Thursday, 30 December 2021

यही प्यार है: अखिलेश और रीमा की बेइंतहा मोहब्बत की कहानी

राइटर- आरती प्रियदर्शनी

दिसंबर का पहला पखवाड़ा चल रहा था. शीतऋतु दस्तक दे चुकी थी. सूरज भी धीरेधीरे अस्ताचल की ओर प्रस्थान कर रहा था और उस की किरणें आसमान में लालिमा फैलाए हुए थीं. ऐसा लग रहा था मानो ठंड के कारण सभी घर जा कर रजाई में घुस कर सोना चाहते हों. पार्क लगभग खाली हो चुका था, लेकिन हम दोनों अभी तक उसी बैंच पर बैठे बातें कर रहे थे. हम एकदूसरे की बातों में इतने खो गए थे कि हमें रात्रि की आहट का भी पता नहीं चला. मैं तो बस, एकाग्रचित्त हो अखिलेश की दीवानगी भरी बातें सुन रही थी.

‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं रीमा, मुझे कभी तनहा मत छोड़ना. मैं तुम्हारे बगैर बिलकुल नहीं जी पाऊंगा,’’ अखिलेश ने मेरी उंगलियों को सहलाते हुए कहा.

‘‘कैसी बातें कर रहे हो अखिलेश, मैं तो हमेशा तुम्हारी बांहों में ही रहूंगी, जिऊंगी भी तुम्हारी बांहों में और मरूंगी भी तुम्हारी ही गोद में सिर रख कर.’’

मेरी बातें सुनते ही अखिलेश बौखला गया, ‘‘यह कैसा प्यार है रीमा, एक तरफ तो तुम मेरे साथ जीने की कसमें खाती हो और अब मेरी गोद में सिर रख कर मरना चाहती हो? तुम ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि मैं तुम्हारे बिना जी कर क्या करूंगा? बोलो रीमा, बोलो न.’’ अखिलेश बच्चों की तरह बिलखने लगा.

‘‘और तुम… क्या तुम उस दूसरी दुनिया में मेरे बगैर रह पाओगी? जानती हो रीमा, अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो क्या कहता,’’ अखिलेश ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘यदि तुम इस दुनिया से पहले चली जाओगी तो मैं तुम्हारे पास आने में बिलकुल भी देर नहीं करूंगा और यदि मैं पहले चला गया तो फिर तुम्हें अपने पास बुलाने में देर नहीं करूंगा, क्योंकि मैं तुम्हारे बिना कहीं भी नहीं रह सकता.’’

अखिलेश का यह रूप देख कर पहले तो मैं सहम गई, लेकिन अपने प्रति अखिलेश का यह पागलपन मुझे अच्छा लगा. हमारे प्यार की कलियां अब खिलने लगी थीं. किसी को भी हमारे प्यार से कोई एतराज नहीं था. दोनों ही घरों में हमारे रिश्ते की बातें होने लगी थीं. मारे खुशी के मेरे कदम जमीन पर ही नहीं पड़ते थे, लेकिन अखिलेश को न जाने आजकल क्या हो गया था. हर वक्त वह खोयाखोया सा रहता था. उस का चेहरा पीला पड़ता जा रहा था. शरीर भी काफी कमजोर हो गया था.

मैं ने कई बार उस से पूछा, लेकिन हर बार वह टाल जाता था. मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता था, जैसे वह मुझ से कुछ छिपा रहा है. इधर कुछ दिनों से वह जल्दी शादी करने की जिद कर रहा था. उस की जिद में छिपे प्यार को मैं तो समझ रही थी, मगर मेरे पापा मेरी शादी अगले साल करना चाहते थे ताकि मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर लूं. इसलिए चाह कर भी मैं अखिलेश की जिद न मान सकी.

अखिलेश मुझे दीवानों की तरह प्यार करता था और मुझे पाने के लिए वह कुछ भी कर सकता था. यह बात मुझे उस दिन समझ में आ गई जब शाम को अखिलेश ने फोन कर के मुझे अपने घर बुलाया. जब मैं वहां पहुंची तो घर में कोई भी नहीं था. अखिलेश अकेला था. उस के मम्मीपापा कहीं गए हुए थे. अखिलेश ने मुझे बताया कि उसे घबराहट हो रही थी और उस की तबीयत भी ठीक नहीं थी इसलिए उस ने मुझे बुलाया है.

थोड़ी देर बाद जब मैं उस के लिए कौफी बनाने रसोई में गई, तभी अखिलेश ने पीछे से आ कर मुझे आलिंगनबद्ध कर लिया, मैं ने घबरा कर पीछे हटना चाहा, लेकिन उस की बांहों की जंजीर न तोड़ सकी. वह बेतहाशा मुझे चूमने लगा, ‘‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता रीमा, जीना तो दूर तुम्हारे बिना तो मैं मर भी नहीं पाऊंगा. आज मुझे मत रोको रीमा, मैं अकेला नहीं रह पाऊंगा.’’

मेरे मुंह से तो आवाज तक नहीं निकल सकी और एक बेजान लता की तरह मैं उस से लिपटती चली गई. उस की आंखों में बिछुड़ने का भय साफ झलक रहा था और मैं उन आंखों में समा कर इस भय को समाप्त कर देना चाहती थी तभी तो बंद पलकों से मैं ने अपनी सहमति जाहिर कर दी. फिर हम दोनों प्यार के उफनते सागर में डूबते चले गए और जब हमें होश आया तब तक सारी सीमाएं टूट चुकी थीं. मैं अखिलेश से नजरें भी नहीं मिला पा रही थी और उस के लाख रोकने के बावजूद बिना कुछ कहे वापस आ गई.

इन 15 दिन में न जाने कितनी बार वह फोन और एसएमएस कर चुका था. मगर न तो मैं ने उस के एसएमएस का कोई जवाब दिया और न ही उस का फोन रिसीव किया. 16वें दिन अखिलेश की मम्मी ने ही फोन कर के मुझे बताया कि अखिलेश पिछले 15 दिन से अस्पताल में भरती है और उस की अंतिम सांसें चल रही हैं. अखिलेश ने उसे बताने से मना किया था, इसलिए वे अब तक उसे नहीं बता पा रही थीं.

इतना सुनते ही मैं एकपल भी न रुक सकी. अस्पताल पहुंचने पर मुझे पता चला कि अब उस की जिंदगी के बस कुछ ही क्षण बाकी हैं. परिवार के सभी लोग आंसुओं के सैलाब को रोके हुए थे. मैं बदहवास सी दौड़ती हुई अखिलेश के पास चली गई. आहट पा कर उस ने अपनी आंखें खोलीं. उस की आंखों में खुशी की चमक आ गई थी. मैं दौड़ कर उस के कृशकाय शरीर से लिपट गई.

‘‘तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं अखिलेश, सिर्फ ‘कौल मी’ लिख कर सैकड़ों बार मैसेज करते थे. क्या एक बार भी तुम अपनी बीमारी के बारे में मुझे नहीं बता सकते थे? क्या मैं इस काबिल भी नहीं कि तुम्हारा गम बांट सकूं?‘‘

‘‘मैं हर दिन तुम्हें फोन करता था रीमा, पर तुम ने एक बार भी क्या मुझ से बात की?’’

‘‘नहीं अखिलेश, ऐसी कोई बात नहीं थी, लेकिन उस दिन की घटना की वजह से मैं तुम से नजरें नहीं मिला पा रही थी.’’

‘‘लेकिन गलती तो मेरी भी थी न रीमा, फिर तुम क्यों नजरें चुरा रही थीं. वह तो मेरा प्यार था रीमा ताकि तुम जब तक जीवित रहोगी मेरे प्यार को याद रख सकोगी.’’

‘‘नहीं अखिलेश, हम ने साथ जीनेमरने का वादा किया था. आज तुम मुझे मंझधार में अकेला छोड़ कर नहीं जा सकते,’’ उस के मौत के एहसास से मैं कांप उठी.

‘‘अभी नहीं रीमा, अभी तो मैं अकेला ही जा रहा हूं, मगर तुम मेरे पास जरूर आओगी रीमा, तुम्हें आना ही पड़ेगा. बोलो रीमा, आओगी न अपने अखिलेश के पास’’,

अभी अखिलेश और कुछ कहता कि उस की सांसें उखड़ने लगीं और डाक्टर ने मुझे बाहर जाने के लिए कह दिया.

डाक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद अखिलेश को नहीं बचाया जा सका. मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई थी. मेरा तो सुहागन बनने का रंगीन ख्वाब ही चकनाचूर हो गया. सब से बड़ा धक्का तो मुझे उस समय लगा जब पापा ने एक भयानक सच उजागर किया. यह कालेज के दिनों की कुछ गलतियों का नतीजा था, जो पिछले एक साल से वह एड्स जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहा था. उस ने यह बात अपने परिवार में किसी से नहीं बताई थी. यहां तक कि डाक्टर से भी किसी को न बताने की गुजारिश की थी.

मेरे कदमों तले जमीन खिसक गई. मुझे अपने पागलपन की वह रात याद आ गई जब मैं ने अपना सर्वस्व अखिलेश को समर्पित कर दिया था.

आज उस की 5वीं बरसी है और मैं मौत के कगार पर खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही हूं. मुझे अखिलेश से कोई शिकायत नहीं है और न ही अपने मरने का कोई गम है, क्योंकि मैं जानती हूं कि जिंदगी के उस पार मौत नहीं, बल्कि अखिलेश मेरा बेसब्री से इंतजार कर रहा होगा.

मैं ने अखिलेश का साथ देने का वादा किया था, इसलिए मेरा जाना तो निश्चित है परंतु आज तक मैं यह नहीं समझ पाई कि मैं ने और अखिलेश ने जो किया वह सही था या गलत?

अखिलेश का वादा पक्का था, मेरे समर्पण में प्यार था या हम दोनों को प्यार की मंजिल के रूप में मौत मिली, यह प्यार था. क्या यही प्यार है? क्या पता मेरी डायरी में लिखा यह वाक्य मेरा अंतिम वाक्य हो. कल का सूरज मैं देख भी पाऊंगी या नहीं, मुझे पता नहीं.

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दिसंबर का पहला पखवाड़ा चल रहा था. शीतऋतु दस्तक दे चुकी थी. सूरज भी धीरेधीरे अस्ताचल की ओर प्रस्थान कर रहा था और उस की किरणें आसमान में लालिमा फैलाए हुए थीं. ऐसा लग रहा था मानो ठंड के कारण सभी घर जा कर रजाई में घुस कर सोना चाहते हों. पार्क लगभग खाली हो चुका था, लेकिन हम दोनों अभी तक उसी बैंच पर बैठे बातें कर रहे थे. हम एकदूसरे की बातों में इतने खो गए थे कि हमें रात्रि की आहट का भी पता नहीं चला. मैं तो बस, एकाग्रचित्त हो अखिलेश की दीवानगी भरी बातें सुन रही थी.

‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं रीमा, मुझे कभी तनहा मत छोड़ना. मैं तुम्हारे बगैर बिलकुल नहीं जी पाऊंगा,’’ अखिलेश ने मेरी उंगलियों को सहलाते हुए कहा.

‘‘कैसी बातें कर रहे हो अखिलेश, मैं तो हमेशा तुम्हारी बांहों में ही रहूंगी, जिऊंगी भी तुम्हारी बांहों में और मरूंगी भी तुम्हारी ही गोद में सिर रख कर.’’

मेरी बातें सुनते ही अखिलेश बौखला गया, ‘‘यह कैसा प्यार है रीमा, एक तरफ तो तुम मेरे साथ जीने की कसमें खाती हो और अब मेरी गोद में सिर रख कर मरना चाहती हो? तुम ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि मैं तुम्हारे बिना जी कर क्या करूंगा? बोलो रीमा, बोलो न.’’ अखिलेश बच्चों की तरह बिलखने लगा.

‘‘और तुम… क्या तुम उस दूसरी दुनिया में मेरे बगैर रह पाओगी? जानती हो रीमा, अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो क्या कहता,’’ अखिलेश ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘यदि तुम इस दुनिया से पहले चली जाओगी तो मैं तुम्हारे पास आने में बिलकुल भी देर नहीं करूंगा और यदि मैं पहले चला गया तो फिर तुम्हें अपने पास बुलाने में देर नहीं करूंगा, क्योंकि मैं तुम्हारे बिना कहीं भी नहीं रह सकता.’’

अखिलेश का यह रूप देख कर पहले तो मैं सहम गई, लेकिन अपने प्रति अखिलेश का यह पागलपन मुझे अच्छा लगा. हमारे प्यार की कलियां अब खिलने लगी थीं. किसी को भी हमारे प्यार से कोई एतराज नहीं था. दोनों ही घरों में हमारे रिश्ते की बातें होने लगी थीं. मारे खुशी के मेरे कदम जमीन पर ही नहीं पड़ते थे, लेकिन अखिलेश को न जाने आजकल क्या हो गया था. हर वक्त वह खोयाखोया सा रहता था. उस का चेहरा पीला पड़ता जा रहा था. शरीर भी काफी कमजोर हो गया था.

मैं ने कई बार उस से पूछा, लेकिन हर बार वह टाल जाता था. मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता था, जैसे वह मुझ से कुछ छिपा रहा है. इधर कुछ दिनों से वह जल्दी शादी करने की जिद कर रहा था. उस की जिद में छिपे प्यार को मैं तो समझ रही थी, मगर मेरे पापा मेरी शादी अगले साल करना चाहते थे ताकि मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर लूं. इसलिए चाह कर भी मैं अखिलेश की जिद न मान सकी.

अखिलेश मुझे दीवानों की तरह प्यार करता था और मुझे पाने के लिए वह कुछ भी कर सकता था. यह बात मुझे उस दिन समझ में आ गई जब शाम को अखिलेश ने फोन कर के मुझे अपने घर बुलाया. जब मैं वहां पहुंची तो घर में कोई भी नहीं था. अखिलेश अकेला था. उस के मम्मीपापा कहीं गए हुए थे. अखिलेश ने मुझे बताया कि उसे घबराहट हो रही थी और उस की तबीयत भी ठीक नहीं थी इसलिए उस ने मुझे बुलाया है.

थोड़ी देर बाद जब मैं उस के लिए कौफी बनाने रसोई में गई, तभी अखिलेश ने पीछे से आ कर मुझे आलिंगनबद्ध कर लिया, मैं ने घबरा कर पीछे हटना चाहा, लेकिन उस की बांहों की जंजीर न तोड़ सकी. वह बेतहाशा मुझे चूमने लगा, ‘‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता रीमा, जीना तो दूर तुम्हारे बिना तो मैं मर भी नहीं पाऊंगा. आज मुझे मत रोको रीमा, मैं अकेला नहीं रह पाऊंगा.’’

मेरे मुंह से तो आवाज तक नहीं निकल सकी और एक बेजान लता की तरह मैं उस से लिपटती चली गई. उस की आंखों में बिछुड़ने का भय साफ झलक रहा था और मैं उन आंखों में समा कर इस भय को समाप्त कर देना चाहती थी तभी तो बंद पलकों से मैं ने अपनी सहमति जाहिर कर दी. फिर हम दोनों प्यार के उफनते सागर में डूबते चले गए और जब हमें होश आया तब तक सारी सीमाएं टूट चुकी थीं. मैं अखिलेश से नजरें भी नहीं मिला पा रही थी और उस के लाख रोकने के बावजूद बिना कुछ कहे वापस आ गई.

इन 15 दिन में न जाने कितनी बार वह फोन और एसएमएस कर चुका था. मगर न तो मैं ने उस के एसएमएस का कोई जवाब दिया और न ही उस का फोन रिसीव किया. 16वें दिन अखिलेश की मम्मी ने ही फोन कर के मुझे बताया कि अखिलेश पिछले 15 दिन से अस्पताल में भरती है और उस की अंतिम सांसें चल रही हैं. अखिलेश ने उसे बताने से मना किया था, इसलिए वे अब तक उसे नहीं बता पा रही थीं.

इतना सुनते ही मैं एकपल भी न रुक सकी. अस्पताल पहुंचने पर मुझे पता चला कि अब उस की जिंदगी के बस कुछ ही क्षण बाकी हैं. परिवार के सभी लोग आंसुओं के सैलाब को रोके हुए थे. मैं बदहवास सी दौड़ती हुई अखिलेश के पास चली गई. आहट पा कर उस ने अपनी आंखें खोलीं. उस की आंखों में खुशी की चमक आ गई थी. मैं दौड़ कर उस के कृशकाय शरीर से लिपट गई.

‘‘तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं अखिलेश, सिर्फ ‘कौल मी’ लिख कर सैकड़ों बार मैसेज करते थे. क्या एक बार भी तुम अपनी बीमारी के बारे में मुझे नहीं बता सकते थे? क्या मैं इस काबिल भी नहीं कि तुम्हारा गम बांट सकूं?‘‘

‘‘मैं हर दिन तुम्हें फोन करता था रीमा, पर तुम ने एक बार भी क्या मुझ से बात की?’’

‘‘नहीं अखिलेश, ऐसी कोई बात नहीं थी, लेकिन उस दिन की घटना की वजह से मैं तुम से नजरें नहीं मिला पा रही थी.’’

‘‘लेकिन गलती तो मेरी भी थी न रीमा, फिर तुम क्यों नजरें चुरा रही थीं. वह तो मेरा प्यार था रीमा ताकि तुम जब तक जीवित रहोगी मेरे प्यार को याद रख सकोगी.’’

‘‘नहीं अखिलेश, हम ने साथ जीनेमरने का वादा किया था. आज तुम मुझे मंझधार में अकेला छोड़ कर नहीं जा सकते,’’ उस के मौत के एहसास से मैं कांप उठी.

‘‘अभी नहीं रीमा, अभी तो मैं अकेला ही जा रहा हूं, मगर तुम मेरे पास जरूर आओगी रीमा, तुम्हें आना ही पड़ेगा. बोलो रीमा, आओगी न अपने अखिलेश के पास’’,

अभी अखिलेश और कुछ कहता कि उस की सांसें उखड़ने लगीं और डाक्टर ने मुझे बाहर जाने के लिए कह दिया.

