Tuesday, 3 May 2022

Mother’s Day 2022- दो पौधे: क्या मां की रस्में निभा रहे थे पिताजी

आंगन में आम का पेड़ चारों ओर फैला था. गरमी के इस मौसम में खटिया डाल कर इस के नीचे बैठने का आनंद ही असीम होता है. पेड़ पर बड़ीबड़ी कैरियां लटकी हुई हों और डालियों पर कोयल कूक रही हो.

मैं अकसर दोपहर में इस के नीचे ही बैठना पसंद करती हूं. यह पेड़ बाहर सड़क से भी दिखलाई देता है. आनेजाने वाले कई राहगीर उस पर लटकती बड़ीबड़ी कैरियों को ऐसे निहारते हैं मानो आंखों से ही खा जाएंगे. पिछले दिनों मैं बैठी थी कि एक राहगीर अपनी पुत्री को साइकिल पर लिए जा रहा था. उस लड़की ने कैरियों को लटकते हुए देखा तो मचल पड़ी. ‘मैं अपने हाथ से एक फल तोड़ूंगी,’ कह कर वह वहीं लोटपोट होने को तैयार.

मैं दरवाजे पर खड़ी थी. मैं ने गेट खोला और उस राहगीर से बच्ची के रोने का कारण पूछा तो उस ने बड़े संकोच के साथ बताया, ‘‘बिटिया आम के पेड़ से एक कैरी तोड़ने की जिद कर रही है.’’
बच्ची की आंखों में मोटेमोटे आंसू आ कर ठहर गए थे.

‘‘मैं मात्र एक ही कैरी तोड़ने की इजाजत दूंगी,’’ यह कह कर मैं ने आने के लिए रास्ता दे दिया. बेटी खुश हो गई और उस ने पूरी ईमानदारी से एक ही कैरी तोड़ी. राहगीर ‘धन्यवाद’ कह कर चला गया.

मेरी बिटिया नेहा इन दिनों कोई ग्रीष्मकालीन कोर्स कर रही है इसलिए वह होस्टल में है. वह थोड़े दिनों के लिए आई थी और फिर चली गई थी. घर सुनसान सा हो गया था.

मैं आम के पेड़ के नीचे बैठ कर अकसर अपने बचपन को याद करती थी जो अब कभी लौट कर नहीं आएगा. अचानक गेट खुलने की आवाज आई, मैं ने देखा कि अनूप यानी मेरे पति गेट से अंदर आ रहे हैं. कैसे असमय आ गए, आने का समय तो शाम 5 बजे का है, यह सोचती हुई मैं तेजी से उठी.

‘‘क्या बात है? तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘हां, ठीक है, तुम्हारे पापा का फोन आया था कि मम्मीजी की तबीयत खराब है. बुलाया है,’’ अनूप ने कहा.

यह सुनते ही मेरा दिल जोरों से धड़क उठा. अनूप ने फिर कहा, ‘‘तुम जल्दी से सामान लगा लो, मैं आटोरिकशा ला रहा हूं. 2 बजे ट्रेन है जावरा के लिए.’’

मैं अंदर गई और फटाफट अटैची में कपड़े डाले, पड़ोस में सुशीला आंटी के पास जा कर बोला कि कैरियों की देखरेख करना, घर भी देखती रहना, मम्मी की तबीयत खराब है कह कर मेरा गला भर आया. सुशीला आंटी ने मुझे सांत्वना दी और मैं घर लौटी तब तक ये आटोरिकशा ले आए थे.

मैन गेट पर ताला लगाया कि अचानक आम के पेड़ पर नजर पड़ गई. वह खामोशी के साथ तेज धूप को सहता खड़ा था.

मैं आटो में बैठी तो तेज गरम हवा के झोंके ने स्वागत किया. मैं अनूप के चेहरे को पढ़ने का पूरा प्रयास कर रही थी. शायद वे कुछ छिपा रहे थे. ‘तो क्या मेरी मम्मी इस दुनिया में नहीं रहीं?’ सोचते ही आंखों से आंसू की धार निकलने लगी.

‘‘शांत भी रहो. हम 2-3 घंटे में पहुंच तो रहे हैं,’’ अनूप ने सांत्वना देते हुए कहा.

हम स्टेशन पर पहुंचे. थोड़ी देर में गाड़ी भी आ गई. गाड़ी चलते ही पसीने को गरम हवा मिली. हलकी सी ठंडक महसूस हुई. मैं खिड़की में सिर रखे बैठी थी. मेरे मन में बारबार एक ही बात आ रही थी कि जावरा कब आएगा? मम्मी से कब मिलूंगी? समय काटना दुरूह लग रहा था. अतीत धीरे से मां के आंचल की तरह मेरे पास फड़फड़ाने लगा.

मां अपने मायके से एक आम का पौधा लाई थीं. विवाह के अवसर पर एक पौधा मायके में रोप कर आई थीं और एकसाथ ले आई थीं. मां उसे जान से ज्यादा चाहती थीं. उस आम के वृक्ष ने भी प्रेम की खाद पा कर बढ़ना प्रारंभ किया. जब मैं पैदा हुई थी तब तक वह इतना बड़ा हो चुका था कि मेरे लिए झूला उस की डाल पर ही डाला गया था. धीरेधीरे वह पौधा वृक्ष बन चुका था. उस में रसीले, मीठे आम लगते थे.

पिताजी थोड़े कड़क स्वभाव के थे. वे कम बोलते थे. घर में निर्णायक भूमिका उन्हीं की होती थी. मैं ने एकदो बार उन्हें मां पर बरसते हुए भी देखा था. मां नीची नजरें किए सब सुनती रहती थीं. उन के जाने के बाद आंखों से निकले आंसुओं को आंचल से पोंछ कर घर के कामों में लग जाती थीं.

मुझे परिवार के बाद यदि कुछ प्रिय था तो आंगन में लगा यह हराभरा वृक्ष जिस पर कोयल होती थी, गिलहरी होती थी. और भी न जाने कौनकौन से परिचित और अपरिचित जीवजंतु होते थे.

मेरी निपुणता पेड़ पर चढ़ने की हो गई थी. मां बहुत मना करतीं. घर की इकलौती थी, इसलिए मार कम पड़ती थी. पिताजी भी मना करते थे कि पेड़ पर न चढ़ा करूं लेकिन सुनता कौन? मेरी सहेलियां आतीं तो मैं अपनी कुशलता वृक्ष पर चढ़ कर बताती और उन सब को बौना साबित कर देती थी.

एक दिन ऊंची डाल पर बैठी थी कि पांव फिसल गया और मैं चीखतीचिल्लाती धड़ाम से नीचे गिर कर बेहोश हो गई. आवाज सुन कर मां भी आ गईं. मुझे बेहोश देख कर रोने लगीं. पिताजी को खबर दी, वे भी जल्दी से आ गए. पहले उन्होंने मां को बहुत बुराभला कहा और फिर मुझे अस्पताल ले जा कर एक्सरे कराया. पांव की हड्डी टूट गई थी.

डा. रत्तीलालजी बूढ़े से व्यक्ति थे. उन्होंने मुझे बड़े प्रेम से हिम्मत रखने को कहा, फिर पांव पर प्लास्टर बांध दिया. पूरे 2 माह बाद खुलना था, तब तक के लिए घूमनाफिरना, दौड़ना, पेड़ पर चढ़ना सब बंद हो गया.

स्कूल जाने से मुक्ति मिली थी. मैं खुश भी थी और दुखी भी. घर पर मेरा बिस्तर खिड़की के पास लगा दिया गया था जहां से हराभरा आम का पेड़ फलों से लदा हुआ दिखलाई देता लेकिन दुख की बात यह थी कि मुझे ले कर हर रोज पिताजी मां को दोषी ठहरा कर उन्हें भलाबुरा कहते रहते थे. एक दिन तो उन्होंने गुस्से में कह भी दिया कि कल रविवार है. मैं इस पेड़ को कटवा ही डालूंगा.

मां चुप थीं.

‘मेरी बेटी की टांग तोड़ दी,’ पिताजी ने कहा.

मां ने एक शब्द भी नहीं कहा. मां को बारबार प्रताडि़त होते देखना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था.

अगले दिन रविवार था. पिताजी कहीं से 2 व्यक्तियों को पेड़ काटने के लिए ले आए. मां अंदर रसोई में थीं. आंगन में फल लदे पेड़ पर जैसे ही पहली कुल्हाड़ी का वार हुआ मैं चीख पड़ी. मां दौड़ कर आईं. आंगन में 2 व्यक्तियों को देख कर मुझे छोड़ कर आम के पेड़ के पास जा पहुंचीं. मां गुस्से में लाल हो रही थीं, ‘तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी इस पर वार करने की?’

दोनों व्यक्ति सहम गए. मैं खिड़की से देख रही थी.

मां ने नाराजगी और क्रोधभरे स्वर में कहा, ‘तुम्हारी हिम्मत हो तो अब चलाओ इस पर कुल्हाड़ी.’

‘हट जाओ बीच से,’ पिताजी गरजे.

मां तेजी से आम के पेड़ के तने के आगे ढाल की तरह खड़ी हो गईं, ‘बहुत सुन ली तुम्हारी. यदि इस वृक्ष को कुछ हो गया तो समझो मैं भी जिंदा नहीं रहूंगी,’ मां क्रोध में कांप रही थीं.

पिताजी को पहली बार निराशा हाथ लगी थी. बड़ा निरीह, अपमानित सा उन्होंने स्वयं को अनुभव किया था और दोनों व्यक्तियों से जाने को कह दिया.

शायद जीवन में पहली बार हार क्या होती है उन्होंने जाना था. उन के चले जाने के बाद मां बाथरूम में गईं, हाथमुंह धो कर मेरे पास आईं और मेरे माथे पर हाथ फेर कर कहने लगीं, ‘बेटी, अपनी शक्ति को पहचानना चाहिए. अच्छे कार्यों में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देनी चाहिए ताकि उस के अच्छे परिणाम आएं,’ इतना कह कर वे रसोई में चली गईं.

पिताजी और मां का अनबोला पूरे 1 माह रहा था. मां ने भी बातचीत की पहल नहीं की थी. आखिर पिताजी ने ही इस बात को स्वीकार किया कि उन से गलती हो गई थी, पेड़ से गिरने पर वृक्ष का क्या दोष? तुम ने अपना रौद्र रूप दिखा कर एक फलदार वृक्ष को कटने से बचा लिया. यह सब देखसुन कर मुझे भी अच्छा लगा.

सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो स्वयं ही अपनी गलती का निर्णायक भी हो और क्षमा मांगने में संकोच भी न करे.

जीवन तेजी से बढ़ता जा रहा था. बचपना और शरारतें पीछे छूटती जा रही थीं. कब मैं बड़ी हो गई, मुझे नहीं मालूम पड़ा. मुझे पसंद भी कर लिया गया और विवाह की तारीख भी पक्की हो गई. अपनी मां का घर छूट जाने का मुझे प्रतिक्षण दर्द अनुभव होने लगा था. कार्ड छपे, बंटे और एक रात घर के आगे बरात भी आ गई. आंगन में ही सब रस्मों को उसी आम के पेड़ तले निबटाया गया. रस्में निबटतेनिबटते सुबह हो गई थी.

विदाई की बेला में मैं बहुत दुख से भरी थी, उसी समय मां मुझे एक ओर ले गईं और आम का एक पौधा देते हुए कहा, ‘इसे आंगन में लगा दे, तेरी याद हमेशा ताजा रहेगी,’ मेहमान सब इस बात पर आश्चर्य कर रहे थे. मैं ने उसी बड़े आम के पेड़ से दूर आम का पौधा अपने हाथों से लगा दिया.

मां ने मुझे आम का एक और पौधा दे कर कहा, ‘इसे अपने ससुराल में लगाना ताकि वहां छांव, मीठे फल मिलते रहें.’

मैं ने बड़ी श्रद्धा से वह पौधा ले लिया था. उसे ससुराल में आने के बाद लगाया था और दिनरात उस की देखरेख की थी. वही पौधा आज विशाल फलदार आम का वृक्ष बन गया था. इस बीच दर्जनों बार मायके आई तो यहां मेरे हाथ का रोपा पौधा भी वृक्ष बनता जा रहा था. मैं उस के तने पर बड़े प्रेम से हाथ फेरती थी.

गाड़ी के ब्रेक लगते ही मेरी तंद्रा टूटी.  स्टेशन आ गया था. जावरा में उतरने के बाद तांगा किया और घर के लिए रवाना हुए.

घर आया तो बाहर भीड़ लगी थी. मैं ने तांगे के रुकने की प्रतीक्षा भी नहीं की और दौड़ कर घर में जा पहुंची. आम के दोनों पेड़ों के मध्य मां का शव मेरी प्रतीक्षा के लिए रखा हुआ था. मैं जोर से रो पड़ी. मां का सौम्य रूप, शांत चेहरा, मांग में सिंदूर, माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी. मैं रोए चली जा रही थी. पिताजी एक ओर खड़े थे. चचेरे भाई व भाभी ने मुझे मां से अलग किया. संध्या हो रही थी, मां का शव केवल मेरी प्रतीक्षा के लिए रखा गया था.

मां को ले जाया गया. मैं रोती रह गई. ऊपर नजर डाली तो आम का विशाल वृक्ष उदास खड़ा था और मेरे द्वारा रोपा गया वह पौधा  बढ़ कर उस को छू रहा था, मानो वंदनवार बन गया हो. चारों ओर उदासी थी. मां के बिना घर कितना सूना, अकेला हो गया था.

दिन आवारा बादल की तरह उड़ते चले गए. मृत्यु उपरांत की रस्में पूरी हो गईं और अनूप को अपनी ड्यूटी, मुझे अपने घर, नेहा की याद आने लगी थी. जीवन कब ठहरता है, युगोंयुगों से वह इसी क्रम से चलता आ रहा है. मैं ने पिताजी को अगली सुबह जाने की बात कही.

अगले दिन अनूप आटोरिकशा ले आए. मैं भैयाभाभी को पिताजी का ध्यान रखने का कह कर आगे बढ़ी तो पिताजी ने मुझे कुछ देर ठहरने को कहा. मैं रुक गई. पिताजी हाथों में आम के 2 पौधों को ले कर आए और बोले, ‘तेरी मां ने तेरे लिए रखे थे.’

‘क्यों?’

‘बेटी नेहा के लिए, उस के विवाह में वह एक ससुराल ले जाएगी और एक अपने आंगन में लगवा लेना. उस की याद हमेशा हरीभरी रहेगी. बेटी की पूंजी मायके में भी बढ़ेगी और ससुराल को भी संपन्न बनाएगी.’

मैं ने दोनों पौधे ले लिए और आटो रिकशा में बैठ गई. हवा के हलके से झोंके के साथ उन के पत्ते हिलने लगे, मानो पिताजी को हाथ हिलाहिला कर विदाई के लिए टाटा कह रहे हों.

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आंगन में आम का पेड़ चारों ओर फैला था. गरमी के इस मौसम में खटिया डाल कर इस के नीचे बैठने का आनंद ही असीम होता है. पेड़ पर बड़ीबड़ी कैरियां लटकी हुई हों और डालियों पर कोयल कूक रही हो.

मैं अकसर दोपहर में इस के नीचे ही बैठना पसंद करती हूं. यह पेड़ बाहर सड़क से भी दिखलाई देता है. आनेजाने वाले कई राहगीर उस पर लटकती बड़ीबड़ी कैरियों को ऐसे निहारते हैं मानो आंखों से ही खा जाएंगे. पिछले दिनों मैं बैठी थी कि एक राहगीर अपनी पुत्री को साइकिल पर लिए जा रहा था. उस लड़की ने कैरियों को लटकते हुए देखा तो मचल पड़ी. ‘मैं अपने हाथ से एक फल तोड़ूंगी,’ कह कर वह वहीं लोटपोट होने को तैयार.

मैं दरवाजे पर खड़ी थी. मैं ने गेट खोला और उस राहगीर से बच्ची के रोने का कारण पूछा तो उस ने बड़े संकोच के साथ बताया, ‘‘बिटिया आम के पेड़ से एक कैरी तोड़ने की जिद कर रही है.’’
बच्ची की आंखों में मोटेमोटे आंसू आ कर ठहर गए थे.

‘‘मैं मात्र एक ही कैरी तोड़ने की इजाजत दूंगी,’’ यह कह कर मैं ने आने के लिए रास्ता दे दिया. बेटी खुश हो गई और उस ने पूरी ईमानदारी से एक ही कैरी तोड़ी. राहगीर ‘धन्यवाद’ कह कर चला गया.

मेरी बिटिया नेहा इन दिनों कोई ग्रीष्मकालीन कोर्स कर रही है इसलिए वह होस्टल में है. वह थोड़े दिनों के लिए आई थी और फिर चली गई थी. घर सुनसान सा हो गया था.

मैं आम के पेड़ के नीचे बैठ कर अकसर अपने बचपन को याद करती थी जो अब कभी लौट कर नहीं आएगा. अचानक गेट खुलने की आवाज आई, मैं ने देखा कि अनूप यानी मेरे पति गेट से अंदर आ रहे हैं. कैसे असमय आ गए, आने का समय तो शाम 5 बजे का है, यह सोचती हुई मैं तेजी से उठी.

‘‘क्या बात है? तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘हां, ठीक है, तुम्हारे पापा का फोन आया था कि मम्मीजी की तबीयत खराब है. बुलाया है,’’ अनूप ने कहा.

यह सुनते ही मेरा दिल जोरों से धड़क उठा. अनूप ने फिर कहा, ‘‘तुम जल्दी से सामान लगा लो, मैं आटोरिकशा ला रहा हूं. 2 बजे ट्रेन है जावरा के लिए.’’

मैं अंदर गई और फटाफट अटैची में कपड़े डाले, पड़ोस में सुशीला आंटी के पास जा कर बोला कि कैरियों की देखरेख करना, घर भी देखती रहना, मम्मी की तबीयत खराब है कह कर मेरा गला भर आया. सुशीला आंटी ने मुझे सांत्वना दी और मैं घर लौटी तब तक ये आटोरिकशा ले आए थे.

मैन गेट पर ताला लगाया कि अचानक आम के पेड़ पर नजर पड़ गई. वह खामोशी के साथ तेज धूप को सहता खड़ा था.

मैं आटो में बैठी तो तेज गरम हवा के झोंके ने स्वागत किया. मैं अनूप के चेहरे को पढ़ने का पूरा प्रयास कर रही थी. शायद वे कुछ छिपा रहे थे. ‘तो क्या मेरी मम्मी इस दुनिया में नहीं रहीं?’ सोचते ही आंखों से आंसू की धार निकलने लगी.

‘‘शांत भी रहो. हम 2-3 घंटे में पहुंच तो रहे हैं,’’ अनूप ने सांत्वना देते हुए कहा.

हम स्टेशन पर पहुंचे. थोड़ी देर में गाड़ी भी आ गई. गाड़ी चलते ही पसीने को गरम हवा मिली. हलकी सी ठंडक महसूस हुई. मैं खिड़की में सिर रखे बैठी थी. मेरे मन में बारबार एक ही बात आ रही थी कि जावरा कब आएगा? मम्मी से कब मिलूंगी? समय काटना दुरूह लग रहा था. अतीत धीरे से मां के आंचल की तरह मेरे पास फड़फड़ाने लगा.

मां अपने मायके से एक आम का पौधा लाई थीं. विवाह के अवसर पर एक पौधा मायके में रोप कर आई थीं और एकसाथ ले आई थीं. मां उसे जान से ज्यादा चाहती थीं. उस आम के वृक्ष ने भी प्रेम की खाद पा कर बढ़ना प्रारंभ किया. जब मैं पैदा हुई थी तब तक वह इतना बड़ा हो चुका था कि मेरे लिए झूला उस की डाल पर ही डाला गया था. धीरेधीरे वह पौधा वृक्ष बन चुका था. उस में रसीले, मीठे आम लगते थे.

पिताजी थोड़े कड़क स्वभाव के थे. वे कम बोलते थे. घर में निर्णायक भूमिका उन्हीं की होती थी. मैं ने एकदो बार उन्हें मां पर बरसते हुए भी देखा था. मां नीची नजरें किए सब सुनती रहती थीं. उन के जाने के बाद आंखों से निकले आंसुओं को आंचल से पोंछ कर घर के कामों में लग जाती थीं.

मुझे परिवार के बाद यदि कुछ प्रिय था तो आंगन में लगा यह हराभरा वृक्ष जिस पर कोयल होती थी, गिलहरी होती थी. और भी न जाने कौनकौन से परिचित और अपरिचित जीवजंतु होते थे.

मेरी निपुणता पेड़ पर चढ़ने की हो गई थी. मां बहुत मना करतीं. घर की इकलौती थी, इसलिए मार कम पड़ती थी. पिताजी भी मना करते थे कि पेड़ पर न चढ़ा करूं लेकिन सुनता कौन? मेरी सहेलियां आतीं तो मैं अपनी कुशलता वृक्ष पर चढ़ कर बताती और उन सब को बौना साबित कर देती थी.

