Friday, 4 March 2022

हाशिए पर कायदे- भाग 1: क्या आर्यन और मीनल एक हो सके?

जगदंबा इंडस्ट्री के मालिक की बेटी मीनल का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जा रहा था, केक काटा जा रहा था, तभी उस का दुपट्टा मोमबत्ती की लौ से छू गया. वहां अफरातफरी मच गई. रमन चद्दर लेने दौड़ा तो आर्यन ने आ कर उस के दुपट्टा और गाउन को उस से अलग किया. इस सब में आर्यन के हाथ जल गए थे. ठीक होने के बाद जब मीनल आर्यन से मिली तो उस का जला हुआ हाथ देख कर पिघल उठी और प्यार का अंकुर फूट गया.  यही प्यार हिंदूमुसलिम समाज के ठेकेदारों को रास न आया. क्या आर्यन और मीनल इतना सख्त विरोध के बावजूद एक हो सके?

नहाने के बाद मीनल जब शरीर पर बौडी लोशन लगाने लगी तो सीने के दाहिनी तरफ जा कर अचानक हाथ वहां आ कर थम गए, जहां एक सफेद निशान झांक रहा था. जले का वो निशान कब उन के प्रेम की निशानी बन गया था, वह आज भी सोचती है तो रोमांचित हो उठती है.

आर्यन के साथ उस की शादी कितनी फिल्मी थी. सामाजिक स्तर में भारी अंतर के साथसाथ शिक्षा से ले कर धर्म और जाति जैसे और भी बहुत से कारक थे, जो उन के रिश्ते के बीच बाधा बने हुए थे. लेकिन उस ने भी हिम्मत नहीं छोड़ी थी और आखिर उस बाधा दौड़ को जीत कर ही दम लिया था.

“अरे बेगम, घर में एक ही गुसलखाना है और बंदे को भी नहाना है. जरा जल्दी करेंगी आप?” आर्यन की आवाज सुन कर मीनल वर्तमान में आई. उस के इसी नफासत भरे लहजे पर तो फिदा थी मीनल. वह मुसकराती हुई फटाफट कपड़े पहन कर बाहर निकल आई. आर्यन बाथरूम के दरवाजे पर ही मिल गया. उस ने मीनल को एक भरपूर निगाह से देखा और आंखों ही आंखों में प्यार बरसाता हुआ नहाने चला गया.

“ये सारी बातें याद करने के लिए तो पूरी दोपहर बाकी है. अभी तो आर्यन को औफिस भेजना ज्यादा जरूरी है,” सोचते हुए मीनल रसोई में जा कर नाश्ता बनाने लगी. अभी उसे आर्यन का टिफिन भी बनाना था.

आर्यन के औफिस जाने के बाद मीनल लगभग पूरी दोपहर खाली सी ही रहती है. क्या हुआ जो कभी किसी फ्रेंड का फोन आ जाए या फिर कभी शौपिंग जाने के अलावा उसे दिनभर में कोई विशेष काम नहीं होता. काम हो तो सकता है, लेकिन आर्यन का बहुत मन था कि उस की पत्नी घर की रानी बन कर रहे, इसलिए उस ने मीनल के सामने अपनी इच्छा जाहिर की और मीनल ने भी इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया था.

ये भी पढ़ें- गोधरा में गोदनामा: किसने उसे जीने का सहारा दिया?

पढ़ीलिखी एमबीए लड़की का घर पर खाली बैठना हालांकि आज के जमाने के हिसाब से और ट्रेंड से थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन प्यार में चांदसितारों से झोली भरने वाले आशिक डौलर्स की परवाह कहां करते हैं. मीनल की झोली भी आर्यन के प्यार से लबालब थी. और इसी प्यार पर वह सबकुछ वारने को तैयार थी. उसे कोई मलाल नहीं था कि वह महज एक हाउस वाइफ बन कर जी रही है.

“मैं जब भी अकेली होती हूं, तुम चुपके से आ जाते हो… और झांक के मेरी आंखों में बीते दिन याद दिलाते हो…” अकसर दोपहर में बिस्तर पर लेटी मीनल यह गाना गुनगुनाती रहती है और इस के साथ ही वह यादों का एक लंबा सफर भी तय कर आती है. कमाल की बात तो ये है कि हर रोज इतना लंबा सफर तय करने के बाद भी मीनल न तो कभी थकती है और ना ही कभी बोर होती है. आज भी बंद कमरे में चौबीस के तापमान पर आराम फरमाती मीनल अपने सफर पर निकल पड़ी.

बात कालेज के दिनों की है. मीनल का फ्रेंड सर्किल बहुत बड़ा था. कुछ तो पिता का अथाह पैसा और रुतबा और कुछ उस की खूबसूरती… मीनल का चुंबकीय क्षेत्र इतना सघन था कि हर कोई खिंचा चला आता था. मीनल यह बात बहुत अच्छे से जानती थी कि उस के चुंबकीय क्षेत्र में आने वाला व्यक्ति उस के रूप और रुतबे से आकर्षित होता है. उसे तलाश एक सच्चे साथी की थी, जो उस के स्टेटस से नहीं, बल्कि खुद उस से प्यार करे. वह उसे तब भी प्यार करे, जब उस का स्टेटस ना रहे. वह यह भी जानती थी कि ऐसे साथी को पहचानना खुद उस के लिए भी आसान नहीं होगा क्योंकि खालिस दोस्तों की पहचान संकट के समय ही होती है और ऊपर वाला ऐसा न करे कि उस पर कभी कोई संकट आए.

बात मीनल के जन्मदिन की है. दूरनजदीक के मिला कर कुल पचास दोस्तों का आंकड़ा तो अवश्य ही होगा. पार्टी के लिए लखनऊ के मशहूर ताज महल होटल का हाल बुक करवाया गया था. हाल की दीवारों पर सजी गुलाब की ताजा कलियां माहौल को रूमानी बना रही थीं. दो पौंड का ब्लू बेरी केक, जिस पर “हैप्पी बर्थडे मीनल” लिखा था, हाल के बीचोंबीच रखी गोल टेबल की शोभा बढ़ा रहा था. चाकू और छोटी मोमबत्ती के साथसाथ एक अन्य मोमबत्ती, जिसे माचिस दिखाते ही सितारों की झड़ी लग जाती है, भी केक के पास ही रखे थे. सब मीनल के आने का इंतजार कर रहे थे. वह अपने घर से रवाना हो चुकी थी और बस किसी भी वक्त आने ही वाली थी.

ये भी पढ़ें- परीक्षा: क्या हुआ जब खटपट की वजह से सुषमा मायके को तैयार हो गई?

जैसे ही पोर्च में मीनल की गाड़ी के रुकने की आवाज आई, हाल की तमाम बत्तियां गुल कर दी गईं. दीवारों को टटोलते हुए मीनल आगे बढ़ रही थी कि अचानक राह में बाधा आने के कारण उसे रुकना पड़ा. वह रुकी ही थी कि हाल रोशनी से जगमगा उठा. म्यूजिक सिस्टम पर “हैप्पी बर्थडे टू यू सांग” बजने लगा और मीनल फूलों की बरसात में नहा उठी.

मीनल के दोस्तों ने ताली बजा कर उस का स्वागत किया. आसमानी रंग के इवनिंग गाउन में मीनल नील परी सी लग रही थी. फर्श को चूमता उस का दुपट्टा उसे शाही लुक दे रहा था.

मीनल केक वाली टेबल के पास आ कर खड़ी हो गई. एक दोस्त ने दोनों मोमबत्तियां केक पर लगा दीं. पहले सितारे बिखेरने वाली मोमबत्ती जली और हाल में तेज रोशनी हो गई.

मीनल ने इतरा कर अपने दोस्तों की तरफ निगाह दौड़ाई. टेबल के आसपास केक के सब से पास वाले घेरे में रमन, साक्षी, श्वेता, विशाल, कृष और मेघा जैसे मीनल के परम मित्र कहलाने वाले दोस्त खड़े थे. उन के पीछे अन्य कुछ कम खास मित्र थे. और सब से पीछे आखिर वाली पंक्ति में आर्यन भी खड़ा मुसकरा रहा था. मीनल ने हाथ में चाकू लिया और कमर को झुका कर बड़ी अदा के साथ अपने गोलगोल किए होंठ जलती हुई मोमबत्ती की तरफ बढ़ा दिए. हाल में उपस्थित सभी लोगों ने केक कटते ही ताली बजाने के लिए अपने हाथों की पोजीशन ले ली. इस से पहले कि मीनल अपनी फूंक से जलती हुई मोमबत्ती को बुझाती, उस का नेट का दुपट्टा हवा में लहराता हुआ मोमबत्ती की लौ को छू गया.

सब अवाक खड़े थे. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. रमन “पानी लाओ-पानी लाओ” चिल्ला रहा था, तभी श्वेता ने मीनल का जलता हुआ दुपट्टा खींच कर परे फेंक दिया, लेकिन अब तक आग ने मीनल के ब्लाउज वाले हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया था.

जलन और डर के मारे मीनल चिल्ला रही थी. रमन चद्दर लेने के लिए कमरे की तरफ दौड़ा, इतने में भीड़ को चीरता हुआ आर्यन आगे आया और उस ने मीनल का गाउन हाथ से खींच कर फाड़ डाला. आर्यन ने फटे हुए गाउन के ऊपरी हिस्से को मीनल के शरीर से अलग कर दिया. अब वह आग से तो आजाद थी, लेकिन ब्लाउज वाला भाग हटते ही उस के अंतर्वस्त्र और शरीर के स्त्री अंग भी दिखने लगे थे. शर्म के मारे उस ने अपने हाथों से शरीर को ढकने का प्रयास किया, लेकिन असफल रही. सब की आँखें शर्म से नीची हो गईं. कुछ ने अपने चेहरे भी दूसरी दिशा में घुमा लिए. तभी रमन चद्दर ले कर आ गया और साक्षी मीनल को उस चद्दर में लपेट कर कमरे में ले गई.

इस हादसे में किसी ने नहीं देखा कि आर्यन के हाथ भी झुलस गए थे. वह अपने हाथ नल के बहते पानी के नीचे रखे उन की जलन कम करने की कोशिश कर रहा था.

पार्टी के रंग में भंग हो गया. मीनल का शर्म और घबराहट के मारे बुरा हाल था. दोस्तों ने उसे घर ड्राप किया और एक हादसे को अपने साथ लिए अपनेअपने घर चले गए.

मीनल को हालांकि आग से कोई नुकसान नहीं हुआ था, बस सीने के दाहिनी तरह बांह के नीचे कपड़े के चिपक जाने से वहां की स्किन झुलस गई थी. कुछ दिन दवाओं और इलाज से वह घाव पूरी तरह ठीक हो गया था, लेकिन जले का निशान रह गया था.

डाक्टर के अनुसार इस तरह के निशान जाते से ही जाएंगे. हो सकता है, ना भी जाएं, स्थायी ही हो जाएं.
सप्ताहभर बाद जब मीनल कालेज पहुंची, तो सब से पहले आर्यन से मिली. वह उसे थैंक्स कहना चाहती थी. मीनल ने उस की झुलसी हुई हथेलियां देखी थीं, पीड़ा से भर उठी.

“अरे, तुम्हारे हाथ तो बुरी तरह से झुलस गए. किसी डाक्टर को दिखाया क्या?” मीनल ने उस की हथेलियां अपने हाथों में ले लीं. आज उसे ये हाथ किसी मसीहा के लग रहे थे. उधर आर्यन था कि शर्म से गड़ा जा रहा था.

“अरे मोहतरमा, ये कुछ खास नहीं. हमें तो इतना ताप सहने की आदत है. अब्बू का लोहे का कारखाना है ना,” कहते हुए आर्यन ने अपने हाथ खींच लिए. मीनल कृतज्ञता से उसे देखती रही.

इस के बाद मीनल का स्वाभाविक झुकाव आर्यन की तरफ होने लगा. जब तक उस की हथेलियां पूरी तरह से ठीक नहीं हुईं, मीनल नोट्स बनाने में उस की मदद करती रही.

हालांकि इसे प्यार का पहला पायदान कह सकते हैं, लेकिन मीनल को अहसास नहीं था कि वह इस पर कदम रख चुकी है. आर्यन की तरफ उस के रुझान को देखते हुए मीनल के कई साथियों ने उसे “लव जिहाद” का मामला बता कर उस से दूर रहने की सलाह दी.

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जगदंबा इंडस्ट्री के मालिक की बेटी मीनल का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जा रहा था, केक काटा जा रहा था, तभी उस का दुपट्टा मोमबत्ती की लौ से छू गया. वहां अफरातफरी मच गई. रमन चद्दर लेने दौड़ा तो आर्यन ने आ कर उस के दुपट्टा और गाउन को उस से अलग किया. इस सब में आर्यन के हाथ जल गए थे. ठीक होने के बाद जब मीनल आर्यन से मिली तो उस का जला हुआ हाथ देख कर पिघल उठी और प्यार का अंकुर फूट गया.  यही प्यार हिंदूमुसलिम समाज के ठेकेदारों को रास न आया. क्या आर्यन और मीनल इतना सख्त विरोध के बावजूद एक हो सके?

नहाने के बाद मीनल जब शरीर पर बौडी लोशन लगाने लगी तो सीने के दाहिनी तरफ जा कर अचानक हाथ वहां आ कर थम गए, जहां एक सफेद निशान झांक रहा था. जले का वो निशान कब उन के प्रेम की निशानी बन गया था, वह आज भी सोचती है तो रोमांचित हो उठती है.

आर्यन के साथ उस की शादी कितनी फिल्मी थी. सामाजिक स्तर में भारी अंतर के साथसाथ शिक्षा से ले कर धर्म और जाति जैसे और भी बहुत से कारक थे, जो उन के रिश्ते के बीच बाधा बने हुए थे. लेकिन उस ने भी हिम्मत नहीं छोड़ी थी और आखिर उस बाधा दौड़ को जीत कर ही दम लिया था.

“अरे बेगम, घर में एक ही गुसलखाना है और बंदे को भी नहाना है. जरा जल्दी करेंगी आप?” आर्यन की आवाज सुन कर मीनल वर्तमान में आई. उस के इसी नफासत भरे लहजे पर तो फिदा थी मीनल. वह मुसकराती हुई फटाफट कपड़े पहन कर बाहर निकल आई. आर्यन बाथरूम के दरवाजे पर ही मिल गया. उस ने मीनल को एक भरपूर निगाह से देखा और आंखों ही आंखों में प्यार बरसाता हुआ नहाने चला गया.

“ये सारी बातें याद करने के लिए तो पूरी दोपहर बाकी है. अभी तो आर्यन को औफिस भेजना ज्यादा जरूरी है,” सोचते हुए मीनल रसोई में जा कर नाश्ता बनाने लगी. अभी उसे आर्यन का टिफिन भी बनाना था.

आर्यन के औफिस जाने के बाद मीनल लगभग पूरी दोपहर खाली सी ही रहती है. क्या हुआ जो कभी किसी फ्रेंड का फोन आ जाए या फिर कभी शौपिंग जाने के अलावा उसे दिनभर में कोई विशेष काम नहीं होता. काम हो तो सकता है, लेकिन आर्यन का बहुत मन था कि उस की पत्नी घर की रानी बन कर रहे, इसलिए उस ने मीनल के सामने अपनी इच्छा जाहिर की और मीनल ने भी इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया था.

ये भी पढ़ें- गोधरा में गोदनामा: किसने उसे जीने का सहारा दिया?

पढ़ीलिखी एमबीए लड़की का घर पर खाली बैठना हालांकि आज के जमाने के हिसाब से और ट्रेंड से थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन प्यार में चांदसितारों से झोली भरने वाले आशिक डौलर्स की परवाह कहां करते हैं. मीनल की झोली भी आर्यन के प्यार से लबालब थी. और इसी प्यार पर वह सबकुछ वारने को तैयार थी. उसे कोई मलाल नहीं था कि वह महज एक हाउस वाइफ बन कर जी रही है.

“मैं जब भी अकेली होती हूं, तुम चुपके से आ जाते हो… और झांक के मेरी आंखों में बीते दिन याद दिलाते हो…” अकसर दोपहर में बिस्तर पर लेटी मीनल यह गाना गुनगुनाती रहती है और इस के साथ ही वह यादों का एक लंबा सफर भी तय कर आती है. कमाल की बात तो ये है कि हर रोज इतना लंबा सफर तय करने के बाद भी मीनल न तो कभी थकती है और ना ही कभी बोर होती है. आज भी बंद कमरे में चौबीस के तापमान पर आराम फरमाती मीनल अपने सफर पर निकल पड़ी.

बात कालेज के दिनों की है. मीनल का फ्रेंड सर्किल बहुत बड़ा था. कुछ तो पिता का अथाह पैसा और रुतबा और कुछ उस की खूबसूरती… मीनल का चुंबकीय क्षेत्र इतना सघन था कि हर कोई खिंचा चला आता था. मीनल यह बात बहुत अच्छे से जानती थी कि उस के चुंबकीय क्षेत्र में आने वाला व्यक्ति उस के रूप और रुतबे से आकर्षित होता है. उसे तलाश एक सच्चे साथी की थी, जो उस के स्टेटस से नहीं, बल्कि खुद उस से प्यार करे. वह उसे तब भी प्यार करे, जब उस का स्टेटस ना रहे. वह यह भी जानती थी कि ऐसे साथी को पहचानना खुद उस के लिए भी आसान नहीं होगा क्योंकि खालिस दोस्तों की पहचान संकट के समय ही होती है और ऊपर वाला ऐसा न करे कि उस पर कभी कोई संकट आए.

बात मीनल के जन्मदिन की है. दूरनजदीक के मिला कर कुल पचास दोस्तों का आंकड़ा तो अवश्य ही होगा. पार्टी के लिए लखनऊ के मशहूर ताज महल होटल का हाल बुक करवाया गया था. हाल की दीवारों पर सजी गुलाब की ताजा कलियां माहौल को रूमानी बना रही थीं. दो पौंड का ब्लू बेरी केक, जिस पर “हैप्पी बर्थडे मीनल” लिखा था, हाल के बीचोंबीच रखी गोल टेबल की शोभा बढ़ा रहा था. चाकू और छोटी मोमबत्ती के साथसाथ एक अन्य मोमबत्ती, जिसे माचिस दिखाते ही सितारों की झड़ी लग जाती है, भी केक के पास ही रखे थे. सब मीनल के आने का इंतजार कर रहे थे. वह अपने घर से रवाना हो चुकी थी और बस किसी भी वक्त आने ही वाली थी.

ये भी पढ़ें- परीक्षा: क्या हुआ जब खटपट की वजह से सुषमा मायके को तैयार हो गई?

जैसे ही पोर्च में मीनल की गाड़ी के रुकने की आवाज आई, हाल की तमाम बत्तियां गुल कर दी गईं. दीवारों को टटोलते हुए मीनल आगे बढ़ रही थी कि अचानक राह में बाधा आने के कारण उसे रुकना पड़ा. वह रुकी ही थी कि हाल रोशनी से जगमगा उठा. म्यूजिक सिस्टम पर “हैप्पी बर्थडे टू यू सांग” बजने लगा और मीनल फूलों की बरसात में नहा उठी.

मीनल के दोस्तों ने ताली बजा कर उस का स्वागत किया. आसमानी रंग के इवनिंग गाउन में मीनल नील परी सी लग रही थी. फर्श को चूमता उस का दुपट्टा उसे शाही लुक दे रहा था.

मीनल केक वाली टेबल के पास आ कर खड़ी हो गई. एक दोस्त ने दोनों मोमबत्तियां केक पर लगा दीं. पहले सितारे बिखेरने वाली मोमबत्ती जली और हाल में तेज रोशनी हो गई.

