Thursday, 29 August 2019

औरत एक पहेली: भाग-2

औरत एक पहेली: भाग-1

अब आगे पढ़ें

आखिरी किस्त

कभी ऐसा भी हो जाता कि विनीता अपने किसी निजी कार्यवश संदीप को कार में बैठा कर कहीं ले जातीं. संदीप घंटों के पश्चात प्रसन्न मुद्रा में वापस लौटते और बताते कि वह किसी बड़े होटल में विनीता के साथ भोजन कर के आ रहे हैं.

मेरे अंदर की औरत यह सब सहन नहीं कर पा रही थी. मैं यह सोच कर ईर्ष्या से जलती भुनती रहती कि विनीता की खूबसूरती ने संदीप के मन को बांध लिया है. अब उन्हें मैं फीकी लगने लगी हूं. उन के मन में मेरा स्थान विनीता लेती जा रही है.

कभी मैं क्षुब्ध हो कर सोचने लगती, इस शहर में मकान बनवाने से मेरा जीवन ही नीरस हो गया. एक शहर में रहते हुए संदीप और विनीता का साथ कभी नहीं छूट पाएगा. अब संदीप मुझे पहले की भांति कभी प्यार नहीं दे पाएंगे. विनीता अदृश्य रूप से मेरी सौत बन चुकी है, हो सकता है दोनों हमबिस्तर हो चुके हों. आखिर होटलों में जाने का और मकसद भी क्या हो सकता है?’

हमारा मकान पूरा बन गया तो मुहूर्त्त करने के पश्चात हम अपने घर में आ कर रहने लगे.

विनीता का आनाजाना और संदीप के साथ घुलमिल कर बातें करना कम नहीं हो पाया था.

एक दिन मेरे मन का आक्रोश जबान पर फूट पड़ा, ‘‘अब इस औरत के यहां आनाजाना बंद क्यों नहीं कर देते? मकान कभी का बन कर पूरा हो चुका है, अब इस फालतू मेलजोल का समापन हो जाना ही बेहतर है.’’

‘‘कैसी स्वार्थियों जैसी बातें करने लगी हो. विनीताजी ने हमारी कितनी सहायता की थी, अब हम उन का तिरस्कार कर दें, क्या यह अच्छा लगता है?’’

‘‘तब क्या जीवन भर उसे गले से लगाए रहोगे.’’

‘‘तुम्हें जलन होती है उस की खूबसूरती से,’’ संदीप मेरे क्रोध की परवा न कर के मुसकराते रहे. फिर लापरवाही से बाहर चले गए.

क्रोध और उत्तेजना से मैं कांप रही थी. जी चाह रहा था कि अभी जा कर उस आवारा, चरित्रहीन औरत का मुंह नोच डालूं.

अपने अपाहिज पति की आंखों में धूल झोंक कर पराए मर्दों के साथ गुलछर्रे उड़ाती फिरती है. अब तक न मालूम कितने पुरुषों के साथ मुंह काला कर चुकी होगी.

मुझे उस अपरिचित अनदेखे व्यक्ति से गहरी सहानुभूति होने लगी, जिस की पत्नी बन कर विनीता उस के प्रति विश्वासघात कर रही थी.

मैं सोचने लगी, ‘अगर यह कांटा अभी से उखाड़ कर नहीं फेंका गया तो मेरा मन जख्मी हो कर लहूलुहान हो जाएगा. इस से पहले कि मामला और आगे बढ़े मुझे विनीता के पति के पास जा कर सबकुछ साफसाफ बता देना चाहिए कि वे अपनी बदचलन पत्नी के ऊपर अंकुश लगाना शुरू कर दें. वह दूसरों के घर उजाड़ती फिरती है.’

उन के घर का पता मुझे मालूम था. एक बार मैं संदीप के साथ घर के बाहर तक जा चुकी थी. उस वक्त विनीता घर पर नहीं थीं. नौकर के बताने पर हम बाहर से ही लौट आए थे.

घर के सभी काम बच्चों पर छोड़ कर मैं विनीता के घर जाने के लिए तैयार हो गई. एक रिकशे में बैठ कर मैं उन के घर पहुंच गई.

विनीता घर में नहीं थीं. नौकर से साहब का कमरा पूछ कर मैं दनदनाती हुई सीढि़यां चढ़ कर ऊपर पहुंची.

नौकर ने कमरे के अंदर जा कर साहब को मेरे आगमन की सूचना दे दी. फिर मुझे अंदर जाने का इशारा कर के वह किसी काम में लग गया.

दरवाजे पर लहराता परदा एक ओर खिसका कर मैं ने अंदर प्रवेश किया तो सभी शब्द मेरे हलक में ही सूख गए. सामने कुरसी पर एक ऐसा इनसान बैठा हुआ था, जिस की कमर के नीचे दोनों टांग गायब थीं. उसे इनसान न कह कर सिर्फ एक धड़ कहा जाए तो बेहतर होगा.

‘‘आ जाओ, रेखा, मुझे विश्वास था  जीवन में दोबारा तुम से मुलाकात अवश्य होगी,’’ एक दर्दीला चिरपरिचित स्वर गूंज उठा.

उस पुरुष को पहचान कर मेरा रोंआरोंआ सिहर उठा था. पैरों तले जमीन खिसकती जा रही थी.

यह कोई और नहीं, मेरे भूतपूर्व पति सूरज थे. इन से वर्षों पहले मेरा तलाक हो चुका था. फिर मैं ने संदीप के साथ नई दुनिया बसा ली थी और संदीप को अपने अतीत से हमेशा अनभिज्ञ रखा था.

अब सूरज को देख कर मेरे कड़वे अतीत का वह काला पन्ना फिर से उजागर हो गया था, जिस की यादें मेरे मन की गहराइयों में दफन हो चुकी थीं.

वर्षों पहले मांबाप ने बड़ी धूमधाम से मेरा विवाह सूरज के साथ किया था. सूरज एक कुशल वास्तुकार थे. घर भी संपन्न था. विवाह के प्रथम वर्ष में ही मैं एक सुंदर, स्वस्थ बेटे की मां बन गई थी.

फिर हमारी खुशियों पर एकाएक वज्रपात हुआ. एक सड़क दुर्घटना में सूरज की दोनों टांगों की हड्डियां टूट कर चूरचूर हो गई थीं. जान बचाने हेतु डाक्टरों को उन की टांगें काट देनी पड़ी थीं.

एक अपाहिज पति को मेरा मन स्वीकार नहीं कर पाया. मैं खिन्न हो उठी. बातबात पर लड़ने, चिड़चिड़ाने लगी. मन का असंतोष अधिक बढ़ गया तो मैं सूरज को छोड़ कर मायके  में जा कर रहने लगी थी.

मायके वालों के प्रयासों के बाद भी मैं ससुराल जाने को तैयार नहीं हो पाई तो सब ने मुझे दुखी देख कर मेरा तलाक कराने के लिए कचहरी में प्रार्थनापत्र दिलवा दिया. मैं सूरज से छुटकारा पा कर किसी समर्थ पूर्ण पुरुष से विवाह करने के लिए अत्यंत इच्छुक थी.

एक दिन हमेशा के लिए हमारा संबंधविच्छेद हो गया. कानून ने सूरज की विकलांगता के कारण हमारे बेटे विक्की को मेरी सुपुर्दगी में दे दिया.

विक्की की वजह से मेरे पुनर्विवाह में अड़चनें आने लगीं. बच्चे वाली स्त्री से विवाह करने के लिए कौन पुरुष तैयार हो सकता था. मेरे मायके वाले भी विक्की की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लादने के लिए तैयार नहीं हो पाए.