एक दिन ऊंची डाल पर बैठी थी कि पांव फिसल गया और मैं चीखतीचिल्लाती धड़ाम से नीचे गिर कर बेहोश हो गई. आवाज सुन कर मां भी आ गईं. मुझे बेहोश देख कर रोने लगीं. पिताजी को खबर दी, वे भी जल्दी से आ गए. पहले उन्होंने मां को बहुत बुराभला कहा और फिर मुझे अस्पताल ले जा कर एक्सरे कराया. पांव की हड्डी टूट गई थी.

डा. रत्तीलालजी बूढ़े से व्यक्ति थे. उन्होंने मुझे बड़े प्रेम से हिम्मत रखने को कहा, फिर पांव पर प्लास्टर बांध दिया. पूरे 2 माह बाद खुलना था, तब तक के लिए घूमनाफिरना, दौड़ना, पेड़ पर चढ़ना सब बंद हो गया.

स्कूल जाने से मुक्ति मिली थी. मैं खुश भी थी और दुखी भी. घर पर मेरा बिस्तर खिड़की के पास लगा दिया गया था जहां से हराभरा आम का पेड़ फलों से लदा हुआ दिखलाई देता लेकिन दुख की बात यह थी कि मुझे ले कर हर रोज पिताजी मां को दोषी ठहरा कर उन्हें भलाबुरा कहते रहते थे. एक दिन तो उन्होंने गुस्से में कह भी दिया कि कल रविवार है. मैं इस पेड़ को कटवा ही डालूंगा.

मां चुप थीं.

‘मेरी बेटी की टांग तोड़ दी,’ पिताजी ने कहा.

मां ने एक शब्द भी नहीं कहा. मां को बारबार प्रताडि़त होते देखना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था.

अगले दिन रविवार था. पिताजी कहीं से 2 व्यक्तियों को पेड़ काटने के लिए ले आए. मां अंदर रसोई में थीं. आंगन में फल लदे पेड़ पर जैसे ही पहली कुल्हाड़ी का वार हुआ मैं चीख पड़ी. मां दौड़ कर आईं. आंगन में 2 व्यक्तियों को देख कर मुझे छोड़ कर आम के पेड़ के पास जा पहुंचीं. मां गुस्से में लाल हो रही थीं, ‘तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी इस पर वार करने की?’

दोनों व्यक्ति सहम गए. मैं खिड़की से देख रही थी.

मां ने नाराजगी और क्रोधभरे स्वर में कहा, ‘तुम्हारी हिम्मत हो तो अब चलाओ इस पर कुल्हाड़ी.’

‘हट जाओ बीच से,’ पिताजी गरजे.

मां तेजी से आम के पेड़ के तने के आगे ढाल की तरह खड़ी हो गईं, ‘बहुत सुन ली तुम्हारी. यदि इस वृक्ष को कुछ हो गया तो समझो मैं भी जिंदा नहीं रहूंगी,’ मां क्रोध में कांप रही थीं.

पिताजी को पहली बार निराशा हाथ लगी थी. बड़ा निरीह, अपमानित सा उन्होंने स्वयं को अनुभव किया था और दोनों व्यक्तियों से जाने को कह दिया.

शायद जीवन में पहली बार हार क्या होती है उन्होंने जाना था. उन के चले जाने के बाद मां बाथरूम में गईं, हाथमुंह धो कर मेरे पास आईं और मेरे माथे पर हाथ फेर कर कहने लगीं, ‘बेटी, अपनी शक्ति को पहचानना चाहिए. अच्छे कार्यों में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देनी चाहिए ताकि उस के अच्छे परिणाम आएं,’ इतना कह कर वे रसोई में चली गईं.

पिताजी और मां का अनबोला पूरे 1 माह रहा था. मां ने भी बातचीत की पहल नहीं की थी. आखिर पिताजी ने ही इस बात को स्वीकार किया कि उन से गलती हो गई थी, पेड़ से गिरने पर वृक्ष का क्या दोष? तुम ने अपना रौद्र रूप दिखा कर एक फलदार वृक्ष को कटने से बचा लिया. यह सब देखसुन कर मुझे भी अच्छा लगा.

सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो स्वयं ही अपनी गलती का निर्णायक भी हो और क्षमा मांगने में संकोच भी न करे.

जीवन तेजी से बढ़ता जा रहा था. बचपना और शरारतें पीछे छूटती जा रही थीं. कब मैं बड़ी हो गई, मुझे नहीं मालूम पड़ा. मुझे पसंद भी कर लिया गया और विवाह की तारीख भी पक्की हो गई. अपनी मां का घर छूट जाने का मुझे प्रतिक्षण दर्द अनुभव होने लगा था. कार्ड छपे, बंटे और एक रात घर के आगे बरात भी आ गई. आंगन में ही सब रस्मों को उसी आम के पेड़ तले निबटाया गया. रस्में निबटतेनिबटते सुबह हो गई थी.

विदाई की बेला में मैं बहुत दुख से भरी थी, उसी समय मां मुझे एक ओर ले गईं और आम का एक पौधा देते हुए कहा, ‘इसे आंगन में लगा दे, तेरी याद हमेशा ताजा रहेगी,’ मेहमान सब इस बात पर आश्चर्य कर रहे थे. मैं ने उसी बड़े आम के पेड़ से दूर आम का पौधा अपने हाथों से लगा दिया.

मां ने मुझे आम का एक और पौधा दे कर कहा, ‘इसे अपने ससुराल में लगाना ताकि वहां छांव, मीठे फल मिलते रहें.’

मैं ने बड़ी श्रद्धा से वह पौधा ले लिया था. उसे ससुराल में आने के बाद लगाया था और दिनरात उस की देखरेख की थी. वही पौधा आज विशाल फलदार आम का वृक्ष बन गया था. इस बीच दर्जनों बार मायके आई तो यहां मेरे हाथ का रोपा पौधा भी वृक्ष बनता जा रहा था. मैं उस के तने पर बड़े प्रेम से हाथ फेरती थी.

गाड़ी के ब्रेक लगते ही मेरी तंद्रा टूटी.  स्टेशन आ गया था. जावरा में उतरने के बाद तांगा किया और घर के लिए रवाना हुए.

घर आया तो बाहर भीड़ लगी थी. मैं ने तांगे के रुकने की प्रतीक्षा भी नहीं की और दौड़ कर घर में जा पहुंची. आम के दोनों पेड़ों के मध्य मां का शव मेरी प्रतीक्षा के लिए रखा हुआ था. मैं जोर से रो पड़ी. मां का सौम्य रूप, शांत चेहरा, मांग में सिंदूर, माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी. मैं रोए चली जा रही थी. पिताजी एक ओर खड़े थे. चचेरे भाई व भाभी ने मुझे मां से अलग किया. संध्या हो रही थी, मां का शव केवल मेरी प्रतीक्षा के लिए रखा गया था.

मां को ले जाया गया. मैं रोती रह गई. ऊपर नजर डाली तो आम का विशाल वृक्ष उदास खड़ा था और मेरे द्वारा रोपा गया वह पौधा  बढ़ कर उस को छू रहा था, मानो वंदनवार बन गया हो. चारों ओर उदासी थी. मां के बिना घर कितना सूना, अकेला हो गया था.

दिन आवारा बादल की तरह उड़ते चले गए. मृत्यु उपरांत की रस्में पूरी हो गईं और अनूप को अपनी ड्यूटी, मुझे अपने घर, नेहा की याद आने लगी थी. जीवन कब ठहरता है, युगोंयुगों से वह इसी क्रम से चलता आ रहा है. मैं ने पिताजी को अगली सुबह जाने की बात कही.

अगले दिन अनूप आटोरिकशा ले आए. मैं भैयाभाभी को पिताजी का ध्यान रखने का कह कर आगे बढ़ी तो पिताजी ने मुझे कुछ देर ठहरने को कहा. मैं रुक गई. पिताजी हाथों में आम के 2 पौधों को ले कर आए और बोले, ‘तेरी मां ने तेरे लिए रखे थे.’

‘क्यों?’

‘बेटी नेहा के लिए, उस के विवाह में वह एक ससुराल ले जाएगी और एक अपने आंगन में लगवा लेना. उस की याद हमेशा हरीभरी रहेगी. बेटी की पूंजी मायके में भी बढ़ेगी और ससुराल को भी संपन्न बनाएगी.’

मैं ने दोनों पौधे ले लिए और आटो रिकशा में बैठ गई. हवा के हलके से झोंके के साथ उन के पत्ते हिलने लगे, मानो पिताजी को हाथ हिलाहिला कर विदाई के लिए टाटा कह रहे हों.

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May 04, 2022 at 09:00AM

Mother’s Day 2022- मत जाओ मां: शुभांगी की मां क्यों घबरा गई थी?

सुबह स्कूल जाने के लिए शुभांगी तैयार हो रही थी कि टेलीफोन  की घंटी घनघना उठी. मां का फोन था. बोलीं, ‘‘अस्पताल से बोल रही हूं. तेरे बाबूजी सीढि़यों से फिसल गए हैं, कमर में चोट आ गई है.’’

शुभांगी घबरा गई. अस्पताल का पता पूछ कर फोन रख दिया और नीरज को प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगी. उन्होंने भी जाने की मौन स्वीकृति दे दी. बच्चों को बस स्टाप पर छोड़ती हुई शुभांगी सीधी मां के पास पहुंची और पूछा तो पता चला कि डाक्टर ने फ्रेक्चर बताया है, आपरेशन करना पड़ सकता है.

‘‘आपरेशन?’’ शुभांगी ने घबरा कर पूछा तो डाक्टर ने उस के चेहरे की घबराहट देख कहा, ‘‘हां, बहुत छोटा सा आपरेशन है किंतु उन का ब्लडप्रेशर अधिक है इस कारण आज यह संभव नहीं है. तब तक इन को हम वार्ड में शिफ्ट कर देते हैं.’’

वार्ड में आते ही मां ने चिंतित होते हुए कहा, ‘‘परेश को संदेश भिजवा दो.’’

‘‘छोटा सा तो आपरेशन है, मां,’’ शुभांगी बोली, ‘‘इस में भैया को तकलीफ देने की क्या जरूरत है. फिर नीरज भी तो हैं यहां. मैं अभी उन्हें बुलवा लेती हूं.’’

जब मां ने जिद की तो आगे शुभांगी कुछ नहीं बोली. बाबूजी शांत हो बिस्तर पर लेटे रहे फिर अनमने भाव चेहरे पर लाते हुए बोले, ‘‘जैसा मां कहती हैं कर लो, बेटी. एक फोन ही तो करना है…’’

बाबूजी का ब्लडप्रेशर सामान्य नहीं हो रहा था इसलिए अगले दिन भी आपरेशन टाल दिया गया. शाम को नीरज के साथ दोनों बच्चे बाबूजी से मिलने आए. दरवाजा खुलते ही उन की नजरें उधर ही जा टिकीं. फिर धीरे से तकिए पर सिर रख कर बोले, ‘‘मैं ने समझा परेश आया है… उस को फोन तो कर दिया था न…परेश आ जाता तो अच्छा था.’’

उन की आवाज में उदासी और वेदना के मिलेजुले भाव थे. शुभांगी नाराज हो कर बोली, ‘‘क्यों बाबूजी, मैं और नीरज तो हैं न यहां. क्या हमारे होने का कोई अर्थ नहीं है. इतना सब करने के बाद भी बेटे का ही इंतजार है. उसे आप से इतना ही प्यार होता तो यों बुढ़ापे में छोड़ कर न जाता.’’

मां की अनुभवी नजरों ने बेटी के चेहरे के सारे भाव पढ़ लिए थे. बात संभालते हुए बोलीं, ‘‘नहीं बेटी, तेरे बाबूजी के कहने का यह मतलब नहीं था. परेश आ जाता तो तेरी अस्पताल की भागदौड़ कम हो जाती. तू सिर पर खड़ी हो गई क्या यह कम है,’’ मां ने बात तो संभाल ली पर उन्हें उस घटना और समय की याद आ गई जिस के चलते उन्हें अपनी बेटी शुभांगी के सामने सफाई देनी पड़ी थी.

बाबूजी का छोटा सा परिवार था. उन के रिटायर होने वाले दिन सभी लोग जमा हुए थे. इतने साल कालिज में काम करने के बाद जब शाम को ढेर सारे उपहारों और गुलदस्तों के साथ बाबूजी लौटे तो मां की आंखें भर आई थीं. वह बरामदे में आरामकुरसी पर टांगें फैला कर बैठ गए.

‘मां, यह तो खुशी की बात है. बड़ी इज्जत से बाबूजी रिटायर हुए हैं वरना आज के समय में तो…’ शुभांगी बाबूजी के पास बैठती हुई बोली, ‘बस, अब तो आप आराम कीजिए बाबूजी…’

परेश बात काटता हुआ बोला, ‘अकेले जीवन काटतेकाटते बाबूजी आप थक गए होंगे. अब मेरी बारी है. मैं आप को लेने आया हूं.’

बाबूजी कुछ नहीं बोले. बस, सोच में पड़ गए थे.

‘यह तो ठीक है बाबूजी,’ शुभांगी ने समर्थन देते हुए कहा, ‘इस उम्र में बेटे के सहारे से बड़ा और क्या हो सकता है. इतने प्यार से बेटा बुला रहा है, 2 मंजिल का घर है. एकदम आजादी रहेगी.’

कुछ सोच कर बाबूजी बोले, ‘आज ही तो रिटायर हुआ हूं. बहुत सी औपचारिकताएं अभी बाकी हैं…पहले उन्हें तो पूरी कर लूं.’

‘ठीक है, बाबूजी,’ परेश बोला, ‘मैं 10 दिन बाद आप को लेने आ जाऊंगा.’

बच्चों के जाने के बाद वे सोच में पड़ गए. फिर निर्णय लिया कि प्रेम से बुला रहा है तो चले जाना चाहिए. अब उस के पास जाने की जरूरत इसलिए भी थी कि कहीं अपना स्वार्थ भी छिपा हुआ था.

मांबाबूजी का सारा सामान बेटे के घर आ गया. उन की उम्र को देखते हुए नीचे के हिस्से में उन का सारा सामान करीने से लगा दिया गया. उन का 4 वर्षीय पोता दिन भर अपने दादादादी का मन लगाए रखता. बाबूजी सुबह बीते समय की तरह ही लंबी सैर करते और सामने बैठ कर ही दूध निकलवा कर घर लौटते. शाम को भी यही क्रम रहता. अपने जीवन की अभी तक की एक ही ढर्रे पर चलने वाली नीरसता को समाप्त होते देख बाबूजी को अच्छा लगने लगा था.

परेश ने आते ही पहले दिन मां से अनुनय भरे स्वर में प्रार्थना की थी, ‘मां, एक ही रसोई में खाना बनेगा. आप को यहां कुछ भी करने की जरूरत नहीं है. खाने के अलावा जिस भी सामान की जरूरत होगी नीचे पहुंच जाएगा.’

किंतु बहू के व्यवहार में धीरेधीरे आता बदलाव मां की अनुभवी नजरों से छिप न सका. परेश के आफिस जाने के बाद उस के व्यवहार में काफी परिवर्तन आ जाता. वह कई बातें अनसुनी भी कर देती.

बाबूजी ने एक दिन नाश्ता करते समय बहू को बताया कि दोपहर को खाने

पर उन के कुछ पुराने साथी मिलने आ रहे हैं इसलिए जरा अच्छा सा इंतजाम

कर लेना.

प्रीति की आंखें फैल गईं. उस से रहा नहीं गया. बोली, ‘बाबूजी, आएदिन कोई न कोई तो आता ही रहता है. मेरी अपनी जिंदगी तो रह ही नहीं गई. मैं एकदम नौकरानी बन कर रह गई हूं.’

बाबूजी भौचक्के हो कर बहू के इस व्यवहार को देखने लगे. मां ने संयतता बरतते हुए कहा, ‘बहू, यह जीवन अभी तक तुम्हारे सहारे तो चला नहीं है, फिर हम लोग जहां रहेंगे वहां हमारे मिलने वाले भी आएंगे ही. भला इतना सब कहने की क्या जरूरत है. तुम छोड़ दो, हम अपना काम कर लेंगे,’ उन के अंतिम स्वर में कठोरता उभर आई.

‘यह बात नहीं है, मां,’ परेश बात संभालते हुए धीरे से बोला, ‘दरअसल, काम की अधिकता के कारण यह घबरा सी गई है…सब ठीक हो जाएगा.’

‘मैं घबरा नहीं गई,’ प्रीति पलट कर बोली, ‘दिन में कईकई बार चाय, समयअसमय नाश्ते की फरमाइश. मेरा तो सहेलियों से मिलना ही छूट गया है, आप तो यहां होते नहीं…’

‘अच्छा, तुम दोनों चुप हो जाओ,’ बाबूजी कड़े शब्दों में बोले, ‘मैं सब बाजार से ले आऊंगा,’ और नाश्ता बीच में ही छोड़ कर वह नीचे आ गए. उन को अपना वजूद बिखरता सा नजरआने लगा.

एक दिन खाने की मेज पर प्रीति और परेश की खाली प्लेटें देखीं तो बाबूजी ने पूछ लिया, ‘क्या बात है, तुम दोनों कहीं बाहर खा कर आए हो?’

‘नहीं, बाबूजी,’ परेश थोड़ा हिचक कर बोला, ‘हम ने पिज्जा का आर्डर दिया है. बस, आता ही होगा.’

तभी दरवाजे की घंटी बजी. मां उठने लगीं तो परेश बोला, ‘मां, आप बैठो. मैं ले कर आता हूं.’

‘अरे नहीं, तू क्यों उठेगा. बैठा रह,’ कह कर मां दरवाजे तक गईं.

‘मां इसे हाथ न लगाना,’ परेश की आवाज में कंपन था.

‘क्यों? गरम है क्या?’

‘नहीं, मां, यह नानवेज है,’ परेश बोला, ‘मैं तो मीटमछली खाता नहीं हूं, कभीकभी प्रीति खा लेती है.’

‘नानवेज,’ मां सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गईं और कहने लगीं, ‘जिस घर

में प्याजलहसुन तक नहीं खाया जाता वहां अब नानवेज आ रहा है.’

‘मांजी, मैं ने घर में तो नहीं बनाया,’ प्रीति ने धीरे से कहा.

‘वह भी कर के देख लो, बहू,’ मां रो पड़ीं और नीचे अपने कमरे में चली गईं.

मां ने बाबूजी के कहने पर इन झंझटों और बढ़ते मनमुटाव से छुटकारा पाने के लिए अपनी रसोई अलग कर ली. परेश ने भी कोई विरोध नहीं किया. सुबह साथसाथ बैठने का जो क्रम बना था वह भी टूट गया.

शुभांगी माह में 1-2 बार आती. प्रीति का रूखा व्यवहार अब शुष्क हो कर सामने आने लगा था. यहां आने की सारी खुशी सूखी रेत की तरह मुट्ठी से सरक रही थी. जल्दी ही बाबूजी को एहसास हो गया कि इस देहरी पर अब और सुख नहीं तलाशा जा सकता.

संबंधों में गहराती दरार और प्रीति की शिकायतों से परेश गंभीर बना रहा. अचानक घर में आए इस अनपेक्षित व्यवहार से उसे घुटन सी होने लगी. बातोंबातों में प्रीति की सारी बातें अनसुनी करते हुए एक दिन परेश बोला, ‘मां, बाबूजी को कुछ भी कहने की मेरी हिम्मत नहीं है. तुम्हारी सिर्फ सुनता रहता हूं, इस से तो बेहतर है मैं कहीं और तबादला करा लूं.’

पिछले सप्ताह बाबूजी ने 2 बार परेश को कालिज ले जाने को कहा तो वह टाल गया. बाबूजी को यह अच्छा नहीं लगा. स्वयं ही एक दिन आटो ले कर कालिज चले गए. शाम को उन के आने से पहले परेश घर पर था.

‘इतनी जल्दी भी क्या थी, बाबूजी?’

‘जल्दी है. कब से कह रहा हूं… 2 बार कालिज से बुलावा आ गया है. लाइव सर्टीफिकेट देना है.’

‘बाबूजी, आप तो रिटायर हो चुके हैं और मुझे छुट्टी लेनी पड़ेगी.’

बाबूजी बेटे का चेहरा देखते रहे. कईकई छुट्टियां ले कर उस के प्रवेश के लिए चक्कर लगाए थे. पहली बार जब पढ़ाई के लिए होस्टल भेजा था तो कितने ही दिन धर्मशाला की टूटी चारपाई पर बिताए.