मीनल ने इतरा कर अपने दोस्तों की तरफ निगाह दौड़ाई. टेबल के आसपास केक के सब से पास वाले घेरे में रमन, साक्षी, श्वेता, विशाल, कृष और मेघा जैसे मीनल के परम मित्र कहलाने वाले दोस्त खड़े थे. उन के पीछे अन्य कुछ कम खास मित्र थे. और सब से पीछे आखिर वाली पंक्ति में आर्यन भी खड़ा मुसकरा रहा था. मीनल ने हाथ में चाकू लिया और कमर को झुका कर बड़ी अदा के साथ अपने गोलगोल किए होंठ जलती हुई मोमबत्ती की तरफ बढ़ा दिए. हाल में उपस्थित सभी लोगों ने केक कटते ही ताली बजाने के लिए अपने हाथों की पोजीशन ले ली. इस से पहले कि मीनल अपनी फूंक से जलती हुई मोमबत्ती को बुझाती, उस का नेट का दुपट्टा हवा में लहराता हुआ मोमबत्ती की लौ को छू गया.

सब अवाक खड़े थे. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. रमन “पानी लाओ-पानी लाओ” चिल्ला रहा था, तभी श्वेता ने मीनल का जलता हुआ दुपट्टा खींच कर परे फेंक दिया, लेकिन अब तक आग ने मीनल के ब्लाउज वाले हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया था.

जलन और डर के मारे मीनल चिल्ला रही थी. रमन चद्दर लेने के लिए कमरे की तरफ दौड़ा, इतने में भीड़ को चीरता हुआ आर्यन आगे आया और उस ने मीनल का गाउन हाथ से खींच कर फाड़ डाला. आर्यन ने फटे हुए गाउन के ऊपरी हिस्से को मीनल के शरीर से अलग कर दिया. अब वह आग से तो आजाद थी, लेकिन ब्लाउज वाला भाग हटते ही उस के अंतर्वस्त्र और शरीर के स्त्री अंग भी दिखने लगे थे. शर्म के मारे उस ने अपने हाथों से शरीर को ढकने का प्रयास किया, लेकिन असफल रही. सब की आँखें शर्म से नीची हो गईं. कुछ ने अपने चेहरे भी दूसरी दिशा में घुमा लिए. तभी रमन चद्दर ले कर आ गया और साक्षी मीनल को उस चद्दर में लपेट कर कमरे में ले गई.

इस हादसे में किसी ने नहीं देखा कि आर्यन के हाथ भी झुलस गए थे. वह अपने हाथ नल के बहते पानी के नीचे रखे उन की जलन कम करने की कोशिश कर रहा था.

पार्टी के रंग में भंग हो गया. मीनल का शर्म और घबराहट के मारे बुरा हाल था. दोस्तों ने उसे घर ड्राप किया और एक हादसे को अपने साथ लिए अपनेअपने घर चले गए.

मीनल को हालांकि आग से कोई नुकसान नहीं हुआ था, बस सीने के दाहिनी तरह बांह के नीचे कपड़े के चिपक जाने से वहां की स्किन झुलस गई थी. कुछ दिन दवाओं और इलाज से वह घाव पूरी तरह ठीक हो गया था, लेकिन जले का निशान रह गया था.

डाक्टर के अनुसार इस तरह के निशान जाते से ही जाएंगे. हो सकता है, ना भी जाएं, स्थायी ही हो जाएं.
सप्ताहभर बाद जब मीनल कालेज पहुंची, तो सब से पहले आर्यन से मिली. वह उसे थैंक्स कहना चाहती थी. मीनल ने उस की झुलसी हुई हथेलियां देखी थीं, पीड़ा से भर उठी.

“अरे, तुम्हारे हाथ तो बुरी तरह से झुलस गए. किसी डाक्टर को दिखाया क्या?” मीनल ने उस की हथेलियां अपने हाथों में ले लीं. आज उसे ये हाथ किसी मसीहा के लग रहे थे. उधर आर्यन था कि शर्म से गड़ा जा रहा था.

“अरे मोहतरमा, ये कुछ खास नहीं. हमें तो इतना ताप सहने की आदत है. अब्बू का लोहे का कारखाना है ना,” कहते हुए आर्यन ने अपने हाथ खींच लिए. मीनल कृतज्ञता से उसे देखती रही.

इस के बाद मीनल का स्वाभाविक झुकाव आर्यन की तरफ होने लगा. जब तक उस की हथेलियां पूरी तरह से ठीक नहीं हुईं, मीनल नोट्स बनाने में उस की मदद करती रही.

हालांकि इसे प्यार का पहला पायदान कह सकते हैं, लेकिन मीनल को अहसास नहीं था कि वह इस पर कदम रख चुकी है. आर्यन की तरफ उस के रुझान को देखते हुए मीनल के कई साथियों ने उसे “लव जिहाद” का मामला बता कर उस से दूर रहने की सलाह दी.

The post हाशिए पर कायदे- भाग 1: क्या आर्यन और मीनल एक हो सके? appeared first on Sarita Magazine.

March 05, 2022 at 10:29AM

होली के रंग: उस दिन सुजाता ने क्या किया?

वह होली का दिन था जब सुबहसवेरे नितिन ने सुजाता से कहा था, ‘मां, मैं अन्नू के घर जा रहा हूं.’ ‘आज और अभी? क्या तुम्हारा अभी जाना ठीक रहेगा?’ सुजाता ने नितिन से पूछा.

‘हां, मां, अभी होली का हुड़दंग शुरू नहीं हुआ है, अभी रास्ते में परेशानी नहीं होगी,’ नितिन ने एक पुरानी कमीज पहनते हुए कहा.

‘लेकिन, आज त्योहार है, बेटा,’ सुजाता यह सोच कर घबरा उठी थी कि अगर नितिन चला गया तो उस के सिवा इस घर में कौन बचेगा? सूना घर उसे काटने को दौड़ेगा. कैसे झेल सकेगी वह इस सूनेपन को? घर के बाहर की दुनिया होली के उत्साह भरे कोलाहल में डूबी रहेगी मगर घर के भीतर श्मशान का सन्नाटा छाया रहेगा. नहीं…नहीं, उस से यह सब सहन नहीं होगा. सुजाता ने घबरा कर नितिन को एक बार फिर रोकने का प्रयास किया.

‘बेटा, अन्नू तो अपने मायके में होली मनाना चाहती थी इसलिए मैं ने उसे नहीं रोका लेकिन अब तू भी उस के पास चला जाएग तो तेरी यह बूढ़ी मां यहां अकेली रह जाएगी. अगर तू रुक सके तो…’

‘नहीं मां, अन्नू का फोन आया था वह चाहती है कि मैं उस के साथ उस के मायके में होली मनाऊं…और मां, अन्नू की छोटी बहन वीनू भी जिद कर रही थी कि जीजाजी, आप चले आइए. अब, अगर मैं नहीं जाऊंगा तो वे लोग नाराज हो जाएंगे,’ नितिन ने अपने जूते का तस्मा बांधते हुए उत्तर दिया.

‘ठीक है बेटा, जैसे तेरी इच्छा,’ सुजाता ने धीरे से स्वीकृति में अपना सिर हिलाते हुए कहा.

‘बात इच्छा की नहीं मां, और फिर तुम होली खेलती ही कहां हो जो मेरा यहां रहना जरूरी है,’ नितिन की कही यह बात सुजाता की दुखती रग को छू गई थी.

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नितिन अन्नू के घर चला गया. अब सूना घर और सुजाता एकदूसरे से जूझने लगे. नितिन का आखिरी वाक्य सुजाता के मन में बारबार कौंध रहा था… ‘और फिर तुम होली खेलती ही कहां हो…’

लगभग 12 साल पहले, उस दिन भी होली के हुड़दंगी सड़कों पर ‘होली है.’ ‘होली है’ का शोर मचाते हुए घूम रहे थे. उस समय नितिन 14 साल का था और सुनीति 10 साल की थी. दोनों बच्चे बहुत छोटे तो नहीं थे लेकिन होली का त्योहार बड़ेबूढ़ों को भी बच्चा बना देता है.

नितिन और सुनीति सेवेरे से उत्साहित थे. सुजाता जानती थी कि उस की भाभी को उन दोनों बच्चों का यों खेलनाकूदना रास नहीं आता है. फिर भी वह बच्चों को मना नहीं कर पाई. जब बच्चे होली के रंग से सराबोर हो कर घर लौटे तो सब से पहले दौड़ कर अपनी मां सुजाता से लिपट गए. सुजाता के कपड़े भी उन के शरीर पर लगे रंगों से रंग गए. उसी समय भाभी आ धमकीं. भाभी अपनी सहेलियों के साथ होली खेल कर चली आ रही थीं लेकिन वे सुजाता और उस के बच्चों को देख कर भड़क उठीं.

‘यह देखो, कैसा जमाना आ गया है…अब तुझे इतना भी धरम- करम याद नहीं रहा कि विधवाएं रंग नहीं खेलती हैं. जैसे तू वैसी तेरी औलादें. मैं तो तंग आ गई हूं तुम सब से. इतना ही होली खेलने का शौक है तो दूसरा घर बसा ले, फिर जी भर कर होली खेलना,’ भाभी ने कहना शुरू किया और फिर देर तक अपने मन की भड़ास निकालती रहीं.

सुजाता ने उसी दिन तय कर लिया था कि चाहे जो भी हो मगर वह अपने भाई के घर किसी शरणार्थी की भांति जीवन नहीं व्यतीत करेगी और न ही कभी होली खेलेगी. जब उस के जीवन में ही सुहाग का रंग नहीं रहा तो वह रंग खेल कर करेगी भी क्या? वह छोटीमोटी कोई भी नौकरी कर लेगी मगर अपने बच्चों को अपने दम पर पढ़ाएगी, पालेगी.

सुजाता ने उसी शाम को अपने भाई का घर छोड़ दिया था और अपने दोनों बच्चों को ले कर अपनी एक सहेली के घर जा पहुंची थी. उस की सहेली ने उसे दूसरे दिन ही एक सिलाई सेंटर में काम दिला दिया था. अपनी मेहनत और लगन के दम पर सुजाता ने जल्दी ही अपना स्वयं का सिलाई सेंटर खोल लिया. इस तरह सुजाता के जीवन की गाड़ी चल निकली थी. उस ने अपने दोनों बच्चों को पढ़ाया और एकएक कर के दोनों का विवाह भी कर दिया. पहले नितिन की शादी हुई और अन्नू बहू के रूप में घर आई. इस के बाद सुनीति की शादी हुई और वह अपने ससुराल चली गई.

कुछ ही महीने बाद सुनीति के पति को विदेश में नौकरी मिल गई और सुनीति भी अपने पति के साथ विदेश चली गई. सुजाता के लिए लेदे कर नितिन और अन्नू का ही सहारा बचा लेकिन अन्नू को सुजाता का सादा जीवन बिलकुल रास नहीं आया. ऊपर से तो वह कुछ कहती नहीं है लेकिन भीतर ही भीतर नितिन को भड़काती रहती है कि वह अपनी मां से अलग रहने लगे.

सुजाता सबकुछ देखती, समझती हुई भी मौन रह जाती है. कहे भी तो क्या? अपने भाई का घर छोड़ने के साथ ही मानो वह जीवन के रंगों को भी छोड़ आई. अब उसे कोई भी रंग नहीं भाता है. अन्नू का भी इस में उसे कोई दोष नजर नहीं आता. आखिर नई उम्र की अन्नू रंगों से, जीवन के उल्लास से नाता रखना ही चाहेगी. भला वह क्यों नीरस, बेरंग जीवन जिए?

सुजाता, अन्नू और नितिन को किसी बात के लिए कभी मना नहीं करती. जब नितिन को हनीमून पर जाने के लिए छुट्टियां नहीं मिल पा रही थीं तो उस ने खुद ही नितिन से कहा था कि वह प्रतिदिन शाम को दफ्तर से घर लौटने के बाद अन्नू को कहीं घुमाने ले जाया करे ताकि उसे हनीमून पर न जा पाने का दुख न हो.

सुजाता की तमाम अभिलाषाएं मानो मर चुकी थीं. वह न तो कभी सिनेमा देखने जाती और न कहीं घूमने. सुजाता के रूप में घर के वातावरण में एक अव्यक्त उदासी छाई रहती और इसी उदासी से अन्नू को चिढ़ होती. परिवार का एक व्यक्ति हमेशा एक उदासी ओढ़े रहे तो बाकी सदस्य भला कैसे हंस बोल सकते हैं? एक मर्यादा उन्हें भी हंसने, चहकने से रोकती. इसीलिए अपने विवाह के बाद की यह तीसरी होली अन्नू ने अपने मायके में मनाने का निश्चय किया. सुजाता चाह कर भी उसे रोक न सकी. रोकती भी तो भला किस आधार पर? सभी को अपनी खुशियां अपने ढंग से मनाने का अधिकार होता है, अन्नू को भी है.

अन्नू अपने मायके गई, वह तो ठीक है लेकिन अब नितिन भी अन्नू के पास चला गया है. पति छूटा, मायका छूटा और अब बच्चे भी उस से दूर होते जा रहे हैं, यह सोच कर सुजाता की आंखें डबडबा गईं. अकेलापन उसे चुभने लगा. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? तभी दरवाजे की घंटी ने उसे चौंका दिया.

कौन आया होगा? सुजाता सोचती हुई दरवाजे के पास पहुंची. उस ने ‘स्पाईआई’ से झांक कर देखा. बाहर 1-2 चेहरे नजर आए लेकिन रंगों से पुते हुए. पहचानना कठिन था. दरवाजा खोले या न खोले? पल दो पल सुजाता ने सोचा, फिर उसे एक परिचित सी आवाज सुनाई दी. शायद यह उस के पड़ोस में रहने वाली मनोरमा की बेटी दिव्या की आवाज थी. सुजाता ने दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही 7-8 लड़केलड़कियां भीतर चले आए.

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‘‘होली मुबारक हो, आंटी,’’ वे समवेत स्वर में बोल उठे. उन में से एक लड़के ने आगे बढ़ कर सुजाता के माथे पर गुलाल लगाया और झुक कर पैर छू लिया. उस के बाद एक लड़की आगे आई. उस ने सुजाता के माथे पर गुलाल लगातेलगाते गालों को भी रंग दिया. चंद ही पलों में वहां का दृश्य बदल गया. वे सारे लड़केलड़कियां सुजाता को खींच कर बाहर ले गए और उस के साथ होली खेलने लगे. पहले तो सुजाता ने झिझकते हुए कहा, ‘‘नहींनहीं, रंग मत लगाओ. मैं विधवा हूं.’’

‘‘ओह आंटी, आप भी कैसी दकियानूसी बातें करती हैं,’’ दिव्या ने सुजाता को झिड़क दिया और बाकी लड़कियां उसे रंग लगाने लगीं. सुजाता भी अपनेआप को रोक नहीं सकी, वह भी उन के चेहरों पर रंग लगाने लगी.

होली के रंगों ने उस के भीतर घिरे हुए अंधेरे को मानो साफ कर दिया. वह अपने भीतर हलकापन महसूस करने लगी. अचानक उसे झटका सा लगा. वह अवाक् खड़ी सी रह गई. नितिन और अन्नू उस के सामने खड़े थे. अब क्या अन्नू भी कहेगी कि ‘विधवाएं रंग नहीं खेलतीं.’

तभी अन्नू और नितिन ने आगे बढ़ कर उस के पैर छू लिए.

‘‘मुझे क्षमा कर दीजिए, मां. जो काम इन लोगों ने किया वह मुझे करना चाहिए था. मगर मैं आप के अकेलेपन को समझ नहीं सकी. हर इनसान के भीतर उत्साह के स्रोत पाए जाते हैं, यह तो परिस्थितियां हैं जो उन्हें दबाए रहती हैं. मैं आप की परिस्थितियों को समझ नहीं पाई और आप को उत्साहहीन मानती रही, जबकि आप के भीतर उत्साह जगाना तो हमारा कर्तव्य था न,’’ अन्नू ने सुजाता से कहा.

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‘‘हां मां, आज मुझे भी अपनी गलती का एहसास हुआ और इसीलिए हम दोनों लौट आए. मैं ने आप को हमेशा ताना मारा कि आप होली नहीं खेलती हैं मगर मैं ने भी तो आप के साथ कभी होली नहीं खेली. अब तक होली के रंग भले ही आप से दूर थे लेकिन अब ये आप से दूर नहीं रहेंगे,’’ यह कहते हुए नितिन ने ढेर सारा गुलाल मां के सिर में डाल दिया.

‘‘गलती मेरी भी है. मुझे भी किसी बात को यों पकड़ कर नहीं बैठ जाना चाहिए था. भाभी ने जो भी कहा था वह उन का अपना विचार था, उन के विचारों को आत्मसम्मान का प्रश्न बना कर मुझे भी जीवन के रंगों से यों मुंह नहीं मोड़ना चाहिए था. कम से कम तुम बच्चों की खुशियों को ध्यान में रखते हुए तो हरगिज नहीं,’’ सुजाता ने भी मुट्ठी भर गुलाल अन्नू के चेहरे पर मल दिया. अन्नू खुशी से खिलखिला कर हंस पड़ी.

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‘होली है’ के स्वर से सारा वातावरण गूंज उठा. सुजाता के जीवन में खुशियां एक बार फिर झूम उठीं.

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वह होली का दिन था जब सुबहसवेरे नितिन ने सुजाता से कहा था, ‘मां, मैं अन्नू के घर जा रहा हूं.’ ‘आज और अभी? क्या तुम्हारा अभी जाना ठीक रहेगा?’ सुजाता ने नितिन से पूछा.

‘हां, मां, अभी होली का हुड़दंग शुरू नहीं हुआ है, अभी रास्ते में परेशानी नहीं होगी,’ नितिन ने एक पुरानी कमीज पहनते हुए कहा.

‘लेकिन, आज त्योहार है, बेटा,’ सुजाता यह सोच कर घबरा उठी थी कि अगर नितिन चला गया तो उस के सिवा इस घर में कौन बचेगा? सूना घर उसे काटने को दौड़ेगा. कैसे झेल सकेगी वह इस सूनेपन को? घर के बाहर की दुनिया होली के उत्साह भरे कोलाहल में डूबी रहेगी मगर घर के भीतर श्मशान का सन्नाटा छाया रहेगा. नहीं…नहीं, उस से यह सब सहन नहीं होगा. सुजाता ने घबरा कर नितिन को एक बार फिर रोकने का प्रयास किया.

‘बेटा, अन्नू तो अपने मायके में होली मनाना चाहती थी इसलिए मैं ने उसे नहीं रोका लेकिन अब तू भी उस के पास चला जाएग तो तेरी यह बूढ़ी मां यहां अकेली रह जाएगी. अगर तू रुक सके तो…’

‘नहीं मां, अन्नू का फोन आया था वह चाहती है कि मैं उस के साथ उस के मायके में होली मनाऊं…और मां, अन्नू की छोटी बहन वीनू भी जिद कर रही थी कि जीजाजी, आप चले आइए. अब, अगर मैं नहीं जाऊंगा तो वे लोग नाराज हो जाएंगे,’ नितिन ने अपने जूते का तस्मा बांधते हुए उत्तर दिया.

‘ठीक है बेटा, जैसे तेरी इच्छा,’ सुजाता ने धीरे से स्वीकृति में अपना सिर हिलाते हुए कहा.

‘बात इच्छा की नहीं मां, और फिर तुम होली खेलती ही कहां हो जो मेरा यहां रहना जरूरी है,’ नितिन की कही यह बात सुजाता की दुखती रग को छू गई थी.