इन सब बातों की जानकारी हो जाने पर एक दिन सूरज की माताजी मेरे मायके आ पहुंचीं. उन्होंने रोरो कर विक्की को मुझ से ले लिया.

ये भी पढ़ें- उलझन

सूरज की माताजी प्रसन्न मन से वापस लौट आईं. मेरा बोझ हलका हो गया था. विक्की की जुदाई के गम से अधिक मुझे दूसरे विवाह की अभिलाषा थी.

एक दिन मेरा विवाह संदीप से संपन्न हो गया. हम दोनों का यह दूसरा विवाह था. संदीप विधुर थे. विवाह की पहली रात ही हम दोनों ने अपनेअपने अतीत को हमेशा के लिए भुला देने की प्रतिज्ञा कर ली थी.

फिर एक दिन मायके जाने पर मुझे मालूम हुआ कि सूरज की माताजी सूरज और विक्की को ले कर किसी अन्य शहर में चली गई हैं.

‘‘बैठो, रेखा. खड़ी क्यों हो? लगता है, मुझे अचानक देख कर हैरान रह गई हो. तुम ने तो समझ लिया होगा मैं कहीं मरखप गया होऊंगा.’’

‘‘नहीं, सूरज, ऐसा मत कहो. सभी को जीवित रहने का पूरापूरा अधिकार है,’’ मेरे मुंह से अचानक निकल गया और मैं एक कुरसी पर निढाल सी बैठ गई.

‘‘मेरे जीवित रहने का अधिकार तो तुम छीन कर ले गई थीं. रेखा, तुम छोड़ कर चली गईं तो मैं लाश बन कर रह गया था. अगर विनीता का सहारा नहीं मिलता तो मैं अब तक अवश्य मर चुका होता. आज विनीता की बदौलत ही मैं इतनी बड़ी फर्म का मालिक बना बैठा हूं.’’

बहुत प्रयत्न करने के बाद भी मेरे आंसू रुक नहीं पाए. मैं ने मुंह फेर कर रूमाल से अपना चेहरा साफ किया.

सूरज कहते जा रहे थे, ‘‘तुम्हें वह नर्स याद है जो मेरी देखभाल के लिए मां ने घर में रखी थी. वह शर्मीली सी छुईमुई लड़की विनी.’’

‘ओह, अब मैं समझी कि मुझे विनीताजी का चेहरा इतना जानापहचाना क्यों लग रहा था.’

‘‘तुम विनी को नहीं पहचान पाईं, परंतु विनी ने पहली बार देख कर ही तुम्हें पहचान लिया था. उस ने मुझे तुम्हारे बारे में, तुम्हारी आर्थिक स्थिति और रहनसहन के बारे में सभी कुछ बतला दिया था. मैं तुम्हारी यथासंभव सहायता करने के लिए तुरंत तैयार हो गया था. मेरे आग्रह पर विनीता ने कदमकदम पर तुम्हारी और तुम्हारे पति की मदद की थी.

‘‘मेरे पैर मौजूद होते तो मैं खुद चल कर तुम्हारे घर आता. तुम्हारे सामने दौलत के ढेर लगा कर कहता, ‘जितनी दौलत की आवश्यकता हो, ले कर अपनी भूख मिटा लो. तुम इसी वजह से मुझे छोड़ कर गई थीं कि मैं अपाहिज हूं. दौलत पैदा करने में असमर्थ हूं…तुम्हें पूर्ण शारीरिक सुख नहीं दे पाऊंगा…’’ कहतेकहते सूरज का गला भर आया था.

‘‘बस, रहने दो सूरज, मैं और अधिक नहीं सुन सकूंगी,’’ मैं रो पड़ी, ‘‘एक जहरीली चुभती हुई यादगार ही तो हूं, भुला क्यों नहीं दिया मुझे.’’

‘‘कैसे भुला पाता कि मेरे विक्की की तुम मां हो…’’

‘‘विक्की कहां है, सूरज? वह कैसा है, क्या मैं उसे देख सकती हूं,’’ मैं व्यग्र हो कर कुरसी से उठ कर खड़ी हो गई.

सूरज अपनेआप को संयत कर चुके थे, ‘‘विक्की यानी विकास से तुम विनीता के दफ्तर में मिल चुकी हो. वह विनीता के बराबर वाली कुरसी पर बैठ कर दफ्तर के कामों में उस का हाथ बंटाता है. अब वह एक प्रसिद्ध वास्तुकार है. तुम्हारे मकान का नक्शा उसी ने तैयार किया था.’’

‘‘सच, वही मेरा विक्की है,’’ हर्ष व उत्तेजना से मैं गद्गद हो उठी. मेरी आंखों के सामने वह गोरा, स्वस्थ युवक घूम गया, जिस से मैं कई बार मिल चुकी थी, बातें कर चुकी थी. मेरे मकान के मुहूर्त पर वह विनीता के साथ मेरे घर भी आया था.

अचानक मेरे मन में एक अनजाना डर उभर आया, ‘‘क्या विक्की जानता है कि मैं उस की मां हूं?’’

‘‘नहीं, वह उस मां से नफरत करता है जो उस के अपाहिज पिता को छोड़ कर सुख की तलाश में अन्यत्र चली गई थी. वह विनीता को ही अपनी सगी मां मानता है. जानती हो रेखा, वह मुझे कितना चाहता है, मेरे बिना भोजन भी नहीं करता.’’

‘‘सूरज, मेरी एक बात मानोगे.’’

‘‘कहो, रेखा.’’

‘‘विक्की से कभी मत कहना कि मैं उस की मां हूं. यही कहना कि विनीता ही उस की असली मां है,’’ रोती हुई मैं सूरज के कमरे से बाहर निकल आई.

जिस पौधे को मैं उजाड़ कर चली गई थी, विनीता ने उसे जीवनदान दे कर हराभरा कर दिया था, मैं सोचती रह गई कि स्वार्थी विनीता है या मैं. कितना गलत समझ बैठी थी मैं विनीता को. इस महान नारी ने 2 बार मेरा घर बसाया था. एक बार अपाहिज सूरज और मासूम बेसहारा विक्की को अपनाकर और दूसरी बार मेरा मकान बनवा कर.

मैं सीढि़यां उतर कर नीचे आ गई.

घर वापस लौटी तो मेरे चेहरे की उड़ी हुई रंगत देख कर बच्चे और संदीप सब सोच में पड़ गए. एकसाथ ही मुझ से कारण पूछने लगे. मैं ने एक गिलास पानी पिया और इत्मीनान से बिस्तर पर बैठ कर संदीप से कहने लगी, ‘‘सुनो, तुम विनीताजी के दफ्तर में जा कर उन्हें और उन के पूरे परिवार को रात के खाने के लिए आमंत्रित कर आओ. उन्होंने हमारे लिए इतना सब किया है, हमारा भी तो उन के प्रति कुछ फर्ज है.’’

ये भी पढ़ें- कैक्टस के फूल

बच्चे हैरानी से एकदूसरे का मुंह ताकते रह गए. संदीप मेरी ओर ऐसे देखने लगे, जैसे कह रहे हों, ‘औरत सचमुच एक पहेली होती है. उसे समझ पाना असंभव है.’