‘तुम्हारे पास मेरे लिए समय ही कहां है,’ बाबूजी बिफर पडे़, ‘बहू आएदिन किटी पार्टियों पर चली जाती है और मेरा सारा दिन मुन्ना और घर की रखवाली में बीत जाता है. क्या इस उम्र में यही काम रह गया है मेरा? क्या इसीलिए हमें यहां लाए थे?’

इस से पहले कि बाबूजी कोई फैसला लेते परेश ने बताया कि उस का तबादला जयपुर हो गया है. उस ने शायद अपने बाबूजी का मन पढ़ लिया था. जयपुर जाने से पहले परेश ने बेहद आत्मीयता से प्रार्थना की कि वे यहां से न जाएं.

परेश के जाने के बाद बाबूजी मां के साथ अकेले रह गए थे.

शुभांगी को भैयाभाभी का यह व्यवहार न्यायसंगत नहीं लगा था. वह कर भी क्या सकती थी. जब किसी के अंदर अपने बड़ों के प्रति भावना न हो तो उसे उस में ठूंसा तो नहीं जा सकता.

बचपन की खट्टीमीठी यादों की छाया में पली शुभांगी का मन बरबस मांबाबूजी में रमा रहा. ‘क्यों परेश इस उम्र में उन्हें इस तरह अकेला छोड़ कर चला गया. इतनी मिन्नतों के साथ यहां लाया था. भला बाबूजी को क्या कमी थी वहां. कितना दुख हुआ होगा उन्हें बरसों पुराने पासपड़ोसियों का, संगीसाथियों का साथ छोड़ते हुए…शायद उस से भी ज्यादा अब…’ शुभांगी सोचती रहती. शायद इसी तनाव में मां को मधुमेह ने आ घेरा.

एक दिन शुभांगी छुट्टी ले कर स्कूल से आ गई तो मां ने उलाहना भरे स्वर में कहा, ‘ऐसे भी भला कोई काम छोड़ कर आ जाता है. तेरा भी स्कूल है, बच्चे हैं और नीरज क्या कहेंगे. अब आगे से इस तरह कोई बात तुझे नहीं बताऊंगी.’

‘मां, नीरज ने ही यहां आने पर जोर दिया है,’ फिर बाबूजी की तरफ मुंह कर शुभांगी बोली, ‘बाबूजी, नीरज और मैं यही चाहते हैं कि अब आप हमारे साथ चल कर रहें. मैं आप को यहां अकेले नहीं रहने दूंगी…आप को लेने आई हूं, बाबूजी.’

बाबूजी ने समझाया कि यह इतनी बड़ी बीमारी नहीं है जितना तू समझती है. उन का सांत्वना भरा हाथ शुभांगी की पीठ पर फिरा तो उस का कंठ अवरुद्ध हो गया.

‘नहीं, बाबूजी, मां को डायबिटीज है. आप पहले से ही ब्लडप्रेशर के रोगी हैं.’

बाबूजी देर तक समझाते रहे कि बेटी के घर जाना ठीक नहीं. भरे कंठ से शुभांगी घर वापस आ गई किंतु मांबाबूजी की चिंता उसे सदैव सताती रहती.

मां के मना करने पर भी शुभांगी ने भैया को बाबूजी की हालत के बारे में बताया था परंतु उस ने अपनी व्यस्तताओं का ब्योरा देते हुए मां का खयाल रखने को कहा था. भाई के मांबाबूजी के प्रति ऐसे निष्ठुर व्यवहार की शुभांगी को आशा नहीं थी. इसीलिए आज मां ने जब अस्पताल में परेश को फोन करने के लिए कहा तो वह नाराज हो गई थी.

सुबह आपरेशन के लिए जातेजाते भी बाबूजी की निगाहें दरवाजे पर परेश को देखने के लिए लगी रहीं. बाबूजी आपरेशन के लिए क्या गए फिर लौट कर न आ सके. मां का सिंदूर देखते ही देखते पुंछ गया. किसी को क्या पता था कि इस छोटे से आपरेशन में बाबूजी सदा  के लिए रूठ कर चले जाएंगे. मां का करुण क्रंदन संभलने में नहीं आ रहा था. किसी तरह नीरज ने धैर्य रख कर अस्पताल की सारी औपचारिकताएं पूरी कीं और बाबूजी का मृत शरीर घर आ गया.

देर रात तक परेश भी प्रीति और मुन्ना के साथ जयपुर से आ गया. फटी आंखों से बाबूजी के शांत शरीर को देखता रहा. फूटफूट कर रो पड़ा वह. असमय ही अस्त हुए सूरज ने उसे भीतर तक अंधकार में ढकेल दिया था.

‘‘तू ने बहुत देर कर दी, बेटा…कितना इंतजार करते रहे बाबूजी तेरा… 5 घंटे की दूरी पर 5 दिन लगा दिए,’’ मां भावुक हो कर बोलीं.

‘‘मां, पहले पता होता तो उसी दिन आ जाता,’’ परेश बोला.

‘‘मैं ने तो भाभी को बता दिया था,’’ शुभांगी ने हैरानगी से कहा, ‘‘क्या भाभी ने तुम्हें नहीं बताया?’’

सभी एकटक प्रीति की तरफ देखने लगे. वह धीरे से बोली, ‘‘शुभांगी ने बताया था कि बाबूजी सीढि़यों से गिर पडे़ हैं. मैं ने सोचा थोड़ीबहुत चोट आई होगी, ठीक हो जाएंगे.’’

पिछली बातों को ले कर मां के मन में गहरा अवसाद तो था ही किंतु अपनी सारी वेदनाओं को भूल कर कठोर हो कर बोलीं, ‘‘लानत है तुम दोनों पर. इसी दिन के लिए पालपोस कर बड़ा किया था तुम को. रोटी का एकएक टुकड़ा काट कर ऊंची से ऊंची शिक्षा दिलवाई थी. न आने के बहाने थे और आने के लिए निमंत्रण देना पड़ा. शरम आनी चाहिए. ऐसा बेटा भी किस काम का जो बाबूजी को ऐसे हाल में छोड़ कर चला गया. पता नहीं तुम्हारे बाबूजी तुम्हारा क्यों इंतजार करते रहे?’’ मां फफक कर रो पड़ीं. उन की तड़प से आहत हो कर परेश का मन अपराधबोध से पीडि़त हो उठा.

सभी क्रियाकर्म पूरा होने के बाद एक दिन मां रोंआसी हो कर बोलीं, ‘‘मैं अब यहां नहीं रहना चाहती, मुझे कहीं और छोड़ आ.’’

‘‘क्यों, मां,’’ परेश रो पड़ा, ‘‘क्या मैं इस योग्य भी नहीं रहा अब? बाबूजी तो रहे नहीं. किस से माफी मांगू. कम से कम आप यों छोड़ कर तो मत जाओ.’’

मां ने बाबूजी की फूल चढ़ी फोटो की ओर बड़ी कातर आंखों से देखा, जैसे पूछ रही हों यह किस धर्मसंकट में डाल कर चले गए आप. अंतिम समय मिल तो लिया होता…क्या करूं, कहां जाऊं…आप के बिना तो कहीं नहीं गई. फिर शुभांगी के घर जाने का मन बना कर बाबूजी का फोटो दीवार से उतार ही रही थीं कि प्रीति पांव में गिर पड़ी.

‘‘मां, मत जाओ…एक बार, सिर्फ एक बार और मेरे कहने से रुक जाओ. हम वापस यहीं आ जाएंगे आप के पास.’’

उस का विलाप मां और शुभांगी दोनों को रुला गया. साड़ी के पल्लू से शुभांगी ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘मां, भाभी की बात मान लो…अब यहीं रह जाओ.’’

परेश पास ही विनीत भाव से हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया.

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सुबह स्कूल जाने के लिए शुभांगी तैयार हो रही थी कि टेलीफोन  की घंटी घनघना उठी. मां का फोन था. बोलीं, ‘‘अस्पताल से बोल रही हूं. तेरे बाबूजी सीढि़यों से फिसल गए हैं, कमर में चोट आ गई है.’’

शुभांगी घबरा गई. अस्पताल का पता पूछ कर फोन रख दिया और नीरज को प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगी. उन्होंने भी जाने की मौन स्वीकृति दे दी. बच्चों को बस स्टाप पर छोड़ती हुई शुभांगी सीधी मां के पास पहुंची और पूछा तो पता चला कि डाक्टर ने फ्रेक्चर बताया है, आपरेशन करना पड़ सकता है.

‘‘आपरेशन?’’ शुभांगी ने घबरा कर पूछा तो डाक्टर ने उस के चेहरे की घबराहट देख कहा, ‘‘हां, बहुत छोटा सा आपरेशन है किंतु उन का ब्लडप्रेशर अधिक है इस कारण आज यह संभव नहीं है. तब तक इन को हम वार्ड में शिफ्ट कर देते हैं.’’

वार्ड में आते ही मां ने चिंतित होते हुए कहा, ‘‘परेश को संदेश भिजवा दो.’’

‘‘छोटा सा तो आपरेशन है, मां,’’ शुभांगी बोली, ‘‘इस में भैया को तकलीफ देने की क्या जरूरत है. फिर नीरज भी तो हैं यहां. मैं अभी उन्हें बुलवा लेती हूं.’’

जब मां ने जिद की तो आगे शुभांगी कुछ नहीं बोली. बाबूजी शांत हो बिस्तर पर लेटे रहे फिर अनमने भाव चेहरे पर लाते हुए बोले, ‘‘जैसा मां कहती हैं कर लो, बेटी. एक फोन ही तो करना है…’’

बाबूजी का ब्लडप्रेशर सामान्य नहीं हो रहा था इसलिए अगले दिन भी आपरेशन टाल दिया गया. शाम को नीरज के साथ दोनों बच्चे बाबूजी से मिलने आए. दरवाजा खुलते ही उन की नजरें उधर ही जा टिकीं. फिर धीरे से तकिए पर सिर रख कर बोले, ‘‘मैं ने समझा परेश आया है… उस को फोन तो कर दिया था न…परेश आ जाता तो अच्छा था.’’

उन की आवाज में उदासी और वेदना के मिलेजुले भाव थे. शुभांगी नाराज हो कर बोली, ‘‘क्यों बाबूजी, मैं और नीरज तो हैं न यहां. क्या हमारे होने का कोई अर्थ नहीं है. इतना सब करने के बाद भी बेटे का ही इंतजार है. उसे आप से इतना ही प्यार होता तो यों बुढ़ापे में छोड़ कर न जाता.’’

मां की अनुभवी नजरों ने बेटी के चेहरे के सारे भाव पढ़ लिए थे. बात संभालते हुए बोलीं, ‘‘नहीं बेटी, तेरे बाबूजी के कहने का यह मतलब नहीं था. परेश आ जाता तो तेरी अस्पताल की भागदौड़ कम हो जाती. तू सिर पर खड़ी हो गई क्या यह कम है,’’ मां ने बात तो संभाल ली पर उन्हें उस घटना और समय की याद आ गई जिस के चलते उन्हें अपनी बेटी शुभांगी के सामने सफाई देनी पड़ी थी.

बाबूजी का छोटा सा परिवार था. उन के रिटायर होने वाले दिन सभी लोग जमा हुए थे. इतने साल कालिज में काम करने के बाद जब शाम को ढेर सारे उपहारों और गुलदस्तों के साथ बाबूजी लौटे तो मां की आंखें भर आई थीं. वह बरामदे में आरामकुरसी पर टांगें फैला कर बैठ गए.

‘मां, यह तो खुशी की बात है. बड़ी इज्जत से बाबूजी रिटायर हुए हैं वरना आज के समय में तो…’ शुभांगी बाबूजी के पास बैठती हुई बोली, ‘बस, अब तो आप आराम कीजिए बाबूजी…’

परेश बात काटता हुआ बोला, ‘अकेले जीवन काटतेकाटते बाबूजी आप थक गए होंगे. अब मेरी बारी है. मैं आप को लेने आया हूं.’

बाबूजी कुछ नहीं बोले. बस, सोच में पड़ गए थे.

‘यह तो ठीक है बाबूजी,’ शुभांगी ने समर्थन देते हुए कहा, ‘इस उम्र में बेटे के सहारे से बड़ा और क्या हो सकता है. इतने प्यार से बेटा बुला रहा है, 2 मंजिल का घर है. एकदम आजादी रहेगी.’

कुछ सोच कर बाबूजी बोले, ‘आज ही तो रिटायर हुआ हूं. बहुत सी औपचारिकताएं अभी बाकी हैं…पहले उन्हें तो पूरी कर लूं.’

‘ठीक है, बाबूजी,’ परेश बोला, ‘मैं 10 दिन बाद आप को लेने आ जाऊंगा.’

बच्चों के जाने के बाद वे सोच में पड़ गए. फिर निर्णय लिया कि प्रेम से बुला रहा है तो चले जाना चाहिए. अब उस के पास जाने की जरूरत इसलिए भी थी कि कहीं अपना स्वार्थ भी छिपा हुआ था.

मांबाबूजी का सारा सामान बेटे के घर आ गया. उन की उम्र को देखते हुए नीचे के हिस्से में उन का सारा सामान करीने से लगा दिया गया. उन का 4 वर्षीय पोता दिन भर अपने दादादादी का मन लगाए रखता. बाबूजी सुबह बीते समय की तरह ही लंबी सैर करते और सामने बैठ कर ही दूध निकलवा कर घर लौटते. शाम को भी यही क्रम रहता. अपने जीवन की अभी तक की एक ही ढर्रे पर चलने वाली नीरसता को समाप्त होते देख बाबूजी को अच्छा लगने लगा था.

परेश ने आते ही पहले दिन मां से अनुनय भरे स्वर में प्रार्थना की थी, ‘मां, एक ही रसोई में खाना बनेगा. आप को यहां कुछ भी करने की जरूरत नहीं है. खाने के अलावा जिस भी सामान की जरूरत होगी नीचे पहुंच जाएगा.’

किंतु बहू के व्यवहार में धीरेधीरे आता बदलाव मां की अनुभवी नजरों से छिप न सका. परेश के आफिस जाने के बाद उस के व्यवहार में काफी परिवर्तन आ जाता. वह कई बातें अनसुनी भी कर देती.

बाबूजी ने एक दिन नाश्ता करते समय बहू को बताया कि दोपहर को खाने

पर उन के कुछ पुराने साथी मिलने आ रहे हैं इसलिए जरा अच्छा सा इंतजाम

कर लेना.

प्रीति की आंखें फैल गईं. उस से रहा नहीं गया. बोली, ‘बाबूजी, आएदिन कोई न कोई तो आता ही रहता है. मेरी अपनी जिंदगी तो रह ही नहीं गई. मैं एकदम नौकरानी बन कर रह गई हूं.’

बाबूजी भौचक्के हो कर बहू के इस व्यवहार को देखने लगे. मां ने संयतता बरतते हुए कहा, ‘बहू, यह जीवन अभी तक तुम्हारे सहारे तो चला नहीं है, फिर हम लोग जहां रहेंगे वहां हमारे मिलने वाले भी आएंगे ही. भला इतना सब कहने की क्या जरूरत है. तुम छोड़ दो, हम अपना काम कर लेंगे,’ उन के अंतिम स्वर में कठोरता उभर आई.

‘यह बात नहीं है, मां,’ परेश बात संभालते हुए धीरे से बोला, ‘दरअसल, काम की अधिकता के कारण यह घबरा सी गई है…सब ठीक हो जाएगा.’

‘मैं घबरा नहीं गई,’ प्रीति पलट कर बोली, ‘दिन में कईकई बार चाय, समयअसमय नाश्ते की फरमाइश. मेरा तो सहेलियों से मिलना ही छूट गया है, आप तो यहां होते नहीं…’

‘अच्छा, तुम दोनों चुप हो जाओ,’ बाबूजी कड़े शब्दों में बोले, ‘मैं सब बाजार से ले आऊंगा,’ और नाश्ता बीच में ही छोड़ कर वह नीचे आ गए. उन को अपना वजूद बिखरता सा नजरआने लगा.

एक दिन खाने की मेज पर प्रीति और परेश की खाली प्लेटें देखीं तो बाबूजी ने पूछ लिया, ‘क्या बात है, तुम दोनों कहीं बाहर खा कर आए हो?’

‘नहीं, बाबूजी,’ परेश थोड़ा हिचक कर बोला, ‘हम ने पिज्जा का आर्डर दिया है. बस, आता ही होगा.’

तभी दरवाजे की घंटी बजी. मां उठने लगीं तो परेश बोला, ‘मां, आप बैठो. मैं ले कर आता हूं.’

‘अरे नहीं, तू क्यों उठेगा. बैठा रह,’ कह कर मां दरवाजे तक गईं.

‘मां इसे हाथ न लगाना,’ परेश की आवाज में कंपन था.

‘क्यों? गरम है क्या?’

‘नहीं, मां, यह नानवेज है,’ परेश बोला, ‘मैं तो मीटमछली खाता नहीं हूं, कभीकभी प्रीति खा लेती है.’

‘नानवेज,’ मां सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गईं और कहने लगीं, ‘जिस घर

में प्याजलहसुन तक नहीं खाया जाता वहां अब नानवेज आ रहा है.’

‘मांजी, मैं ने घर में तो नहीं बनाया,’ प्रीति ने धीरे से कहा.

‘वह भी कर के देख लो, बहू,’ मां रो पड़ीं और नीचे अपने कमरे में चली गईं.

मां ने बाबूजी के कहने पर इन झंझटों और बढ़ते मनमुटाव से छुटकारा पाने के लिए अपनी रसोई अलग कर ली. परेश ने भी कोई विरोध नहीं किया. सुबह साथसाथ बैठने का जो क्रम बना था वह भी टूट गया.

शुभांगी माह में 1-2 बार आती. प्रीति का रूखा व्यवहार अब शुष्क हो कर सामने आने लगा था. यहां आने की सारी खुशी सूखी रेत की तरह मुट्ठी से सरक रही थी. जल्दी ही बाबूजी को एहसास हो गया कि इस देहरी पर अब और सुख नहीं तलाशा जा सकता.

संबंधों में गहराती दरार और प्रीति की शिकायतों से परेश गंभीर बना रहा. अचानक घर में आए इस अनपेक्षित व्यवहार से उसे घुटन सी होने लगी. बातोंबातों में प्रीति की सारी बातें अनसुनी करते हुए एक दिन परेश बोला, ‘मां, बाबूजी को कुछ भी कहने की मेरी हिम्मत नहीं है. तुम्हारी सिर्फ सुनता रहता हूं, इस से तो बेहतर है मैं कहीं और तबादला करा लूं.’

पिछले सप्ताह बाबूजी ने 2 बार परेश को कालिज ले जाने को कहा तो वह टाल गया. बाबूजी को यह अच्छा नहीं लगा. स्वयं ही एक दिन आटो ले कर कालिज चले गए. शाम को उन के आने से पहले परेश घर पर था.

‘इतनी जल्दी भी क्या थी, बाबूजी?’

‘जल्दी है. कब से कह रहा हूं… 2 बार कालिज से बुलावा आ गया है. लाइव सर्टीफिकेट देना है.’

‘बाबूजी, आप तो रिटायर हो चुके हैं और मुझे छुट्टी लेनी पड़ेगी.’

बाबूजी बेटे का चेहरा देखते रहे. कईकई छुट्टियां ले कर उस के प्रवेश के लिए चक्कर लगाए थे. पहली बार जब पढ़ाई के लिए होस्टल भेजा था तो कितने ही दिन धर्मशाला की टूटी चारपाई पर बिताए.

‘तुम्हारे पास मेरे लिए समय ही कहां है,’ बाबूजी बिफर पडे़, ‘बहू आएदिन किटी पार्टियों पर चली जाती है और मेरा सारा दिन मुन्ना और घर की रखवाली में बीत जाता है. क्या इस उम्र में यही काम रह गया है मेरा? क्या इसीलिए हमें यहां लाए थे?’

इस से पहले कि बाबूजी कोई फैसला लेते परेश ने बताया कि उस का तबादला जयपुर हो गया है. उस ने शायद अपने बाबूजी का मन पढ़ लिया था. जयपुर जाने से पहले परेश ने बेहद आत्मीयता से प्रार्थना की कि वे यहां से न जाएं.

परेश के जाने के बाद बाबूजी मां के साथ अकेले रह गए थे.

शुभांगी को भैयाभाभी का यह व्यवहार न्यायसंगत नहीं लगा था. वह कर भी क्या सकती थी. जब किसी के अंदर अपने बड़ों के प्रति भावना न हो तो उसे उस में ठूंसा तो नहीं जा सकता.

बचपन की खट्टीमीठी यादों की छाया में पली शुभांगी का मन बरबस मांबाबूजी में रमा रहा. ‘क्यों परेश इस उम्र में उन्हें इस तरह अकेला छोड़ कर चला गया. इतनी मिन्नतों के साथ यहां लाया था. भला बाबूजी को क्या कमी थी वहां. कितना दुख हुआ होगा उन्हें बरसों पुराने पासपड़ोसियों का, संगीसाथियों का साथ छोड़ते हुए…शायद उस से भी ज्यादा अब…’ शुभांगी सोचती रहती. शायद इसी तनाव में मां को मधुमेह ने आ घेरा.