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नितिन अन्नू के घर चला गया. अब सूना घर और सुजाता एकदूसरे से जूझने लगे. नितिन का आखिरी वाक्य सुजाता के मन में बारबार कौंध रहा था… ‘और फिर तुम होली खेलती ही कहां हो…’

लगभग 12 साल पहले, उस दिन भी होली के हुड़दंगी सड़कों पर ‘होली है.’ ‘होली है’ का शोर मचाते हुए घूम रहे थे. उस समय नितिन 14 साल का था और सुनीति 10 साल की थी. दोनों बच्चे बहुत छोटे तो नहीं थे लेकिन होली का त्योहार बड़ेबूढ़ों को भी बच्चा बना देता है.

नितिन और सुनीति सेवेरे से उत्साहित थे. सुजाता जानती थी कि उस की भाभी को उन दोनों बच्चों का यों खेलनाकूदना रास नहीं आता है. फिर भी वह बच्चों को मना नहीं कर पाई. जब बच्चे होली के रंग से सराबोर हो कर घर लौटे तो सब से पहले दौड़ कर अपनी मां सुजाता से लिपट गए. सुजाता के कपड़े भी उन के शरीर पर लगे रंगों से रंग गए. उसी समय भाभी आ धमकीं. भाभी अपनी सहेलियों के साथ होली खेल कर चली आ रही थीं लेकिन वे सुजाता और उस के बच्चों को देख कर भड़क उठीं.

‘यह देखो, कैसा जमाना आ गया है…अब तुझे इतना भी धरम- करम याद नहीं रहा कि विधवाएं रंग नहीं खेलती हैं. जैसे तू वैसी तेरी औलादें. मैं तो तंग आ गई हूं तुम सब से. इतना ही होली खेलने का शौक है तो दूसरा घर बसा ले, फिर जी भर कर होली खेलना,’ भाभी ने कहना शुरू किया और फिर देर तक अपने मन की भड़ास निकालती रहीं.

सुजाता ने उसी दिन तय कर लिया था कि चाहे जो भी हो मगर वह अपने भाई के घर किसी शरणार्थी की भांति जीवन नहीं व्यतीत करेगी और न ही कभी होली खेलेगी. जब उस के जीवन में ही सुहाग का रंग नहीं रहा तो वह रंग खेल कर करेगी भी क्या? वह छोटीमोटी कोई भी नौकरी कर लेगी मगर अपने बच्चों को अपने दम पर पढ़ाएगी, पालेगी.

सुजाता ने उसी शाम को अपने भाई का घर छोड़ दिया था और अपने दोनों बच्चों को ले कर अपनी एक सहेली के घर जा पहुंची थी. उस की सहेली ने उसे दूसरे दिन ही एक सिलाई सेंटर में काम दिला दिया था. अपनी मेहनत और लगन के दम पर सुजाता ने जल्दी ही अपना स्वयं का सिलाई सेंटर खोल लिया. इस तरह सुजाता के जीवन की गाड़ी चल निकली थी. उस ने अपने दोनों बच्चों को पढ़ाया और एकएक कर के दोनों का विवाह भी कर दिया. पहले नितिन की शादी हुई और अन्नू बहू के रूप में घर आई. इस के बाद सुनीति की शादी हुई और वह अपने ससुराल चली गई.

कुछ ही महीने बाद सुनीति के पति को विदेश में नौकरी मिल गई और सुनीति भी अपने पति के साथ विदेश चली गई. सुजाता के लिए लेदे कर नितिन और अन्नू का ही सहारा बचा लेकिन अन्नू को सुजाता का सादा जीवन बिलकुल रास नहीं आया. ऊपर से तो वह कुछ कहती नहीं है लेकिन भीतर ही भीतर नितिन को भड़काती रहती है कि वह अपनी मां से अलग रहने लगे.

सुजाता सबकुछ देखती, समझती हुई भी मौन रह जाती है. कहे भी तो क्या? अपने भाई का घर छोड़ने के साथ ही मानो वह जीवन के रंगों को भी छोड़ आई. अब उसे कोई भी रंग नहीं भाता है. अन्नू का भी इस में उसे कोई दोष नजर नहीं आता. आखिर नई उम्र की अन्नू रंगों से, जीवन के उल्लास से नाता रखना ही चाहेगी. भला वह क्यों नीरस, बेरंग जीवन जिए?

सुजाता, अन्नू और नितिन को किसी बात के लिए कभी मना नहीं करती. जब नितिन को हनीमून पर जाने के लिए छुट्टियां नहीं मिल पा रही थीं तो उस ने खुद ही नितिन से कहा था कि वह प्रतिदिन शाम को दफ्तर से घर लौटने के बाद अन्नू को कहीं घुमाने ले जाया करे ताकि उसे हनीमून पर न जा पाने का दुख न हो.

सुजाता की तमाम अभिलाषाएं मानो मर चुकी थीं. वह न तो कभी सिनेमा देखने जाती और न कहीं घूमने. सुजाता के रूप में घर के वातावरण में एक अव्यक्त उदासी छाई रहती और इसी उदासी से अन्नू को चिढ़ होती. परिवार का एक व्यक्ति हमेशा एक उदासी ओढ़े रहे तो बाकी सदस्य भला कैसे हंस बोल सकते हैं? एक मर्यादा उन्हें भी हंसने, चहकने से रोकती. इसीलिए अपने विवाह के बाद की यह तीसरी होली अन्नू ने अपने मायके में मनाने का निश्चय किया. सुजाता चाह कर भी उसे रोक न सकी. रोकती भी तो भला किस आधार पर? सभी को अपनी खुशियां अपने ढंग से मनाने का अधिकार होता है, अन्नू को भी है.

अन्नू अपने मायके गई, वह तो ठीक है लेकिन अब नितिन भी अन्नू के पास चला गया है. पति छूटा, मायका छूटा और अब बच्चे भी उस से दूर होते जा रहे हैं, यह सोच कर सुजाता की आंखें डबडबा गईं. अकेलापन उसे चुभने लगा. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? तभी दरवाजे की घंटी ने उसे चौंका दिया.

कौन आया होगा? सुजाता सोचती हुई दरवाजे के पास पहुंची. उस ने ‘स्पाईआई’ से झांक कर देखा. बाहर 1-2 चेहरे नजर आए लेकिन रंगों से पुते हुए. पहचानना कठिन था. दरवाजा खोले या न खोले? पल दो पल सुजाता ने सोचा, फिर उसे एक परिचित सी आवाज सुनाई दी. शायद यह उस के पड़ोस में रहने वाली मनोरमा की बेटी दिव्या की आवाज थी. सुजाता ने दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही 7-8 लड़केलड़कियां भीतर चले आए.

ये भी पढ़ें- दांव पर भविष्य

‘‘होली मुबारक हो, आंटी,’’ वे समवेत स्वर में बोल उठे. उन में से एक लड़के ने आगे बढ़ कर सुजाता के माथे पर गुलाल लगाया और झुक कर पैर छू लिया. उस के बाद एक लड़की आगे आई. उस ने सुजाता के माथे पर गुलाल लगातेलगाते गालों को भी रंग दिया. चंद ही पलों में वहां का दृश्य बदल गया. वे सारे लड़केलड़कियां सुजाता को खींच कर बाहर ले गए और उस के साथ होली खेलने लगे. पहले तो सुजाता ने झिझकते हुए कहा, ‘‘नहींनहीं, रंग मत लगाओ. मैं विधवा हूं.’’

‘‘ओह आंटी, आप भी कैसी दकियानूसी बातें करती हैं,’’ दिव्या ने सुजाता को झिड़क दिया और बाकी लड़कियां उसे रंग लगाने लगीं. सुजाता भी अपनेआप को रोक नहीं सकी, वह भी उन के चेहरों पर रंग लगाने लगी.

होली के रंगों ने उस के भीतर घिरे हुए अंधेरे को मानो साफ कर दिया. वह अपने भीतर हलकापन महसूस करने लगी. अचानक उसे झटका सा लगा. वह अवाक् खड़ी सी रह गई. नितिन और अन्नू उस के सामने खड़े थे. अब क्या अन्नू भी कहेगी कि ‘विधवाएं रंग नहीं खेलतीं.’

तभी अन्नू और नितिन ने आगे बढ़ कर उस के पैर छू लिए.

‘‘मुझे क्षमा कर दीजिए, मां. जो काम इन लोगों ने किया वह मुझे करना चाहिए था. मगर मैं आप के अकेलेपन को समझ नहीं सकी. हर इनसान के भीतर उत्साह के स्रोत पाए जाते हैं, यह तो परिस्थितियां हैं जो उन्हें दबाए रहती हैं. मैं आप की परिस्थितियों को समझ नहीं पाई और आप को उत्साहहीन मानती रही, जबकि आप के भीतर उत्साह जगाना तो हमारा कर्तव्य था न,’’ अन्नू ने सुजाता से कहा.

ये भी पढ़ें- सच्ची परख : शेफाली रात के अंधेरे में किसे निहार रही थी

‘‘हां मां, आज मुझे भी अपनी गलती का एहसास हुआ और इसीलिए हम दोनों लौट आए. मैं ने आप को हमेशा ताना मारा कि आप होली नहीं खेलती हैं मगर मैं ने भी तो आप के साथ कभी होली नहीं खेली. अब तक होली के रंग भले ही आप से दूर थे लेकिन अब ये आप से दूर नहीं रहेंगे,’’ यह कहते हुए नितिन ने ढेर सारा गुलाल मां के सिर में डाल दिया.

‘‘गलती मेरी भी है. मुझे भी किसी बात को यों पकड़ कर नहीं बैठ जाना चाहिए था. भाभी ने जो भी कहा था वह उन का अपना विचार था, उन के विचारों को आत्मसम्मान का प्रश्न बना कर मुझे भी जीवन के रंगों से यों मुंह नहीं मोड़ना चाहिए था. कम से कम तुम बच्चों की खुशियों को ध्यान में रखते हुए तो हरगिज नहीं,’’ सुजाता ने भी मुट्ठी भर गुलाल अन्नू के चेहरे पर मल दिया. अन्नू खुशी से खिलखिला कर हंस पड़ी.

ये भी पढ़ें- अल्का : ममता ने किसकी बात सुनकर बयोडाटा देखा

‘होली है’ के स्वर से सारा वातावरण गूंज उठा. सुजाता के जीवन में खुशियां एक बार फिर झूम उठीं.

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March 05, 2022 at 09:00AM

Thursday, 3 March 2022

कोरा कागज: माता-पिता की सख्ती से घर से भागे राहुल के साथ क्या हुआ?

Writer- Sudha Jugran

राहुल औफिस से घर आया तो पत्नी माला की कमेंट्री शुरू हो गई, ‘‘पता है, हमारे पड़ोसी शर्माजी का टिंकू घर से भाग गया.’’

‘‘भाग गया? कहां?’’ राहुल चौंक कर बोला.

‘‘पता नहीं, स्कूल की तो आजकल छुट्टी है. सुबह दोस्त के घर जाने की बात कह कर गया था. तब से घर नहीं आया.’’

‘‘अरे, कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई. पुलिस में रिपोर्ट की या नहीं?’’ राहुल डर से कांप उठा.

‘‘हां, पुलिस में रिपोर्ट तो कर दी पर 13-14 साल का नादान बच्चा न जाने कहां घूम रहा होगा. कहीं गलत हाथों में न पड़ जाए. नाराज हो कर गया है. कल रात उस को बहुत डांट पड़ी थी, पढ़ाई के कारण. उस की मां तो बहुत रो रही हैं. आप चाय पी लो. मैं जाती हूं, उन के पास बैठती हूं. पड़ोस की बात है, चाय पी कर आप भी आ जाना,’’ कह कर माला चली गई.

राहुल जड़वत अपनी जगह पर बैठा का बैठा ही रह गया. उस के बचपन की एक घटना भी कुछ ऐसी ही थी, जरा आप भी पढ़ लीजिए :

वर्षों पहले उस दिन बस से उतर कर राहुल नीचे खड़ा हो गया था. ‘अब कहां जाऊं?’ वह सोचने लगा, ‘पिता की डांट से दुखी हो कर मैं ने घर तो छोड़ दिया. आगरा से दिल्ली भी पहुंच गया, लेकिन अब कहां जाऊं? घर तो किसी हालत में नहीं जाऊंगा.’ उस ने अपना इरादा पक्का किया, ‘पता नहीं क्या समझते हैं मांबाप खुद को. हर समय डांट, हर समय टोकाटाकी, यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, टीवी मत देखो, दोस्तों से फोन पर बात मत करो, हर समय बस पढ़ो.’

उस की जेब में 500 रुपए थे. उन्हें ही ले कर वह घर से चल दिया था. 13 साल के राहुल के लिए 500 रुपए बहुत थे.

दुनिया घर से बाहर कितनी भयानक और जिंदगी कितनी त्रासदीपूर्ण होती है इस का उसे अंदाजा भी नहीं था. नीली जींस और गुलाबी रंग का स्वैटर पहने स्वस्थ, सुंदर बच्चा अपने पहनावे और चालढाल से ही संपन्न घर का लग रहा था.

बस अड्डे पर बहुत भीड़ थी. राहुल एक तरफ खड़ा हो गया. बसों की रेलमपेल, टिकट खिड़की की लाइन, यात्रियों का रेला, चढ़नाउतरना. टैक्सी व आटो वालों का यात्रियों के पीछे पड़ना. यह सब वह खड़ेखड़े देख रहा था.

उस के मन में तूफान सा भरा था. घर तो जाना ही नहीं है. जब वह शाम तक घर नहीं पहुंचेगा तब सब उसे ढूंढ़ेंगे. मां रोएंगी. पिता चिंता करेंगे. बहन उस के दोस्तों के घर फोन मिलाएगी. खूब परेशान होंगे सब. अब हों परेशान. जब पापा हर समय डांटते रहते हैं, मां हर छोटीछोटी बात पर पापा से उस की शिकायत करती रहती हैं तब वह रोता है तो किसी को नहीं दिखता है.

पापा के घर आते ही जैसे घर में कर्फ्यू लग जाता है. न कोई जोर से बोलेगा, न जोर से हंसेगा, न फोन पर बात करेगा, न टीवी देखेगा. उन्हें तो बस बच्चे पढ़ते हुए नजर आने चाहिए. हर समय पढ़ने के नाम से तो उसे नफरत सी हो गई.

छोटीछोटी बातों पर दोनों झगड़ते भी रहते हैं. छोटेमोटे झगड़े से तो इतना फर्क नहीं पड़ता पर जब पापा के दहाड़ने की और मां के रोने की आवाज सुनाई पड़ती है तो वह दीदी के पहलू में छिप जाता है. बदन में कंपकंपी होने लगती है. अब कहीं उस का भी नंबर न आ जाए पिटने का, वैसे भी उस के रिपोर्ट कार्ड से पापा हमेशा ही खफा रहते हैं.

अगले कुछ दिनों तक घर का वातावरण दमघोंटू हो जाता है. मां की आंखें हर वक्त आंसुओं से भरी रहती हैं और पापा तनेतने से रहते हैं. उसे संभल कर रहना पड़ता है. दीदी बड़ी हैं, ऊपर से पढ़ने में अच्छी, इसलिए उन को डांट कम पड़ती है.

वह घर के वातावरण के ठीक होने का इंतजार करता है. घर के वातावरण का ठीक होना पापा के मूड पर निर्भर करता है. बड़ी मुश्किल से पापा का मूड ठीक होता है. जब तक सब चैन की सांस लेते हैं तब तक किसी न किसी बात पर उन का मूड फिर खराब हो जाता है. तंग आ गया है वह घर के दमघोंटू वातावरण से.

इस बार तिमाही परीक्षा के रिजल्ट पर मैडम ने पापा को बुलाया. स्कूल से आ कर पापा ने उसे खूब डांटा, मारा. उस का हृदय दुखी हो गया. पापा के शब्द अभी तक उस के कानों में गूंज रहे थे, ‘तेरे जैसी औलाद से तो बेऔलाद होना अच्छा है.’

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उस का हृदय तारतार हो गया था. उसे कोई पसंद नहीं करता. उस की समस्या, उस के नजरिए से कोई देखना नहीं चाहता, समझना ही नहीं चाहता. दीदी कहती हैं कि पढ़ाई अच्छी कर ले, सब ठीक हो जाएगा लेकिन उस का मन पढ़ाई में लगता ही नहीं. पढ़ाई उसे पहाड़ जैसी लगती है. उस ने दीदी से कहा भी था कि मैथ्स, साइंस में उस का मन बिलकुल नहीं लगता, उसे समझ ही नहीं आते दोनों विषय, पर पापा कहते हैं साइंस ही पढ़ो. वैसे भी विषय तो वह 10वीं के बाद ही बदल सकता है. राहुल इसी सोच में डूबा था कि एक टैक्सी वाले ने उसे जोर से डांट दिया.

‘अबे ओ लड़के, मरना है क्या? बीचोंबीच खड़ा है, बेवकूफ की औलाद. एक तरफ हट कर खड़ा हो.’

राहुल अचकचा कर एक तरफ खड़ा हो गया. ऐसे गाली दे कर तो कभी किसी ने उस से बात नहीं की थी.

उस की आंखें अनायास ही छलछला आईं पर उस ने खुद को रोक लिया. उसे इस तरह सोचतेसोचते काफी लंबा समय बीत गया था. शाम ढलने को थी. भूख लग आई थी और ठंड भी बढ़ रही थी. उस के बदन पर सिर्फ एक स्वैटर था. उस ने गले का मफलर और कस कर लपेटा और सामने खड़े ठेलीवाले वाले की तरफ बढ़ गया. सोचा पहले कुछ खा ले फिर आगे की सोचेगा. ठेली पर जा कर उस ने कुछ खानेपीने का सामान लिया और एक तरफ बैठ कर खाने लगा.

तभी एक बदमाश किस्म का लड़का उस के चारों तरफ चक्कर काटने लगा. वह बारबार उस की बगल में आ कर खड़ा हो जाता. आखिर राहुल से न रहा गया. वह बोला, ‘क्या बात है, आप इस तरह मेरे चारों तरफ क्यों घूम रहे हैं?’

‘साला, अकड़ किसे दिखा रहा है? तेरे बाप की सड़क है क्या?’ लड़का अपने पीले दांतों को पीसते हुए बोला.

राहुल उस के बोलने के अंदाज से डर गया.

‘मैं तो सिर्फ पूछ रहा था,’ कह कर वह वहां से हट कर थोड़ा अलग जा कर खड़ा हो गया. लड़का थोड़ी देर बाद फिर उस के पास आ कर खड़ा हो गया.

‘कहां से आया है बे? अकेला है क्या?’ वह आंखें नचाता हुआ राहुल से पूछने लगा. राहुल ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘अबे बोलता क्यों नहीं, कहां से आया है? अकेला है क्या?’

‘आगरा से,’ किसी तरह राहुल बोला.

‘अकेला है क्या?’

राहुल फिर चुप हो गया.

‘अबे लगाऊं एक, साला, बोलता क्यों नहीं?’

‘हां,’ राहुल ने धीरे से कहा.

‘अच्छा, घर से भाग कर आया है,’ उस लड़के के हौसले थोड़े और बुलंद हो गए. तभी वहां उसी की तरह के उस से कुछ बड़े 3 लड़के और आ गए.

‘राजेश, यह कौन है?’ उन लड़कों में से एक बोला.

‘घर से भाग कर आया है. अच्छे घर का लगता है. अपने मतलब का लगता है. उस्ताद खुश हो जाएगा,’ उस ने पूछने वाले के कान में फुसफुसाया.

