Thursday, 28 October 2021

हुनर : आरती को किसका साथ मिला था

लेखिका-डा. उर्मिला सिन्हा

हाथों में ब्रश पकड़ आरती अपने हुनर को निखारने में लगी थी जबकि उस की बड़ीछोटी बहनें बिगाड़ने में. पर मां ही थीं, जो उसे सम?ातीं तो वह फिर से बनाती. शादी के बाद पति का साथ मिला तो उस को इसी हुनर से नई पहचान मिली. क्या वह बड़ीछोटी बहनों द्वारा की गई शरारतों को भूल पाई… आरती ने पलट कर अपनी बड़ीछोटी बहनों की ओर देखा. किसी बात पर दोनों खिलखिला उठी थीं. बेमौसम बरसात की तरह यों उन का ठहाका लगाना आरती को भीतर तक छेद गया. ‘सोच क्या रही है, तू भी सुन ले हमारी योजना और इस में शामिल हो जा,’ बड़ी फुसफुसाई. ‘कैसी योजना?’

‘है कुछ,’ छोटी फुसफुसाई. आरती की निगाहें बरबस ओसारे पर बिछी तख्त पर जा टिकीं. दुग्धधवल चादर बिछी हुई है. उसे भ्रम हुआ जैसे अम्मा उस पर बैठी उसे बुला रही हैं, ‘आ बिटिया, बैठ मेरे पास.’ ‘क्या है अम्मा?’ ‘तू इतनी गुमसुम क्यों रहती है री, देख तो तेरी बड़ीछोटी बहनें कैसे सारा दिन चहकती रहती हैं.’ आरती हौले से मुसकरा दी. फिर तो अम्मा ऊंचनीच सम?ातीं और वह ‘हां…हूं’ में जवाब देती जाती. बड़ी बहन बाबूजी की लाड़ली थी, तो छोटी अम्मा की. आरती का व्यक्तित्व उन दोनों बहनों की शोखी तले दब सा गया था. वह चाह कर भी बड़ीछोटी की तरह न तो इठला पाती थी, न अपनी उचितअनुचित फरमाइशों से घर वालों को परेशान कर सकती थी. वह अपने मनोभावों को चित्रों द्वारा प्रकट करने लगी. हाथों में तूलिका पकड़ वह अपने चित्रों के संसार में खो जाती जहां न अम्मा का लाड़, न बाबूजी का संरक्षण, न बहनों का बेतुका प्रदर्शन और न ही भाई की जल्दबाजी.

ये भी पढ़ें- तेरी मेरी जिंदगी: क्या था रामस्वरूप और रूपा का संबंध?

रंगोंलकीरों में उस का पूरा संसार सन्निहित था. जो मिल जाता, पहन लेती, चौके में जो पकता, खा लेती. न तो कभी ठेले के पास खड़े हो कर किसी ने उसे चाट खाते देखा और न वह कभी छिपछिप कर सहेलियों के संग सिनेमा देखने गई. बड़ीछोटी बेटियों की ऊंटपटांग हरकतों से अम्मा ?ाल्ला पड़तीं, ‘आखिर आरती भी हमारी ही बेटी है. हमें जरा सा भी परेशान नहीं करती और तुम दोनों जब देखो, कोई न कोई उत्पात मचाती रहती हो.’ ‘भोंदू है आरती, सिर्फ लकीरें खींच कर कोई काबिल नहीं बनता,’ बड़ी अपमान से तिलमिला उठती. ‘अम्मा, तुम भी किस का उदाहरण दे कर हमें छोटा बताती हो, उस घरघुस्सी का,’ छोटी भला कब पीछे रहने वाली थी. ‘वह भोंदू, मूर्ख है और तुम लोग…’ अम्मा देर तक भुनभुनाती रहतीं, जिस का परिणाम आरती को भुगतना पड़ता.

पता नहीं, कब बड़ीछोटी आंखों से इशारा करतीं, एकदूसरे के कानों में कुछ फुसकतीं और दूसरे दिन आरती के चित्रों का सत्यानाश हो गया होता. फटे कागज के बिखरे टुकड़े, लुढ़का रंगों का प्याला… ब्रश की ऐसी हालत कर दी गई होती कि वह दोबारा किसी काम का न रहे. बिलखती आरती अम्मा से फरियाद करती, ‘अम्मा, अम्मा, देखो मेरी पेंटिंग की हालत… मैं ने कितनी मेहनत से बनाई थी.’ ‘फिर से बना लेना. हाथ का हुनर भला कौन छीन सकता है,’ अम्मा आरती को दिलासा दे कर अपनी बड़ीछोटी बेटियों पर बरस पड़तीं, ‘यह कौन सा बहादुरी का काम किया तुम लोगों ने आरती को दुख पहुंचा कर.’ अम्मा देर तक भुनभुनाती रहतीं और बड़ीछोटी बेहयाई से कंधे उचकाती आरती को परेशान करने के लिए नई खोज में डूब जातीं. वहीं, वे दोनों आज आरती को किस योजना में शामिल होने का न्योता दे रही हैं,

ये भी पढ़ें- कर्ण : खराब परवरिश के अंधेरे रास्तों से गुजरती रम्या

इसे आरती का निश्चल हृदय खूब सम?ाता है. अम्मा की तेरहवीं हुए अभी 2 दिन भी नहीं बीते, नातेरिश्तेदार एकएक कर चले गए. सिर्फ बच गए हैं हम पांचों भाईबहन. ‘‘भाभी, मैं कल जाऊंगी,’’ आरती ने रोटी खाते हुए कहा. ‘‘दोचार दिन और रुक जातीं.’’ ‘‘नहीं भाभी, वहां बच्चे अकेले हैं. आनाजाना लगा ही रहेगा.’’ जिस घर में उस का जन्म हुआ, पलीबढ़ी, जवान हुई, सपनों ने उड़ान भरी, वहां से निकल जाना ही उचित है. पता नहीं, बहनें कौन से कुचक्र में भागीदार बनने पर मजबूर करें. वह थकीहारी अपने आशियाने लौटी, तो पति सुदर्शन और दोनों प्यारे बच्चे उस का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. ‘‘सब कुशलमंगल तो है न. नहाधो कर फ्रैश हो जाओ. मैं ने डिनर तैयार कर लिया है.’’ पति का स्नेह, बच्चों का ‘मम्मा, मम्मा’ करते लिपटना…

वह सारी कड़वाहटें भूल गई. ‘‘यह तुम्हारे लिए…’’ ‘‘क्या है लिफाफे में…’’ ‘‘स्वतंत्रता दिवस पर बनाई गई तुम्हारी पेंटिंग, पोस्टर को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है. बुलाहट है दिल्ली के लालकिले पर पुरस्कार के लिए, उसी का निमंत्रणपत्र है.’’ ‘‘मम्मा, हम भी चलेंगे लालकिला देखने,’’ बच्चे मचल उठे. ‘‘अरे, हम सभी चलेंगे. चलने की तैयारी करो,’’ पति के उल्लासमय आह्वान पर आरती का दुखी हृदय खुशियों से भर उठा. जिस हुनर को मायके में हंसी का पात्र बनाया गया, वही पुरुषार्थी पति का सहयोग पा कर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पहचान बना रहा है. ‘मां, यह तुम्हारा प्यार है शायद जिस ने मु?ो कभी भी कमजोर पड़ने न दिया, अपने मार्ग से भटका न सका और जिस की वजह से मेरा जनून मेरी ताकत बना…’ मन ही मन सोचती आरती का भावुक होना स्वाभाविक था. आरती का मन पाखी पुरानी यादों में खो गया

ये भी पढ़ें- खेल: दिव्या तो मुझसे भी बढ़ कर खेल में माहिर निकली

… खामोश, काम से काम रखने वाली आरती को अपने सहकर्मी के विनम्र, सुल?ो हुए साहसी स्वभाव ने आकर्षित कर लिया. अनाथ यश का प्रस्ताव, ‘मु?ा से विवाह करोगी?’ ‘मां से बात करनी पड़ेगी,’ कहती हुई आरती ने नजरें ?ाका लीं. उस ने डरतेडरते मां से बात की, ‘मां, यश आप से मिलना चाहता है. मेरा सहकर्मी है.’ ‘किसलिए,’ अनुभवी मां की आंखें चौड़ी हो गईं. यश की सज्जनता को देख परिवार प्रभावित हुआ, किंतु विजातीय विवाह की अनुमति नहीं, ‘लोग क्या कहेंगे…’ बहनों ने घर सिर पर उठा लिया, ‘विवाह में खर्च कौन करेगा…’ इस बार आरती ने दिल से काम लिया. कोर्ट में विवाह कर दूल्हे के संग मां का आशीर्वाद लेने पहुंची. तब सब ने मुंह मोड़ लिया किंतु मां के मुख से निकला, ‘सदा सुहागन रहो.’ बचपन से ही आरती को पेंटिंग, कढ़ाईसिलाई के अलावा रचनात्मक कार्यों में अभिरुचि थी. पति का साथ पा कर उस ने अपनी प्रतिभा को निखारना शुरू किया.

उस की खूबसूरत डिजाइन के परिधानों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया. मांग बढ़ने लगी. इसी बीच वह 2 बच्चों की मां बनी. ससुराल में कोई था नहीं और मायके से कोई उम्मीद नहीं. इधर, बुटीक का काम चल निकला. नौकरी पहले ही छोड़ चुकी थी वह. अब पति ने भी अपना पूरा समय बुटीक को देना शुरू कर दिया. एक कमरे के व्यवसाय से प्रारंभ बुटीक का कारोबार आज शहर के बीच में है. आज उस की आमदनी हजारों में है. 4 कारीगर रखे हुए हैं. जब भी मां की याद आती, आरती उन से मिल आती, रुपएपैसे से उन की मदद करती. मां को अपने पास ला कर सेवासुश्रुषा करती.