The post औरत एक पहेली: भाग-2 appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/2ZnumE4

औरत एक पहेली: भाग-1

अब आगे पढ़ें

आखिरी किस्त

कभी ऐसा भी हो जाता कि विनीता अपने किसी निजी कार्यवश संदीप को कार में बैठा कर कहीं ले जातीं. संदीप घंटों के पश्चात प्रसन्न मुद्रा में वापस लौटते और बताते कि वह किसी बड़े होटल में विनीता के साथ भोजन कर के आ रहे हैं.

मेरे अंदर की औरत यह सब सहन नहीं कर पा रही थी. मैं यह सोच कर ईर्ष्या से जलती भुनती रहती कि विनीता की खूबसूरती ने संदीप के मन को बांध लिया है. अब उन्हें मैं फीकी लगने लगी हूं. उन के मन में मेरा स्थान विनीता लेती जा रही है.

कभी मैं क्षुब्ध हो कर सोचने लगती, इस शहर में मकान बनवाने से मेरा जीवन ही नीरस हो गया. एक शहर में रहते हुए संदीप और विनीता का साथ कभी नहीं छूट पाएगा. अब संदीप मुझे पहले की भांति कभी प्यार नहीं दे पाएंगे. विनीता अदृश्य रूप से मेरी सौत बन चुकी है, हो सकता है दोनों हमबिस्तर हो चुके हों. आखिर होटलों में जाने का और मकसद भी क्या हो सकता है?’

हमारा मकान पूरा बन गया तो मुहूर्त्त करने के पश्चात हम अपने घर में आ कर रहने लगे.

विनीता का आनाजाना और संदीप के साथ घुलमिल कर बातें करना कम नहीं हो पाया था.

एक दिन मेरे मन का आक्रोश जबान पर फूट पड़ा, ‘‘अब इस औरत के यहां आनाजाना बंद क्यों नहीं कर देते? मकान कभी का बन कर पूरा हो चुका है, अब इस फालतू मेलजोल का समापन हो जाना ही बेहतर है.’’

‘‘कैसी स्वार्थियों जैसी बातें करने लगी हो. विनीताजी ने हमारी कितनी सहायता की थी, अब हम उन का तिरस्कार कर दें, क्या यह अच्छा लगता है?’’

‘‘तब क्या जीवन भर उसे गले से लगाए रहोगे.’’

‘‘तुम्हें जलन होती है उस की खूबसूरती से,’’ संदीप मेरे क्रोध की परवा न कर के मुसकराते रहे. फिर लापरवाही से बाहर चले गए.

क्रोध और उत्तेजना से मैं कांप रही थी. जी चाह रहा था कि अभी जा कर उस आवारा, चरित्रहीन औरत का मुंह नोच डालूं.

अपने अपाहिज पति की आंखों में धूल झोंक कर पराए मर्दों के साथ गुलछर्रे उड़ाती फिरती है. अब तक न मालूम कितने पुरुषों के साथ मुंह काला कर चुकी होगी.

मुझे उस अपरिचित अनदेखे व्यक्ति से गहरी सहानुभूति होने लगी, जिस की पत्नी बन कर विनीता उस के प्रति विश्वासघात कर रही थी.

मैं सोचने लगी, ‘अगर यह कांटा अभी से उखाड़ कर नहीं फेंका गया तो मेरा मन जख्मी हो कर लहूलुहान हो जाएगा. इस से पहले कि मामला और आगे बढ़े मुझे विनीता के पति के पास जा कर सबकुछ साफसाफ बता देना चाहिए कि वे अपनी बदचलन पत्नी के ऊपर अंकुश लगाना शुरू कर दें. वह दूसरों के घर उजाड़ती फिरती है.’

उन के घर का पता मुझे मालूम था. एक बार मैं संदीप के साथ घर के बाहर तक जा चुकी थी. उस वक्त विनीता घर पर नहीं थीं. नौकर के बताने पर हम बाहर से ही लौट आए थे.

घर के सभी काम बच्चों पर छोड़ कर मैं विनीता के घर जाने के लिए तैयार हो गई. एक रिकशे में बैठ कर मैं उन के घर पहुंच गई.

विनीता घर में नहीं थीं. नौकर से साहब का कमरा पूछ कर मैं दनदनाती हुई सीढि़यां चढ़ कर ऊपर पहुंची.

नौकर ने कमरे के अंदर जा कर साहब को मेरे आगमन की सूचना दे दी. फिर मुझे अंदर जाने का इशारा कर के वह किसी काम में लग गया.

दरवाजे पर लहराता परदा एक ओर खिसका कर मैं ने अंदर प्रवेश किया तो सभी शब्द मेरे हलक में ही सूख गए. सामने कुरसी पर एक ऐसा इनसान बैठा हुआ था, जिस की कमर के नीचे दोनों टांग गायब थीं. उसे इनसान न कह कर सिर्फ एक धड़ कहा जाए तो बेहतर होगा.

‘‘आ जाओ, रेखा, मुझे विश्वास था  जीवन में दोबारा तुम से मुलाकात अवश्य होगी,’’ एक दर्दीला चिरपरिचित स्वर गूंज उठा.

उस पुरुष को पहचान कर मेरा रोंआरोंआ सिहर उठा था. पैरों तले जमीन खिसकती जा रही थी.

यह कोई और नहीं, मेरे भूतपूर्व पति सूरज थे. इन से वर्षों पहले मेरा तलाक हो चुका था. फिर मैं ने संदीप के साथ नई दुनिया बसा ली थी और संदीप को अपने अतीत से हमेशा अनभिज्ञ रखा था.

अब सूरज को देख कर मेरे कड़वे अतीत का वह काला पन्ना फिर से उजागर हो गया था, जिस की यादें मेरे मन की गहराइयों में दफन हो चुकी थीं.

वर्षों पहले मांबाप ने बड़ी धूमधाम से मेरा विवाह सूरज के साथ किया था. सूरज एक कुशल वास्तुकार थे. घर भी संपन्न था. विवाह के प्रथम वर्ष में ही मैं एक सुंदर, स्वस्थ बेटे की मां बन गई थी.

फिर हमारी खुशियों पर एकाएक वज्रपात हुआ. एक सड़क दुर्घटना में सूरज की दोनों टांगों की हड्डियां टूट कर चूरचूर हो गई थीं. जान बचाने हेतु डाक्टरों को उन की टांगें काट देनी पड़ी थीं.

एक अपाहिज पति को मेरा मन स्वीकार नहीं कर पाया. मैं खिन्न हो उठी. बातबात पर लड़ने, चिड़चिड़ाने लगी. मन का असंतोष अधिक बढ़ गया तो मैं सूरज को छोड़ कर मायके  में जा कर रहने लगी थी.

मायके वालों के प्रयासों के बाद भी मैं ससुराल जाने को तैयार नहीं हो पाई तो सब ने मुझे दुखी देख कर मेरा तलाक कराने के लिए कचहरी में प्रार्थनापत्र दिलवा दिया. मैं सूरज से छुटकारा पा कर किसी समर्थ पूर्ण पुरुष से विवाह करने के लिए अत्यंत इच्छुक थी.

एक दिन हमेशा के लिए हमारा संबंधविच्छेद हो गया. कानून ने सूरज की विकलांगता के कारण हमारे बेटे विक्की को मेरी सुपुर्दगी में दे दिया.

विक्की की वजह से मेरे पुनर्विवाह में अड़चनें आने लगीं. बच्चे वाली स्त्री से विवाह करने के लिए कौन पुरुष तैयार हो सकता था. मेरे मायके वाले भी विक्की की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लादने के लिए तैयार नहीं हो पाए.

इन सब बातों की जानकारी हो जाने पर एक दिन सूरज की माताजी मेरे मायके आ पहुंचीं. उन्होंने रोरो कर विक्की को मुझ से ले लिया.