‘क्यों भागा बे घर से, बाप की डांट खा कर?’ दूसरे लड़के ने राहुल से पूछा.

‘हां,’ राहुल उन चारों को देख कर डर के मारे कांप रहा था.

‘मांबाप साले ऐसे ही होते हैं. बिना बात डांटते रहते हैं. मैं भी घर से भाग गया था, मां के सिर पर थाली मार कर,’ वह उस के गाल सहला कर, उस को पुचकारता हुआ बोला, ‘ठीक किया तू ने, चल, हमारे साथ चल.’

‘मैं तुम लोगों के साथ नहीं जाऊंगा,’ राहुल सहमते हुए बोला.

‘अबे चल न, यहां कहां रहेगा? थोड़ी देर में रात हो जाएगी, तब कहां जाएगा?’ वे उसे जबरदस्ती अपने साथ ले जाना चाह रहे थे.

‘नहीं, मुझे अकेला छोड़ दो. मैं तुम लोगों के साथ नहीं जाऊंगा,’ डर के मारे राहुल की आंखों से आंसू बहने लगे. वह उन से अनुनय करने लगा, ‘प्लीज, मुझे छोड़ दो.’

‘अरे, ऐसे कैसे छोड़ दें. चलता है हमारे साथ या नहीं? सीधेसीधे चल वरना जबरदस्ती ले जाएंगे.’

इस सारे नजारे को थोड़ी दूर पर बैठे एक सज्जन देख रहे थे. उन्हें लग रहा था शायद बच्चा अपनों से बिछड़ गया है.

उन लड़कों की जबरदस्ती से राहुल घबरा गया और रोने लगा. अंधेरा गहराने लगा था. डर के मारे राहुल को घर की याद भी आने लगी थी. घर वालों को मालूम भी नहीं होगा कि वह इस समय कहां है. वे तो उसे आगरा में ढूंढ़ रहे होंगे.

आखिर एक लड़के ने उस का हाथ पकड़ा और जबरदस्ती अपने साथ घसीटने लगा. राहुल उस से हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रहा था. दूर बैठे उन सज्जन से अब न रहा गया. उन का नाम सोमेश्वर प्रसाद था, एकाएक वे अपनी जगह से उठ कर उन लड़कों की तरफ बढ़ गए और साधिकार राहुल का हाथ पकड़ कर बोले, ‘अरे, बंटी, तू कहां चला गया था? मैं तुझे कितनी देर से ढूंढ़ रहा हूं. ऐसे कोई जाता है क्या? चल, घर चल जल्दी. बस निकल जाएगी.’

फिर उन लड़कों की तरफ मुखातिब हो कर बोले, ‘क्या कर रहे हो तुम लोग मेरे बेटे के साथ? करूं अभी पुलिस में रिपोर्ट. अकेला बच्चा देखा नहीं कि उस के पीछे पड़ गए.’

सोमेश्वर प्रसाद को एकाएक देख कर लड़के घबरा कर भाग गए. राहुल सोमेश्वर प्रसाद को देख कर चौंक गया. लेकिन परिस्थितियां ऐसी थीं कि उस ने उन के साथ जाने में ही भलाई समझी. उम्रदराज शरीफ लग रहे सज्जन पर उसे भरोसा हो गया.

थोड़ी देर बाद राहुल सोमेश्वर प्रसाद के साथ जयपुर की बस में बैठ कर चल दिया.

सोमेश्वर प्रसाद का स्टील के बरतनों का व्यापार था और वे व्यापार के सिलसिले में ही दिल्ली आए थे. सोमेश्वर प्रसाद ने उस के बारे में जो कुछ पूछा, उस ने सभी बातों का जवाब चुप्पी से ही दिया. हार कर सोमेश्वरजी चुप हो गए और उन्होंने उसे अपने घर ले जाने का निर्णय ले लिया.

घर पहुंचे तो उन की पत्नी उन के साथ एक लड़के को देख कर चौंक गईं. उन्हें अंदर ले जा कर बोलीं, ‘कौन है यह? कहां से ले कर आए हो इसे?’

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‘यह लड़का घर से भागा हुआ लगता है. कुछ बदमाश इसे अपने साथ ले जा रहे थे. अच्छे घर का बच्चा लग रहा है. इसलिए इसे अपने साथ ले आया. अभी घबराहट और डर के मारे कुछ बता नहीं रहा है. 2-4 दिन बाद जब इस की घबराहट कुछ कम होगी, तब बातोंबातों में प्यार से सबकुछ पूछ कर इस के घर खबर कर देंगे,’ सोमेश्वर प्रसाद पत्नी से बोले, ‘अभी तो इसे खानावाना खिलाओ, भूखा है और थका भी. कल बात करेंगे.’

सोमेश्वरजी के घर में सब ने उसे प्यार से लिया. धीरेधीरे उस की घबराहट दूर होने लगी. वह उन के परिवार में घुलनेमिलने लगा. रहतेरहते उसे 15 दिन हो गए. राहुल को अब घर की याद सताने लगी. वह अनमना सा रहने लगा. मम्मीपापा की, स्कूल की, संगीसाथियों की याद सताने लगी. महसूस होने लगा कि जिंदगी घर से बाहर इतनी सरल नहीं, ये लोग भी उसे कब तक रखेंगे. किस हैसियत से यहां पर रहेगा? क्या नौकर की हैसियत से? 13-14 साल का लड़का इतना छोटा भी नहीं था कि अपनी स्थिति को नहीं समझता.

और एक दिन उस ने सोमेश्वर प्रसाद को अपने बारे में सबकुछ बता दिया. उस से फोन नंबर ले कर सोमेश्वरजी ने उस के घर फोन किया, जहां बेसब्री से सब उस को ढूंढ़ रहे थे. एकाएक मिली इस खबर पर घर वालों को विश्वास ही नहीं हुआ. जब सोमेश्वरजी ने फोन पर उन की बात राहुल से कराई तो वह फूटफूट कर रो पड़ा.

‘मुझे माफ कर दो पापा, मैं आज से ऐसा कभी नहीं करूंगा, मन लगा कर पढ़ूंगा. मुझे आ कर ले जाओ,’ कहतेकहते उस की हिचकियां बंध गईं. उस की आवाज सुन कर पापा का कंठ भी अवरुद्ध हो गया.

राहुल के घर से भागने के मामले में वे कहीं न कहीं खुद को जिम्मेदार समझ रहे थे. उन की अत्यधिक सख्ती ने उन के बेटे को अपने ही घर में पराया कर दिया था. उसे अपना ही घर बेगाना लगने लगा.

हर बच्चे का स्वभाव अलग होता है. राहुल की बहन उसी माहौल में रह रही थी. लेकिन वह उस घुटन भरे माहौल में नहीं रह पा रहा था. फिर यों भी लड़कों का स्वभाव अधिक आक्रामक होता है.

जब बेटे को खोने का एहसास हुआ तो अपनी गलतियां महसूस होने लगीं. सभी बच्चों का दिमागी स्तर और सोचनेसमझने का तरीका अलग होता है. अपने बच्चों के स्वभाव को समझना चाहिए. किस के लिए कैसे व्यवहार की जरूरत है, यह मातापिता से अधिक कोई नहीं समझ सकता. किशोरावस्था में बच्चे मातापिता को नहीं समझ सकते, इसलिए मातापिता को ही बच्चों को समझने की कोशिश करनी चाहिए.

खैर, उन के बेटे के साथ कोई अनहोनी होने से बच गई. अब वे बच्चों पर ध्यान देंगे. अब थोड़े समय उन के बच्चों को उन के प्यार, मार्गदर्शन व सहयोग की जरूरत है. हिटलर पिता की जगह एक दोस्त पिता कहलाने की जरूरत है, जिन से वे अपनी परेशानियां शेयर कर सकें.

मन ही मन ऐसे कई प्रण कर के राहुल के मम्मीपापा राहुल को लेने पहुंच गए. राहुल मम्मीपापा से मिल कर फूटफूट कर रोया. उसे भी महसूस हो गया कि वास्तविक जिंदगी कोई फिल्मी कहानी नहीं है. अपने मातापिता से ज्यादा अपना और बड़ा हितैषी इस संसार में कोई नहीं. उन्हें ही अपना समझना चाहिए तो सारा संसार अपना लगता है और उन्हें बेगाना समझ कर सारा संसार पराया हो जाता है.

ये 15 दिन राहुल और राहुल के मातापिता के लिए एक पाठशाला की तरह साबित हुए. दोनों ने ही जिंदगी को एक नए नजरिए से देखना सीखा.

राहुल अभी सोच में ही डूबा था कि तभी दुखी सी सूरत लिए माला बदहवास सी आई. वह अतीत से वर्तमान में लौट आया.

‘‘सुनो, जल्दी चलो जरा. बड़ी अनहोनी घट गई, टिंकू की लाश हाईवे पर सड़क किनारे झाडि़यों में पड़ी मिली है, पता नहीं क्या हुआ उस के साथ.’’

‘‘क्या?’’ सुन कर राहुल बुरी तरह से सिहर गया, ‘‘अरे, यह क्या हो गया?’’

‘‘बहुत बुरा हुआ. मातापिता तो बुरी तरह बिलख रहे हैं. संभाले नहीं संभल रहे. इकलौता बेटा था. कैसे संभलेंगे इतने भयंकर दुख से,’’ बोलतेबोलते माला का गला भर आया.

‘‘चलो,’’ राहुल माला के साथ तुरंत चल दिया. चलते समय राहुल सोच रहा था कि टिंकू उस के जैसा भाग्यशाली नहीं निकला. उसे कोई सोमेश्वर प्रसाद नहीं मिला. हजारों टिंकुओं में से शायद ही किसी एक को कोई सोमेश्वर प्रसाद जैसा सज्जन व्यक्ति मिलता है.

ये भी पढ़ें-बहकते कदम: क्या अनीश के चगुंल से निकल सकी प्रिया

बच्चे सोचते हैं कि शायद घर से बाहर जिंदगी फिल्मी स्टाइल की होगी. घर से भाग कर वे जानेअनजाने मातापिता को दुख पहुंचाना चाहते हैं. उन पर अपना आक्रोश जाहिर करना चाहते हैं. पर मातापिता की छत्रछाया से बाहर जिंदगी 3 घंटे की फिल्म नहीं होती, बल्कि बहुत भयानक होती है. बच्चों को इस बात का अनुभव नहीं होता. उन्हें समझने और संभालने के लिए मातापिता को कुछ साल बहुत सहनशक्ति से काम लेना चाहिए. बच्चों का हृदय कोरे कागज जैसा होता है, जिस पर जिस तरह की इबारत लिख गई, जिंदगी की धारा उधर ही मुड़ गई, वही उन का जीवन व भविष्य बन जाता है.

उस दिन अगर उसे सोमेश्वर प्रसाद नहीं मिलते तो पता नहीं उस का भी क्या हश्र होता. सोचते सोचते राहुल माला के साथ तेजी से कदम बढ़ाने लगा.

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Writer- Sudha Jugran

राहुल औफिस से घर आया तो पत्नी माला की कमेंट्री शुरू हो गई, ‘‘पता है, हमारे पड़ोसी शर्माजी का टिंकू घर से भाग गया.’’

‘‘भाग गया? कहां?’’ राहुल चौंक कर बोला.

‘‘पता नहीं, स्कूल की तो आजकल छुट्टी है. सुबह दोस्त के घर जाने की बात कह कर गया था. तब से घर नहीं आया.’’

‘‘अरे, कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई. पुलिस में रिपोर्ट की या नहीं?’’ राहुल डर से कांप उठा.

‘‘हां, पुलिस में रिपोर्ट तो कर दी पर 13-14 साल का नादान बच्चा न जाने कहां घूम रहा होगा. कहीं गलत हाथों में न पड़ जाए. नाराज हो कर गया है. कल रात उस को बहुत डांट पड़ी थी, पढ़ाई के कारण. उस की मां तो बहुत रो रही हैं. आप चाय पी लो. मैं जाती हूं, उन के पास बैठती हूं. पड़ोस की बात है, चाय पी कर आप भी आ जाना,’’ कह कर माला चली गई.

राहुल जड़वत अपनी जगह पर बैठा का बैठा ही रह गया. उस के बचपन की एक घटना भी कुछ ऐसी ही थी, जरा आप भी पढ़ लीजिए :

वर्षों पहले उस दिन बस से उतर कर राहुल नीचे खड़ा हो गया था. ‘अब कहां जाऊं?’ वह सोचने लगा, ‘पिता की डांट से दुखी हो कर मैं ने घर तो छोड़ दिया. आगरा से दिल्ली भी पहुंच गया, लेकिन अब कहां जाऊं? घर तो किसी हालत में नहीं जाऊंगा.’ उस ने अपना इरादा पक्का किया, ‘पता नहीं क्या समझते हैं मांबाप खुद को. हर समय डांट, हर समय टोकाटाकी, यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, टीवी मत देखो, दोस्तों से फोन पर बात मत करो, हर समय बस पढ़ो.’

उस की जेब में 500 रुपए थे. उन्हें ही ले कर वह घर से चल दिया था. 13 साल के राहुल के लिए 500 रुपए बहुत थे.

दुनिया घर से बाहर कितनी भयानक और जिंदगी कितनी त्रासदीपूर्ण होती है इस का उसे अंदाजा भी नहीं था. नीली जींस और गुलाबी रंग का स्वैटर पहने स्वस्थ, सुंदर बच्चा अपने पहनावे और चालढाल से ही संपन्न घर का लग रहा था.

बस अड्डे पर बहुत भीड़ थी. राहुल एक तरफ खड़ा हो गया. बसों की रेलमपेल, टिकट खिड़की की लाइन, यात्रियों का रेला, चढ़नाउतरना. टैक्सी व आटो वालों का यात्रियों के पीछे पड़ना. यह सब वह खड़ेखड़े देख रहा था.

उस के मन में तूफान सा भरा था. घर तो जाना ही नहीं है. जब वह शाम तक घर नहीं पहुंचेगा तब सब उसे ढूंढ़ेंगे. मां रोएंगी. पिता चिंता करेंगे. बहन उस के दोस्तों के घर फोन मिलाएगी. खूब परेशान होंगे सब. अब हों परेशान. जब पापा हर समय डांटते रहते हैं, मां हर छोटीछोटी बात पर पापा से उस की शिकायत करती रहती हैं तब वह रोता है तो किसी को नहीं दिखता है.

पापा के घर आते ही जैसे घर में कर्फ्यू लग जाता है. न कोई जोर से बोलेगा, न जोर से हंसेगा, न फोन पर बात करेगा, न टीवी देखेगा. उन्हें तो बस बच्चे पढ़ते हुए नजर आने चाहिए. हर समय पढ़ने के नाम से तो उसे नफरत सी हो गई.

छोटीछोटी बातों पर दोनों झगड़ते भी रहते हैं. छोटेमोटे झगड़े से तो इतना फर्क नहीं पड़ता पर जब पापा के दहाड़ने की और मां के रोने की आवाज सुनाई पड़ती है तो वह दीदी के पहलू में छिप जाता है. बदन में कंपकंपी होने लगती है. अब कहीं उस का भी नंबर न आ जाए पिटने का, वैसे भी उस के रिपोर्ट कार्ड से पापा हमेशा ही खफा रहते हैं.

अगले कुछ दिनों तक घर का वातावरण दमघोंटू हो जाता है. मां की आंखें हर वक्त आंसुओं से भरी रहती हैं और पापा तनेतने से रहते हैं. उसे संभल कर रहना पड़ता है. दीदी बड़ी हैं, ऊपर से पढ़ने में अच्छी, इसलिए उन को डांट कम पड़ती है.

वह घर के वातावरण के ठीक होने का इंतजार करता है. घर के वातावरण का ठीक होना पापा के मूड पर निर्भर करता है. बड़ी मुश्किल से पापा का मूड ठीक होता है. जब तक सब चैन की सांस लेते हैं तब तक किसी न किसी बात पर उन का मूड फिर खराब हो जाता है. तंग आ गया है वह घर के दमघोंटू वातावरण से.

इस बार तिमाही परीक्षा के रिजल्ट पर मैडम ने पापा को बुलाया. स्कूल से आ कर पापा ने उसे खूब डांटा, मारा. उस का हृदय दुखी हो गया. पापा के शब्द अभी तक उस के कानों में गूंज रहे थे, ‘तेरे जैसी औलाद से तो बेऔलाद होना अच्छा है.’

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उस का हृदय तारतार हो गया था. उसे कोई पसंद नहीं करता. उस की समस्या, उस के नजरिए से कोई देखना नहीं चाहता, समझना ही नहीं चाहता. दीदी कहती हैं कि पढ़ाई अच्छी कर ले, सब ठीक हो जाएगा लेकिन उस का मन पढ़ाई में लगता ही नहीं. पढ़ाई उसे पहाड़ जैसी लगती है. उस ने दीदी से कहा भी था कि मैथ्स, साइंस में उस का मन बिलकुल नहीं लगता, उसे समझ ही नहीं आते दोनों विषय, पर पापा कहते हैं साइंस ही पढ़ो. वैसे भी विषय तो वह 10वीं के बाद ही बदल सकता है. राहुल इसी सोच में डूबा था कि एक टैक्सी वाले ने उसे जोर से डांट दिया.

‘अबे ओ लड़के, मरना है क्या? बीचोंबीच खड़ा है, बेवकूफ की औलाद. एक तरफ हट कर खड़ा हो.’

राहुल अचकचा कर एक तरफ खड़ा हो गया. ऐसे गाली दे कर तो कभी किसी ने उस से बात नहीं की थी.

उस की आंखें अनायास ही छलछला आईं पर उस ने खुद को रोक लिया. उसे इस तरह सोचतेसोचते काफी लंबा समय बीत गया था. शाम ढलने को थी. भूख लग आई थी और ठंड भी बढ़ रही थी. उस के बदन पर सिर्फ एक स्वैटर था. उस ने गले का मफलर और कस कर लपेटा और सामने खड़े ठेलीवाले वाले की तरफ बढ़ गया. सोचा पहले कुछ खा ले फिर आगे की सोचेगा. ठेली पर जा कर उस ने कुछ खानेपीने का सामान लिया और एक तरफ बैठ कर खाने लगा.

तभी एक बदमाश किस्म का लड़का उस के चारों तरफ चक्कर काटने लगा. वह बारबार उस की बगल में आ कर खड़ा हो जाता. आखिर राहुल से न रहा गया. वह बोला, ‘क्या बात है, आप इस तरह मेरे चारों तरफ क्यों घूम रहे हैं?’

‘साला, अकड़ किसे दिखा रहा है? तेरे बाप की सड़क है क्या?’ लड़का अपने पीले दांतों को पीसते हुए बोला.

राहुल उस के बोलने के अंदाज से डर गया.

‘मैं तो सिर्फ पूछ रहा था,’ कह कर वह वहां से हट कर थोड़ा अलग जा कर खड़ा हो गया. लड़का थोड़ी देर बाद फिर उस के पास आ कर खड़ा हो गया.

‘कहां से आया है बे? अकेला है क्या?’ वह आंखें नचाता हुआ राहुल से पूछने लगा. राहुल ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘अबे बोलता क्यों नहीं, कहां से आया है? अकेला है क्या?’

‘आगरा से,’ किसी तरह राहुल बोला.

‘अकेला है क्या?’

राहुल फिर चुप हो गया.

‘अबे लगाऊं एक, साला, बोलता क्यों नहीं?’

‘हां,’ राहुल ने धीरे से कहा.

‘अच्छा, घर से भाग कर आया है,’ उस लड़के के हौसले थोड़े और बुलंद हो गए. तभी वहां उसी की तरह के उस से कुछ बड़े 3 लड़के और आ गए.