मां के दिल से यही दुआ निकलती, ‘तुम्हें दुनियाजहान की सारी खुशियां मिलें.’ उसे भाईभाभी से कोई शिकायत नहीं थी किंतु बहनों को अपनी कामयाबी की भनक तक नहीं लगने दी. आरती को उन के खुराफाती दिमाग और कुटिल चालों की छाया तक अपने संसार पर गवारा नहीं थी. उसी धैर्य और हुनर का परिणाम है कि आज उसे पुरस्कृत किया जा रहा है… उस ने मन ही मन मृत मां को धन्यवाद दिया. सुखसंतोष से वह पुलकित हो उठी.

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लेखिका-डा. उर्मिला सिन्हा

हाथों में ब्रश पकड़ आरती अपने हुनर को निखारने में लगी थी जबकि उस की बड़ीछोटी बहनें बिगाड़ने में. पर मां ही थीं, जो उसे सम?ातीं तो वह फिर से बनाती. शादी के बाद पति का साथ मिला तो उस को इसी हुनर से नई पहचान मिली. क्या वह बड़ीछोटी बहनों द्वारा की गई शरारतों को भूल पाई… आरती ने पलट कर अपनी बड़ीछोटी बहनों की ओर देखा. किसी बात पर दोनों खिलखिला उठी थीं. बेमौसम बरसात की तरह यों उन का ठहाका लगाना आरती को भीतर तक छेद गया. ‘सोच क्या रही है, तू भी सुन ले हमारी योजना और इस में शामिल हो जा,’ बड़ी फुसफुसाई. ‘कैसी योजना?’

‘है कुछ,’ छोटी फुसफुसाई. आरती की निगाहें बरबस ओसारे पर बिछी तख्त पर जा टिकीं. दुग्धधवल चादर बिछी हुई है. उसे भ्रम हुआ जैसे अम्मा उस पर बैठी उसे बुला रही हैं, ‘आ बिटिया, बैठ मेरे पास.’ ‘क्या है अम्मा?’ ‘तू इतनी गुमसुम क्यों रहती है री, देख तो तेरी बड़ीछोटी बहनें कैसे सारा दिन चहकती रहती हैं.’ आरती हौले से मुसकरा दी. फिर तो अम्मा ऊंचनीच सम?ातीं और वह ‘हां…हूं’ में जवाब देती जाती. बड़ी बहन बाबूजी की लाड़ली थी, तो छोटी अम्मा की. आरती का व्यक्तित्व उन दोनों बहनों की शोखी तले दब सा गया था. वह चाह कर भी बड़ीछोटी की तरह न तो इठला पाती थी, न अपनी उचितअनुचित फरमाइशों से घर वालों को परेशान कर सकती थी. वह अपने मनोभावों को चित्रों द्वारा प्रकट करने लगी. हाथों में तूलिका पकड़ वह अपने चित्रों के संसार में खो जाती जहां न अम्मा का लाड़, न बाबूजी का संरक्षण, न बहनों का बेतुका प्रदर्शन और न ही भाई की जल्दबाजी.

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रंगोंलकीरों में उस का पूरा संसार सन्निहित था. जो मिल जाता, पहन लेती, चौके में जो पकता, खा लेती. न तो कभी ठेले के पास खड़े हो कर किसी ने उसे चाट खाते देखा और न वह कभी छिपछिप कर सहेलियों के संग सिनेमा देखने गई. बड़ीछोटी बेटियों की ऊंटपटांग हरकतों से अम्मा ?ाल्ला पड़तीं, ‘आखिर आरती भी हमारी ही बेटी है. हमें जरा सा भी परेशान नहीं करती और तुम दोनों जब देखो, कोई न कोई उत्पात मचाती रहती हो.’ ‘भोंदू है आरती, सिर्फ लकीरें खींच कर कोई काबिल नहीं बनता,’ बड़ी अपमान से तिलमिला उठती. ‘अम्मा, तुम भी किस का उदाहरण दे कर हमें छोटा बताती हो, उस घरघुस्सी का,’ छोटी भला कब पीछे रहने वाली थी. ‘वह भोंदू, मूर्ख है और तुम लोग…’ अम्मा देर तक भुनभुनाती रहतीं, जिस का परिणाम आरती को भुगतना पड़ता.

पता नहीं, कब बड़ीछोटी आंखों से इशारा करतीं, एकदूसरे के कानों में कुछ फुसकतीं और दूसरे दिन आरती के चित्रों का सत्यानाश हो गया होता. फटे कागज के बिखरे टुकड़े, लुढ़का रंगों का प्याला… ब्रश की ऐसी हालत कर दी गई होती कि वह दोबारा किसी काम का न रहे. बिलखती आरती अम्मा से फरियाद करती, ‘अम्मा, अम्मा, देखो मेरी पेंटिंग की हालत… मैं ने कितनी मेहनत से बनाई थी.’ ‘फिर से बना लेना. हाथ का हुनर भला कौन छीन सकता है,’ अम्मा आरती को दिलासा दे कर अपनी बड़ीछोटी बेटियों पर बरस पड़तीं, ‘यह कौन सा बहादुरी का काम किया तुम लोगों ने आरती को दुख पहुंचा कर.’ अम्मा देर तक भुनभुनाती रहतीं और बड़ीछोटी बेहयाई से कंधे उचकाती आरती को परेशान करने के लिए नई खोज में डूब जातीं. वहीं, वे दोनों आज आरती को किस योजना में शामिल होने का न्योता दे रही हैं,

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इसे आरती का निश्चल हृदय खूब सम?ाता है. अम्मा की तेरहवीं हुए अभी 2 दिन भी नहीं बीते, नातेरिश्तेदार एकएक कर चले गए. सिर्फ बच गए हैं हम पांचों भाईबहन. ‘‘भाभी, मैं कल जाऊंगी,’’ आरती ने रोटी खाते हुए कहा. ‘‘दोचार दिन और रुक जातीं.’’ ‘‘नहीं भाभी, वहां बच्चे अकेले हैं. आनाजाना लगा ही रहेगा.’’ जिस घर में उस का जन्म हुआ, पलीबढ़ी, जवान हुई, सपनों ने उड़ान भरी, वहां से निकल जाना ही उचित है. पता नहीं, बहनें कौन से कुचक्र में भागीदार बनने पर मजबूर करें. वह थकीहारी अपने आशियाने लौटी, तो पति सुदर्शन और दोनों प्यारे बच्चे उस का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. ‘‘सब कुशलमंगल तो है न. नहाधो कर फ्रैश हो जाओ. मैं ने डिनर तैयार कर लिया है.’’ पति का स्नेह, बच्चों का ‘मम्मा, मम्मा’ करते लिपटना…

वह सारी कड़वाहटें भूल गई. ‘‘यह तुम्हारे लिए…’’ ‘‘क्या है लिफाफे में…’’ ‘‘स्वतंत्रता दिवस पर बनाई गई तुम्हारी पेंटिंग, पोस्टर को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है. बुलाहट है दिल्ली के लालकिले पर पुरस्कार के लिए, उसी का निमंत्रणपत्र है.’’ ‘‘मम्मा, हम भी चलेंगे लालकिला देखने,’’ बच्चे मचल उठे. ‘‘अरे, हम सभी चलेंगे. चलने की तैयारी करो,’’ पति के उल्लासमय आह्वान पर आरती का दुखी हृदय खुशियों से भर उठा. जिस हुनर को मायके में हंसी का पात्र बनाया गया, वही पुरुषार्थी पति का सहयोग पा कर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पहचान बना रहा है. ‘मां, यह तुम्हारा प्यार है शायद जिस ने मु?ो कभी भी कमजोर पड़ने न दिया, अपने मार्ग से भटका न सका और जिस की वजह से मेरा जनून मेरी ताकत बना…’ मन ही मन सोचती आरती का भावुक होना स्वाभाविक था. आरती का मन पाखी पुरानी यादों में खो गया

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… खामोश, काम से काम रखने वाली आरती को अपने सहकर्मी के विनम्र, सुल?ो हुए साहसी स्वभाव ने आकर्षित कर लिया. अनाथ यश का प्रस्ताव, ‘मु?ा से विवाह करोगी?’ ‘मां से बात करनी पड़ेगी,’ कहती हुई आरती ने नजरें ?ाका लीं. उस ने डरतेडरते मां से बात की, ‘मां, यश आप से मिलना चाहता है. मेरा सहकर्मी है.’ ‘किसलिए,’ अनुभवी मां की आंखें चौड़ी हो गईं. यश की सज्जनता को देख परिवार प्रभावित हुआ, किंतु विजातीय विवाह की अनुमति नहीं, ‘लोग क्या कहेंगे…’ बहनों ने घर सिर पर उठा लिया, ‘विवाह में खर्च कौन करेगा…’ इस बार आरती ने दिल से काम लिया. कोर्ट में विवाह कर दूल्हे के संग मां का आशीर्वाद लेने पहुंची. तब सब ने मुंह मोड़ लिया किंतु मां के मुख से निकला, ‘सदा सुहागन रहो.’ बचपन से ही आरती को पेंटिंग, कढ़ाईसिलाई के अलावा रचनात्मक कार्यों में अभिरुचि थी. पति का साथ पा कर उस ने अपनी प्रतिभा को निखारना शुरू किया.

उस की खूबसूरत डिजाइन के परिधानों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया. मांग बढ़ने लगी. इसी बीच वह 2 बच्चों की मां बनी. ससुराल में कोई था नहीं और मायके से कोई उम्मीद नहीं. इधर, बुटीक का काम चल निकला. नौकरी पहले ही छोड़ चुकी थी वह. अब पति ने भी अपना पूरा समय बुटीक को देना शुरू कर दिया. एक कमरे के व्यवसाय से प्रारंभ बुटीक का कारोबार आज शहर के बीच में है. आज उस की आमदनी हजारों में है. 4 कारीगर रखे हुए हैं. जब भी मां की याद आती, आरती उन से मिल आती, रुपएपैसे से उन की मदद करती. मां को अपने पास ला कर सेवासुश्रुषा करती.