डाक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद अखिलेश को नहीं बचाया जा सका. मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई थी. मेरा तो सुहागन बनने का रंगीन ख्वाब ही चकनाचूर हो गया. सब से बड़ा धक्का तो मुझे उस समय लगा जब पापा ने एक भयानक सच उजागर किया. यह कालेज के दिनों की कुछ गलतियों का नतीजा था, जो पिछले एक साल से वह एड्स जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहा था. उस ने यह बात अपने परिवार में किसी से नहीं बताई थी. यहां तक कि डाक्टर से भी किसी को न बताने की गुजारिश की थी.

मेरे कदमों तले जमीन खिसक गई. मुझे अपने पागलपन की वह रात याद आ गई जब मैं ने अपना सर्वस्व अखिलेश को समर्पित कर दिया था.

आज उस की 5वीं बरसी है और मैं मौत के कगार पर खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही हूं. मुझे अखिलेश से कोई शिकायत नहीं है और न ही अपने मरने का कोई गम है, क्योंकि मैं जानती हूं कि जिंदगी के उस पार मौत नहीं, बल्कि अखिलेश मेरा बेसब्री से इंतजार कर रहा होगा.

मैं ने अखिलेश का साथ देने का वादा किया था, इसलिए मेरा जाना तो निश्चित है परंतु आज तक मैं यह नहीं समझ पाई कि मैं ने और अखिलेश ने जो किया वह सही था या गलत?

अखिलेश का वादा पक्का था, मेरे समर्पण में प्यार था या हम दोनों को प्यार की मंजिल के रूप में मौत मिली, यह प्यार था. क्या यही प्यार है? क्या पता मेरी डायरी में लिखा यह वाक्य मेरा अंतिम वाक्य हो. कल का सूरज मैं देख भी पाऊंगी या नहीं, मुझे पता नहीं.

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December 30, 2021 at 12:29PM

गुरुजी : रोहन की मां और पत्नी से कैसे पैसे ऐंठता था गुरुजी

विधि के गुरुजी को देख कर धक्का सा लगा. जरा भी तो नहीं बदला था विजय. बस, पहले अमीरी का रोब नहीं था. अब वह तो है ही. हम जैसे मूर्ख भक्त भी हैं. ‘‘देखो, तुम्हारी ही उम्र के होंगे पर किसी भी समस्या का सिद्धि के बल पर चुटकियों में निदान ढूंढ़ लेते हैं,’’ विधि मेरे कानों में फुसफुसाई.

अब तक मैं ‘गुरुजी’ के किसी भी काम में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था, पर गुरुजी को देखने के बाद तो जैसे मैं उतावला ही हो गया था. ‘‘देखा, गुरुजी के दर्शन मात्र से मन का मैल दूर हो गया,’’ विधि ने विजयी भाव से मम्मी की तरफ देखा.

मम्मी जो विधि की हर बात काटती थीं, भी संतुष्टि से गरदन हिला कर मुसकराईं, ‘‘बेटी, मुझे पहले ही पता था कि बस गुरुजी के घर आने की देरी है. सब मंगलमय हो जाएगा.’’

मेरी तरफ से किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होगी, यह दोनों को अच्छी तरह समझ में आ गया था. मुझ से छिपा कर गुरुजी के लिए उपहार और स्वागत के लिए पकवान इत्यादि बाहर आने लगे. विजय मेरे रघु भैया की क्लास में था. हम दोनों भाई शहर में एक कमरा ले कर पढ़ा करते थे. कालेज के पास ही कमरा लिया था, तो कुछ यारदोस्त आ ही जाते थे.

मगर विजय से हम दोनों भाई परेशान हो गए थे. उस के पिताजी कालेज के गेट पर उसे छोड़ते तो सीधा हमारे कमरे पर आ जाता. हम दोनों भाई क्लास से वापस आते तो वह सोया होता. कामचोरी और काहिली का ऐसा अनूठा मिश्रण हम दोनों भाइयों ने पहली बार देखा था. किसी तरह गिरतेपड़ते थर्ड डिविजन में बीकौम किया और फिर दुकान खोल ली.

कहने की जरूरत नहीं कि दुकान का क्या हश्र हुआ. फिर न जाने किस के कहने पर उस की शादी कर दी गई. हम दोनों भाई एमबीए कर रहे थे. उस की शादी में तो नहीं गए परंतु डाक इत्यादि लेने आखिरी बार कमरे पर गए तो मिला था विजय. 2 बच्चों का बाप बन गया था. 3 बिजनैस 2 साल में कर चुका था. आज फिर से इस निकम्मे विजय पर इतना खर्चा.

‘इस निकम्मे विजय के लिए मेरी मेहनत की कमाई के क्व10-12 हजार अवश्य भेंट चढ़ा दिए हैं दोनों ने,’ मन ही मन सिर धुनता हुआ मैं विजय से मिलने पहुंचा. ‘‘कैसे हो विजय भैया, पहचाना मुझे? मैं रघु का छोटा भाई रोहन,’’ मैं ने हाथ जोड़ते हुए स्वागत किया.

‘‘गुरुजी, हर नातेरिश्ते का परित्याग कर चुके हैं,’’ उन के शिष्य ने ऊंची आवाज में कहा. ‘‘कैसे हो रोहन?’’

मैं ने महसूस किया कि विजय असहज महसूस कर रहा है. ‘‘मुझे अकेले में रोहन से कुछ बातें करनी हैं,’’ गुरुजी के इतना कहते ही मुझे एकांत मिल गया.

‘‘यह क्या, आप ने तो बिजनैस शुरू किया था न?’’ मैं ने चाय का कप पकड़ाते हुए पूछा.

‘‘नहीं चला, जिस काम में भी हाथ डाला नहीं चला. थकहार कर मैं घर बैठ गया था. इसी बीच एक दिन पड़ोस के रमाकांत की पत्नी अपने गुरुजी के पास ले कर गईं. और फिर धीरेधीरे मुझे उन की पदवी मिल गई. चढ़ावा वगैरह सब कुछ आपस में बराबर बंटता है. बस नाम की पदवी है. ‘‘इत्तेफाक से कुछ लोगों की समस्याएं इतनी तुच्छ होती हैं कि व्यावहारिक टोटके ही सुलझा देते हैं. खैर, अब पैसा, पदवी, नौकरचाकर सबकुछ है. राहुल और बंटी लंदन में पढ़ाई कर रहे हैं,’’ गुरुजी उर्फ विजय ने कुछ भी नहीं छिपाया उस से.

‘‘पर अगर किसी दिन भक्तों को पता चल गया कि आप की गृहस्थी है तब क्या होगा?’’ कामचोरी और काहिली से मजबूर विजय आज भी वैसा ही था. मैं सोच रहा था कि अगर विजय ने थोड़ी मेहनत और कर ली होती तो शायद अच्छी नौकरी मिल जाती. मेहनत की कमाई का नशा कुछ और ही होता है. कुछ भी हो चोर चोर ही होता है, चाहे अंधेरे का चोर हो या फिर सफेदपोश चोर.

‘‘विजय भैया, आप यहां आए अच्छा लगा. जब जी चाहे आप यहां आ सकते हैं. मेरी पत्नी और मां को पता नहीं था कि विजय भैया यहां आ रहे हैं. सारे आयोजन पर कम से कम क्व10-12 हजार का खर्च तो हुआ ही होगा…’’ मैं अपनी बात पूरी कर पाता उस से पहले ही विजय ने एक शिष्य को आवाज दी. कान में कुछ गिटपिट हुई और क्व6 हजार उन के शिष्य ने उन्हें पकड़ा दिए.

विजय ने मुझे रुपए देते हुए इतना ही कहा, ‘‘तुम्हारा परिवार मेरी इज्जत करता है, इन बातों को अपने तक ही सीमित रखना.’’ विजय तो चला गया. मेरी पत्नी और मम्मी का गुरुजी का भूत भी साथ ही ले गया. विजय के बारे में मम्मी ने बहुत कुछ सुन रखा था. जितना भी सुना पर उस के बाद वे हम से इतना जरूर कहती थीं कि उस विजय से तुम दोनों दूर ही रहना. अपना कमरा भी उस से दूर ले लो. अब जब वह गुरुजी के रूप में पहली बार दिखा तो जान कर चढ़ी भक्ति का पानी अपनेआप उतर गया.

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विधि के गुरुजी को देख कर धक्का सा लगा. जरा भी तो नहीं बदला था विजय. बस, पहले अमीरी का रोब नहीं था. अब वह तो है ही. हम जैसे मूर्ख भक्त भी हैं. ‘‘देखो, तुम्हारी ही उम्र के होंगे पर किसी भी समस्या का सिद्धि के बल पर चुटकियों में निदान ढूंढ़ लेते हैं,’’ विधि मेरे कानों में फुसफुसाई.

अब तक मैं ‘गुरुजी’ के किसी भी काम में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था, पर गुरुजी को देखने के बाद तो जैसे मैं उतावला ही हो गया था. ‘‘देखा, गुरुजी के दर्शन मात्र से मन का मैल दूर हो गया,’’ विधि ने विजयी भाव से मम्मी की तरफ देखा.

मम्मी जो विधि की हर बात काटती थीं, भी संतुष्टि से गरदन हिला कर मुसकराईं, ‘‘बेटी, मुझे पहले ही पता था कि बस गुरुजी के घर आने की देरी है. सब मंगलमय हो जाएगा.’’

मेरी तरफ से किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होगी, यह दोनों को अच्छी तरह समझ में आ गया था. मुझ से छिपा कर गुरुजी के लिए उपहार और स्वागत के लिए पकवान इत्यादि बाहर आने लगे. विजय मेरे रघु भैया की क्लास में था. हम दोनों भाई शहर में एक कमरा ले कर पढ़ा करते थे. कालेज के पास ही कमरा लिया था, तो कुछ यारदोस्त आ ही जाते थे.

मगर विजय से हम दोनों भाई परेशान हो गए थे. उस के पिताजी कालेज के गेट पर उसे छोड़ते तो सीधा हमारे कमरे पर आ जाता. हम दोनों भाई क्लास से वापस आते तो वह सोया होता. कामचोरी और काहिली का ऐसा अनूठा मिश्रण हम दोनों भाइयों ने पहली बार देखा था. किसी तरह गिरतेपड़ते थर्ड डिविजन में बीकौम किया और फिर दुकान खोल ली.

कहने की जरूरत नहीं कि दुकान का क्या हश्र हुआ. फिर न जाने किस के कहने पर उस की शादी कर दी गई. हम दोनों भाई एमबीए कर रहे थे. उस की शादी में तो नहीं गए परंतु डाक इत्यादि लेने आखिरी बार कमरे पर गए तो मिला था विजय. 2 बच्चों का बाप बन गया था. 3 बिजनैस 2 साल में कर चुका था. आज फिर से इस निकम्मे विजय पर इतना खर्चा.

‘इस निकम्मे विजय के लिए मेरी मेहनत की कमाई के क्व10-12 हजार अवश्य भेंट चढ़ा दिए हैं दोनों ने,’ मन ही मन सिर धुनता हुआ मैं विजय से मिलने पहुंचा. ‘‘कैसे हो विजय भैया, पहचाना मुझे? मैं रघु का छोटा भाई रोहन,’’ मैं ने हाथ जोड़ते हुए स्वागत किया.

‘‘गुरुजी, हर नातेरिश्ते का परित्याग कर चुके हैं,’’ उन के शिष्य ने ऊंची आवाज में कहा. ‘‘कैसे हो रोहन?’’

मैं ने महसूस किया कि विजय असहज महसूस कर रहा है. ‘‘मुझे अकेले में रोहन से कुछ बातें करनी हैं,’’ गुरुजी के इतना कहते ही मुझे एकांत मिल गया.

‘‘यह क्या, आप ने तो बिजनैस शुरू किया था न?’’ मैं ने चाय का कप पकड़ाते हुए पूछा.

‘‘नहीं चला, जिस काम में भी हाथ डाला नहीं चला. थकहार कर मैं घर बैठ गया था. इसी बीच एक दिन पड़ोस के रमाकांत की पत्नी अपने गुरुजी के पास ले कर गईं. और फिर धीरेधीरे मुझे उन की पदवी मिल गई. चढ़ावा वगैरह सब कुछ आपस में बराबर बंटता है. बस नाम की पदवी है. ‘‘इत्तेफाक से कुछ लोगों की समस्याएं इतनी तुच्छ होती हैं कि व्यावहारिक टोटके ही सुलझा देते हैं. खैर, अब पैसा, पदवी, नौकरचाकर सबकुछ है. राहुल और बंटी लंदन में पढ़ाई कर रहे हैं,’’ गुरुजी उर्फ विजय ने कुछ भी नहीं छिपाया उस से.

‘‘पर अगर किसी दिन भक्तों को पता चल गया कि आप की गृहस्थी है तब क्या होगा?’’ कामचोरी और काहिली से मजबूर विजय आज भी वैसा ही था. मैं सोच रहा था कि अगर विजय ने थोड़ी मेहनत और कर ली होती तो शायद अच्छी नौकरी मिल जाती. मेहनत की कमाई का नशा कुछ और ही होता है. कुछ भी हो चोर चोर ही होता है, चाहे अंधेरे का चोर हो या फिर सफेदपोश चोर.

‘‘विजय भैया, आप यहां आए अच्छा लगा. जब जी चाहे आप यहां आ सकते हैं. मेरी पत्नी और मां को पता नहीं था कि विजय भैया यहां आ रहे हैं. सारे आयोजन पर कम से कम क्व10-12 हजार का खर्च तो हुआ ही होगा…’’ मैं अपनी बात पूरी कर पाता उस से पहले ही विजय ने एक शिष्य को आवाज दी. कान में कुछ गिटपिट हुई और क्व6 हजार उन के शिष्य ने उन्हें पकड़ा दिए.

विजय ने मुझे रुपए देते हुए इतना ही कहा, ‘‘तुम्हारा परिवार मेरी इज्जत करता है, इन बातों को अपने तक ही सीमित रखना.’’ विजय तो चला गया. मेरी पत्नी और मम्मी का गुरुजी का भूत भी साथ ही ले गया. विजय के बारे में मम्मी ने बहुत कुछ सुन रखा था. जितना भी सुना पर उस के बाद वे हम से इतना जरूर कहती थीं कि उस विजय से तुम दोनों दूर ही रहना. अपना कमरा भी उस से दूर ले लो. अब जब वह गुरुजी के रूप में पहली बार दिखा तो जान कर चढ़ी भक्ति का पानी अपनेआप उतर गया.

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December 30, 2021 at 10:57AM

Wednesday, 29 December 2021

अपनी खुशी के लिए- भाग 3: क्या जबरदस्ती की शादी से बच पाई नम्रता?

‘‘चलिए न मांजी. हम तीनों चलेंगे. स्कूल जाने के बाद थोड़ा घूमेंगेफिरेंगे. फिर बाहर ही खापी कर लौट आएंगे,’’ उत्तर खुशी के स्थान पर नम्रता ने दिया.

‘‘क्यों नहीं, मैं तो खुशी से पहले तैयार हो जाऊंगी,’’ पूर्णा देवी ने सहमति जताई.

तरंग ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि उस के परिवार की महिलाएं बिना उस की सहायता के घर से बाहर की खुली हवा में निकलने का साहस करेंगी. पूर्णा देवी ने परिवार में कठोर अनुशासन में दिन बिताए थे. उन के सासससुर ही नहीं उन के पति भी स्त्रियों का स्थान घर की चारदीवारी में ही होने में विश्वास करते थे. उन्होंने यही सोच कर संतोष कर लिया था? कि उन का जीवन तो किसी प्रकार कट गया पर आने वाली पीढ़ी को वे अपनी तरह घुटघुट कर नहीं जीने देंगी. पर केवल सोच लेने से क्या होता है? वे नम्रता के हंसमुख और जिंदादिल स्वभाव से ही प्रभावित हुई थीं पर विवाह के बाद तिलतिल कर बुझने लगी थी नम्रता. यों घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. तरंग की अच्छीभली नौकरी थी. उन के पति श्रीराम का फलताफूलता व्यवसाय था. पर तरंग ने अपने पिता के आचारविचार और स्वभाव विरासत में पाया था.

वह स्वयं रंगरलियां मनाने को स्वतंत्र था पर नम्रता पर कड़ा पहरा था. उस का खिड़की से बाहर झांकना तक तरंग को पसंद नहीं था. नम्रता को हर बात पर नीचा दिखाना, जलीकटी सुनाना, क्रोध में बरतन, प्लेटें आदि उठा कर फेंक देना, उस के स्वभाव के अभिन्न अंग थे. ऐसे में नम्रता अपने ही संसार में सिमट कर रह गई थी.

‘‘दादीमां, सो गईं क्या?’’ उन की विचारशृंखला शायद इसी तरह चलती रहती कि खुशी के स्वर ने उन्हें झकझोर कर जगा दिया.

‘‘मेरा स्कूल आ गया दादीमां,’’ खुशी बोली.

‘‘तेरा स्कूल नहीं आया बुद्धू. हम तेरे स्कूल आ गए,’’ पूर्णा देवी ने हंसते हुए कहा.

‘‘देखा मम्मी, दादीमां मुझे बुद्धू कह रही हैं,’’ खुशी हंसते हुए बोली. फिर मां और दादीमां का हाथ थामे अपनी कक्षा की ओर खींच ले गई.

‘‘शीरी मैम, मेरी मम्मी और मेरी दादीमां,’’ खुशी ने प्रसन्नता से अपनी टीचर से दोनों का परिचय कराया.

‘‘आप को पहली बार देखा है मैं ने. आप तो कभी आती ही नहीं. कभी मन नहीं होता हम लोगों से मिलने का?’’ शीरी मैम ने उलाहना दिया.

‘‘जी आगे आया करूंगी,’’ नम्रता ने उत्तर दिया.

‘‘हम लोग तो अभिभावकों और बच्चों के बीच मेलजोल को प्रोत्साहित करते हैं. बहुत से बच्चों की मांएं शनिवार को बच्चों को कहानियां सुनाती हैं, गेम्स खिलाती हैं, क्राफ्ट सिखाती हैं. चाहें तो आप भी अपनी रुचि के अनुसार बच्चों को कोई भी हुनरसिखा सकती हैं.’’