‘राजेश, यह कौन है?’ उन लड़कों में से एक बोला.

‘घर से भाग कर आया है. अच्छे घर का लगता है. अपने मतलब का लगता है. उस्ताद खुश हो जाएगा,’ उस ने पूछने वाले के कान में फुसफुसाया.

‘क्यों भागा बे घर से, बाप की डांट खा कर?’ दूसरे लड़के ने राहुल से पूछा.

‘हां,’ राहुल उन चारों को देख कर डर के मारे कांप रहा था.

‘मांबाप साले ऐसे ही होते हैं. बिना बात डांटते रहते हैं. मैं भी घर से भाग गया था, मां के सिर पर थाली मार कर,’ वह उस के गाल सहला कर, उस को पुचकारता हुआ बोला, ‘ठीक किया तू ने, चल, हमारे साथ चल.’

‘मैं तुम लोगों के साथ नहीं जाऊंगा,’ राहुल सहमते हुए बोला.

‘अबे चल न, यहां कहां रहेगा? थोड़ी देर में रात हो जाएगी, तब कहां जाएगा?’ वे उसे जबरदस्ती अपने साथ ले जाना चाह रहे थे.

‘नहीं, मुझे अकेला छोड़ दो. मैं तुम लोगों के साथ नहीं जाऊंगा,’ डर के मारे राहुल की आंखों से आंसू बहने लगे. वह उन से अनुनय करने लगा, ‘प्लीज, मुझे छोड़ दो.’

‘अरे, ऐसे कैसे छोड़ दें. चलता है हमारे साथ या नहीं? सीधेसीधे चल वरना जबरदस्ती ले जाएंगे.’

इस सारे नजारे को थोड़ी दूर पर बैठे एक सज्जन देख रहे थे. उन्हें लग रहा था शायद बच्चा अपनों से बिछड़ गया है.

उन लड़कों की जबरदस्ती से राहुल घबरा गया और रोने लगा. अंधेरा गहराने लगा था. डर के मारे राहुल को घर की याद भी आने लगी थी. घर वालों को मालूम भी नहीं होगा कि वह इस समय कहां है. वे तो उसे आगरा में ढूंढ़ रहे होंगे.

आखिर एक लड़के ने उस का हाथ पकड़ा और जबरदस्ती अपने साथ घसीटने लगा. राहुल उस से हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रहा था. दूर बैठे उन सज्जन से अब न रहा गया. उन का नाम सोमेश्वर प्रसाद था, एकाएक वे अपनी जगह से उठ कर उन लड़कों की तरफ बढ़ गए और साधिकार राहुल का हाथ पकड़ कर बोले, ‘अरे, बंटी, तू कहां चला गया था? मैं तुझे कितनी देर से ढूंढ़ रहा हूं. ऐसे कोई जाता है क्या? चल, घर चल जल्दी. बस निकल जाएगी.’

फिर उन लड़कों की तरफ मुखातिब हो कर बोले, ‘क्या कर रहे हो तुम लोग मेरे बेटे के साथ? करूं अभी पुलिस में रिपोर्ट. अकेला बच्चा देखा नहीं कि उस के पीछे पड़ गए.’

सोमेश्वर प्रसाद को एकाएक देख कर लड़के घबरा कर भाग गए. राहुल सोमेश्वर प्रसाद को देख कर चौंक गया. लेकिन परिस्थितियां ऐसी थीं कि उस ने उन के साथ जाने में ही भलाई समझी. उम्रदराज शरीफ लग रहे सज्जन पर उसे भरोसा हो गया.

थोड़ी देर बाद राहुल सोमेश्वर प्रसाद के साथ जयपुर की बस में बैठ कर चल दिया.

सोमेश्वर प्रसाद का स्टील के बरतनों का व्यापार था और वे व्यापार के सिलसिले में ही दिल्ली आए थे. सोमेश्वर प्रसाद ने उस के बारे में जो कुछ पूछा, उस ने सभी बातों का जवाब चुप्पी से ही दिया. हार कर सोमेश्वरजी चुप हो गए और उन्होंने उसे अपने घर ले जाने का निर्णय ले लिया.

घर पहुंचे तो उन की पत्नी उन के साथ एक लड़के को देख कर चौंक गईं. उन्हें अंदर ले जा कर बोलीं, ‘कौन है यह? कहां से ले कर आए हो इसे?’

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‘यह लड़का घर से भागा हुआ लगता है. कुछ बदमाश इसे अपने साथ ले जा रहे थे. अच्छे घर का बच्चा लग रहा है. इसलिए इसे अपने साथ ले आया. अभी घबराहट और डर के मारे कुछ बता नहीं रहा है. 2-4 दिन बाद जब इस की घबराहट कुछ कम होगी, तब बातोंबातों में प्यार से सबकुछ पूछ कर इस के घर खबर कर देंगे,’ सोमेश्वर प्रसाद पत्नी से बोले, ‘अभी तो इसे खानावाना खिलाओ, भूखा है और थका भी. कल बात करेंगे.’

सोमेश्वरजी के घर में सब ने उसे प्यार से लिया. धीरेधीरे उस की घबराहट दूर होने लगी. वह उन के परिवार में घुलनेमिलने लगा. रहतेरहते उसे 15 दिन हो गए. राहुल को अब घर की याद सताने लगी. वह अनमना सा रहने लगा. मम्मीपापा की, स्कूल की, संगीसाथियों की याद सताने लगी. महसूस होने लगा कि जिंदगी घर से बाहर इतनी सरल नहीं, ये लोग भी उसे कब तक रखेंगे. किस हैसियत से यहां पर रहेगा? क्या नौकर की हैसियत से? 13-14 साल का लड़का इतना छोटा भी नहीं था कि अपनी स्थिति को नहीं समझता.

और एक दिन उस ने सोमेश्वर प्रसाद को अपने बारे में सबकुछ बता दिया. उस से फोन नंबर ले कर सोमेश्वरजी ने उस के घर फोन किया, जहां बेसब्री से सब उस को ढूंढ़ रहे थे. एकाएक मिली इस खबर पर घर वालों को विश्वास ही नहीं हुआ. जब सोमेश्वरजी ने फोन पर उन की बात राहुल से कराई तो वह फूटफूट कर रो पड़ा.

‘मुझे माफ कर दो पापा, मैं आज से ऐसा कभी नहीं करूंगा, मन लगा कर पढ़ूंगा. मुझे आ कर ले जाओ,’ कहतेकहते उस की हिचकियां बंध गईं. उस की आवाज सुन कर पापा का कंठ भी अवरुद्ध हो गया.

राहुल के घर से भागने के मामले में वे कहीं न कहीं खुद को जिम्मेदार समझ रहे थे. उन की अत्यधिक सख्ती ने उन के बेटे को अपने ही घर में पराया कर दिया था. उसे अपना ही घर बेगाना लगने लगा.

हर बच्चे का स्वभाव अलग होता है. राहुल की बहन उसी माहौल में रह रही थी. लेकिन वह उस घुटन भरे माहौल में नहीं रह पा रहा था. फिर यों भी लड़कों का स्वभाव अधिक आक्रामक होता है.

जब बेटे को खोने का एहसास हुआ तो अपनी गलतियां महसूस होने लगीं. सभी बच्चों का दिमागी स्तर और सोचनेसमझने का तरीका अलग होता है. अपने बच्चों के स्वभाव को समझना चाहिए. किस के लिए कैसे व्यवहार की जरूरत है, यह मातापिता से अधिक कोई नहीं समझ सकता. किशोरावस्था में बच्चे मातापिता को नहीं समझ सकते, इसलिए मातापिता को ही बच्चों को समझने की कोशिश करनी चाहिए.

खैर, उन के बेटे के साथ कोई अनहोनी होने से बच गई. अब वे बच्चों पर ध्यान देंगे. अब थोड़े समय उन के बच्चों को उन के प्यार, मार्गदर्शन व सहयोग की जरूरत है. हिटलर पिता की जगह एक दोस्त पिता कहलाने की जरूरत है, जिन से वे अपनी परेशानियां शेयर कर सकें.

मन ही मन ऐसे कई प्रण कर के राहुल के मम्मीपापा राहुल को लेने पहुंच गए. राहुल मम्मीपापा से मिल कर फूटफूट कर रोया. उसे भी महसूस हो गया कि वास्तविक जिंदगी कोई फिल्मी कहानी नहीं है. अपने मातापिता से ज्यादा अपना और बड़ा हितैषी इस संसार में कोई नहीं. उन्हें ही अपना समझना चाहिए तो सारा संसार अपना लगता है और उन्हें बेगाना समझ कर सारा संसार पराया हो जाता है.

ये 15 दिन राहुल और राहुल के मातापिता के लिए एक पाठशाला की तरह साबित हुए. दोनों ने ही जिंदगी को एक नए नजरिए से देखना सीखा.

राहुल अभी सोच में ही डूबा था कि तभी दुखी सी सूरत लिए माला बदहवास सी आई. वह अतीत से वर्तमान में लौट आया.

‘‘सुनो, जल्दी चलो जरा. बड़ी अनहोनी घट गई, टिंकू की लाश हाईवे पर सड़क किनारे झाडि़यों में पड़ी मिली है, पता नहीं क्या हुआ उस के साथ.’’

‘‘क्या?’’ सुन कर राहुल बुरी तरह से सिहर गया, ‘‘अरे, यह क्या हो गया?’’

‘‘बहुत बुरा हुआ. मातापिता तो बुरी तरह बिलख रहे हैं. संभाले नहीं संभल रहे. इकलौता बेटा था. कैसे संभलेंगे इतने भयंकर दुख से,’’ बोलतेबोलते माला का गला भर आया.

‘‘चलो,’’ राहुल माला के साथ तुरंत चल दिया. चलते समय राहुल सोच रहा था कि टिंकू उस के जैसा भाग्यशाली नहीं निकला. उसे कोई सोमेश्वर प्रसाद नहीं मिला. हजारों टिंकुओं में से शायद ही किसी एक को कोई सोमेश्वर प्रसाद जैसा सज्जन व्यक्ति मिलता है.

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बच्चे सोचते हैं कि शायद घर से बाहर जिंदगी फिल्मी स्टाइल की होगी. घर से भाग कर वे जानेअनजाने मातापिता को दुख पहुंचाना चाहते हैं. उन पर अपना आक्रोश जाहिर करना चाहते हैं. पर मातापिता की छत्रछाया से बाहर जिंदगी 3 घंटे की फिल्म नहीं होती, बल्कि बहुत भयानक होती है. बच्चों को इस बात का अनुभव नहीं होता. उन्हें समझने और संभालने के लिए मातापिता को कुछ साल बहुत सहनशक्ति से काम लेना चाहिए. बच्चों का हृदय कोरे कागज जैसा होता है, जिस पर जिस तरह की इबारत लिख गई, जिंदगी की धारा उधर ही मुड़ गई, वही उन का जीवन व भविष्य बन जाता है.

उस दिन अगर उसे सोमेश्वर प्रसाद नहीं मिलते तो पता नहीं उस का भी क्या हश्र होता. सोचते सोचते राहुल माला के साथ तेजी से कदम बढ़ाने लगा.

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March 04, 2022 at 09:00AM

हिजड़ा: क्यों सिया को खुद से ही चिढ़ थी?

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

‘छनाक’ की आवाज के साथ आईना चकनाचूर हो गया था. आईने का हर टुकड़ा सिया का अक्स दिखा रहा था. मांग में भरा सिंदूर, गले का मंगलसूत्र, कानों के कुंडल ये सब मानो सिया को चिढ़ा रहे थे. शायद समाज के दोहरेपन के आगे वह हार मान चुकी थी. एकसाथ कई सवाल उस के मन में उमड़घुमड़ रहे थे.

आईने के नुकीले टुकड़ों में सिया को उस के सवालों का जवाब नहीं मिल सका. आंखों में आंसुओं के साथ पिछली यादें किसी फिल्म की तरह सिया की आंखों के सामने से गुजरने लगी थीं.

श्री नाम था उस का. 20 साल का होतेहोते वह और उस के मांबाप ये समझ चुके थे कि श्री का शरीर भले ही एक मर्द का हो, पर उस के अंदर का मन एक औरत का ही है.

मांबाप ने श्री को कई डाक्टरों को दिखाया, इलाज भी चला, पर कोई फायदा नहीं हुआ. डाक्टरों ने श्री को ‘जैंडर आइडैंटिटी डिसऔर्डर’ का मरीज बताया, जिस में शरीर तो औरत या मर्द का हो सकता है, पर हावभाव और लक्षण विपरीत लिंग के होते हैं.

श्री के नैननक्श तीखे थे. उस के चेहरे की खूबसूरती और चमक से लड़कियों को जलन होना लाजिमी था. वह लड़कियों के कपड़े पहनता, उन की तरह हावभाव रखता, गाने गाता और लड़कियों की तरह डांस करना उसे बहुत अच्छा लगता था. किसी से बात करते समय लचकनामचकना श्री की आदत थी.

श्री 22 साल का हो चुका था. बाहर जाने पर लड़कियों जैसे कपड़े पहनने लगा था वह… मानो अब उसे जमाने के कहनेसुनने की कोई परवाह नहीं थी. उस ने अमर नाम का एक दोस्त बनाया, जिसे वह अपना बौयफ्रैंड कहता था.

अमर को इस बात का अहसास था कि श्री की हरकतें लड़कियों जैसी हैं, पर उसे तो सिर्फ श्री के पैसे से मजे करने थे, इसलिए वह उस के नाज उठाता था.

आज वे दोनों श्री का जन्मदिन मनाने के लिए किसी रैस्टोरैंट में जाने वाले थे.  इस खास दिन के लिए श्री ने अपने लंबे बालों को खुला छोड़ा हुआ था और वह सलवारसूट पहने था.

उन दोनों को वापसी में रात के साढ़े 11 बजे गए थे. अमर और श्री एकदूसरे का हाथ पकड़े गाड़ी की पार्किंग की तरफ बढ़ रहे थे.

‘‘अरे लगता है, मैं अपना मोबाइल रैस्टोरैंट में ही भूल आया हूं,’’ कह कर अमर अंदर की ओर लपक गया, जबकि श्री बाहर ही उस के आने का इंतजार करने लगा.

एक बड़ी सी गाड़ी श्री के ठीक सामने आ कर खड़ी हुई और उन में से बाहर निकले एक बलशाली लड़के ने श्री को अंदर घसीट लिया और उस के मुंह पर टेप लगा दिया, ताकि वह शोर न मचा सके. गाड़ी को वे लोग एक आधी बनी बिल्डिंग के पास ले गए और श्री को बाहर घसीटा.

‘‘आज बहुत दिनों बाद कोई चिकना माल मिला है,’’ श्री के कपड़े फाड़ते हुए एक वहशी बोला, पर अगले ही पल वह बुरी तरह चौंक गया, ‘‘अरे, यह तो लड़की के वेश में लड़का है. क्यों बे, लड़की बन कर घूमने में ज्यादा मजा आता है क्या?’’ कह कर उस वहशी ने श्री के गाल पर 2-4 घूंसे रसीद कर

दिए थे.

‘‘अब क्या करें, सारे मूड का तो सत्यानाश हो गया, अब मूड कैसे फ्रैश करें?’’ दूसरा लड़का बोला.

‘‘भाई तुम लोग अपना सोच लो, मुझे तो आज इस लड़के के साथ ही मजे लेना है. कभीकभी स्वाद भी तो बदलना चाहिए न,’’ इतना कह कर वह लड़का श्री के साथ जबरदस्ती करने लगा और फिर कुछ देर बाद बारीबारी से तीनों दोस्तों ने भी श्री के साथ मुंह काला किया और उसे तड़पती हालत में छोड़ कर वहां से चले गए.

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बेहोशी की हालत में श्री कब तक रहा, उसे कुछ पता नहीं था. आंखें खुलीं, तो उस ने अपनेआप को एक अस्पताल में पाया. पुलिस वाले उस के सामने खड़े थे.

‘‘तो आप का कहना है कि आप के बेटे का रेप हुआ है,’’ पुलिस वाले ने श्री के पिता से पूछा.

‘‘जी.’’

‘‘हमें पीडि़त का बयान लेना होगा,’’ इंस्पैक्टर ने कहा और श्री से कुछ अटपटे सवाल पूछने के बाद जल्द ही कार्यवाही करने की बात कह कर बाहर निकलते हुए पुलिस कांस्टेबल इंस्पैक्टर से कह रहा था, ‘‘साहब, ये सब अमीर घर के लड़कों  के चोंचले हैं, पहले लड़की बन कर घूमते हैं और फिर रेप करवा कर हमारे लिए काम बढ़ा देते हैं. हिजड़े कहीं के.’’

‘हिजड़े…’ श्री को यह शब्द गाली की तरह चुभा था. उस का कलेजा अंदर तक छलनी हो गया था.

यह पहला मौका था, जब उसे अपनी इस दोहरी जिंदगी जीने के ढंग पर शर्म आई थी.

तकरीबन 5 दिन तक अस्पताल में रहने के बाद श्री अपने मांबाप के साथ  घर आया और अपने बौयफ्रैंड अमर को फोन लगाया.

काफी देर बाद अमर ने उस का फोन उठाया और सीधे शब्दों में कह दिया कि तुम्हारे साथ जो हादसा हुआ है, उस से हमारी काफी बदनामी हो गई है, इसलिए वह उस के साथ अब कोई संबंध नहीं रखना चाहता.

जिस दोस्त की अब उसे सब से ज्यादा जरूरत थी, उसी ने उस का साथ छोड़ दिया. श्री काफी परेशान हो उठा.

श्री ने अपने मर्दाना पर बेजान से पड़े हुए अंग को देखा और नफरत से भर गया. यह पहला मौका था, जब श्री ने अपना लिंग बदलवाने की बात गहराई से सोची, इस के लिए सब से पहले उस ने इंटरनैट खंगालना शुरू किया.

श्री के जैसे लक्षणों वाले और बहुत से लोग हैं इस दुनिया में. यह बात उसे पता चली, तो उस के मन को थोड़ा सुकून मिला और गहरे जाने पर उसे बहुत सी नई बातें पता चलीं. उस में से एक बात यह भी थी कि अब लिंग कोई बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है और 10 लाख से भी कम खर्चे में भारत में ही रह कर अपना लिंग बदलवाया जा सकता है.

ये सारी बातें जान कर श्री ने अपने मांबाप से बात की, तो पहले तो वे  सकते में आ गए, पर बाद में उन्होंने हामी भर दी.

कुछ और जरूरी खोजबीन के बाद डाक्टर मुकेश माथुर से अपना लिंग बदलवाने के लिए श्री गुजरात में उन से मिला और उन के अस्पताल में भरती

हो गया.

डाक्टर मुकेश माथुर ने सब से पहले उसे हार्मोन के इंजैक्शन देने शुरू किए और थैरेपी व दूसरी दवाएं भी देनी शुरू कीं, जिन के असर से कभीकभी श्री परेशान हो उठता. कभी वह मूड स्विंग्स का शिकार भी हो जाता था. औरत के स्वभाव के साथसाथ उस का शरीर भी एक औरत का हो जाएगा, यह सोच कर श्री ये सारे दर्द झेलता रहा.

40 साल के डाक्टर मुकेश माथुर शहर के जानेमाने सर्जन थे और उन्होंने कई इनाम भी जीते थे. उन्हें मरीज की मनोदशा का अच्छी तरह से पता था. वह  घंटों श्री का हाथ पकड़ कर उस के सिरहाने बैठे रहते और उसे हिम्मत बंधाते. श्री को उन का यह अपनापन बहुत अच्छा लगता था.