ये भी पढ़ें- उलझन

सूरज की माताजी प्रसन्न मन से वापस लौट आईं. मेरा बोझ हलका हो गया था. विक्की की जुदाई के गम से अधिक मुझे दूसरे विवाह की अभिलाषा थी.

एक दिन मेरा विवाह संदीप से संपन्न हो गया. हम दोनों का यह दूसरा विवाह था. संदीप विधुर थे. विवाह की पहली रात ही हम दोनों ने अपनेअपने अतीत को हमेशा के लिए भुला देने की प्रतिज्ञा कर ली थी.

फिर एक दिन मायके जाने पर मुझे मालूम हुआ कि सूरज की माताजी सूरज और विक्की को ले कर किसी अन्य शहर में चली गई हैं.

‘‘बैठो, रेखा. खड़ी क्यों हो? लगता है, मुझे अचानक देख कर हैरान रह गई हो. तुम ने तो समझ लिया होगा मैं कहीं मरखप गया होऊंगा.’’

‘‘नहीं, सूरज, ऐसा मत कहो. सभी को जीवित रहने का पूरापूरा अधिकार है,’’ मेरे मुंह से अचानक निकल गया और मैं एक कुरसी पर निढाल सी बैठ गई.

‘‘मेरे जीवित रहने का अधिकार तो तुम छीन कर ले गई थीं. रेखा, तुम छोड़ कर चली गईं तो मैं लाश बन कर रह गया था. अगर विनीता का सहारा नहीं मिलता तो मैं अब तक अवश्य मर चुका होता. आज विनीता की बदौलत ही मैं इतनी बड़ी फर्म का मालिक बना बैठा हूं.’’

बहुत प्रयत्न करने के बाद भी मेरे आंसू रुक नहीं पाए. मैं ने मुंह फेर कर रूमाल से अपना चेहरा साफ किया.

सूरज कहते जा रहे थे, ‘‘तुम्हें वह नर्स याद है जो मेरी देखभाल के लिए मां ने घर में रखी थी. वह शर्मीली सी छुईमुई लड़की विनी.’’

‘ओह, अब मैं समझी कि मुझे विनीताजी का चेहरा इतना जानापहचाना क्यों लग रहा था.’

‘‘तुम विनी को नहीं पहचान पाईं, परंतु विनी ने पहली बार देख कर ही तुम्हें पहचान लिया था. उस ने मुझे तुम्हारे बारे में, तुम्हारी आर्थिक स्थिति और रहनसहन के बारे में सभी कुछ बतला दिया था. मैं तुम्हारी यथासंभव सहायता करने के लिए तुरंत तैयार हो गया था. मेरे आग्रह पर विनीता ने कदमकदम पर तुम्हारी और तुम्हारे पति की मदद की थी.

‘‘मेरे पैर मौजूद होते तो मैं खुद चल कर तुम्हारे घर आता. तुम्हारे सामने दौलत के ढेर लगा कर कहता, ‘जितनी दौलत की आवश्यकता हो, ले कर अपनी भूख मिटा लो. तुम इसी वजह से मुझे छोड़ कर गई थीं कि मैं अपाहिज हूं. दौलत पैदा करने में असमर्थ हूं…तुम्हें पूर्ण शारीरिक सुख नहीं दे पाऊंगा…’’ कहतेकहते सूरज का गला भर आया था.

‘‘बस, रहने दो सूरज, मैं और अधिक नहीं सुन सकूंगी,’’ मैं रो पड़ी, ‘‘एक जहरीली चुभती हुई यादगार ही तो हूं, भुला क्यों नहीं दिया मुझे.’’

‘‘कैसे भुला पाता कि मेरे विक्की की तुम मां हो…’’

‘‘विक्की कहां है, सूरज? वह कैसा है, क्या मैं उसे देख सकती हूं,’’ मैं व्यग्र हो कर कुरसी से उठ कर खड़ी हो गई.

सूरज अपनेआप को संयत कर चुके थे, ‘‘विक्की यानी विकास से तुम विनीता के दफ्तर में मिल चुकी हो. वह विनीता के बराबर वाली कुरसी पर बैठ कर दफ्तर के कामों में उस का हाथ बंटाता है. अब वह एक प्रसिद्ध वास्तुकार है. तुम्हारे मकान का नक्शा उसी ने तैयार किया था.’’

‘‘सच, वही मेरा विक्की है,’’ हर्ष व उत्तेजना से मैं गद्गद हो उठी. मेरी आंखों के सामने वह गोरा, स्वस्थ युवक घूम गया, जिस से मैं कई बार मिल चुकी थी, बातें कर चुकी थी. मेरे मकान के मुहूर्त पर वह विनीता के साथ मेरे घर भी आया था.

अचानक मेरे मन में एक अनजाना डर उभर आया, ‘‘क्या विक्की जानता है कि मैं उस की मां हूं?’’

‘‘नहीं, वह उस मां से नफरत करता है जो उस के अपाहिज पिता को छोड़ कर सुख की तलाश में अन्यत्र चली गई थी. वह विनीता को ही अपनी सगी मां मानता है. जानती हो रेखा, वह मुझे कितना चाहता है, मेरे बिना भोजन भी नहीं करता.’’

‘‘सूरज, मेरी एक बात मानोगे.’’

‘‘कहो, रेखा.’’

‘‘विक्की से कभी मत कहना कि मैं उस की मां हूं. यही कहना कि विनीता ही उस की असली मां है,’’ रोती हुई मैं सूरज के कमरे से बाहर निकल आई.

जिस पौधे को मैं उजाड़ कर चली गई थी, विनीता ने उसे जीवनदान दे कर हराभरा कर दिया था, मैं सोचती रह गई कि स्वार्थी विनीता है या मैं. कितना गलत समझ बैठी थी मैं विनीता को. इस महान नारी ने 2 बार मेरा घर बसाया था. एक बार अपाहिज सूरज और मासूम बेसहारा विक्की को अपनाकर और दूसरी बार मेरा मकान बनवा कर.

मैं सीढि़यां उतर कर नीचे आ गई.

घर वापस लौटी तो मेरे चेहरे की उड़ी हुई रंगत देख कर बच्चे और संदीप सब सोच में पड़ गए. एकसाथ ही मुझ से कारण पूछने लगे. मैं ने एक गिलास पानी पिया और इत्मीनान से बिस्तर पर बैठ कर संदीप से कहने लगी, ‘‘सुनो, तुम विनीताजी के दफ्तर में जा कर उन्हें और उन के पूरे परिवार को रात के खाने के लिए आमंत्रित कर आओ. उन्होंने हमारे लिए इतना सब किया है, हमारा भी तो उन के प्रति कुछ फर्ज है.’’

ये भी पढ़ें- कैक्टस के फूल

बच्चे हैरानी से एकदूसरे का मुंह ताकते रह गए. संदीप मेरी ओर ऐसे देखने लगे, जैसे कह रहे हों, ‘औरत सचमुच एक पहेली होती है. उसे समझ पाना असंभव है.’

The post औरत एक पहेली: भाग-2 appeared first on Sarita Magazine.

August 30, 2019 at 08:46AM

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-2

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-1

अब आगे पढ़ें-

‘खट… खट… खट…’ दरवाजे की दस्तक ने निकहत को चौंका दिया. वह पलंग पर बैठी एक रोमान्टिक सा गीत लिखने में मशगूल थी. दरवाजे पर संजीव के होने के ख्याल से उसका दिल बल्लियों उछलने लगा. वह लगभग भागती हुई सी दरवाजे तक पहुंची. कुंडी खोली तो उसके चेहरे पर खुशियों के हजारों रंग बिखर गये. सामने उसका संजीव खड़ा था. वो उससे लगभग लिपटते हुए बोली…

‘आज जल्दी कैसे आ गये…?’