‘‘मेरी दादीमां को बहुत सी कहानियां आती हैं और मेरी मम्मी तो इतनी होशियार हैं कि पूछो ही मत,’’ खुशी अब भी जोश में थी.

‘‘हम तो अवश्य पूछेंगे,’’ शीरी मैम मुसकराईं.

तभी खुशी शीरी मैम के कान में कुछ कहने लगी.

‘‘हां देख लिया, तुम्हारी मम्मी तो वाकई बहुत सुंदर हैं,’’ शीरी मैम ने खुशी की हां में हां मिलाई.

‘‘बहुत नटखट हो गई है कुछ भी बोलती रहती है,’’ नम्रता शरमा गई.

‘‘सुंदर को सुंदर नहीं तो और क्या कहेगी खुशी. आप की बेटी बहुत प्यारी और होशियार है. पर किसी शनिवार को आइए न. बच्चों को कुछ भी सिखाइए या केवल उन्हें गीत सुनाइए, बातचीत कीजिए. इस से बच्चे का व्यक्तित्व विकसित होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है. सदा चहकती रहने वाली खुशी शनिवार को अलगथलग उदास सी बैठी रहती है,’’ शीरी मैम ने पुन: याद दिलाया.

‘‘मैं भविष्य में याद रखूंगी. खुशी की खुशी में ही मेरी खुशी है,’’ नम्रता ने आश्वासन दिया.

स्कूल से निकल कर नम्रता खुशी को एक बड़े से मौल में ले गई. वहां बच्चों के लिए अनेक प्रकार के गेम्स थे, जिन का आनंद लेने के लिए वहां बच्चों की भीड़ लगी थी. खुशी के साथ ही पूर्णा देवी और नम्रता ने भी उन का भरपूर आनंद लिया. दिन भर मस्ती कर के और खापी कर जब तीनों घर पहुंचीं तो थक कर चूर हो गई थीं, अत: शीघ्र ही निद्रा देवी की गोद में समा गईं. घंटी की आवाज सुन कर नम्रता हड़बड़ा कर उठी. घड़ी में 6 बज रहे थे. द्वार खोला तो तरंग सामने खड़ा था.

‘‘सो रही थीं?’’

‘‘हां,’’ नम्रता बोली.

‘‘खुशी और मां भी सो रही हैं?’’ पूछते हुए तरंग अंदर आ गया. फिर गुस्से से बोला, ‘‘जमाना कहां से कहां पहुंच गया पर तुम सब तो बस अपनी नींद में डूबे रहो. क्या कह कर गया था मैं? यही न कि नंदिनी को फोन कर लेना और कल के व्यवहार के लिए क्षमा मांग लेना तो वह खुशी को स्कूल ले जाएगी. पर नहीं, तुम अपनी ही ऐंठ में हो. तुम ने कुछ नहीं किया, चाहे बच्ची का भविष्य चौपट हो जाए.’’

‘‘हम ने फोन नहीं किया तो क्या हुआ? आप ने तो नंदिनी को फोन किया ही होगा?’’ नम्रता ने सहज भाव से पूछा.

‘‘प्रश्न पूछ रही हो या ताना मार रही हो?’’ तरंग क्रोधित हो उठा.

‘‘मैं तो दोनों में से कुछ भी नहीं कर रही. मैं तो केवल जानना चाह रही थी.’’

‘‘तो जान लो मैं ने नंदिनी को यह जानने के लिए फोन किया था कि वह खुशी के स्कूल गई या नहीं तो पता चला कि तुम ने उसे फोन तक नहीं किया क्षमा मांगने की कौन कहे. एक बात तो साफ हो गई कि तुम्हें खुशी की कोई चिंता नहीं है.’’

‘‘खुशी की चिंता है इसीलिए नंदिनी को फोन नहीं किया तरंग. यह भी जान लो कि अजनबियों के सामने मेरी घिग्घी नहीं बंधती. मैं और मांजी खुशी के स्कूल गए थे और सच मानो कि खुशी को इतना खुश मैं ने पहले कभी नहीं देखा,’’ नम्रता हर एक शब्द पर जोर दे कर बोली.

‘‘ओह, तो अब तुम्हारे मुंह में भी जबान आ गई है. तुम यह भी भूल गईं कि नंदिनी तुम्हारी बहन है.’’

‘‘तरंग, चाहे बहन हो या पति, अन्याय का प्रतिकार करने का अधिकार तो मेरे पास होना ही चाहिए. मैं अब तक चुप थी पर अब मैं लड़ूंगी अपने लिए नहीं अपनी बेटी खुशी के लिए.’’

‘‘मैं तुम्हारे साथ हूं बेटी,’’ पूर्णा देवी जो अब तक चुप खड़ी थीं धीमे स्वर में बोलीं.

‘‘मां, तुम भी?’’ तरंग चौंक कर बोला.

‘‘क्या कहूं बेटे, जीवन भर अन्याय सहती रही मैं. पर अब लगता है समय बदल गया है. नम्रता के साथ मैं भी लड़ूंगी अपनी खुशी के लिए,’’ पूर्णा देवी धीमे पर दृढ़ स्वर में बोलीं. नम्रता बढ़ कर पूर्णा देवी के गले से लग गई. उस की आंखों में आभार के आंसू थे.

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‘‘चलिए न मांजी. हम तीनों चलेंगे. स्कूल जाने के बाद थोड़ा घूमेंगेफिरेंगे. फिर बाहर ही खापी कर लौट आएंगे,’’ उत्तर खुशी के स्थान पर नम्रता ने दिया.

‘‘क्यों नहीं, मैं तो खुशी से पहले तैयार हो जाऊंगी,’’ पूर्णा देवी ने सहमति जताई.

तरंग ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि उस के परिवार की महिलाएं बिना उस की सहायता के घर से बाहर की खुली हवा में निकलने का साहस करेंगी. पूर्णा देवी ने परिवार में कठोर अनुशासन में दिन बिताए थे. उन के सासससुर ही नहीं उन के पति भी स्त्रियों का स्थान घर की चारदीवारी में ही होने में विश्वास करते थे. उन्होंने यही सोच कर संतोष कर लिया था? कि उन का जीवन तो किसी प्रकार कट गया पर आने वाली पीढ़ी को वे अपनी तरह घुटघुट कर नहीं जीने देंगी. पर केवल सोच लेने से क्या होता है? वे नम्रता के हंसमुख और जिंदादिल स्वभाव से ही प्रभावित हुई थीं पर विवाह के बाद तिलतिल कर बुझने लगी थी नम्रता. यों घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. तरंग की अच्छीभली नौकरी थी. उन के पति श्रीराम का फलताफूलता व्यवसाय था. पर तरंग ने अपने पिता के आचारविचार और स्वभाव विरासत में पाया था.

वह स्वयं रंगरलियां मनाने को स्वतंत्र था पर नम्रता पर कड़ा पहरा था. उस का खिड़की से बाहर झांकना तक तरंग को पसंद नहीं था. नम्रता को हर बात पर नीचा दिखाना, जलीकटी सुनाना, क्रोध में बरतन, प्लेटें आदि उठा कर फेंक देना, उस के स्वभाव के अभिन्न अंग थे. ऐसे में नम्रता अपने ही संसार में सिमट कर रह गई थी.

‘‘दादीमां, सो गईं क्या?’’ उन की विचारशृंखला शायद इसी तरह चलती रहती कि खुशी के स्वर ने उन्हें झकझोर कर जगा दिया.

‘‘मेरा स्कूल आ गया दादीमां,’’ खुशी बोली.

‘‘तेरा स्कूल नहीं आया बुद्धू. हम तेरे स्कूल आ गए,’’ पूर्णा देवी ने हंसते हुए कहा.

‘‘देखा मम्मी, दादीमां मुझे बुद्धू कह रही हैं,’’ खुशी हंसते हुए बोली. फिर मां और दादीमां का हाथ थामे अपनी कक्षा की ओर खींच ले गई.

‘‘शीरी मैम, मेरी मम्मी और मेरी दादीमां,’’ खुशी ने प्रसन्नता से अपनी टीचर से दोनों का परिचय कराया.

‘‘आप को पहली बार देखा है मैं ने. आप तो कभी आती ही नहीं. कभी मन नहीं होता हम लोगों से मिलने का?’’ शीरी मैम ने उलाहना दिया.

‘‘जी आगे आया करूंगी,’’ नम्रता ने उत्तर दिया.

‘‘हम लोग तो अभिभावकों और बच्चों के बीच मेलजोल को प्रोत्साहित करते हैं. बहुत से बच्चों की मांएं शनिवार को बच्चों को कहानियां सुनाती हैं, गेम्स खिलाती हैं, क्राफ्ट सिखाती हैं. चाहें तो आप भी अपनी रुचि के अनुसार बच्चों को कोई भी हुनरसिखा सकती हैं.’’

‘‘मेरी दादीमां को बहुत सी कहानियां आती हैं और मेरी मम्मी तो इतनी होशियार हैं कि पूछो ही मत,’’ खुशी अब भी जोश में थी.

‘‘हम तो अवश्य पूछेंगे,’’ शीरी मैम मुसकराईं.

तभी खुशी शीरी मैम के कान में कुछ कहने लगी.

‘‘हां देख लिया, तुम्हारी मम्मी तो वाकई बहुत सुंदर हैं,’’ शीरी मैम ने खुशी की हां में हां मिलाई.

‘‘बहुत नटखट हो गई है कुछ भी बोलती रहती है,’’ नम्रता शरमा गई.

‘‘सुंदर को सुंदर नहीं तो और क्या कहेगी खुशी. आप की बेटी बहुत प्यारी और होशियार है. पर किसी शनिवार को आइए न. बच्चों को कुछ भी सिखाइए या केवल उन्हें गीत सुनाइए, बातचीत कीजिए. इस से बच्चे का व्यक्तित्व विकसित होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है. सदा चहकती रहने वाली खुशी शनिवार को अलगथलग उदास सी बैठी रहती है,’’ शीरी मैम ने पुन: याद दिलाया.

‘‘मैं भविष्य में याद रखूंगी. खुशी की खुशी में ही मेरी खुशी है,’’ नम्रता ने आश्वासन दिया.

स्कूल से निकल कर नम्रता खुशी को एक बड़े से मौल में ले गई. वहां बच्चों के लिए अनेक प्रकार के गेम्स थे, जिन का आनंद लेने के लिए वहां बच्चों की भीड़ लगी थी. खुशी के साथ ही पूर्णा देवी और नम्रता ने भी उन का भरपूर आनंद लिया. दिन भर मस्ती कर के और खापी कर जब तीनों घर पहुंचीं तो थक कर चूर हो गई थीं, अत: शीघ्र ही निद्रा देवी की गोद में समा गईं. घंटी की आवाज सुन कर नम्रता हड़बड़ा कर उठी. घड़ी में 6 बज रहे थे. द्वार खोला तो तरंग सामने खड़ा था.

‘‘सो रही थीं?’’

‘‘हां,’’ नम्रता बोली.

‘‘खुशी और मां भी सो रही हैं?’’ पूछते हुए तरंग अंदर आ गया. फिर गुस्से से बोला, ‘‘जमाना कहां से कहां पहुंच गया पर तुम सब तो बस अपनी नींद में डूबे रहो. क्या कह कर गया था मैं? यही न कि नंदिनी को फोन कर लेना और कल के व्यवहार के लिए क्षमा मांग लेना तो वह खुशी को स्कूल ले जाएगी. पर नहीं, तुम अपनी ही ऐंठ में हो. तुम ने कुछ नहीं किया, चाहे बच्ची का भविष्य चौपट हो जाए.’’

‘‘हम ने फोन नहीं किया तो क्या हुआ? आप ने तो नंदिनी को फोन किया ही होगा?’’ नम्रता ने सहज भाव से पूछा.

‘‘प्रश्न पूछ रही हो या ताना मार रही हो?’’ तरंग क्रोधित हो उठा.

‘‘मैं तो दोनों में से कुछ भी नहीं कर रही. मैं तो केवल जानना चाह रही थी.’’

‘‘तो जान लो मैं ने नंदिनी को यह जानने के लिए फोन किया था कि वह खुशी के स्कूल गई या नहीं तो पता चला कि तुम ने उसे फोन तक नहीं किया क्षमा मांगने की कौन कहे. एक बात तो साफ हो गई कि तुम्हें खुशी की कोई चिंता नहीं है.’’

‘‘खुशी की चिंता है इसीलिए नंदिनी को फोन नहीं किया तरंग. यह भी जान लो कि अजनबियों के सामने मेरी घिग्घी नहीं बंधती. मैं और मांजी खुशी के स्कूल गए थे और सच मानो कि खुशी को इतना खुश मैं ने पहले कभी नहीं देखा,’’ नम्रता हर एक शब्द पर जोर दे कर बोली.

‘‘ओह, तो अब तुम्हारे मुंह में भी जबान आ गई है. तुम यह भी भूल गईं कि नंदिनी तुम्हारी बहन है.’’

‘‘तरंग, चाहे बहन हो या पति, अन्याय का प्रतिकार करने का अधिकार तो मेरे पास होना ही चाहिए. मैं अब तक चुप थी पर अब मैं लड़ूंगी अपने लिए नहीं अपनी बेटी खुशी के लिए.’’

‘‘मैं तुम्हारे साथ हूं बेटी,’’ पूर्णा देवी जो अब तक चुप खड़ी थीं धीमे स्वर में बोलीं.

‘‘मां, तुम भी?’’ तरंग चौंक कर बोला.

‘‘क्या कहूं बेटे, जीवन भर अन्याय सहती रही मैं. पर अब लगता है समय बदल गया है. नम्रता के साथ मैं भी लड़ूंगी अपनी खुशी के लिए,’’ पूर्णा देवी धीमे पर दृढ़ स्वर में बोलीं. नम्रता बढ़ कर पूर्णा देवी के गले से लग गई. उस की आंखों में आभार के आंसू थे.

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December 28, 2021 at 12:30PM

प्यार की गंध

रात के 9 बज चुके थे. टीवी चैनल पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ प्रोग्राम शुरू हो चुका था. मैं जल्दी से मेज पर खाना लगा कर प्रोग्राम देखने के लिए बैठना ही चाहती थी, तभी फोन की घंटी बज उठी. आनंद प्रोग्राम छोड़ कर उठना नहीं चाहते थे, सो मुझे फोन की ओर बढ़ता देख बोले, ‘‘मेरे लिए हो तो नाम पूछ लेना, मैं बाद में फोन कर लूंगा.’’

मेरे रिसीवर उठाते ही अजनबी आवाज कानों में पड़ी. संक्षिप्त परिचय के बाद अत्यंत दुखद समाचार मिला कि आनंद की उदयपुर वाली मौसी के एकलौते जवान बेटे की ऐक्सिडैंट में मौत हो गई है. फोन सुनते ही मैं स्तब्ध रह गई.

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि यह दुखद समाचार मैं आनंद को कैसे दूं. खाना मेज पर लगा था. मैं सोच में पड़ गई कि क्या पहले खाना खा लेने दूं, फिर बताऊं? लेकिन मेरे दिलोदिमाग ने चेहरे का साथ नहीं दिया. मुझे देखते ही आनंद हैरान हो गए, बोले, ‘‘क्या हुआ? किस का फोन था?’’

आनंद के पूछते ही मैं स्वयं को रोक न सकी और भीगी आंखों से उन्हें पूरी बात बता दी. सुनते ही आनंद गुमसुम से हो गए. मैं भी परेशान हो उठी थी. टीवी प्रोग्राम में अब मन नहीं लग रहा था. उस प्रोग्राम से कई गुना बड़े सवाल हमारे मन में उठने लगे थे. प्रोग्राम में पूछे जा रहे सवालों का तो 4 में से एक सही उत्तर भी था, लेकिन मन में उठ रहे सवालों का हमारे पास कोई उत्तर न था.

बच्चे हमें देख कर सहम से गए थे. उन्हें तो जैसेतैसे खाना खिला कर सुला दिया, लेकिन हम दोनों चाह कर भी कुछ न खा पाए.

आनंद उदयपुर जाने की तैयारी करने लगे. वहां जाना तो मैं भी चाहती थी, लेकिन एक तो सुबह दफ्तर में जरूरी मीटिंग थी, जिस के कारण मेरा अचानक छुट्टी करना संभव नहीं था, दूसरे, बच्चों को कुछ दिनों के लिए कहां, किस के पास छोड़ते हमें हड़बड़ी में कुछ नहीं सूझ रहा था. सो, आनंद तुरंत ही अकेले उदयपुर के लिए रवाना हो गए.

आनंद बहुत दुखी थे. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि मौसी से आनंद का विशेष स्नेह है. बचपन में आनंद अपनी छुट्टियां मौसी के यहां ही बिताना पसंद करते थे. मां की मृत्यु के बाद तो मौसी ने मां की ही जगह ले ली थी. मौसी के बेटे, शिव और आनंद में उम्र का भी कोई ज्यादा फर्क नहीं था. शिव आनंद का मौसेरा भाई कम, दोस्त ज्यादा था.

मौसी शादी के 10 साल बाद ही विधवा हो गई थीं. बहुत मेहनत से उन्होंने अपने एकलौते बेटे शिव की परवरिश की, उसे पैरों पर खड़ा किया था. शिव भी श्रवण कुमार से कम न था. शादी के लिए बरसों इनकार करता रहा. मां की कठिन तपस्या के बदले वह मां की आजीवन सेवा करना चाहता था. वह डरता था कि कहीं कोई झगड़ालू बहू आ कर मां का जीवन जीर्ण न बना दे.

मौसी का स्वभाव बहुत ही अच्छा है. उन की जबान से शहद और आंखों से स्नेह बरसता था. मौसी के जीवन का एक ही अरमान था कि बेटे के सिर पर सेहरा देखें और बहू घर लाएं. लेकिन शिव था कि अपनी ही जिद पर अड़ा था. मौसी के बहुत कहने और हम सब के बहुत समझने पर शिव ने शादी के लिए हामी भरी थी. उस की शादी को 2 साल भी नहीं हुए थे कि जीवनभर मां की सेवा का व्रत लेने वाला शिव, बुढ़ापे में मां को छोड़ कर चला गया था.