धीरेधीरे दवाएं और हार्मोन का असर श्री के शरीर पर आने लगा. सीने पर उभार आने लगे और शरीर के बाल पतले हो कर गायब होने लगे.

आखिर वह दिन भी आया, जब डाक्टर मुकेश माथुर ने श्री को औरत घोषित कर दिया.

डाक्टर माथुर ने श्री को नया नाम भी दिया, ‘‘नए शरीर के साथ तुम्हारा नया नाम होगा सिया.’’

श्री अपने नए नाम सिया को बारबार दोहरा रहा था और ऐसा करते समय उस की आंखों से आंसू लगातार बहे जा  रहे थे.

श्री से सिया बन कर उस के जीने  का अंदाज ही बदल गया था. सिया अपनेआप को घंटों आईने के सामने निहारती रहती थी.

उस ने सिया के नाम से नया फेसबुक एकाउंट भी बना लिया था. सब से पहली फ्रैंड रिक्वेस्ट उस ने अमर को भेजी. एक खूबसूरत लड़की का फोटो देख कर अमर ने तुरंत ही फ्रैंडशिप स्वीकार कर ली. धीरेधीरे फोन नंबरों का आपस में बदलना हुआ और अमर और सिया में बातचीत होने लगी.

सिया ने वीडियो काल कर अमर को अपनी खूबसूरती की एक झलक भी दिखला दी थी.

अमर सिया से मिलने के लिए बेचैन हो उठा और एक रैस्टोरैंट में बुलाया, फिर उसे बहाने से एक होटल के कमरे में ले गया. उस की मंशा सिया जैसी खूबसूरत लड़की को भोगने की थी, इसलिए वह सिया को बातों मे लगा कर उस के कपड़े उतारने लगा. सिया ने भी कोई विरोध नहीं किया. कुछ देर बाद सिया बिना कपड़ों के अमर के सामने खड़ी थी.

अमर अपलक सिया को निहारे जा रहा था. उसे अपनी बांहों में भर लिया था, पर जैसे ही सिया के शरीर में अमर ने समाने की कोशिश की, सिया ने उसे जोर का धक्का दिया.

यह देख अमर थोड़ा सा चौंक उठा, ‘‘अरे सिया, अब इतना नाटक क्यों कर रही हो?’’

‘‘मैं नाटक नहीं कर रही, बल्कि मैं तुम्हें यह अहसास कराना चाहती हूं कि तुम ने क्या खोया  है. यह सिया वही श्री है, जिस को तुम ने एक दिन अपनी बदनामी के डर से ठुकरा दिया था,’’  ऐसा कह कर सिया ने झट से कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गई.

अमर को अपने ऊपर भरोसा नहीं हो रहा था कि यह सब हकीकत थी या कोई छलावा था.

सिया अपने मांबाप के साथ रहने लगी. महल्ले के लोगों को पता चल चुका था कि श्री ही सिया है, इसलिए सब उसे अजीब नजरों से देखते थे. कभीकभी 15-16 साल के लड़के पीठ पीछे उसे ‘हिजड़ा’ बोल कर हंसते हुए चले  जाते थे.

पहलेपहल तो सिया ने ध्यान नहीं दिया, पर जब इन चीजों की हद होने लगी, तो सिया के मन में खटास आने लगी.

‘‘मैं कोई हिजड़ा नहीं, बल्कि पूरी औरत हूं,’’ सिया फुसफुसा उठती थी.

इस दौरान सिया को हार्मोन थैरेपी के लिए डाक्टर मुकेश माथुर के पास जाना पड़ता था. उस दिन 14 फरवरी यानी ‘वैलेंटाइन डे’ था. डाक्टर मुकेश माथुर ने हाथों में एक सुर्ख गुलाब ले कर सिया को दिया.

‘‘क्या आप किसी लड़की को लाल गुलाब देने का मतलब जानते हैं डाक्टर?’’ सिया ने पूछा.

‘‘अच्छी तरह जानता हूं, तभी तो दे रहा हूं.’’ डाक्टर मुकेश माथुर ने कहा, ‘‘तुम्हारी सर्जरी करने के बाद मुझे तुम से मिलतेमिलते इतना प्यार हो गया है कि अब तुम्हारे बिना मुझ से रहा नहीं जाता है, इसलिए मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

एक ट्रांसजैंडर बनने के बाद से ही सिया एक ऐसे इनसान को ढूंढ़ रही थी, जो उस के साथ शादी करने की हिम्मत जुटा सके और उसे औरत के जिस्म का अहसास करा सके.

सिया डाक्टर मुकेश माथुर की ये बातें सुन कर फूली नहीं समा रही थी. उसे लग रहा था कि उस का सपना पूरा हो गया है.

सिया के मांबाप को भला इस फैसले से क्या एतराज होता… उन्होंने उस की हां में हां मिला दी.

एक सादा समारोह में डाक्टर मुकेश माथुर ने सिया से शादी कर ली. एक ट्रांसजैंडर की एक डाक्टर से शादी को लोकल अखबारों ने प्रमुखता से जगह दी. सोशल मीडिया पर भी डाक्टर मुकेश माथुर और सिया की शादी खूब सुर्खियों में रही.

शादी के बाद डाक्टर मुकेश और सिया जी भर कर सैक्स का सुख लेने लगे. अपने शरीर को ले कर सिया का हर तरह का डर खत्म हो गया था.

आज कुछ मीडिया वाले डाक्टर मुकेश माथुर का इंटरव्यू लेने आए थे, जो उन से बारबार वही जानना चाह रहे थे कि एक ट्रांसजैंडर के साथ शादी कर के उन्हें कैसा लग रहा है. पत्रकार घुमाफिरा कर उन के सैक्स संबंधों के बारे में ही सवाल पूछ रहे थे. उन के हर सवाल का डाक्टर मुकेश माथुर बड़ी गर्मजोशी से जवाब दे रहे थे.

पत्रकारवार्त्ता खत्म होने के बाद डाक्टर मुकेश माथुर के मोबाइल पर एक फोन आया, जिसे सुन कर वे बहुत खुश हुए और सिया से बोले, ‘‘सुनो सिया, मैं ने एक लिंग बदले हुए एक लड़के से शादी की है. मेरे इस हिम्मती फैसले के लिए मुझे मानव कल्याण संस्था वाले एक अवार्ड दे रहे हैं,’’ डाक्टर मुकेश चहक रहे थे. उन को खुश देख कर सिया भी खुश हो गई.

2 दिन बाद ही डाक्टर मुकेश माथुर को जब अवार्ड मिल गया, तो उस ने अपने कुछ डाक्टर साथियों को इस खुशी में घर पर पार्टी के लिए बुलाया. सारा खाना बाहर से मंगवाया गया था और महंगी वाली शराब का दौर चल रहा था. मुकेश के सभी साथी नशे में झूमने लगे थे.

‘‘यार मुकेश, शराब तो तू ने पिला दी, पर शबाब के लिए अपनी उस ट्रांसजैंडर बीवी को ही बुला ले,’’ एक साथी ने कहा.

‘‘हां यार, बड़ा मूड हो रहा है,’’ दूसरे साथी ने कहा.

‘‘नहीं यार, भले ही वह ट्रांसजैंडर हो, पर है तो उस की बीवी ही,’’ दूसरे दोस्त ने बचाव किया.

‘‘इन ट्रांसजैंडर की भी क्या इज्जत और क्या बेइज्जती? ये तो ग्रुप सैक्स के लिए भी राजी हो जाते हैं.’’

कमाल की बात यह थी कि डाक्टर मुकेश माथुर उन सब की बातों का कोई विरोध नहीं कर रहे थे, बल्कि उन की हां में हां मिला रहे थे.

दीवार के पीछे खड़ी सिया यह सब सुन रही थी. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. इतने में सिया ने अपनी पीठ पर किसी का मजबूत हाथ महसूस किया. ये डाक्टर मुकेश माथुर थे.

मुकेश सिया को घसीटते हुए अपने साथियों के सामने ले गए और बोले, ‘‘लो दोस्तो, शराब के बाद शबाब… मजे ले लो इस के.’’

‘‘यह आप क्या कर रहे हैं, मैं आप की पत्नी हूं.’’

डाक्टर मुकेश माथुर बड़ी जोर से हंस पड़े, ‘‘अरे ओ… मैं ने तुझ जैसे हिजड़े सौरी, ट्रांसजैंडर से शादी इसलिए की है कि मुझे समाज में सम्मान मिल सके, अवार्ड मिल सके… और मैं एक हिजड़े का उद्धार करने वाले डाक्टर के रूप मे जाना जाऊं,’’ नशे में डाक्टर मुकेश माथुर बुरी तरह हावी हो रहे थे, जबकि डाक्टर मुकेश के साथी सिया के कपड़े खींचने में लगे हुए थे.

ये भी पढ़ें- सांझा दुख: मां के चेहरे पर खामोशी क्यों थी

कुछ ही देर में सिया उन सब के सामने नंगी खड़ी हुई फफक रही थी. वह हाथों से अपने सीने को ढकने की नाकाम कोशिश कर रही थी कि एक आदमी ने उसे बिस्तर पर गिरा लिया.

उस के बाद सभी लोगों ने बारीबारी से सिया के साथ मुंह काला किया और इस घटना का वीडियो भी बनाया, ताकि इस रेप की यादें ताजा रहें.

अगली सुबह जब सिया को होश आया, तब कमरे में कोई नहीं था, सिर्फ शराब और सिगरेट की बदबू थी.

सिया ने किसी तरह से कपड़े  पहने और उस की नजर आईने के टूटे हुए टुकड़ों पर पड़ी, जो उसे चिढ़ा  रहे थे मानो कह रहे हों कि तू एक हिजड़ा है, तू एक ट्रांसजैंडर है और  तुझे समाज वाले इज्जत की नजर  से कभी नहीं देखेंगे, बड़ी चली थी शादी करने…

सिया ने भरे मन से टूटे आईने का एक टुकड़ा उठाया और अपनी कलाई की नस को काट लिया. उस की कलाई से खून तेजी से टपकने लगा था.  सिया के कानों में अब भी आवाजें गूंज रही थीं… ‘ट्रांसजैंडर, हिजड़ा… हिजड़ा…’

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लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

‘छनाक’ की आवाज के साथ आईना चकनाचूर हो गया था. आईने का हर टुकड़ा सिया का अक्स दिखा रहा था. मांग में भरा सिंदूर, गले का मंगलसूत्र, कानों के कुंडल ये सब मानो सिया को चिढ़ा रहे थे. शायद समाज के दोहरेपन के आगे वह हार मान चुकी थी. एकसाथ कई सवाल उस के मन में उमड़घुमड़ रहे थे.

आईने के नुकीले टुकड़ों में सिया को उस के सवालों का जवाब नहीं मिल सका. आंखों में आंसुओं के साथ पिछली यादें किसी फिल्म की तरह सिया की आंखों के सामने से गुजरने लगी थीं.

श्री नाम था उस का. 20 साल का होतेहोते वह और उस के मांबाप ये समझ चुके थे कि श्री का शरीर भले ही एक मर्द का हो, पर उस के अंदर का मन एक औरत का ही है.

मांबाप ने श्री को कई डाक्टरों को दिखाया, इलाज भी चला, पर कोई फायदा नहीं हुआ. डाक्टरों ने श्री को ‘जैंडर आइडैंटिटी डिसऔर्डर’ का मरीज बताया, जिस में शरीर तो औरत या मर्द का हो सकता है, पर हावभाव और लक्षण विपरीत लिंग के होते हैं.

श्री के नैननक्श तीखे थे. उस के चेहरे की खूबसूरती और चमक से लड़कियों को जलन होना लाजिमी था. वह लड़कियों के कपड़े पहनता, उन की तरह हावभाव रखता, गाने गाता और लड़कियों की तरह डांस करना उसे बहुत अच्छा लगता था. किसी से बात करते समय लचकनामचकना श्री की आदत थी.

श्री 22 साल का हो चुका था. बाहर जाने पर लड़कियों जैसे कपड़े पहनने लगा था वह… मानो अब उसे जमाने के कहनेसुनने की कोई परवाह नहीं थी. उस ने अमर नाम का एक दोस्त बनाया, जिसे वह अपना बौयफ्रैंड कहता था.

अमर को इस बात का अहसास था कि श्री की हरकतें लड़कियों जैसी हैं, पर उसे तो सिर्फ श्री के पैसे से मजे करने थे, इसलिए वह उस के नाज उठाता था.

आज वे दोनों श्री का जन्मदिन मनाने के लिए किसी रैस्टोरैंट में जाने वाले थे.  इस खास दिन के लिए श्री ने अपने लंबे बालों को खुला छोड़ा हुआ था और वह सलवारसूट पहने था.

उन दोनों को वापसी में रात के साढ़े 11 बजे गए थे. अमर और श्री एकदूसरे का हाथ पकड़े गाड़ी की पार्किंग की तरफ बढ़ रहे थे.

‘‘अरे लगता है, मैं अपना मोबाइल रैस्टोरैंट में ही भूल आया हूं,’’ कह कर अमर अंदर की ओर लपक गया, जबकि श्री बाहर ही उस के आने का इंतजार करने लगा.

एक बड़ी सी गाड़ी श्री के ठीक सामने आ कर खड़ी हुई और उन में से बाहर निकले एक बलशाली लड़के ने श्री को अंदर घसीट लिया और उस के मुंह पर टेप लगा दिया, ताकि वह शोर न मचा सके. गाड़ी को वे लोग एक आधी बनी बिल्डिंग के पास ले गए और श्री को बाहर घसीटा.

‘‘आज बहुत दिनों बाद कोई चिकना माल मिला है,’’ श्री के कपड़े फाड़ते हुए एक वहशी बोला, पर अगले ही पल वह बुरी तरह चौंक गया, ‘‘अरे, यह तो लड़की के वेश में लड़का है. क्यों बे, लड़की बन कर घूमने में ज्यादा मजा आता है क्या?’’ कह कर उस वहशी ने श्री के गाल पर 2-4 घूंसे रसीद कर

दिए थे.

‘‘अब क्या करें, सारे मूड का तो सत्यानाश हो गया, अब मूड कैसे फ्रैश करें?’’ दूसरा लड़का बोला.

‘‘भाई तुम लोग अपना सोच लो, मुझे तो आज इस लड़के के साथ ही मजे लेना है. कभीकभी स्वाद भी तो बदलना चाहिए न,’’ इतना कह कर वह लड़का श्री के साथ जबरदस्ती करने लगा और फिर कुछ देर बाद बारीबारी से तीनों दोस्तों ने भी श्री के साथ मुंह काला किया और उसे तड़पती हालत में छोड़ कर वहां से चले गए.

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बेहोशी की हालत में श्री कब तक रहा, उसे कुछ पता नहीं था. आंखें खुलीं, तो उस ने अपनेआप को एक अस्पताल में पाया. पुलिस वाले उस के सामने खड़े थे.

‘‘तो आप का कहना है कि आप के बेटे का रेप हुआ है,’’ पुलिस वाले ने श्री के पिता से पूछा.

‘‘जी.’’

‘‘हमें पीडि़त का बयान लेना होगा,’’ इंस्पैक्टर ने कहा और श्री से कुछ अटपटे सवाल पूछने के बाद जल्द ही कार्यवाही करने की बात कह कर बाहर निकलते हुए पुलिस कांस्टेबल इंस्पैक्टर से कह रहा था, ‘‘साहब, ये सब अमीर घर के लड़कों  के चोंचले हैं, पहले लड़की बन कर घूमते हैं और फिर रेप करवा कर हमारे लिए काम बढ़ा देते हैं. हिजड़े कहीं के.’’

‘हिजड़े…’ श्री को यह शब्द गाली की तरह चुभा था. उस का कलेजा अंदर तक छलनी हो गया था.

यह पहला मौका था, जब उसे अपनी इस दोहरी जिंदगी जीने के ढंग पर शर्म आई थी.

तकरीबन 5 दिन तक अस्पताल में रहने के बाद श्री अपने मांबाप के साथ  घर आया और अपने बौयफ्रैंड अमर को फोन लगाया.

काफी देर बाद अमर ने उस का फोन उठाया और सीधे शब्दों में कह दिया कि तुम्हारे साथ जो हादसा हुआ है, उस से हमारी काफी बदनामी हो गई है, इसलिए वह उस के साथ अब कोई संबंध नहीं रखना चाहता.

जिस दोस्त की अब उसे सब से ज्यादा जरूरत थी, उसी ने उस का साथ छोड़ दिया. श्री काफी परेशान हो उठा.

श्री ने अपने मर्दाना पर बेजान से पड़े हुए अंग को देखा और नफरत से भर गया. यह पहला मौका था, जब श्री ने अपना लिंग बदलवाने की बात गहराई से सोची, इस के लिए सब से पहले उस ने इंटरनैट खंगालना शुरू किया.

श्री के जैसे लक्षणों वाले और बहुत से लोग हैं इस दुनिया में. यह बात उसे पता चली, तो उस के मन को थोड़ा सुकून मिला और गहरे जाने पर उसे बहुत सी नई बातें पता चलीं. उस में से एक बात यह भी थी कि अब लिंग कोई बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है और 10 लाख से भी कम खर्चे में भारत में ही रह कर अपना लिंग बदलवाया जा सकता है.

ये सारी बातें जान कर श्री ने अपने मांबाप से बात की, तो पहले तो वे  सकते में आ गए, पर बाद में उन्होंने हामी भर दी.

कुछ और जरूरी खोजबीन के बाद डाक्टर मुकेश माथुर से अपना लिंग बदलवाने के लिए श्री गुजरात में उन से मिला और उन के अस्पताल में भरती

हो गया.

डाक्टर मुकेश माथुर ने सब से पहले उसे हार्मोन के इंजैक्शन देने शुरू किए और थैरेपी व दूसरी दवाएं भी देनी शुरू कीं, जिन के असर से कभीकभी श्री परेशान हो उठता. कभी वह मूड स्विंग्स का शिकार भी हो जाता था. औरत के स्वभाव के साथसाथ उस का शरीर भी एक औरत का हो जाएगा, यह सोच कर श्री ये सारे दर्द झेलता रहा.

40 साल के डाक्टर मुकेश माथुर शहर के जानेमाने सर्जन थे और उन्होंने कई इनाम भी जीते थे. उन्हें मरीज की मनोदशा का अच्छी तरह से पता था. वह  घंटों श्री का हाथ पकड़ कर उस के सिरहाने बैठे रहते और उसे हिम्मत बंधाते. श्री को उन का यह अपनापन बहुत अच्छा लगता था.

धीरेधीरे दवाएं और हार्मोन का असर श्री के शरीर पर आने लगा. सीने पर उभार आने लगे और शरीर के बाल पतले हो कर गायब होने लगे.

आखिर वह दिन भी आया, जब डाक्टर मुकेश माथुर ने श्री को औरत घोषित कर दिया.

डाक्टर माथुर ने श्री को नया नाम भी दिया, ‘‘नए शरीर के साथ तुम्हारा नया नाम होगा सिया.’’

श्री अपने नए नाम सिया को बारबार दोहरा रहा था और ऐसा करते समय उस की आंखों से आंसू लगातार बहे जा  रहे थे.

श्री से सिया बन कर उस के जीने  का अंदाज ही बदल गया था. सिया अपनेआप को घंटों आईने के सामने निहारती रहती थी.

उस ने सिया के नाम से नया फेसबुक एकाउंट भी बना लिया था. सब से पहली फ्रैंड रिक्वेस्ट उस ने अमर को भेजी. एक खूबसूरत लड़की का फोटो देख कर अमर ने तुरंत ही फ्रैंडशिप स्वीकार कर ली. धीरेधीरे फोन नंबरों का आपस में बदलना हुआ और अमर और सिया में बातचीत होने लगी.