मां के दिल से यही दुआ निकलती, ‘तुम्हें दुनियाजहान की सारी खुशियां मिलें.’ उसे भाईभाभी से कोई शिकायत नहीं थी किंतु बहनों को अपनी कामयाबी की भनक तक नहीं लगने दी. आरती को उन के खुराफाती दिमाग और कुटिल चालों की छाया तक अपने संसार पर गवारा नहीं थी. उसी धैर्य और हुनर का परिणाम है कि आज उसे पुरस्कृत किया जा रहा है… उस ने मन ही मन मृत मां को धन्यवाद दिया. सुखसंतोष से वह पुलकित हो उठी.

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October 29, 2021 at 10:00AM

हत्या बनाम आत्महत्या

लेखक-डा. आर एस खरे

इंस्पैक्टर का फोन सुनते ही उस के चेहरे की रंगत फीकी पड़ गई. दिल जोरजोर से धड़कने लगा और माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं. सुबह 11बजे उसे लोकायुक्त में बुलाया गया था. इंस्पैक्टर ने लोकेशन भी समझा दी थी- जिला न्यायालय के ठीक अपोजिट वाली नई बिल्डिंग में लोकायुक्त कार्यालय है.

वह जिला न्यायालय के सामने से सैकड़ों बार गुजरा था पर उस का ध्यान कभी लोकायुक्त कार्यालय पर नहीं गया था. 11बजने के कुछ मिनट पहले ही वह उस नई बिल्डिंग के सामने खड़ा था. बिल्डिंग के ऊपर एक बोर्ड लगा था- आर्थिक अपराध अनुसंधान कार्यालय‘. उस ने बिल्डिंग से निकल रहे खाकी वरदीधारी से पूछा, “लोकायुक्त का दफ्तर कहां है?”

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सिपाही ने बताया कि वह इसी बिल्डिंग के गेट नंबर 2 पर जाए. पीछे की ओर जाने पर गेट नंबर 2 के ऊपर दूर से ही लोकायुक्त कार्यालय‘ का बोर्ड दिखाई दे गया. लिफ्ट के पास जा कर वह रुका. इंस्पैक्टर ने कहा था कि उसे थर्डफ्लोर पर आना है. जब काफी देर तक लिफ्ट में कोई हलचल न हुईतो उस का ध्यान लिफ्ट के प्रवेशद्वार के ऊपर चस्पां कागज के टुकड़े पर गयाजिस पर किसी ने पेन से लिख दिया था- लिफ्ट बंद है.

हाई ब्लडप्रैशर का मरीज होने के कारण सीढ़ियां चढ़ते हुए उस की सांस फूलने लगी. रेलिंग के सहारे चढ़ता  हुआ वह तीसरी मंजिल पर पहुंचा. गेट पर खड़े गार्ड ने रजिस्टर में उस से प्रविष्टियां कराईं- नामपतामोबाइल नंबर तथा किस से मिलना है.

उस ने गार्ड से पूछा, “इंस्पैक्टर अशोक यादव कहां बैठते हैं?” गार्ड ने उसे हाथ के इशारे से मार्गदर्शन दिया. अब वह इंस्पैक्टर अशोक यादव की टेबल के सामने था. टेबल पर फाइलें बेतरतीब पड़ी थीं. इंस्पैक्टर की कुरसी खाली थी. कुरसी के पीछे दीवाल पर टाइप किया कागज चस्पां था- आप गोपनीय कैमरे की निगरानी में हैं.

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टेबल की बगल में पड़े स्टूल पर उस ने बैठना चाहा पर उसे स्टूल पर बैठने में अपनी तौहीन लगी. पिछले माह तक वह शासकीय सेवा में राज्य स्तर का वरिष्ठ प्रथम श्रेणी अधिकारी हुआ करता थाजिस के सामने राजपत्रित द्वितीय श्रेणी वर्ग के अधिकारी भी बैठने की जुर्रत न किया करते थे.

वह सोचविचार में मग्न थातभी एक सिपाही ने आ कर पूछा, “आप आर के जैन हैं?”  उस के हां कहते ही सिपाही बोला, “इंस्पैक्टर साहब अभी एसपी साहब के पास हैंथोड़ी देर में आने वाले हैं.”वह अनुमान लगाने लगाहो न होइंस्पैक्टर उन्हीं के प्रकरण में एसपी से चर्चा करने गया होगा.

उस के अनेक आईपीएस तथा आईएएस  अधिकारियों से अच्छे संबंध रहे थे किंतु कभी भी किसी से भी अपने लिए मदद लेने का उसे अवसर नहीं आया था. उस ने पूरी शासकीय  सेवा निष्ठा और ईमानदारी से पूरी की थी और स्वयं की प्रतिष्ठा को कभी धूमिल नहीं होने दिया था. सेवानिवृत्ति के समय अब यह केस दर्ज कर उस पर विभिन्न धाराएं अधिरोपित की गई थीं.जाड़े का मौसम होते हुए भी उस का मुंह सूख रहा था. उस ने चारों ओर निगाह दौड़ाई कि कहीं वाटरकूलर लगा हो. जब ऐसा कुछ न दिखा तो मजबूरी में उस ने स्टूल अपनी ओर खींचा और उस पर बैठ गया.

11 की जगह 11:30  हो चुके थे और इंस्पैक्टर अभी भी वापस नहीं आया था. अपने शासकीय सेवाकाल में वह सदैव समय का पाबंद रहा था और समय के संबंध में लापरवाही दिखाने वालों को जम कर लताड़ लगाया करता था. उसे अपने विभाग के प्रमुख सचिव के कहे शब्द याद हो आए- जो समय की परवा नहीं करता,  समय उस की परवा नहीं करता.’ उन्होंने उस समय जो दृष्टांत सुनाया थावह उसे स्मरण हो आया. वह ऐसे ही खयालों में डूबा हुआ था कि तभी उसी सिपाही ने आ कर उसे सूचना दी, “यादव साहबएसपी साहब के पास से पीपी साहब के पास गए हैं और वहां से सीधे यहीं आएंगे.”

उस ने उस अर्दली सिपाही से विनम्रता से पूछा, “क्या पीने का पानी मिल सकता है?”सिपाही ने इंस्पैक्टर यादव की कुरसी के पीछे जा कर,  उस की वाटर बोतल सेकांच के गिलास में पानी निकाला और ला कर उसे दिया. पानी पीते हुए उस ने सूखते होंठों पर अपनी जीभ फिराई और उन्हें गीला किया.

वह सोचने लगा कि जब उस ने कोई अपराध नहीं किया है तो इतना घबराया और डरा हुआ क्यों है. सांच को आंच नहीं’,  यह कहावत वह कितनी ही बार सुन चुका था. यदि लोकायुक्त झूठा मुकदमा चलाएगा तो न्यायालय भी तो है,  जहां  न्याय प्राप्त किया जा सकता है.

पर एसपी साहब के पास से इंस्पैक्टर पीपी साहब के पास क्यों गयाक्या उस के विरुद्ध चार्जशीट न्यायालय में प्रस्तुत करने की तैयारी हो रही है और क्या उसे गिरफ्तार किया जाएगा?  अखबारों में जब उस के बारे में खबरें छपेंगी तो वह तो किसी को मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेगा. वह किसकिस को स्पष्टीकरण देता रहेगा कि उस ने कोई अपराध नहीं किया है. सारे आरोप झूठे हैं. उस के बेटे और बेटी की ससुराल वाले उस के बारे में क्या सोचेंगेसभी अपनेपराए उस से मुंह मोड़ लेंगे और वह सभी की निगाहों में घृणा का पात्र बन जाएगा. उस की पत्नी का क्या हाल होगाउस के क्लब की महिलाएं उस का मजाक उड़ाएंगी.

पर ऐसा वह क्यों सोच रहा हैउस ने जानबूझ कर तो कोई अपराध किया  नहीं. क्या सत्य इतनी आसानी से पराजित हो जाएगा?  उस के बाबा तो कहा करते थे, ‘सत्य का बल सब से बड़ा बल होता है.उन के आदर्शों पर चल कर और उन के बताए एक ही सिद्धांत-  नौकरी मे जानबूझ कर गलत करना नहीं,  बेमतलब किसी से डरना नहीं’ को ले कर पूरे 37 वर्ष शासकीय सेवा पूरी कर डाली. पर आज डर तो पीछा ही नहीं छोड़ रहा. उसे सब से अधिक बदनामी से डर लगता रहा है. वह जानता हैउस के विरुद्ध तैयार किया गया झूठा मुकदमा न्यायालय में टिक नहीं पाएगा. पर समाज की निगाहों में उस की अब तक अर्जित की गई प्रतिष्ठा तो तारतार हो जाएगी. भयमिश्रित क्रोध से उस का चेहरा तमतमा उठा और होंठ फिर से सूखने लगे.

तभी इंस्पैक्टर यादव ने आ कर विलंब के लिए खेद व्यक्त किया. वह पसोपेश में था कि खड़े हो कर इंस्पैक्टर को सम्मान दे या बैठेबैठे ही नमस्कार करे. फिर उम्र और पद की तुलना करते हुए उस ने बैठे रहना ही उचित समझा.इंस्पैक्टर ने अलमीरा का ताला खोला और एक मोटी सी फाइल निकाली. 10 वर्ष पूर्व जब वह जिले में विभाग का अधिकारी था,  रिक्त पदों पर उस ने कुछ नियुक्तियां की थीं. जैसा कि अधिकांश अधिकारियों के साथ होता हैउस के साथ भी हुआ. नियुक्तियों में भ्रष्टाचारभाईभतीजावाद के आरोप लगाए गए. विभागीय मंत्री ने विधानसभा में जांच कराने का आश्वासन दिया और विभाग ने प्रकरण लोकायुक्त को सौंप दिया.