कुछ ही दिनों बाद मैं भी दफ्तर से छुट्टी ले कर बच्चों को साथ ले उदयपुर पहुंच गई. सफेद साड़ी में लिपटी मौसी और शिव की पत्नी भारती मुझे वेदना की प्रतिमूर्ति लगीं. मैं दोनों से गले क्या मिली कि आंसुओं की बाढ़ सी आ गई.

मौसी की गृहस्थी 2 प्राणियों में सिमट कर रह गई थी. सूनी मांग तथा सूनी गोद वाली 2 औरतें, एक के सामने पहाड़ जैसा जीवन था तो दूसरी के सामाने लाचार बुढ़ापा. घर लोगों से भरा था, लेकिन शिव के बिना बिलकुल खाली लग रहा था.

भारती के मातापिता उसे हमेशा के लिए अपने साथ ले जाना चाहते थे. एक तरह से यह ठीक भी था. मुझे लगा, उस घर से दूर रह कर भारती का जख्म जल्दी भर जाएगा और फिर उस की दूसरी शादी भी कर देनी चाहिए. किसी औरत के लिए पूरा जीवन अकेले काटना बहुत कठिन होता है. वैसे भी, जीने का कोई तो बहाना होना ही चाहिए.

अपने मातापिता के निर्णय पर भारती मुझे 2 हिस्सों में बंटी हुई लगी. वह शिव की यादों के सहारे जीना भी चाहती थी और पूरा जीवन अकेले जीने के भय से ग्रस्त भी थी.

मौसी कुछ भी नहीं कह पा रही थीं. जीने का बहाना तो उन्हें भी चाहिए था, जो अब मात्र भारती के रूप में था, लेकिन भारती के भविष्य की चिंता उन्हें चुप रहने पर भी मजबूर कर रही थी.

फिर एक शाम बहुत ही दुखी मन से हम सब ने यही फैसला लिया कि भारती का लौट जाना ही उस के भविष्य को सुरक्षित रख पाएगा. आखिर एक बूढ़े पेड़ के साए में वह पूरा जीवन कैसे काट पाएगी?

मौसी अब बिलकुल अकेली हो गई थीं. एक ओर मौसी का दुख और उन का अकेलापन मुझसेदेखा नहीं जा रहा था तो दूसरी ओर आनंद का अंदर ही अंदर टूटना मुझसे सहा नहीं जा रहा था. मेरे अंदर अजीब सी कशमकश चल रही थी.

एक शाम मैं अपनी कशमकश से उबर ही आई और मैंने अपना फैसला सुना दिया, ‘‘मौसी, आप अब यहां अकेली नहीं रहेंगी. यहां की हर चीज शिव की यादों से जुड़ी है, जो आप को जीने नहीं देगी.’’

‘‘मैं तो जीती ही रहूंगी, बहू. मेरी मौत बहुत मुश्किल है. भरी जवानी में पति छोड़ कर चले गए, मैं जीती रही. अब बुढ़ापे में बेटा छोड़ गया है तो भी…’’ कहते हुए वे फूटफूट कर रोने लगीं.

मैं भी स्वयं को रोक न सकी. बहुत देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा.

‘‘आप को जीना है और हमारे लिए जीना है,’’ कहते हुए मैं ने खामोशी तोड़ी.

‘‘बहू, मेरे लिए परेशान होने की जरूरत नहीं. मेरी जिंदगी में अब बचा ही क्या है.’’

‘‘मौसीजी, आप हमारे साथ चलेंगी. हमें आप की जरूरत है,’’ कहते हुए मैं मौसी के गले लग गई.

मेरी बात सुन कर आनंद ने राहत की सांस ली थी, ऐसा उन के चेहरे के हावभाव बता रहे थे. वे तुरंत बोल उठे, ‘‘मौसी, मुझमें और शिव में आप ने कभी कोई फर्क नहीं किया. मैं आप का बेटा, अभी जिंदा हूं. आप के पोतेपोती हैं, बहू है, हम सब को छोड़ कर आप यहां अकेली कैसे रहेंगी?’’

‘‘क्यों नहीं, बेटा. तुम सब मेरे अपने हो, तुम्हारे सिवा अब मेरा और है ही कौन? लेकिन बेटा, मैं दुखियारी अब बुढ़ापे में तुम पर बोझ नहीं बनना चाहती.’’

‘‘मां बोझ नहीं हुआ करती. आप हमारे साथ चलिए. हम सब मिल कर आप का दुख बांटने की कोशिश करेंगे, फिर भी अगर आप को वहां अच्छा न लगे तो लौट आइएगा. हम आप को नहीं रोकेंगे,’’ मैं ने अपनी बात रखते हुए कहा.

‘‘हां मौसी, अभी आप हमारे साथ चल रही हैं. हम आप को यहां अकेला नहीं छोड़ सकते. बाद में आप को जैसा ठीक लगेगा, हम ने आप पर छोड़ा,’’ आनंद ने भी अपना फैसला सुना दिया था.

जल्दी ही हम मौसी को साथ ले कर दिल्ली लौट आए. 2-4 दिन मौसी के साथ घर पर बिता कर मैं ने दफ्तर जाना शुरू कर दिया. कई दिनों की छुट्टी के बाद मैं दफ्तर गई तो लंचटाइम में सब सहेलियां मिलीं और कई तरह के सवाल करने लगीं. कोई मेरी छुट्टियों का कारण पूछ रही थी तो कोई शिव की मृत्यु की खबर पर दुख जता रही थी, कोई उदयपुर के बारे में जानकारी चाहती थी. तभी बातोंबातों में मैं ने बताया कि मैं मौसी को साथ ले आई हूं. अब वे हमारे साथ ही रहेंगी.

मेरी बात सुनते ही सीमा बोली, ‘‘दीपा, गई तुम भी काम से. हो गया शुरू रोज का कलह, तानोंउलाहनों का सिलसिला.’’

‘‘मौसी ऐसी नहीं हैं. वे स्वभाव की बहुत अच्छी हैं,’’ मैं ने तुरंत उत्तर दिया.

‘‘कैसी भी हों, हैं तो सास ही. देख लेना एक दिन तेरा सांस लेना दूभर कर देंगी,’’ रश्मि ने हाथ नचाते हुए कहा.

तभी सुषमा बहुत ही अपनेपन से बोली, ‘‘तुझे बैठेबिठाए क्या पड़ी थी जो यह मुसीबत गले डाल ली. अच्छीभली गृहस्थी चल रही थी, ले आई मौसी को साथ.’’

‘‘अरी, ऐसा फैसला लेने से पहले तुझे हमारी याद नहीं आई, जो वर्षों से सास के जुल्मों को सह रही हैं, तू तो फिर भी खुशहाल है जो तेरी सास नहीं है. तुझे क्या शौक चर्राया था जो मौसी सास को घर ले आई?’’ वनिता ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘मेरे हसबैंड अगर ऐसा कहते भी न, तो मैं अड़ जाती, कभी ऐसा न होने देती. और एक तू है मूर्ख, जो स्वयं मौसी को साथ ले आई,’’ शिखा कब चुप रहने वाली थी जो कुछ महीने पहले ही लड़झगड़ कर ससुराल से अलग हुई थी, सो वह भी बोल उठी.

मेरी बात कोई सुनने को तैयार ही नहीं थी. सब अपनीअपनी कह रही थीं. उन के विचार में वे सब अनुभवी थीं और मैं नादान, जिस ने स्वयं ही अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली थी. उन सब की बातें सुन कर मेरे मन में बहुत से प्रश्न उठ रहे थे. मैं उन्हें बहुतकुछ समझना चाहती थी, लेकिन मैं जानती थी कि उस समय उन से बहस करना फुजूल था.

शाम को मेरे घर पहुंचते ही मौसी पानी का गिलास ले आईं जो हमेशा मुझे स्वयं ही भर कर पीना पड़ता था. फिर मौसी बहुत ही अपनत्व से बोलीं, ‘‘बहू, हाथमुंह धो लो, चाय तैयार है.’’

यह सुनते ही खुशी से मेरा तनमन भीग गया. कपड़े बदल कर हाथमुंह धोए, मेज पर पहुंचते ही मैं ने देखा कि गरमागरम चायनाश्ता तैयार है.

‘‘आनंद भी आने ही वाले होंगे,’’ मैं ने यों ही कह दिया, जबकि गरमागरम चायनाश्ता देख कर मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही थी.

‘‘कोई बात नहीं, बहू. सुबह की गई अब आई हो. थकी होगी तुम, अब तुम आराम से चाय पियो, आनंद आएगा तो फिर बना दूंगी.’’

मैं चाय पी ही रही थी कि रसोईघर से कुकर की सीटी की आवाज कानों में पड़ी. पता चला मौसी ने रात के खाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी.

‘‘मौसीजी, आप पूरा दिन काम में लगी रहीं, आप आराम किया कीजिए, यह काम तो मैं आ कर रोज करती ही थी.’’

‘‘तुम्हारी गृहस्थी है, बहू. सब तुम्हें ही करना है, मैं तो यों ही थोड़ी मदद कर रही हूं. पहाड़ जितना बड़ा दिन, खाली बैठ कर गुजारना भी तो मुश्किल होता है.’’

‘‘इन दोनों शैतानों ने आप को परेशान तो नहीं किया?’’ मौसी की अगलबगल आ कर बैठे दोनों बच्चों को देख कर मैं ने हंसते हुए कहा.

‘‘ये क्या परेशान करेंगे, बहू. वे लोग खुशहाल होते हैं जिन के घर में बच्चों की किलकारियां गूंजती हैं. इन से ही तो जीवन में रौनक है,’’ मौसी बोलीं.

शायद मैं ने अनजाने में ही मौसी की दुखती रग पर हाथ रख दिया था, लेकिन मौसी ने मुझे शर्मिंदा होने का अवसर ही नहीं दिया, वे तुरंत बोलीं, ‘‘बहू, चाहो तो जब तक आनंद आता है, थोड़ा आराम कर लो. रसोई की चिंता तुम मत करो,’’ कहते हुए वे दोनों बच्चों का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने कमरे में ले गईं.

आजकल रहरह कर मेरे कानों में अपनी सहकर्मियों की कड़वी बातें गूंजती रहती हैं, लेकिन मेरा अनुभव उन के अनुभव से मेल नहीं खाता. मैं तो आजकल दफ्तर में स्वयं को इतना हलका और तनावमुक्त अनुभव करती हूं कि बता नहीं सकती. सुबह बिना किसी भागदौड़ के दफ्तर पहुंचती हूं, क्योंकि मौसी घर पर हैं ही. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने से ले कर नाश्ता बनाने तक वे बराबर मेरी मदद करती हैं.

अब बच्चों के लिए दोपहर का खाना बनाने की भी जरूरत नहीं रही, क्योंकि मौसी उन्हें गरमागरम खाना खिलाती हैं. अब न बच्चों का सामान क्रैच में दे कर आना पड़ता है और न ही शाम को दफ्तर के बाद उन्हें वहां से लाने की चिंता है. बच्चे दिनभर अपने घर में सुरक्षित हाथों में रहते हैं.

मुझे तो मौसी को घर लाने के अपने फैसले में कहीं कोई गलती नजर नहीं आ रही. शाम को जब घर पहुंचती हूं तो घर का दरवाजा खुला मिलता है. मुसकराते और खिलखिलाते बच्चे मिलते हैं जो दिनभर क्रैच के बंधन में नहीं, अपने घर के उन्मुक्त वातावरण में रहते हैं. दोनों बच्चे दोपहर में थोड़ा आराम करने के बाद अपनाअपना होमवर्क भी कर लेते हैं.

मौसी को देख कर मुझे लगता है, वे ऐसा घना पेड़ हैं जिस के साए में हम जिंदगी की तेज धूप से बच सकते हैं. हम सब की भी पूरी कोशिश रहती है कि मौसी अपने गम को भूली रहें.

एक शाम मैं दफ्तर से आई तो तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी. देखते ही देखते मुझे तेज बुखार हो गया. मौसी तो परेशान हो उठीं. आनंद अभी दफ्तर से नहीं लौटे थे. मौसी ने तुरंत मुझे दूध के साथ बुखार उतारने की गोली दी और पानी की पट्टियां रखनी शुरू कर दीं. आनंद को आते ही डाक्टर के पास भेज दिया. जब तक मेरा बुखार नहीं उतरा, वे मेरे पास से नहीं उठीं.

मौसी का ऐसा स्नेह देख कर मैं स्वयं को रोक न सकी, मेरी आंखें भीग गईं. मौसी के हाथ अपने हाथों में ले कर मैं ने पूछा, ‘‘आप आनंद की मौसी हैं या मेरी मां?’’

‘‘चल पगली, मैं आनंद की मौसी बाद में हूं, पहले तेरी मां हूं. बहू क्या बेटी नहीं होती? सास क्या मां नहीं होती?’’ मौसी की जबान से सदा की भांति शहद और आंखों से नेह बरस रहा था.

‘‘मां ही तो होती है,’’ कहते हुए मैं मौसी से लिपट गई.

उस पल मुझे मौसी से वैसी ही गंध आ रही थी जो मैं बचपन में अपनी मां के गले लग कर महसूस करती थी. यह यकीनन ममता, प्यार की ही गंध थी, जिसे मैं वर्षों बाद अनुभव कर रही थी.

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रात के 9 बज चुके थे. टीवी चैनल पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ प्रोग्राम शुरू हो चुका था. मैं जल्दी से मेज पर खाना लगा कर प्रोग्राम देखने के लिए बैठना ही चाहती थी, तभी फोन की घंटी बज उठी. आनंद प्रोग्राम छोड़ कर उठना नहीं चाहते थे, सो मुझे फोन की ओर बढ़ता देख बोले, ‘‘मेरे लिए हो तो नाम पूछ लेना, मैं बाद में फोन कर लूंगा.’’

मेरे रिसीवर उठाते ही अजनबी आवाज कानों में पड़ी. संक्षिप्त परिचय के बाद अत्यंत दुखद समाचार मिला कि आनंद की उदयपुर वाली मौसी के एकलौते जवान बेटे की ऐक्सिडैंट में मौत हो गई है. फोन सुनते ही मैं स्तब्ध रह गई.

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि यह दुखद समाचार मैं आनंद को कैसे दूं. खाना मेज पर लगा था. मैं सोच में पड़ गई कि क्या पहले खाना खा लेने दूं, फिर बताऊं? लेकिन मेरे दिलोदिमाग ने चेहरे का साथ नहीं दिया. मुझे देखते ही आनंद हैरान हो गए, बोले, ‘‘क्या हुआ? किस का फोन था?’’

आनंद के पूछते ही मैं स्वयं को रोक न सकी और भीगी आंखों से उन्हें पूरी बात बता दी. सुनते ही आनंद गुमसुम से हो गए. मैं भी परेशान हो उठी थी. टीवी प्रोग्राम में अब मन नहीं लग रहा था. उस प्रोग्राम से कई गुना बड़े सवाल हमारे मन में उठने लगे थे. प्रोग्राम में पूछे जा रहे सवालों का तो 4 में से एक सही उत्तर भी था, लेकिन मन में उठ रहे सवालों का हमारे पास कोई उत्तर न था.

बच्चे हमें देख कर सहम से गए थे. उन्हें तो जैसेतैसे खाना खिला कर सुला दिया, लेकिन हम दोनों चाह कर भी कुछ न खा पाए.

आनंद उदयपुर जाने की तैयारी करने लगे. वहां जाना तो मैं भी चाहती थी, लेकिन एक तो सुबह दफ्तर में जरूरी मीटिंग थी, जिस के कारण मेरा अचानक छुट्टी करना संभव नहीं था, दूसरे, बच्चों को कुछ दिनों के लिए कहां, किस के पास छोड़ते हमें हड़बड़ी में कुछ नहीं सूझ रहा था. सो, आनंद तुरंत ही अकेले उदयपुर के लिए रवाना हो गए.

आनंद बहुत दुखी थे. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि मौसी से आनंद का विशेष स्नेह है. बचपन में आनंद अपनी छुट्टियां मौसी के यहां ही बिताना पसंद करते थे. मां की मृत्यु के बाद तो मौसी ने मां की ही जगह ले ली थी. मौसी के बेटे, शिव और आनंद में उम्र का भी कोई ज्यादा फर्क नहीं था. शिव आनंद का मौसेरा भाई कम, दोस्त ज्यादा था.

मौसी शादी के 10 साल बाद ही विधवा हो गई थीं. बहुत मेहनत से उन्होंने अपने एकलौते बेटे शिव की परवरिश की, उसे पैरों पर खड़ा किया था. शिव भी श्रवण कुमार से कम न था. शादी के लिए बरसों इनकार करता रहा. मां की कठिन तपस्या के बदले वह मां की आजीवन सेवा करना चाहता था. वह डरता था कि कहीं कोई झगड़ालू बहू आ कर मां का जीवन जीर्ण न बना दे.

मौसी का स्वभाव बहुत ही अच्छा है. उन की जबान से शहद और आंखों से स्नेह बरसता था. मौसी के जीवन का एक ही अरमान था कि बेटे के सिर पर सेहरा देखें और बहू घर लाएं. लेकिन शिव था कि अपनी ही जिद पर अड़ा था. मौसी के बहुत कहने और हम सब के बहुत समझने पर शिव ने शादी के लिए हामी भरी थी. उस की शादी को 2 साल भी नहीं हुए थे कि जीवनभर मां की सेवा का व्रत लेने वाला शिव, बुढ़ापे में मां को छोड़ कर चला गया था.

कुछ ही दिनों बाद मैं भी दफ्तर से छुट्टी ले कर बच्चों को साथ ले उदयपुर पहुंच गई. सफेद साड़ी में लिपटी मौसी और शिव की पत्नी भारती मुझे वेदना की प्रतिमूर्ति लगीं. मैं दोनों से गले क्या मिली कि आंसुओं की बाढ़ सी आ गई.