सिया ने वीडियो काल कर अमर को अपनी खूबसूरती की एक झलक भी दिखला दी थी.

अमर सिया से मिलने के लिए बेचैन हो उठा और एक रैस्टोरैंट में बुलाया, फिर उसे बहाने से एक होटल के कमरे में ले गया. उस की मंशा सिया जैसी खूबसूरत लड़की को भोगने की थी, इसलिए वह सिया को बातों मे लगा कर उस के कपड़े उतारने लगा. सिया ने भी कोई विरोध नहीं किया. कुछ देर बाद सिया बिना कपड़ों के अमर के सामने खड़ी थी.

अमर अपलक सिया को निहारे जा रहा था. उसे अपनी बांहों में भर लिया था, पर जैसे ही सिया के शरीर में अमर ने समाने की कोशिश की, सिया ने उसे जोर का धक्का दिया.

यह देख अमर थोड़ा सा चौंक उठा, ‘‘अरे सिया, अब इतना नाटक क्यों कर रही हो?’’

‘‘मैं नाटक नहीं कर रही, बल्कि मैं तुम्हें यह अहसास कराना चाहती हूं कि तुम ने क्या खोया  है. यह सिया वही श्री है, जिस को तुम ने एक दिन अपनी बदनामी के डर से ठुकरा दिया था,’’  ऐसा कह कर सिया ने झट से कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गई.

अमर को अपने ऊपर भरोसा नहीं हो रहा था कि यह सब हकीकत थी या कोई छलावा था.

सिया अपने मांबाप के साथ रहने लगी. महल्ले के लोगों को पता चल चुका था कि श्री ही सिया है, इसलिए सब उसे अजीब नजरों से देखते थे. कभीकभी 15-16 साल के लड़के पीठ पीछे उसे ‘हिजड़ा’ बोल कर हंसते हुए चले  जाते थे.

पहलेपहल तो सिया ने ध्यान नहीं दिया, पर जब इन चीजों की हद होने लगी, तो सिया के मन में खटास आने लगी.

‘‘मैं कोई हिजड़ा नहीं, बल्कि पूरी औरत हूं,’’ सिया फुसफुसा उठती थी.

इस दौरान सिया को हार्मोन थैरेपी के लिए डाक्टर मुकेश माथुर के पास जाना पड़ता था. उस दिन 14 फरवरी यानी ‘वैलेंटाइन डे’ था. डाक्टर मुकेश माथुर ने हाथों में एक सुर्ख गुलाब ले कर सिया को दिया.

‘‘क्या आप किसी लड़की को लाल गुलाब देने का मतलब जानते हैं डाक्टर?’’ सिया ने पूछा.

‘‘अच्छी तरह जानता हूं, तभी तो दे रहा हूं.’’ डाक्टर मुकेश माथुर ने कहा, ‘‘तुम्हारी सर्जरी करने के बाद मुझे तुम से मिलतेमिलते इतना प्यार हो गया है कि अब तुम्हारे बिना मुझ से रहा नहीं जाता है, इसलिए मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

एक ट्रांसजैंडर बनने के बाद से ही सिया एक ऐसे इनसान को ढूंढ़ रही थी, जो उस के साथ शादी करने की हिम्मत जुटा सके और उसे औरत के जिस्म का अहसास करा सके.

सिया डाक्टर मुकेश माथुर की ये बातें सुन कर फूली नहीं समा रही थी. उसे लग रहा था कि उस का सपना पूरा हो गया है.

सिया के मांबाप को भला इस फैसले से क्या एतराज होता… उन्होंने उस की हां में हां मिला दी.

एक सादा समारोह में डाक्टर मुकेश माथुर ने सिया से शादी कर ली. एक ट्रांसजैंडर की एक डाक्टर से शादी को लोकल अखबारों ने प्रमुखता से जगह दी. सोशल मीडिया पर भी डाक्टर मुकेश माथुर और सिया की शादी खूब सुर्खियों में रही.

शादी के बाद डाक्टर मुकेश और सिया जी भर कर सैक्स का सुख लेने लगे. अपने शरीर को ले कर सिया का हर तरह का डर खत्म हो गया था.

आज कुछ मीडिया वाले डाक्टर मुकेश माथुर का इंटरव्यू लेने आए थे, जो उन से बारबार वही जानना चाह रहे थे कि एक ट्रांसजैंडर के साथ शादी कर के उन्हें कैसा लग रहा है. पत्रकार घुमाफिरा कर उन के सैक्स संबंधों के बारे में ही सवाल पूछ रहे थे. उन के हर सवाल का डाक्टर मुकेश माथुर बड़ी गर्मजोशी से जवाब दे रहे थे.

पत्रकारवार्त्ता खत्म होने के बाद डाक्टर मुकेश माथुर के मोबाइल पर एक फोन आया, जिसे सुन कर वे बहुत खुश हुए और सिया से बोले, ‘‘सुनो सिया, मैं ने एक लिंग बदले हुए एक लड़के से शादी की है. मेरे इस हिम्मती फैसले के लिए मुझे मानव कल्याण संस्था वाले एक अवार्ड दे रहे हैं,’’ डाक्टर मुकेश चहक रहे थे. उन को खुश देख कर सिया भी खुश हो गई.

2 दिन बाद ही डाक्टर मुकेश माथुर को जब अवार्ड मिल गया, तो उस ने अपने कुछ डाक्टर साथियों को इस खुशी में घर पर पार्टी के लिए बुलाया. सारा खाना बाहर से मंगवाया गया था और महंगी वाली शराब का दौर चल रहा था. मुकेश के सभी साथी नशे में झूमने लगे थे.

‘‘यार मुकेश, शराब तो तू ने पिला दी, पर शबाब के लिए अपनी उस ट्रांसजैंडर बीवी को ही बुला ले,’’ एक साथी ने कहा.

‘‘हां यार, बड़ा मूड हो रहा है,’’ दूसरे साथी ने कहा.

‘‘नहीं यार, भले ही वह ट्रांसजैंडर हो, पर है तो उस की बीवी ही,’’ दूसरे दोस्त ने बचाव किया.

‘‘इन ट्रांसजैंडर की भी क्या इज्जत और क्या बेइज्जती? ये तो ग्रुप सैक्स के लिए भी राजी हो जाते हैं.’’

कमाल की बात यह थी कि डाक्टर मुकेश माथुर उन सब की बातों का कोई विरोध नहीं कर रहे थे, बल्कि उन की हां में हां मिला रहे थे.

दीवार के पीछे खड़ी सिया यह सब सुन रही थी. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. इतने में सिया ने अपनी पीठ पर किसी का मजबूत हाथ महसूस किया. ये डाक्टर मुकेश माथुर थे.

मुकेश सिया को घसीटते हुए अपने साथियों के सामने ले गए और बोले, ‘‘लो दोस्तो, शराब के बाद शबाब… मजे ले लो इस के.’’

‘‘यह आप क्या कर रहे हैं, मैं आप की पत्नी हूं.’’

डाक्टर मुकेश माथुर बड़ी जोर से हंस पड़े, ‘‘अरे ओ… मैं ने तुझ जैसे हिजड़े सौरी, ट्रांसजैंडर से शादी इसलिए की है कि मुझे समाज में सम्मान मिल सके, अवार्ड मिल सके… और मैं एक हिजड़े का उद्धार करने वाले डाक्टर के रूप मे जाना जाऊं,’’ नशे में डाक्टर मुकेश माथुर बुरी तरह हावी हो रहे थे, जबकि डाक्टर मुकेश के साथी सिया के कपड़े खींचने में लगे हुए थे.

ये भी पढ़ें- सांझा दुख: मां के चेहरे पर खामोशी क्यों थी

कुछ ही देर में सिया उन सब के सामने नंगी खड़ी हुई फफक रही थी. वह हाथों से अपने सीने को ढकने की नाकाम कोशिश कर रही थी कि एक आदमी ने उसे बिस्तर पर गिरा लिया.

उस के बाद सभी लोगों ने बारीबारी से सिया के साथ मुंह काला किया और इस घटना का वीडियो भी बनाया, ताकि इस रेप की यादें ताजा रहें.

अगली सुबह जब सिया को होश आया, तब कमरे में कोई नहीं था, सिर्फ शराब और सिगरेट की बदबू थी.

सिया ने किसी तरह से कपड़े  पहने और उस की नजर आईने के टूटे हुए टुकड़ों पर पड़ी, जो उसे चिढ़ा  रहे थे मानो कह रहे हों कि तू एक हिजड़ा है, तू एक ट्रांसजैंडर है और  तुझे समाज वाले इज्जत की नजर  से कभी नहीं देखेंगे, बड़ी चली थी शादी करने…

सिया ने भरे मन से टूटे आईने का एक टुकड़ा उठाया और अपनी कलाई की नस को काट लिया. उस की कलाई से खून तेजी से टपकने लगा था.  सिया के कानों में अब भी आवाजें गूंज रही थीं… ‘ट्रांसजैंडर, हिजड़ा… हिजड़ा…’

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March 04, 2022 at 09:00AM

कद्रदान- भाग 1: समीर और प्रभा के बीच क्या हुआ था?

‘‘अरे, वह लाइट वाला आया क्या? कितनी बार फोन कर चुका हूं. केवल 2 दिन ही तो बचे हैं. अब तक तो चारों ओर लाइटें लग जानी चाहिए थीं. रंगबिरंगी जगमगाती लाइटों और सजावट से ही तो उत्सव की भव्यता का आभास होता है वरना एक आम दिन और एक खास दिन में कुछ फर्क ही महसूस नहीं होता,’’ समीर ने ?ाल्लाते हुए कहा और एक बार फिर लाइट वाले को फोन मिलाया.

‘‘अरे भैया, गृहप्रवेश में केवल

2 दिन बचे हैं और आज से ही मेहमान आने शुरू हो जाएंगे और तुम अभी तक नहीं आए? भाई साहब, काम नहीं करना तो मना कर दो. हम किसी और से करवा लेंगे.’’

उधर से पता नहीं लाइट वाले ने क्या कहा कि समीर ने फोन बंद कर दिया और फिर फुरती से दूसरी ओर बढ़ा ही था कि दीप्ति की आवाज आई, ‘‘सुनो, जरा ड्राइवर को बुला देना. मु?ो पार्लर जाना है. फेशियल करवा लूं. 2 दिनों बाद फंक्शन है, सो, चेहरे पर थोड़ा ग्लो आ जाएगा.’’

‘‘अरे भाई, आ जाएगा ड्राइवर और फिर ग्लो भी आ जाएगा पर पहले मु?ो एक बात बता दो कि घर में या बाहर कोई भी छोटामोटा फंक्शन हो, तुम महिलाएं सब से पहले ब्यूटीपार्लर की ओर क्यों भागती हो? अजी, मकान का नांगल है. सब लोग तुम्हें नहीं, मकान को देखेंगे.’’

‘‘बस, यही बात तो तुम मर्द आज तक सम?ा नहीं पाए. भई, मकान अपनी जगह है और मकानमालकिन अपनी जगह. सब मकान के साथसाथ मु?ो भी तो देखेंगे. खासकर, तुम्हारे मित्र,’’ दीप्ति ने चुटकी ली तो समीर खिसिया गया.

‘अरे, याद आया, बुटीक वाली को भी तो फोन करना है. मेरा ब्लाउज तैयार किया या नहीं. यह तो शुक्र है कि साड़ी तैयार हो गई,’ दीप्ति बड़बड़ाई और बुटीक वाली को फोन करने में व्यस्त हो गई.

अभी वह फोन पर बात कर के हटी ही थी कि समीर फिर उस के पास आया, ‘‘सुनो, प्रेमा का फोन आया था. कल दोपहर 3 बजे वाली ट्रेन से आ रही हैं. साथ में कुंवर साहब तथा दोनों बच्चे भी हैं.’’ प्रेमा समीर की बहन थी.

‘‘अच्छी बात है. मैं ने वह बड़ा वाला कमरा साफ करवा दिया था. प्रेमा दीदी को वही कमरा दे देंगे. काफी बड़ा है. चारों आराम से रह जाएंगे,’’ दीप्ति ने कहा.

दीप्ति की बात सुन कर समीर बोला, ‘‘अभी तो एसी रूम ही खाली पड़े हैं.

मेरे खयाल से तो वही रूम देना ही ठीक रहेगा.’’

ये भी पढ़ें- तुम देना साथ मेरा: अजय के साथ कौन-सा हादसा हुआ?

‘‘अरे, उन्हें कहां आदत है एसी में सोने की और बहुत से रिश्तेदार आएंगे जो एसी के बिना नहीं सो सकते. उन के लिए रखो,’’ दीप्ति ने कहा.

‘‘ठीक है, जैसा तुम मुनासिब सम?ा. मैं फोन कर के पता कर लूंगा कि ट्रेन कितने बजे पहुंचेगी, फिर हम उसी मुताबिक उन्हें लाने के लिए गाड़ी भेज देंगे.’’

‘‘फिर वही बात… अरे भई, गाड़ी भेजने की कहां जरूरत है? किसकिस को भेजोगे गाड़ी? कुंवरजी साथ हैं, औटो कर के आ जाएंगे. हमें और पचासों काम हैं. ऐसे फालतू पचड़ों में मत पड़ो. मेहमान आ रहे हैं, उन का स्वागत करना है. यह फालतू की तीमारदारी मत करो. अरे, यह ड्राइवर नहीं आया अभी तक. बेवजह देर हो रही है. पता नहीं पार्लर वाली फ्री होगी कि नहीं. फोन कर के पता करती हूं और पहले से अपौइंटमैंट ले लेती हूं.’’

इस तरह समीर और दीप्ति 2 दिनों बाद होने वाले अपने नवनिर्मित निवास के गृहप्रवेश के दौरान होने वाले कार्यक्रमों की तैयारी कर रहे थे और आने वाले मेहमानों की आवभगत करने की योजना बना रहे थे. समीर और दीप्ति का एक ही बेटा था जो मुंबई में किसी प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा था

और इस आयोजन में शरीक नहीं हो पा रहा था.

समीर ने बहुत सोचसम?ा कर यह मकान बनवाया था. कई वर्षों तक तो उस का खयाल था मकान बनवाना ही नहीं चाहिए क्योंकि जितना पैसा मकान बनवाने में खर्च होता है उसी पूंजी के ब्याज में आराम से एक किराए के मकान में रह कर घर खर्च भी निकाला जा सकता है और पूंजी सुरक्षित की सुरक्षित रहती है या फिर आजकल तो पैसों को इनवैस्ट करने के लिए म्यूचुअल फंड, क्रिप्टो या बिटक्वाइन जैसे प्लेटफौर्म्स भी हैं, पर फिर बच्चों के विवाह, सामाजिक प्रतिष्ठा और दीप्ति की जिद के आगे उसे ?ाकना पड़ा था और उस ने यह मकान बनवाने का निर्णय लिया था.

फिर भी उस का मानना यही था कि वह मकान पर जरूरत से ज्यादा खर्च नहीं करेगा. मकान सुविधा संपन्न अवश्य होगा पर सजावट और विलासिता के नाम पर पैसा खर्च करने में समीर का विश्वास नहीं था. वैसे भी, एक मध्यवर्गीय परिवार के लिए ऐसा ही मकान बनवा पाना संभव था.

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‘‘अरे, वह लाइट वाला आया क्या? कितनी बार फोन कर चुका हूं. केवल 2 दिन ही तो बचे हैं. अब तक तो चारों ओर लाइटें लग जानी चाहिए थीं. रंगबिरंगी जगमगाती लाइटों और सजावट से ही तो उत्सव की भव्यता का आभास होता है वरना एक आम दिन और एक खास दिन में कुछ फर्क ही महसूस नहीं होता,’’ समीर ने ?ाल्लाते हुए कहा और एक बार फिर लाइट वाले को फोन मिलाया.

‘‘अरे भैया, गृहप्रवेश में केवल

2 दिन बचे हैं और आज से ही मेहमान आने शुरू हो जाएंगे और तुम अभी तक नहीं आए? भाई साहब, काम नहीं करना तो मना कर दो. हम किसी और से करवा लेंगे.’’

उधर से पता नहीं लाइट वाले ने क्या कहा कि समीर ने फोन बंद कर दिया और फिर फुरती से दूसरी ओर बढ़ा ही था कि दीप्ति की आवाज आई, ‘‘सुनो, जरा ड्राइवर को बुला देना. मु?ो पार्लर जाना है. फेशियल करवा लूं. 2 दिनों बाद फंक्शन है, सो, चेहरे पर थोड़ा ग्लो आ जाएगा.’’

‘‘अरे भाई, आ जाएगा ड्राइवर और फिर ग्लो भी आ जाएगा पर पहले मु?ो एक बात बता दो कि घर में या बाहर कोई भी छोटामोटा फंक्शन हो, तुम महिलाएं सब से पहले ब्यूटीपार्लर की ओर क्यों भागती हो? अजी, मकान का नांगल है. सब लोग तुम्हें नहीं, मकान को देखेंगे.’’

‘‘बस, यही बात तो तुम मर्द आज तक सम?ा नहीं पाए. भई, मकान अपनी जगह है और मकानमालकिन अपनी जगह. सब मकान के साथसाथ मु?ो भी तो देखेंगे. खासकर, तुम्हारे मित्र,’’ दीप्ति ने चुटकी ली तो समीर खिसिया गया.

‘अरे, याद आया, बुटीक वाली को भी तो फोन करना है. मेरा ब्लाउज तैयार किया या नहीं. यह तो शुक्र है कि साड़ी तैयार हो गई,’ दीप्ति बड़बड़ाई और बुटीक वाली को फोन करने में व्यस्त हो गई.

अभी वह फोन पर बात कर के हटी ही थी कि समीर फिर उस के पास आया, ‘‘सुनो, प्रेमा का फोन आया था. कल दोपहर 3 बजे वाली ट्रेन से आ रही हैं. साथ में कुंवर साहब तथा दोनों बच्चे भी हैं.’’ प्रेमा समीर की बहन थी.

‘‘अच्छी बात है. मैं ने वह बड़ा वाला कमरा साफ करवा दिया था. प्रेमा दीदी को वही कमरा दे देंगे. काफी बड़ा है. चारों आराम से रह जाएंगे,’’ दीप्ति ने कहा.

दीप्ति की बात सुन कर समीर बोला, ‘‘अभी तो एसी रूम ही खाली पड़े हैं.

मेरे खयाल से तो वही रूम देना ही ठीक रहेगा.’’

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‘‘अरे, उन्हें कहां आदत है एसी में सोने की और बहुत से रिश्तेदार आएंगे जो एसी के बिना नहीं सो सकते. उन के लिए रखो,’’ दीप्ति ने कहा.

‘‘ठीक है, जैसा तुम मुनासिब सम?ा. मैं फोन कर के पता कर लूंगा कि ट्रेन कितने बजे पहुंचेगी, फिर हम उसी मुताबिक उन्हें लाने के लिए गाड़ी भेज देंगे.’’

‘‘फिर वही बात… अरे भई, गाड़ी भेजने की कहां जरूरत है? किसकिस को भेजोगे गाड़ी? कुंवरजी साथ हैं, औटो कर के आ जाएंगे. हमें और पचासों काम हैं. ऐसे फालतू पचड़ों में मत पड़ो. मेहमान आ रहे हैं, उन का स्वागत करना है. यह फालतू की तीमारदारी मत करो. अरे, यह ड्राइवर नहीं आया अभी तक. बेवजह देर हो रही है. पता नहीं पार्लर वाली फ्री होगी कि नहीं. फोन कर के पता करती हूं और पहले से अपौइंटमैंट ले लेती हूं.’’