इन 10 वर्षों में उस से न तो कभी किसी ने इन आरोपों के बारे में पूछताछ की और न ही किसी तरह की जानकारी मांगी. अब सेवानिवृत्त होते ही उसे पूछताछ के लिए बुलाया  गया है.इंस्पैक्टर यादव ने फाइल हाथ में ली और उस से पूछताछ कक्ष‘ में चलने के लिए पीछेपीछे आने को कहा. वह स्टूल से उठा और इंस्पैक्टर के पीछे चलने लगा.

पूछताछ कक्ष में एक गोल टेबल थी और 3 कुरसियां. इंस्पैक्टर ने बैठने का इशारा किया तो वह एक कुरसी पर बैठ गया. उस ने चारों ओर नजर दौड़ाई कि गोपनीय कैमरा कहां लगा है?  पर उसे कुछ स्पष्ट नजर न आया.इंस्पैक्टर ने फाइल के अंदर रखी प्रैसविज्ञप्ति‘ निकाली और उस के सामने रखते हुए बोला, “यह कल के सभी समाचारपत्रों में प्रकाशित होने को भेजी जा रही है.”

प्रैसविज्ञप्ति का शीर्षक था- भ्रष्ट अधिकारी आर के जैन लोकायुक्त के शिकंजे में’. उस ने एकदो पैरा ही पढ़े थे कि उस का उच्च रक्तचाप अचानक बढ़ गया और वह वहीं लुढ़क गया. इंस्पैक्टर घबरा गया. उस ने कागज समेट कर फाइल में रखे और अर्दली को पानी लाने के लिए आवाज लगाई. पानी के छींटे चेहरे पर पड़ते ही उसे थोड़ा होश आया तो उस ने जेब से एस्प्रिन की टेबलेट निकाली और जीभ के नीचे रखी. दोतीन मिनट में ही वह सामान्य हो गया.

इंस्पैक्टर ने विनम्रता से उस से कहा कि, “अब वह जा सकता है और आवश्यकता हुई तो  किसी अन्य दिन उसे वह बुलवा लेगा.उस ने इंस्पैक्टर से कुछ नहीं कहा और धीमेधीमे चलते हुए सीढ़ियां उतरने लगा. कार में बैठते ही उस के सामने वही प्रैसविज्ञप्ति फिर से उभर आई- आर के जैन पर लोकायुक्त का शिकंजा’. उस का खून फिर से खौलने लगा और रक्तचाप फिर से बढ़ गया. उस ने कार को अब बड़े तालाब की दिशा में मोड़ दिया. कार से उतर कर वह तालाब की मेड़ पर जा कर बैठ गया. उस के मस्तिष्क में विचार तालाब की लहरों की तरह उठ-गिर रहे थे. वह तालाब की लहरों को एकटक देखते हुए अपनी बदनामी को ले कर चिंतित था. हर लहर पर वही प्रैसविज्ञप्ति उस की  आंखों के सामने आ जाती. उसे भ्रष्ट अधिकारी घोषित किया जा रहा था. उस पर मनगढ़ंत,  झूठे आरोप लगाए गए थे. उस का रक्तचाप एक बार फिर से उबलने लगा और मस्तिष्क विवेकशून्य हो गया.

फिर अचानक उस के सीने में तेज दर्द उठा. उस ने अपनी सभी जेबों में दवा की गोली की तलाश की,  जो अब थी ही नहीं. अचानक उस की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और पसीने से सारा बदन भीग गया.फिर उसे होश नहीं रहा. गोताखोरों ने उस की बौडी को खोज कर बाहर निकाला. पर तब तक काफी देर हो चुकी थी.अगली सुबह सभी अखबारों में उस के फोटो के साथ आत्महत्या की खबरें प्रकाशित हुई थीं. कितनी आसानी से एक हत्या को आत्महत्या में तबदील किया जा चुका था…

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लेखक-डा. आर एस खरे

इंस्पैक्टर का फोन सुनते ही उस के चेहरे की रंगत फीकी पड़ गई. दिल जोरजोर से धड़कने लगा और माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं. सुबह 11बजे उसे लोकायुक्त में बुलाया गया था. इंस्पैक्टर ने लोकेशन भी समझा दी थी- जिला न्यायालय के ठीक अपोजिट वाली नई बिल्डिंग में लोकायुक्त कार्यालय है.

वह जिला न्यायालय के सामने से सैकड़ों बार गुजरा था पर उस का ध्यान कभी लोकायुक्त कार्यालय पर नहीं गया था. 11बजने के कुछ मिनट पहले ही वह उस नई बिल्डिंग के सामने खड़ा था. बिल्डिंग के ऊपर एक बोर्ड लगा था- आर्थिक अपराध अनुसंधान कार्यालय‘. उस ने बिल्डिंग से निकल रहे खाकी वरदीधारी से पूछा, “लोकायुक्त का दफ्तर कहां है?”

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सिपाही ने बताया कि वह इसी बिल्डिंग के गेट नंबर 2 पर जाए. पीछे की ओर जाने पर गेट नंबर 2 के ऊपर दूर से ही लोकायुक्त कार्यालय‘ का बोर्ड दिखाई दे गया. लिफ्ट के पास जा कर वह रुका. इंस्पैक्टर ने कहा था कि उसे थर्डफ्लोर पर आना है. जब काफी देर तक लिफ्ट में कोई हलचल न हुईतो उस का ध्यान लिफ्ट के प्रवेशद्वार के ऊपर चस्पां कागज के टुकड़े पर गयाजिस पर किसी ने पेन से लिख दिया था- लिफ्ट बंद है.

हाई ब्लडप्रैशर का मरीज होने के कारण सीढ़ियां चढ़ते हुए उस की सांस फूलने लगी. रेलिंग के सहारे चढ़ता  हुआ वह तीसरी मंजिल पर पहुंचा. गेट पर खड़े गार्ड ने रजिस्टर में उस से प्रविष्टियां कराईं- नामपतामोबाइल नंबर तथा किस से मिलना है.

उस ने गार्ड से पूछा, “इंस्पैक्टर अशोक यादव कहां बैठते हैं?” गार्ड ने उसे हाथ के इशारे से मार्गदर्शन दिया. अब वह इंस्पैक्टर अशोक यादव की टेबल के सामने था. टेबल पर फाइलें बेतरतीब पड़ी थीं. इंस्पैक्टर की कुरसी खाली थी. कुरसी के पीछे दीवाल पर टाइप किया कागज चस्पां था- आप गोपनीय कैमरे की निगरानी में हैं.

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टेबल की बगल में पड़े स्टूल पर उस ने बैठना चाहा पर उसे स्टूल पर बैठने में अपनी तौहीन लगी. पिछले माह तक वह शासकीय सेवा में राज्य स्तर का वरिष्ठ प्रथम श्रेणी अधिकारी हुआ करता थाजिस के सामने राजपत्रित द्वितीय श्रेणी वर्ग के अधिकारी भी बैठने की जुर्रत न किया करते थे.

वह सोचविचार में मग्न थातभी एक सिपाही ने आ कर पूछा, “आप आर के जैन हैं?”  उस के हां कहते ही सिपाही बोला, “इंस्पैक्टर साहब अभी एसपी साहब के पास हैंथोड़ी देर में आने वाले हैं.”वह अनुमान लगाने लगाहो न होइंस्पैक्टर उन्हीं के प्रकरण में एसपी से चर्चा करने गया होगा.

उस के अनेक आईपीएस तथा आईएएस  अधिकारियों से अच्छे संबंध रहे थे किंतु कभी भी किसी से भी अपने लिए मदद लेने का उसे अवसर नहीं आया था. उस ने पूरी शासकीय  सेवा निष्ठा और ईमानदारी से पूरी की थी और स्वयं की प्रतिष्ठा को कभी धूमिल नहीं होने दिया था. सेवानिवृत्ति के समय अब यह केस दर्ज कर उस पर विभिन्न धाराएं अधिरोपित की गई थीं.जाड़े का मौसम होते हुए भी उस का मुंह सूख रहा था. उस ने चारों ओर निगाह दौड़ाई कि कहीं वाटरकूलर लगा हो. जब ऐसा कुछ न दिखा तो मजबूरी में उस ने स्टूल अपनी ओर खींचा और उस पर बैठ गया.

11 की जगह 11:30  हो चुके थे और इंस्पैक्टर अभी भी वापस नहीं आया था. अपने शासकीय सेवाकाल में वह सदैव समय का पाबंद रहा था और समय के संबंध में लापरवाही दिखाने वालों को जम कर लताड़ लगाया करता था. उसे अपने विभाग के प्रमुख सचिव के कहे शब्द याद हो आए- जो समय की परवा नहीं करता,  समय उस की परवा नहीं करता.’ उन्होंने उस समय जो दृष्टांत सुनाया थावह उसे स्मरण हो आया. वह ऐसे ही खयालों में डूबा हुआ था कि तभी उसी सिपाही ने आ कर उसे सूचना दी, “यादव साहबएसपी साहब के पास से पीपी साहब के पास गए हैं और वहां से सीधे यहीं आएंगे.”

उस ने उस अर्दली सिपाही से विनम्रता से पूछा, “क्या पीने का पानी मिल सकता है?”सिपाही ने इंस्पैक्टर यादव की कुरसी के पीछे जा कर,  उस की वाटर बोतल सेकांच के गिलास में पानी निकाला और ला कर उसे दिया. पानी पीते हुए उस ने सूखते होंठों पर अपनी जीभ फिराई और उन्हें गीला किया.

वह सोचने लगा कि जब उस ने कोई अपराध नहीं किया है तो इतना घबराया और डरा हुआ क्यों है. सांच को आंच नहीं’,  यह कहावत वह कितनी ही बार सुन चुका था. यदि लोकायुक्त झूठा मुकदमा चलाएगा तो न्यायालय भी तो है,  जहां  न्याय प्राप्त किया जा सकता है.