एक दिन शुभांगी छुट्टी ले कर स्कूल से आ गई तो मां ने उलाहना भरे स्वर में कहा, ‘ऐसे भी भला कोई काम छोड़ कर आ जाता है. तेरा भी स्कूल है, बच्चे हैं और नीरज क्या कहेंगे. अब आगे से इस तरह कोई बात तुझे नहीं बताऊंगी.’

‘मां, नीरज ने ही यहां आने पर जोर दिया है,’ फिर बाबूजी की तरफ मुंह कर शुभांगी बोली, ‘बाबूजी, नीरज और मैं यही चाहते हैं कि अब आप हमारे साथ चल कर रहें. मैं आप को यहां अकेले नहीं रहने दूंगी…आप को लेने आई हूं, बाबूजी.’

बाबूजी ने समझाया कि यह इतनी बड़ी बीमारी नहीं है जितना तू समझती है. उन का सांत्वना भरा हाथ शुभांगी की पीठ पर फिरा तो उस का कंठ अवरुद्ध हो गया.

‘नहीं, बाबूजी, मां को डायबिटीज है. आप पहले से ही ब्लडप्रेशर के रोगी हैं.’

बाबूजी देर तक समझाते रहे कि बेटी के घर जाना ठीक नहीं. भरे कंठ से शुभांगी घर वापस आ गई किंतु मांबाबूजी की चिंता उसे सदैव सताती रहती.

मां के मना करने पर भी शुभांगी ने भैया को बाबूजी की हालत के बारे में बताया था परंतु उस ने अपनी व्यस्तताओं का ब्योरा देते हुए मां का खयाल रखने को कहा था. भाई के मांबाबूजी के प्रति ऐसे निष्ठुर व्यवहार की शुभांगी को आशा नहीं थी. इसीलिए आज मां ने जब अस्पताल में परेश को फोन करने के लिए कहा तो वह नाराज हो गई थी.

सुबह आपरेशन के लिए जातेजाते भी बाबूजी की निगाहें दरवाजे पर परेश को देखने के लिए लगी रहीं. बाबूजी आपरेशन के लिए क्या गए फिर लौट कर न आ सके. मां का सिंदूर देखते ही देखते पुंछ गया. किसी को क्या पता था कि इस छोटे से आपरेशन में बाबूजी सदा  के लिए रूठ कर चले जाएंगे. मां का करुण क्रंदन संभलने में नहीं आ रहा था. किसी तरह नीरज ने धैर्य रख कर अस्पताल की सारी औपचारिकताएं पूरी कीं और बाबूजी का मृत शरीर घर आ गया.

देर रात तक परेश भी प्रीति और मुन्ना के साथ जयपुर से आ गया. फटी आंखों से बाबूजी के शांत शरीर को देखता रहा. फूटफूट कर रो पड़ा वह. असमय ही अस्त हुए सूरज ने उसे भीतर तक अंधकार में ढकेल दिया था.

‘‘तू ने बहुत देर कर दी, बेटा…कितना इंतजार करते रहे बाबूजी तेरा… 5 घंटे की दूरी पर 5 दिन लगा दिए,’’ मां भावुक हो कर बोलीं.

‘‘मां, पहले पता होता तो उसी दिन आ जाता,’’ परेश बोला.

‘‘मैं ने तो भाभी को बता दिया था,’’ शुभांगी ने हैरानगी से कहा, ‘‘क्या भाभी ने तुम्हें नहीं बताया?’’

सभी एकटक प्रीति की तरफ देखने लगे. वह धीरे से बोली, ‘‘शुभांगी ने बताया था कि बाबूजी सीढि़यों से गिर पडे़ हैं. मैं ने सोचा थोड़ीबहुत चोट आई होगी, ठीक हो जाएंगे.’’

पिछली बातों को ले कर मां के मन में गहरा अवसाद तो था ही किंतु अपनी सारी वेदनाओं को भूल कर कठोर हो कर बोलीं, ‘‘लानत है तुम दोनों पर. इसी दिन के लिए पालपोस कर बड़ा किया था तुम को. रोटी का एकएक टुकड़ा काट कर ऊंची से ऊंची शिक्षा दिलवाई थी. न आने के बहाने थे और आने के लिए निमंत्रण देना पड़ा. शरम आनी चाहिए. ऐसा बेटा भी किस काम का जो बाबूजी को ऐसे हाल में छोड़ कर चला गया. पता नहीं तुम्हारे बाबूजी तुम्हारा क्यों इंतजार करते रहे?’’ मां फफक कर रो पड़ीं. उन की तड़प से आहत हो कर परेश का मन अपराधबोध से पीडि़त हो उठा.

सभी क्रियाकर्म पूरा होने के बाद एक दिन मां रोंआसी हो कर बोलीं, ‘‘मैं अब यहां नहीं रहना चाहती, मुझे कहीं और छोड़ आ.’’

‘‘क्यों, मां,’’ परेश रो पड़ा, ‘‘क्या मैं इस योग्य भी नहीं रहा अब? बाबूजी तो रहे नहीं. किस से माफी मांगू. कम से कम आप यों छोड़ कर तो मत जाओ.’’

मां ने बाबूजी की फूल चढ़ी फोटो की ओर बड़ी कातर आंखों से देखा, जैसे पूछ रही हों यह किस धर्मसंकट में डाल कर चले गए आप. अंतिम समय मिल तो लिया होता…क्या करूं, कहां जाऊं…आप के बिना तो कहीं नहीं गई. फिर शुभांगी के घर जाने का मन बना कर बाबूजी का फोटो दीवार से उतार ही रही थीं कि प्रीति पांव में गिर पड़ी.

‘‘मां, मत जाओ…एक बार, सिर्फ एक बार और मेरे कहने से रुक जाओ. हम वापस यहीं आ जाएंगे आप के पास.’’

उस का विलाप मां और शुभांगी दोनों को रुला गया. साड़ी के पल्लू से शुभांगी ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘मां, भाभी की बात मान लो…अब यहीं रह जाओ.’’

परेश पास ही विनीत भाव से हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया.

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May 04, 2022 at 09:00AM

Sunday, 1 May 2022

Mother’s Day 2022: अब हम समझदार हो गए हैं- भाग 1

निर्मल नदी सी सुलेखा चाची, जिन्हें न कोई तमन्ना थी न ही कोई आस, ने मिलीजुली मिट्टी के गीलेअधगीले लौंदे को आकार दे कर मूर्तरूप देने की कोशिश की. विजय के रूप में चाची को भी जीने का सहारा मिल गया था. लेकिन सहसा ऐसा क्या हो गया कि चाची को विजय से कड़वे शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा?

‘‘तुम्हारी भाषा में प्यार किसे कहते हैं? तुम इतने नासमझ तो नहीं हो जो तुम्हें समझ में ही न आए कि सामने वाला तुम से प्यार कर रहा है या नहीं. घर में पलता पालतू जानवर तक प्यारभरा हाथ पहचान जाता है और तुम्हें इंसान हो कर भी इस बात का पता नहीं चला. वाह, धन्य हो तुम और तुम्हारा फलसफा.’’

सुलेखा चाची का स्वर इतना तीखा और कानों को भेद जाने वाला होगा, मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. ‘‘तुम्हारा कोई दोष नहीं है, बेटा. मेरा ही दोष है जो तुम्हें अपना बच्चा समझ कर तुम पर अपनी ममता लुटाती रही. सोचती रही बिना मां के पले हो, लाख कमियां हो सकती हैं तुम में क्योंकि कुछ बातें बचपन से ही सिखाई जाती हैं जन्मघुट्टी में घोल कर. जन्मघुट्टी में तुम्हें मां का सम्मान करना पिलाया ही नहीं गया तो कैसे तुम आज मेरा सम्मान कर पाते.’’

‘‘बड़ी मां,’’ विजय कुछ कह पाता, अपनी सफाई में कुछ बोल पाता इस से पहले ही सुलेखा चाची ने उसे हाथ के इशारे से रोक दिया. स्तब्ध रह गया था मैं भी. सुलेखा चाची जिन के शांत स्वभाव का सिक्का हमारा सारा खानदान मानता है वही इस तरह कैसे और क्यों बोलने लगीं? अच्छा भला तो सब चल रहा है. सुलेखा चाची ने अपनी एक सहेली की अनाथ बच्ची सीमा से विजय का रिश्ता भी पक्का कर रखा है.

विजय के पिता मेरे चाचा थे और सुलेखा मेरी चाची. सुलेखा चाची विजय की जन्मदातृ नहीं हैं लेकिन विजय की बड़ी मां हैं, विजय के पिता की पहली पत्नी. चाचा शादी के बाद विदेश चले गए थे और लगभग 20 साल बाद हमेशा के लिए देश वापस लौटे थे. शांत सुलेखा चाची सामाजिक दायरे का सम्मान करतेकरते बंधी रहीं हमारे घर की दहलीज से.

चाचा 2-3 साल बाद आते. घर पर कुछ डौलरों की वर्षा करते, कुछ तरसी आंखों में जराजरा सी आस जगाते, एहसास जगा जाते कि वे जिंदा हैं अभी. हमारी दादी चाचा का इंतजार करतीकरती थक गईं. लगभग 20 साल, सालोंसाल चाचा का आनाजाना लगा रहा. चाची की गोद कभी नहीं भरी. घर में अकसर बात चलती, चाची के कोई औलाद ही होती तो चाचा को घर की तरफ खींचती.

मैं आज भी सोचता हूं कैसे चाचा को उस की औलाद अपनी ओर खींचती. जिस चाचा को उन की मां, उन की पत्नी न खींच पाईं उन्हें उन की औलाद कैसे खींच पाती. मैं सब से बड़ा था न घर में. बड़ों में मैं बच्चा था और बच्चों में मैं बड़ा. सब से कुछकुछ सुनता रहता था. मैं बीच का था न, सो सब की तरह सोच पाता था. चाचा जब आ कर जाते तब दादी और मां की नजरें बड़ी तमन्ना से देखतीं.

‘‘क्या पता इस बार तेरी गोद भर जाए. बस, वक्त का इंतजार कर.’’

चाची मुसकरा भर देती थीं. जैसे उन्हें ऐसी न कोई तमन्ना है और न आस ही. एक शांत सी, भीनीभीनी सी मुसकान. एक दर्प सा लगता मुझे उन के चेहरे पर, जैसे सब पर हंस रही हों. कह रही हों, क्या उम्रभर तुम्हारा ही चाहा होगा?

चाची पढ़ीलिखी हैं, स्थानीय कालेज में हिंदी की प्राध्यापिका हैं. बड़ी सुलझी और परिपक्व सी. चाची से मैं 10 साल छोटा हूं. फिर भी कभीकभी लगता था उन का हमउम्र हूं. उन के स्तर तक जा कर मैं तब भी सोच सकता था और आज भी सोच सकता हूं. तब भी मुझे समझ में आता था उन की जीत हो चुकी है. उन का चाहा ही होगा. शायद वे मां बनना चाहती ही नहीं थीं.

‘‘अच्छा है न, मैं अकेली जान. भूखी भी सो जाऊं तो किसी को पता नहीं चलेगा. बच्चा होगा तो किसकिस का मुंह देखूंगी. बच्चे को क्या नहीं चाहिए. क्या उसे पिता नहीं चाहिए? मेरी तरह लावारिस जिएगा क्या वह?’’

‘‘ऐसा क्यों सोचती है री, सुलेखा. बच्चे से तेरा भी तो मन लगेगा न.’’

‘‘यह सोमू है न बीजी. यह भी तो मेरा ही बच्चा है. मेरा मन इसी से लग जाता है.’’

चाची की बातों में एक बार ऐसा सुना था और उसी दिन से मैं ने चाची को छोटी मां कहना शुरू कर दिया था. मैं तब 22 साल का था. बीकौम का नतीजा आया था, पता नहीं क्यों सब से पहले चाची के पैर छू कर आशीर्वाद मांगा था.

‘‘आज से आप मेरी छोटी मां. आप का बच्चा हूं न मैं. आशीर्वाद दीजिए, छोटी मां.’’

तब एक प्यारीसी भावना जागी थी चाची की आंखों में. मैं चाची का अच्छा दोस्त तो पहले ही था तब वास्तव में उन की संतान भी बन गया था. चाची ने गले लगा कर जो मेरा माथा चूमा था वह भाव आज भी भूला नहीं हूं. मन ही मन ठान लिया था. पति के अभाव में भी जिस तरह चाची ने दहलीज का मान रखा है उसी तरह मैं भी पुत्र बन कर चाची की रक्षा करूंगा.

मेरी शादी हुई और अपनी पत्नी से भी मैं ने यही आश्वासन मांगा कि वह चाची को अपनी मां, अपनी सखी, अपनी मित्र मानेगी सदा और वैसा ही हुआ. मेरी पत्नी ने भी सदा चाची का मान रखा है. मैं अकसर सोचता हूं, रिश्ते निभाना इतना मुश्किल होता नहीं जितना हम उन्हें बना देते हैं. गरिमा और अनुशासन में रह कर भी जटिल रिश्ता निभाया जा सकता है बशर्ते उस में दोनों तरफ से समान मेहनत की जाए. इंसान शराफत की हद में रहे और अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न करे तो कोई भी संबंध आसान हो सकता है.

लगभग चाची और चाचा के विवाह के 20 साल बाद एक बार फिर चाचा के साथ एक नए रिश्ते का पदार्पण हमारी दहलीज पर हुआ था. काफी बीमार अवस्था में चाचा लौट आए थे और साथसाथ चला आया था उन का बेटा विजय. हमारा सारा परिवार हैरानपरेशान. बीजी ने बांहें खोल कर दोनों का स्वागत किया था.

आगे पढ़ें- बस, एक चाची थीं जो तटस्थ थीं. न कोई खुशी, न…

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निर्मल नदी सी सुलेखा चाची, जिन्हें न कोई तमन्ना थी न ही कोई आस, ने मिलीजुली मिट्टी के गीलेअधगीले लौंदे को आकार दे कर मूर्तरूप देने की कोशिश की. विजय के रूप में चाची को भी जीने का सहारा मिल गया था. लेकिन सहसा ऐसा क्या हो गया कि चाची को विजय से कड़वे शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा?

‘‘तुम्हारी भाषा में प्यार किसे कहते हैं? तुम इतने नासमझ तो नहीं हो जो तुम्हें समझ में ही न आए कि सामने वाला तुम से प्यार कर रहा है या नहीं. घर में पलता पालतू जानवर तक प्यारभरा हाथ पहचान जाता है और तुम्हें इंसान हो कर भी इस बात का पता नहीं चला. वाह, धन्य हो तुम और तुम्हारा फलसफा.’’

सुलेखा चाची का स्वर इतना तीखा और कानों को भेद जाने वाला होगा, मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. ‘‘तुम्हारा कोई दोष नहीं है, बेटा. मेरा ही दोष है जो तुम्हें अपना बच्चा समझ कर तुम पर अपनी ममता लुटाती रही. सोचती रही बिना मां के पले हो, लाख कमियां हो सकती हैं तुम में क्योंकि कुछ बातें बचपन से ही सिखाई जाती हैं जन्मघुट्टी में घोल कर. जन्मघुट्टी में तुम्हें मां का सम्मान करना पिलाया ही नहीं गया तो कैसे तुम आज मेरा सम्मान कर पाते.’’

‘‘बड़ी मां,’’ विजय कुछ कह पाता, अपनी सफाई में कुछ बोल पाता इस से पहले ही सुलेखा चाची ने उसे हाथ के इशारे से रोक दिया. स्तब्ध रह गया था मैं भी. सुलेखा चाची जिन के शांत स्वभाव का सिक्का हमारा सारा खानदान मानता है वही इस तरह कैसे और क्यों बोलने लगीं? अच्छा भला तो सब चल रहा है. सुलेखा चाची ने अपनी एक सहेली की अनाथ बच्ची सीमा से विजय का रिश्ता भी पक्का कर रखा है.

विजय के पिता मेरे चाचा थे और सुलेखा मेरी चाची. सुलेखा चाची विजय की जन्मदातृ नहीं हैं लेकिन विजय की बड़ी मां हैं, विजय के पिता की पहली पत्नी. चाचा शादी के बाद विदेश चले गए थे और लगभग 20 साल बाद हमेशा के लिए देश वापस लौटे थे. शांत सुलेखा चाची सामाजिक दायरे का सम्मान करतेकरते बंधी रहीं हमारे घर की दहलीज से.

चाचा 2-3 साल बाद आते. घर पर कुछ डौलरों की वर्षा करते, कुछ तरसी आंखों में जराजरा सी आस जगाते, एहसास जगा जाते कि वे जिंदा हैं अभी. हमारी दादी चाचा का इंतजार करतीकरती थक गईं. लगभग 20 साल, सालोंसाल चाचा का आनाजाना लगा रहा. चाची की गोद कभी नहीं भरी. घर में अकसर बात चलती, चाची के कोई औलाद ही होती तो चाचा को घर की तरफ खींचती.

मैं आज भी सोचता हूं कैसे चाचा को उस की औलाद अपनी ओर खींचती. जिस चाचा को उन की मां, उन की पत्नी न खींच पाईं उन्हें उन की औलाद कैसे खींच पाती. मैं सब से बड़ा था न घर में. बड़ों में मैं बच्चा था और बच्चों में मैं बड़ा. सब से कुछकुछ सुनता रहता था. मैं बीच का था न, सो सब की तरह सोच पाता था. चाचा जब आ कर जाते तब दादी और मां की नजरें बड़ी तमन्ना से देखतीं.

‘‘क्या पता इस बार तेरी गोद भर जाए. बस, वक्त का इंतजार कर.’’

चाची मुसकरा भर देती थीं. जैसे उन्हें ऐसी न कोई तमन्ना है और न आस ही. एक शांत सी, भीनीभीनी सी मुसकान. एक दर्प सा लगता मुझे उन के चेहरे पर, जैसे सब पर हंस रही हों. कह रही हों, क्या उम्रभर तुम्हारा ही चाहा होगा?

चाची पढ़ीलिखी हैं, स्थानीय कालेज में हिंदी की प्राध्यापिका हैं. बड़ी सुलझी और परिपक्व सी. चाची से मैं 10 साल छोटा हूं. फिर भी कभीकभी लगता था उन का हमउम्र हूं. उन के स्तर तक जा कर मैं तब भी सोच सकता था और आज भी सोच सकता हूं. तब भी मुझे समझ में आता था उन की जीत हो चुकी है. उन का चाहा ही होगा. शायद वे मां बनना चाहती ही नहीं थीं.

‘‘अच्छा है न, मैं अकेली जान. भूखी भी सो जाऊं तो किसी को पता नहीं चलेगा. बच्चा होगा तो किसकिस का मुंह देखूंगी. बच्चे को क्या नहीं चाहिए. क्या उसे पिता नहीं चाहिए? मेरी तरह लावारिस जिएगा क्या वह?’’

‘‘ऐसा क्यों सोचती है री, सुलेखा. बच्चे से तेरा भी तो मन लगेगा न.’’

‘‘यह सोमू है न बीजी. यह भी तो मेरा ही बच्चा है. मेरा मन इसी से लग जाता है.’’

चाची की बातों में एक बार ऐसा सुना था और उसी दिन से मैं ने चाची को छोटी मां कहना शुरू कर दिया था. मैं तब 22 साल का था. बीकौम का नतीजा आया था, पता नहीं क्यों सब से पहले चाची के पैर छू कर आशीर्वाद मांगा था.

‘‘आज से आप मेरी छोटी मां. आप का बच्चा हूं न मैं. आशीर्वाद दीजिए, छोटी मां.’’

तब एक प्यारीसी भावना जागी थी चाची की आंखों में. मैं चाची का अच्छा दोस्त तो पहले ही था तब वास्तव में उन की संतान भी बन गया था. चाची ने गले लगा कर जो मेरा माथा चूमा था वह भाव आज भी भूला नहीं हूं. मन ही मन ठान लिया था. पति के अभाव में भी जिस तरह चाची ने दहलीज का मान रखा है उसी तरह मैं भी पुत्र बन कर चाची की रक्षा करूंगा.

मेरी शादी हुई और अपनी पत्नी से भी मैं ने यही आश्वासन मांगा कि वह चाची को अपनी मां, अपनी सखी, अपनी मित्र मानेगी सदा और वैसा ही हुआ. मेरी पत्नी ने भी सदा चाची का मान रखा है. मैं अकसर सोचता हूं, रिश्ते निभाना इतना मुश्किल होता नहीं जितना हम उन्हें बना देते हैं. गरिमा और अनुशासन में रह कर भी जटिल रिश्ता निभाया जा सकता है बशर्ते उस में दोनों तरफ से समान मेहनत की जाए. इंसान शराफत की हद में रहे और अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न करे तो कोई भी संबंध आसान हो सकता है.

