले दिन किया था. मगर आज जैसे उस के लिए चीजें बेमानी थीं. सारे अरमान मर गए थे जैसे. अब 2 दिन शेष थे लेकिन मेरा मन कह रहा था कि उसे उस के हाल पर छोड़ कर बहुत बड़ा अन्याय कर रहा था मैं.

ये भी पढ़ें- कोई उचित रास्ता: क्या अपनी गृहस्थी संभाल पाई स्वार्थी रज्जी?

रोज की तरह शाम 3 बजे दीप्ति का फोन आया. उस ने खबर दी कि सब कागज तैयार हैं, बस एक बार पूनम को कोर्ट आ कर हस्ताक्षर करने होंगे.वार्तालाप के दौरान मैं बस हांहूं करता रहा क्योंकि दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था.

मेरा दिल गवाही दे रहा था कि पूनम की हालत को नजरअंदाज कर के मैं ने बहुत बड़ी गलती कर दी थी. इस बात को जितना सोचता बेचैनी बढ़ती जाती. हालत यह हो गई कि 1-1 पल बहुत भारी गुजरने लगा. कल हमारे करार का आखिरी दिन भी था लेकिन कल तक इंतजार करना असंभव लगा.

“किसी से बहुत जरूरी बात करनी है.लौट कर डाक्टर के पास चलेंगे, तब तक तैयार हो जाओ और हां, आज कोई बहाना नहीं चलेगा,” मैं ने कहा तो रोज की तरह उस ने प्रतिरोध नहीं किया, शायद इसलिए कि आज मेरे लहजे में उसे अपनेपन का एहसास हुआ था.

“कल तो हमारा करार खत्म हो ही रहा है. क्यों नया पेंच फंसा रहे हो?”

कोई जवाब दिए बिना मैं गाड़ी में सवार हुआ और दीप्ति के पास पहुंच गया.

“मैं पूनम को नहीं छोड़ सकता. उसे मेरी जरूरत है,” मैं ने दोटूक शब्दों में कहा तो वह जैसे तिलमिला उठी.

“पिछले 6 महीने से मुझे शादी के हसीन सपने दिखा कर और बिना शादी किए साथ रह कर अब कह रहे हो कि तलाक नहीं ले सकता… अपनी पत्नी से इतना ही प्यार था तो 2 साल से उस की खैरखबर क्यों न ली? मेरे सपनों…”

मैं अपराधी तो दीप्ति का भी था और जो अन्याय उस के साथ हुआ था उस के बदले मुझे कोसने और गालियां देने तक का उसे पूरा अधिकार था. वह दे भी रही थी और जाने कितनी देर तक देती. लेकिन मैं उस की बातों को सुनने के लिए वहां न रुका. पूनम की फिक्र जो सता रही थी. मैं वापस लौट चला.

गाड़ी ड्राइव करते हुए मेरी जिंदगी के बीते 10 साल चलचित्र की तरह दिमाग में घूम रहे थे. पूनम से मिलने का वह सुखद संयोग. जब एक दिन शहर में आई बाढ़ के चलते मुझे बिलकुल अनजान होने के बावजूद उन के घर पनाह लेनी पड़ी थी. मैं उस की सादगी और खूबसूरती पर फिदा हो गया था. फिर शादी के बाद का उस का वह सरल व्यवहार जो उस की खूबसूरती के साथसाथ मुझे दिखाई देना बंद हो गया था.

काश कि जिंदगी का कोई रिवाइंड बटन होता और मुझे उन कुछ सालों को दोबारा जीने का मौका मिलता जब मैं ने पूनम की तरफ से मुंह फेर लिया था. सब एहसास और कर्तव्यबोध लौट आए थे लेकिन अब देर हो चुकी थी.

लग रहा था कि पूनम को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए था. आज तो सफर भी जैसे बहुत लंबा हो गया था. आखिरकार घर पहुंचा तो गाड़ी खङी कर के जल्दी से बाहर निकल कर लगभग दौड़ते हुए घर में घुसा.

वह किचन में नहीं थी. हालांकि खाना वह बना चुकी थी जोकि किचन के रैक पर रखा था. बाथरूम में भी नहीं. घर सुनसान था जैसे वह यहां हो ही नहीं. आगे बढ़ कर मैं ने बैडरूम में कदम रखा. वह बैड पर पड़ी थी. शांत और निश्चल. उस के करीब कुछ डाक्टरी रिपोर्ट ओर दवा की परची भी बिखरे हुए थे. पहली नजर में कोई भी देखता तो कहता कि थक कर सो रही है वह. मगर मैं जानता था कि पिछले 10 सालों में इस वक्त सोना उस का शगल बिलकुल नहीं था.

अज्ञात भावना के चलते मुझे अपनी टांगे कांपती प्रतीत हुईं. शरीर से किसी ने जैसे खून निचोड़ लिया हो.आगे बढ़ कर उस का हाथ थामा. बर्फ की तरह सर्द था और नब्ज गायब. वह मर चुकी थी. मैं उस की बगल में लेट कर फूटफूट कर रोने लगा. रोतेबिलखते स्वाभाविक रूप से वहां पड़ी डाक्टरी रिपोर्ट पर नजर पड़ी, जिस में साफ लिखा था कि वह एक अरसे से कैंसर से पीड़ित थी.

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Writer- धीरज राणा भायला

मैं अपने ही शहर में होने के बावजूद 1 माह बाद अपने घर में दाखिल हुआ था. पूरे 30 दिन मैं ने दीप्ति के साथ लिवइन में उस के छोटे से घर में बिताया था. इस 1 महीने मैं बेहद खुश रहा था जैसे मन की मुराद पूरी हो गई हो. दीप्ति औफिस में मेरी कुलीग थी. हालांकि उस की उम्र मुझ से 5 साल कम थी मगर वह इतनी खूबसूरत थी कि मैं उस से प्रेम करने लगा था और 1 हफ्ते के मुख्तसर से वक्त में हम ने साथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं. यह अलग बात है कि शादी होने से पहले ही लिवइन में एकदूसरे के साथ रहने का हमारा यह फैसला जिहादी था.

शादी में एकमात्र और गंभीर समस्या मेरी पहली पत्नी पूनम थी, जिस से मैं ने 10 साल पहले ठीक इसी तरह से प्रेमविवाह किया था और 1 साल बाद ही मुझे वह औरत इतनी बोर लगने लगी थी कि मैं ने उस की तरफ ध्यान देना ही छोड़ दिया था. अगले 9 सालों तक हमारे बीच रिश्ते कुछ ऐसे रहे जैसे किसी मजबूरी के तहत 2 यात्री किसी 1 ही सीट पर यात्रा करने को विवश हों.

आज घर लौटने के पीछे दीप्ति का आग्रह बड़ी वजह थी. उस ने कहा था कि लिवइन में रहने से अच्छा है कि मैं जा कर पत्नी से तलाक की बात करूं और जैसे भी हो उसे राजी करूं. मुझे विश्वास नहीं था कि तलाक की बात पर वह राजी होगी. आखिर हमारा 8 साल का बेटा वह सूत्र था जिस की वजह से वह मुझ से आज तक बंधी हुई थी और मुझे लगता था कि यह बंधन अब मजबूत होता जा रहा था. बावजूद इस के कि पत्नी का मेरे जीवन मे कोई महत्त्व शेष न था.

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घर में दाखिल होते ही उस ने मुझे पानी का गिलास दिया और कुछ पलों बाद चाय बना कर ले लाई. चाय पीते हुए तलाक का जिक्र करना मुझे जल्दबाजी लगी इसलिए मैं ने रात होने तक इंतजार करने का फैसला किया.

वह मेरे आने से शायद बहुत खुश हुई थी. हालांकि उस की खुशी कभी चेहरे पर दिखाई नहीं देती थी. उस के काम से उस के खुश होने का एहसास करने की मुझे आदत सी हो गई थी.आज उस ने खाना मेरी पसंद का बनाया था. मैं सोफे पर बैठा मोबाइल पर गेम खेल रहा था जब उस ने बिन कहे खाना ला कर वहीं परोस दिया.

“तुम से कुछ जरूरी बात करनी थी, 2 मिनट पास बैठो,” वह खाना दे कर जाने लगी तो मैं ने कहा. वह बिना कुछ कहे बगल वाली कुरसी पर बैठ गई. यह दिखाने के लिए कि हालात सामान्य थे मैं इत्मिनान से खाना खाने लगा.

“पिछले 10 सालों से हमारे बीच कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा है. हम एकदूसरे के साथ जबरन बंधे से हैं. मैं चाहता हूं कि हम तलाक ले कर एकदूसरे से आजाद हो जाएं. तुम्हारा क्या विचार है,” बहुत हिम्मत कर के एक सांस में मैं ने दिल की बात कह दी. फिर उस के हावभाव को जांचने के लिए उस के चेहरे की ओर देखा. ऐसा लगा जैसे वह किसी गंभीर बीमारी से जूझ रही हो.

चेहरे पर फीकी सी हंसी ला कर उस ने मेरी आंखों से आंखें मिलाईं तो उन आंखों में भी मुझे दूर तक एक सूनापन नजर आया, जिसे देख कर एक पल के लिए दिमाग सन्न रह गया. फिर अगले ही पल दीप्ति का खयाल आते ही जैसे सब भूल बैठा.

“आप की खुशी से बड़ी मेरे लिए कोई बात भला क्या हो सकती है? अगर इसी में आप की खुशी है तो यही सही,” कहते हुए उस का चेहरा उदास हो गया.

“तो फिर मैं वकील से बात कर लेता हूं ताकि वे जरूरी कागजात तैयार कर सकें. संभव है कि 20 दिनों में हम आजाद होंगे.”

“मगर मेरी एक छोटी सी शर्त है…”

“क्या चाहिए तुम्हें?” मुझे लगा कि जैसा मैं समझ रहा था उतनी आसानी से मामला हल न होगा.

“मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. मैं तो बस इतना चाहती हूं कि जब तक तलाक नहीं हो जाता हम उसी तरह साथ रहें जैसे शादी के पहले 20 दिनों में रहे थे. यह मेरी आखिरी इच्छा है.”

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“आखिरी इच्छा?”

“तलाक के बाद तो आप के लिए मैं मर ही जाऊंगी न,” उस ने कहा तो उस का खूबसरत चेहरा सिकुड़ सा गया. बहुत कुछ बदलीबदली सी.

मैं मन ही मन खुश हुआ कि मांगा भी तो क्या, बस 20 दिन. इतने दिनों को तो जेल की सजा समझ कर भी काट सकता था.

फोन कर के औफिस से मैं ने 10 दिनों की छुट्टी ली. फिर दीप्ति को भी फोन पर खुशखबरी सुनाने के साथ ही वकील से बात करने को कह दिया. अब मैं फिल्म के एक पात्र की तरह अभिनय करने के लिए तैयार था.

अभिनय को सशक्त और वास्तविक बनाने के लिए कभी रसोई में काम करती पत्नी को पीछे से बांहों में भर लेता, कभी उसे बांहों में उठा कर बैडरूम में ले आता. वह बरतन साफ कर रही होती तो मैं झाड़ू लगाने लग जाता. वह आटा गूंध रही होती तो सामने बैठ कर अपलक निहारता रहता.

इन सब क्रियाओं के बाद भी लगता कि उस के भीतर कुछ टूट रहा था.जैसे जीने की उमंग मर रही थी. 3 दिनों में ही मुझे एहसास होने लगा था कि अब खुशी और गम के उस के लिए वे मायने नहीं रह गए थे जो तब थे जब हम ने शादी की थी.

एक दिन सुबह वह उठने लगी तो पैरों पर खड़े होते ही ऐसे लड़खड़ाई कि बैड का किनारा हाथ में न आया होता तो गिर गई होती. हालांकि मैं उस के साथ सो भी रहा था मगर मात्र अभिनय के बतौर. वह लड़खड़ाई तो मेरा अभिनय भी जैसे लड़खड़ाया था.

“तुम ठीक हो पूनम?” हालचाल पूछने की बिलकुल नीयत न होने के बावजूद नितांत अपनेपन से दिल की आवाज निकली.

“हां, मैं बिलकुल ठीक हूं. बस, नींद पूरी तरह खुली नहीं थी इसलिए लड़खड़ा गई थी,” फिर कुछ याद करते हुए उस ने पूछा,”वकील से बात हो गई?”

“हां, फोन कर दिया था उसे.”

“आप वकील न ही करते. बेवजह पैसे खर्च होंगे आप के. अगर मैं वैसे ही छोड़ कर चली जाऊं तो?”

मैं जैसे सिहर उठा. जाने क्यों मुझे लगा कि उस के कहने का आशय वह नहीं था जो मैं समझ रहा था. उस ने 20 दिन साथ रहने की शर्त रखते हुए भी क्यों कहा था कि यह मेरी आखिरी इच्छा है?

उस रोज वह दिनभर काम में लगी रही और मैं उस की बातों को मन ही मन दिमाग मे तौलता रहा. दोपहर को उस ने खाना लगाया तो मैं ने साथ बैठ कर खाने का आग्रह किया. अब मेरी अभिनय कला जवाब दे रही थी. मैं ने एक निवाला अपने हाथ से उस के मुंह में रखा. हम ने ठीक शादी के पहले दिनों की तरह एकदूसरे को खाना खिलाया. खाना खत्म कर के वह बरतन ले जाने लगी तो मैं ने उसे रोक दिया,”राहुल को होस्टल से बुला लूं? 2-4 दिन साथ रह लेगा.”

“क्या जरूरत है? फोन पर बात तो हो ही जाती है.”

“डाक्टर के पास चलें?”

उस ने सूनी आंखों से मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैं ने उस की किसी दुखती रग को छेड़ दिया हो.

“नहीं, मैं तो बिलकुल ठीक हूं,” इतना कह कर वह चली गई. मैं भी उस के पीछे किचन में आ गया. उस ने बरतन सिंक में डाल दिए तो मैं ने उसे प्यार से बांहों में उठा लिया. इस हरकत को मैं रोज करता आ रहा था लेकिन वह अभिनय था. आज कुछ अपनेपन और प्यार से उठाया तो एहसास हुआ कि उस का वजन भी बहुत कम हो गया था. उसे बांहों में उठाए ला कर बैडरूम में बैड पर लिटा दिया. मैं ने आज 10 साल बाद उसे उसी तरह भरपूर प्यार किया जैसे शादी के पहले दिन किया था. मगर आज जैसे उस के लिए चीजें बेमानी थीं. सारे अरमान मर गए थे जैसे. अब 2 दिन शेष थे लेकिन मेरा मन कह रहा था कि उसे उस के हाल पर छोड़ कर बहुत बड़ा अन्याय कर रहा था मैं.

ये भी पढ़ें- कोई उचित रास्ता: क्या अपनी गृहस्थी संभाल पाई स्वार्थी रज्जी?

रोज की तरह शाम 3 बजे दीप्ति का फोन आया. उस ने खबर दी कि सब कागज तैयार हैं, बस एक बार पूनम को कोर्ट आ कर हस्ताक्षर करने होंगे.वार्तालाप के दौरान मैं बस हांहूं करता रहा क्योंकि दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था.