‘कुछ काम था…’ छोटा सा जवाब देकर संजीव तख्त की ओर बढ़ गया, ‘अम्मी नहीं हैं…?’ उसने इधर-उधर दृष्टि घुमायी.

‘नहीं, जाहिद के साथ वैद्यजी के पास गयी हैं, मालिश का तेल लेने…’ निकहत ने उसे प्यार से देखते हुए कहा और उसके बगल में बैठ गयी.

‘निकहत… मैं बिजनेस के काम से कुछ दो-तीन महीने के लिए बाहर जा रहा हूं…?’

‘दो-तीन महीने के लिए… क्यों… कहां…?’ निकहत ने बेचैनी से पूछा.

‘कोलकाता…’ संजीव ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, ‘पापा चाहते हैं कि वहां हमारा एक नया शोरूम खुल जाए… वो अब बिजनेस बढ़ाना चाहते हैं…. इसके लिए मेरा जाना जरूरी है…’

‘कब तक वापस आ जाओगे…’ निकहत ने उदास होते हुए पूछा.

‘कम से कम तीन महीने तो लग ही जाएंगे… ज्यादा वक्त भी लग सकता है…’ संजीव ने जवाब दिया.

‘मैं यहां तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी…’ निकहत परेशान हो गयी.

‘अरे यार, समय जाते देर नहीं लगती, फिर ये भी तो सोचो अगर कोलकाता में हमारा बिजनेस सेट हो गया तो हमें कितना फायदा होगा… फिर पापा भी मुझसे खुश हो जाएंगे… क्या तुम यह नहीं चाहतीं…?’ संजीव प्यार से उसका चेहरा अपनी हथेलियों के बीच लेते हुए बोला.

‘वो तो ठीक है मगर…’ निकहत की आंखों में आंसू आ गये.

‘देखो निकहत, बात समझने की कोशिश करो, अगर मेरी वजह से पापा का बिजनेस बढ़ता है तो मेरे ऊपर उनका भरोसा बढ़ेगा, वो मेरी बात मानेंगे और तब हम दोनों की शादी के लिए मैं उनको आसानी से मना भी सकता हूं, वरना…’ संजीव ने उसे फुसलाने की कोशिश की.

निकहत की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे. संजीव से एक दिन की दूरी भी उसे बर्दाश्त नहीं थी और वह तीन महीने के लिए दूर जाने की बात कर रहा था, ‘मैं…’ कुछ कहते-कहते निकहत के होंठ थरथराने लगे. शब्द उसके हलक में ही अटक कर रह गये.

‘मैं तुम्हें फोन करता रहूंगा…’ संजीव उठ खड़ा हुआ. उसे डर था कि निकहत के आंसुओं के सामने वह अपने झूठ को ज्यादा देर संभाल नहीं पाएगा.

‘मैं अभी चलता हूं… पैकिंग वगैरह भी करनी है, अपना ख्याल रखना… परेशान मत होना…’ वह दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा.

निकहत अपने आंसुओं को समेटती उसके पीछे उठ खड़ी हुई.

‘देखो… तुम खुद कोई फोन मत करना, वहां मैं काफी बिजी रहूंगा… मैं ही टाइम मिलने पर तुम्हारे स्टूडियो फोन कर लिया करूंगा… ठीक है न…?’ संजीव ने पलट कर कहा.

‘हूं…’ निकहत ने सिर हिलाया.

संजीव चला गया, मगर आज जाते वक्त न तो उसने निकहत के माथे पर अपने प्यार की मुहर लगायी थी, न ही उसे मुड़ कर देखा था. वह तो जैसे उसकी निगाहों की पकड़ से जल्द ही बहुत दूर हो जाना चाहता था. उसे डर था कि अगर उसने पलट कर देखा तो वहीं जकड़ जाएगा, उसके पैर उसका साथ नहीं देंगे. वह अपने पीछे आंसुओं में डूबी निकहत को छोड़ कर तेज-तेज कदमों से बढ़ता चला गया.

जिन्दगी अपनी रफ्तार से चलने लगी. तीन हफ्ते गुजर गये. इस बीच सिर्फ दो बार ही संजीव का फोन आया था. औपचारिक सी बातचीत ही हो पायी थी. हालचाल पूछने, काम अच्छा चलने की खबर और अपना ख्याल रखने की नसीहतों के साथ ही फोन कट गया था. निकहत ने पूछा भी था कि कब तक लौटेगा?

‘अभी कुछ कह नहीं सकता… समय लगेगा…’ संजीव ने गोलमोल सा जवाब दिया था.

निकहत मुरझाने लगी थी. इसी आशा के साथ वह रोजाना स्टूडियो जाती थी कि न जाने किस दिन संजीव का फोन आ जाए. रिकॉर्डिंग या रिहर्सल नहीं भी होती, तब भी वह वहां जाकर घंटों बैठी रहती थी. दो महीने बीत चुके थे. इधर प्रेमभाई ने निकहत को कई गीत लिखने के लिए कहे थे. उसकी आवाज भी मार्केट में ठीक बिजनेस दे रही थी. अक्सर ही किसी न किसी रेडियो विज्ञापन की रिकॉर्डिंग होती रहती थी. काफी समय बीत चुका था संजीव का फोन आये. बीते दो हफ्ते से उसका फोन नहीं आया था. कोलकाता का फोन नम्बर निकहत के पास नहीं था, वरना वह खुद ही बात कर लेती. संजीव ने फोन नम्बर दिया ही नहीं, बोला कि स्टूडियो के लैंड लाइन पर मैं खुद ही फोन करूंगा.

‘शायद काम ज्यादा बढ़ गया हो’ निकहत सोचती. कई बार सोचा कि उसके घर पर फोन करके पता करे, मगर संजीव की हिदायत याद आ जाती, ‘घर पर फोन मत करना…’ और वह दिल मसोस कर रह जाती.

‘पता नहीं वो कैसा होगा…?’ निकहत स्टूडियो में बैठी अपने ख्यालों में गुम थी.

ये भी पढ़ें- अनमोल रिश्ता

अचानक…

‘एक गाने की रिकॉर्डिंग फिर से होगी…’ प्रेमभाई ने अन्दर प्रवेश करते हुए उससे कहा. वह चौंकर उनकी तरफ देखने लगी.

‘क्या सोच रही हो निकहत…?’ उन्होंने स्नेहिल स्वरों में पूछा.

‘जी कुछ नहीं… आप कुछ कह रहे थे…?’ निकहत उनकी तरफ देखने लगी.

‘हां… वो पिछले महीने डिटर्जेंट पाउडर के लिए जो जिंगल तैयार किया था, उसकी धुन थोड़ी बदलनी है, वो फिर से रिकॉर्ड होना होगा… मास्टर जी को भी बुलाया है… आते ही होंगे…’ प्रेमभाई ने संगीतकार के बारे में बताया, ‘तुम्हारे पास तो लिखा होगा वो गाना…?’ उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि निकहत पर डाली.

‘जी लिखा तो है, मगर वह डायरी तो घर पर पड़ी है…’

‘घर पर…! अच्छा तुम यहां किसी डायरी में देखो, कहीं न कहीं लिखा रखा होगा. मैं जब तक उधर रिकॉर्डिंग रूम सेट करवाता हूं…’ प्रेमभाई कहते हुए कमरे से निकल गये.