मौसी की गृहस्थी 2 प्राणियों में सिमट कर रह गई थी. सूनी मांग तथा सूनी गोद वाली 2 औरतें, एक के सामने पहाड़ जैसा जीवन था तो दूसरी के सामाने लाचार बुढ़ापा. घर लोगों से भरा था, लेकिन शिव के बिना बिलकुल खाली लग रहा था.

भारती के मातापिता उसे हमेशा के लिए अपने साथ ले जाना चाहते थे. एक तरह से यह ठीक भी था. मुझे लगा, उस घर से दूर रह कर भारती का जख्म जल्दी भर जाएगा और फिर उस की दूसरी शादी भी कर देनी चाहिए. किसी औरत के लिए पूरा जीवन अकेले काटना बहुत कठिन होता है. वैसे भी, जीने का कोई तो बहाना होना ही चाहिए.

अपने मातापिता के निर्णय पर भारती मुझे 2 हिस्सों में बंटी हुई लगी. वह शिव की यादों के सहारे जीना भी चाहती थी और पूरा जीवन अकेले जीने के भय से ग्रस्त भी थी.

मौसी कुछ भी नहीं कह पा रही थीं. जीने का बहाना तो उन्हें भी चाहिए था, जो अब मात्र भारती के रूप में था, लेकिन भारती के भविष्य की चिंता उन्हें चुप रहने पर भी मजबूर कर रही थी.

फिर एक शाम बहुत ही दुखी मन से हम सब ने यही फैसला लिया कि भारती का लौट जाना ही उस के भविष्य को सुरक्षित रख पाएगा. आखिर एक बूढ़े पेड़ के साए में वह पूरा जीवन कैसे काट पाएगी?

मौसी अब बिलकुल अकेली हो गई थीं. एक ओर मौसी का दुख और उन का अकेलापन मुझसेदेखा नहीं जा रहा था तो दूसरी ओर आनंद का अंदर ही अंदर टूटना मुझसे सहा नहीं जा रहा था. मेरे अंदर अजीब सी कशमकश चल रही थी.

एक शाम मैं अपनी कशमकश से उबर ही आई और मैंने अपना फैसला सुना दिया, ‘‘मौसी, आप अब यहां अकेली नहीं रहेंगी. यहां की हर चीज शिव की यादों से जुड़ी है, जो आप को जीने नहीं देगी.’’

‘‘मैं तो जीती ही रहूंगी, बहू. मेरी मौत बहुत मुश्किल है. भरी जवानी में पति छोड़ कर चले गए, मैं जीती रही. अब बुढ़ापे में बेटा छोड़ गया है तो भी…’’ कहते हुए वे फूटफूट कर रोने लगीं.

मैं भी स्वयं को रोक न सकी. बहुत देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा.

‘‘आप को जीना है और हमारे लिए जीना है,’’ कहते हुए मैं ने खामोशी तोड़ी.

‘‘बहू, मेरे लिए परेशान होने की जरूरत नहीं. मेरी जिंदगी में अब बचा ही क्या है.’’

‘‘मौसीजी, आप हमारे साथ चलेंगी. हमें आप की जरूरत है,’’ कहते हुए मैं मौसी के गले लग गई.

मेरी बात सुन कर आनंद ने राहत की सांस ली थी, ऐसा उन के चेहरे के हावभाव बता रहे थे. वे तुरंत बोल उठे, ‘‘मौसी, मुझमें और शिव में आप ने कभी कोई फर्क नहीं किया. मैं आप का बेटा, अभी जिंदा हूं. आप के पोतेपोती हैं, बहू है, हम सब को छोड़ कर आप यहां अकेली कैसे रहेंगी?’’

‘‘क्यों नहीं, बेटा. तुम सब मेरे अपने हो, तुम्हारे सिवा अब मेरा और है ही कौन? लेकिन बेटा, मैं दुखियारी अब बुढ़ापे में तुम पर बोझ नहीं बनना चाहती.’’

‘‘मां बोझ नहीं हुआ करती. आप हमारे साथ चलिए. हम सब मिल कर आप का दुख बांटने की कोशिश करेंगे, फिर भी अगर आप को वहां अच्छा न लगे तो लौट आइएगा. हम आप को नहीं रोकेंगे,’’ मैं ने अपनी बात रखते हुए कहा.

‘‘हां मौसी, अभी आप हमारे साथ चल रही हैं. हम आप को यहां अकेला नहीं छोड़ सकते. बाद में आप को जैसा ठीक लगेगा, हम ने आप पर छोड़ा,’’ आनंद ने भी अपना फैसला सुना दिया था.

जल्दी ही हम मौसी को साथ ले कर दिल्ली लौट आए. 2-4 दिन मौसी के साथ घर पर बिता कर मैं ने दफ्तर जाना शुरू कर दिया. कई दिनों की छुट्टी के बाद मैं दफ्तर गई तो लंचटाइम में सब सहेलियां मिलीं और कई तरह के सवाल करने लगीं. कोई मेरी छुट्टियों का कारण पूछ रही थी तो कोई शिव की मृत्यु की खबर पर दुख जता रही थी, कोई उदयपुर के बारे में जानकारी चाहती थी. तभी बातोंबातों में मैं ने बताया कि मैं मौसी को साथ ले आई हूं. अब वे हमारे साथ ही रहेंगी.

मेरी बात सुनते ही सीमा बोली, ‘‘दीपा, गई तुम भी काम से. हो गया शुरू रोज का कलह, तानोंउलाहनों का सिलसिला.’’

‘‘मौसी ऐसी नहीं हैं. वे स्वभाव की बहुत अच्छी हैं,’’ मैं ने तुरंत उत्तर दिया.

‘‘कैसी भी हों, हैं तो सास ही. देख लेना एक दिन तेरा सांस लेना दूभर कर देंगी,’’ रश्मि ने हाथ नचाते हुए कहा.

तभी सुषमा बहुत ही अपनेपन से बोली, ‘‘तुझे बैठेबिठाए क्या पड़ी थी जो यह मुसीबत गले डाल ली. अच्छीभली गृहस्थी चल रही थी, ले आई मौसी को साथ.’’

‘‘अरी, ऐसा फैसला लेने से पहले तुझे हमारी याद नहीं आई, जो वर्षों से सास के जुल्मों को सह रही हैं, तू तो फिर भी खुशहाल है जो तेरी सास नहीं है. तुझे क्या शौक चर्राया था जो मौसी सास को घर ले आई?’’ वनिता ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘मेरे हसबैंड अगर ऐसा कहते भी न, तो मैं अड़ जाती, कभी ऐसा न होने देती. और एक तू है मूर्ख, जो स्वयं मौसी को साथ ले आई,’’ शिखा कब चुप रहने वाली थी जो कुछ महीने पहले ही लड़झगड़ कर ससुराल से अलग हुई थी, सो वह भी बोल उठी.

मेरी बात कोई सुनने को तैयार ही नहीं थी. सब अपनीअपनी कह रही थीं. उन के विचार में वे सब अनुभवी थीं और मैं नादान, जिस ने स्वयं ही अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली थी. उन सब की बातें सुन कर मेरे मन में बहुत से प्रश्न उठ रहे थे. मैं उन्हें बहुतकुछ समझना चाहती थी, लेकिन मैं जानती थी कि उस समय उन से बहस करना फुजूल था.

शाम को मेरे घर पहुंचते ही मौसी पानी का गिलास ले आईं जो हमेशा मुझे स्वयं ही भर कर पीना पड़ता था. फिर मौसी बहुत ही अपनत्व से बोलीं, ‘‘बहू, हाथमुंह धो लो, चाय तैयार है.’’

यह सुनते ही खुशी से मेरा तनमन भीग गया. कपड़े बदल कर हाथमुंह धोए, मेज पर पहुंचते ही मैं ने देखा कि गरमागरम चायनाश्ता तैयार है.

‘‘आनंद भी आने ही वाले होंगे,’’ मैं ने यों ही कह दिया, जबकि गरमागरम चायनाश्ता देख कर मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही थी.

‘‘कोई बात नहीं, बहू. सुबह की गई अब आई हो. थकी होगी तुम, अब तुम आराम से चाय पियो, आनंद आएगा तो फिर बना दूंगी.’’

मैं चाय पी ही रही थी कि रसोईघर से कुकर की सीटी की आवाज कानों में पड़ी. पता चला मौसी ने रात के खाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी.

‘‘मौसीजी, आप पूरा दिन काम में लगी रहीं, आप आराम किया कीजिए, यह काम तो मैं आ कर रोज करती ही थी.’’

‘‘तुम्हारी गृहस्थी है, बहू. सब तुम्हें ही करना है, मैं तो यों ही थोड़ी मदद कर रही हूं. पहाड़ जितना बड़ा दिन, खाली बैठ कर गुजारना भी तो मुश्किल होता है.’’

‘‘इन दोनों शैतानों ने आप को परेशान तो नहीं किया?’’ मौसी की अगलबगल आ कर बैठे दोनों बच्चों को देख कर मैं ने हंसते हुए कहा.

‘‘ये क्या परेशान करेंगे, बहू. वे लोग खुशहाल होते हैं जिन के घर में बच्चों की किलकारियां गूंजती हैं. इन से ही तो जीवन में रौनक है,’’ मौसी बोलीं.

शायद मैं ने अनजाने में ही मौसी की दुखती रग पर हाथ रख दिया था, लेकिन मौसी ने मुझे शर्मिंदा होने का अवसर ही नहीं दिया, वे तुरंत बोलीं, ‘‘बहू, चाहो तो जब तक आनंद आता है, थोड़ा आराम कर लो. रसोई की चिंता तुम मत करो,’’ कहते हुए वे दोनों बच्चों का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने कमरे में ले गईं.

आजकल रहरह कर मेरे कानों में अपनी सहकर्मियों की कड़वी बातें गूंजती रहती हैं, लेकिन मेरा अनुभव उन के अनुभव से मेल नहीं खाता. मैं तो आजकल दफ्तर में स्वयं को इतना हलका और तनावमुक्त अनुभव करती हूं कि बता नहीं सकती. सुबह बिना किसी भागदौड़ के दफ्तर पहुंचती हूं, क्योंकि मौसी घर पर हैं ही. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने से ले कर नाश्ता बनाने तक वे बराबर मेरी मदद करती हैं.

अब बच्चों के लिए दोपहर का खाना बनाने की भी जरूरत नहीं रही, क्योंकि मौसी उन्हें गरमागरम खाना खिलाती हैं. अब न बच्चों का सामान क्रैच में दे कर आना पड़ता है और न ही शाम को दफ्तर के बाद उन्हें वहां से लाने की चिंता है. बच्चे दिनभर अपने घर में सुरक्षित हाथों में रहते हैं.

मुझे तो मौसी को घर लाने के अपने फैसले में कहीं कोई गलती नजर नहीं आ रही. शाम को जब घर पहुंचती हूं तो घर का दरवाजा खुला मिलता है. मुसकराते और खिलखिलाते बच्चे मिलते हैं जो दिनभर क्रैच के बंधन में नहीं, अपने घर के उन्मुक्त वातावरण में रहते हैं. दोनों बच्चे दोपहर में थोड़ा आराम करने के बाद अपनाअपना होमवर्क भी कर लेते हैं.

मौसी को देख कर मुझे लगता है, वे ऐसा घना पेड़ हैं जिस के साए में हम जिंदगी की तेज धूप से बच सकते हैं. हम सब की भी पूरी कोशिश रहती है कि मौसी अपने गम को भूली रहें.

एक शाम मैं दफ्तर से आई तो तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी. देखते ही देखते मुझे तेज बुखार हो गया. मौसी तो परेशान हो उठीं. आनंद अभी दफ्तर से नहीं लौटे थे. मौसी ने तुरंत मुझे दूध के साथ बुखार उतारने की गोली दी और पानी की पट्टियां रखनी शुरू कर दीं. आनंद को आते ही डाक्टर के पास भेज दिया. जब तक मेरा बुखार नहीं उतरा, वे मेरे पास से नहीं उठीं.

मौसी का ऐसा स्नेह देख कर मैं स्वयं को रोक न सकी, मेरी आंखें भीग गईं. मौसी के हाथ अपने हाथों में ले कर मैं ने पूछा, ‘‘आप आनंद की मौसी हैं या मेरी मां?’’

‘‘चल पगली, मैं आनंद की मौसी बाद में हूं, पहले तेरी मां हूं. बहू क्या बेटी नहीं होती? सास क्या मां नहीं होती?’’ मौसी की जबान से सदा की भांति शहद और आंखों से नेह बरस रहा था.

‘‘मां ही तो होती है,’’ कहते हुए मैं मौसी से लिपट गई.

उस पल मुझे मौसी से वैसी ही गंध आ रही थी जो मैं बचपन में अपनी मां के गले लग कर महसूस करती थी. यह यकीनन ममता, प्यार की ही गंध थी, जिसे मैं वर्षों बाद अनुभव कर रही थी.

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December 29, 2021 at 11:32AM

धंधा अपना अपना

‘‘भक्तजनो,यह शरीर नश्वर है. इस के अंदर निवास करने वाली आत्मा का परमात्मा से मिलन ही परमानंद है. किंतु काम, क्रोध, लोभ नामक बेड़ियां इस मिलन में सब से बड़ी बाधा हैं. जिस दिन तुम इन बेड़ियों को तोड़ दोगे उस दिन तुम मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाओगे,’’ स्वामी दिव्यानंद की ओजस्वी वाणी गूंज रही थी.

महानगर के सब से वातानुकूलित हाल में एक ऊंचे मंच पर स्वामीजी विराजमान थे. गेरुए रंग के रेशमी वस्त्र, गले में रुद्राक्ष की माला, माथे पर चंदन का तिलक और उंगलियों में जगमगा रही पुखराज की अंगूठियां उन के व्यक्तित्व को अनोखी गरिमा प्रदान कर रही थीं.

प्रचार करा गया था कि स्वामीजी को सिद्धि  प्राप्त है. जिस पर उन की कृपादृष्टि हो जाए उस के कष्ट दूर होते देर नहीं लगती. पूरे शहर में स्वामीजी के बड़ेबड़े पोस्टर लगे थे. दूरदूर के इलाकों से आए भक्तजन स्वामीजी की महिमा का बखान करते रहते. जन सैलाब उन के दर्शन करने के लिए उमड़ा पड़ा था.

सुबह, दोपहर, शाम स्वामीजी दिन में 3 बार भक्तों को दर्शन और प्रवचन देते थे. इस समय उन का अंतिम व्याख्यान चल रहा था. पूरा हाल रंगबिरंगे बल्बों की रोशनी से जगमगा रहा था. मंच की सज्जा गुलाब के ताजे फूलों से की गई थी, जिन की खुशबू पूरे हाल में बिखरी थी.

स्वामीजी के चरणों में शीश झुका कर आशीर्वाद लेने वालों का तांता लगा था. आश्रम के स्वयंसेवक भी श्रद्धालुओं को अधिकाधिक चढ़ावा चढ़ा कर आशीर्वाद लेने के लिए प्रेरित कर रहे थे.

रात 9 बजे स्वामीजी का प्रवचन समाप्त हुआ. उन्होंने हाथ उठा कर भक्तों को आशीर्वाद दिया तो उन के जयघोष से पूरा हाल गुंजायमान हो उठा. मंदमंद मुसकराते हुए स्वामीजी उठे और आशीर्वाद की वर्षा करते हुए मंच के पीछे चले गए. उन के जाने के बाद धीरेधीरे हाल खाली हो गया. स्वामीजी के विश्वासपात्र शिष्यों श्रद्धानंदजी महाराज और सत्यानंदजी महाराज ने स्वयंसेवकों को भी बाहर निकालने के बाद हाल का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

‘‘चलो भाई, आज की मजदूरी बटोरी जाए’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने अपने गेरुए कुरते की बांहें चढ़ाते हुए कहा.

‘‘दिन भर इन बेवकूफों का स्वागतसत्कार करतेकरते यह नश्वर शरीर थक कर चूरचूर हो गया है. अब इसे तत्काल उत्तम किस्म के विश्राम की आवश्यकता है. इसलिए सारी गिनती शीघ्र पूरी कर ली जाए,’’ सत्यानंदजी महाराज ने अंगड़ाई लेते हुए सहमति जताई.

‘‘जो आज्ञा महाराज, श्रद्धानंदजी महाराज ने मुसकराते हुए मंच के सामने लगे फूलों के ढेर को फर्श पर बिखरा दिया. फूलों के साथ भक्तजनों ने दिल खोल कर दक्षिणा भी अर्पित की थी. दोनों तेजी से उसे बटोरने लगे, किंतु उन की आंखों से लग रहा था कि उन्हें किसी और चीज की तलाश है.

श्रद्धानंदजी महाराज ने फूलों के ढेर को एक बार फिर उलटापुलटा तो उन की आंखें चमक उठीं. वे खुशी से चिल्लाए, ‘‘वह देखो मिल गया.’’

सामने लाल रंग के रेशमी कपड़े में लिपटी कोई वस्तु पड़ी थी. सत्यानंदजी महाराज ने लपक कर उसे उठा लिया. शीघ्रता से उन्होंने उस वस्त्र को खोला तो उस के भीतर 1 लाख रुपए की नई गड्डी चमक रही थी.

‘‘महाराज, आज फिर वह 1 लाख की गड्डी चढ़ा गया है,’’ सत्यानंदजी गड्डी ले कर दिव्यानंदजी के कक्ष की ओर लपके. श्रद्धानंदजी महाराज भी उन के पीछेपीछे दौड़े.

स्वामी दिव्यानंद शानदार महाराजा बैड पर लेटे हुए थे. आवाज सुनते ही वे उठ बैठे. उन्होंने एक लाख की गड्डी को ले कर उलटपुलट कर देखा. उस के असली होने का विश्वास होने पर उन्होंने पूछा, ‘‘कुछ पता चला कौन था वह?’’

‘‘स्वामीजी, हम ने बहुत कोशिश की, लेकिन पता ही नहीं चल पाया कि वह गड्डी कब और कौन चढ़ा गया,’’ सत्यानंद महाराज ने कहा.

‘‘तुम दोनों माल खाखा कर मुटा गए हो. एक आदमी 5 दिनों से रोज 1 लाख की गड्डी चढ़ा जाता है और तुम दोनों उस का पता नहीं लगा पा रहे हो,’’ स्वामीजी की आंखें लाल हो उठीं.