मेरा दिल गवाही दे रहा था कि पूनम की हालत को नजरअंदाज कर के मैं ने बहुत बड़ी गलती कर दी थी. इस बात को जितना सोचता बेचैनी बढ़ती जाती. हालत यह हो गई कि 1-1 पल बहुत भारी गुजरने लगा. कल हमारे करार का आखिरी दिन भी था लेकिन कल तक इंतजार करना असंभव लगा.

“किसी से बहुत जरूरी बात करनी है.लौट कर डाक्टर के पास चलेंगे, तब तक तैयार हो जाओ और हां, आज कोई बहाना नहीं चलेगा,” मैं ने कहा तो रोज की तरह उस ने प्रतिरोध नहीं किया, शायद इसलिए कि आज मेरे लहजे में उसे अपनेपन का एहसास हुआ था.

“कल तो हमारा करार खत्म हो ही रहा है. क्यों नया पेंच फंसा रहे हो?”

कोई जवाब दिए बिना मैं गाड़ी में सवार हुआ और दीप्ति के पास पहुंच गया.

“मैं पूनम को नहीं छोड़ सकता. उसे मेरी जरूरत है,” मैं ने दोटूक शब्दों में कहा तो वह जैसे तिलमिला उठी.

“पिछले 6 महीने से मुझे शादी के हसीन सपने दिखा कर और बिना शादी किए साथ रह कर अब कह रहे हो कि तलाक नहीं ले सकता… अपनी पत्नी से इतना ही प्यार था तो 2 साल से उस की खैरखबर क्यों न ली? मेरे सपनों…”

मैं अपराधी तो दीप्ति का भी था और जो अन्याय उस के साथ हुआ था उस के बदले मुझे कोसने और गालियां देने तक का उसे पूरा अधिकार था. वह दे भी रही थी और जाने कितनी देर तक देती. लेकिन मैं उस की बातों को सुनने के लिए वहां न रुका. पूनम की फिक्र जो सता रही थी. मैं वापस लौट चला.

गाड़ी ड्राइव करते हुए मेरी जिंदगी के बीते 10 साल चलचित्र की तरह दिमाग में घूम रहे थे. पूनम से मिलने का वह सुखद संयोग. जब एक दिन शहर में आई बाढ़ के चलते मुझे बिलकुल अनजान होने के बावजूद उन के घर पनाह लेनी पड़ी थी. मैं उस की सादगी और खूबसूरती पर फिदा हो गया था. फिर शादी के बाद का उस का वह सरल व्यवहार जो उस की खूबसूरती के साथसाथ मुझे दिखाई देना बंद हो गया था.

काश कि जिंदगी का कोई रिवाइंड बटन होता और मुझे उन कुछ सालों को दोबारा जीने का मौका मिलता जब मैं ने पूनम की तरफ से मुंह फेर लिया था. सब एहसास और कर्तव्यबोध लौट आए थे लेकिन अब देर हो चुकी थी.

लग रहा था कि पूनम को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए था. आज तो सफर भी जैसे बहुत लंबा हो गया था. आखिरकार घर पहुंचा तो गाड़ी खङी कर के जल्दी से बाहर निकल कर लगभग दौड़ते हुए घर में घुसा.

वह किचन में नहीं थी. हालांकि खाना वह बना चुकी थी जोकि किचन के रैक पर रखा था. बाथरूम में भी नहीं. घर सुनसान था जैसे वह यहां हो ही नहीं. आगे बढ़ कर मैं ने बैडरूम में कदम रखा. वह बैड पर पड़ी थी. शांत और निश्चल. उस के करीब कुछ डाक्टरी रिपोर्ट ओर दवा की परची भी बिखरे हुए थे. पहली नजर में कोई भी देखता तो कहता कि थक कर सो रही है वह. मगर मैं जानता था कि पिछले 10 सालों में इस वक्त सोना उस का शगल बिलकुल नहीं था.

अज्ञात भावना के चलते मुझे अपनी टांगे कांपती प्रतीत हुईं. शरीर से किसी ने जैसे खून निचोड़ लिया हो.आगे बढ़ कर उस का हाथ थामा. बर्फ की तरह सर्द था और नब्ज गायब. वह मर चुकी थी. मैं उस की बगल में लेट कर फूटफूट कर रोने लगा. रोतेबिलखते स्वाभाविक रूप से वहां पड़ी डाक्टरी रिपोर्ट पर नजर पड़ी, जिस में साफ लिखा था कि वह एक अरसे से कैंसर से पीड़ित थी.

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February 26, 2022 at 09:01AM

Friday, 25 February 2022

अपने पैर कुल्हाड़ी- भाग 1: मोहिनी अपने पति से क्यों नाराज थी

“तुम्हारे लिए शुभ समाचार है शिप्रा पटेल,” मोहिनी बड़ी अदा से मुसकराई मानो शिप्रा पर कोई उपकार कर रही हो.

‘‘शुभ समाचार… वह भी तुम्हारे मुंह से? चलो, सुना ही डालो,’’ शिप्रा व्यंग्य भरे लहजे में बोली.

‘‘तुम्हारे प्यारे आशीष गुर्जर को मैं ने तुम्हारे लिए छोड़ दिया है. अब तुम साथ जीनेमरने के अपने वादे पूरे कर सकते हो,’’ मोहिनी पर्स से दर्पण निकाल कर अपनी छवि निहारते हुए बोली.

‘‘मेरी चिंता तुम ना ही करो तो अच्छा है. पर, बेचारे आशीष को क्यों छोड़ आई? कोई मिल गया क्या?’’

‘‘तुम्हें नहीं पता क्या? मेरा विवाह दिल्ली के प्रसिद्ध व्यावसायिक घराने में तय हो गया है. आशीष बहुत रोयागिड़गिड़ाया, कहने लगा कि मैं ने उसे छोड़ दिया तो आत्महत्या कर लेगा. उस ने क्या सोचा था? मैं उस से विवाह करूंगी? मैं ने ही उसे समझाया कि वैसे तो शिप्रा अब तक तुम्हारी बाट जोह रही है. और फिर जाति के बाहर शादी करने पर होहल्ला बेकार ही हो, इसलिए यह संबंध यहीं खत्म करना होगा. पर वह मूर्ख कुछ सुनने को तैयार ही नहीं है.’’

‘‘तुम से किस ने कहा कि मैं आशीष की बाट जोह रही हूं. तुम होती कौन हो मेरे संबंध में इस तरह की बात करने वाली?” शिप्रा कोध में आ गई.

‘‘पर, यों कहो कि तुम्हारी ऊंची जाति की अकड़ अब बीच में आ गई है. हम पिछड़ी जाति वालों को तो तुम वैसे ही पीठ पीछे बुराभला कहते रहते हो.’’

‘‘लो और सुनो, मैं तुम्हारी सब से प्यारी सहेली हूं, अब क्या यह भी याद दिलाना पड़ेगा?’ क्या जाति की बात मैं ने कभी की थी?”

ये भी पढ़ें- प्यार नहीं पागलपन: लावण्य से मुलाकात के बाद अशोक के साथ क्या हुआ?

‘‘सहेली हो नहीं, थी कभी. तुम्हारे जैसे मित्र हों तो शत्रु की क्या आवश्यकता है? एकसाथ एक ही कक्षा में पढ़ने के कारण तुम से हंसबोल लेती हूं तो इस का यह मतलब तो नहीं कि तुम अब भी मेरी प्रिय सहेली हो. सच पूछो, तो तुम ने और आशीष ने मेरे साथ जो किया, उस के बाद से मेरा मित्रता और प्रेम जैसे शब्दों से विश्वास ही उठ गया है. हम एक समाज से आते थे, इसलिए घुलमिल रहे थेे पर तुम ने तो उसे भी खट्टा कर दिया,’’ आक्रोश से शिप्रा का स्वर भर्रा गया और आंखें ड़बड़बा गईं.

‘‘यों दिल छोटा नहीं करते. इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं होता. वैसे भी तुम मानो ना मानो मैं तो तुम्हें अब भी अपनी सब से प्रिय सहेली मानती हूं.’’

‘‘अपने विचार मुबारक हो तुम्हें, पर मैं स्थायी संबंधों की तलाश में हूं. वैसे, एक शुभ सूचना तुम्हें मैं भी दे दूं कि मैं आशीष की बाट नहीं जोह रही. मैं ने अपने मातापिता द्वारा चुने वर से विवाह करने का निर्णय किया है,’’ शिप्रा ने बात समाप्त की.

‘‘तुम तो बड़ी छुपी रुस्तम निकली? बताया तक नहीं कि विवाह कर रही हो?’’

‘‘ऐसा कुछ बताने को है भी नहीं, मैं तो अपने जैसे हमारी ही जाति के मध्यमवर्गीय परिवार के युवक से विवाह कर रही हूं. वह न तो तुम्हारे वर की भांति बड़े ऊंची जाति वाले घराने का है और ना ही लाखों में एक. वह तो मेरे जैसे साधारण रूपरंग वाला युवक है और इतना कमा लेता है कि हम दोनों आराम से रह सकें. सच पूछो तो उस के व्यवहार में बड़बोलापन कहीं नजर नहीं आया. बातबात पर हंसना और हंसाना. अब तक केवल दो बार मिली हूं उस से. पर न जाने कैसा जादू कर दिया है उस ने कि फोन पर घंटों व्हाट्सएप चैट कर के भी मन तृप्त नही.’’

‘‘यह तो बड़ा ही शुभ समाचार है. कुछ ही दिनों में परीक्षा समाप्त हो जाएंगी और हम दोनों बिछुड़ जाएंगे, पर अपने विवाह में बुलाना मत भूल जाना. आशीष को मारो गोली, उसे कोई और मिल जाएगी.’’

शिप्रा का रुख देख कर मोहिनी ने बात बदल दी थी.

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शिप्रा दूर तक मोहिनी को जाते हुए देखती रही थी. दोनों की घनिष्ठ मित्रता की चर्चा कालेज भर में थी. दोनों ही एक जिस्म एक जान थीं. लोगों को आश्चर्य होता था कि अलग जातियों के होते हुए भी इन की कैसे चल रही है. पर जब मोहिनी आशीष को ही ले उड़ी थी तो शिप्रा को संभालने में लंबा समय लगा था. उसे सारा संसार स्वार्थी और अर्थहीन लगने लगा था. आज वही मोहिनी उस के लिए आकाश को छोड़ने की बात कर रही थी मानो वह कोई कठपुतली हो, जिसे मोहिनी अपनी उंगलियों पर नचा सके. फिर उस ने एक झटके से इस विचार को झटक दिया था. परीक्षा सिर पर थी और वह मोहिनीआशीष प्रकरण में उलझ कर अपना भविष्य दांव पर नहीं लगा सकती.

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“तुम्हारे लिए शुभ समाचार है शिप्रा पटेल,” मोहिनी बड़ी अदा से मुसकराई मानो शिप्रा पर कोई उपकार कर रही हो.

‘‘शुभ समाचार… वह भी तुम्हारे मुंह से? चलो, सुना ही डालो,’’ शिप्रा व्यंग्य भरे लहजे में बोली.

‘‘तुम्हारे प्यारे आशीष गुर्जर को मैं ने तुम्हारे लिए छोड़ दिया है. अब तुम साथ जीनेमरने के अपने वादे पूरे कर सकते हो,’’ मोहिनी पर्स से दर्पण निकाल कर अपनी छवि निहारते हुए बोली.

‘‘मेरी चिंता तुम ना ही करो तो अच्छा है. पर, बेचारे आशीष को क्यों छोड़ आई? कोई मिल गया क्या?’’

‘‘तुम्हें नहीं पता क्या? मेरा विवाह दिल्ली के प्रसिद्ध व्यावसायिक घराने में तय हो गया है. आशीष बहुत रोयागिड़गिड़ाया, कहने लगा कि मैं ने उसे छोड़ दिया तो आत्महत्या कर लेगा. उस ने क्या सोचा था? मैं उस से विवाह करूंगी? मैं ने ही उसे समझाया कि वैसे तो शिप्रा अब तक तुम्हारी बाट जोह रही है. और फिर जाति के बाहर शादी करने पर होहल्ला बेकार ही हो, इसलिए यह संबंध यहीं खत्म करना होगा. पर वह मूर्ख कुछ सुनने को तैयार ही नहीं है.’’

‘‘तुम से किस ने कहा कि मैं आशीष की बाट जोह रही हूं. तुम होती कौन हो मेरे संबंध में इस तरह की बात करने वाली?” शिप्रा कोध में आ गई.

‘‘पर, यों कहो कि तुम्हारी ऊंची जाति की अकड़ अब बीच में आ गई है. हम पिछड़ी जाति वालों को तो तुम वैसे ही पीठ पीछे बुराभला कहते रहते हो.’’

‘‘लो और सुनो, मैं तुम्हारी सब से प्यारी सहेली हूं, अब क्या यह भी याद दिलाना पड़ेगा?’ क्या जाति की बात मैं ने कभी की थी?”

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‘‘सहेली हो नहीं, थी कभी. तुम्हारे जैसे मित्र हों तो शत्रु की क्या आवश्यकता है? एकसाथ एक ही कक्षा में पढ़ने के कारण तुम से हंसबोल लेती हूं तो इस का यह मतलब तो नहीं कि तुम अब भी मेरी प्रिय सहेली हो. सच पूछो, तो तुम ने और आशीष ने मेरे साथ जो किया, उस के बाद से मेरा मित्रता और प्रेम जैसे शब्दों से विश्वास ही उठ गया है. हम एक समाज से आते थे, इसलिए घुलमिल रहे थेे पर तुम ने तो उसे भी खट्टा कर दिया,’’ आक्रोश से शिप्रा का स्वर भर्रा गया और आंखें ड़बड़बा गईं.

‘‘यों दिल छोटा नहीं करते. इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं होता. वैसे भी तुम मानो ना मानो मैं तो तुम्हें अब भी अपनी सब से प्रिय सहेली मानती हूं.’’

‘‘अपने विचार मुबारक हो तुम्हें, पर मैं स्थायी संबंधों की तलाश में हूं. वैसे, एक शुभ सूचना तुम्हें मैं भी दे दूं कि मैं आशीष की बाट नहीं जोह रही. मैं ने अपने मातापिता द्वारा चुने वर से विवाह करने का निर्णय किया है,’’ शिप्रा ने बात समाप्त की.

‘‘तुम तो बड़ी छुपी रुस्तम निकली? बताया तक नहीं कि विवाह कर रही हो?’’

‘‘ऐसा कुछ बताने को है भी नहीं, मैं तो अपने जैसे हमारी ही जाति के मध्यमवर्गीय परिवार के युवक से विवाह कर रही हूं. वह न तो तुम्हारे वर की भांति बड़े ऊंची जाति वाले घराने का है और ना ही लाखों में एक. वह तो मेरे जैसे साधारण रूपरंग वाला युवक है और इतना कमा लेता है कि हम दोनों आराम से रह सकें. सच पूछो तो उस के व्यवहार में बड़बोलापन कहीं नजर नहीं आया. बातबात पर हंसना और हंसाना. अब तक केवल दो बार मिली हूं उस से. पर न जाने कैसा जादू कर दिया है उस ने कि फोन पर घंटों व्हाट्सएप चैट कर के भी मन तृप्त नही.’’