इस तरह समीर और दीप्ति 2 दिनों बाद होने वाले अपने नवनिर्मित निवास के गृहप्रवेश के दौरान होने वाले कार्यक्रमों की तैयारी कर रहे थे और आने वाले मेहमानों की आवभगत करने की योजना बना रहे थे. समीर और दीप्ति का एक ही बेटा था जो मुंबई में किसी प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा था

और इस आयोजन में शरीक नहीं हो पा रहा था.

समीर ने बहुत सोचसम?ा कर यह मकान बनवाया था. कई वर्षों तक तो उस का खयाल था मकान बनवाना ही नहीं चाहिए क्योंकि जितना पैसा मकान बनवाने में खर्च होता है उसी पूंजी के ब्याज में आराम से एक किराए के मकान में रह कर घर खर्च भी निकाला जा सकता है और पूंजी सुरक्षित की सुरक्षित रहती है या फिर आजकल तो पैसों को इनवैस्ट करने के लिए म्यूचुअल फंड, क्रिप्टो या बिटक्वाइन जैसे प्लेटफौर्म्स भी हैं, पर फिर बच्चों के विवाह, सामाजिक प्रतिष्ठा और दीप्ति की जिद के आगे उसे ?ाकना पड़ा था और उस ने यह मकान बनवाने का निर्णय लिया था.

फिर भी उस का मानना यही था कि वह मकान पर जरूरत से ज्यादा खर्च नहीं करेगा. मकान सुविधा संपन्न अवश्य होगा पर सजावट और विलासिता के नाम पर पैसा खर्च करने में समीर का विश्वास नहीं था. वैसे भी, एक मध्यवर्गीय परिवार के लिए ऐसा ही मकान बनवा पाना संभव था.

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March 04, 2022 at 09:00AM

कद्रदान: समीर और प्रभा के बीच क्या हुआ था?

पैसा और रुतबा हो तो इंसान सामने वालों की कद्र करना छोड़ देता है, हर रिश्ते पर पैसा भारी पड़ने लगता है. समीर की बड़ी बहन प्रभा समीर के घर आईं तो वही हुआ जिस बात का डर था…

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पैसा और रुतबा हो तो इंसान सामने वालों की कद्र करना छोड़ देता है, हर रिश्ते पर पैसा भारी पड़ने लगता है. समीर की बड़ी बहन प्रभा समीर के घर आईं तो वही हुआ जिस बात का डर था…

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March 04, 2022 at 09:00AM

गोधरा में गोदनामा: किसने उसे जीने का सहारा दिया?

मरने के अलावा उसे और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. जीने के लिए उस के पास कुछ नहीं था. न पत्नी न बच्चे, न मकान, न दुकान. उस का सबकुछ लुट चुका था. एक लुटा हुआ इंसान, एक टूटा हुआ आदमी करे भी तो क्या?

उस का घर दंगाइयों ने जला दिया था. हरहर महादेव के नारे श्रीराम पर भी कहर बरपा चुके थे. वह हिंदू था लेकिन उस की पत्नी शबनम मुसलमान थी. उस के बेटे का नाम शंकर था. फिर भी वे गोधरा में चली नफरत की आग में स्वाहा हो चुके थे.

श्रीराम अपने व्यापार के काम से रतलाम गया हुआ था. तभी अचानक दंगे भड़क उठे. जंगल की आग को तो बुझाया जा सकता है लेकिन आग यदि नफरत की हो और उस पर धर्म का पैट्रोल छिड़का जाता रहे, प्रशासन दंगाइयों का उत्साहवर्द्धन करता रहे तो फिर मुश्किल है उस आग का बुझना. ऊपर से एक फोन आया प्रशासन को. लोगों का गुस्सा निकल जाने दो. जो हो रहा है होने दो. बस, फिर क्या था? मौत का खूनी खेल चलता रहा. जिन दोस्तों ने श्रीराम का विवाह करवाया था वे अब कट्टरपंथी बन चुके थे.

दंगाई जब श्रीराम के घर के पास पहुंचे तो किसी ने कहा, ‘‘इस की पत्नी मुसलमान है. इसे मार डालना जरूरी है.’’

दंगाइयों में श्रीराम के दोस्त भी शामिल थे. उस के एक दोस्त ने कहा, ‘‘नहीं, वह श्रीराम की पत्नी है. इस नाते वह भी हिंदू हुई.’’

दंगाई बोले, ‘‘यह हिंदू नहीं मुसलमान है. यह अब भी नमाज पढ़ती है. रोजे रखती है. इस ने अपना नाम और सरनेम भी नहीं बदला. इस ने अपने बेटे का नाम जरूर शंकर रखा है किंतु उसे शिक्षासंस्कार इस्लाम के ही दिए हैं. इस तरह श्रीराम की पत्नी और बेटा मुसलमान ही हुए.’’

श्रीराम के एक दोस्त ने कहा, ‘‘कृपया यह घर छोड़ दीजिए. यह हमारे दोस्त का घर है. इस में उस की पत्नी और बच्चे रहते हैं. कल जब वह वापस आएगा तो हम उसे क्या जवाब देंगे.’’

दंगाई भड़क उठे, ‘‘श्रीराम जैसे मर्दों को जीने का कोई अधिकार नहीं है. मुसलिम औरत से विवाह किया था तो उसे हिंदू बनाना था. हिंदुओं की तरह रहना सिखाना था. ऐसे ही लोग मुसलमानों को बढ़ावा देते हैं. देखते क्या हो? खत्म कर दो सब को और आग लगा दो घर में.’’

थोड़ी ही देर में उस की पत्नीबच्चा आग के दावानल में घिर जल कर राख हो गए. घर से लगी हुई उस की दुकान लूट कर जला दी गई. जब वह वापस आया तो उस का सबकुछ लुट चुका था. वह बरबाद हो चुका था. वह मरने के लिए घर से निकल पड़ा. पहले उस ने ट्रेन के नीचे आ कर मरने की सोची किंतु भारतीय रेल की लेटलतीफी और दंगों के कारण रेल पुलिस भी सजग हो चुकी थी.

ये भी पढ़ें- पति, पत्नी और बिंदास वो

आत्महत्या करने के अपराध में कहीं उसे गिरफ्तार न होना पड़े, इसलिए उस ने फसलों की सुरक्षा के लिए कीटनाशक की शीशी खरीदी और पूरी की पूरी मुंह में उड़ेल ली. थोड़ी देर बाद उसे चक्कर आने लगे. वह बेहोश हो कर गिर पड़ा. होश आया तो उस ने स्वयं को अस्पताल में पाया. उस के दोस्त शर्मिंदगी के भाव लिए उस के पास खड़े थे. उस से माफी मांग रहे थे. किंतु उन के माफी मांगने से उस का परिवार तो जीवित होने से रहा. उसे कोई शिकायत भी नहीं थी किसी से. वह तो हर हाल में मरना चाहता था.

अस्पताल घायलों की चीखपुकार से गूंज रहा था. श्रीराम सोच रहा था कि रात को वह अपनी नस काट लेगा ताकि उसे इस अकेले और लुटे जीवन से मुक्ति मिल सके. बिना प्यार, बिना सहारे, बिना घर, बिना दुकान के वह जी कर क्या करेगा? उस की पत्नी, उस का बच्चा, घर… सब कितने प्रेम से संजोया था उस ने. शबनम से विवाह के कारण उस का अपना परिवार भी छूट गया था. क्या करेगा वह शबनम और शंकर के बिना जी कर?

जिस बैड पर वह लेटा था उस के बगल में एक मासूम बच्ची थी. घायल, चोटग्रस्त. उफ, दंगाइयों ने इसे भी नहीं छोड़ा. न जाने कैसे बच गई थी. बच्ची को होश आ चुका था. वह रोने लगी. श्रीराम ने उसे सांत्वना दी, सहलाया. उस से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम?’’

बच्ची ने कराहते हुए कहा, ‘‘शबाना, और आप का?’’

‘‘श्रीराम.’’

बच्ची के चेहरे पर घबराहट के भाव आ गए.

वह बोली, ‘‘आप हिंदू हो. मुझे भी मार डालोगे.’’

‘‘मैं तो खुद तुम्हारी तरह अस्पताल में भरती हूं. मैं तुम्हें क्यों मारूंगा?’’

‘‘आप तो हिंदू हैं. फिर आप को क्यों मारा?’’

श्रीराम की आंखों में आंसू आ गए.

उसे रोता देख बच्ची ने कहा, ‘‘सौरी, अंकल, आप को मुसलमानों ने मारा होगा. मेरा पूरा घर जला दिया. मेरे अम्मीअब्बू को भी मार डाला. पता नहीं, मैं कैसे बच गई?’’ यह कह कर 10 वर्ष की मासूम शबाना रोने लगी.

‘अब इस बच्ची का क्या होगा?

इसे कौन सहारा देगा? कौन इसे पालेगापोसेगा?’ श्रीराम सोचने लगा. उस ने डाक्टर से पूछा कि ठीक होने के बाद इस बच्ची का क्या होगा?

डाक्टर ने कहा, ‘‘अभी तक तो कोई रिश्तेदार आया नहीं. एकदो दिन देखते हैं, वरना यतीमखाने भिजवाना पड़ेगा.’’

श्रीराम सोचने लगा कि वह भी इस दुनिया में अकेला है और यह बच्ची भी. क्यों न इसी बच्ची को जीने का सहारा बनाया जाए. श्रीराम को शबाना में अपना बेटा शंकर दिखने लगा. उस का शबाना से मेलमिलाप बढ़ चुका था. उस ने शबाना से पूछा, ‘‘तुम मेरी बेटी बनोगी?’’

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‘‘लेकिन आप तो हिंदू हैं.’’

‘‘ठीक है, तो मैं मुसलमान बन जाता हूं.’’

‘‘नहीं, अंकल, आप मुसलमान मत बनना. नहीं तो आप का भी घर जला देंगे.’’

‘‘तो तुम हिंदू बन जाओ.’’

‘‘नहीं, अंकल, मैं हिंदू नहीं बनूंगी. हिंदू लोग अच्छे नहीं होते. वे लोगों को मार डालते हैं. घर जला देते हैं.’’

‘‘तो फिर तुम्हीं बताओ, मेरी बेटी कैसे बनोगी?’’

शबाना ने दिमाग पर जोर लगाया, फिर कहा, ‘‘अंकल, आप हिंदू मैं मुसलमान. जब मुसलमान दंगे करेंगे तो मैं आप को बचाऊंगी और जब हिंदू दंगे करेंगे तो आप मुझे बचाना. क्यों, ठीक है न अंकल?’’

‘‘हां, ठीक है,’’ कह कर श्रीराम उदास हो गया. वह कैसे समझाए इस मासूम को कि दंगाइयों का कोई धर्म नहीं होता. होता तो उस की पत्नी शबनम और बेटा शंकर जिंदा होते. शैतानों का कोई ईमान नहीं होता.

बहरहाल, हुआ यों कि श्रीराम ने आत्महत्या का विचार त्याग दिया और शबाना को अपनी गोद में लिए शेष जीवन जीने में जुट गया.

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मरने के अलावा उसे और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. जीने के लिए उस के पास कुछ नहीं था. न पत्नी न बच्चे, न मकान, न दुकान. उस का सबकुछ लुट चुका था. एक लुटा हुआ इंसान, एक टूटा हुआ आदमी करे भी तो क्या?

उस का घर दंगाइयों ने जला दिया था. हरहर महादेव के नारे श्रीराम पर भी कहर बरपा चुके थे. वह हिंदू था लेकिन उस की पत्नी शबनम मुसलमान थी. उस के बेटे का नाम शंकर था. फिर भी वे गोधरा में चली नफरत की आग में स्वाहा हो चुके थे.

श्रीराम अपने व्यापार के काम से रतलाम गया हुआ था. तभी अचानक दंगे भड़क उठे. जंगल की आग को तो बुझाया जा सकता है लेकिन आग यदि नफरत की हो और उस पर धर्म का पैट्रोल छिड़का जाता रहे, प्रशासन दंगाइयों का उत्साहवर्द्धन करता रहे तो फिर मुश्किल है उस आग का बुझना. ऊपर से एक फोन आया प्रशासन को. लोगों का गुस्सा निकल जाने दो. जो हो रहा है होने दो. बस, फिर क्या था? मौत का खूनी खेल चलता रहा. जिन दोस्तों ने श्रीराम का विवाह करवाया था वे अब कट्टरपंथी बन चुके थे.

दंगाई जब श्रीराम के घर के पास पहुंचे तो किसी ने कहा, ‘‘इस की पत्नी मुसलमान है. इसे मार डालना जरूरी है.’’

दंगाइयों में श्रीराम के दोस्त भी शामिल थे. उस के एक दोस्त ने कहा, ‘‘नहीं, वह श्रीराम की पत्नी है. इस नाते वह भी हिंदू हुई.’’

दंगाई बोले, ‘‘यह हिंदू नहीं मुसलमान है. यह अब भी नमाज पढ़ती है. रोजे रखती है. इस ने अपना नाम और सरनेम भी नहीं बदला. इस ने अपने बेटे का नाम जरूर शंकर रखा है किंतु उसे शिक्षासंस्कार इस्लाम के ही दिए हैं. इस तरह श्रीराम की पत्नी और बेटा मुसलमान ही हुए.’’

श्रीराम के एक दोस्त ने कहा, ‘‘कृपया यह घर छोड़ दीजिए. यह हमारे दोस्त का घर है. इस में उस की पत्नी और बच्चे रहते हैं. कल जब वह वापस आएगा तो हम उसे क्या जवाब देंगे.’’

दंगाई भड़क उठे, ‘‘श्रीराम जैसे मर्दों को जीने का कोई अधिकार नहीं है. मुसलिम औरत से विवाह किया था तो उसे हिंदू बनाना था. हिंदुओं की तरह रहना सिखाना था. ऐसे ही लोग मुसलमानों को बढ़ावा देते हैं. देखते क्या हो? खत्म कर दो सब को और आग लगा दो घर में.’’

थोड़ी ही देर में उस की पत्नीबच्चा आग के दावानल में घिर जल कर राख हो गए. घर से लगी हुई उस की दुकान लूट कर जला दी गई. जब वह वापस आया तो उस का सबकुछ लुट चुका था. वह बरबाद हो चुका था. वह मरने के लिए घर से निकल पड़ा. पहले उस ने ट्रेन के नीचे आ कर मरने की सोची किंतु भारतीय रेल की लेटलतीफी और दंगों के कारण रेल पुलिस भी सजग हो चुकी थी.

ये भी पढ़ें- पति, पत्नी और बिंदास वो

आत्महत्या करने के अपराध में कहीं उसे गिरफ्तार न होना पड़े, इसलिए उस ने फसलों की सुरक्षा के लिए कीटनाशक की शीशी खरीदी और पूरी की पूरी मुंह में उड़ेल ली. थोड़ी देर बाद उसे चक्कर आने लगे. वह बेहोश हो कर गिर पड़ा. होश आया तो उस ने स्वयं को अस्पताल में पाया. उस के दोस्त शर्मिंदगी के भाव लिए उस के पास खड़े थे. उस से माफी मांग रहे थे. किंतु उन के माफी मांगने से उस का परिवार तो जीवित होने से रहा. उसे कोई शिकायत भी नहीं थी किसी से. वह तो हर हाल में मरना चाहता था.

अस्पताल घायलों की चीखपुकार से गूंज रहा था. श्रीराम सोच रहा था कि रात को वह अपनी नस काट लेगा ताकि उसे इस अकेले और लुटे जीवन से मुक्ति मिल सके. बिना प्यार, बिना सहारे, बिना घर, बिना दुकान के वह जी कर क्या करेगा? उस की पत्नी, उस का बच्चा, घर… सब कितने प्रेम से संजोया था उस ने. शबनम से विवाह के कारण उस का अपना परिवार भी छूट गया था. क्या करेगा वह शबनम और शंकर के बिना जी कर?

जिस बैड पर वह लेटा था उस के बगल में एक मासूम बच्ची थी. घायल, चोटग्रस्त. उफ, दंगाइयों ने इसे भी नहीं छोड़ा. न जाने कैसे बच गई थी. बच्ची को होश आ चुका था. वह रोने लगी. श्रीराम ने उसे सांत्वना दी, सहलाया. उस से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम?’’

बच्ची ने कराहते हुए कहा, ‘‘शबाना, और आप का?’’

‘‘श्रीराम.’’

बच्ची के चेहरे पर घबराहट के भाव आ गए.

वह बोली, ‘‘आप हिंदू हो. मुझे भी मार डालोगे.’’

‘‘मैं तो खुद तुम्हारी तरह अस्पताल में भरती हूं. मैं तुम्हें क्यों मारूंगा?’’

‘‘आप तो हिंदू हैं. फिर आप को क्यों मारा?’’

श्रीराम की आंखों में आंसू आ गए.

उसे रोता देख बच्ची ने कहा, ‘‘सौरी, अंकल, आप को मुसलमानों ने मारा होगा. मेरा पूरा घर जला दिया. मेरे अम्मीअब्बू को भी मार डाला. पता नहीं, मैं कैसे बच गई?’’ यह कह कर 10 वर्ष की मासूम शबाना रोने लगी.

‘अब इस बच्ची का क्या होगा?

इसे कौन सहारा देगा? कौन इसे पालेगापोसेगा?’ श्रीराम सोचने लगा. उस ने डाक्टर से पूछा कि ठीक होने के बाद इस बच्ची का क्या होगा?

डाक्टर ने कहा, ‘‘अभी तक तो कोई रिश्तेदार आया नहीं. एकदो दिन देखते हैं, वरना यतीमखाने भिजवाना पड़ेगा.’’

श्रीराम सोचने लगा कि वह भी इस दुनिया में अकेला है और यह बच्ची भी. क्यों न इसी बच्ची को जीने का सहारा बनाया जाए. श्रीराम को शबाना में अपना बेटा शंकर दिखने लगा. उस का शबाना से मेलमिलाप बढ़ चुका था. उस ने शबाना से पूछा, ‘‘तुम मेरी बेटी बनोगी?’’

ये भी पढ़ें- मन आंगन की चंपा: सुभद्रा स्वयं को असहाय क्यों मानती रही

‘‘लेकिन आप तो हिंदू हैं.’’

‘‘ठीक है, तो मैं मुसलमान बन जाता हूं.’’

‘‘नहीं, अंकल, आप मुसलमान मत बनना. नहीं तो आप का भी घर जला देंगे.’’

‘‘तो तुम हिंदू बन जाओ.’’

‘‘नहीं, अंकल, मैं हिंदू नहीं बनूंगी. हिंदू लोग अच्छे नहीं होते. वे लोगों को मार डालते हैं. घर जला देते हैं.’’

‘‘तो फिर तुम्हीं बताओ, मेरी बेटी कैसे बनोगी?’’

शबाना ने दिमाग पर जोर लगाया, फिर कहा, ‘‘अंकल, आप हिंदू मैं मुसलमान. जब मुसलमान दंगे करेंगे तो मैं आप को बचाऊंगी और जब हिंदू दंगे करेंगे तो आप मुझे बचाना. क्यों, ठीक है न अंकल?’’

‘‘हां, ठीक है,’’ कह कर श्रीराम उदास हो गया. वह कैसे समझाए इस मासूम को कि दंगाइयों का कोई धर्म नहीं होता. होता तो उस की पत्नी शबनम और बेटा शंकर जिंदा होते. शैतानों का कोई ईमान नहीं होता.

बहरहाल, हुआ यों कि श्रीराम ने आत्महत्या का विचार त्याग दिया और शबाना को अपनी गोद में लिए शेष जीवन जीने में जुट गया.

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