‘‘क्षमा करें महाराज, हम ने पूरी कोशिश की…’’

‘‘क्या खाक कोशिश की,’’ स्वामीजी उस की बात काटते हुए गरजे, ‘‘तुम दोनों से कुछ नहीं होगा. अब हमें ही कुछ करना होगा,’’ इतना कह कर उन्होंने अपना मोबाइल निकाला और एक नंबर मिलाते हुए बोले, ‘‘हैलो निर्मलजी, मैं जिस मंच पर बैठता हूं उस के ऊपर आज रात में ही सीसी टीवी कैमरा लग जाना चाहिए.’’

‘‘लेकिन स्वामीजी, आप ही ने तो वहां कैमरा लगाने से मना किया था. बाकी सभी जगहों पर कैमरे लगे हुए हैं और उन की चकाचक रिकौर्डिंग हो रही है,’’ निर्मलजी की आवाज आई.

‘‘वत्स, यह सृष्टि परिवर्तनशील है. यहां कुछ भी स्थाई नहीं होता है,’’ स्वामीजी हलका सा हंसे फिर बोले, ‘‘तुम तो जानते हो कि मेरे निर्णय समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं. इसी कारण सफलता सदैव मेरे कदम चूमती है. तुम तो बस इतना बतलाओ कि यह काम कितनी देर में पूरा हो जाएगा. काम तुम्हारा और पैसा हमारा.’’

‘‘सूर्योदय से पहले आप की आज्ञा का पालन हो जाएगा,’’ निर्मलजी ने आश्वासन दिया. फिर झिझकते हुए बोले, ‘‘स्वामीजी कुछ जरूरी काम आ पड़ा है. अगर कुछ पैसे मिल जाते तो कृपा होती.’’

‘‘1 पैसे का भी भरोसा नहीं करते हो मुझ पर,’’ स्वामीजी ने कहा और फिर श्रद्धानंद की ओर मुड़ते हुए बोले, ‘‘निर्मलजी को अभी पैसे पहुंचा दो वरना उन्हें कोई दूसरा जरूरी काम याद आ जाएगा.’’

‘‘जो आज्ञा महाराज,’’ कह श्रद्धानंदजी महाराज सिर नवा कर चले गए.

निर्मलजी ने वादा निभाया. सूर्योदय से पहले स्वामीजी के मंच के ऊपर सीसी टीवी कैमरा लग गया. उधर उस भक्त ने भी अपनी रीति निभाई. आज फिर वह लाल वस्त्र में लिपटी 1 लाख की गड्डी स्वामीजी के चरणों में अर्पित कर गया था. श्रद्धानंद और दिव्यानंद आज भी उस भक्त का पता नहीं लगा पाए.

रात के 11 बजे स्वामीजी बड़ी तल्लीनता के साथ सीसी टीवी की रिकौर्डिंग देख रहे थे. अचानक एक दृश्य को देखते ही वे बोले, ‘‘इसे रिवाइंड करो.’’

श्रद्धानंद ने रिकौर्डिंग को रिवाइंड कर के चला दिया. स्वामीजी ने 2 बार और रिवाइंड करवाया. श्रद्धानंद को उस में कोई खास बात नजर नहीं आ रही थी, लेकिन स्वामीजी की आज्ञा का पालन जरूरी था.

‘‘रोकोरोको, यहीं पर रोको,’’ अचानक स्वामीजी चीखे, श्रद्धानंद ने रिकौर्डिंग तुरंत रोक दी.

‘‘जूम करो इसे,’’ स्वामीजी ने आज्ञा दी तो श्रद्धानंद ने जूम कर दिया.

‘‘यह रहा मेरा शिकार,’’ स्वामीजी ने सोफे से उठ कर स्क्रीन पर एक जगह उंगली रख दी. फिर बोले, ‘‘हलका सा रिवाइंड कर स्लो मोशन में चलाओ इसे.’’

श्रद्धानंद ने स्लो मोशन में रिकार्डिंग चला दी. रिकौर्डिंग में करीब 45 साल का एक व्यक्ति हाथों में फूलों का दोना लिए स्वामीजी के करीब आता दिखाई पड़ा. करीब आ कर उस ने फूलों को स्वामीजी के चरणों में अर्पित करने के बाद अपना शीश भी उन के चरणों में रख दिया. इसी के साथ उस ने अत्यंत शीघ्रता के साथ अपनी जेब से लाल रंग के वस्त्र में लिपटी गड्डी निकाली और फूलों के नीचे सरका दी. एक बार फिर शीश नवाने के बाद वह उठ कर तेजी से बाहर चला गया.

‘‘यह कोई तगड़ा आसामी मालूम पड़ता है. इस का चेहरा तुम दोनों ध्यान से देख लो. मुझे यह आदमी चाहिए… हर हालत में चाहिए,’’ स्वामीजी की आंखों में अनोखी चमक उभर आई.

‘‘आप चिंता मत करिए. कल हम लोग इसे हर हालत में पकड़ लाएंगे,’’ सत्यानंद ने आश्वस्त किया.

‘‘नहीं वत्स,’’ स्वामीजी अपना दायां हाथ उठा कर शांत स्वर में बोले, ‘‘वह मेरा अनन्य भक्त है. उसे पकड़ कर नहीं, बल्कि पूर्ण सम्मान के साथ लाना. स्मरण रहे कि उसे कोई कष्ट न होने पाए.’’

‘‘जो आज्ञा,’’ श्रद्धानंद और सत्यानंद ने शीश नवाया और कक्ष से बाहर चले गए.

अगले दिन उन दोनों की दृष्टि हर आनेजाने वाले भक्त के चेहरे पर टिकी थी. रात के करीब 8 बजे जब शरीर थक कर चूर होने लगा तब वह व्यक्ति आता दिखाई पड़ा.

‘‘देखो वह आ गया,’’ श्रद्धानंद ने सत्यानंद को कुहनी मारी.

‘‘लग तो यही रहा है. चलो उसे उधर ले कर चलते हैं,’’ सत्यानंद ने कहा.

‘‘अभी नहीं. पहले उसे गड्डी चढ़ा लेने दो ताकि सुनिश्चित हो जाए कि यह वही है जिस की हमें तलाश है,’’ श्रद्धानंद फुसफुसाए.

पिछले कल की तरह वह व्यक्ति आज भी मंच के करीब आया. फूल अर्पित करने के बाद उस ने स्वामीजी के चरणों में शीश नवाया, लाल रंग में लिपटी नोटों की गड्डी को चढ़ाने के बाद वह तेजी से उठ कर बाहर चल दिया.

‘‘मान्यवर, कृपया इधर आइए,’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने उस के करीब आ कर सम्मानित स्वर में कहा.

‘‘क्यों?’’

‘‘स्वामीजी आप से भेंट करना चाहते हैं,’’ सत्यानंदजी महाराज ने बताया.

‘‘मुझ से? किसलिए?’’ वह व्यक्ति घबरा उठा.

‘‘वे आप की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हैं. इसलिए आप को साक्षात दर्शन दे कर आशीर्वाद देना चाहते हैं,’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने बताया, ‘‘बड़ेबड़े मंत्री और अफसर स्वामीजी के दर्शनों के लिए लाइन लगा कर खड़े होते हैं. आप अत्यंत सौभाग्यशाली हैं, जो स्वामीजी ने आप को स्वयं मिलने के लिए बुलाया है. अब आप का भाग्योदय निश्चित है.’’

यह सुन उस व्यक्ति के चेहरे पर राहत के चिह्न उभर आए. श्रद्धानंदजी महाराज और सत्यानंद महाराज ने उसे एक खूबसूरत कक्ष में बैठा दिया.

करीब आधा घंटे बाद स्वामीजी उस कक्ष में आए और अत्यंत शांत स्वर में बोले, ‘‘वत्स, तुम्हारे ललाट की रेखाएं बता रही हैं कि तुम्हें जीवन में बहुत बड़ी सफलता मिलने वाली है.’’

स्वामीजी की वाणी सुन वह व्यक्ति उन के चरणों में लेट गया. उस की आंखों से श्रद्धा सुमन बह निकले. स्वामीजी ने उसे अपने हाथों से पकड़ कर उठाया और फिर स्नेह भरे स्वर में बोले, ‘‘उठो वत्स, अश्रु बहाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एक नया सवेरा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है.’’

‘‘स्वामीजी, आप के दर्शन पा कर मेरा जीवन धन्य हो गया,’’ वह व्यक्ति हाथ जोड़ कर बोला. भावातिरेक में उस की वाणी अवरुद्ध हो रही थी.

स्वामीजी ने उसे अपने साथ सोफे पर बैठाया और फिर बोले, ‘‘वत्स, एक प्रश्न पूछूं तो क्या उस का उत्तर सचसच दोगे?’’

‘‘आप आज्ञा करें तो उत्तर तो क्या आप के लिए प्राण भी देने के लिए तैयार हूं,’’ उस व्यक्ति ने कहा.

स्वामीजी ने अपनी दिव्यदृष्टि उस के चेहरे पर टिका दी फिर सीधे उस की आंखों में झांकते हुए बोले, ‘‘तुम प्रतिदिन 1 लाख रुपयों की गड्डी मेरे चरणों में क्यों चढ़ा रहे हो?’’

यह सुन उस व्यक्ति ने अपनी आंखें बंद कर लीं. उस के चेहरे पर छाए भावों को देख कर लग रहा था कि उस के भीतर भारी संघर्ष चल रहा है. चंद पलों बाद उस ने अपनी आंखें खोलीं और बोला, ‘‘स्वामीजी, मैं एक अरबपति आदमी था, लेकिन व्यापार में घाटा हो जाने के कारण मैं पूरी तरह बरबाद हो गया. सभी रिश्तेदारों और परिचितों ने मुझ से मुंह मोड़ लिया था. एक दिन मुझे पता चला कि यूरोप में एक बंद फैक्टरी कौड़ियों के भाव बिक रही है. मेरी पत्नी आप की अनन्य भक्त है. उस की सलाह पर मैं ने अपना मकान और पत्नी के गहने बेच कर वह फैक्टरी खरीद ली. आप को उस फैक्टरी में 20% का साझेदार बना कर मैं ने उस फैक्टरी को दोबारा चलाना शुरू कर दिया. शुरुआती दिनों में काफी परेशानियां हुईं लेकिन आप के आशीर्वाद से पिछले सप्ताह से वह फैक्टरी फायदे में आ गई. इस समय उस से 5 लाख रुपये रोज का फायदा हो रहा है. इसलिए 20% के हिसाब से मैं रोज 1 लाख रुपए आप के चरणों में अर्पित कर देता हूं.’’

‘‘लेकिन तुम ने यह बात गुप्त क्यों रखी?’’ मुझे बता भी तो सकते थे? स्वामीजी ने पूछा.

‘‘मैं ने सुना है कि आप मोहमाया और लोभ से काफी ऊपर हैं. इसलिए आप को बता कर आप की साधना में विध्न डालने का साहस मैं नहीं कर सका.’’

‘‘वत्स, धन्य हो तुम. तुम जैसे ईमानदार व्यक्तियों के बल पर ही यह दुनिया चल रही है वरना अब तक अपने पाप के बोझ से यह रसातल में समा चुकी होती,’’ स्वामीजी ने गंभीर स्वर में सांस भरी फिर आशीर्वाद की मुद्रा में आते हुए बोले, ‘‘ईश्वर की कृपा दृष्टि तुम पर पड़ चुकी है. जल्द ही तुम्हें 5 लाख रुपए नहीं, बल्कि 5 करोड़ रोज का मुनाफा होने वाला है.’’

‘‘सत्य वचन महाराज,’’ उस व्यक्ति ने श्रद्धा से शीश झुकाया फिर बोला, ‘‘यूरोप में ही एक और बंद पड़ी खान का पता लगा है, मैं ने हिसाब लगाया है कि अगर उसे ठीक से चलाया जाए तो 5 करोड़ रुपए रोज तो नहीं लेकिन 5 करोड़ रुपए महीने का फायदा जरूर हो सकता है.’’

‘‘तो उस फैक्टरी को खरीद क्यों नहीं लेते?’’

‘‘खरीद तो लेता, लेकिन उस के लिए करीब 20 करोड़ रुपए चाहिए. मैं ने काफी भागदौड़ की, लेकिन फंड का इंतजाम नहीं हो पा रहा है. एक बार मुझे व्यापार में घाटा हो चुका है, इसलिए फाइनैंसर मुझ पर दांव लगाने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं,’’ उस व्यक्ति के स्वर में निराशा झलक उठी.

‘‘वत्स, फंड की चिंता मत करो. ऊपर वाले ने तुम्हें मेरी शरण में भेज दिया है, इसलिए अब सारी व्यवस्थाएं हो जाएंगी,’’ स्वामीजी मुसकराए.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘तुम जैसे व्यक्तियों का दिया मेरे पास बहुत कुछ है. वह मेरे किसी काम का नहीं है. तुम उसे ले जाओ और फैक्टरी खरीद लो,’’ स्वामीजी ने कहा.

‘‘आप मुझे इतना रुपया दे देंगे?’’ उस व्यक्ति की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.

‘‘अकारण नहीं दूंगा,’’ स्वामीजी मुसकराए, ‘‘मुझे अपने भक्तों के कल्याण के लिए बहुत सारे कार्य करने हैं. इस सब के लिए बहुत पैसा चाहिए. इसलिए इस पैसे से तुम फैक्टरी खरीद लो, लेकिन उस में 51 प्रतिशत शेयर मेरे होंगे.’’

‘‘आप धन्य हैं महाराज,’’ वह व्यक्ति एक बार फिर स्वामीजी के चरणों में लोट गया.

‘‘श्रद्धा और सत्या, तुम दोनों अभी इन के साथ इन के निवास पर जाओ.

साझेदारी के कागजात तुरंत बना लो ताकि फैक्टरी को जल्द से जल्दी खरीद लिया जाए,’’ स्वामीजी ने आज्ञा दी.

अगले ही दिन साझेदारी के कागजात तैयार हो गए. स्वामीजी ने हजारों भक्तों की चढ़ाई की कमाई अपने अनन्य भक्त को सौंप दी. वह भक्त फैक्टरी खरीदने यूरोप चला गया.

स्वामीजी की आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने जगमगा रहे थे. किंतु जब 1 महीने तक उस भक्त का कोई संदेश नहीं आया तो उन्होंने श्रद्धानंद और सत्यानंद को उस के निवास पर भेजा. वहां उपस्थिति गार्ड ने उन दोनों को देखते ही बताया, ‘‘उन साहब ने तो 2 महीने के लिए यह कोठी किराए पर ली थी, किंतु आप लोगों के आने के 2 दिनों बाद वे अचानक ही इसे खाली कर के चले गए थे. किंतु जाने से पहले वे आप लोगों के लिए एक लिफाफा दे गए थे. कह रहे थे कि आप लोग एक न एक दिन उन से मिलने यहां जरूर आएंगे.’’

इतना कह कर गार्ड अपनी कोठरी के भीतर से एक लिफाफा ले आया. डगमगाते कदमों से वे दोनों स्वामी दिव्यानंद के पास लौट आए और लिफाफा उन्हें पकड़ा दिया.

स्वामीजी ने लिफाफा फाड़ा तो उस के भीतर से एक पत्र निकला, जिस में लिखा था:

‘‘आदरणीय स्वामी जी,

सादर चरण स्पर्श. अब तो आप को विश्वास हो गया होगा कि यह शरीर नश्वर है. इस के अंदर निवास करने वाली आत्मा का परमात्मा से मिलन ही परमानंद है. किंतु काम, क्रोध, लोभ नामक बेड़ियां इस मिलन में सब से बड़ी बाधा हैं. जिस दिन कोई व्यक्ति इन बेड़ियों को तोड़ देगा उस दिन वह मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाएगा. आप ने अपने भक्तों की बेड़ियां तोड़ने का कार्य किया है और मैं ने आप की इन बेड़ियों को तोड़ने की छोटी सी चेष्टा की है. आप इसे ‘धंधा अपना अपना’ भी कह सकते हैं.

आप का एक सेवक.

स्वामीजी उस पत्र को अपलक निहारे जा रहे थे और श्रद्धा और सत्या उन के चेहरे को.

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‘‘भक्तजनो,यह शरीर नश्वर है. इस के अंदर निवास करने वाली आत्मा का परमात्मा से मिलन ही परमानंद है. किंतु काम, क्रोध, लोभ नामक बेड़ियां इस मिलन में सब से बड़ी बाधा हैं. जिस दिन तुम इन बेड़ियों को तोड़ दोगे उस दिन तुम मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाओगे,’’ स्वामी दिव्यानंद की ओजस्वी वाणी गूंज रही थी.

महानगर के सब से वातानुकूलित हाल में एक ऊंचे मंच पर स्वामीजी विराजमान थे. गेरुए रंग के रेशमी वस्त्र, गले में रुद्राक्ष की माला, माथे पर चंदन का तिलक और उंगलियों में जगमगा रही पुखराज की अंगूठियां उन के व्यक्तित्व को अनोखी गरिमा प्रदान कर रही थीं.

प्रचार करा गया था कि स्वामीजी को सिद्धि  प्राप्त है. जिस पर उन की कृपादृष्टि हो जाए उस के कष्ट दूर होते देर नहीं लगती. पूरे शहर में स्वामीजी के बड़ेबड़े पोस्टर लगे थे. दूरदूर के इलाकों से आए भक्तजन स्वामीजी की महिमा का बखान करते रहते. जन सैलाब उन के दर्शन करने के लिए उमड़ा पड़ा था.

सुबह, दोपहर, शाम स्वामीजी दिन में 3 बार भक्तों को दर्शन और प्रवचन देते थे. इस समय उन का अंतिम व्याख्यान चल रहा था. पूरा हाल रंगबिरंगे बल्बों की रोशनी से जगमगा रहा था. मंच की सज्जा गुलाब के ताजे फूलों से की गई थी, जिन की खुशबू पूरे हाल में बिखरी थी.