‘‘यह तो बड़ा ही शुभ समाचार है. कुछ ही दिनों में परीक्षा समाप्त हो जाएंगी और हम दोनों बिछुड़ जाएंगे, पर अपने विवाह में बुलाना मत भूल जाना. आशीष को मारो गोली, उसे कोई और मिल जाएगी.’’

शिप्रा का रुख देख कर मोहिनी ने बात बदल दी थी.

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शिप्रा दूर तक मोहिनी को जाते हुए देखती रही थी. दोनों की घनिष्ठ मित्रता की चर्चा कालेज भर में थी. दोनों ही एक जिस्म एक जान थीं. लोगों को आश्चर्य होता था कि अलग जातियों के होते हुए भी इन की कैसे चल रही है. पर जब मोहिनी आशीष को ही ले उड़ी थी तो शिप्रा को संभालने में लंबा समय लगा था. उसे सारा संसार स्वार्थी और अर्थहीन लगने लगा था. आज वही मोहिनी उस के लिए आकाश को छोड़ने की बात कर रही थी मानो वह कोई कठपुतली हो, जिसे मोहिनी अपनी उंगलियों पर नचा सके. फिर उस ने एक झटके से इस विचार को झटक दिया था. परीक्षा सिर पर थी और वह मोहिनीआशीष प्रकरण में उलझ कर अपना भविष्य दांव पर नहीं लगा सकती.

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February 26, 2022 at 09:00AM

आखिर क्यों: अंधभक्ति के कारण बर्बाद हुई रोली की जिंदगी

Writer- Ritu Verma

रोली बहुत देर तक अपनी मम्मी की बात पर विचार करती रही. कुछ गलत तो नहीं कह रही थी उस की मम्मी. परंतु रोली को अच्छे से पता था कि शिखर और उस के मातापिता रोली की बात को पूरी तरह से नकार देंगे. तभी बाहर ड्राइंगरूम में शिखर ने न्यूज लगा दी. चारों तरफ कोरोना का कहर मचा हुआ था. हर तरफ मृत्यु और बेबसी का ही नजारा था, तभी पापाजी चिंतित से बाहर निकले और शिखर से बोले, ‘‘वरुण को कंपनी ने 2 महीने का नोटिस दे दिया है.‘‘

वरुण शिखर की बहन का पति था. शिखर बोला, ‘‘पापा, चिंता मत कीजिए, वरुण टैलेंटेड लड़का है. कुछ न कुछ हो जाएगा, मैं 1-2 जगह बात कर के देखता हूं.‘‘

रोली रसोई में चाय बनाते हुए सोच रही थी, ‘आज वरुण हैं तो कल शिखर भी हो सकता है,’ चाय बनातेबनाते रोली ने दृढ़ निश्चय ले लिया था.

जब सभी लोग चाय की चुसकियां ले रहे थे, तो रोली बोली, ‘‘अगले हफ्ते मेरठ वाले गुरुजी यहीं पर आ रहे हैं. मैं चाहती हूं कि हम भी अपने घर पर यज्ञ करवाएं.

‘‘यज्ञ करवाने के पश्चात न केवल हमारा परिवार कोरोना के संकट से बचा रहेगा, बल्कि शिखर की नौकरी पर भी कोई आंच नहीं आएगी.‘‘

‘‘बस 50,000 रुपए का खर्च है, पर ये कोरोना पर होने वाले खर्च से तो बहुत सस्ता है शिखर.”

रोली की सास अपनी पढ़ीलिखी बहू के मुंह से ये बात सुन कर हक्कीबक्की रह गईं और बोलीं, ‘‘रोली, ये तुम क्या कह रही हो? चारों तरफ कोरोना का कहर है और तुम ऐसे में घर में यज्ञ करवाना चाहती हो?‘‘

रोली तुनकते हुए बोली, ‘‘हां मम्मीजी, आप को तो मेरी सब चीजों से दिक्कत है.’‘

‘‘आप खुद जपतप करें सब ठीक, पर अगर मैं परिवार की भलाई के लिए कुछ करवाना चाहूं तो आप को उस में भी दिक्कत है.‘‘

रोली के ससुर बोले, ‘‘रोली बेटा, ऐसी बात नहीं है, पर ये संभव नहीं है.

‘‘तुम्हें तो मालूम ही है कि हम ऐसे भीड़ इकट्ठी नहीं कर सकते हैं.‘‘

शिखर उठते हुए बोला, ‘‘रोली, मेरे पास ऐसे यज्ञपूजन पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं और शायद हम अब कोरोना से बच भी जाएं, परंतु उस यज्ञ के कारण हमारा पूरा परिवार जरूर कोरोना के कारण स्वाहा हो जाएगा.‘‘

रोली गुस्से में पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई. रात के 8 बज गए, लेकिन रसोई में सन्नाटा था. शिखर कमरे में गया और प्यार से बोला, ‘‘रोली गुस्सा थूक दो, आज खाना नहीं खिलाओगी क्या?‘‘

रोली चिल्लाते हुए बोली, ‘‘क्यों नौकरानी हूं तुम्हारी और तुम्हारे मम्मीपापा की?‘‘

‘‘अपनी इच्छा से मैं घर में एक काम भी नहीं कर सकती, पर जब काम की बारी आती है तो बस वह ही याद आती है.’‘

शिखर रोली को प्यार से समझाता रहा, परंतु वह टस से मस नहीं हुई.

शिखर और उस के मम्मीपापा की सारी कोशिशें बेकार हो गई थीं. रोली की आंखों पर गुरुजी के नाम की ऐसी पट्टी बंधी थी कि वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी.

रोली के मन में कोरोना का डर इस कदर हावी था कि वह किसी भी तरह कोरोना के पंजे से बचना चाहती थी.

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रोली की मम्मी उसे रोज फोन पर बताती कि कैसे गुरुजी ने अपने तप से रोली के मायके में पूरे परिवार को कोरोना से पूरी तरह सुरक्षित कर रखा है.

रोली की मम्मी यह भी
बोलतीं, ‘‘अरे, हम लोग न तो मास्क लगाते हैं और न ही सेनेटाइजर का प्रयोग करते हैं. बस गुरुजी की भभूति लगा लेते हैं.‘‘

‘‘सारी कंपनियों में छंटनी और वेतन में कटौती हो रही है, पर तेरे छोटे भाई का तो गुरुजी के कारण ऐसे संकट काल में भी प्रमोशन हो गया है.‘‘

आज गुरुजी रोली के शहर देहरादून आ गए थे. रोली को पता था कि शिखर गुरुजी का यज्ञ घर पर कभी नहीं कराएगा और न ही कभी पैसे देगा.

रोली ने गुरुजी के मैनेजर से फोन पर बात की, तो उन्होंने कहा, ‘‘आप यहीं पर आ जाएं. तकरीबन 500 भक्त और भी हैं. गुरुजी के भक्तों ने ही गुरुद्वारा रोड पर एक हाल किराए पर ले लिया है…

‘‘आप बेझिझक यहां चली आएं,‘‘ गुरुजी के मैनेजर ने कहा.

रोली मन ही मन खुश थी, परंतु 50,000 रुपयों का इंतजाम कैसे करे? वह यही सोच रही थी, तभी रोली को ध्यान आया कि क्यों न वह अपने मायके से मिला हुआ सेट इस अच्छे काम के लिए दान कर दे.

सुबह काम करने के बाद रोली तैयार हो गई और शिखर और उस के मम्मीपापा से बोली, ‘‘मैं 2 दिन के लिए गुरुजी के शिविर में जा रही हूं.‘‘

‘‘मैं ने पैसों का बंदोबस्त कर लिया है. परिवार की खुशहाली के लिए यज्ञ कर के मैं परसों तक लौट आऊंगी.‘‘

शिखर की मम्मी बोलीं, ‘‘रोली, होश में तो हो ना…‘‘

‘‘हम तुम्हें कहीं नहीं जाने देंगे. तुम्हें मालूम है ना कि ये महामारी है और इस का वायरस बड़ी तेजी से फैलता है.‘‘

रोली गुस्से में बोली, ‘‘आप भी भूल रही हैं मम्मी कि मैं एक बालिग हूं. आप को शायद मालूम नहीं है कि जिस तरह का व्यवहार आप मेरे साथ कर रही हैं, वो घरेलू हिंसा के दायरे में आता है. यह एक तरह की मानसिक और भावनात्मक हिंसा है.‘‘

शिखर ने अपने मम्मीपापा से कहा, ‘‘जब रोली ने कुएं में छलांग लगाने का निर्णय ले ही लिया है, तो आप उसे रोकिए मत.‘‘

शिखर बिना कुछ बोले रोली को उस हाल के गेट तक छोड़ आया. हाल के गेट पर भीड़ देख शिखर ने रोली से कहा, ‘‘रोली, एक बार और सोच लो.‘‘

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रोली मुसकराते हुए बोली, ‘‘मैं तो गुरुजी को घर पर बुलाना चाहती थी, पर तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की जिद के कारण मैं यहां पर हूं.‘‘

रोली जैसे ही हाल के अंदर पहुंची, बाहर गेट पर खड़े युवकों ने उस का मास्क उतरवा दिया और फिर गंगाजल से उस के हाथ धुलवाए.

अंदर धीमाधीमा संगीत चल रहा था. रोली ने देखा कि तकरीबन 300 लोग वहां थे. हर कोई गुरुजी के आगे सिर झुका कर श्रद्धा के साथ दान कर रहा था.

रोली भी गुरुजी के आगे हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘‘गुरुजी, मेरे पास तो बस ये गहने हैं देने के लिए.‘‘

गुरुजी शांत स्वर में बोले, ‘‘बेटी, दान से अधिक भाव का महत्व है. तुम जो भी पूरी श्रद्धा से भेंट करोगी, वह हमें स्वीकार है.‘‘

सात्विक भोजन, सात्विक माहौल, न कोई महामारी का डर और न ही चिंता. रोली को इतना हलका तो पहले कभी महसूस नहीं हुआ था. उस का गुस्सा भी काफूर हो गया था. अब तो रोली को अपने परिवार की बुद्धि पर तरस आ रहा था कि वो ऐसे अच्छे आनंदमय वातावरण से वंचित रह गए हैं.

पूरा दिन गुरुजी के प्रवचन और यज्ञ में बीत गया था. रात में जब रोली सोने के लिए कमरे में गई तो देखा कि उस छोटे से कमरे में 8 महिलाओं के बिस्तर लगे हुए थे.

रोली पहले तो हिचकिचाई, पर फिर उसे गुरुजी की कही हुई बात याद आई कि कैसे हम ने डरडर कर इस वायरस को अपने ऊपर हावी कर रखा है. ये वायरस मनुष्य को मनुष्य से दूर करना चाहता है. दरअसल, ऐसे पूजाहवन से ही इस महाकाल वायरस का सफाया हो जाएगा. ये ऊपर वाले का इशारा है हम मूर्ख मनुष्यों के लिए कि हम उन की शरण में जाएं. अगर विज्ञान कुछ करने में सक्षम होता, तो क्यों पूरे विश्व मे त्राहित्राहि मची रहती.

ये सब बातें याद आते ही रोली शांत मन से आंखें बंद कर के सो गई. सुबह 6 बजे रोली की आंखें खुलीं तो उसे लगा, जैसे वह रूई की तरह हलकी हो गई है.

गुरुजी को स्मरण कर के रोली ने सब से पहले अपनी मम्मी को फोन लगाया और फिर शिखर को फोन कर अपना हालचाल बताया.

अगला दिन भी भजन, प्रवचन और ध्यान में ऐसे बीत गया कि रोली को पता भी नहीं चला कि कब शाम हो गई. तकरीबन 500 लोग इस पूजा में सम्मलित थे, परंतु न तो कोई आपाधापी थी, न ही कोई घबराहट.

शाम के 7 बजे रोली ने गुरुजी को प्रणाम किया, तो गुरुजी ने उसे भभूति देते हुए कहा, ‘‘बेटी, ये भभूति तुम्हारी हर तरह से रक्षा करेगी.‘‘

जब रोली बाहर निकली तो देखा कि शिखर कार में बैठा उस की प्रतीक्षा कर रहा था.

रोली बिना कोई प्रतिक्रिया किए कार में बैठ गई. घर आ कर भी वह बेहद शांत और संभली हुई लग रही थी. रोली ने किसी से कुछ नहीं कहा और न ही उस के सासससुर ने उस से कुछ पूछा.

अगले रोज सुबहसुबह शिखर ने रोली को खुशखबरी सुनाई कि बहुत दिनों से जिस कंपनी में उस की बात अटकी हुई थी, वहां से बात फाइनल हो गई है. 1 अगस्त को उसे पूना में ज्वाइनिंग के लिए जाना है.

रोली नाचते हुए बोली, ‘‘ये सब गुरुजी की कृपा है.‘‘

शिखर बोला, ‘‘अरे वाह, मेहनत मैं करूं और क्रेडिट तुम्हारे गुरुजी ले जाएं.‘‘

जब से रोली गुरुजी के पास से आई थी, उस ने सावधानी बरतनी छोड़ दी थी. शिखर की नौकरी के कारण रोली का विश्वास और पक्का हो गया था.

और फिर एक हफ्ते बाद रोली को वह खुशखबरी भी मिल गई, जिस का पिछले 5 साल से इंतजार कर रही थी. वह मां बनने वाली थी. घर में ऐसा लग रहा था, चारों ओर खुशियों की बरसात हो रही है. रोली को पक्का विश्वास था कि देरसवेर ही सही, शिखर और उस का परिवार भी गुरुजी की भक्ति में आ जाएगा. पर, जब 5 दिन बाद रोली को बुखार हो गया, तो रोली के सासससुर और शिखर के होश उड़ गए थे. परंतु रोली ने कोई दवा नहीं ली, बल्कि गुरुजी के यहां से लाई भभूति चाट ली.

शिखर ने रोली को टेस्ट कराने के लिए भी कहा, परंतु रोली ने कहा, ‘‘मैं ने गुरुजी से फोन पर बात की थी. मुझे वायरल हुआ है. गुरुजी ने कहा है कि परसों तक सब ठीक हो जाएगा.‘‘

पर, उसी रात अचानक ही रोली को सांस लेने में दिक्कत होने लगी. रोली को महसूस हो रहा था, जैसे पूरे वातावरण में औक्सीजन की कमी हो गई हो.

शिखर रात में ही रोली को ले कर अस्पताल भागा. बहुत मुश्किलों से रोली को किसी तरह अस्पताल में दाखिला मिला. पुलिस ने पूछताछ की, तो एक के बाद एक लगभग 500 लोगों की एक लंबी कोरोना चेन बन गई.

गुरुजी का फोन स्विच औफ आ रहा था. यज्ञ में शामिल हुए परिवारों का जब कोरोना टेस्ट हुआ तो ऐसा लगा, कोरोना बम का विस्फोट हो गया है. जहां पहले शहर में बस गिनती के 50 मामले थे, वे अब सीधे 500 पार कर गए थे.