लगभग चाची और चाचा के विवाह के 20 साल बाद एक बार फिर चाचा के साथ एक नए रिश्ते का पदार्पण हमारी दहलीज पर हुआ था. काफी बीमार अवस्था में चाचा लौट आए थे और साथसाथ चला आया था उन का बेटा विजय. हमारा सारा परिवार हैरानपरेशान. बीजी ने बांहें खोल कर दोनों का स्वागत किया था.

आगे पढ़ें- बस, एक चाची थीं जो तटस्थ थीं. न कोई खुशी, न…

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May 02, 2022 at 09:00AM

Mother’s Day 2022: मुझे बच्चा नहीं चाहिए

अर्शी की आए-दिन मियां से लड़ाई हो जाती है. झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि अर्शी सोचने लगती कि इस आदमी के साथ पूरी जिन्दगी कैसे काटेगी. डर लगता है कि कहीं किसी दिन आदिल उसे तलाक ही न दे दे. बड़ी असुरक्षित सी जिन्दगी जी रही थी. हर वक्त सीने में धुकधुकी सी लगी रहती. लड़ाई भी ऐसे मुद्दे पर कि कोई सुने तो हंसी निकल जाए.

आदिल को सफाई की सनक थी. सनक भी ऐसी-वैसी नहीं, बहुत बड़ी. उसे भी और उसकी मां को भी. वो घर को किसी होटल की तरह चमचमाता हुआ देखना चाहते थे. धूल का कण न मिले कहीं, हर चीज चमकती हुई हो, फर्श पर हर वक्त फिनाइल का पोछा. बाहर से आओ तो लगता कि घर में नहीं, किसी अस्पताल में घुसे हो. अर्शी यहां हर काम ऐसे संभाल-संभाल कर करती थी कि कहीं उससे कोई चूक न हो जाए. कहीं कुछ गिर न जाए, कुछ टूट न जाए. वह किचेन को कई-कई बार पोंछती कि कहीं पानी की कोई बूंद पड़ी न दिख जाए आदिल को.

बेडरूम में कोई कपड़ा, सामान, कागज, अखबार इधर-उधर न पड़ा हो. सबकुछ भलीभांति व्यवस्थित हो. आदिल के आफिस से आते ही वह उसकी हर चीज जल्दी-जल्दी करीने से लगा देती, ताकि उसके गुस्से से बची रहे. सात साल हो गए शादी को और अर्शी को इंसान से रोबोट बने हुए. वह आज तक इस घर को अपना नहीं समझ पायी. समझे भी कैसे, वह कभी अपने तरीके से कुछ कर ही नहीं पायी यहां. घर को सुविधानुसार और अपने अनुरूप तो वह रख ही नहीं पाती है.

आदिल की मां ने घर में जो चीज जहां सजा दी हैं, वह बस उसे वहीं देखना चाहता है. अर्शी अपने मन से कोई चीज इधर से उधर नहीं कर सकती. यहां तक कि अपने बेडरूम तक में वह अपने अनुसार तस्वीरें,  फूल या अन्य चीजें नहीं लगा पाती है. जरा सा चेंज करो तो सौ सवाल खड़े हो जाते हैं. यह क्यों किया? इस घर में अर्शी खुद को एक नौकरानी समझने लगी है. एक नौकरानी की तरह घर की तमाम चीजों को रोजाना झांड-पोंछ कर साफ तो करती है मगर इन्हें बदल कर इनकी जगह कुछ और सजाने का हक उसको नहीं है.

शादी के बाद दो साल तक तो उसे लगता रहा कि शायद एडजेस्मेंट प्रॉब्लम हो रही है. शायद उसके घर में साफ-सफाई का इतना ध्यान नहीं रखा जाता, जैसे यहां रखते हैं. नया घर, नये लोग हैं तो धीरे-धीरे वह इनके तौर-तरीके सीख लेगी. मगर बीते पांच साल से वह इस बात को शिद्दत से महसूस करने लगी थी कि आदिल और उसकी मां सफाई के मामले में बहुत ज्यादा सनकी हैं. उसे लगने लगा था कि आदिल से शादी करके उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है. मां का घर तो छूटा ही, जो मिला वह अपना नहीं है.

इन सात सालों में उसके अंदर ही अंदर बहुत कुछ टूट चुका है, एक सन्नाटा सा बिखर गया है अर्शी के शरीर और आत्मा में. सात सालों में वह बिल्कुल अकेली हो गयी है. हाथ भी खाली, मन भी खाली और कोख भी खाली. कोख इसलिए खाली क्योंकि अर्शी गर्भनिरोधक दवाएं लेती है, आदिल को बताए बिना.

सोचती थी कि इस घर में एडजेस्ट हो जाऊं तब फैमिली बढ़ाऊंगी. फिर आदिल के गुस्से और लड़ाई-झगड़े की वजह से सोचती दो-चार साल में जब दोनों को एकदूसरे की आदत हो जाएगी, एक दूसरे को समझने लगेंगे और झगड़े कम हो जाएंगे तब वह अपनी बगिया में नये फूल का स्वागत करेगी. मगर अब तो लगता ही नहीं कि कभी ऐसा हो पाएगा.

उस दिन आदिल का मूड कुछ रोमांटिक सा था. बिस्तर पर लेटते ही उसने अर्शी को बांहों में जकड़ा और बोला, ‘अब हमें फैमिली बढ़ाने की सोचनी चाहिए. तुम किसी लेडी डॉक्टर से मशवरा क्यों नहीं करती, आखिर कब तक इंतजार करोगी?’

अर्शी उसकी बात सुन कर खामोश ही रही. आदिल अपनी रौ में बोलता रहा, ‘देखो, मैं बहुत आजाद ख्याल का आदमी हूं. तुम इलाज के चक्कर में अगर नहीं पड़ना चाहती तो हम बच्चा गोद भी ले सकते हैं.’

अर्शी को खामोश देखकर उसे खीज सी हुई. ‘कुछ तो कहो…’ उसने उसकी चुप्पी पर खिसियाते हुए कहा.

‘मुझे बच्चा नहीं चाहिए.’ अर्शी ने धीरे से जवाब दिया. आदिल इस जवाब पर चौंक कर उठ बैठा. अर्शी के चेहरे की ओर उसने गौर से देखा और पूछा, ‘बच्चा नहीं चाहिए? क्यों? फिर शादी क्यों की तुमने?’ उसकी आवाज कठोर हो गयी.

‘अपना घर बनाने के लिए शादी की थी. क्या पता था कि घर नहीं, होटल मिलेगा. जहां हर चीज चमचमाती हुई होगी. करीने से रखी हुई कि मैं उसे हिला भी न सकूं.’ अर्शी ने धीरे से जवाब दिया.

‘क्या… मतलब क्या है तुम्हारा? ये घर नहीं होटल है?’ आदिल चिल्लाया.

‘हां, होटल ही है… चमचमाता हुआ होटल… कभी देखा है उन घरों को जहां बच्चे होते हैं… कैसे होते हैं वह घर… वहां हर तरफ खिलौने बिखरे होते हैं, चॉकलेट-टॉफियां बिखरी पड़ी रहती हैं. घर वह होता है जहां बच्चों की किताबें पड़ी होती हैं…  उनके कपड़े यहां वहां सूख रहे होते हैं… कहीं वह खेल रहे होते हैं… कहीं खाना खा कर फैला रहे होते हैं तो कहीं पॉटी करके बैठे होते हैं… वो होता है घर, जहां जिन्दगी होती है, जहां हलचल होती है, शोर-शराबा, हंसी-मजाक होता है… ऐसा नहीं जैसा यहां है… फिनाइल की महक से भरा सन्नाटा… सिर्फ सन्नाटा… अंदर भी और बाहर भी… मुझे होटल में बच्चा पैदा नहीं करना है… तुम चाहो तो मुझे तलाक दे दो…’

आदिल बिस्तर पर सन्न बैठा था और अर्शी को आज इतने सालों बाद यह सच्चाई कहने के बाद बहुत हल्का महसूस हो रहा था. यह बात आदिल से कह पाने की हिम्मत उसमें आयी थी तलाक का कठोर फैसला लेने के बाद. आदिल को उसी हाल में छोड़कर वह छत पर चली गयी. आखिरी बार इस होटल के ऊपर का आकाश देखने के लिए क्योंकि कल सुबह उसे वहां से उड़ जाना था.

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अर्शी की आए-दिन मियां से लड़ाई हो जाती है. झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि अर्शी सोचने लगती कि इस आदमी के साथ पूरी जिन्दगी कैसे काटेगी. डर लगता है कि कहीं किसी दिन आदिल उसे तलाक ही न दे दे. बड़ी असुरक्षित सी जिन्दगी जी रही थी. हर वक्त सीने में धुकधुकी सी लगी रहती. लड़ाई भी ऐसे मुद्दे पर कि कोई सुने तो हंसी निकल जाए.

आदिल को सफाई की सनक थी. सनक भी ऐसी-वैसी नहीं, बहुत बड़ी. उसे भी और उसकी मां को भी. वो घर को किसी होटल की तरह चमचमाता हुआ देखना चाहते थे. धूल का कण न मिले कहीं, हर चीज चमकती हुई हो, फर्श पर हर वक्त फिनाइल का पोछा. बाहर से आओ तो लगता कि घर में नहीं, किसी अस्पताल में घुसे हो. अर्शी यहां हर काम ऐसे संभाल-संभाल कर करती थी कि कहीं उससे कोई चूक न हो जाए. कहीं कुछ गिर न जाए, कुछ टूट न जाए. वह किचेन को कई-कई बार पोंछती कि कहीं पानी की कोई बूंद पड़ी न दिख जाए आदिल को.

बेडरूम में कोई कपड़ा, सामान, कागज, अखबार इधर-उधर न पड़ा हो. सबकुछ भलीभांति व्यवस्थित हो. आदिल के आफिस से आते ही वह उसकी हर चीज जल्दी-जल्दी करीने से लगा देती, ताकि उसके गुस्से से बची रहे. सात साल हो गए शादी को और अर्शी को इंसान से रोबोट बने हुए. वह आज तक इस घर को अपना नहीं समझ पायी. समझे भी कैसे, वह कभी अपने तरीके से कुछ कर ही नहीं पायी यहां. घर को सुविधानुसार और अपने अनुरूप तो वह रख ही नहीं पाती है.

आदिल की मां ने घर में जो चीज जहां सजा दी हैं, वह बस उसे वहीं देखना चाहता है. अर्शी अपने मन से कोई चीज इधर से उधर नहीं कर सकती. यहां तक कि अपने बेडरूम तक में वह अपने अनुसार तस्वीरें,  फूल या अन्य चीजें नहीं लगा पाती है. जरा सा चेंज करो तो सौ सवाल खड़े हो जाते हैं. यह क्यों किया? इस घर में अर्शी खुद को एक नौकरानी समझने लगी है. एक नौकरानी की तरह घर की तमाम चीजों को रोजाना झांड-पोंछ कर साफ तो करती है मगर इन्हें बदल कर इनकी जगह कुछ और सजाने का हक उसको नहीं है.

शादी के बाद दो साल तक तो उसे लगता रहा कि शायद एडजेस्मेंट प्रॉब्लम हो रही है. शायद उसके घर में साफ-सफाई का इतना ध्यान नहीं रखा जाता, जैसे यहां रखते हैं. नया घर, नये लोग हैं तो धीरे-धीरे वह इनके तौर-तरीके सीख लेगी. मगर बीते पांच साल से वह इस बात को शिद्दत से महसूस करने लगी थी कि आदिल और उसकी मां सफाई के मामले में बहुत ज्यादा सनकी हैं. उसे लगने लगा था कि आदिल से शादी करके उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है. मां का घर तो छूटा ही, जो मिला वह अपना नहीं है.

इन सात सालों में उसके अंदर ही अंदर बहुत कुछ टूट चुका है, एक सन्नाटा सा बिखर गया है अर्शी के शरीर और आत्मा में. सात सालों में वह बिल्कुल अकेली हो गयी है. हाथ भी खाली, मन भी खाली और कोख भी खाली. कोख इसलिए खाली क्योंकि अर्शी गर्भनिरोधक दवाएं लेती है, आदिल को बताए बिना.

सोचती थी कि इस घर में एडजेस्ट हो जाऊं तब फैमिली बढ़ाऊंगी. फिर आदिल के गुस्से और लड़ाई-झगड़े की वजह से सोचती दो-चार साल में जब दोनों को एकदूसरे की आदत हो जाएगी, एक दूसरे को समझने लगेंगे और झगड़े कम हो जाएंगे तब वह अपनी बगिया में नये फूल का स्वागत करेगी. मगर अब तो लगता ही नहीं कि कभी ऐसा हो पाएगा.

उस दिन आदिल का मूड कुछ रोमांटिक सा था. बिस्तर पर लेटते ही उसने अर्शी को बांहों में जकड़ा और बोला, ‘अब हमें फैमिली बढ़ाने की सोचनी चाहिए. तुम किसी लेडी डॉक्टर से मशवरा क्यों नहीं करती, आखिर कब तक इंतजार करोगी?’

अर्शी उसकी बात सुन कर खामोश ही रही. आदिल अपनी रौ में बोलता रहा, ‘देखो, मैं बहुत आजाद ख्याल का आदमी हूं. तुम इलाज के चक्कर में अगर नहीं पड़ना चाहती तो हम बच्चा गोद भी ले सकते हैं.’

अर्शी को खामोश देखकर उसे खीज सी हुई. ‘कुछ तो कहो…’ उसने उसकी चुप्पी पर खिसियाते हुए कहा.

‘मुझे बच्चा नहीं चाहिए.’ अर्शी ने धीरे से जवाब दिया. आदिल इस जवाब पर चौंक कर उठ बैठा. अर्शी के चेहरे की ओर उसने गौर से देखा और पूछा, ‘बच्चा नहीं चाहिए? क्यों? फिर शादी क्यों की तुमने?’ उसकी आवाज कठोर हो गयी.

‘अपना घर बनाने के लिए शादी की थी. क्या पता था कि घर नहीं, होटल मिलेगा. जहां हर चीज चमचमाती हुई होगी. करीने से रखी हुई कि मैं उसे हिला भी न सकूं.’ अर्शी ने धीरे से जवाब दिया.

‘क्या… मतलब क्या है तुम्हारा? ये घर नहीं होटल है?’ आदिल चिल्लाया.

‘हां, होटल ही है… चमचमाता हुआ होटल… कभी देखा है उन घरों को जहां बच्चे होते हैं… कैसे होते हैं वह घर… वहां हर तरफ खिलौने बिखरे होते हैं, चॉकलेट-टॉफियां बिखरी पड़ी रहती हैं. घर वह होता है जहां बच्चों की किताबें पड़ी होती हैं…  उनके कपड़े यहां वहां सूख रहे होते हैं… कहीं वह खेल रहे होते हैं… कहीं खाना खा कर फैला रहे होते हैं तो कहीं पॉटी करके बैठे होते हैं… वो होता है घर, जहां जिन्दगी होती है, जहां हलचल होती है, शोर-शराबा, हंसी-मजाक होता है… ऐसा नहीं जैसा यहां है… फिनाइल की महक से भरा सन्नाटा… सिर्फ सन्नाटा… अंदर भी और बाहर भी… मुझे होटल में बच्चा पैदा नहीं करना है… तुम चाहो तो मुझे तलाक दे दो…’

आदिल बिस्तर पर सन्न बैठा था और अर्शी को आज इतने सालों बाद यह सच्चाई कहने के बाद बहुत हल्का महसूस हो रहा था. यह बात आदिल से कह पाने की हिम्मत उसमें आयी थी तलाक का कठोर फैसला लेने के बाद. आदिल को उसी हाल में छोड़कर वह छत पर चली गयी. आखिरी बार इस होटल के ऊपर का आकाश देखने के लिए क्योंकि कल सुबह उसे वहां से उड़ जाना था.

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May 02, 2022 at 09:00AM

Mother’s Day 2022- मैं सास ही भली: क्या मयंक की मां को वाणी पसंद आई?

लाड़ लड़ाती बेटी जैसी बहू पा कर मैं निहाल हो गई. मांमां कर जब वह गले लग जाती तो बेटी की कमी पूरी हो जाती लेकिन कभीकभी ज्यादा मीठा भी कड़वा लगने लगता है… ‘‘वाणी, बस मु झे तुम से यही कहना है कि मेरी मम्मी को भी अपनी मां ही सम झना, उन्हें सास मत सम झना. दीदी का जब से विवाह हुआ है, उन्हें अकेलापन लगता होगा. तुम बिलकुल अपनी मां की तरह ही रहना उन के साथ, प्रौमिस करो, वाणी,’’ फोन पर दूसरी तरफ वाणी ने क्या कहा होगा, यह तो नहीं जान सकती थी लतिका, पर अपने बेटे मयंक की फोन पर यह बात सुन कर उन्हें बेटे पर गर्व हो आया, वाह, कितनी अच्छी बात कर रहा है उन का बेटा, गर्व से सीना चौड़ा हो गया, आंखों में चमक उभर आई. एक महीने बाद ही तो मयंक का विवाह होना था. वह वाणी से प्रेमविवाह कर रहा था.

मयंक ने जब मां लतिका को पहली बार वाणी से मिलवाया था, तो वाणी उन्हें पहली नजर में ही पसंद आ गई थी. सुंदर, स्मार्ट, खूब हंसमुख वाणी का घर मुंबई के एक इलाके पवई में लतिका के घर से कुछ दूरी पर ही था. वाणी और मयंक अच्छे पद पर थे. दोनों एक कौमन फ्रैंड के घर पर मिले थे. दोस्ती, प्यार, फिर अब विवाह होने वाला था. वाणी अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. लतिका की बेटी सुनयना का विवाह 2 वर्षों पहले हुआ था. वह सपरिवार अमेरिका में थी. लतिका और उस के पति विनोद बहुत उत्साहपूर्वक विवाह की तैयारियों में व्यस्त थे. वाणी लतिका से फोन पर काफी संपर्क में रहती थी. अभी से ही वह लतिका का दिल जीत चुकी थी. और आज बेटे की फोन पर बात सुन कर तो लतिका के पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. विनोद जैसे ही औफिस से आए, लतिका ने उन के साथ बैठ कर चाय पीते हुए मयंक की फोन पर सुनी बात बताई. विनोद ने कहा, ‘‘वाह, तुम तो बहुत लकी हो. एक बेटी गई, दूसरी बेटी घर आ रही है. चलो, अच्छा है. मयंक सचमुच सम झदार बेटा है.’’ लतिका का वाणी को बहू बना कर लाने का उत्साह और भी बढ़ गया था. दिन गिन रही थीं. कब बहू आए और उन्हें अच्छा साथ मिले. कुछ महीनों से उन का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था. और वाणी बहू बन कर आ भी गई, घर की दीवारें जैसे चहक उठीं. लतिका ने खुलेदिल से उस पर स्नेह की वर्षा कर दी.

पहले ही दिन वाणी उन से लिपट गई, ‘‘मैं आप को मयंक की तरह मम्मी नहीं कहूंगी, मैं अपनी मम्मी को मां ही कहती हूं, आप को भी मां ही कहूंगी. अब आप भी मेरी मां जैसी ही तो हैं न.’’ ‘‘हां, बेटा, और क्या, मु झे अपनी मां ही सम झना, सास नहीं. यह सासबहू का रिश्ता मु झे भी कुछ डराता ही है. हम मांबेटी की तरह ही रहेंगे,’’ विनोद वाहवाह कर उठे, कहने लगे, ‘‘यह क्या? दोनों मांबेटी बन कर रहोगी तो मैं और मयंक तो बोर हो जाएंगे, क्यों मयंक?’’ मयंक सम झा नहीं, बोला, ‘‘क्यों, पापा?’’ ‘‘अरे, सासबहू का कोई ड्रामा देखने को नहीं मिलेगा, बोर नहीं होंगे?’’ मयंक हंस पड़ा, वाणी ने इतरा कर कहा, ‘‘नहीं, पापा, आप को सासबहू का कोई ड्रामा देखने को नहीं मिलेगा. ये मेरी मां हैं, सास नहीं.’’ ‘‘ओह, मेरी बच्ची,’’ लतिका ने अपनी बांहें फैला दीं, वाणी उन की बांहों में लाड़ से समा गई.