स्वामीजी के चरणों में शीश झुका कर आशीर्वाद लेने वालों का तांता लगा था. आश्रम के स्वयंसेवक भी श्रद्धालुओं को अधिकाधिक चढ़ावा चढ़ा कर आशीर्वाद लेने के लिए प्रेरित कर रहे थे.

रात 9 बजे स्वामीजी का प्रवचन समाप्त हुआ. उन्होंने हाथ उठा कर भक्तों को आशीर्वाद दिया तो उन के जयघोष से पूरा हाल गुंजायमान हो उठा. मंदमंद मुसकराते हुए स्वामीजी उठे और आशीर्वाद की वर्षा करते हुए मंच के पीछे चले गए. उन के जाने के बाद धीरेधीरे हाल खाली हो गया. स्वामीजी के विश्वासपात्र शिष्यों श्रद्धानंदजी महाराज और सत्यानंदजी महाराज ने स्वयंसेवकों को भी बाहर निकालने के बाद हाल का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

‘‘चलो भाई, आज की मजदूरी बटोरी जाए’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने अपने गेरुए कुरते की बांहें चढ़ाते हुए कहा.

‘‘दिन भर इन बेवकूफों का स्वागतसत्कार करतेकरते यह नश्वर शरीर थक कर चूरचूर हो गया है. अब इसे तत्काल उत्तम किस्म के विश्राम की आवश्यकता है. इसलिए सारी गिनती शीघ्र पूरी कर ली जाए,’’ सत्यानंदजी महाराज ने अंगड़ाई लेते हुए सहमति जताई.

‘‘जो आज्ञा महाराज, श्रद्धानंदजी महाराज ने मुसकराते हुए मंच के सामने लगे फूलों के ढेर को फर्श पर बिखरा दिया. फूलों के साथ भक्तजनों ने दिल खोल कर दक्षिणा भी अर्पित की थी. दोनों तेजी से उसे बटोरने लगे, किंतु उन की आंखों से लग रहा था कि उन्हें किसी और चीज की तलाश है.

श्रद्धानंदजी महाराज ने फूलों के ढेर को एक बार फिर उलटापुलटा तो उन की आंखें चमक उठीं. वे खुशी से चिल्लाए, ‘‘वह देखो मिल गया.’’

सामने लाल रंग के रेशमी कपड़े में लिपटी कोई वस्तु पड़ी थी. सत्यानंदजी महाराज ने लपक कर उसे उठा लिया. शीघ्रता से उन्होंने उस वस्त्र को खोला तो उस के भीतर 1 लाख रुपए की नई गड्डी चमक रही थी.

‘‘महाराज, आज फिर वह 1 लाख की गड्डी चढ़ा गया है,’’ सत्यानंदजी गड्डी ले कर दिव्यानंदजी के कक्ष की ओर लपके. श्रद्धानंदजी महाराज भी उन के पीछेपीछे दौड़े.

स्वामी दिव्यानंद शानदार महाराजा बैड पर लेटे हुए थे. आवाज सुनते ही वे उठ बैठे. उन्होंने एक लाख की गड्डी को ले कर उलटपुलट कर देखा. उस के असली होने का विश्वास होने पर उन्होंने पूछा, ‘‘कुछ पता चला कौन था वह?’’

‘‘स्वामीजी, हम ने बहुत कोशिश की, लेकिन पता ही नहीं चल पाया कि वह गड्डी कब और कौन चढ़ा गया,’’ सत्यानंद महाराज ने कहा.

‘‘तुम दोनों माल खाखा कर मुटा गए हो. एक आदमी 5 दिनों से रोज 1 लाख की गड्डी चढ़ा जाता है और तुम दोनों उस का पता नहीं लगा पा रहे हो,’’ स्वामीजी की आंखें लाल हो उठीं.

‘‘क्षमा करें महाराज, हम ने पूरी कोशिश की…’’

‘‘क्या खाक कोशिश की,’’ स्वामीजी उस की बात काटते हुए गरजे, ‘‘तुम दोनों से कुछ नहीं होगा. अब हमें ही कुछ करना होगा,’’ इतना कह कर उन्होंने अपना मोबाइल निकाला और एक नंबर मिलाते हुए बोले, ‘‘हैलो निर्मलजी, मैं जिस मंच पर बैठता हूं उस के ऊपर आज रात में ही सीसी टीवी कैमरा लग जाना चाहिए.’’

‘‘लेकिन स्वामीजी, आप ही ने तो वहां कैमरा लगाने से मना किया था. बाकी सभी जगहों पर कैमरे लगे हुए हैं और उन की चकाचक रिकौर्डिंग हो रही है,’’ निर्मलजी की आवाज आई.

‘‘वत्स, यह सृष्टि परिवर्तनशील है. यहां कुछ भी स्थाई नहीं होता है,’’ स्वामीजी हलका सा हंसे फिर बोले, ‘‘तुम तो जानते हो कि मेरे निर्णय समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं. इसी कारण सफलता सदैव मेरे कदम चूमती है. तुम तो बस इतना बतलाओ कि यह काम कितनी देर में पूरा हो जाएगा. काम तुम्हारा और पैसा हमारा.’’

‘‘सूर्योदय से पहले आप की आज्ञा का पालन हो जाएगा,’’ निर्मलजी ने आश्वासन दिया. फिर झिझकते हुए बोले, ‘‘स्वामीजी कुछ जरूरी काम आ पड़ा है. अगर कुछ पैसे मिल जाते तो कृपा होती.’’

‘‘1 पैसे का भी भरोसा नहीं करते हो मुझ पर,’’ स्वामीजी ने कहा और फिर श्रद्धानंद की ओर मुड़ते हुए बोले, ‘‘निर्मलजी को अभी पैसे पहुंचा दो वरना उन्हें कोई दूसरा जरूरी काम याद आ जाएगा.’’

‘‘जो आज्ञा महाराज,’’ कह श्रद्धानंदजी महाराज सिर नवा कर चले गए.

निर्मलजी ने वादा निभाया. सूर्योदय से पहले स्वामीजी के मंच के ऊपर सीसी टीवी कैमरा लग गया. उधर उस भक्त ने भी अपनी रीति निभाई. आज फिर वह लाल वस्त्र में लिपटी 1 लाख की गड्डी स्वामीजी के चरणों में अर्पित कर गया था. श्रद्धानंद और दिव्यानंद आज भी उस भक्त का पता नहीं लगा पाए.

रात के 11 बजे स्वामीजी बड़ी तल्लीनता के साथ सीसी टीवी की रिकौर्डिंग देख रहे थे. अचानक एक दृश्य को देखते ही वे बोले, ‘‘इसे रिवाइंड करो.’’

श्रद्धानंद ने रिकौर्डिंग को रिवाइंड कर के चला दिया. स्वामीजी ने 2 बार और रिवाइंड करवाया. श्रद्धानंद को उस में कोई खास बात नजर नहीं आ रही थी, लेकिन स्वामीजी की आज्ञा का पालन जरूरी था.

‘‘रोकोरोको, यहीं पर रोको,’’ अचानक स्वामीजी चीखे, श्रद्धानंद ने रिकौर्डिंग तुरंत रोक दी.

‘‘जूम करो इसे,’’ स्वामीजी ने आज्ञा दी तो श्रद्धानंद ने जूम कर दिया.

‘‘यह रहा मेरा शिकार,’’ स्वामीजी ने सोफे से उठ कर स्क्रीन पर एक जगह उंगली रख दी. फिर बोले, ‘‘हलका सा रिवाइंड कर स्लो मोशन में चलाओ इसे.’’

श्रद्धानंद ने स्लो मोशन में रिकार्डिंग चला दी. रिकौर्डिंग में करीब 45 साल का एक व्यक्ति हाथों में फूलों का दोना लिए स्वामीजी के करीब आता दिखाई पड़ा. करीब आ कर उस ने फूलों को स्वामीजी के चरणों में अर्पित करने के बाद अपना शीश भी उन के चरणों में रख दिया. इसी के साथ उस ने अत्यंत शीघ्रता के साथ अपनी जेब से लाल रंग के वस्त्र में लिपटी गड्डी निकाली और फूलों के नीचे सरका दी. एक बार फिर शीश नवाने के बाद वह उठ कर तेजी से बाहर चला गया.

‘‘यह कोई तगड़ा आसामी मालूम पड़ता है. इस का चेहरा तुम दोनों ध्यान से देख लो. मुझे यह आदमी चाहिए… हर हालत में चाहिए,’’ स्वामीजी की आंखों में अनोखी चमक उभर आई.

‘‘आप चिंता मत करिए. कल हम लोग इसे हर हालत में पकड़ लाएंगे,’’ सत्यानंद ने आश्वस्त किया.

‘‘नहीं वत्स,’’ स्वामीजी अपना दायां हाथ उठा कर शांत स्वर में बोले, ‘‘वह मेरा अनन्य भक्त है. उसे पकड़ कर नहीं, बल्कि पूर्ण सम्मान के साथ लाना. स्मरण रहे कि उसे कोई कष्ट न होने पाए.’’

‘‘जो आज्ञा,’’ श्रद्धानंद और सत्यानंद ने शीश नवाया और कक्ष से बाहर चले गए.

अगले दिन उन दोनों की दृष्टि हर आनेजाने वाले भक्त के चेहरे पर टिकी थी. रात के करीब 8 बजे जब शरीर थक कर चूर होने लगा तब वह व्यक्ति आता दिखाई पड़ा.

‘‘देखो वह आ गया,’’ श्रद्धानंद ने सत्यानंद को कुहनी मारी.

‘‘लग तो यही रहा है. चलो उसे उधर ले कर चलते हैं,’’ सत्यानंद ने कहा.

‘‘अभी नहीं. पहले उसे गड्डी चढ़ा लेने दो ताकि सुनिश्चित हो जाए कि यह वही है जिस की हमें तलाश है,’’ श्रद्धानंद फुसफुसाए.

पिछले कल की तरह वह व्यक्ति आज भी मंच के करीब आया. फूल अर्पित करने के बाद उस ने स्वामीजी के चरणों में शीश नवाया, लाल रंग में लिपटी नोटों की गड्डी को चढ़ाने के बाद वह तेजी से उठ कर बाहर चल दिया.

‘‘मान्यवर, कृपया इधर आइए,’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने उस के करीब आ कर सम्मानित स्वर में कहा.

‘‘क्यों?’’

‘‘स्वामीजी आप से भेंट करना चाहते हैं,’’ सत्यानंदजी महाराज ने बताया.

‘‘मुझ से? किसलिए?’’ वह व्यक्ति घबरा उठा.

‘‘वे आप की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हैं. इसलिए आप को साक्षात दर्शन दे कर आशीर्वाद देना चाहते हैं,’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने बताया, ‘‘बड़ेबड़े मंत्री और अफसर स्वामीजी के दर्शनों के लिए लाइन लगा कर खड़े होते हैं. आप अत्यंत सौभाग्यशाली हैं, जो स्वामीजी ने आप को स्वयं मिलने के लिए बुलाया है. अब आप का भाग्योदय निश्चित है.’’

यह सुन उस व्यक्ति के चेहरे पर राहत के चिह्न उभर आए. श्रद्धानंदजी महाराज और सत्यानंद महाराज ने उसे एक खूबसूरत कक्ष में बैठा दिया.

करीब आधा घंटे बाद स्वामीजी उस कक्ष में आए और अत्यंत शांत स्वर में बोले, ‘‘वत्स, तुम्हारे ललाट की रेखाएं बता रही हैं कि तुम्हें जीवन में बहुत बड़ी सफलता मिलने वाली है.’’

स्वामीजी की वाणी सुन वह व्यक्ति उन के चरणों में लेट गया. उस की आंखों से श्रद्धा सुमन बह निकले. स्वामीजी ने उसे अपने हाथों से पकड़ कर उठाया और फिर स्नेह भरे स्वर में बोले, ‘‘उठो वत्स, अश्रु बहाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एक नया सवेरा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है.’’

‘‘स्वामीजी, आप के दर्शन पा कर मेरा जीवन धन्य हो गया,’’ वह व्यक्ति हाथ जोड़ कर बोला. भावातिरेक में उस की वाणी अवरुद्ध हो रही थी.

स्वामीजी ने उसे अपने साथ सोफे पर बैठाया और फिर बोले, ‘‘वत्स, एक प्रश्न पूछूं तो क्या उस का उत्तर सचसच दोगे?’’

‘‘आप आज्ञा करें तो उत्तर तो क्या आप के लिए प्राण भी देने के लिए तैयार हूं,’’ उस व्यक्ति ने कहा.

स्वामीजी ने अपनी दिव्यदृष्टि उस के चेहरे पर टिका दी फिर सीधे उस की आंखों में झांकते हुए बोले, ‘‘तुम प्रतिदिन 1 लाख रुपयों की गड्डी मेरे चरणों में क्यों चढ़ा रहे हो?’’

यह सुन उस व्यक्ति ने अपनी आंखें बंद कर लीं. उस के चेहरे पर छाए भावों को देख कर लग रहा था कि उस के भीतर भारी संघर्ष चल रहा है. चंद पलों बाद उस ने अपनी आंखें खोलीं और बोला, ‘‘स्वामीजी, मैं एक अरबपति आदमी था, लेकिन व्यापार में घाटा हो जाने के कारण मैं पूरी तरह बरबाद हो गया. सभी रिश्तेदारों और परिचितों ने मुझ से मुंह मोड़ लिया था. एक दिन मुझे पता चला कि यूरोप में एक बंद फैक्टरी कौड़ियों के भाव बिक रही है. मेरी पत्नी आप की अनन्य भक्त है. उस की सलाह पर मैं ने अपना मकान और पत्नी के गहने बेच कर वह फैक्टरी खरीद ली. आप को उस फैक्टरी में 20% का साझेदार बना कर मैं ने उस फैक्टरी को दोबारा चलाना शुरू कर दिया. शुरुआती दिनों में काफी परेशानियां हुईं लेकिन आप के आशीर्वाद से पिछले सप्ताह से वह फैक्टरी फायदे में आ गई. इस समय उस से 5 लाख रुपये रोज का फायदा हो रहा है. इसलिए 20% के हिसाब से मैं रोज 1 लाख रुपए आप के चरणों में अर्पित कर देता हूं.’’

‘‘लेकिन तुम ने यह बात गुप्त क्यों रखी?’’ मुझे बता भी तो सकते थे? स्वामीजी ने पूछा.

‘‘मैं ने सुना है कि आप मोहमाया और लोभ से काफी ऊपर हैं. इसलिए आप को बता कर आप की साधना में विध्न डालने का साहस मैं नहीं कर सका.’’

‘‘वत्स, धन्य हो तुम. तुम जैसे ईमानदार व्यक्तियों के बल पर ही यह दुनिया चल रही है वरना अब तक अपने पाप के बोझ से यह रसातल में समा चुकी होती,’’ स्वामीजी ने गंभीर स्वर में सांस भरी फिर आशीर्वाद की मुद्रा में आते हुए बोले, ‘‘ईश्वर की कृपा दृष्टि तुम पर पड़ चुकी है. जल्द ही तुम्हें 5 लाख रुपए नहीं, बल्कि 5 करोड़ रोज का मुनाफा होने वाला है.’’

‘‘सत्य वचन महाराज,’’ उस व्यक्ति ने श्रद्धा से शीश झुकाया फिर बोला, ‘‘यूरोप में ही एक और बंद पड़ी खान का पता लगा है, मैं ने हिसाब लगाया है कि अगर उसे ठीक से चलाया जाए तो 5 करोड़ रुपए रोज तो नहीं लेकिन 5 करोड़ रुपए महीने का फायदा जरूर हो सकता है.’’

‘‘तो उस फैक्टरी को खरीद क्यों नहीं लेते?’’

‘‘खरीद तो लेता, लेकिन उस के लिए करीब 20 करोड़ रुपए चाहिए. मैं ने काफी भागदौड़ की, लेकिन फंड का इंतजाम नहीं हो पा रहा है. एक बार मुझे व्यापार में घाटा हो चुका है, इसलिए फाइनैंसर मुझ पर दांव लगाने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं,’’ उस व्यक्ति के स्वर में निराशा झलक उठी.

‘‘वत्स, फंड की चिंता मत करो. ऊपर वाले ने तुम्हें मेरी शरण में भेज दिया है, इसलिए अब सारी व्यवस्थाएं हो जाएंगी,’’ स्वामीजी मुसकराए.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘तुम जैसे व्यक्तियों का दिया मेरे पास बहुत कुछ है. वह मेरे किसी काम का नहीं है. तुम उसे ले जाओ और फैक्टरी खरीद लो,’’ स्वामीजी ने कहा.

‘‘आप मुझे इतना रुपया दे देंगे?’’ उस व्यक्ति की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.

‘‘अकारण नहीं दूंगा,’’ स्वामीजी मुसकराए, ‘‘मुझे अपने भक्तों के कल्याण के लिए बहुत सारे कार्य करने हैं. इस सब के लिए बहुत पैसा चाहिए. इसलिए इस पैसे से तुम फैक्टरी खरीद लो, लेकिन उस में 51 प्रतिशत शेयर मेरे होंगे.’’

‘‘आप धन्य हैं महाराज,’’ वह व्यक्ति एक बार फिर स्वामीजी के चरणों में लोट गया.

‘‘श्रद्धा और सत्या, तुम दोनों अभी इन के साथ इन के निवास पर जाओ.

साझेदारी के कागजात तुरंत बना लो ताकि फैक्टरी को जल्द से जल्दी खरीद लिया जाए,’’ स्वामीजी ने आज्ञा दी.

अगले ही दिन साझेदारी के कागजात तैयार हो गए. स्वामीजी ने हजारों भक्तों की चढ़ाई की कमाई अपने अनन्य भक्त को सौंप दी. वह भक्त फैक्टरी खरीदने यूरोप चला गया.

स्वामीजी की आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने जगमगा रहे थे. किंतु जब 1 महीने तक उस भक्त का कोई संदेश नहीं आया तो उन्होंने श्रद्धानंद और सत्यानंद को उस के निवास पर भेजा. वहां उपस्थिति गार्ड ने उन दोनों को देखते ही बताया, ‘‘उन साहब ने तो 2 महीने के लिए यह कोठी किराए पर ली थी, किंतु आप लोगों के आने के 2 दिनों बाद वे अचानक ही इसे खाली कर के चले गए थे. किंतु जाने से पहले वे आप लोगों के लिए एक लिफाफा दे गए थे. कह रहे थे कि आप लोग एक न एक दिन उन से मिलने यहां जरूर आएंगे.’’