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रोली शर्म के कारण आंख नहीं उठा पा रही थी. काश, उस ने शिखर और उस के परिवार की बात मान ली होती. रोली को अपने से ज्यादा पेट में पल रहे बच्चे की चिंता हो रही थी. उधर शिखर को रोली के साथसाथ अपने डायबिटिक मातापिता की भी चिंता हो रही थी. शिखर को समझ नहीं आ रहा था कि क्यों रोली की इस अंधभक्ति का नतीजा रोली के साथसाथ पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा. आखिर कब तक हम पढ़ेलिखे लोग भी अपनेआप को इस तरह अंधविश्वास के कुएं में धकेलते रहेंगे? आखिर क्यों हम आज भी हर समस्या का शार्टकट ढूंढ़ते हैं? आखिर क्यों…?

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Writer- Ritu Verma

रोली बहुत देर तक अपनी मम्मी की बात पर विचार करती रही. कुछ गलत तो नहीं कह रही थी उस की मम्मी. परंतु रोली को अच्छे से पता था कि शिखर और उस के मातापिता रोली की बात को पूरी तरह से नकार देंगे. तभी बाहर ड्राइंगरूम में शिखर ने न्यूज लगा दी. चारों तरफ कोरोना का कहर मचा हुआ था. हर तरफ मृत्यु और बेबसी का ही नजारा था, तभी पापाजी चिंतित से बाहर निकले और शिखर से बोले, ‘‘वरुण को कंपनी ने 2 महीने का नोटिस दे दिया है.‘‘

वरुण शिखर की बहन का पति था. शिखर बोला, ‘‘पापा, चिंता मत कीजिए, वरुण टैलेंटेड लड़का है. कुछ न कुछ हो जाएगा, मैं 1-2 जगह बात कर के देखता हूं.‘‘

रोली रसोई में चाय बनाते हुए सोच रही थी, ‘आज वरुण हैं तो कल शिखर भी हो सकता है,’ चाय बनातेबनाते रोली ने दृढ़ निश्चय ले लिया था.

जब सभी लोग चाय की चुसकियां ले रहे थे, तो रोली बोली, ‘‘अगले हफ्ते मेरठ वाले गुरुजी यहीं पर आ रहे हैं. मैं चाहती हूं कि हम भी अपने घर पर यज्ञ करवाएं.

‘‘यज्ञ करवाने के पश्चात न केवल हमारा परिवार कोरोना के संकट से बचा रहेगा, बल्कि शिखर की नौकरी पर भी कोई आंच नहीं आएगी.‘‘

‘‘बस 50,000 रुपए का खर्च है, पर ये कोरोना पर होने वाले खर्च से तो बहुत सस्ता है शिखर.”

रोली की सास अपनी पढ़ीलिखी बहू के मुंह से ये बात सुन कर हक्कीबक्की रह गईं और बोलीं, ‘‘रोली, ये तुम क्या कह रही हो? चारों तरफ कोरोना का कहर है और तुम ऐसे में घर में यज्ञ करवाना चाहती हो?‘‘

रोली तुनकते हुए बोली, ‘‘हां मम्मीजी, आप को तो मेरी सब चीजों से दिक्कत है.’‘

‘‘आप खुद जपतप करें सब ठीक, पर अगर मैं परिवार की भलाई के लिए कुछ करवाना चाहूं तो आप को उस में भी दिक्कत है.‘‘

रोली के ससुर बोले, ‘‘रोली बेटा, ऐसी बात नहीं है, पर ये संभव नहीं है.

‘‘तुम्हें तो मालूम ही है कि हम ऐसे भीड़ इकट्ठी नहीं कर सकते हैं.‘‘

शिखर उठते हुए बोला, ‘‘रोली, मेरे पास ऐसे यज्ञपूजन पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं और शायद हम अब कोरोना से बच भी जाएं, परंतु उस यज्ञ के कारण हमारा पूरा परिवार जरूर कोरोना के कारण स्वाहा हो जाएगा.‘‘

रोली गुस्से में पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई. रात के 8 बज गए, लेकिन रसोई में सन्नाटा था. शिखर कमरे में गया और प्यार से बोला, ‘‘रोली गुस्सा थूक दो, आज खाना नहीं खिलाओगी क्या?‘‘

रोली चिल्लाते हुए बोली, ‘‘क्यों नौकरानी हूं तुम्हारी और तुम्हारे मम्मीपापा की?‘‘

‘‘अपनी इच्छा से मैं घर में एक काम भी नहीं कर सकती, पर जब काम की बारी आती है तो बस वह ही याद आती है.’‘

शिखर रोली को प्यार से समझाता रहा, परंतु वह टस से मस नहीं हुई.

शिखर और उस के मम्मीपापा की सारी कोशिशें बेकार हो गई थीं. रोली की आंखों पर गुरुजी के नाम की ऐसी पट्टी बंधी थी कि वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी.

रोली के मन में कोरोना का डर इस कदर हावी था कि वह किसी भी तरह कोरोना के पंजे से बचना चाहती थी.

ये भी पढ़ें- सांझा दुख: मां के चेहरे पर खामोशी क्यों थी

रोली की मम्मी उसे रोज फोन पर बताती कि कैसे गुरुजी ने अपने तप से रोली के मायके में पूरे परिवार को कोरोना से पूरी तरह सुरक्षित कर रखा है.

रोली की मम्मी यह भी
बोलतीं, ‘‘अरे, हम लोग न तो मास्क लगाते हैं और न ही सेनेटाइजर का प्रयोग करते हैं. बस गुरुजी की भभूति लगा लेते हैं.‘‘

‘‘सारी कंपनियों में छंटनी और वेतन में कटौती हो रही है, पर तेरे छोटे भाई का तो गुरुजी के कारण ऐसे संकट काल में भी प्रमोशन हो गया है.‘‘

आज गुरुजी रोली के शहर देहरादून आ गए थे. रोली को पता था कि शिखर गुरुजी का यज्ञ घर पर कभी नहीं कराएगा और न ही कभी पैसे देगा.

रोली ने गुरुजी के मैनेजर से फोन पर बात की, तो उन्होंने कहा, ‘‘आप यहीं पर आ जाएं. तकरीबन 500 भक्त और भी हैं. गुरुजी के भक्तों ने ही गुरुद्वारा रोड पर एक हाल किराए पर ले लिया है…

‘‘आप बेझिझक यहां चली आएं,‘‘ गुरुजी के मैनेजर ने कहा.

रोली मन ही मन खुश थी, परंतु 50,000 रुपयों का इंतजाम कैसे करे? वह यही सोच रही थी, तभी रोली को ध्यान आया कि क्यों न वह अपने मायके से मिला हुआ सेट इस अच्छे काम के लिए दान कर दे.

सुबह काम करने के बाद रोली तैयार हो गई और शिखर और उस के मम्मीपापा से बोली, ‘‘मैं 2 दिन के लिए गुरुजी के शिविर में जा रही हूं.‘‘

‘‘मैं ने पैसों का बंदोबस्त कर लिया है. परिवार की खुशहाली के लिए यज्ञ कर के मैं परसों तक लौट आऊंगी.‘‘

शिखर की मम्मी बोलीं, ‘‘रोली, होश में तो हो ना…‘‘

‘‘हम तुम्हें कहीं नहीं जाने देंगे. तुम्हें मालूम है ना कि ये महामारी है और इस का वायरस बड़ी तेजी से फैलता है.‘‘

रोली गुस्से में बोली, ‘‘आप भी भूल रही हैं मम्मी कि मैं एक बालिग हूं. आप को शायद मालूम नहीं है कि जिस तरह का व्यवहार आप मेरे साथ कर रही हैं, वो घरेलू हिंसा के दायरे में आता है. यह एक तरह की मानसिक और भावनात्मक हिंसा है.‘‘

शिखर ने अपने मम्मीपापा से कहा, ‘‘जब रोली ने कुएं में छलांग लगाने का निर्णय ले ही लिया है, तो आप उसे रोकिए मत.‘‘

शिखर बिना कुछ बोले रोली को उस हाल के गेट तक छोड़ आया. हाल के गेट पर भीड़ देख शिखर ने रोली से कहा, ‘‘रोली, एक बार और सोच लो.‘‘

ये भी पढ़ें- वो एक लड़की: जिस लड़की से वह बेतहाशा प्यार करती थी

रोली मुसकराते हुए बोली, ‘‘मैं तो गुरुजी को घर पर बुलाना चाहती थी, पर तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की जिद के कारण मैं यहां पर हूं.‘‘

रोली जैसे ही हाल के अंदर पहुंची, बाहर गेट पर खड़े युवकों ने उस का मास्क उतरवा दिया और फिर गंगाजल से उस के हाथ धुलवाए.

अंदर धीमाधीमा संगीत चल रहा था. रोली ने देखा कि तकरीबन 300 लोग वहां थे. हर कोई गुरुजी के आगे सिर झुका कर श्रद्धा के साथ दान कर रहा था.

रोली भी गुरुजी के आगे हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘‘गुरुजी, मेरे पास तो बस ये गहने हैं देने के लिए.‘‘

गुरुजी शांत स्वर में बोले, ‘‘बेटी, दान से अधिक भाव का महत्व है. तुम जो भी पूरी श्रद्धा से भेंट करोगी, वह हमें स्वीकार है.‘‘

सात्विक भोजन, सात्विक माहौल, न कोई महामारी का डर और न ही चिंता. रोली को इतना हलका तो पहले कभी महसूस नहीं हुआ था. उस का गुस्सा भी काफूर हो गया था. अब तो रोली को अपने परिवार की बुद्धि पर तरस आ रहा था कि वो ऐसे अच्छे आनंदमय वातावरण से वंचित रह गए हैं.

पूरा दिन गुरुजी के प्रवचन और यज्ञ में बीत गया था. रात में जब रोली सोने के लिए कमरे में गई तो देखा कि उस छोटे से कमरे में 8 महिलाओं के बिस्तर लगे हुए थे.

रोली पहले तो हिचकिचाई, पर फिर उसे गुरुजी की कही हुई बात याद आई कि कैसे हम ने डरडर कर इस वायरस को अपने ऊपर हावी कर रखा है. ये वायरस मनुष्य को मनुष्य से दूर करना चाहता है. दरअसल, ऐसे पूजाहवन से ही इस महाकाल वायरस का सफाया हो जाएगा. ये ऊपर वाले का इशारा है हम मूर्ख मनुष्यों के लिए कि हम उन की शरण में जाएं. अगर विज्ञान कुछ करने में सक्षम होता, तो क्यों पूरे विश्व मे त्राहित्राहि मची रहती.

ये सब बातें याद आते ही रोली शांत मन से आंखें बंद कर के सो गई. सुबह 6 बजे रोली की आंखें खुलीं तो उसे लगा, जैसे वह रूई की तरह हलकी हो गई है.

गुरुजी को स्मरण कर के रोली ने सब से पहले अपनी मम्मी को फोन लगाया और फिर शिखर को फोन कर अपना हालचाल बताया.

अगला दिन भी भजन, प्रवचन और ध्यान में ऐसे बीत गया कि रोली को पता भी नहीं चला कि कब शाम हो गई. तकरीबन 500 लोग इस पूजा में सम्मलित थे, परंतु न तो कोई आपाधापी थी, न ही कोई घबराहट.

शाम के 7 बजे रोली ने गुरुजी को प्रणाम किया, तो गुरुजी ने उसे भभूति देते हुए कहा, ‘‘बेटी, ये भभूति तुम्हारी हर तरह से रक्षा करेगी.‘‘

जब रोली बाहर निकली तो देखा कि शिखर कार में बैठा उस की प्रतीक्षा कर रहा था.

रोली बिना कोई प्रतिक्रिया किए कार में बैठ गई. घर आ कर भी वह बेहद शांत और संभली हुई लग रही थी. रोली ने किसी से कुछ नहीं कहा और न ही उस के सासससुर ने उस से कुछ पूछा.

अगले रोज सुबहसुबह शिखर ने रोली को खुशखबरी सुनाई कि बहुत दिनों से जिस कंपनी में उस की बात अटकी हुई थी, वहां से बात फाइनल हो गई है. 1 अगस्त को उसे पूना में ज्वाइनिंग के लिए जाना है.

रोली नाचते हुए बोली, ‘‘ये सब गुरुजी की कृपा है.‘‘

शिखर बोला, ‘‘अरे वाह, मेहनत मैं करूं और क्रेडिट तुम्हारे गुरुजी ले जाएं.‘‘

जब से रोली गुरुजी के पास से आई थी, उस ने सावधानी बरतनी छोड़ दी थी. शिखर की नौकरी के कारण रोली का विश्वास और पक्का हो गया था.

और फिर एक हफ्ते बाद रोली को वह खुशखबरी भी मिल गई, जिस का पिछले 5 साल से इंतजार कर रही थी. वह मां बनने वाली थी. घर में ऐसा लग रहा था, चारों ओर खुशियों की बरसात हो रही है. रोली को पक्का विश्वास था कि देरसवेर ही सही, शिखर और उस का परिवार भी गुरुजी की भक्ति में आ जाएगा. पर, जब 5 दिन बाद रोली को बुखार हो गया, तो रोली के सासससुर और शिखर के होश उड़ गए थे. परंतु रोली ने कोई दवा नहीं ली, बल्कि गुरुजी के यहां से लाई भभूति चाट ली.

शिखर ने रोली को टेस्ट कराने के लिए भी कहा, परंतु रोली ने कहा, ‘‘मैं ने गुरुजी से फोन पर बात की थी. मुझे वायरल हुआ है. गुरुजी ने कहा है कि परसों तक सब ठीक हो जाएगा.‘‘

पर, उसी रात अचानक ही रोली को सांस लेने में दिक्कत होने लगी. रोली को महसूस हो रहा था, जैसे पूरे वातावरण में औक्सीजन की कमी हो गई हो.

शिखर रात में ही रोली को ले कर अस्पताल भागा. बहुत मुश्किलों से रोली को किसी तरह अस्पताल में दाखिला मिला. पुलिस ने पूछताछ की, तो एक के बाद एक लगभग 500 लोगों की एक लंबी कोरोना चेन बन गई.

गुरुजी का फोन स्विच औफ आ रहा था. यज्ञ में शामिल हुए परिवारों का जब कोरोना टेस्ट हुआ तो ऐसा लगा, कोरोना बम का विस्फोट हो गया है. जहां पहले शहर में बस गिनती के 50 मामले थे, वे अब सीधे 500 पार कर गए थे.

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रोली शर्म के कारण आंख नहीं उठा पा रही थी. काश, उस ने शिखर और उस के परिवार की बात मान ली होती. रोली को अपने से ज्यादा पेट में पल रहे बच्चे की चिंता हो रही थी. उधर शिखर को रोली के साथसाथ अपने डायबिटिक मातापिता की भी चिंता हो रही थी. शिखर को समझ नहीं आ रहा था कि क्यों रोली की इस अंधभक्ति का नतीजा रोली के साथसाथ पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा. आखिर कब तक हम पढ़ेलिखे लोग भी अपनेआप को इस तरह अंधविश्वास के कुएं में धकेलते रहेंगे? आखिर क्यों हम आज भी हर समस्या का शार्टकट ढूंढ़ते हैं? आखिर क्यों…?