पर एसपी साहब के पास से इंस्पैक्टर पीपी साहब के पास क्यों गयाक्या उस के विरुद्ध चार्जशीट न्यायालय में प्रस्तुत करने की तैयारी हो रही है और क्या उसे गिरफ्तार किया जाएगा?  अखबारों में जब उस के बारे में खबरें छपेंगी तो वह तो किसी को मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेगा. वह किसकिस को स्पष्टीकरण देता रहेगा कि उस ने कोई अपराध नहीं किया है. सारे आरोप झूठे हैं. उस के बेटे और बेटी की ससुराल वाले उस के बारे में क्या सोचेंगेसभी अपनेपराए उस से मुंह मोड़ लेंगे और वह सभी की निगाहों में घृणा का पात्र बन जाएगा. उस की पत्नी का क्या हाल होगाउस के क्लब की महिलाएं उस का मजाक उड़ाएंगी.

पर ऐसा वह क्यों सोच रहा हैउस ने जानबूझ कर तो कोई अपराध किया  नहीं. क्या सत्य इतनी आसानी से पराजित हो जाएगा?  उस के बाबा तो कहा करते थे, ‘सत्य का बल सब से बड़ा बल होता है.उन के आदर्शों पर चल कर और उन के बताए एक ही सिद्धांत-  नौकरी मे जानबूझ कर गलत करना नहीं,  बेमतलब किसी से डरना नहीं’ को ले कर पूरे 37 वर्ष शासकीय सेवा पूरी कर डाली. पर आज डर तो पीछा ही नहीं छोड़ रहा. उसे सब से अधिक बदनामी से डर लगता रहा है. वह जानता हैउस के विरुद्ध तैयार किया गया झूठा मुकदमा न्यायालय में टिक नहीं पाएगा. पर समाज की निगाहों में उस की अब तक अर्जित की गई प्रतिष्ठा तो तारतार हो जाएगी. भयमिश्रित क्रोध से उस का चेहरा तमतमा उठा और होंठ फिर से सूखने लगे.

तभी इंस्पैक्टर यादव ने आ कर विलंब के लिए खेद व्यक्त किया. वह पसोपेश में था कि खड़े हो कर इंस्पैक्टर को सम्मान दे या बैठेबैठे ही नमस्कार करे. फिर उम्र और पद की तुलना करते हुए उस ने बैठे रहना ही उचित समझा.इंस्पैक्टर ने अलमीरा का ताला खोला और एक मोटी सी फाइल निकाली. 10 वर्ष पूर्व जब वह जिले में विभाग का अधिकारी था,  रिक्त पदों पर उस ने कुछ नियुक्तियां की थीं. जैसा कि अधिकांश अधिकारियों के साथ होता हैउस के साथ भी हुआ. नियुक्तियों में भ्रष्टाचारभाईभतीजावाद के आरोप लगाए गए. विभागीय मंत्री ने विधानसभा में जांच कराने का आश्वासन दिया और विभाग ने प्रकरण लोकायुक्त को सौंप दिया.

इन 10 वर्षों में उस से न तो कभी किसी ने इन आरोपों के बारे में पूछताछ की और न ही किसी तरह की जानकारी मांगी. अब सेवानिवृत्त होते ही उसे पूछताछ के लिए बुलाया  गया है.इंस्पैक्टर यादव ने फाइल हाथ में ली और उस से पूछताछ कक्ष‘ में चलने के लिए पीछेपीछे आने को कहा. वह स्टूल से उठा और इंस्पैक्टर के पीछे चलने लगा.

पूछताछ कक्ष में एक गोल टेबल थी और 3 कुरसियां. इंस्पैक्टर ने बैठने का इशारा किया तो वह एक कुरसी पर बैठ गया. उस ने चारों ओर नजर दौड़ाई कि गोपनीय कैमरा कहां लगा है?  पर उसे कुछ स्पष्ट नजर न आया.इंस्पैक्टर ने फाइल के अंदर रखी प्रैसविज्ञप्ति‘ निकाली और उस के सामने रखते हुए बोला, “यह कल के सभी समाचारपत्रों में प्रकाशित होने को भेजी जा रही है.”

प्रैसविज्ञप्ति का शीर्षक था- भ्रष्ट अधिकारी आर के जैन लोकायुक्त के शिकंजे में’. उस ने एकदो पैरा ही पढ़े थे कि उस का उच्च रक्तचाप अचानक बढ़ गया और वह वहीं लुढ़क गया. इंस्पैक्टर घबरा गया. उस ने कागज समेट कर फाइल में रखे और अर्दली को पानी लाने के लिए आवाज लगाई. पानी के छींटे चेहरे पर पड़ते ही उसे थोड़ा होश आया तो उस ने जेब से एस्प्रिन की टेबलेट निकाली और जीभ के नीचे रखी. दोतीन मिनट में ही वह सामान्य हो गया.

इंस्पैक्टर ने विनम्रता से उस से कहा कि, “अब वह जा सकता है और आवश्यकता हुई तो  किसी अन्य दिन उसे वह बुलवा लेगा.उस ने इंस्पैक्टर से कुछ नहीं कहा और धीमेधीमे चलते हुए सीढ़ियां उतरने लगा. कार में बैठते ही उस के सामने वही प्रैसविज्ञप्ति फिर से उभर आई- आर के जैन पर लोकायुक्त का शिकंजा’. उस का खून फिर से खौलने लगा और रक्तचाप फिर से बढ़ गया. उस ने कार को अब बड़े तालाब की दिशा में मोड़ दिया. कार से उतर कर वह तालाब की मेड़ पर जा कर बैठ गया. उस के मस्तिष्क में विचार तालाब की लहरों की तरह उठ-गिर रहे थे. वह तालाब की लहरों को एकटक देखते हुए अपनी बदनामी को ले कर चिंतित था. हर लहर पर वही प्रैसविज्ञप्ति उस की  आंखों के सामने आ जाती. उसे भ्रष्ट अधिकारी घोषित किया जा रहा था. उस पर मनगढ़ंत,  झूठे आरोप लगाए गए थे. उस का रक्तचाप एक बार फिर से उबलने लगा और मस्तिष्क विवेकशून्य हो गया.

फिर अचानक उस के सीने में तेज दर्द उठा. उस ने अपनी सभी जेबों में दवा की गोली की तलाश की,  जो अब थी ही नहीं. अचानक उस की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और पसीने से सारा बदन भीग गया.फिर उसे होश नहीं रहा. गोताखोरों ने उस की बौडी को खोज कर बाहर निकाला. पर तब तक काफी देर हो चुकी थी.अगली सुबह सभी अखबारों में उस के फोटो के साथ आत्महत्या की खबरें प्रकाशित हुई थीं. कितनी आसानी से एक हत्या को आत्महत्या में तबदील किया जा चुका था…

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October 29, 2021 at 10:00AM

खौफ- भाग 3 : हिना की मां के मन में किस बात का डर था

लेखिका- डा. के रानी 

‘‘तु?ो क्या हो गया है हिना? कैसी बातें कर रही है. शेखर सुनेगा तो क्या सोचेगा?’’‘‘सोचता है तो सोचने दो. मु?ो किसी की परवा नहीं है,’’ इतना कह कर उस ने बीच के दरवाजे पर कुंडी चढ़ा दी. हिना को आश्चर्य हो रहा था कि इतना कुछ कहने पर भी मम्मी आंखें मूंदें थीं और उस के इशारे नहीं सम?ा रही थीं. हिना सबकुछ जानते हुए भी चुप थी, इसीलिए उस की हिम्मत ज्यादा बढ़ गई.

बीच का दरवाजा बंद हो जाने से शेखर की उम्मीदों पर पानी फिर गया. एक बच्चे का पिता होने के बावजूद उस की गंदी नजर अपनी बूआ की बेटी हिना पर पता नहीं कब से लगी थी. अकसर वह उस के लिए गिफ्ट ले आता और उस के साथ खुल कर बातें करता. उसे याद आ रहा था कि वे उसे अजीब तरीके से छूते.

‘‘अगर वह उन के बहकावे में आ जाती तो…’’ यह सोच कर वह सिहर गई. लोकलाज के कारण उसे पता नहीं क्या कुछ ?ोलना पड़ता. मम्मी अपने भतीजे पर कभी शक तक नहीं कर सकीं. अब शेखर को खुद वहां रहना अखरने लगा था. हिना की निगाहों में उठने वाली नफरत को ?ोलने में वह समर्थ नहीं था. उस ने इस बीच कई बार उस से बात करने की कोशिश की. उस के पास आते ही वह चुपचाप वहां से उठ कर चली जाती.

हफ्तेभर बाद शेखर अपने पापा के घर चला गया था. इस घटना से हिना ने महसूस किया कि बाहर वालों से ज्यादा अपने लोग खतरनाक होते हैं. रिश्तों की आड़ में क्या कुछ कर गुजरते हैं, इस का किसी को एहसास तक नहीं होता. वे जानते हैं कि अपनों को बदनामी से बचाने व ?ाठी शान के लिए इस समाज में औरत की आवाज हर हाल में दबा दी जाएगी.

हिना की शादी के 2 साल बाद अनन्या पैदा हुई. उस ने सोच लिया था कि वह अपनी बेटी को दुश्मनों से बचा कर रखेगी. वह बचपन से उसे एक रात के लिए भी किसी रिश्तेदार के घर अकेला न छोड़ती. कई बार बड़े भैया ने कहा भी, लेकिन हिना कोई न कोई बहाना बना कर टाल जाती. अनन्या को यह बात सम?ा आने लगी थी. वह कई मौकों पर मम्मी का विरोध भी करती. घर पर अकसर मेहमान आते. हिना उन का पूरा खयाल रखती, लेकिन बेटी की सुरक्षा के लिए कोई रिस्क न उठाती.