सुनयना हंसती हुई यह दृश्य देख रही थी, जो वाणी के लिए अमेरिका से आई थी. बोली, ‘‘यह तो अच्छा है, अब तो आप मु झे याद ही नहीं करेंगी.’’ वाणी ने कहा, ‘‘अरे नहीं दीदी, एक घर में 2 बेटियां भी तो होती हैं न, मां के लिए तो सब बराबर होती हैं, हैं न, मां?’’ लतिका तो ऐसी लाड़ दिखाने वाली बहू पा कर निहाल थीं, फौरन हां में सिर हिलाया. हंसीखुशी के माहौल में एक हफ्ता खूब शानदार बीता. फिर दोनों एक हफ्ते के लिए हनीमून पर चले गए. वहां से भी वाणी लतिका को मां, मां कर के लगातार संपर्क में रही. लतिका बहुत खुश थी. जिस दिन मयंक और वाणी घूम कर वापस आए, वाणी ने घर में घुसते हुए अपने बैग जमीन पर पटके और आराम से सोफे पर पसर गई, ‘‘ओह मां, थक गई, चाय चाहिए,’’ रात के 8 बज रहे थे. सुनयना का पति राजीव विवाह अटैंड कर के लौट चुका था. वहां उस के मातापिता भी राजीव और सुनयना के साथ ही रहते थे. लतिका ने कहा, ‘‘पर बेटा, अब तो खाना लग ही गया है.

तुम लोग फ्रैश हो कर खाना पहले खा लेते, चाय बाद में पी लेना.’’ ‘‘नहीं मां, चाय पीने का मन है, बना दो न,’’ वाणी ने इस तरह कहा कि सुनयना को हंसी आ गई. उस ने लतिका को देख कर आंख मारते हुए कहा, ‘‘आप की दूसरी बेटी के लिए मैं चाय बना लाती हूं,’’ चाय आने तक वाणी फ्रैश हो चुकी थी. मयंक भी सोफे पर पसरा था. लतिका मयंक से ट्रिप के बारे में पूछती रही. विनोद भी आ गए, तो सब ने खाना शुरू किया. खाना देख कर वाणी ने कहा, ‘‘मां, छोले तो ठीक हैं पर यह आलूगोभी. मां, मेरा दिमाग खराब हो जाता है आलूगोभी देख कर.’’ लतिका चौंकी, ‘‘ओह, पसंद नहीं है?’’ ‘‘न मां, बिलकुल नहीं, मु झे यह टिफिन में कभी मत देना?’’ विनोद ने कहा, ‘‘तुम्हें औफिस में टिफिन चाहिए, मैं और मयंक तो औफिस की कैंटीन में ही खा लेते हैं. लतिका के ऊपर सुबह खाने का काफी काम आ जाता था.

उस की तबीयत भी ठीक नहीं रहती.’’ ‘‘पर पापा, मां हमेशा टिफिन देती थीं. कैंटीन का खाना तो मैं रोजरोज खा ही नहीं सकती.’’ लतिका के चेहरे पर कुछ सोचने के भाव आए, फिर पूछ लिया, ‘‘क्या ले जाना पसंद करोगी, बेटा.’’ ‘‘खूब अच्छीअच्छी चीजें, मां?’’ मयंक ने कहा, ‘‘तुम एक काम करना, थोड़ा जल्दी उठ कर मम्मी के साथ किचन देख लेना कि क्या बनाना है?’’ ‘‘न बाबा, सुबह कहां किचन में जाने का मन होगा, घर में टिफिन मां ही बनाती थीं, ये भी तो अब मेरी मां हैं. अब मेरा यही घर है, यही मां, है न मां?’’ भोला चेहरा लिए वाणी ऐसे बात कर रही थी कि किसी को पलभर तो कुछ सू झा ही नहीं. विनोद और सुनयना की नजरें मिलीं, दोनों ने अपनी हंसी मुश्किल से रोकी.

सुनयना काफी स्नेहिल स्वभाव की लड़की थी, बोली, ‘‘मम्मी, आप मेरा टिफिन बनाती थीं न, अब वाणी का भी बना देना,’’ लतिका ने ठंडी सांस लेते हुए हां में सिर हिला दिया. वे रात को सोने लेटीं तो विनोद ने उन्हें छेड़ा, ‘‘कैसा लग रहा है? एक और बेटी की मां बन कर. लतिका ने उन्हें घूरा तो विनोद हंस पड़े. रात के 11 बज रहे थे. इतने में वाणी की आवाज आई, ‘‘मां, मां.’’ ‘‘अब क्या हुआ,’’ कहती हुई लतिका अपने बैडरूम से बाहर निकलीं, ‘‘क्या हुआ, बेटा?’’ ‘‘मां, बहुत दिन हो गए, गरम दूध चाहिए, सोने से पहले मु झे गरम दूध पीने की आदत है.’’ ‘‘हां, ले लो बेटा, तुम्हारा घर है, जाओ, ले लो.’’ ‘‘नहीं मां, आप दे दो, मैं थक गई हूं, प्लीज मां.’’ ‘‘अच्छा,’’ लतिका को जैसे करंट सा लगा था. अभी तो किचन समेट कर फुरसत मिली थी. और तो किसी को दूध पीने की आदत थी नहीं.

लतिका दूध गरम कर के लाई. इतनी देर में वाणी सोफे पर लेट कर अपने फोन में कुछ कर रही थी. मां, मां, सुन कर सुनयना भी आ गई थी. वाणी गटागट दूध पी गई, बोली, ‘‘थैंक्स, मां, अब अच्छी नींद आएगी. मां, मु झे रोज रात में दूध देना,’’ फिर लतिका से लिपट कर उन का गाल चूम लिया, ‘‘बाय, गुडनाइट मां, गुडनाइट दीदी.’’ उस के जाने के बाद सुनयना हंसी, ‘‘क्या हुआ, मां, शौक्ड लग रही हो,’’ सुनयना के कहने के ढंग पर लतिका को हंसी आ गई. ‘चुप रहो तुम’ कह कर हंसती हुई सोने गईं तो विनोद ने फिर छेड़ा, ‘‘क्या हुआ, तुम्हारी नई बेटी ‘मां, मां’ क्यों कर रही थी?’’ ‘‘उसे दूध पीना था.’’ ‘‘क्या?’’ जोर से हंसे विनोद. ‘‘हां, अब रोज देना है उसे गरम दूध, उसे अच्छा लगता है,’’ दोनों इस बात पर हंसीमजाक करते रहे. कुछ दिन बाद सुनयना चली गई. सब अपने रूटीन में व्यस्त थे.

देखने में तो सब बहुत अच्छा चल रहा था पर लतिका की हालत इन 3 महीनों में पस्त हो चुकी थी. प्यारी सी, लाड़प्यार से लिपटती, नखरे उठवाती बहू को किसी भी बात के लिए टोकने की लतिका की हिम्मत ही नहीं होती थी. एक दिन विनोद से कहा भी, ‘‘ऐसे नखरे तो सुनयना ने भी कभी नहीं उठवाए मु झ से.’’ एक दिन सब डिनर कर रहे थे. मयंक ने बहुत ही लगाव से पूछा, ‘‘मम्मी, अब आप को दीदी की कमी तो नहीं खलती न? वाणी तो आप के साथ अपनी मां की तरह ही रहती है न?’’ वाणी लतिका का चेहरा देख रही थी. लतिका ने उस के भोले से चेहरे पर उत्तर की प्रतीक्षारत आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘हां, हां, अपनी मां ही सम झती है,’’ वाणी बहुत खुश हुई, उठ कर लतिका के गले में बांहें डाल दीं, कहा, ‘‘मैं इस घर में आ कर कितनी खुश हूं, मां. बता नहीं सकती.’’ विनोद बस, लतिका को देख मुसकरा दिए. वे अपनी पत्नी के बढ़े हुए काम, उन का कमरदर्द, थकान सब सम झ रहे थे. पर वाणी को क्या, कैसे कहा जाए, सम झ ही नहीं आ रहा था. नया विवाह था. शुरू में ही कुछ कह कर मतभेद उत्पन्न नहीं करना चाहते थे. वाणी से और कोई शिकायत भी तो नहीं थी किसी को. सब को प्यार करती थी, खुश रहती थी.

पूरा दिन औफिस में रह कर शाम को मां, मां करती घर आती थी. लतिका कैसे किसी बात पर उसे टोके. वे तो बहुत शांतिपसंद और स्नेहिल स्वभाव की महिला थीं. वाणी को घर के कामों में हाथ बंटाने का कोई शौक न था, न उसे जरूरत महसूस हो रही थी. साफसफाई करने वाली मेड उमा ही लतिका का हाथ बंटा रही थी. एक दिन विनोद ने सलाह दी, ‘‘लतिका, उमा से कहो, खाना भी बना दिया करे. अपनी नई बेटी से तो तुम्हें कुछ हैल्प मिलने के आसार नजर नहीं आ रहे.’’ उमा पुरानी मेड थी, घर की सदस्या की तरह ही थी. वह अब लतिका के कहे अनुसार खाना भी बनाने लगी थी. अब लतिका को कुछ आराम हुआ, बैकपेन में कुछ राहत सी मिली. वाणी के आने से पहले वह सब संभाल तो रही थी पर जब से वाणी आई थी, उन का काम बहुत बढ़ गया था. पहले तो जो भी बनता था, तीनों खा लेते थे. पर वाणी के खानेपीने में खूब नखरे थे, उस के लिए कुछ अलग ही अचानक बनाना पड़ जाता था. मां, मां कर के कुछ फरमाइश करती तो लतिका कुछ मना कर ही न पाती थी. रात को सब डिनर कर रहे थे.

वाणी चुप सी थी. लतिका ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, बेटा? थक गई क्या? बहुत चुप हो.’’ ‘‘मां.’’ ‘‘हां, बोलो न.’’ ‘‘एक बात कहूं?’’ ‘‘अरे, बोलो न क्या हुआ?’’ ‘‘मां, मु झे उमा आंटी के हाथ का खाना उतना अच्छा नहीं लग रहा है.’’ ‘‘पर वह वैसे ही बनाती है जैसा मैं उसे बताती हूं.’’ ‘‘पर मां, आप जैसी रोटी नहीं है उन की.’’ मयंक ने कहा, ‘‘तो क्या हुआ, ये भी काफी अच्छी हैं.’’ ‘‘पर मु झे मां के हाथ की रोटी अच्छी लगती है न.’’ ‘‘चुपचाप खा लो वाणी, खाना अच्छा है,’’ मयंक ने फिर कहा. पर वाणी तो अपनी तरह की एक ही बहू थी, बोली, ‘‘मां, बस मेरे लिए 2 रोटी बना दोगी कल से? प्लीज.’’ लतिका को धक्का सा लगा, क्या है यह लड़की. सम झ ही नहीं आया क्या कहे. वाणी ने फिर कहा, ‘‘बस, मेरी 2 रोटी बनाने में तो आप को तकलीफ नहीं होगी न, मां?’’ मयंक ने कहा, ‘‘अरे, चुपचाप खा लो जैसी बनी है. एक तो तुम कुछ भी काम नहीं करतीं, क्यों मां का काम बढ़ाती रहती हो?’’ वाणी ने उसे घूरा, ‘‘तुम चुप रहो, मैं अपनी मां से बात कर रही हूं, तुम्हें क्या परेशानी है?’’ विनोद और लतिका एकदूसरे का मुंह देख रहे थे, क्या कहें अब. लतिका ने कह दिया, ‘‘हां, बना दूंगी.’’ ‘‘ओह मां, आप कितनी अच्छी हैं, बिलकुल मेरी मां की तरह.

वे भी मेरी हर बात मान जाती हैं,’’ कहतेकहते उठ कर लतिका के गले में बांहें डाल दीं वाणी ने. सोने से पहले वाणी को गरम दूध का गिलास पकड़ा कर लतिका कमरे में आईं. आंखों पर हाथ रख कर लेट गईं. आज दिनभर उन की तबीयत ढीली ही थी. विनोद ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘कुछ नहीं,’’ कहती वे मुसकराईं तो विनोद हंसे, ‘‘दूसरी बेटी के बारे में सोच रही हो न?’’ ‘‘सुनो.’’ ‘‘हां, बोलो न.’’ ‘‘क्या कोई उसे कह सकता है कि वह मु झे अपनी मां नहीं, सास ही सम झ ले. मैं सास ही भली,’’ दोनों हाथ जोड़ कर अपने माथे से लगा कर लतिका ने नाटकीय स्वर में कहा तो विनोद जोर से हंस पड़े.

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लाड़ लड़ाती बेटी जैसी बहू पा कर मैं निहाल हो गई. मांमां कर जब वह गले लग जाती तो बेटी की कमी पूरी हो जाती लेकिन कभीकभी ज्यादा मीठा भी कड़वा लगने लगता है… ‘‘वाणी, बस मु झे तुम से यही कहना है कि मेरी मम्मी को भी अपनी मां ही सम झना, उन्हें सास मत सम झना. दीदी का जब से विवाह हुआ है, उन्हें अकेलापन लगता होगा. तुम बिलकुल अपनी मां की तरह ही रहना उन के साथ, प्रौमिस करो, वाणी,’’ फोन पर दूसरी तरफ वाणी ने क्या कहा होगा, यह तो नहीं जान सकती थी लतिका, पर अपने बेटे मयंक की फोन पर यह बात सुन कर उन्हें बेटे पर गर्व हो आया, वाह, कितनी अच्छी बात कर रहा है उन का बेटा, गर्व से सीना चौड़ा हो गया, आंखों में चमक उभर आई. एक महीने बाद ही तो मयंक का विवाह होना था. वह वाणी से प्रेमविवाह कर रहा था.

मयंक ने जब मां लतिका को पहली बार वाणी से मिलवाया था, तो वाणी उन्हें पहली नजर में ही पसंद आ गई थी. सुंदर, स्मार्ट, खूब हंसमुख वाणी का घर मुंबई के एक इलाके पवई में लतिका के घर से कुछ दूरी पर ही था. वाणी और मयंक अच्छे पद पर थे. दोनों एक कौमन फ्रैंड के घर पर मिले थे. दोस्ती, प्यार, फिर अब विवाह होने वाला था. वाणी अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. लतिका की बेटी सुनयना का विवाह 2 वर्षों पहले हुआ था. वह सपरिवार अमेरिका में थी. लतिका और उस के पति विनोद बहुत उत्साहपूर्वक विवाह की तैयारियों में व्यस्त थे. वाणी लतिका से फोन पर काफी संपर्क में रहती थी. अभी से ही वह लतिका का दिल जीत चुकी थी. और आज बेटे की फोन पर बात सुन कर तो लतिका के पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. विनोद जैसे ही औफिस से आए, लतिका ने उन के साथ बैठ कर चाय पीते हुए मयंक की फोन पर सुनी बात बताई. विनोद ने कहा, ‘‘वाह, तुम तो बहुत लकी हो. एक बेटी गई, दूसरी बेटी घर आ रही है. चलो, अच्छा है. मयंक सचमुच सम झदार बेटा है.’’ लतिका का वाणी को बहू बना कर लाने का उत्साह और भी बढ़ गया था. दिन गिन रही थीं. कब बहू आए और उन्हें अच्छा साथ मिले. कुछ महीनों से उन का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था. और वाणी बहू बन कर आ भी गई, घर की दीवारें जैसे चहक उठीं. लतिका ने खुलेदिल से उस पर स्नेह की वर्षा कर दी.

पहले ही दिन वाणी उन से लिपट गई, ‘‘मैं आप को मयंक की तरह मम्मी नहीं कहूंगी, मैं अपनी मम्मी को मां ही कहती हूं, आप को भी मां ही कहूंगी. अब आप भी मेरी मां जैसी ही तो हैं न.’’ ‘‘हां, बेटा, और क्या, मु झे अपनी मां ही सम झना, सास नहीं. यह सासबहू का रिश्ता मु झे भी कुछ डराता ही है. हम मांबेटी की तरह ही रहेंगे,’’ विनोद वाहवाह कर उठे, कहने लगे, ‘‘यह क्या? दोनों मांबेटी बन कर रहोगी तो मैं और मयंक तो बोर हो जाएंगे, क्यों मयंक?’’ मयंक सम झा नहीं, बोला, ‘‘क्यों, पापा?’’ ‘‘अरे, सासबहू का कोई ड्रामा देखने को नहीं मिलेगा, बोर नहीं होंगे?’’ मयंक हंस पड़ा, वाणी ने इतरा कर कहा, ‘‘नहीं, पापा, आप को सासबहू का कोई ड्रामा देखने को नहीं मिलेगा. ये मेरी मां हैं, सास नहीं.’’ ‘‘ओह, मेरी बच्ची,’’ लतिका ने अपनी बांहें फैला दीं, वाणी उन की बांहों में लाड़ से समा गई.

सुनयना हंसती हुई यह दृश्य देख रही थी, जो वाणी के लिए अमेरिका से आई थी. बोली, ‘‘यह तो अच्छा है, अब तो आप मु झे याद ही नहीं करेंगी.’’ वाणी ने कहा, ‘‘अरे नहीं दीदी, एक घर में 2 बेटियां भी तो होती हैं न, मां के लिए तो सब बराबर होती हैं, हैं न, मां?’’ लतिका तो ऐसी लाड़ दिखाने वाली बहू पा कर निहाल थीं, फौरन हां में सिर हिलाया. हंसीखुशी के माहौल में एक हफ्ता खूब शानदार बीता. फिर दोनों एक हफ्ते के लिए हनीमून पर चले गए. वहां से भी वाणी लतिका को मां, मां कर के लगातार संपर्क में रही. लतिका बहुत खुश थी. जिस दिन मयंक और वाणी घूम कर वापस आए, वाणी ने घर में घुसते हुए अपने बैग जमीन पर पटके और आराम से सोफे पर पसर गई, ‘‘ओह मां, थक गई, चाय चाहिए,’’ रात के 8 बज रहे थे. सुनयना का पति राजीव विवाह अटैंड कर के लौट चुका था. वहां उस के मातापिता भी राजीव और सुनयना के साथ ही रहते थे. लतिका ने कहा, ‘‘पर बेटा, अब तो खाना लग ही गया है.

तुम लोग फ्रैश हो कर खाना पहले खा लेते, चाय बाद में पी लेना.’’ ‘‘नहीं मां, चाय पीने का मन है, बना दो न,’’ वाणी ने इस तरह कहा कि सुनयना को हंसी आ गई. उस ने लतिका को देख कर आंख मारते हुए कहा, ‘‘आप की दूसरी बेटी के लिए मैं चाय बना लाती हूं,’’ चाय आने तक वाणी फ्रैश हो चुकी थी. मयंक भी सोफे पर पसरा था. लतिका मयंक से ट्रिप के बारे में पूछती रही. विनोद भी आ गए, तो सब ने खाना शुरू किया. खाना देख कर वाणी ने कहा, ‘‘मां, छोले तो ठीक हैं पर यह आलूगोभी. मां, मेरा दिमाग खराब हो जाता है आलूगोभी देख कर.’’ लतिका चौंकी, ‘‘ओह, पसंद नहीं है?’’ ‘‘न मां, बिलकुल नहीं, मु झे यह टिफिन में कभी मत देना?’’ विनोद ने कहा, ‘‘तुम्हें औफिस में टिफिन चाहिए, मैं और मयंक तो औफिस की कैंटीन में ही खा लेते हैं. लतिका के ऊपर सुबह खाने का काफी काम आ जाता था.

उस की तबीयत भी ठीक नहीं रहती.’’ ‘‘पर पापा, मां हमेशा टिफिन देती थीं. कैंटीन का खाना तो मैं रोजरोज खा ही नहीं सकती.’’ लतिका के चेहरे पर कुछ सोचने के भाव आए, फिर पूछ लिया, ‘‘क्या ले जाना पसंद करोगी, बेटा.’’ ‘‘खूब अच्छीअच्छी चीजें, मां?’’ मयंक ने कहा, ‘‘तुम एक काम करना, थोड़ा जल्दी उठ कर मम्मी के साथ किचन देख लेना कि क्या बनाना है?’’ ‘‘न बाबा, सुबह कहां किचन में जाने का मन होगा, घर में टिफिन मां ही बनाती थीं, ये भी तो अब मेरी मां हैं. अब मेरा यही घर है, यही मां, है न मां?’’ भोला चेहरा लिए वाणी ऐसे बात कर रही थी कि किसी को पलभर तो कुछ सू झा ही नहीं. विनोद और सुनयना की नजरें मिलीं, दोनों ने अपनी हंसी मुश्किल से रोकी.

सुनयना काफी स्नेहिल स्वभाव की लड़की थी, बोली, ‘‘मम्मी, आप मेरा टिफिन बनाती थीं न, अब वाणी का भी बना देना,’’ लतिका ने ठंडी सांस लेते हुए हां में सिर हिला दिया. वे रात को सोने लेटीं तो विनोद ने उन्हें छेड़ा, ‘‘कैसा लग रहा है? एक और बेटी की मां बन कर. लतिका ने उन्हें घूरा तो विनोद हंस पड़े. रात के 11 बज रहे थे. इतने में वाणी की आवाज आई, ‘‘मां, मां.’’ ‘‘अब क्या हुआ,’’ कहती हुई लतिका अपने बैडरूम से बाहर निकलीं, ‘‘क्या हुआ, बेटा?’’ ‘‘मां, बहुत दिन हो गए, गरम दूध चाहिए, सोने से पहले मु झे गरम दूध पीने की आदत है.’’ ‘‘हां, ले लो बेटा, तुम्हारा घर है, जाओ, ले लो.’’ ‘‘नहीं मां, आप दे दो, मैं थक गई हूं, प्लीज मां.’’ ‘‘अच्छा,’’ लतिका को जैसे करंट सा लगा था. अभी तो किचन समेट कर फुरसत मिली थी. और तो किसी को दूध पीने की आदत थी नहीं.