इतना कह कर गार्ड अपनी कोठरी के भीतर से एक लिफाफा ले आया. डगमगाते कदमों से वे दोनों स्वामी दिव्यानंद के पास लौट आए और लिफाफा उन्हें पकड़ा दिया.

स्वामीजी ने लिफाफा फाड़ा तो उस के भीतर से एक पत्र निकला, जिस में लिखा था:

‘‘आदरणीय स्वामी जी,

सादर चरण स्पर्श. अब तो आप को विश्वास हो गया होगा कि यह शरीर नश्वर है. इस के अंदर निवास करने वाली आत्मा का परमात्मा से मिलन ही परमानंद है. किंतु काम, क्रोध, लोभ नामक बेड़ियां इस मिलन में सब से बड़ी बाधा हैं. जिस दिन कोई व्यक्ति इन बेड़ियों को तोड़ देगा उस दिन वह मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाएगा. आप ने अपने भक्तों की बेड़ियां तोड़ने का कार्य किया है और मैं ने आप की इन बेड़ियों को तोड़ने की छोटी सी चेष्टा की है. आप इसे ‘धंधा अपना अपना’ भी कह सकते हैं.

आप का एक सेवक.

स्वामीजी उस पत्र को अपलक निहारे जा रहे थे और श्रद्धा और सत्या उन के चेहरे को.

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December 29, 2021 at 11:30AM

Tuesday, 28 December 2021

केलिकुंचिका: पलभर की गलती बनी जीवनभर की सजा

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December 29, 2021 at 11:27AM

केलिकुंचिका: भाग 3- पलभर की गलती बनी जीवनभर की सजा

छोटे से माइनिंग वाले शहर में सभी अफसर एकदूसरे को अच्छी तरह जानतेपहचानते थे. थोड़ी ही देर में डाक्टर ने अमोलिका को फोन कर कहा, ‘‘मुबारक हो, शाम को मैं आ रही हूं, मिठाई खिलाना.’’ ‘‘श्योर, दरअसल हम लोगों ने जिस दिन पार्टी दी थी आप छुट्टी ले कर बाहर गई थीं.’’

‘‘वह तो ठीक है, मैं तुम्हारी मौसी बनने की खुशी में मिठाई मांग रही हूं. ठीक है, शाम को डबल मिठाई खा लूंगी.’’ डाक्टर से बात करने के बाद अमोलिका के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं. उस के मन में संदेह हुआ क्योंकि दुर्गा और जतिन के अलावा घर में तीसरा और कोई नहीं था, कहीं यह बच्चा जतिन का न हो. उसे अपनी बहन पर क्रोध आ रहा था. साथ ही, उसे नफरत भी हो रही थी.

अभी तक दुर्गा और जतिन दोनों अस्पताल से घर भी नहीं लौटे थे. दोनों की समझ में नहीं आ रहा था कि आने वाले भीषण तूफान से कैसे निबटा जाए. कुछ पलों का आनंद इतनी बड़ी मुसीबत बन जाएगा, उन्होंने इस की कल्पना भी नहीं की थी. दोनों सोच रहे थे कि आज नहीं तो कल अमोलिका को यह बात तो पता चलेगी ही, तब उस के सामने कैसे मुंह दिखाएंगे.

दुर्गा का बेटा शलभ भी अब बड़ा हो रहा था. वह जरमन के अतिरिक्त हिंदी, इंगलिश और संस्कृत भी सीख रहा था. दुर्गा ने कुछ प्राचीन पुस्तकों, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम, गीता और वेद के जरमन अनुवाद भी देखे और कुछ पढ़े भी. जरमन विद्वानों का कहना है कि भारत के वेदों में बहुतकुछ छिपा है जिन से वे काफी सीख सकते हैं. सामान्य बातें और सामान्य ज्ञान से ले कर विज्ञान के बारे में भी वेद से सीखा जा सकता है.

जरमनी आने पर भी दुर्गा हमेशा अपनी सहेली माधुरी के संपर्क में रही थी. उस ने माधुरी को कुछ पैसे भी लौटा दिए थे जिस के चलते माधुरी थोड़ा नाराज भी हुई थी. माधुरी से ही दुर्गा को मालूम हुआ कि उस की दीदी अमोलिका और पापा दीनानाथ अब नहीं रहे. अमोलिका का बेटा बंटी कुछ साल नानी के साथ रहा था, बाद में वह अपने पापा जतिन के पास चला गया. उस की नानी भी उसी के साथ रहती थी. बंटी 16 साल का हो चुका था और कालेज में पढ़ रहा था. इधर, दुर्गा का बेटा शलभ 15 साल का हो गया था. वह भी अगले साल कालेज में चला जाएगा. दुर्गा के निमंत्रण पर माधुरी जरमनी आई थी. वह करीब एक महीने यहां रही. दुर्गा ने उसे बर्लिन, बोन, म्युनिक, फ्रैंकफर्ट, कौंलोन आदि जगहें घुमाईं. माधुरी इंडिया लौट गई.

दुर्गा से यूनिवर्सिटी की ओर से वेद पढ़ाने को कहा गया. उस से वेद के कुछ अध्यायों व श्लोकों का समुचित विश्लेषण करने को कहा गया. दुर्गा ने वेदों का अध्ययन किया था, इसलिए उसे पढ़ाने में कोई परेशानी नहीं हुई. उस के पढ़ाने के तरीके की विद्यार्थियों और शिक्षकों ने खूब प्रशंसा की. दुर्गा अब यूनिवर्सिटी में प्रतिष्ठित हो चुकी थी, बल्कि उसे अन्य पश्चिमी देशों में भी कभीकभी पढ़ाने जाना होता था.

5 वर्षों बाद शलभ फिजिक्स से ग्रेजुएशन कर चुका था. उसे न्यूक्लिअर फिजिक्स में आगे की पढ़ाई करनी थी. पीजी में ऐडमिशन से पहले उस ने मां से इंडिया जाने की पेशकश की तो दुर्गा ने उस की बात मान ली. दुर्गा ने उस के जन्म की सचाई अब उसे बता दी थी. सच जान कर उसे अपनी मां पर गर्व हुआ. अकेले ही काफी दुख झेल कर, अपने साहस के बलबूते पर मां खुद को और मुझे सम्मानजनक स्थिति में लाई थी. शलभ को अपनी मां पर गर्व हो रहा था. हालांकि वह किसी संबंधी के यहां नहीं जाना चाहता था लेकिन दुर्गा ने उसे अपने पिता जतिन और नानी से मिलने को कहा. माधुरी ने दुर्गा को जतिन का ठिकाना बता दिया था. जतिन आजकल नागपुर के पास वैस्टर्न कोलफील्ड में कार्यरत था.

इंडिया आ कर शलभ ने पहले देश के विभिन्न ऐतिहासिक व प्राचीन नगरों का भ्रमण किया. बाद में वह पिता से मिलने नागपुर गया. उस दिन रविवार था, जतिन और नानी दोनों घर पर ही थे. डोरबैल बजाने पर जतिन ने दरवाजा खोला. शलभ ने उस के पैर छुए. जतिन बोला, ‘‘मैं ने तुम को पहचाना नहीं.’’ शलभ बोला, ‘‘मैं एक जरमन नागरिक हूं. भारत घूमने आया हूं. मैं अंदर आ सकता हूं. मेरी मां ने मुझे आप से मिलने के लिए कहा है.’’

शलभ का चेहरा एकदम अपनी मां से मिलता था. तब तक उस की नानी भी आई तो उस ने नानी के भी पैर छू कर प्रणाम किया. जतिन और नानी दोनों शलभ को बड़े गौर से देख रहे थे. शलभ ने देखा कि शोकेस पर उस की मौसी और मां दोनों की फोटो पर माला पड़ी हुई है. शलभ ने दोनों तसवीरों की ओर संकेत करते हुए पूछा, ‘‘ये महिलाएं कौन हैं?’’

जतिन ने बताया, ‘‘एक मेरी पत्नी अमोलिका, दूसरी उन की छोटी बहन दुर्गा है, अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं.’’

‘‘एस तुत मिर लाइट,’’ शलभ बोला. ‘‘मैं समझा नहीं,’’ जतिन ने कहा.

‘‘आई एम सौरी, यही पहले मैं ने जरमन भाषा में कहा था,’’ शलभ बोला. ‘‘अरे वाह, कितनी भाषाएं जानते हो,’’ जतिन ने हैरानी जताई.

‘‘सब मेरी मां की देन है,’’ शलभ ने कहा. फिर दुर्गा की फोटो को दिखाते हुए शलभ बोला, ‘‘तो ये आप की केलिकुंचिका हैं.’’

‘‘व्हाट?’’ ‘‘केलिकुंचिका यानी साली, सिस्टर इन लौ.’’

‘‘यह कौन सी भाषा है…जरमन?’’ ‘‘जी नहीं, संस्कृत.’’

‘‘तो तुम संस्कृत भी जानते हो?’’ ‘‘जी, आप की केलिकुंचिका संस्कृत की विदुषी हैं, उन्हीं ने मुझे संस्कृत भी सिखाई है.’’

‘‘वह तो बहुत पहले मर चुकी है.’’ ‘‘आप के लिए मृत होंगी.’’

‘‘व्हाट? हम लोगों ने उसे ढूढ़ने की बहुत कोशिश की थी, पर वह नहीं मिली. आखिर में हम ने उसे मृत मान लिया.’’ ‘‘अच्छा, तो अब चलता हूं, कल दिल्ली से मेरी फ्लाइट है.’’

शलभ ने उठ कर दोनों के पैर छुए और बाहर निकल गया. ‘‘अरे, जरा रुको तो सही, हमारी बात तो सुनते जाओ, शलभ…’’

वे दोनों उसे पुकारते रहे, पर उस ने एक बार भी मुड़ कर उन की तरफ नहीं देखा.

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छोटे से माइनिंग वाले शहर में सभी अफसर एकदूसरे को अच्छी तरह जानतेपहचानते थे. थोड़ी ही देर में डाक्टर ने अमोलिका को फोन कर कहा, ‘‘मुबारक हो, शाम को मैं आ रही हूं, मिठाई खिलाना.’’ ‘‘श्योर, दरअसल हम लोगों ने जिस दिन पार्टी दी थी आप छुट्टी ले कर बाहर गई थीं.’’

‘‘वह तो ठीक है, मैं तुम्हारी मौसी बनने की खुशी में मिठाई मांग रही हूं. ठीक है, शाम को डबल मिठाई खा लूंगी.’’ डाक्टर से बात करने के बाद अमोलिका के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं. उस के मन में संदेह हुआ क्योंकि दुर्गा और जतिन के अलावा घर में तीसरा और कोई नहीं था, कहीं यह बच्चा जतिन का न हो. उसे अपनी बहन पर क्रोध आ रहा था. साथ ही, उसे नफरत भी हो रही थी.

अभी तक दुर्गा और जतिन दोनों अस्पताल से घर भी नहीं लौटे थे. दोनों की समझ में नहीं आ रहा था कि आने वाले भीषण तूफान से कैसे निबटा जाए. कुछ पलों का आनंद इतनी बड़ी मुसीबत बन जाएगा, उन्होंने इस की कल्पना भी नहीं की थी. दोनों सोच रहे थे कि आज नहीं तो कल अमोलिका को यह बात तो पता चलेगी ही, तब उस के सामने कैसे मुंह दिखाएंगे.

दुर्गा का बेटा शलभ भी अब बड़ा हो रहा था. वह जरमन के अतिरिक्त हिंदी, इंगलिश और संस्कृत भी सीख रहा था. दुर्गा ने कुछ प्राचीन पुस्तकों, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम, गीता और वेद के जरमन अनुवाद भी देखे और कुछ पढ़े भी. जरमन विद्वानों का कहना है कि भारत के वेदों में बहुतकुछ छिपा है जिन से वे काफी सीख सकते हैं. सामान्य बातें और सामान्य ज्ञान से ले कर विज्ञान के बारे में भी वेद से सीखा जा सकता है.

जरमनी आने पर भी दुर्गा हमेशा अपनी सहेली माधुरी के संपर्क में रही थी. उस ने माधुरी को कुछ पैसे भी लौटा दिए थे जिस के चलते माधुरी थोड़ा नाराज भी हुई थी. माधुरी से ही दुर्गा को मालूम हुआ कि उस की दीदी अमोलिका और पापा दीनानाथ अब नहीं रहे. अमोलिका का बेटा बंटी कुछ साल नानी के साथ रहा था, बाद में वह अपने पापा जतिन के पास चला गया. उस की नानी भी उसी के साथ रहती थी. बंटी 16 साल का हो चुका था और कालेज में पढ़ रहा था. इधर, दुर्गा का बेटा शलभ 15 साल का हो गया था. वह भी अगले साल कालेज में चला जाएगा. दुर्गा के निमंत्रण पर माधुरी जरमनी आई थी. वह करीब एक महीने यहां रही. दुर्गा ने उसे बर्लिन, बोन, म्युनिक, फ्रैंकफर्ट, कौंलोन आदि जगहें घुमाईं. माधुरी इंडिया लौट गई.

दुर्गा से यूनिवर्सिटी की ओर से वेद पढ़ाने को कहा गया. उस से वेद के कुछ अध्यायों व श्लोकों का समुचित विश्लेषण करने को कहा गया. दुर्गा ने वेदों का अध्ययन किया था, इसलिए उसे पढ़ाने में कोई परेशानी नहीं हुई. उस के पढ़ाने के तरीके की विद्यार्थियों और शिक्षकों ने खूब प्रशंसा की. दुर्गा अब यूनिवर्सिटी में प्रतिष्ठित हो चुकी थी, बल्कि उसे अन्य पश्चिमी देशों में भी कभीकभी पढ़ाने जाना होता था.

5 वर्षों बाद शलभ फिजिक्स से ग्रेजुएशन कर चुका था. उसे न्यूक्लिअर फिजिक्स में आगे की पढ़ाई करनी थी. पीजी में ऐडमिशन से पहले उस ने मां से इंडिया जाने की पेशकश की तो दुर्गा ने उस की बात मान ली. दुर्गा ने उस के जन्म की सचाई अब उसे बता दी थी. सच जान कर उसे अपनी मां पर गर्व हुआ. अकेले ही काफी दुख झेल कर, अपने साहस के बलबूते पर मां खुद को और मुझे सम्मानजनक स्थिति में लाई थी. शलभ को अपनी मां पर गर्व हो रहा था. हालांकि वह किसी संबंधी के यहां नहीं जाना चाहता था लेकिन दुर्गा ने उसे अपने पिता जतिन और नानी से मिलने को कहा. माधुरी ने दुर्गा को जतिन का ठिकाना बता दिया था. जतिन आजकल नागपुर के पास वैस्टर्न कोलफील्ड में कार्यरत था.

इंडिया आ कर शलभ ने पहले देश के विभिन्न ऐतिहासिक व प्राचीन नगरों का भ्रमण किया. बाद में वह पिता से मिलने नागपुर गया. उस दिन रविवार था, जतिन और नानी दोनों घर पर ही थे. डोरबैल बजाने पर जतिन ने दरवाजा खोला. शलभ ने उस के पैर छुए. जतिन बोला, ‘‘मैं ने तुम को पहचाना नहीं.’’ शलभ बोला, ‘‘मैं एक जरमन नागरिक हूं. भारत घूमने आया हूं. मैं अंदर आ सकता हूं. मेरी मां ने मुझे आप से मिलने के लिए कहा है.’’

शलभ का चेहरा एकदम अपनी मां से मिलता था. तब तक उस की नानी भी आई तो उस ने नानी के भी पैर छू कर प्रणाम किया. जतिन और नानी दोनों शलभ को बड़े गौर से देख रहे थे. शलभ ने देखा कि शोकेस पर उस की मौसी और मां दोनों की फोटो पर माला पड़ी हुई है. शलभ ने दोनों तसवीरों की ओर संकेत करते हुए पूछा, ‘‘ये महिलाएं कौन हैं?’’

जतिन ने बताया, ‘‘एक मेरी पत्नी अमोलिका, दूसरी उन की छोटी बहन दुर्गा है, अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं.’’

‘‘एस तुत मिर लाइट,’’ शलभ बोला. ‘‘मैं समझा नहीं,’’ जतिन ने कहा.

‘‘आई एम सौरी, यही पहले मैं ने जरमन भाषा में कहा था,’’ शलभ बोला. ‘‘अरे वाह, कितनी भाषाएं जानते हो,’’ जतिन ने हैरानी जताई.

‘‘सब मेरी मां की देन है,’’ शलभ ने कहा. फिर दुर्गा की फोटो को दिखाते हुए शलभ बोला, ‘‘तो ये आप की केलिकुंचिका हैं.’’

‘‘व्हाट?’’ ‘‘केलिकुंचिका यानी साली, सिस्टर इन लौ.’’

‘‘यह कौन सी भाषा है…जरमन?’’ ‘‘जी नहीं, संस्कृत.’’

‘‘तो तुम संस्कृत भी जानते हो?’’ ‘‘जी, आप की केलिकुंचिका संस्कृत की विदुषी हैं, उन्हीं ने मुझे संस्कृत भी सिखाई है.’’

‘‘वह तो बहुत पहले मर चुकी है.’’ ‘‘आप के लिए मृत होंगी.’’

‘‘व्हाट? हम लोगों ने उसे ढूढ़ने की बहुत कोशिश की थी, पर वह नहीं मिली. आखिर में हम ने उसे मृत मान लिया.’’ ‘‘अच्छा, तो अब चलता हूं, कल दिल्ली से मेरी फ्लाइट है.’’

शलभ ने उठ कर दोनों के पैर छुए और बाहर निकल गया. ‘‘अरे, जरा रुको तो सही, हमारी बात तो सुनते जाओ, शलभ…’’

वे दोनों उसे पुकारते रहे, पर उस ने एक बार भी मुड़ कर उन की तरफ नहीं देखा.

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December 25, 2021 at 11:18AM