उस ने गैस्टरूम घर की छत पर अलग से बना रखा था, जिस से उन का वक्तबेवक्त उस के परिवार से कोई संपर्क न रहे. खानापीना खिला कर वह मेहमानों को गैस्टरूम में टिका देती. पता नहीं, उस की अंदर की दहशत ने उसे कितना हिला कर रख दिया था. नजदीकी रिश्तों के प्रति उस की आस्था ही खत्म हो गई थी. उसे लगता, रिश्ते की आड़ में छिपे हुए भेडि़ए कभी भी अपने ऊपर की रिश्ते की चादर सरका कर अपने असल रूप में आ उस की बेटी पर हमला कर सकते हैं.

बहुत देर तक उसे अतीत में तैरते हुए नींद नहीं आ रही थी. अगली सुबह वह समय से उठ गई, लेकिन अनन्या देर तक सोती रही. उस ने उसे उठाना उचित न सम?ा. शादी की रात भी हिना की नजरें शादी की रस्मों के बीच उस पर ही लगी रहीं. रात के 3 बजे फेरे खत्म हो गए और उस के बाद वह अनन्या के साथ कमरे में आ गई.

विदाई के समय सभी भावुक हो गए थे. 8 बजे ईशा की विदाई हो गई. घर सूना हो गया था. दोपहर तक अधिकांश मेहमान जाने लगे थे. सिद्धार्थ उस से और दी से मिलने आया, ‘‘अच्छा बूआ, चलता हूं.’’  ‘‘इतनी जल्दी क्या है? 1-2 दिन और रुक जाते,’’ राशि बोली. ‘‘जिस काम के लिए आए थे, वह पूरा हो गया. घर जा कर पढ़ाई भी करनी है.’’

अनन्या अभी 1-2 दिन और मौसी के पास रुकना चाहती थी, लेकिन मम्मी की वजह से कहने में हिचक रही थी. राशि दी खुद ही बोली, ‘‘ईशा के जाने के बाद घर खाली हो गया है. हिना, अनन्या को कुछ दिन यहां छोड़ दे.’’  ‘‘नहीं दी, इस के पापा नाराज होंगे. हम फिर आ जाएंगे. यहां से अलीगढ़ है ही कितना दूर. जब तुम कहोगी तभी ईशा और दामादजी से मिलने चले आएंगे.’’अगले दिन वह बेटी के साथ घर वापस जा रही थी. अनन्या के मन में कई सवाल थे, लेकिन वह मम्मी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी.

हिना जानती थी कि अनन्या मम्मी के व्यवहार से नाखुश है, लेकिन वह मजबूर थी. वह अपनी मम्मी की तरह रिश्तों की छांव में आंख मूंद कर निश्ंिचत हो कर नहीं रह सकती थी. शुक्र था, जवानी में खुद सचेत रहने के कारण वह अपने को बचा पाई थी, नहीं तो उस के साथ कुछ भी बुरा घट सकता था. वह अपनी बेटी को ऐसी परिस्थितियों से दूर रखना चाहती थी.

बाहर वाला कुछ गलत कर बैठे तो उस के विरुद्ध शोर मचाना आसान होता है, लेकिन अपनों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए कितना हौसला चाहिए, इस की अनन्या कल्पना भी नहीं कर सकती. बेटी चाहे लाख नाराज होती रहे, उसे इस की परवा नहीं. उसे तो केवल भेडि़ए को रोकने की परवा है. अपनेपन की आड़ में वे सबकुछ लूट कर ले जाते हैं और लुटने वाला उन के खिलाफ आवाज तक नहीं उठा पाता. खुद घर वाले उस की आवाज को दबा देते हैं.

‘‘अभी उसे कुछ सम?ाना बेकार है. धीरेधीरे अपने अनुभव से उसे बहुतकुछ पता चल जाएगा. तब उसे अपनी मम्मी की यह बात अच्छे से सम?ा आ जाएगी,’’ यह सोच कर वह थोड़ी आश्वस्त हो गई और अनन्या की नाराजगी को नजरअंदाज कर उस से सहज हो कर बातें करने लगी.

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लेखिका- डा. के रानी 

‘‘तु?ो क्या हो गया है हिना? कैसी बातें कर रही है. शेखर सुनेगा तो क्या सोचेगा?’’‘‘सोचता है तो सोचने दो. मु?ो किसी की परवा नहीं है,’’ इतना कह कर उस ने बीच के दरवाजे पर कुंडी चढ़ा दी. हिना को आश्चर्य हो रहा था कि इतना कुछ कहने पर भी मम्मी आंखें मूंदें थीं और उस के इशारे नहीं सम?ा रही थीं. हिना सबकुछ जानते हुए भी चुप थी, इसीलिए उस की हिम्मत ज्यादा बढ़ गई.

बीच का दरवाजा बंद हो जाने से शेखर की उम्मीदों पर पानी फिर गया. एक बच्चे का पिता होने के बावजूद उस की गंदी नजर अपनी बूआ की बेटी हिना पर पता नहीं कब से लगी थी. अकसर वह उस के लिए गिफ्ट ले आता और उस के साथ खुल कर बातें करता. उसे याद आ रहा था कि वे उसे अजीब तरीके से छूते.

‘‘अगर वह उन के बहकावे में आ जाती तो…’’ यह सोच कर वह सिहर गई. लोकलाज के कारण उसे पता नहीं क्या कुछ ?ोलना पड़ता. मम्मी अपने भतीजे पर कभी शक तक नहीं कर सकीं. अब शेखर को खुद वहां रहना अखरने लगा था. हिना की निगाहों में उठने वाली नफरत को ?ोलने में वह समर्थ नहीं था. उस ने इस बीच कई बार उस से बात करने की कोशिश की. उस के पास आते ही वह चुपचाप वहां से उठ कर चली जाती.

हफ्तेभर बाद शेखर अपने पापा के घर चला गया था. इस घटना से हिना ने महसूस किया कि बाहर वालों से ज्यादा अपने लोग खतरनाक होते हैं. रिश्तों की आड़ में क्या कुछ कर गुजरते हैं, इस का किसी को एहसास तक नहीं होता. वे जानते हैं कि अपनों को बदनामी से बचाने व ?ाठी शान के लिए इस समाज में औरत की आवाज हर हाल में दबा दी जाएगी.

हिना की शादी के 2 साल बाद अनन्या पैदा हुई. उस ने सोच लिया था कि वह अपनी बेटी को दुश्मनों से बचा कर रखेगी. वह बचपन से उसे एक रात के लिए भी किसी रिश्तेदार के घर अकेला न छोड़ती. कई बार बड़े भैया ने कहा भी, लेकिन हिना कोई न कोई बहाना बना कर टाल जाती. अनन्या को यह बात सम?ा आने लगी थी. वह कई मौकों पर मम्मी का विरोध भी करती. घर पर अकसर मेहमान आते. हिना उन का पूरा खयाल रखती, लेकिन बेटी की सुरक्षा के लिए कोई रिस्क न उठाती.

उस ने गैस्टरूम घर की छत पर अलग से बना रखा था, जिस से उन का वक्तबेवक्त उस के परिवार से कोई संपर्क न रहे. खानापीना खिला कर वह मेहमानों को गैस्टरूम में टिका देती. पता नहीं, उस की अंदर की दहशत ने उसे कितना हिला कर रख दिया था. नजदीकी रिश्तों के प्रति उस की आस्था ही खत्म हो गई थी. उसे लगता, रिश्ते की आड़ में छिपे हुए भेडि़ए कभी भी अपने ऊपर की रिश्ते की चादर सरका कर अपने असल रूप में आ उस की बेटी पर हमला कर सकते हैं.

बहुत देर तक उसे अतीत में तैरते हुए नींद नहीं आ रही थी. अगली सुबह वह समय से उठ गई, लेकिन अनन्या देर तक सोती रही. उस ने उसे उठाना उचित न सम?ा. शादी की रात भी हिना की नजरें शादी की रस्मों के बीच उस पर ही लगी रहीं. रात के 3 बजे फेरे खत्म हो गए और उस के बाद वह अनन्या के साथ कमरे में आ गई.

विदाई के समय सभी भावुक हो गए थे. 8 बजे ईशा की विदाई हो गई. घर सूना हो गया था. दोपहर तक अधिकांश मेहमान जाने लगे थे. सिद्धार्थ उस से और दी से मिलने आया, ‘‘अच्छा बूआ, चलता हूं.’’  ‘‘इतनी जल्दी क्या है? 1-2 दिन और रुक जाते,’’ राशि बोली. ‘‘जिस काम के लिए आए थे, वह पूरा हो गया. घर जा कर पढ़ाई भी करनी है.’’

अनन्या अभी 1-2 दिन और मौसी के पास रुकना चाहती थी, लेकिन मम्मी की वजह से कहने में हिचक रही थी. राशि दी खुद ही बोली, ‘‘ईशा के जाने के बाद घर खाली हो गया है. हिना, अनन्या को कुछ दिन यहां छोड़ दे.’’  ‘‘नहीं दी, इस के पापा नाराज होंगे. हम फिर आ जाएंगे. यहां से अलीगढ़ है ही कितना दूर. जब तुम कहोगी तभी ईशा और दामादजी से मिलने चले आएंगे.’’अगले दिन वह बेटी के साथ घर वापस जा रही थी. अनन्या के मन में कई सवाल थे, लेकिन वह मम्मी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी.

हिना जानती थी कि अनन्या मम्मी के व्यवहार से नाखुश है, लेकिन वह मजबूर थी. वह अपनी मम्मी की तरह रिश्तों की छांव में आंख मूंद कर निश्ंिचत हो कर नहीं रह सकती थी. शुक्र था, जवानी में खुद सचेत रहने के कारण वह अपने को बचा पाई थी, नहीं तो उस के साथ कुछ भी बुरा घट सकता था. वह अपनी बेटी को ऐसी परिस्थितियों से दूर रखना चाहती थी.