लतिका दूध गरम कर के लाई. इतनी देर में वाणी सोफे पर लेट कर अपने फोन में कुछ कर रही थी. मां, मां, सुन कर सुनयना भी आ गई थी. वाणी गटागट दूध पी गई, बोली, ‘‘थैंक्स, मां, अब अच्छी नींद आएगी. मां, मु झे रोज रात में दूध देना,’’ फिर लतिका से लिपट कर उन का गाल चूम लिया, ‘‘बाय, गुडनाइट मां, गुडनाइट दीदी.’’ उस के जाने के बाद सुनयना हंसी, ‘‘क्या हुआ, मां, शौक्ड लग रही हो,’’ सुनयना के कहने के ढंग पर लतिका को हंसी आ गई. ‘चुप रहो तुम’ कह कर हंसती हुई सोने गईं तो विनोद ने फिर छेड़ा, ‘‘क्या हुआ, तुम्हारी नई बेटी ‘मां, मां’ क्यों कर रही थी?’’ ‘‘उसे दूध पीना था.’’ ‘‘क्या?’’ जोर से हंसे विनोद. ‘‘हां, अब रोज देना है उसे गरम दूध, उसे अच्छा लगता है,’’ दोनों इस बात पर हंसीमजाक करते रहे. कुछ दिन बाद सुनयना चली गई. सब अपने रूटीन में व्यस्त थे.

देखने में तो सब बहुत अच्छा चल रहा था पर लतिका की हालत इन 3 महीनों में पस्त हो चुकी थी. प्यारी सी, लाड़प्यार से लिपटती, नखरे उठवाती बहू को किसी भी बात के लिए टोकने की लतिका की हिम्मत ही नहीं होती थी. एक दिन विनोद से कहा भी, ‘‘ऐसे नखरे तो सुनयना ने भी कभी नहीं उठवाए मु झ से.’’ एक दिन सब डिनर कर रहे थे. मयंक ने बहुत ही लगाव से पूछा, ‘‘मम्मी, अब आप को दीदी की कमी तो नहीं खलती न? वाणी तो आप के साथ अपनी मां की तरह ही रहती है न?’’ वाणी लतिका का चेहरा देख रही थी. लतिका ने उस के भोले से चेहरे पर उत्तर की प्रतीक्षारत आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘हां, हां, अपनी मां ही सम झती है,’’ वाणी बहुत खुश हुई, उठ कर लतिका के गले में बांहें डाल दीं, कहा, ‘‘मैं इस घर में आ कर कितनी खुश हूं, मां. बता नहीं सकती.’’ विनोद बस, लतिका को देख मुसकरा दिए. वे अपनी पत्नी के बढ़े हुए काम, उन का कमरदर्द, थकान सब सम झ रहे थे. पर वाणी को क्या, कैसे कहा जाए, सम झ ही नहीं आ रहा था. नया विवाह था. शुरू में ही कुछ कह कर मतभेद उत्पन्न नहीं करना चाहते थे. वाणी से और कोई शिकायत भी तो नहीं थी किसी को. सब को प्यार करती थी, खुश रहती थी.

पूरा दिन औफिस में रह कर शाम को मां, मां करती घर आती थी. लतिका कैसे किसी बात पर उसे टोके. वे तो बहुत शांतिपसंद और स्नेहिल स्वभाव की महिला थीं. वाणी को घर के कामों में हाथ बंटाने का कोई शौक न था, न उसे जरूरत महसूस हो रही थी. साफसफाई करने वाली मेड उमा ही लतिका का हाथ बंटा रही थी. एक दिन विनोद ने सलाह दी, ‘‘लतिका, उमा से कहो, खाना भी बना दिया करे. अपनी नई बेटी से तो तुम्हें कुछ हैल्प मिलने के आसार नजर नहीं आ रहे.’’ उमा पुरानी मेड थी, घर की सदस्या की तरह ही थी. वह अब लतिका के कहे अनुसार खाना भी बनाने लगी थी. अब लतिका को कुछ आराम हुआ, बैकपेन में कुछ राहत सी मिली. वाणी के आने से पहले वह सब संभाल तो रही थी पर जब से वाणी आई थी, उन का काम बहुत बढ़ गया था. पहले तो जो भी बनता था, तीनों खा लेते थे. पर वाणी के खानेपीने में खूब नखरे थे, उस के लिए कुछ अलग ही अचानक बनाना पड़ जाता था. मां, मां कर के कुछ फरमाइश करती तो लतिका कुछ मना कर ही न पाती थी. रात को सब डिनर कर रहे थे.

वाणी चुप सी थी. लतिका ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, बेटा? थक गई क्या? बहुत चुप हो.’’ ‘‘मां.’’ ‘‘हां, बोलो न.’’ ‘‘एक बात कहूं?’’ ‘‘अरे, बोलो न क्या हुआ?’’ ‘‘मां, मु झे उमा आंटी के हाथ का खाना उतना अच्छा नहीं लग रहा है.’’ ‘‘पर वह वैसे ही बनाती है जैसा मैं उसे बताती हूं.’’ ‘‘पर मां, आप जैसी रोटी नहीं है उन की.’’ मयंक ने कहा, ‘‘तो क्या हुआ, ये भी काफी अच्छी हैं.’’ ‘‘पर मु झे मां के हाथ की रोटी अच्छी लगती है न.’’ ‘‘चुपचाप खा लो वाणी, खाना अच्छा है,’’ मयंक ने फिर कहा. पर वाणी तो अपनी तरह की एक ही बहू थी, बोली, ‘‘मां, बस मेरे लिए 2 रोटी बना दोगी कल से? प्लीज.’’ लतिका को धक्का सा लगा, क्या है यह लड़की. सम झ ही नहीं आया क्या कहे. वाणी ने फिर कहा, ‘‘बस, मेरी 2 रोटी बनाने में तो आप को तकलीफ नहीं होगी न, मां?’’ मयंक ने कहा, ‘‘अरे, चुपचाप खा लो जैसी बनी है. एक तो तुम कुछ भी काम नहीं करतीं, क्यों मां का काम बढ़ाती रहती हो?’’ वाणी ने उसे घूरा, ‘‘तुम चुप रहो, मैं अपनी मां से बात कर रही हूं, तुम्हें क्या परेशानी है?’’ विनोद और लतिका एकदूसरे का मुंह देख रहे थे, क्या कहें अब. लतिका ने कह दिया, ‘‘हां, बना दूंगी.’’ ‘‘ओह मां, आप कितनी अच्छी हैं, बिलकुल मेरी मां की तरह.

वे भी मेरी हर बात मान जाती हैं,’’ कहतेकहते उठ कर लतिका के गले में बांहें डाल दीं वाणी ने. सोने से पहले वाणी को गरम दूध का गिलास पकड़ा कर लतिका कमरे में आईं. आंखों पर हाथ रख कर लेट गईं. आज दिनभर उन की तबीयत ढीली ही थी. विनोद ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘कुछ नहीं,’’ कहती वे मुसकराईं तो विनोद हंसे, ‘‘दूसरी बेटी के बारे में सोच रही हो न?’’ ‘‘सुनो.’’ ‘‘हां, बोलो न.’’ ‘‘क्या कोई उसे कह सकता है कि वह मु झे अपनी मां नहीं, सास ही सम झ ले. मैं सास ही भली,’’ दोनों हाथ जोड़ कर अपने माथे से लगा कर लतिका ने नाटकीय स्वर में कहा तो विनोद जोर से हंस पड़े.

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May 02, 2022 at 09:00AM

Mother’s Day 2022: खुश रहो गुड़िया- गुड़िया के साथ कैसी घटना घटी?

एक दिन पहले गुडि़या ने फोन किया था, ‘मम्मा, जाने क्यों पिछले कुछ दिनों से आप की बहुत याद आ रही है. राजीव की 2 दिन की छुट्टी है, हम लोग आप से मिलने आ रहे हैं.’

मैं ने रात को ही दहीबडे़ और आलू की कचौडि़यों की तैयारी कर के रख दी थी. मेरी बेटी गुडि़या, दामाद राजीव और दोनों नातिनें गीतूमीतू सुबह की ट्रेन से आ रहे थे पर सुबहसुबह ही टेलीविजन पर समाचार आया कि जिस ट्रेन से वे लोग आ रहे थे वह दुर्घटनाग्रस्त हो गई.

यह खबर सुनते ही मैं गश खा कर गिर पड़ी और पूरा परिवार सकते में था. पति, बेटा और बहू सब अपने दुखों पर नियंत्रण रख कर मुझे संभाल रहे थे. मैं रहरह कर अपनी चेतना खो बैठती थी.

चेतना जागृत होने पर यह क्रूर सचाई मेरे सामने थी कि मेरी गुडि़या अपनी अबोध गीतूमीतू और पति राजीव को छोड़ कर इस संसार से जा चुकी थी. समझाने वाले मुझे समझाते रहे पर मैं यह मानने को कहां तैयार थी कि मेरी गुडि़या अब हमारे बीच नहीं है और इसे स्वीकारने में मुझे वर्षों लग गए थे.

राजीव की आंखों में कैसा अजीब सा सूनापन उभर आया था और वह दोनों नन्ही कलियां इतनी नादान थीं कि उन्हें इस का अहसास तक नहीं था कि कुदरत ने उन के साथ कितना क्रूर खेल खेला है. उन की आंखें अपनी मां को ढूंढ़तेढूंढ़ते थक गईं. आखिर में उन के मन में धीरेधीरे मां की छवि धुंधली पड़तेपड़ते लुप्त सी हो गई और उन्होंने मां के बिना जीना सीख लिया.

दादी व बूआ के भरपूर लाड़प्यार के बावजूद मुझे गीतूमीतू अनाथ ही नजर आतीं. कभी दोपहर में बालकनी में खड़ी हो जाती तो देखती नन्हेमुन्ने बच्चे रंगबिरंगी यूनीफार्म में सजे अपनीअपनी मम्मी की उंगली पकड़ कर उछलतेकूदते स्कूल जा रहे हैं. उन्हें देख कर मेरे सीने में हूक सी उठती कि हाय, मेरी गीतूमीतू किस की उंगली पकड़ कर स्कूल जाएंगी. किस से मचलेंगी, किस से जिद करेंगी कि मम्मी, हमें टौफी दिला दो, हमें चिप्स दिला दो. और यही सब सोचते- सोचते मेरा मन भर उठता था.

जब से उड़ती- उड़ती सी यह खबर मेरे कानों में पड़ी है कि राजीव की मां अपने बेटे के पुन- र्विवाह की सोच रही हैं तो लगा किसी ने गरम शीशा मेरे कानोें में डाल दिया है. कई लड़की वाले अपनी अधेड़ बेटियों के लिए राजीव को विधुर और 2 बेटियों का बाप जान कर सहजप्राप्य समझने लगे थे.

राजीव की दूसरी शादी का मतलब था मासूम कलियों को विमाता के जुल्म व अत्याचार की आग में झोंकना. इस सोच ने मेरी बेचैनी को अपनी चरमसीमा पर पहुंचा दिया था. अब राजीव के पुनर्विवाह को रोकना मेरे लिए पहला और सब से अहम मकसद बन गया.

मैं ने अपनी चचेरी बहन, जो राजीव के घर से कुछ ही दूरी पर रहती थी, को सख्त हिदायत दे डाली कि किसी भी कीमत पर राजीव की दूसरी शादी नहीं होनी चाहिए. कोई लड़की वाला राजीव या उस के घरपरिवार के बारे में जानकारी हासिल करना चाहे तो उन की कमियां बताने में कोई कोरकसर न छोडे़.

राजीव के साथ अपनी बेटी की शादी की इच्छा ले कर जो भी मातापिता मेरे पास उन के घरपरिवार की जानकारी लेने आते, मैं उन के सामने उस परिवार के बुरे स्वभाव का कुछ ऐसा चित्र खींचती कि वह दोबारा वहां जाने का नाम नहीं लेते थे और अपनी इस सफलता पर मैं अपार संतुष्टि का अनुभव करती थी.

मेरे बहुत अनुरोध पर उस दिन राजीव गीतूमीतू को मुझ से मिलाने ले आया. इस बार वह काफी खीजा हुआ सा लग रहा था. बातबात में गीतूमीतू को झिड़क बैठता. पता नहीं, मेरे कुचक्रों से या किसी और वजह से उस का विवाह नहीं हो पा रहा था और वह एकाकी जीवन जीने को विवश था.

मेरी समधिन बारबार फोन पर मुझ से अनुरोध करतीं, ‘बहनजी, कोई अच्छी लड़की हो तो बताइएगा. मैं चाहती हूं कि मेरी आंखों के सामने राजीव का घर फिर से बस जाए. कल को बेटी सुधा भी ब्याह कर अपने घर चली जाएगी तो इन बच्चियों को संभालने वाला कोई तो चाहिए न.

प्रकट में तो मैं कुछ नहीं कहती पर मेरी गुडि़या के बच्चों को सौतेली मां मिले, यह मेरे दिल को मंजूर न था. आखिर तिनकातिनका जोड़ कर बसाए अपनी बेटी के घोंसले को मैं किसी और का होता हुआ कैसे देख सकती थी.

मेरी लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें यह पता लग गया कि राजीव का घर बसाने के मामले में जड़ काटने का काम मैं खुद कर रही हूं तो उन्हें सतर्क होना ही था और उन के सतर्क होने का नतीजा यह निकला कि राजीव ने अपनी सहकर्मी से विवाह कर लिया.

इस मनहूस खबर ने तो मुझे तोड़ कर ही रख दिया. हाय, अब मेरी गुडि़या के बच्चों का क्या होगा. अब मैं ने लगातार राजीव और उस की मां को कोसना शुरू कर दिया.

अब दिनोदिन मेरी बेचैनी बढ़ने लगी. जाने कितनी सौतेली मांओं के क्रूरता भरे किस्से मेरे दिमाग में कौंधते रहते और एक पल भी मुझे चैन न लेने देते. मन ही मन में गीतूमीतू को सौतेली मां की झिड़कियां खाते, पिटते और कई तरह के अत्याचारों को तसवीर में ढाल कर देखती रहती और अपनी बेबसी पर खून के आंसू रोती.

उस दिन मैं घर में अकेली ही थी. अचानक दरवाजे की घंटी बजी. मैं ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने जो खड़ा था उसे देख कर मेरी त्यौरियां चढ़ गईं. मैं तो दरवाजा ही बंद कर लेती पर बगल में मुसकराती गीतूमीतू को देख कर मैं अपने गुस्से को पी गई.

राजीव ने नमस्ते की और उस के साथ जो औरत खड़ी थी उस ने भी कुछ सकुचाते हुए हाथ जोड़ कर नजरें झुका लीं.

राजीव ने कुछ अपराधी मुद्रा में कहा, ‘मांजी, मुझे माफ कीजिएगा कि आप को बिना बताए मैं ने फिर से विवाह कर लिया. मैं तो यहां आने में संकोच का अनुभव कर रहा था पर नेहा की जिद थी कि वह आप से मिल कर आप का आशीर्वाद जरूर लेगी.

मैं ने क्रोध भरी नजरों से नेहा को देखा पर उस के होंठों पर सरल मुसकान खेल रही थी. उस ने अपने सिर पर गुलाबी साड़ी का पल्लू डाला और मेरे चरण स्पर्श करने को झुकी पर उसे आशीर्वाद देना तो दूर, मैं ने अपने कदमों को पीछे खींच लिया. नेहा ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई, शायद वह इस के लिए तैयार थी.

बहुत दिनों बाद गीतूमीतू को अनायास ही अपने पास पा कर अपनी ममता लुटाने का जो अवसर आज मुझे मिला था उसे मैं किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी इसलिए मजबूरीवश सब को अंदर आने के लिए कहना पड़ा.

राजीव तो बिना कहे ही सोफे पर बैठ गया और अपने माथे पर उभर आए पसीने को रूमाल से जज्ब करते हुए कहीं खो सा गया. गीतूमीतू ने खुद को टेलीविजन देखने में व्यस्त कर लिया पर नेहा थोड़ी देर ठिठकी सी खड़ी रही फिर स्वयं रसोई में जा कर सब के लिए पानी ले आई.

उस ने सब से पहले पानी के लिए मुझ से पूछा पर मैं ने बड़ी रुखाई से मना कर दिया. उस ने गीतूमीतू और राजीव को पानी पिलाया और फिर खुद पिया. इस के बाद मेरे रूखे व्यवहार की परवा न करते हुए वह मेरे पास ही बैठ गई.

पानी पी कर राजीव अचानक उठ कर बाहर चला गया. उस के चेहरे से मुझे लगा कि शायद यहां आ कर उस के मन में मेरी गुडि़या की याद ताजा हो गई थी पर अब क्या फायदा. मेरी गुडि़या से यदि वह इतना ही प्यार करता तो उस का स्थान किसी और को क्यों देता. और उस पर से मुझ से मिलाने के बहाने मेरे जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए उसे यहां ले आया है. मेरी सोच की लकीरें मेरे चेहरे पर शायद उभर आई थीं तभी नेहा उन लकीरों को पढ़ कर अपराधबोध से पीडि़त हो उठी.

अगले ही पल नेहा ने अपने चेहरे से अपराधभाव को उतार फेंका और सहज हो कर पूछने लगी, ‘मांजी, आप की तबीयत ठीक नहीं है शायद? मैं अभी चाय बना कर लाती हूं.’

राजीव बाहर से अपने को सहज कर वापस आ गया. गीतूमीतू दौड़ती हुई राजीव की गोद में चढ़ गईं. नेहा चाय और रसोई के डब्बों में से ढूंढ़ कर बिस्कुटनमकीन भी ले आई. सब से पहले उस ने चाय मुझे ही दी, न चाहते हुए भी मुझे चाय लेनी ही पड़ी.

मीतू अचानक राजीव की गोद से उतर कर नेहा की गोद में बैठ गई. बिस्कुट कुतरती मीतू बारबार नेहा से चिपकी जा रही थी और नेहा उस के माथे पर बिखर आई लटों को पीछे करते हुए उस का माथा सहला रही थी. मीतू का इस तरह दुलार होता देख गीतू भी नेहा की गोद में जगह बनाती हुई चढ़ बैठी और नेहा ने उसे भी अपने अंक में समेट लिया तो गीतूमीतू दोनों एकसाथ खिलखिला कर हंस पड़ीं. पता नहीं उन की हंसी मेरे रोने का सबब क्यों बन गई. मैं आंखों के कोरों में छलक आए आंसुओं को कतई न छिपा सकी.

तभी नेहा ने दोनों बच्चों को गोद से उतार कर आंखों ही आंखों में राजीव को जाने क्या इशारा किया कि वह दोनों बच्चों को ले कर बाहर चला गया. नेहा खाली हो गया कप जो अभी भी मेरे हाथों में ही था, को ले कर सारे बरतन समेट रसोई में रख आई और मेरे एकदम करीब आ कर बैठ गई. फिर मेरे हाथों को अपने कोमल हाथों में ले कर जैसे मुझे आश्वस्त करती हुई बोली, ‘मांजी, मैं आप का दुख समझ सकती हूं. आप ने अपने कलेजे के टुकडे़ को खोया है और मैं यह भी जानती हूं कि मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है. आप बेहद आशंकित हैं कि कहीं सौतेली मां आ कर आप की नातिनों पर अत्याचार करना न शुरू कर दे और उन के पिता को उन से दूर न कर दे.

‘मेरा विश्वास कीजिए मांजी, जब यह बात मुझे पता चली तो मैं ने मन में यह ठान लिया कि मैं आप से मिल कर आप की आशंका जरूर दूर करूंगी. सभी ने तो मुझे रोका था कि आप पता नहीं मुझ से कैसे पेश आएंगी लेकिन मुझे यह पता था कि आप का वह व्यवहार बच्चों की असुरक्षा की आशंका से ही प्रेरित होगा.’

मेरे हाथों पर नेहा के  कोमल हाथों का हल्का सा दबाव बढ़ा और थोड़ा रुक कर उस ने फिर कहना शुरू किया, ‘मांजी, आप अपने दिल से यह डर बिलकुल निकाल दीजिए कि मैं गीतू व मीतू के साथ बुरा सुलूक करूंगी. आप निश्ंिचत हो कर रहिए ताकि आप का स्वास्थ्य सुधर सके,’ नेहा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा कर मेरा कंधा थपथपाया और मेरी आंखों में झांकती हुई बोली, ‘मांजी, मेरी विनती है कि मुझे भी आप अपनी बेटी जैसी ही समझें. मेरा आप से वादा है कि आप बच्चों से मिलने को नहीं तरसेंगी. हम उन्हें आप से मिलाने लाते रहेंगे.’