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February 26, 2022 at 09:00AM

बहकते कदम: क्या अनीश के चगुंल से निकल सकी प्रिया

लेखिका- मीनू त्रिपाठी

‘देख प्रिया, तू ऐसावैसा कुछ करने की सोचना भी मत, अनीश अच्छा लड़का नहीं है, अभी भी समय है संभल जा.’ प्रज्ञा दीदी के शब्द मानो पटरी पर दौड़ती रेलगाड़ी का पीछा कर रहे थे. भय, आशंका, उत्तेजना के बीच हिचकोले लेता मन अतीत को कभी आगे तो कभी पीछे धकेल देता था. कुछ देर पहले रोमांचकारी सपनीले भविष्य में खोया मन जाने क्यों अज्ञात भय से घिर गया था. मम्मीपापा की लाडली बेटी और प्रज्ञा दीदी की चहेती बहन घर से भाग गई है, यह सब को धीरेधीरे पता चल ही जाएगा.

अलसुबह आंख खुलते ही मम्मी चाय का प्याला ले कर जगाने आ जाएगी, क्या पता रात को ही सब जान गए हों? कितना समझाया था प्रज्ञा दीदी ने कि इस उम्र में लिया गया एक भी गलत फैसला हमारे जीवन को बिखेर सकता है. जितना दीदी समझाने का प्रयास करतीं उतनी ही दृढ़ता से बिंदास प्रिया दो कदम अनीश की ओर बढ़ा देती.

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‘‘प्रिया, अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, ये प्यारव्यार के चक्कर में पड़ कर अपने भविष्य से मत खेल.’’

‘‘दीदी, अब तो अनीश ही मेरी जिंदगी है. मैं ने उसे दिल से चाहा है, वह जीवनभर मेरा साथ निभाएगा,’’ प्रिया के ये फिल्मी संवाद सुन प्रज्ञा अपना सिर पकड़ लेती.

‘‘क्या हम तुझे नहीं चाहते और अगर तुझे अपने प्यार पर इतना ही भरोसा है तो एक बार पापा से बात कर उसे सब से मिलवा तो सही.’’

एक अनजाने अविश्वास के तहत जाने क्यों प्रिया पापा से बात करने की हिम्मत न जुटा पाई. उस वक्त अनीश द्वारा घर से भाग कर शादी करने का रास्ता उसे रोमांच भरा दिखाई दिया.

अनीश के केयरिंग स्वभाव पर वह उस दिन फिदा हो गई, जब प्रज्ञा दीदी के जोर डालने पर उस ने अनीश को मम्मीपापा से मिलने को कहा, तो उस ने भावावेश में प्रिया को गले लगा लिया और कहा वह अपने प्यार को खोने का रिस्क नहीं उठा सकता है, बस, उसी रात गली के उस पार इंतजार करते अनीश के साथ वह आ गई, घर छोड़ कर आते समय प्रिया का मनोबल चरम पर था. रास्ते में अनीश ने बताया कि वे लोग बेंगलुरु जा रहे हैं, जहां वे कुछ दिन उस के एक दोस्त के घर पर ठहरेंगे और 7 महीने बाद प्रिया के बालिग होने पर शादी करेंगे.

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रास्ते भर वह प्रिया को समझाता रहा कि इस दौरान उसे किसी से संपर्क नहीं रखना है, इस मामले में यहां का कानून बेहद सख्त है. विचारों में डूबतीउतराती प्रिया कब नींद के आगोश में चली गई उसे पता ही नहीं चला. अचानक एक स्टेशन पर गहमागहमी के बीच उस की नींद खुली, उस ने देखा तो अनीश अपनी सीट पर नहीं था. बिंदास और मजबूत इरादों वाली प्रिया का हलक सूख गया था. आवेग से उस की आंखें भर आईं, माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई थीं, अकेलेपन के एहसास ने उसे घेर लिया, तभी वह अपना मोबाइल खोजने लगी, पूरा पर्स खंगाल डाला पर कहीं मोबाइल नहीं दिखा.

‘‘आप मोबाइल तो नहीं ढूंढ़ रही हैं?’’ एक आवाज ने उसे चौंका दिया. सामने देखा तो एक युवती बैठी किताब पढ़ रही थी, ‘‘आप ने मुझ से कुछ कहा क्या?’’

‘‘मुझे लगा आप अपना मोबाइल ढूंढ़ रही हैं.’’

‘‘हां, आप ने देखा क्या?’’

प्रिया ने पूछा तो वह बोली, ‘‘तुम्हारे साथ जो लड़का है वह तुम्हारा भाई है क्या ?’’

उस का प्रश्न प्रिया को रुचिकर नहीं लगा. तभी उस युवती ने आगे खुलासा किया, ‘‘तुम्हारा मोबाइल तुम्हारे साथ जो लड़का था वह ले गया है.’’

कातर दृष्टि से इधरउधर देखती प्रिया को उस ने बताया कि वह दूसरे कंपार्टमेंट में बैठा ताश खेल रहा है. प्रिया यह सुन शर्म से गड़ गई. उसे अनीश पर बहुत गुस्सा आया.

ये भी पढ़ें- मोल सच्चे रिश्तों का

‘‘कृपया आप मेरा सामान देखिएगा, मैं वाशरूम जा रही हूं,’’ प्रिया तेजी से निकली. तभी अंधेरे में किसी की आवाज पर उस के पांव वहीं ठिठक गए, दरवाजे के पास खड़ा अनीश मोबाइल पर किसी से कह रहा था, ‘‘बस, ऐसी ही बेवकूफ लड़कियों से तो रोजीरोटी चल रही है हमारी, उस का मोबाइल ले लिया है, 15-20 हजार का तो होगा ही. डर भी था कहीं घर वालों से संपर्क न कर बैठे, मैं बिना बात की मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता. अभी पूछा तो नहीं है, पर घर से कुछ न कुछ तो ले कर जरूर आई होगी, घर जो बसाना है मेरे साथ,’’ उस के ये शब्द ठहाकों के साथ हवा में तैर गए.

‘‘और हां सुन, तू सारा इंतजाम रखना, मेरी जिम्मेदारी केवल वहां तक छोड़ने की है आगे तू संभालना, बस, फिल्म मस्त बननी चाहिए.’’

इस वार्त्ता को सुन कर प्रिया का खून बर्फ की तरह जम चुका था, उस के पांव स्थिर न रह पाए. वह गिरने वाली थी कि किसी ने उसे संभाला, वह कैसे अपनी सीट तक आई उसे पता ही नहीं चला, दो घूंट पानी पीने के कुछ क्षण बाद उस ने आंखें खोलीं तो अपने कंपार्टमैंट में बैठी युवती का चिरपरिचित चेहरा दिखा.

‘‘तुम ठीक तो हो न?’’ उस ने जैसे ही पूछा प्रिया की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी, उस युवती ने अपने साथ आए शख्स को बाहर भेज दिया और कूपे को अंदर से बंद कर दिया.

‘‘क्या हुआ? साथ आया लड़का बौयफ्रैंड है न तुम्हारा?’’ उस युवती की बात सुन प्रिया फफक पड़ी.

‘‘देखो, वह लड़का ठीक नहीं है. यह शायद तुम्हें भी पता चल गया होगा. मैं जानती हूं कि तुम दोनों घर से भाग कर आए हो.’’

प्रिया ने आश्चर्य और शंकित नजरों से उसे देखा तो वह बोली, ‘‘मेरा नाम सरन्या है. तुम मुझ पर भरोसा कर सकती हो. वैसे तुम्हारे पास और कोई चारा भी नहीं है.’’ युवती की बातों में सचाई थी. वैसे भी अनीश का जो बीभत्स चेहरा वह अभीअभी देख कर आई थी, उसे देख कर तो उस की रूह कांप उठी थी.

‘‘देखो, जो गलत कदम तुम ने उठाया है, जिन कांटों में तुम उलझी हो उस से निकलने के लिए तुम्हें साहस जुटाना पड़ेगा.’’ सरन्या की बातों का प्रभाव प्रिया पर पड़ा. कुछ देर में ही वह संभल गई.

‘‘प्रिया नाम है न तुम्हारा? अपने पापा का नंबर दो मुझे.’’ उस ने अधिकार से कहा तो प्रिया ने पापा का नंबर बता दिया. वह युवती बात करने के लिए बाहर चली गई.

अब तक प्रिया स्थिति का सामना करने को तैयार हो गई थी. कुछ देर में वह वापस आई और बोली, ‘‘मैं ने तुम्हारे पापा से बात कर ली है, वह अगली फ्लाइट से बेंगलुरु पहुंच रहे हैं. अब तुम्हें क्या करना है यह ध्यान से सुनो.’’ वह प्रिया को कुछ बताते हुए अपने साथ आए युवक से बोली, ‘‘मैडम के साथ जो व्यक्ति आया है उसे बताओ कि ये उसे बुला रही हैं और हां, अर्जुन कुछ देर तुम बाहर ही रहना.’’

कुछ देर बाद ही अनीश आ गया तो प्रिया उस से शिकायती लहजे में बोली, ‘‘तुम कहां चले गए थे, अनीश? मैं कितना डर गई थी मालूम है तुम्हें.’’

अनीश उस की बात सुन कर तुरंत बोला, ‘‘मैं तुम्हें छोड़ कर भले कहां जाऊंगा.’’ प्रिया ने कूपे की लाइट जला दी. उसे कुछ देर पहले जिस अनीश की आंखों में प्यार का समुद्र नजर आ रहा था अब उन में मक्कारी दिखाई दे रही थी. अब वह अपनी खुली आंखों से देख रही थी कि किस तरह सतर्कतापूर्वक अनीश इधरउधर देख रहा था. तभी प्यार से प्रिया ने उस से कहा, ‘‘मैं तुम्हें एक खुशखबरी देना चाहती हूं.’’

‘‘क्या?’’ भौचक्का सा वह बोला तो प्रिया ने कहा, ‘‘जानते हो पापा हमारी शादी के लिए राजी हो गए हैं और वे भी बेंगलुरु पहुंच रहे हैं.’’ प्रिया के इस खुलासे से अनीश का तो रंग ही उड़ गया, वह अचानक बिफर गया, ‘‘बेवकूफ लड़की, मैं ने मना किया था कि कहीं फोन मत करना.’’

तभी मानो उसे कुछ याद आया हो, न चाहते हुए भी उस के मुंह से निकला, ‘‘तुम्हारा मोबाइल तो…’’ ‘‘मैं जानती हूं वह तो तुम्हारे पास है.’’ इस से पहले कि अनीश कुछ और पूछता प्रिया अपना आपा खो चुकी थी. उस का हाथ पूरे वेग से लहराया और अनीश के गाल पर तेज आवाज के साथ झन्नाटेदार चांटा पड़ा. क्रोध और अपमान से उस का बदन कांप रहा था. अनीश का सारा खून निचुड़ गया था. शोरशराबे की आवाज बाहर तक चली गई थी. लोगों ने अंदर झांकना शुरू कर दिया था. उतनी देर में टीटीई भी आ गया. उस ने पूछा कि क्या माजरा है? तो बड़े इत्मीनान से वह युवती उठ कर आई और बोली, ‘‘ये मेरी रिश्तेदार हैं, दरअसल यह हमारे साथ बैठा एक यात्री है. हमें लगता है कि इस ने हमारा मोबाइल चुराया है. आप पुलिस बुलाइए.’’ अनीश के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगी थीं.

’’देखिए मैडम, यह फर्स्ट क्लास का डब्बा है, आप इस में बैठे यात्री पर इस तरह का इलजाम नहीं लगा सकतीं.’’ टीटीई के बोलने पर अर्जुन बोला, ‘‘मैं भी इन को यही समझा रहा हूं कि पुलिस के झंझट में पड़ने से पहले खुद तसल्ली कर लो,’’ इतना कहते ही उस ने अनीश की जेबें खंगालते हुए प्रिया का मोबाइल निकाल लिया. अनीश सकते में था, पासा यों पलट जाएगा, उस ने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था. तुरतफुरत रेलवे के 2 पुलिस कांस्टेबल आए तो उस युवती ने अपना पहचानपत्र दिखाया. ‘एसीपी सरन्या’ पढ़ कर दोनों ने उसे एक करारा सेल्यूट बजाया तो टीटीई सहित प्रिया भी अचंभे में पड़ गई. टीटीई हंस कर बोला, ‘‘क्या बेटा, चोरी भी की तो पुलिस वालों की?’’

एसीपी सरन्या ने अर्जुन से कहा, ‘‘इंस्पेक्टर अर्जुन, आप इस के साथ अगले स्टेशन पर उतर जाइए, मैं बताती हूं आप को आगे क्या करना है और हां, जरा इसे समझाना और खुद भी ध्यान रखना कि इस लड़की का नाम बीच में न आए, ’’ हंगामे के बीच अनीश को अगले स्टेशन पर उतार लिया गया.

ट्रेन में सवार यात्री इस पर अपनीअपनी टिप्पणी देने में मशगूल थे. प्रिया अपमान और शर्मिंदगी से भरी देर तक रोती रही. तभी सरन्या ने सांत्वनाभरा हाथ उस की पीठ पर फेरा, तो वह सरन्या के गले लग गई और बोली, ‘‘आप ने मुझे बचा लिया, आप का यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी.’’

उस की बात पर सरन्या हंस पड़ी और बोली, ‘‘कैसे नहीं बचाती तुम्हें, यह तो वही बात हुई कि एक डाक्टर के सामने किसी ने खुदकुशी करने की कोशिश की. जान तो उस की बचनी ही थी, यह मेरी पहली नियुक्ति है आईपीएस औफिसर के रूप में, तुम ने तो मुझे शुरू में ही इतना बड़ा केस दिला दिया है. मैं तो तुम्हें देख कर ही समझ गई थी कि तुम घर से भाग कर आई हो. ट्रेन में चढ़ते वक्त तो तुम किसी दूसरी ही दुनिया में थीं. किसी और का तुम्हें होश ही कहां था, अलबत्ता वह लड़का जरूरत से ज्यादा सतर्क था.’’

‘‘दूसरों को औब्जर्व करना मेरी हौबी है, उसे देख कर ही मैं समझ गई थी कि वह लड़का ठीक नहीं है. जब मैं ने चुपके से उसे तुम्हारे पर्स से मोबाइल निकालते और पैसे चेक करते देखा तो मुझे बड़ा अजीब लगा. जब वह बाहर गया तो मैं ने अर्जुन से बात कर के उस  पर नजर रखने को कहा, इसीलिए जब तुम वाशरूम गईर् तो तुम्हारे पीछेपीछे मैं भी आई थी. मुझे पता था कि कहीं कुछ गड़बड़ है, पर मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि तुम्हारे जैसी पढ़ीलिखी लड़की आज के जमाने में ऐसी मूर्खता कैसे कर सकती है.

‘‘जरा सोचो, अगर वह अपनी योजना में कामयाब हो जाता तो क्या होता. तुम ठीक समय पर संभल गई अन्यथा उस दलदल में फंसने के बाद जिंदगी दूभर हो जाती.

प्रिया सब सोच कर एकबारगी फिर से सिहर उठी. ‘‘मैं अब घर जा कर सब से नजरें कैसे मिलाऊंगी,’’ कुछ खोई हुई सी वह बोली.