निकहत मेज पर रखी डायरियों के पन्ने पलट कर देखने लगी. ‘यहां तो किसी में भी नहीं है…’ वह बड़बड़ायी, ‘शायद दराज के अन्दर रखी डायरियों में मिले…’ सोचते हुए उसने प्रेमभाई की मेज वाली दराज बाहर खींची. पहली डायरी खोलते ही एक कार्ड जमीन पर गिरा. निकहत ने झुककर उसे उठाया, मेज पर डालने ही वाली थी कि उस पर संजीव का नाम पढ़ते ही चौंक पड़ी. उसने जल्दी से कार्ड खोला.

संजीव वेड्स मोनिका’ पढ़ते ही उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. कार्ड पर संजीव के घर का पता लिखा था और शादी की तारीख पिछले महीने की थी. उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया… खड़ा न रहा गया… वह धड़ाम से कुर्सी पर गिर पड़ी. उसे लगा जैसे सारे जिस्म की ताकत किसी ने निचोड़ ली हो. न जाने कितनी देर तक वह सन्नाटे में बैठी रही. एकाएक दरवाजा खुला…

‘निकहत… गाना मिल गया…?’ पूछते हुए प्रेमभाई अन्दर आये तो निकहत की हालत देखकर उनके होश उड़ गये.

‘निकहत…!’ वह उसकी ओर बढ़े और उसके कंपकपाते हाथों में संजीव की शादी का कार्ड देखकर पलक झपकते ही सब कुछ समझ गये. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वो उससे क्या कहें.

संजीव ने उन्हें निकहत को कुछ न बताने की कसम दी थी. उन्हें स्वयं संजीव की यह हरकत बड़ी नागवार गुजरी थी मगर वह कुछ भी नहीं कर पाये. संजीव ने अपनी दोस्ती का वास्ता देकर उन्हें अपनी मजबूरी कुछ इस ढंग से समझा दी थी कि वह खामोश होकर रह गये थे. उसका कार्ड लेकर उन्होंने चुपचाप अपनी दराज में रखी एक पुरानी डायरी में डाल दिया था, और आज… निकहत के हाथ वह कार्ड लग गया. उन्हें समझ में नहीं आया कि वह निकहत को किस तरह सांत्वना दें. उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे और वह सूनी-सूनी नजरों से प्रेमभाई को ताक रही थी.

प्रेमभाई ने आगे बढ़कर अपना हाथ उसके कंधों पर टिका दिया, ‘निकहत… मैं तुम्हें सबकुछ…’ वह हकलाते हुए बोले, और बस… निकहत फट पड़ी. वह दहाड़े मार-मार कर रोने लगी. प्रेमभाई बौखला उठे, ‘निकहत… अपने आपको संभालो निकहत…’ वह बौखलाए हुए स्वरों में बोले.

‘आपने मुझे बताया क्यों नहीं, प्रेमभाई…?’ उसने बुरी तरह रोते हुए पूछा, ‘आपको तो मैं अपने बड़े भाई की जगह समझती थी, मगर… मगर आपने भी… आपको सबकुछ पता था… है न…?’ वह फफक रही थी.

‘निकहत…’ उन्होंने उसका कंधा थपथपाते हुए उसे चुप कराने की कोशिश की, ‘निकहत… तुम नहीं जानती, मैंने उसे समझाने की कितनी कोशिश की, मगर उस पर तो दौलत का नशा सवार था. अगर उसे तुम्हारे प्यार की जरा भी कद्र होती तो वह यह काम हरगिज नहीं करता, वह तो सिर्फ तुमसे अपना दिल बहला रहा था… व्यापार कर रहा था… प्यार का व्यापार…’ प्रेमभाई की आवाज कर्कश हो गयी.

‘प्रेमभाई…’

‘देखो निकहत… अब जो हुआ है उसे भूल जाओ… वो तुम्हारे काबिल नहीं था…’ प्रेमभाई ने समझाने की कोशिश की.

‘कैसे भूल जाऊं, प्रेमभाई…?’ निकहत रोते-रोते लगभग चीखने के अन्दाज में बोली, ‘कितना आसान है आपके लिए यह बात कह देना, भूल जाओ… कैसे भूल जाऊं? आप ही बताइये… कैसे भूल जाऊं?’ निकहत की हालत पागलों जैसी हो गयी.

पे्रमभाई निरुत्तर हो गये. वह आगे बढ़े और मेज पर रखे गिलास में पानी उंडेल कर उसकी ओर बढ़ाया. निकहत ने कंपकंपाते हाथों से गिलास लेकर अपने होंठों से लगा लिया, मगर अभी भी वह बुरी तरह सिसक रही थी. उसके प्रेम की बगिया को उसका ही माली उजाड़ गया था. गिलास वापस मेज पर रख कर वह आंसू पोछते उठ खड़ी हुई.

‘निकहत…’ प्रेमभाई ने उसे टोका, ‘चलो मैं तुम्हें घर छोड़ आऊं… रिकॉर्डिंग कल करेंगे…’ वह उसके साथ दरवाजे की ओर बढ़े. उन्हें डर था कि दु:ख के आवेश में कहीं वह कुछ उल्टा-सीधा न कर बैठे.

‘नहीं, प्रेमभाई…’ निकहत ने उन्हें रोक दिया, ‘मैं अकेली जाऊंगी… रिकौर्डिंग कल की रख लीजिए…’ कह कर वह तेजी के साथ दरवाजे से निकल गयी.

ये भी पढ़ें- मां का घर

उसके दिलो-दिमाग में एक सन्नाटा सा छाया हुआ था. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका संजीव उसके साथ ऐसा कर सकता है. टैक्सी लेकर वह सीधे उसके घर की ओर चल दी.

(धारावाहिक के तीसरे भाग में पढ़िये कि संजीव के नये आलीशान बंगले पर पहुंच कर निकहत को क्या पता चला और संजीव ने उसके साथ क्या किया.)

The post धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-2 appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/2Lfw7cB

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-1

अब आगे पढ़ें-

‘खट… खट… खट…’ दरवाजे की दस्तक ने निकहत को चौंका दिया. वह पलंग पर बैठी एक रोमान्टिक सा गीत लिखने में मशगूल थी. दरवाजे पर संजीव के होने के ख्याल से उसका दिल बल्लियों उछलने लगा. वह लगभग भागती हुई सी दरवाजे तक पहुंची. कुंडी खोली तो उसके चेहरे पर खुशियों के हजारों रंग बिखर गये. सामने उसका संजीव खड़ा था. वो उससे लगभग लिपटते हुए बोली…

‘आज जल्दी कैसे आ गये…?’

‘कुछ काम था…’ छोटा सा जवाब देकर संजीव तख्त की ओर बढ़ गया, ‘अम्मी नहीं हैं…?’ उसने इधर-उधर दृष्टि घुमायी.

‘नहीं, जाहिद के साथ वैद्यजी के पास गयी हैं, मालिश का तेल लेने…’ निकहत ने उसे प्यार से देखते हुए कहा और उसके बगल में बैठ गयी.

‘निकहत… मैं बिजनेस के काम से कुछ दो-तीन महीने के लिए बाहर जा रहा हूं…?’

‘दो-तीन महीने के लिए… क्यों… कहां…?’ निकहत ने बेचैनी से पूछा.