बाहर वाला कुछ गलत कर बैठे तो उस के विरुद्ध शोर मचाना आसान होता है, लेकिन अपनों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए कितना हौसला चाहिए, इस की अनन्या कल्पना भी नहीं कर सकती. बेटी चाहे लाख नाराज होती रहे, उसे इस की परवा नहीं. उसे तो केवल भेडि़ए को रोकने की परवा है. अपनेपन की आड़ में वे सबकुछ लूट कर ले जाते हैं और लुटने वाला उन के खिलाफ आवाज तक नहीं उठा पाता. खुद घर वाले उस की आवाज को दबा देते हैं.

‘‘अभी उसे कुछ सम?ाना बेकार है. धीरेधीरे अपने अनुभव से उसे बहुतकुछ पता चल जाएगा. तब उसे अपनी मम्मी की यह बात अच्छे से सम?ा आ जाएगी,’’ यह सोच कर वह थोड़ी आश्वस्त हो गई और अनन्या की नाराजगी को नजरअंदाज कर उस से सहज हो कर बातें करने लगी.

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October 29, 2021 at 10:00AM

खौफ- भाग 2 : हिना की मां के मन में किस बात का डर था

लेखिका- डा. के रानी 

‘‘मम्मी प्लीज, मैं कोई बच्ची नहीं हूं. 16 साल की हो गई हूं. मु?ो भी अपने भलेबुरे की पहचान है.’’ ‘‘जानती हूं, फिर भी मैं कुछ मामलों में बिलकुल रिस्क नहीं उठा सकती.’ ‘‘इस में रिस्क की क्या बात है? हम सब आपस में रिश्तेदार हैं.’’

‘‘तुम नहीं सम?ाती अनन्या. बस, मेरी बात मान लो. मैं जानती हूं कि तुम्हें यह सब देखसुन कर बुरा लगता है, फिर भी इस से आगे कुछ मत कहो और इस टौपिक को यहीं खत्म कर दो.’’

अपना सामान व्यवस्थित कर के वह राशि दी के पास चली गई. राशि दी एकएक कर के उसे शादी का सामान दिखा रही थीं और अनन्या उस पर अपनी टिप्पणियां दे रही थी. उस के बाद वह ईशा के साथ आ गई.

खाना खाने के बहुत देर बाद अनन्या मम्मी के पास आई. हिना उस समय राशि के साथ बातें कर रही थी. बातें तो एक बहाना था. दरअसल, वह उसी के आने का इंतजार कर रही थी. दोनों कमरे में आ कर कुछ देर बातें करती रहीं और फिर आराम से सो गईं.

अगले दिन सुबह से ही मेहमानों का आनाजाना शुरू हो गया था. राशि दी के परिवार में यह पहली शादी थी. सारे रिश्तेदार शादी में शामिल होने सपरिवार आए थे. बूआ, मौसी, चाचा, ताऊ और छोटे दादाजी सब अपने परिवार के साथ पहुंच गए थे. घर पर रिश्तेदारों का मेला लग गया था. सभी के बच्चे जवान थे. कुछ की शादी हो चुकी थी और उन के साथ छोटे बच्चे भी आए हुए थे. यह सब देख कर राशि दी बहुत खुश थीं. वे खुद भी बहुत व्यवहारकुशल थीं. हरेक के सुखदुख में शामिल होने वे सब से पहले पहुंच जातीं. इसी वजह से सभी लोग ईशा की शादी में एक दिन पहले ही पहुंच गए थे.

सुबह से ही घर में शादी की रस्में चल रही थीं. हिना राशि दी के साथ हर काम में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही थी. अनन्या कजिन के साथ बातों में व्यस्त थी. सब अपने कामों में लगे थे. जवान लड़कियों को सजनेसंवरने और शाम को होने वाले महिला संगीत में विशेष रुचि थी. उन्होंने पहले से ही प्रोग्राम बना लिया था कि सब मिल कर खूब धमाल मचाएंगे. इस के लिए वे दिनभर तैयारी करते रहे थे.

शाम हुई. अच्छेखासे जलपान के बाद अधिकांश अपने घर चले गए. अब युवाओं की महफिल सजने लगी थी. डैक पर नए गाने बज रहे थे और उस की धुन पर सभी युवा थिरक रहे थे. उस में पासपड़ोस के युवा भी शामिल थे. आए हुए युवा मेहमानों के कुछ दोस्त भी शादी में शिरकत कर रहे थे. अनन्या गुलाबी लहंगे में बहुत खूबसूरत लग रही थी. उस की दीपक मामा के बेटे सिद्धार्थ से बहुत अच्छी पटती थी. वे दोनों साथ मिल कर दिनभर से प्रैक्टिस कर रहे थे. शाम को उन का प्रदर्शन सब से अच्छा था. सब उन्हें बधाई दे रहे थे.

हिना को यह कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा. रात को खाना खाने के बाद उन्होंने और भी प्रोग्राम बना लिए थे.रात के 12 बज चुके थे. सब लोग सोने की तैयारी करने लगे. कल के जश्न के लिए सभी को रात देर तक उठे रहना था. हिना अभी तक युवाओं के साथ बैठी हुई थी. सिद्धार्थ बोला, ‘‘बूआ, तुम भी सो जाओ. थोड़ी देर और मस्ती कर के हम सब भी सोने चले जाएंगे.’’‘‘मु?ो नींद नहीं आ रही है. तुम लोगों के कार्यक्रम बहुत अच्छे लग रहे हैं. ऐसा मौका बारबार कहां मिलता है?’’

‘‘जैसी आप की इच्छा. मु?ो लगा, शायद आप जबरदस्ती यहां बैठी हैं.’’उस की बात सुन कर अनन्या ने एक नजर मम्मी पर डाली, लेकिन बोली कुछ नहीं. वह अच्छे से जानती थी कि मम्मी उसी की वजह से इतनी रात तक जागी हुई हैं, अन्यथा वे रोज 10 बजे ही सोने चली जाती हैं. हिना के साथ के सभी लोग सोने जा चुके थे. एकमात्र वही थीं जो उन युवाओं के बीच बैठ कर उन के कार्यक्रमों का मजा ले रही थीं.

रात के एक बजे कार्यक्रम खत्म हुए और सब अपनेअपने कमरों में सोने चले गए. अनन्या भी मम्मी के साथ कमरे में आ गई. हिना को लग रहा था, आज उस के कारण शायद वह आहत हुई है. हिना बोली, ‘‘सो जा बेटा. कल भी तुम्हें सारी रात जागना है.’’‘‘नींद की जरूरत मु?ा से ज्यादा आप को है मम्मी. आप की नींद पूरी न हो तो आप सुबह बड़ी चिड़चिड़ी सी हो जाती हैं. क्या जरूरत थी इतनी देर तक वहां बैठे रहने की?’’

‘‘मु?ो तुम्हारा डांस बहुत अच्छा लग रहा था.’’‘‘ज्यादा बहाने बनाने की जरूरत नहीं है मम्मी. मु?ो सब पता है कि आप मेरी चौकीदारी के लिए वहां बैठी थीं.’’‘‘ऐसा क्यों सोचती है तू? मु?ो तेरी चिंता रहती है, बस.’’‘‘ऐसी चिंता किस काम की, जिस पर मम्मीपापा चौकीदार नजर आने लगें.’’

अनन्या की बात पर हिना कुछ नहीं बोली और चुपचाप बिस्तर पर लेट गई. उसे सम?ा नहीं आ रहा था कि वे अनन्या को किस तरह सम?ाएं. आज के जमाने में युवा लड़कियों को जितना खतरा बाहर से है, उस से अधिक खतरा अपने लोगों से है. बाहर वालों के खिलाफ तो खुल कर आवाज उठाई जा सकती है, लेकिन घर वालों के खिलाफ मुंह खोलने के लिए बहुत अधिक साहस चाहिए.

यह सोच कर वे अतीत में गोते लगाने लगीं. वह बचपन से मम्मीपापा के साथ कानपुर में रहती थी. शहर के नजदीक होने की वजह से उन के घर मेहमानों का आनाजाना लगा रहता. ताऊजी, चाचाजी, बूआजी, मामाजी व अन्य दूर के सभी रिश्तेदार अकसर मम्मीपापा से मिलने आ जाते. कभी कोई बीमार पड़ता तो वह उन्हीं के घर पर महीनों तक डेरा डाल लेता.

मम्मी के बड़े भाई गणेश मामा के 2 जवान बेटे थे. उन में से बड़े बेटे शेखर की कम उम्र में ही शादी हो गई थी और वे एक कंपनी में नौकरी करते थे. जबकि छोटा बेटा अभी पढ़ाई कर रहा था. वह हिना के बड़े भाई रमेश का हमउम्र था. बचपन से हिना उन के साथ घुलीमिली थी. अकसर वे उन के घर आतेजाते रहते. गणेश मामा कानपुर में ही रहते थे. मम्मी अपने भतीजों का बहुत ध्यान रखती.

एक बार शेखर की तबीयत खराब हो गई. उन के फेफड़ों में पानी भर गया था.मामा को शेखर की देखभाल करने में परेशानी हो रही थी. यह देख कर मम्मी ने उन्हें अपने घर पर बुला लिया, जिस से उन की ठीक से देखभाल हो सके.

शेखर की उम्र तकरीबन 26 साल की थी और वे एक बच्चे के पिता भी बन चुके थे. उन की पत्नी रूपा मामी गांव में थी. मम्मी ने बड़े भैया का कमरा उन्हें दे दिया. वह दिनरात उन की खिदमत में लगी रहती ताकि वे जल्दी ठीक हो कर नौकरी पर चले जाएं.