‘‘देखो प्रिया, सवाल यह नहीं है कि तुम सब से कैसे नजरें मिलाओगी, यह सोचो कि तुम अपने वजूद से कैसे नजरें मिलाओगी जिसे तुम ने इतने बड़े जोखिम में यों ही डाल दिया, खुद से नजरें मिलाने के लिए तो तुम्हें अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ेगा, तुम्हारा कर्म ही तुम्हारी अग्नि परीक्षा होगी. अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम किस तरह से खुद को और अपने भविष्य को संवार कर अपने परिवार के सदस्यों को यह खुशी दो जिस से तुम्हारा यह सफर न तुम्हें और न कभी तुम्हारे परिवार को याद आए.’’

सरन्या की बातों का असर प्रिया की चुप्पी में दिखा, मन ही मन वह आत्ममंथन करती रही. मानसिक रूप से थकी प्रिया कब सो गई पता ही नहीं चला, किसी के स्नेह भरे स्पर्श से आंखें खुलीं, सामने पापा को देख वह छोटी बच्ची की तरह उन से लिपटी, साथ आई प्रज्ञा भी रो पड़ी.

‘‘आप का यह एहसान हम कैसे चुका पाएंगे,’’ पापा सरन्या से बोल रहे थे.

‘‘पापा, आप मुझे कभी माफ कर पाएंगे क्या?’’

उन दोनों की बात सुन कर सरन्या ने प्रिया के पापा से कहा, ‘‘अगर आप वाकई एहसान उतारना चाहते हैं तो मुझ से वादा कीजिए कि आप अपनी बेटी पर भरोसा कायम रखते हुए इस की उड़ान को पंख देंगे, इस सफर को भूलते हुए, आगे की जिंदगी में इस का साथ देंगे, न कि इस सफर का बारबार उल्लेख कर इस की आगे की जिंदगी को दूभर बनाएंगे.’’

‘‘मैं वादा करता हूं कि प्रिया की आज की भूल का जिक्र कर के हम इस के मनोबल को नहीं गिरने देंगे, आज के बाद हम में से कोई भी प्रिया से इस बारे में कोई बात नहीं करेगा.’’

‘‘पापा, आप की बेटी आप का सिर कभी झुकने नहीं देगी, मैं भी सरन्या दीदी जैसा बन कर दिखाऊंगी.’’ सरन्या के व्यक्त्तित्व के प्रभाव से प्रभावित प्रिया पापा का साथ पा कर पूरे आत्मविश्वास से बोली, तो पापा और प्रज्ञा ने उसे प्यार से थाम लिया. सरन्या समझ गई कि अब सही माने में प्रिया भंवर से बाहर निकल चुकी है. उस के होंठों पर तसल्ली भरी स्मितरेखा थी.

 

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लेखिका- मीनू त्रिपाठी

‘देख प्रिया, तू ऐसावैसा कुछ करने की सोचना भी मत, अनीश अच्छा लड़का नहीं है, अभी भी समय है संभल जा.’ प्रज्ञा दीदी के शब्द मानो पटरी पर दौड़ती रेलगाड़ी का पीछा कर रहे थे. भय, आशंका, उत्तेजना के बीच हिचकोले लेता मन अतीत को कभी आगे तो कभी पीछे धकेल देता था. कुछ देर पहले रोमांचकारी सपनीले भविष्य में खोया मन जाने क्यों अज्ञात भय से घिर गया था. मम्मीपापा की लाडली बेटी और प्रज्ञा दीदी की चहेती बहन घर से भाग गई है, यह सब को धीरेधीरे पता चल ही जाएगा.

अलसुबह आंख खुलते ही मम्मी चाय का प्याला ले कर जगाने आ जाएगी, क्या पता रात को ही सब जान गए हों? कितना समझाया था प्रज्ञा दीदी ने कि इस उम्र में लिया गया एक भी गलत फैसला हमारे जीवन को बिखेर सकता है. जितना दीदी समझाने का प्रयास करतीं उतनी ही दृढ़ता से बिंदास प्रिया दो कदम अनीश की ओर बढ़ा देती.

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‘‘प्रिया, अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, ये प्यारव्यार के चक्कर में पड़ कर अपने भविष्य से मत खेल.’’

‘‘दीदी, अब तो अनीश ही मेरी जिंदगी है. मैं ने उसे दिल से चाहा है, वह जीवनभर मेरा साथ निभाएगा,’’ प्रिया के ये फिल्मी संवाद सुन प्रज्ञा अपना सिर पकड़ लेती.

‘‘क्या हम तुझे नहीं चाहते और अगर तुझे अपने प्यार पर इतना ही भरोसा है तो एक बार पापा से बात कर उसे सब से मिलवा तो सही.’’

एक अनजाने अविश्वास के तहत जाने क्यों प्रिया पापा से बात करने की हिम्मत न जुटा पाई. उस वक्त अनीश द्वारा घर से भाग कर शादी करने का रास्ता उसे रोमांच भरा दिखाई दिया.

अनीश के केयरिंग स्वभाव पर वह उस दिन फिदा हो गई, जब प्रज्ञा दीदी के जोर डालने पर उस ने अनीश को मम्मीपापा से मिलने को कहा, तो उस ने भावावेश में प्रिया को गले लगा लिया और कहा वह अपने प्यार को खोने का रिस्क नहीं उठा सकता है, बस, उसी रात गली के उस पार इंतजार करते अनीश के साथ वह आ गई, घर छोड़ कर आते समय प्रिया का मनोबल चरम पर था. रास्ते में अनीश ने बताया कि वे लोग बेंगलुरु जा रहे हैं, जहां वे कुछ दिन उस के एक दोस्त के घर पर ठहरेंगे और 7 महीने बाद प्रिया के बालिग होने पर शादी करेंगे.

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रास्ते भर वह प्रिया को समझाता रहा कि इस दौरान उसे किसी से संपर्क नहीं रखना है, इस मामले में यहां का कानून बेहद सख्त है. विचारों में डूबतीउतराती प्रिया कब नींद के आगोश में चली गई उसे पता ही नहीं चला. अचानक एक स्टेशन पर गहमागहमी के बीच उस की नींद खुली, उस ने देखा तो अनीश अपनी सीट पर नहीं था. बिंदास और मजबूत इरादों वाली प्रिया का हलक सूख गया था. आवेग से उस की आंखें भर आईं, माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई थीं, अकेलेपन के एहसास ने उसे घेर लिया, तभी वह अपना मोबाइल खोजने लगी, पूरा पर्स खंगाल डाला पर कहीं मोबाइल नहीं दिखा.

‘‘आप मोबाइल तो नहीं ढूंढ़ रही हैं?’’ एक आवाज ने उसे चौंका दिया. सामने देखा तो एक युवती बैठी किताब पढ़ रही थी, ‘‘आप ने मुझ से कुछ कहा क्या?’’

‘‘मुझे लगा आप अपना मोबाइल ढूंढ़ रही हैं.’’

‘‘हां, आप ने देखा क्या?’’

प्रिया ने पूछा तो वह बोली, ‘‘तुम्हारे साथ जो लड़का है वह तुम्हारा भाई है क्या ?’’

उस का प्रश्न प्रिया को रुचिकर नहीं लगा. तभी उस युवती ने आगे खुलासा किया, ‘‘तुम्हारा मोबाइल तुम्हारे साथ जो लड़का था वह ले गया है.’’

कातर दृष्टि से इधरउधर देखती प्रिया को उस ने बताया कि वह दूसरे कंपार्टमेंट में बैठा ताश खेल रहा है. प्रिया यह सुन शर्म से गड़ गई. उसे अनीश पर बहुत गुस्सा आया.

ये भी पढ़ें- मोल सच्चे रिश्तों का

‘‘कृपया आप मेरा सामान देखिएगा, मैं वाशरूम जा रही हूं,’’ प्रिया तेजी से निकली. तभी अंधेरे में किसी की आवाज पर उस के पांव वहीं ठिठक गए, दरवाजे के पास खड़ा अनीश मोबाइल पर किसी से कह रहा था, ‘‘बस, ऐसी ही बेवकूफ लड़कियों से तो रोजीरोटी चल रही है हमारी, उस का मोबाइल ले लिया है, 15-20 हजार का तो होगा ही. डर भी था कहीं घर वालों से संपर्क न कर बैठे, मैं बिना बात की मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता. अभी पूछा तो नहीं है, पर घर से कुछ न कुछ तो ले कर जरूर आई होगी, घर जो बसाना है मेरे साथ,’’ उस के ये शब्द ठहाकों के साथ हवा में तैर गए.

‘‘और हां सुन, तू सारा इंतजाम रखना, मेरी जिम्मेदारी केवल वहां तक छोड़ने की है आगे तू संभालना, बस, फिल्म मस्त बननी चाहिए.’’

इस वार्त्ता को सुन कर प्रिया का खून बर्फ की तरह जम चुका था, उस के पांव स्थिर न रह पाए. वह गिरने वाली थी कि किसी ने उसे संभाला, वह कैसे अपनी सीट तक आई उसे पता ही नहीं चला, दो घूंट पानी पीने के कुछ क्षण बाद उस ने आंखें खोलीं तो अपने कंपार्टमैंट में बैठी युवती का चिरपरिचित चेहरा दिखा.

‘‘तुम ठीक तो हो न?’’ उस ने जैसे ही पूछा प्रिया की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी, उस युवती ने अपने साथ आए शख्स को बाहर भेज दिया और कूपे को अंदर से बंद कर दिया.

‘‘क्या हुआ? साथ आया लड़का बौयफ्रैंड है न तुम्हारा?’’ उस युवती की बात सुन प्रिया फफक पड़ी.

‘‘देखो, वह लड़का ठीक नहीं है. यह शायद तुम्हें भी पता चल गया होगा. मैं जानती हूं कि तुम दोनों घर से भाग कर आए हो.’’

प्रिया ने आश्चर्य और शंकित नजरों से उसे देखा तो वह बोली, ‘‘मेरा नाम सरन्या है. तुम मुझ पर भरोसा कर सकती हो. वैसे तुम्हारे पास और कोई चारा भी नहीं है.’’ युवती की बातों में सचाई थी. वैसे भी अनीश का जो बीभत्स चेहरा वह अभीअभी देख कर आई थी, उसे देख कर तो उस की रूह कांप उठी थी.

‘‘देखो, जो गलत कदम तुम ने उठाया है, जिन कांटों में तुम उलझी हो उस से निकलने के लिए तुम्हें साहस जुटाना पड़ेगा.’’ सरन्या की बातों का प्रभाव प्रिया पर पड़ा. कुछ देर में ही वह संभल गई.

‘‘प्रिया नाम है न तुम्हारा? अपने पापा का नंबर दो मुझे.’’ उस ने अधिकार से कहा तो प्रिया ने पापा का नंबर बता दिया. वह युवती बात करने के लिए बाहर चली गई.

अब तक प्रिया स्थिति का सामना करने को तैयार हो गई थी. कुछ देर में वह वापस आई और बोली, ‘‘मैं ने तुम्हारे पापा से बात कर ली है, वह अगली फ्लाइट से बेंगलुरु पहुंच रहे हैं. अब तुम्हें क्या करना है यह ध्यान से सुनो.’’ वह प्रिया को कुछ बताते हुए अपने साथ आए युवक से बोली, ‘‘मैडम के साथ जो व्यक्ति आया है उसे बताओ कि ये उसे बुला रही हैं और हां, अर्जुन कुछ देर तुम बाहर ही रहना.’’

कुछ देर बाद ही अनीश आ गया तो प्रिया उस से शिकायती लहजे में बोली, ‘‘तुम कहां चले गए थे, अनीश? मैं कितना डर गई थी मालूम है तुम्हें.’’

अनीश उस की बात सुन कर तुरंत बोला, ‘‘मैं तुम्हें छोड़ कर भले कहां जाऊंगा.’’ प्रिया ने कूपे की लाइट जला दी. उसे कुछ देर पहले जिस अनीश की आंखों में प्यार का समुद्र नजर आ रहा था अब उन में मक्कारी दिखाई दे रही थी. अब वह अपनी खुली आंखों से देख रही थी कि किस तरह सतर्कतापूर्वक अनीश इधरउधर देख रहा था. तभी प्यार से प्रिया ने उस से कहा, ‘‘मैं तुम्हें एक खुशखबरी देना चाहती हूं.’’

‘‘क्या?’’ भौचक्का सा वह बोला तो प्रिया ने कहा, ‘‘जानते हो पापा हमारी शादी के लिए राजी हो गए हैं और वे भी बेंगलुरु पहुंच रहे हैं.’’ प्रिया के इस खुलासे से अनीश का तो रंग ही उड़ गया, वह अचानक बिफर गया, ‘‘बेवकूफ लड़की, मैं ने मना किया था कि कहीं फोन मत करना.’’

तभी मानो उसे कुछ याद आया हो, न चाहते हुए भी उस के मुंह से निकला, ‘‘तुम्हारा मोबाइल तो…’’ ‘‘मैं जानती हूं वह तो तुम्हारे पास है.’’ इस से पहले कि अनीश कुछ और पूछता प्रिया अपना आपा खो चुकी थी. उस का हाथ पूरे वेग से लहराया और अनीश के गाल पर तेज आवाज के साथ झन्नाटेदार चांटा पड़ा. क्रोध और अपमान से उस का बदन कांप रहा था. अनीश का सारा खून निचुड़ गया था. शोरशराबे की आवाज बाहर तक चली गई थी. लोगों ने अंदर झांकना शुरू कर दिया था. उतनी देर में टीटीई भी आ गया. उस ने पूछा कि क्या माजरा है? तो बड़े इत्मीनान से वह युवती उठ कर आई और बोली, ‘‘ये मेरी रिश्तेदार हैं, दरअसल यह हमारे साथ बैठा एक यात्री है. हमें लगता है कि इस ने हमारा मोबाइल चुराया है. आप पुलिस बुलाइए.’’ अनीश के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगी थीं.

’’देखिए मैडम, यह फर्स्ट क्लास का डब्बा है, आप इस में बैठे यात्री पर इस तरह का इलजाम नहीं लगा सकतीं.’’ टीटीई के बोलने पर अर्जुन बोला, ‘‘मैं भी इन को यही समझा रहा हूं कि पुलिस के झंझट में पड़ने से पहले खुद तसल्ली कर लो,’’ इतना कहते ही उस ने अनीश की जेबें खंगालते हुए प्रिया का मोबाइल निकाल लिया. अनीश सकते में था, पासा यों पलट जाएगा, उस ने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था. तुरतफुरत रेलवे के 2 पुलिस कांस्टेबल आए तो उस युवती ने अपना पहचानपत्र दिखाया. ‘एसीपी सरन्या’ पढ़ कर दोनों ने उसे एक करारा सेल्यूट बजाया तो टीटीई सहित प्रिया भी अचंभे में पड़ गई. टीटीई हंस कर बोला, ‘‘क्या बेटा, चोरी भी की तो पुलिस वालों की?’’