‘कोलकाता…’ संजीव ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, ‘पापा चाहते हैं कि वहां हमारा एक नया शोरूम खुल जाए… वो अब बिजनेस बढ़ाना चाहते हैं…. इसके लिए मेरा जाना जरूरी है…’

‘कब तक वापस आ जाओगे…’ निकहत ने उदास होते हुए पूछा.

‘कम से कम तीन महीने तो लग ही जाएंगे… ज्यादा वक्त भी लग सकता है…’ संजीव ने जवाब दिया.

‘मैं यहां तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी…’ निकहत परेशान हो गयी.

‘अरे यार, समय जाते देर नहीं लगती, फिर ये भी तो सोचो अगर कोलकाता में हमारा बिजनेस सेट हो गया तो हमें कितना फायदा होगा… फिर पापा भी मुझसे खुश हो जाएंगे… क्या तुम यह नहीं चाहतीं…?’ संजीव प्यार से उसका चेहरा अपनी हथेलियों के बीच लेते हुए बोला.

‘वो तो ठीक है मगर…’ निकहत की आंखों में आंसू आ गये.

‘देखो निकहत, बात समझने की कोशिश करो, अगर मेरी वजह से पापा का बिजनेस बढ़ता है तो मेरे ऊपर उनका भरोसा बढ़ेगा, वो मेरी बात मानेंगे और तब हम दोनों की शादी के लिए मैं उनको आसानी से मना भी सकता हूं, वरना…’ संजीव ने उसे फुसलाने की कोशिश की.

निकहत की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे. संजीव से एक दिन की दूरी भी उसे बर्दाश्त नहीं थी और वह तीन महीने के लिए दूर जाने की बात कर रहा था, ‘मैं…’ कुछ कहते-कहते निकहत के होंठ थरथराने लगे. शब्द उसके हलक में ही अटक कर रह गये.

‘मैं तुम्हें फोन करता रहूंगा…’ संजीव उठ खड़ा हुआ. उसे डर था कि निकहत के आंसुओं के सामने वह अपने झूठ को ज्यादा देर संभाल नहीं पाएगा.

‘मैं अभी चलता हूं… पैकिंग वगैरह भी करनी है, अपना ख्याल रखना… परेशान मत होना…’ वह दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा.

निकहत अपने आंसुओं को समेटती उसके पीछे उठ खड़ी हुई.

‘देखो… तुम खुद कोई फोन मत करना, वहां मैं काफी बिजी रहूंगा… मैं ही टाइम मिलने पर तुम्हारे स्टूडियो फोन कर लिया करूंगा… ठीक है न…?’ संजीव ने पलट कर कहा.

‘हूं…’ निकहत ने सिर हिलाया.

संजीव चला गया, मगर आज जाते वक्त न तो उसने निकहत के माथे पर अपने प्यार की मुहर लगायी थी, न ही उसे मुड़ कर देखा था. वह तो जैसे उसकी निगाहों की पकड़ से जल्द ही बहुत दूर हो जाना चाहता था. उसे डर था कि अगर उसने पलट कर देखा तो वहीं जकड़ जाएगा, उसके पैर उसका साथ नहीं देंगे. वह अपने पीछे आंसुओं में डूबी निकहत को छोड़ कर तेज-तेज कदमों से बढ़ता चला गया.

जिन्दगी अपनी रफ्तार से चलने लगी. तीन हफ्ते गुजर गये. इस बीच सिर्फ दो बार ही संजीव का फोन आया था. औपचारिक सी बातचीत ही हो पायी थी. हालचाल पूछने, काम अच्छा चलने की खबर और अपना ख्याल रखने की नसीहतों के साथ ही फोन कट गया था. निकहत ने पूछा भी था कि कब तक लौटेगा?

‘अभी कुछ कह नहीं सकता… समय लगेगा…’ संजीव ने गोलमोल सा जवाब दिया था.

निकहत मुरझाने लगी थी. इसी आशा के साथ वह रोजाना स्टूडियो जाती थी कि न जाने किस दिन संजीव का फोन आ जाए. रिकॉर्डिंग या रिहर्सल नहीं भी होती, तब भी वह वहां जाकर घंटों बैठी रहती थी. दो महीने बीत चुके थे. इधर प्रेमभाई ने निकहत को कई गीत लिखने के लिए कहे थे. उसकी आवाज भी मार्केट में ठीक बिजनेस दे रही थी. अक्सर ही किसी न किसी रेडियो विज्ञापन की रिकॉर्डिंग होती रहती थी. काफी समय बीत चुका था संजीव का फोन आये. बीते दो हफ्ते से उसका फोन नहीं आया था. कोलकाता का फोन नम्बर निकहत के पास नहीं था, वरना वह खुद ही बात कर लेती. संजीव ने फोन नम्बर दिया ही नहीं, बोला कि स्टूडियो के लैंड लाइन पर मैं खुद ही फोन करूंगा.

‘शायद काम ज्यादा बढ़ गया हो’ निकहत सोचती. कई बार सोचा कि उसके घर पर फोन करके पता करे, मगर संजीव की हिदायत याद आ जाती, ‘घर पर फोन मत करना…’ और वह दिल मसोस कर रह जाती.

‘पता नहीं वो कैसा होगा…?’ निकहत स्टूडियो में बैठी अपने ख्यालों में गुम थी.

ये भी पढ़ें- अनमोल रिश्ता

अचानक…

‘एक गाने की रिकॉर्डिंग फिर से होगी…’ प्रेमभाई ने अन्दर प्रवेश करते हुए उससे कहा. वह चौंकर उनकी तरफ देखने लगी.

‘क्या सोच रही हो निकहत…?’ उन्होंने स्नेहिल स्वरों में पूछा.

‘जी कुछ नहीं… आप कुछ कह रहे थे…?’ निकहत उनकी तरफ देखने लगी.

‘हां… वो पिछले महीने डिटर्जेंट पाउडर के लिए जो जिंगल तैयार किया था, उसकी धुन थोड़ी बदलनी है, वो फिर से रिकॉर्ड होना होगा… मास्टर जी को भी बुलाया है… आते ही होंगे…’ प्रेमभाई ने संगीतकार के बारे में बताया, ‘तुम्हारे पास तो लिखा होगा वो गाना…?’ उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि निकहत पर डाली.

‘जी लिखा तो है, मगर वह डायरी तो घर पर पड़ी है…’

‘घर पर…! अच्छा तुम यहां किसी डायरी में देखो, कहीं न कहीं लिखा रखा होगा. मैं जब तक उधर रिकॉर्डिंग रूम सेट करवाता हूं…’ प्रेमभाई कहते हुए कमरे से निकल गये.

निकहत मेज पर रखी डायरियों के पन्ने पलट कर देखने लगी. ‘यहां तो किसी में भी नहीं है…’ वह बड़बड़ायी, ‘शायद दराज के अन्दर रखी डायरियों में मिले…’ सोचते हुए उसने प्रेमभाई की मेज वाली दराज बाहर खींची. पहली डायरी खोलते ही एक कार्ड जमीन पर गिरा. निकहत ने झुककर उसे उठाया, मेज पर डालने ही वाली थी कि उस पर संजीव का नाम पढ़ते ही चौंक पड़ी. उसने जल्दी से कार्ड खोला.

संजीव वेड्स मोनिका’ पढ़ते ही उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. कार्ड पर संजीव के घर का पता लिखा था और शादी की तारीख पिछले महीने की थी. उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया… खड़ा न रहा गया… वह धड़ाम से कुर्सी पर गिर पड़ी. उसे लगा जैसे सारे जिस्म की ताकत किसी ने निचोड़ ली हो. न जाने कितनी देर तक वह सन्नाटे में बैठी रही. एकाएक दरवाजा खुला…

‘निकहत… गाना मिल गया…?’ पूछते हुए प्रेमभाई अन्दर आये तो निकहत की हालत देखकर उनके होश उड़ गये.