नेहा की बात समाप्त भी न होने पाई थी कि राजीव व बच्चे आ गए. दोनों बच्चे दौड़ कर नेहा की टांगों से लिपट गए और ‘मम्मी घर चलो,’ ‘मम्मी घर चलो’ की रट लगाने लगे.

नेहा ने उन्हें गोद में बिठाते हुए कहा, ‘चलते हैं बेटे, पहले आप नानी मां को नमस्ते करो.’

गीतूमीतू ने एकसाथ अपनी छोटीछोटी हथेलियां जोड़ कर तोतली भाषा में मुझे नमस्ते की. मेरे अंदर जमा शिलाखंड पिघलने को आतुर होता सा जान पड़ा. राजीव व नेहा ने चलने की इजाजत मांगी.

उन्हें कुछ पल रुकने को कह कर मैं अंदर गई और अलमारी से गीतूमीतू को देने के लिए 100-100 के 2 नोट निकाले तो लिफाफे के नीचे से झांकती नीली कांजीवरम् की साड़ी ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया. साड़ी देखते ही मेरी आंखें भर आईं क्योंकि यह साड़ी मैं अपनी गुडि़या को देने के लिए लाई थी. साड़ी का स्पर्श करते ही मेरे हाथ कांपने लगे पर न जाने कैसे मैं वह साड़ी उठा लाई और टीके की थाली भी लगा लाई.

टीके के बाद मेरे पैर छू कर नेहा ने मीतू को गोद में उठाया और गीतू की उंगली पकड़ कर आटो में बैठने चल दी. आटो में बैठने से पहले नेहा ने मुझे पीछे मुड़ कर देखा. पता नहीं उस की आंखों में मैं ने क्या देखा कि मेरी आंखें झरझर बरसने लगीं. आंसुओं के सैलाब ने आंखों को इतना धुंधला कर दिया कि कुछ भी दिखना संभव न रहा.

जब धुंध छंटी तो सामने से जाती नेहा में मुझे अपनी गुडि़या की छवि का कुछकुछ आभास होने लगा. अब मुझे लगने लगा कि गुडि़या के जाने के बाद मैं जिस डर व आशंका के साथ जी रही थी वह कितना बेमानी था.

एक सवाल मन को मथे जा रहा था कि मैं जो करने जा रही थी क्या वह उचित था?

आज नेहा से मिल कर ऐसा लगा कि मेरी समधिन ने मुझ से छिपा कर राजीव का पुनर्विवाह कर के बहुत ही अच्छा काम किया, वरना मैं तो अपनी नातिनों की भलाई सोच कर उन का बुरा करने ही जा रही थी. कभी अपनी हार भी इतनी सुखदाई हो सकती है यह मैं ने आज नेहा से मिलने के बाद जाना. राजीव के चेहरे पर छाई संतुष्टि और गीतूमीतू के लिए नेहा के हृदय से छलकता ममता का सागर देख कर मैं भावविभोर थी.

मैं यह सोचने पर विवश थी, कितना बड़ा दिल है नेहा का. एक तो उसे विधुर पति मिला और उस पर से 2 अबोध बच्चियों के पालनपोषण की जिम्मेदारी. फिर भी वह मुझे मनाने चली आई. मुझे नेहा अपने से बहुत बड़ी लगने लगी.

अब मुझ से और नहीं रहा गया. बहुत दिनों बाद मैं ने राजीव के यहां फोन लगाया. रुंधे कंठ से इतना ही पूछ पाई, ‘‘ठीक से पहुंच गई थीं, बेटी?’’

‘‘जी, मम्मीजी,’’ नेहा का भी गला भर आया था. मेरे गले और दिल से एकसाथ निकला, ‘‘खुश रहो, मेरी गुडि़या.’’

 

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एक दिन पहले गुडि़या ने फोन किया था, ‘मम्मा, जाने क्यों पिछले कुछ दिनों से आप की बहुत याद आ रही है. राजीव की 2 दिन की छुट्टी है, हम लोग आप से मिलने आ रहे हैं.’

मैं ने रात को ही दहीबडे़ और आलू की कचौडि़यों की तैयारी कर के रख दी थी. मेरी बेटी गुडि़या, दामाद राजीव और दोनों नातिनें गीतूमीतू सुबह की ट्रेन से आ रहे थे पर सुबहसुबह ही टेलीविजन पर समाचार आया कि जिस ट्रेन से वे लोग आ रहे थे वह दुर्घटनाग्रस्त हो गई.

यह खबर सुनते ही मैं गश खा कर गिर पड़ी और पूरा परिवार सकते में था. पति, बेटा और बहू सब अपने दुखों पर नियंत्रण रख कर मुझे संभाल रहे थे. मैं रहरह कर अपनी चेतना खो बैठती थी.

चेतना जागृत होने पर यह क्रूर सचाई मेरे सामने थी कि मेरी गुडि़या अपनी अबोध गीतूमीतू और पति राजीव को छोड़ कर इस संसार से जा चुकी थी. समझाने वाले मुझे समझाते रहे पर मैं यह मानने को कहां तैयार थी कि मेरी गुडि़या अब हमारे बीच नहीं है और इसे स्वीकारने में मुझे वर्षों लग गए थे.

राजीव की आंखों में कैसा अजीब सा सूनापन उभर आया था और वह दोनों नन्ही कलियां इतनी नादान थीं कि उन्हें इस का अहसास तक नहीं था कि कुदरत ने उन के साथ कितना क्रूर खेल खेला है. उन की आंखें अपनी मां को ढूंढ़तेढूंढ़ते थक गईं. आखिर में उन के मन में धीरेधीरे मां की छवि धुंधली पड़तेपड़ते लुप्त सी हो गई और उन्होंने मां के बिना जीना सीख लिया.

दादी व बूआ के भरपूर लाड़प्यार के बावजूद मुझे गीतूमीतू अनाथ ही नजर आतीं. कभी दोपहर में बालकनी में खड़ी हो जाती तो देखती नन्हेमुन्ने बच्चे रंगबिरंगी यूनीफार्म में सजे अपनीअपनी मम्मी की उंगली पकड़ कर उछलतेकूदते स्कूल जा रहे हैं. उन्हें देख कर मेरे सीने में हूक सी उठती कि हाय, मेरी गीतूमीतू किस की उंगली पकड़ कर स्कूल जाएंगी. किस से मचलेंगी, किस से जिद करेंगी कि मम्मी, हमें टौफी दिला दो, हमें चिप्स दिला दो. और यही सब सोचते- सोचते मेरा मन भर उठता था.

जब से उड़ती- उड़ती सी यह खबर मेरे कानों में पड़ी है कि राजीव की मां अपने बेटे के पुन- र्विवाह की सोच रही हैं तो लगा किसी ने गरम शीशा मेरे कानोें में डाल दिया है. कई लड़की वाले अपनी अधेड़ बेटियों के लिए राजीव को विधुर और 2 बेटियों का बाप जान कर सहजप्राप्य समझने लगे थे.

राजीव की दूसरी शादी का मतलब था मासूम कलियों को विमाता के जुल्म व अत्याचार की आग में झोंकना. इस सोच ने मेरी बेचैनी को अपनी चरमसीमा पर पहुंचा दिया था. अब राजीव के पुनर्विवाह को रोकना मेरे लिए पहला और सब से अहम मकसद बन गया.

मैं ने अपनी चचेरी बहन, जो राजीव के घर से कुछ ही दूरी पर रहती थी, को सख्त हिदायत दे डाली कि किसी भी कीमत पर राजीव की दूसरी शादी नहीं होनी चाहिए. कोई लड़की वाला राजीव या उस के घरपरिवार के बारे में जानकारी हासिल करना चाहे तो उन की कमियां बताने में कोई कोरकसर न छोडे़.

राजीव के साथ अपनी बेटी की शादी की इच्छा ले कर जो भी मातापिता मेरे पास उन के घरपरिवार की जानकारी लेने आते, मैं उन के सामने उस परिवार के बुरे स्वभाव का कुछ ऐसा चित्र खींचती कि वह दोबारा वहां जाने का नाम नहीं लेते थे और अपनी इस सफलता पर मैं अपार संतुष्टि का अनुभव करती थी.

मेरे बहुत अनुरोध पर उस दिन राजीव गीतूमीतू को मुझ से मिलाने ले आया. इस बार वह काफी खीजा हुआ सा लग रहा था. बातबात में गीतूमीतू को झिड़क बैठता. पता नहीं, मेरे कुचक्रों से या किसी और वजह से उस का विवाह नहीं हो पा रहा था और वह एकाकी जीवन जीने को विवश था.

मेरी समधिन बारबार फोन पर मुझ से अनुरोध करतीं, ‘बहनजी, कोई अच्छी लड़की हो तो बताइएगा. मैं चाहती हूं कि मेरी आंखों के सामने राजीव का घर फिर से बस जाए. कल को बेटी सुधा भी ब्याह कर अपने घर चली जाएगी तो इन बच्चियों को संभालने वाला कोई तो चाहिए न.

प्रकट में तो मैं कुछ नहीं कहती पर मेरी गुडि़या के बच्चों को सौतेली मां मिले, यह मेरे दिल को मंजूर न था. आखिर तिनकातिनका जोड़ कर बसाए अपनी बेटी के घोंसले को मैं किसी और का होता हुआ कैसे देख सकती थी.

मेरी लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें यह पता लग गया कि राजीव का घर बसाने के मामले में जड़ काटने का काम मैं खुद कर रही हूं तो उन्हें सतर्क होना ही था और उन के सतर्क होने का नतीजा यह निकला कि राजीव ने अपनी सहकर्मी से विवाह कर लिया.

इस मनहूस खबर ने तो मुझे तोड़ कर ही रख दिया. हाय, अब मेरी गुडि़या के बच्चों का क्या होगा. अब मैं ने लगातार राजीव और उस की मां को कोसना शुरू कर दिया.

अब दिनोदिन मेरी बेचैनी बढ़ने लगी. जाने कितनी सौतेली मांओं के क्रूरता भरे किस्से मेरे दिमाग में कौंधते रहते और एक पल भी मुझे चैन न लेने देते. मन ही मन में गीतूमीतू को सौतेली मां की झिड़कियां खाते, पिटते और कई तरह के अत्याचारों को तसवीर में ढाल कर देखती रहती और अपनी बेबसी पर खून के आंसू रोती.

उस दिन मैं घर में अकेली ही थी. अचानक दरवाजे की घंटी बजी. मैं ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने जो खड़ा था उसे देख कर मेरी त्यौरियां चढ़ गईं. मैं तो दरवाजा ही बंद कर लेती पर बगल में मुसकराती गीतूमीतू को देख कर मैं अपने गुस्से को पी गई.

राजीव ने नमस्ते की और उस के साथ जो औरत खड़ी थी उस ने भी कुछ सकुचाते हुए हाथ जोड़ कर नजरें झुका लीं.

राजीव ने कुछ अपराधी मुद्रा में कहा, ‘मांजी, मुझे माफ कीजिएगा कि आप को बिना बताए मैं ने फिर से विवाह कर लिया. मैं तो यहां आने में संकोच का अनुभव कर रहा था पर नेहा की जिद थी कि वह आप से मिल कर आप का आशीर्वाद जरूर लेगी.

मैं ने क्रोध भरी नजरों से नेहा को देखा पर उस के होंठों पर सरल मुसकान खेल रही थी. उस ने अपने सिर पर गुलाबी साड़ी का पल्लू डाला और मेरे चरण स्पर्श करने को झुकी पर उसे आशीर्वाद देना तो दूर, मैं ने अपने कदमों को पीछे खींच लिया. नेहा ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई, शायद वह इस के लिए तैयार थी.

बहुत दिनों बाद गीतूमीतू को अनायास ही अपने पास पा कर अपनी ममता लुटाने का जो अवसर आज मुझे मिला था उसे मैं किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी इसलिए मजबूरीवश सब को अंदर आने के लिए कहना पड़ा.

राजीव तो बिना कहे ही सोफे पर बैठ गया और अपने माथे पर उभर आए पसीने को रूमाल से जज्ब करते हुए कहीं खो सा गया. गीतूमीतू ने खुद को टेलीविजन देखने में व्यस्त कर लिया पर नेहा थोड़ी देर ठिठकी सी खड़ी रही फिर स्वयं रसोई में जा कर सब के लिए पानी ले आई.

उस ने सब से पहले पानी के लिए मुझ से पूछा पर मैं ने बड़ी रुखाई से मना कर दिया. उस ने गीतूमीतू और राजीव को पानी पिलाया और फिर खुद पिया. इस के बाद मेरे रूखे व्यवहार की परवा न करते हुए वह मेरे पास ही बैठ गई.

पानी पी कर राजीव अचानक उठ कर बाहर चला गया. उस के चेहरे से मुझे लगा कि शायद यहां आ कर उस के मन में मेरी गुडि़या की याद ताजा हो गई थी पर अब क्या फायदा. मेरी गुडि़या से यदि वह इतना ही प्यार करता तो उस का स्थान किसी और को क्यों देता. और उस पर से मुझ से मिलाने के बहाने मेरे जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए उसे यहां ले आया है. मेरी सोच की लकीरें मेरे चेहरे पर शायद उभर आई थीं तभी नेहा उन लकीरों को पढ़ कर अपराधबोध से पीडि़त हो उठी.

अगले ही पल नेहा ने अपने चेहरे से अपराधभाव को उतार फेंका और सहज हो कर पूछने लगी, ‘मांजी, आप की तबीयत ठीक नहीं है शायद? मैं अभी चाय बना कर लाती हूं.’

राजीव बाहर से अपने को सहज कर वापस आ गया. गीतूमीतू दौड़ती हुई राजीव की गोद में चढ़ गईं. नेहा चाय और रसोई के डब्बों में से ढूंढ़ कर बिस्कुटनमकीन भी ले आई. सब से पहले उस ने चाय मुझे ही दी, न चाहते हुए भी मुझे चाय लेनी ही पड़ी.

मीतू अचानक राजीव की गोद से उतर कर नेहा की गोद में बैठ गई. बिस्कुट कुतरती मीतू बारबार नेहा से चिपकी जा रही थी और नेहा उस के माथे पर बिखर आई लटों को पीछे करते हुए उस का माथा सहला रही थी. मीतू का इस तरह दुलार होता देख गीतू भी नेहा की गोद में जगह बनाती हुई चढ़ बैठी और नेहा ने उसे भी अपने अंक में समेट लिया तो गीतूमीतू दोनों एकसाथ खिलखिला कर हंस पड़ीं. पता नहीं उन की हंसी मेरे रोने का सबब क्यों बन गई. मैं आंखों के कोरों में छलक आए आंसुओं को कतई न छिपा सकी.

तभी नेहा ने दोनों बच्चों को गोद से उतार कर आंखों ही आंखों में राजीव को जाने क्या इशारा किया कि वह दोनों बच्चों को ले कर बाहर चला गया. नेहा खाली हो गया कप जो अभी भी मेरे हाथों में ही था, को ले कर सारे बरतन समेट रसोई में रख आई और मेरे एकदम करीब आ कर बैठ गई. फिर मेरे हाथों को अपने कोमल हाथों में ले कर जैसे मुझे आश्वस्त करती हुई बोली, ‘मांजी, मैं आप का दुख समझ सकती हूं. आप ने अपने कलेजे के टुकडे़ को खोया है और मैं यह भी जानती हूं कि मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है. आप बेहद आशंकित हैं कि कहीं सौतेली मां आ कर आप की नातिनों पर अत्याचार करना न शुरू कर दे और उन के पिता को उन से दूर न कर दे.

‘मेरा विश्वास कीजिए मांजी, जब यह बात मुझे पता चली तो मैं ने मन में यह ठान लिया कि मैं आप से मिल कर आप की आशंका जरूर दूर करूंगी. सभी ने तो मुझे रोका था कि आप पता नहीं मुझ से कैसे पेश आएंगी लेकिन मुझे यह पता था कि आप का वह व्यवहार बच्चों की असुरक्षा की आशंका से ही प्रेरित होगा.’

मेरे हाथों पर नेहा के  कोमल हाथों का हल्का सा दबाव बढ़ा और थोड़ा रुक कर उस ने फिर कहना शुरू किया, ‘मांजी, आप अपने दिल से यह डर बिलकुल निकाल दीजिए कि मैं गीतू व मीतू के साथ बुरा सुलूक करूंगी. आप निश्ंिचत हो कर रहिए ताकि आप का स्वास्थ्य सुधर सके,’ नेहा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा कर मेरा कंधा थपथपाया और मेरी आंखों में झांकती हुई बोली, ‘मांजी, मेरी विनती है कि मुझे भी आप अपनी बेटी जैसी ही समझें. मेरा आप से वादा है कि आप बच्चों से मिलने को नहीं तरसेंगी. हम उन्हें आप से मिलाने लाते रहेंगे.’

नेहा की बात समाप्त भी न होने पाई थी कि राजीव व बच्चे आ गए. दोनों बच्चे दौड़ कर नेहा की टांगों से लिपट गए और ‘मम्मी घर चलो,’ ‘मम्मी घर चलो’ की रट लगाने लगे.

नेहा ने उन्हें गोद में बिठाते हुए कहा, ‘चलते हैं बेटे, पहले आप नानी मां को नमस्ते करो.’

गीतूमीतू ने एकसाथ अपनी छोटीछोटी हथेलियां जोड़ कर तोतली भाषा में मुझे नमस्ते की. मेरे अंदर जमा शिलाखंड पिघलने को आतुर होता सा जान पड़ा. राजीव व नेहा ने चलने की इजाजत मांगी.

उन्हें कुछ पल रुकने को कह कर मैं अंदर गई और अलमारी से गीतूमीतू को देने के लिए 100-100 के 2 नोट निकाले तो लिफाफे के नीचे से झांकती नीली कांजीवरम् की साड़ी ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया. साड़ी देखते ही मेरी आंखें भर आईं क्योंकि यह साड़ी मैं अपनी गुडि़या को देने के लिए लाई थी. साड़ी का स्पर्श करते ही मेरे हाथ कांपने लगे पर न जाने कैसे मैं वह साड़ी उठा लाई और टीके की थाली भी लगा लाई.

टीके के बाद मेरे पैर छू कर नेहा ने मीतू को गोद में उठाया और गीतू की उंगली पकड़ कर आटो में बैठने चल दी. आटो में बैठने से पहले नेहा ने मुझे पीछे मुड़ कर देखा. पता नहीं उस की आंखों में मैं ने क्या देखा कि मेरी आंखें झरझर बरसने लगीं. आंसुओं के सैलाब ने आंखों को इतना धुंधला कर दिया कि कुछ भी दिखना संभव न रहा.

जब धुंध छंटी तो सामने से जाती नेहा में मुझे अपनी गुडि़या की छवि का कुछकुछ आभास होने लगा. अब मुझे लगने लगा कि गुडि़या के जाने के बाद मैं जिस डर व आशंका के साथ जी रही थी वह कितना बेमानी था.

एक सवाल मन को मथे जा रहा था कि मैं जो करने जा रही थी क्या वह उचित था?

आज नेहा से मिल कर ऐसा लगा कि मेरी समधिन ने मुझ से छिपा कर राजीव का पुनर्विवाह कर के बहुत ही अच्छा काम किया, वरना मैं तो अपनी नातिनों की भलाई सोच कर उन का बुरा करने ही जा रही थी. कभी अपनी हार भी इतनी सुखदाई हो सकती है यह मैं ने आज नेहा से मिलने के बाद जाना. राजीव के चेहरे पर छाई संतुष्टि और गीतूमीतू के लिए नेहा के हृदय से छलकता ममता का सागर देख कर मैं भावविभोर थी.

मैं यह सोचने पर विवश थी, कितना बड़ा दिल है नेहा का. एक तो उसे विधुर पति मिला और उस पर से 2 अबोध बच्चियों के पालनपोषण की जिम्मेदारी. फिर भी वह मुझे मनाने चली आई. मुझे नेहा अपने से बहुत बड़ी लगने लगी.

अब मुझ से और नहीं रहा गया. बहुत दिनों बाद मैं ने राजीव के यहां फोन लगाया. रुंधे कंठ से इतना ही पूछ पाई, ‘‘ठीक से पहुंच गई थीं, बेटी?’’

‘‘जी, मम्मीजी,’’ नेहा का भी गला भर आया था. मेरे गले और दिल से एकसाथ निकला, ‘‘खुश रहो, मेरी गुडि़या.’’

 

The post Mother’s Day 2022: खुश रहो गुड़िया- गुड़िया के साथ कैसी घटना घटी? appeared first on Sarita Magazine.

May 02, 2022 at 08:00AM