एसीपी सरन्या ने अर्जुन से कहा, ‘‘इंस्पेक्टर अर्जुन, आप इस के साथ अगले स्टेशन पर उतर जाइए, मैं बताती हूं आप को आगे क्या करना है और हां, जरा इसे समझाना और खुद भी ध्यान रखना कि इस लड़की का नाम बीच में न आए, ’’ हंगामे के बीच अनीश को अगले स्टेशन पर उतार लिया गया.

ट्रेन में सवार यात्री इस पर अपनीअपनी टिप्पणी देने में मशगूल थे. प्रिया अपमान और शर्मिंदगी से भरी देर तक रोती रही. तभी सरन्या ने सांत्वनाभरा हाथ उस की पीठ पर फेरा, तो वह सरन्या के गले लग गई और बोली, ‘‘आप ने मुझे बचा लिया, आप का यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी.’’

उस की बात पर सरन्या हंस पड़ी और बोली, ‘‘कैसे नहीं बचाती तुम्हें, यह तो वही बात हुई कि एक डाक्टर के सामने किसी ने खुदकुशी करने की कोशिश की. जान तो उस की बचनी ही थी, यह मेरी पहली नियुक्ति है आईपीएस औफिसर के रूप में, तुम ने तो मुझे शुरू में ही इतना बड़ा केस दिला दिया है. मैं तो तुम्हें देख कर ही समझ गई थी कि तुम घर से भाग कर आई हो. ट्रेन में चढ़ते वक्त तो तुम किसी दूसरी ही दुनिया में थीं. किसी और का तुम्हें होश ही कहां था, अलबत्ता वह लड़का जरूरत से ज्यादा सतर्क था.’’

‘‘दूसरों को औब्जर्व करना मेरी हौबी है, उसे देख कर ही मैं समझ गई थी कि वह लड़का ठीक नहीं है. जब मैं ने चुपके से उसे तुम्हारे पर्स से मोबाइल निकालते और पैसे चेक करते देखा तो मुझे बड़ा अजीब लगा. जब वह बाहर गया तो मैं ने अर्जुन से बात कर के उस  पर नजर रखने को कहा, इसीलिए जब तुम वाशरूम गईर् तो तुम्हारे पीछेपीछे मैं भी आई थी. मुझे पता था कि कहीं कुछ गड़बड़ है, पर मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि तुम्हारे जैसी पढ़ीलिखी लड़की आज के जमाने में ऐसी मूर्खता कैसे कर सकती है.

‘‘जरा सोचो, अगर वह अपनी योजना में कामयाब हो जाता तो क्या होता. तुम ठीक समय पर संभल गई अन्यथा उस दलदल में फंसने के बाद जिंदगी दूभर हो जाती.

प्रिया सब सोच कर एकबारगी फिर से सिहर उठी. ‘‘मैं अब घर जा कर सब से नजरें कैसे मिलाऊंगी,’’ कुछ खोई हुई सी वह बोली.

‘‘देखो प्रिया, सवाल यह नहीं है कि तुम सब से कैसे नजरें मिलाओगी, यह सोचो कि तुम अपने वजूद से कैसे नजरें मिलाओगी जिसे तुम ने इतने बड़े जोखिम में यों ही डाल दिया, खुद से नजरें मिलाने के लिए तो तुम्हें अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ेगा, तुम्हारा कर्म ही तुम्हारी अग्नि परीक्षा होगी. अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम किस तरह से खुद को और अपने भविष्य को संवार कर अपने परिवार के सदस्यों को यह खुशी दो जिस से तुम्हारा यह सफर न तुम्हें और न कभी तुम्हारे परिवार को याद आए.’’

सरन्या की बातों का असर प्रिया की चुप्पी में दिखा, मन ही मन वह आत्ममंथन करती रही. मानसिक रूप से थकी प्रिया कब सो गई पता ही नहीं चला, किसी के स्नेह भरे स्पर्श से आंखें खुलीं, सामने पापा को देख वह छोटी बच्ची की तरह उन से लिपटी, साथ आई प्रज्ञा भी रो पड़ी.

‘‘आप का यह एहसान हम कैसे चुका पाएंगे,’’ पापा सरन्या से बोल रहे थे.

‘‘पापा, आप मुझे कभी माफ कर पाएंगे क्या?’’

उन दोनों की बात सुन कर सरन्या ने प्रिया के पापा से कहा, ‘‘अगर आप वाकई एहसान उतारना चाहते हैं तो मुझ से वादा कीजिए कि आप अपनी बेटी पर भरोसा कायम रखते हुए इस की उड़ान को पंख देंगे, इस सफर को भूलते हुए, आगे की जिंदगी में इस का साथ देंगे, न कि इस सफर का बारबार उल्लेख कर इस की आगे की जिंदगी को दूभर बनाएंगे.’’

‘‘मैं वादा करता हूं कि प्रिया की आज की भूल का जिक्र कर के हम इस के मनोबल को नहीं गिरने देंगे, आज के बाद हम में से कोई भी प्रिया से इस बारे में कोई बात नहीं करेगा.’’

‘‘पापा, आप की बेटी आप का सिर कभी झुकने नहीं देगी, मैं भी सरन्या दीदी जैसा बन कर दिखाऊंगी.’’ सरन्या के व्यक्त्तित्व के प्रभाव से प्रभावित प्रिया पापा का साथ पा कर पूरे आत्मविश्वास से बोली, तो पापा और प्रज्ञा ने उसे प्यार से थाम लिया. सरन्या समझ गई कि अब सही माने में प्रिया भंवर से बाहर निकल चुकी है. उस के होंठों पर तसल्ली भरी स्मितरेखा थी.

 

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February 26, 2022 at 09:00AM

अपने पैर कुल्हाड़ी: मोहिनी अपने पति से क्यों नाराज थी

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February 26, 2022 at 09:00AM

एक बेटी ऐसी भी: जब मंजरी ने उठाया माता-पिता का फायदा

‘‘नानी आप को पता है कि ममा ने शादी कर ली?’’ मेरी 15 वर्षीय नातिन टीना ने जब सुबहसुबह यह अप्रत्याशित खबर दी तो मैं बुरी तरह चौंक उठी.

मैं ने पूछा, ‘‘तुझे कैसे पता? फोन आया है क्या?’’

‘‘नहीं, फेसबुक पर पोस्ट किया है,’’ नातिन ने उत्तर दिया.

मैं ने झट से उस के हाथ से मोबाइल लिया और उस पुरुष के प्रोफाइल को देख कर सन्न रह गई. वह पाकिस्तान में रहता था. मैं अपना सिर पकड़ कर बैठ गई. ‘यह लड़की कब कौन सा दिन दिखा दे, कुछ नहीं कह सकते… इस का कुछ नहीं हो सकता.’ मैं मन ही मन बुदबुदाई.

टीना ने देखते ही अपनी मां को अनफ्रैंड कर दिया. 10वीं क्लास में है. छोटी थोड़ी है, सब समझती है.

पूरे घर में सन्नाटा पसर गया था. मेरे पति घर पर नहीं थे. वे थोड़ी देर बाद आए तो यह खबर सुन कर चौंके. फिर थोड़ा संयत होते हुए बोले, ‘‘अच्छा तो है. शादी कर के अपना घर संभाले और हमें जिम्मेदारी से मुक्ति दे. उस के नौकरी पर जाने के बाद उस के बच्चे अब हम से नहीं संभाले जाते… तुम इतनी परेशान क्यों हो?’’

मैं ने थोड़े उत्तेजित स्वर में कहा, ‘‘अरे, मुक्ति कहां मिलेगी? और जिम्मेदारी बढ़ गई है. जिस आदमी से शादी की है वह पाकिस्तानी है, अब वह वहीं रहेगी. इसीलिए तो उस ने नहीं बताया और चुपचाप शादी कर ली. अब बच्चे तो हमें ही संभालने पड़ेंगे… कम से कम मुझे शादी करने से पहले बताती तो… लेकिन जानती थी कि इस शादी के लिए हम कभी नहीं मानेंगे. मानते भी कैसे. अपने देश के लड़के मर गए हैं क्या? मुझ से तो बोल कर गई थी कि औफिस के काम से मुंबई जा रही है.’’

वे विस्फारित आंखों से अवाक से मेरी ओर देखते रह गए.

‘कोई मां इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती है? उसे अपने बूढ़े मांबाप और बच्चों का जरा भी खयाल नहीं आया?’ मैं मन ही मन बुदबुदाई.

ये भी पढ़ें- आत्मग्लानि: कोमल ने चैन की सांस कब ली

‘‘उफ, यह तो बहुत बुरी बात है. हमारे बारे में न सोचे, लेकिन अपने बच्चों की जिम्मेदारी तो उसे उठानी ही चाहिए… वैसे बच्चे तो हम ही संभाल रहे थे उस के बावजूद उस के यहां हमारे साथ रहने से घर में तनाव ही रहता था. अब कम से कम हम शांति से तो रह सकते हैं,’’ उन्होंने मुझे सांत्वना दी.

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन हम भी कब तक संभालेंगे? हमारा शरीर भी थक रहा है. फिर इन का खर्चा कहां से आएगा?’’ मैं ने थके मन से कहा.

यह सुन उन्हें अपनी अदूरदर्शिता पर क्षोभ हुआ तो फिर सकारात्मक में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘हूं.’’

हमारे कोई बेटा नहीं था. इकलौती बेटी मंजरी, जिसे हम ने कंप्यूटर इंजीनिरिंग की उच्च शिक्षा दिलाई थी, को जाने किस के संस्कार मिले थे. उस का जब दूसरा बच्चा हुआ था, तभी से हम अपना घर छोड़ कर उस के बच्चों को संभालने के लिए उस के साथ रह रहे थे. उस के पिता रिटायरमैंट के बाद भी उसे आर्थिक सहायता देने हेतु नौकरी कर रहे थे.

मंजरी के दोनों बच्चे हमारी ही देखरेख में पैदा हुए थे, पले थे. कई बार हम मंजरी के व्यवहार से आहत हो कर यह कह कर कि अब हम कभी नहीं आएंगे, अपने घर लौट जाते, फिर बच्चों की कोई न कोई समस्या देख कर लौट आते. मंजरी हमारी इस कमजोरी का पूरा लाभ उठाने में नहीं चूकती थी.

हम उसे समझाते तो वह कहती, ‘‘आप लोगों ने जिस तरह मेरी परवरिश की है वैसी मैं अपने बच्चों की नहीं होने दूंगी.’’

वास्तविकता तो यह थी कि वह बिना मेहनत के सब कुछ प्राप्त करना चाहती थी, यह हमें बहुत बाद में ज्ञात हुआ. औफिस से आ कर प्रतिदिन बताना कि आज उस की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई थी. झूठी बीमारियों की रिपोर्ट बनवा कर हमें डरा कर हम से इलाज के लिए पैसे भी ऐंठती थी.

हम सब को इमोशनली ब्लैकमेल करती थी. शुरू में तो मैं भी उस की रिपोर्ट्स देख कर घबरा जाती थी कि उस का और उस के बच्चों का क्या होगा, लेकिन उस के चेहरे पर शिकन भी नहीं होती थी. बाद में समझ आया कि अकसर वह गूगल पर बीमारियों के बारे में क्यों जानकारी लेती रहती थी. नौकरी छोड़ के बिजनैस करना, उस को बंद कर के फिर नौकरी करना यह उस की आदत बन गई थी. घर के कार्यों में तो उस की रत्ती भर भी रुचि नहीं थी. खाना बनाने वाली पर या बाजार के खाने पर ही उस के बच्चे पल रहे थे.

मंजरी ने पहली शादी नैट के द्वारा अमेरिका रहने के लोभ के कारण किसी अमेरिका निवासी से की, जिस में हम भी शामिल हुए थे. बिना किसी जानकारी के यह रिश्ता हमें समझ नहीं आ रहा था. हम ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उस पर तो अमेरिका का भूत सवार था. फिर वही हुआ जिस का डर था. कुछ ही महीनों बाद वह गर्भवती हो कर इंडिया आ गई.

शादी के बाद अमेरिका जाने के बाद उसे पता लगा कि वह पहले से विवाहित था, तो उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई थी. हम बेबस थे. उस ने एक बेटी को जन्म दिया. हम ने मंजरी की बेटी को अपने पास रख लिया और वह दिल्ली जा कर किसी कंपनी में नौकरी करने लगी.

एक दिन अचानक जब हम उस से मिलने पहुंचे तो यह देख कर सन्न रह गए कि वह एक पुरुष के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही थी. हम ने अपना सिर पीट लिया. हमें देखते ही वह व्यक्ति वहां से ऐसा गायब हुआ कि फिर दिखाई नहीं दिया. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. 4 महीने का गर्भ उस के पेट में पल रहा था, असहाय से हम कर भी क्या सकते थे. अपना घर छोड़ कर उस के साथ रहने को मजबूर हो गए.

ये भी पढ़ें- गुरू घंटाल: मां अनीता के अंधविश्वास ने बदल दी बेटी नीति की जिंदगी

महरी ने जब डोर बैल बजाई तो मेरे विचारों का तारतम्य टूटा. किचन में जा कर बरतन खाली कर उसे दिए और डिनर की तैयारी में लग गई. लेकिन दिमाग पर अभी भी मंजरी ने ही कब्जा कर रखा था. सोच रही थी इनसान एक बार धोखा खा सकता है, 2 बार खा सकता है, लेकिन यह  तीसरी बार… मुसलमानों में तो 4 शादियों की स्वीकृति उन का धर्म ही देता है, तो क्या गारंटी है कि… और एक और बच्चा हो गया तो?

आगे की स्थिति सोच कर मैं कांप गई, लेकिन जो उस की पृष्ठभूमि थी, उस में कोई संस्कारी पुरुष तो उसे अपनाता नहीं. जो कदम उस ने उठाए हैं, उस के बाद क्या वह अपने परिवार को तथा अपनी किशोरावस्था की ओर अग्रसर होती बेटी को मुंह दिखा पाएगी? जरूर कोई बहुत बड़ा आसामी होगा, जिसे उस ने अपने चंगुल में फांस लिया होगा. पैसे के लिए वह कुछ भी कर सकती है, यह सर्वविदित था. बहुत जल्दी सारी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, कब तक परदे के पीछे रहेगी.

टीना के द्वारा उस को फेसबुक पर अनफ्रैंड करते ही वह समझ गई कि सब को उस के विवाह की खबर मिल गई है और टीना उस से बहुत नाराज है. आए दिन उस का फोन आने लगा. लेकिन इधर की प्रतिक्रिया में कोई अंतर नहीं आया. मैं ने मन ही मन सोचा आखिर कब तक बात नहीं करूंगी? बच्चों के भविष्य के बारे में तो उस से बात करनी ही पड़ेगी.