‘निकहत…!’ वह उसकी ओर बढ़े और उसके कंपकपाते हाथों में संजीव की शादी का कार्ड देखकर पलक झपकते ही सब कुछ समझ गये. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वो उससे क्या कहें.

संजीव ने उन्हें निकहत को कुछ न बताने की कसम दी थी. उन्हें स्वयं संजीव की यह हरकत बड़ी नागवार गुजरी थी मगर वह कुछ भी नहीं कर पाये. संजीव ने अपनी दोस्ती का वास्ता देकर उन्हें अपनी मजबूरी कुछ इस ढंग से समझा दी थी कि वह खामोश होकर रह गये थे. उसका कार्ड लेकर उन्होंने चुपचाप अपनी दराज में रखी एक पुरानी डायरी में डाल दिया था, और आज… निकहत के हाथ वह कार्ड लग गया. उन्हें समझ में नहीं आया कि वह निकहत को किस तरह सांत्वना दें. उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे और वह सूनी-सूनी नजरों से प्रेमभाई को ताक रही थी.

प्रेमभाई ने आगे बढ़कर अपना हाथ उसके कंधों पर टिका दिया, ‘निकहत… मैं तुम्हें सबकुछ…’ वह हकलाते हुए बोले, और बस… निकहत फट पड़ी. वह दहाड़े मार-मार कर रोने लगी. प्रेमभाई बौखला उठे, ‘निकहत… अपने आपको संभालो निकहत…’ वह बौखलाए हुए स्वरों में बोले.

‘आपने मुझे बताया क्यों नहीं, प्रेमभाई…?’ उसने बुरी तरह रोते हुए पूछा, ‘आपको तो मैं अपने बड़े भाई की जगह समझती थी, मगर… मगर आपने भी… आपको सबकुछ पता था… है न…?’ वह फफक रही थी.

‘निकहत…’ उन्होंने उसका कंधा थपथपाते हुए उसे चुप कराने की कोशिश की, ‘निकहत… तुम नहीं जानती, मैंने उसे समझाने की कितनी कोशिश की, मगर उस पर तो दौलत का नशा सवार था. अगर उसे तुम्हारे प्यार की जरा भी कद्र होती तो वह यह काम हरगिज नहीं करता, वह तो सिर्फ तुमसे अपना दिल बहला रहा था… व्यापार कर रहा था… प्यार का व्यापार…’ प्रेमभाई की आवाज कर्कश हो गयी.

‘प्रेमभाई…’

‘देखो निकहत… अब जो हुआ है उसे भूल जाओ… वो तुम्हारे काबिल नहीं था…’ प्रेमभाई ने समझाने की कोशिश की.

‘कैसे भूल जाऊं, प्रेमभाई…?’ निकहत रोते-रोते लगभग चीखने के अन्दाज में बोली, ‘कितना आसान है आपके लिए यह बात कह देना, भूल जाओ… कैसे भूल जाऊं? आप ही बताइये… कैसे भूल जाऊं?’ निकहत की हालत पागलों जैसी हो गयी.

पे्रमभाई निरुत्तर हो गये. वह आगे बढ़े और मेज पर रखे गिलास में पानी उंडेल कर उसकी ओर बढ़ाया. निकहत ने कंपकंपाते हाथों से गिलास लेकर अपने होंठों से लगा लिया, मगर अभी भी वह बुरी तरह सिसक रही थी. उसके प्रेम की बगिया को उसका ही माली उजाड़ गया था. गिलास वापस मेज पर रख कर वह आंसू पोछते उठ खड़ी हुई.

‘निकहत…’ प्रेमभाई ने उसे टोका, ‘चलो मैं तुम्हें घर छोड़ आऊं… रिकॉर्डिंग कल करेंगे…’ वह उसके साथ दरवाजे की ओर बढ़े. उन्हें डर था कि दु:ख के आवेश में कहीं वह कुछ उल्टा-सीधा न कर बैठे.

‘नहीं, प्रेमभाई…’ निकहत ने उन्हें रोक दिया, ‘मैं अकेली जाऊंगी… रिकौर्डिंग कल की रख लीजिए…’ कह कर वह तेजी के साथ दरवाजे से निकल गयी.

ये भी पढ़ें- मां का घर

उसके दिलो-दिमाग में एक सन्नाटा सा छाया हुआ था. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका संजीव उसके साथ ऐसा कर सकता है. टैक्सी लेकर वह सीधे उसके घर की ओर चल दी.

(धारावाहिक के तीसरे भाग में पढ़िये कि संजीव के नये आलीशान बंगले पर पहुंच कर निकहत को क्या पता चला और संजीव ने उसके साथ क्या किया.)

The post धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-2 appeared first on Sarita Magazine.

August 30, 2019 at 08:43AM

नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी का आरोप

वरिष्ठ संवाददाता, गुड़गांव : जिला अदालत परिसर में चपरासी की नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी का मामला सामने आया ...

from Google Alert - नौकरी https://ift.tt/2zxVhxD
वरिष्ठ संवाददाता, गुड़गांव : जिला अदालत परिसर में चपरासी की नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी का मामला सामने आया ...

युवाओं को उनकी रुचि के मुताबिक मिलेगी ट्रेनिंग ताकि वे कर सकें बड़ा ...

कई युवा केवल नौकरी के लिए ट्रेनिंग ले रहे हैं। इसके बाद ही यह तय किया गया कि तय कोर्स के अलावा भी युवाओं को ...

from Google Alert - नौकरी https://ift.tt/2zxVaCd
कई युवा केवल नौकरी के लिए ट्रेनिंग ले रहे हैं। इसके बाद ही यह तय किया गया कि तय कोर्स के अलावा भी युवाओं को ...

विदेश में नौकरी के नाम पर 16 युवकों से ठगी

विभूतिखंड के साइबर टॉवर स्थित ईगल सिक्योरिटी कंपनी के संचालक जावेद हुसैन पर खाड़ी देशों में नौकरी का ...

from Google Alert - नौकरी https://ift.tt/2PlZYFz
विभूतिखंड के साइबर टॉवर स्थित ईगल सिक्योरिटी कंपनी के संचालक जावेद हुसैन पर खाड़ी देशों में नौकरी का ...

Fake Government Job Requirement: अगर आपने भी भरा है इस सरकारी नौकरी का फॉर्म ...

Government Job Requirement: डेपुटेशन में बाहर गए अधिकारी के नाम से जारी हो गई प्रेस विज्ञप्ति, जेल प्रहरी की भर्ती ...

from Google Alert - नौकरी https://ift.tt/2zxV51n
Government Job Requirement: डेपुटेशन में बाहर गए अधिकारी के नाम से जारी हो गई प्रेस विज्ञप्ति, जेल प्रहरी की भर्ती ...

भोले- भाले बेरोजगारों को सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा Archives > Jubilee ...

जुबिली पोस्ट ब्यूरो लखनऊ। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में भोले- भाले बेरोजगारों को सरकारी नौकरी दिलाने का ...

from Google Alert - नौकरी https://ift.tt/2HyvZ77
जुबिली पोस्ट ब्यूरो लखनऊ। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में भोले- भाले बेरोजगारों को सरकारी नौकरी दिलाने का ...