एक बार उस का फोन आने पर जैसे ही मोबाइल को अपने कान से लगा कर मैं ने हैलो कहा, वह तुरंत बोली, ‘‘टीना को समझाओ… मुझे भी तो खुशी से जीने का हक है. मेरे विवाह से किसी को क्या परेशानी है. अभी भी मैं अपने बच्चों की जिम्मेदारी संभालूंगी. उन्हें किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगी, क्योंकि जिस से मैं ने विवाह किया है उस का बहुत समृद्घ व्यवसाय है…’’

मुझे उस का कथन बड़ा ही हास्यास्पद लगा और मैं ने जो उस के वर्तमान पति की हैसियत के बारे में अनुमान लगाया था वह सत्य निकला. फिर एक दिन अचानक बहुत बड़ा सा कूरियर आया, जिस में बहुत महंगे मोबाइल और बच्चों के लिए कपड़े थे और औन लाइन बहुत सारा खाने का सामान, जिस में चौकलेट, केक, पेस्ट्री आदि भेजा था. सामान को देख कर चिंटू के अलावा कोई खुश नहीं हुआ.

एक दिन मंजरी ने हमें अपने बच्चों का वीजा बनवाने के लिए कहा कि एअर टिकट वह भेज देगी और हमारे लिए भी फ्लाइट के टिकट भेजेगी ताकि हम अपने घर लौट जाएं.

यह सुनते ही टीना आक्रोश में बोली, ‘‘नहीं जाना मुझे. आप के पास रहना है, आई हेट हर…’’ चिंटू बोला, ‘‘मुझे जाना है, ममा के पास, लेकिन वे यहां क्यों नहीं आतीं?’’

मैं तो शब्दहीन हो कर सन्न रह गई. थोड़ा मौन रहने के बाद कटाक्ष करते हुए बोली, ‘‘बहुत अच्छा संदेश दिया है तूने… तूने बच्चों को जन्म दिया है, तेरा पूरा अधिकार है उन पर, कानून भी तेरा ही साथ देगी. हम तो केयरटेकर मात्र हैं. हमारा कोई रिश्ता थोड़ी है बच्चों से… पूछे कोई तुम से रातरात भर जाग कर किस ने बच्चों को पाला है. वहां जाने के बाद तो हम इन से मिलने को तरस जाएंगे.

‘‘यदि तुम्हें बच्चों की इतनी चिंता होती तो ऐसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचती. बच्चे प्यार के भूखे होते हैं, पैसे के नहीं. हमारी भावनाओं की तो कद्र ही नहीं है, जाने किस मिट्टी की बनी है तू. मुझे अफसोस है कि  तू मेरी बेटी है, मुझे तुझ पर ही विश्वास नहीं है कि तू बच्चों को अच्छी तरह पालेगी, फिर मैं उस सौतेले बाप पर कैसे कर सकती हूं…’’

‘‘चिंटू जाना चाहे तो चला जाए, लेकिन टीना को तो मैं हरगिज नहीं भेजूंगी. जमाना वैसे ही बहुत खराब है… यदि मैं नहीं संभाल पाई तो होस्टल में डाल दूंगी,’’ मैं ने एक सांस में अपनी सारी व्यथा उगल दी. मेरे वर्चस्व का सब ने सम्मान कर के मेरे निर्णय का समर्थन किया. टीना के चेहरे पर खुशी झलक रही थी. वह मेरे गले से लिपट गई.

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‘‘नानी आप को पता है कि ममा ने शादी कर ली?’’ मेरी 15 वर्षीय नातिन टीना ने जब सुबहसुबह यह अप्रत्याशित खबर दी तो मैं बुरी तरह चौंक उठी.

मैं ने पूछा, ‘‘तुझे कैसे पता? फोन आया है क्या?’’

‘‘नहीं, फेसबुक पर पोस्ट किया है,’’ नातिन ने उत्तर दिया.

मैं ने झट से उस के हाथ से मोबाइल लिया और उस पुरुष के प्रोफाइल को देख कर सन्न रह गई. वह पाकिस्तान में रहता था. मैं अपना सिर पकड़ कर बैठ गई. ‘यह लड़की कब कौन सा दिन दिखा दे, कुछ नहीं कह सकते… इस का कुछ नहीं हो सकता.’ मैं मन ही मन बुदबुदाई.

टीना ने देखते ही अपनी मां को अनफ्रैंड कर दिया. 10वीं क्लास में है. छोटी थोड़ी है, सब समझती है.

पूरे घर में सन्नाटा पसर गया था. मेरे पति घर पर नहीं थे. वे थोड़ी देर बाद आए तो यह खबर सुन कर चौंके. फिर थोड़ा संयत होते हुए बोले, ‘‘अच्छा तो है. शादी कर के अपना घर संभाले और हमें जिम्मेदारी से मुक्ति दे. उस के नौकरी पर जाने के बाद उस के बच्चे अब हम से नहीं संभाले जाते… तुम इतनी परेशान क्यों हो?’’

मैं ने थोड़े उत्तेजित स्वर में कहा, ‘‘अरे, मुक्ति कहां मिलेगी? और जिम्मेदारी बढ़ गई है. जिस आदमी से शादी की है वह पाकिस्तानी है, अब वह वहीं रहेगी. इसीलिए तो उस ने नहीं बताया और चुपचाप शादी कर ली. अब बच्चे तो हमें ही संभालने पड़ेंगे… कम से कम मुझे शादी करने से पहले बताती तो… लेकिन जानती थी कि इस शादी के लिए हम कभी नहीं मानेंगे. मानते भी कैसे. अपने देश के लड़के मर गए हैं क्या? मुझ से तो बोल कर गई थी कि औफिस के काम से मुंबई जा रही है.’’

वे विस्फारित आंखों से अवाक से मेरी ओर देखते रह गए.

‘कोई मां इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती है? उसे अपने बूढ़े मांबाप और बच्चों का जरा भी खयाल नहीं आया?’ मैं मन ही मन बुदबुदाई.

ये भी पढ़ें- आत्मग्लानि: कोमल ने चैन की सांस कब ली

‘‘उफ, यह तो बहुत बुरी बात है. हमारे बारे में न सोचे, लेकिन अपने बच्चों की जिम्मेदारी तो उसे उठानी ही चाहिए… वैसे बच्चे तो हम ही संभाल रहे थे उस के बावजूद उस के यहां हमारे साथ रहने से घर में तनाव ही रहता था. अब कम से कम हम शांति से तो रह सकते हैं,’’ उन्होंने मुझे सांत्वना दी.

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन हम भी कब तक संभालेंगे? हमारा शरीर भी थक रहा है. फिर इन का खर्चा कहां से आएगा?’’ मैं ने थके मन से कहा.

यह सुन उन्हें अपनी अदूरदर्शिता पर क्षोभ हुआ तो फिर सकारात्मक में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘हूं.’’

हमारे कोई बेटा नहीं था. इकलौती बेटी मंजरी, जिसे हम ने कंप्यूटर इंजीनिरिंग की उच्च शिक्षा दिलाई थी, को जाने किस के संस्कार मिले थे. उस का जब दूसरा बच्चा हुआ था, तभी से हम अपना घर छोड़ कर उस के बच्चों को संभालने के लिए उस के साथ रह रहे थे. उस के पिता रिटायरमैंट के बाद भी उसे आर्थिक सहायता देने हेतु नौकरी कर रहे थे.

मंजरी के दोनों बच्चे हमारी ही देखरेख में पैदा हुए थे, पले थे. कई बार हम मंजरी के व्यवहार से आहत हो कर यह कह कर कि अब हम कभी नहीं आएंगे, अपने घर लौट जाते, फिर बच्चों की कोई न कोई समस्या देख कर लौट आते. मंजरी हमारी इस कमजोरी का पूरा लाभ उठाने में नहीं चूकती थी.

हम उसे समझाते तो वह कहती, ‘‘आप लोगों ने जिस तरह मेरी परवरिश की है वैसी मैं अपने बच्चों की नहीं होने दूंगी.’’

वास्तविकता तो यह थी कि वह बिना मेहनत के सब कुछ प्राप्त करना चाहती थी, यह हमें बहुत बाद में ज्ञात हुआ. औफिस से आ कर प्रतिदिन बताना कि आज उस की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई थी. झूठी बीमारियों की रिपोर्ट बनवा कर हमें डरा कर हम से इलाज के लिए पैसे भी ऐंठती थी.

हम सब को इमोशनली ब्लैकमेल करती थी. शुरू में तो मैं भी उस की रिपोर्ट्स देख कर घबरा जाती थी कि उस का और उस के बच्चों का क्या होगा, लेकिन उस के चेहरे पर शिकन भी नहीं होती थी. बाद में समझ आया कि अकसर वह गूगल पर बीमारियों के बारे में क्यों जानकारी लेती रहती थी. नौकरी छोड़ के बिजनैस करना, उस को बंद कर के फिर नौकरी करना यह उस की आदत बन गई थी. घर के कार्यों में तो उस की रत्ती भर भी रुचि नहीं थी. खाना बनाने वाली पर या बाजार के खाने पर ही उस के बच्चे पल रहे थे.

मंजरी ने पहली शादी नैट के द्वारा अमेरिका रहने के लोभ के कारण किसी अमेरिका निवासी से की, जिस में हम भी शामिल हुए थे. बिना किसी जानकारी के यह रिश्ता हमें समझ नहीं आ रहा था. हम ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उस पर तो अमेरिका का भूत सवार था. फिर वही हुआ जिस का डर था. कुछ ही महीनों बाद वह गर्भवती हो कर इंडिया आ गई.

शादी के बाद अमेरिका जाने के बाद उसे पता लगा कि वह पहले से विवाहित था, तो उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई थी. हम बेबस थे. उस ने एक बेटी को जन्म दिया. हम ने मंजरी की बेटी को अपने पास रख लिया और वह दिल्ली जा कर किसी कंपनी में नौकरी करने लगी.

एक दिन अचानक जब हम उस से मिलने पहुंचे तो यह देख कर सन्न रह गए कि वह एक पुरुष के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही थी. हम ने अपना सिर पीट लिया. हमें देखते ही वह व्यक्ति वहां से ऐसा गायब हुआ कि फिर दिखाई नहीं दिया. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. 4 महीने का गर्भ उस के पेट में पल रहा था, असहाय से हम कर भी क्या सकते थे. अपना घर छोड़ कर उस के साथ रहने को मजबूर हो गए.

ये भी पढ़ें- गुरू घंटाल: मां अनीता के अंधविश्वास ने बदल दी बेटी नीति की जिंदगी

महरी ने जब डोर बैल बजाई तो मेरे विचारों का तारतम्य टूटा. किचन में जा कर बरतन खाली कर उसे दिए और डिनर की तैयारी में लग गई. लेकिन दिमाग पर अभी भी मंजरी ने ही कब्जा कर रखा था. सोच रही थी इनसान एक बार धोखा खा सकता है, 2 बार खा सकता है, लेकिन यह  तीसरी बार… मुसलमानों में तो 4 शादियों की स्वीकृति उन का धर्म ही देता है, तो क्या गारंटी है कि… और एक और बच्चा हो गया तो?

आगे की स्थिति सोच कर मैं कांप गई, लेकिन जो उस की पृष्ठभूमि थी, उस में कोई संस्कारी पुरुष तो उसे अपनाता नहीं. जो कदम उस ने उठाए हैं, उस के बाद क्या वह अपने परिवार को तथा अपनी किशोरावस्था की ओर अग्रसर होती बेटी को मुंह दिखा पाएगी? जरूर कोई बहुत बड़ा आसामी होगा, जिसे उस ने अपने चंगुल में फांस लिया होगा. पैसे के लिए वह कुछ भी कर सकती है, यह सर्वविदित था. बहुत जल्दी सारी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, कब तक परदे के पीछे रहेगी.

टीना के द्वारा उस को फेसबुक पर अनफ्रैंड करते ही वह समझ गई कि सब को उस के विवाह की खबर मिल गई है और टीना उस से बहुत नाराज है. आए दिन उस का फोन आने लगा. लेकिन इधर की प्रतिक्रिया में कोई अंतर नहीं आया. मैं ने मन ही मन सोचा आखिर कब तक बात नहीं करूंगी? बच्चों के भविष्य के बारे में तो उस से बात करनी ही पड़ेगी.

एक बार उस का फोन आने पर जैसे ही मोबाइल को अपने कान से लगा कर मैं ने हैलो कहा, वह तुरंत बोली, ‘‘टीना को समझाओ… मुझे भी तो खुशी से जीने का हक है. मेरे विवाह से किसी को क्या परेशानी है. अभी भी मैं अपने बच्चों की जिम्मेदारी संभालूंगी. उन्हें किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगी, क्योंकि जिस से मैं ने विवाह किया है उस का बहुत समृद्घ व्यवसाय है…’’

मुझे उस का कथन बड़ा ही हास्यास्पद लगा और मैं ने जो उस के वर्तमान पति की हैसियत के बारे में अनुमान लगाया था वह सत्य निकला. फिर एक दिन अचानक बहुत बड़ा सा कूरियर आया, जिस में बहुत महंगे मोबाइल और बच्चों के लिए कपड़े थे और औन लाइन बहुत सारा खाने का सामान, जिस में चौकलेट, केक, पेस्ट्री आदि भेजा था. सामान को देख कर चिंटू के अलावा कोई खुश नहीं हुआ.

एक दिन मंजरी ने हमें अपने बच्चों का वीजा बनवाने के लिए कहा कि एअर टिकट वह भेज देगी और हमारे लिए भी फ्लाइट के टिकट भेजेगी ताकि हम अपने घर लौट जाएं.

यह सुनते ही टीना आक्रोश में बोली, ‘‘नहीं जाना मुझे. आप के पास रहना है, आई हेट हर…’’ चिंटू बोला, ‘‘मुझे जाना है, ममा के पास, लेकिन वे यहां क्यों नहीं आतीं?’’

मैं तो शब्दहीन हो कर सन्न रह गई. थोड़ा मौन रहने के बाद कटाक्ष करते हुए बोली, ‘‘बहुत अच्छा संदेश दिया है तूने… तूने बच्चों को जन्म दिया है, तेरा पूरा अधिकार है उन पर, कानून भी तेरा ही साथ देगी. हम तो केयरटेकर मात्र हैं. हमारा कोई रिश्ता थोड़ी है बच्चों से… पूछे कोई तुम से रातरात भर जाग कर किस ने बच्चों को पाला है. वहां जाने के बाद तो हम इन से मिलने को तरस जाएंगे.

‘‘यदि तुम्हें बच्चों की इतनी चिंता होती तो ऐसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचती. बच्चे प्यार के भूखे होते हैं, पैसे के नहीं. हमारी भावनाओं की तो कद्र ही नहीं है, जाने किस मिट्टी की बनी है तू. मुझे अफसोस है कि  तू मेरी बेटी है, मुझे तुझ पर ही विश्वास नहीं है कि तू बच्चों को अच्छी तरह पालेगी, फिर मैं उस सौतेले बाप पर कैसे कर सकती हूं…’’

‘‘चिंटू जाना चाहे तो चला जाए, लेकिन टीना को तो मैं हरगिज नहीं भेजूंगी. जमाना वैसे ही बहुत खराब है… यदि मैं नहीं संभाल पाई तो होस्टल में डाल दूंगी,’’ मैं ने एक सांस में अपनी सारी व्यथा उगल दी. मेरे वर्चस्व का सब ने सम्मान कर के मेरे निर्णय का समर्थन किया. टीना के चेहरे पर खुशी झलक रही थी. वह मेरे गले से लिपट गई.

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February 25, 2022 at 09:49AM