हिना और उस का छोटा भाई अरुण एक ही कमरे में अलग बिस्तर पर सोते. मम्मीपापा का अलग कमरा था. हिना के कमरे से लगा हुआ बड़े भैया का कमरा था. गरमी में मच्छरों के आतंक से बचने के लिए सभी के बिस्तर पर मच्छरदानी लगी रहती.

एक दिन उस ने महसूस किया कि रात में कोई उस की मच्छरदानी खींच रहा है.  कुछ देर बाद एक हाथ मच्छरदानी के अंदर उस के पैरों तक पहुंच गया. हिना ने पूरा जोर लगा कर उसे ?ाटक दिया. कुछ देर बाद उसे वही हाथ अपने शरीर पर रेंगता हुआ महसूस हुआ. उस ने उस पर दांत गड़ा दिए तो हाथ तेजी से मच्छरदानी से बाहर निकल गया.

इस घटना के बाद वह सुकून से सो न सकी. उसे महसूस हो गया कि यह किस का हाथ था, लेकिन वह कुछ कह न पाई.सुबह उठ कर उस ने मम्मी से इस का जिक्र नहीं किया. छोटा भाई निश्ंिचत हो कर बगल की चारपाई पर सोया था. उसे इस का इल्म तक न था. दूसरे दिन उस ने मम्मी से पूछा, ‘‘शेखर भैया कब तक यहां रहेंगे?’’‘‘अभी उन की तबीयत ठीक नहीं है. हो सकता है कि कुछ हफ्ते और लग जाएं.’’

‘‘मम्मी, आप उन्हें उन के घर भेज दो.’’‘‘तु?ो क्या परेशानी है उन से? बेचारा एक कमरे में पड़ा रहता है. उस की तबीयत सुधर जाएगी, तो मैं खुद ही उसे जाने के लिए कह दूंगी. तू जानती है कि तेरी मामी यहां नहीं रहती. घर में उस की देखभाल करने वाला कोई नहीं है,’’ मम्मी बोली.

‘‘अब उन की तबीयत काफी सुधर गई है. वे चाहें तो मामी को गांव से बुला सकते हैं.’’ ‘‘बहकीबहकी बातें कर रही है तू? वह मेरा भतीजा और तेरा भाई है. रमेश और उस में क्या फर्क है? तु?ो भी उस का खयाल रखना चाहिए.’’ उन का तर्क सुन कर वह चुप हो गई.

अगले दिन रात को फिर वही घटना घटी. इस बार सुरक्षा के तौर पर हिना ने मच्छरदानी बहुत अच्छी तरह से गद्दे के नीचे दबा दी और अपने साथ बिस्तर पर टौर्च रख ली. मच्छरदानी खिंचने के साथ हाथ महसूस करते ही वह ?ाट से उठ कर बैठ गई और जोर से बोली, ‘‘कौन है?’’उस की आवाज और टौर्च की रोशनी से मम्मी उठ गईं. वे तुरंत उस के पास पहुंच कर बोलीं, ‘‘क्या हुआ हिना?’’

‘‘मम्मी, मु?ो लगा जैसे कोई मेरी मच्छरदानी खींच रहा है. खतरा महसूस होते ही मैं ने टौर्च जला दी. सामने शेखर भैया खड़े थे.’’उसे देख कर मम्मी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या हुआ शेखर? तुम यहां कैसे चले आए?’’ ‘‘बूआजी, बहुत जोर की प्यास लगी थी. पानी खत्म हो गया. वही लेने जा रहा था. शायद दरवाजा खुलने की आवाज से हिना डर कर उठ गई.’’

‘‘कोई बात नहीं बेटा. तू आराम कर. मैं पानी ला कर रख देती हूं,’’ कह कर उस ने जग भर पानी उन के कमरे में रख दिया.आज रात इतना कुछ अपनी आंखों से देख कर भी मम्मी को कुछ सम?ा नहीं आया था. हिना परेशान थी कि यह बात उन्हें कैसे सम?ाए? सीधे इलजाम लगाने पर बात बहुत बढ़ सकती थी और अंत में उसे ही चुप करा दिया जाता. लिहाजा, वह चुप ही रही.

अगली रात सोने से पहले उस ने मम्मी को हिदायत दे दी, ‘‘मम्मी, शेखर भैया के कमरे में हर चीज पहले से ही रख दिया करो. जरा सी खटपट होने पर मेरी नींद खुल जाती है. मु?ो रात में किसी का कमरे में आना अच्छा नहीं लगता.’’

 

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लेखिका- डा. के रानी 

‘‘मम्मी प्लीज, मैं कोई बच्ची नहीं हूं. 16 साल की हो गई हूं. मु?ो भी अपने भलेबुरे की पहचान है.’’ ‘‘जानती हूं, फिर भी मैं कुछ मामलों में बिलकुल रिस्क नहीं उठा सकती.’ ‘‘इस में रिस्क की क्या बात है? हम सब आपस में रिश्तेदार हैं.’’

‘‘तुम नहीं सम?ाती अनन्या. बस, मेरी बात मान लो. मैं जानती हूं कि तुम्हें यह सब देखसुन कर बुरा लगता है, फिर भी इस से आगे कुछ मत कहो और इस टौपिक को यहीं खत्म कर दो.’’

अपना सामान व्यवस्थित कर के वह राशि दी के पास चली गई. राशि दी एकएक कर के उसे शादी का सामान दिखा रही थीं और अनन्या उस पर अपनी टिप्पणियां दे रही थी. उस के बाद वह ईशा के साथ आ गई.

खाना खाने के बहुत देर बाद अनन्या मम्मी के पास आई. हिना उस समय राशि के साथ बातें कर रही थी. बातें तो एक बहाना था. दरअसल, वह उसी के आने का इंतजार कर रही थी. दोनों कमरे में आ कर कुछ देर बातें करती रहीं और फिर आराम से सो गईं.

अगले दिन सुबह से ही मेहमानों का आनाजाना शुरू हो गया था. राशि दी के परिवार में यह पहली शादी थी. सारे रिश्तेदार शादी में शामिल होने सपरिवार आए थे. बूआ, मौसी, चाचा, ताऊ और छोटे दादाजी सब अपने परिवार के साथ पहुंच गए थे. घर पर रिश्तेदारों का मेला लग गया था. सभी के बच्चे जवान थे. कुछ की शादी हो चुकी थी और उन के साथ छोटे बच्चे भी आए हुए थे. यह सब देख कर राशि दी बहुत खुश थीं. वे खुद भी बहुत व्यवहारकुशल थीं. हरेक के सुखदुख में शामिल होने वे सब से पहले पहुंच जातीं. इसी वजह से सभी लोग ईशा की शादी में एक दिन पहले ही पहुंच गए थे.

सुबह से ही घर में शादी की रस्में चल रही थीं. हिना राशि दी के साथ हर काम में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही थी. अनन्या कजिन के साथ बातों में व्यस्त थी. सब अपने कामों में लगे थे. जवान लड़कियों को सजनेसंवरने और शाम को होने वाले महिला संगीत में विशेष रुचि थी. उन्होंने पहले से ही प्रोग्राम बना लिया था कि सब मिल कर खूब धमाल मचाएंगे. इस के लिए वे दिनभर तैयारी करते रहे थे.

शाम हुई. अच्छेखासे जलपान के बाद अधिकांश अपने घर चले गए. अब युवाओं की महफिल सजने लगी थी. डैक पर नए गाने बज रहे थे और उस की धुन पर सभी युवा थिरक रहे थे. उस में पासपड़ोस के युवा भी शामिल थे. आए हुए युवा मेहमानों के कुछ दोस्त भी शादी में शिरकत कर रहे थे. अनन्या गुलाबी लहंगे में बहुत खूबसूरत लग रही थी. उस की दीपक मामा के बेटे सिद्धार्थ से बहुत अच्छी पटती थी. वे दोनों साथ मिल कर दिनभर से प्रैक्टिस कर रहे थे. शाम को उन का प्रदर्शन सब से अच्छा था. सब उन्हें बधाई दे रहे थे.

हिना को यह कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा. रात को खाना खाने के बाद उन्होंने और भी प्रोग्राम बना लिए थे.रात के 12 बज चुके थे. सब लोग सोने की तैयारी करने लगे. कल के जश्न के लिए सभी को रात देर तक उठे रहना था. हिना अभी तक युवाओं के साथ बैठी हुई थी. सिद्धार्थ बोला, ‘‘बूआ, तुम भी सो जाओ. थोड़ी देर और मस्ती कर के हम सब भी सोने चले जाएंगे.’’‘‘मु?ो नींद नहीं आ रही है. तुम लोगों के कार्यक्रम बहुत अच्छे लग रहे हैं. ऐसा मौका बारबार कहां मिलता है?’’

‘‘जैसी आप की इच्छा. मु?ो लगा, शायद आप जबरदस्ती यहां बैठी हैं.’’उस की बात सुन कर अनन्या ने एक नजर मम्मी पर डाली, लेकिन बोली कुछ नहीं. वह अच्छे से जानती थी कि मम्मी उसी की वजह से इतनी रात तक जागी हुई हैं, अन्यथा वे रोज 10 बजे ही सोने चली जाती हैं. हिना के साथ के सभी लोग सोने जा चुके थे. एकमात्र वही थीं जो उन युवाओं के बीच बैठ कर उन के कार्यक्रमों का मजा ले रही थीं.

रात के एक बजे कार्यक्रम खत्म हुए और सब अपनेअपने कमरों में सोने चले गए. अनन्या भी मम्मी के साथ कमरे में आ गई. हिना को लग रहा था, आज उस के कारण शायद वह आहत हुई है. हिना बोली, ‘‘सो जा बेटा. कल भी तुम्हें सारी रात जागना है.’’‘‘नींद की जरूरत मु?ा से ज्यादा आप को है मम्मी. आप की नींद पूरी न हो तो आप सुबह बड़ी चिड़चिड़ी सी हो जाती हैं. क्या जरूरत थी इतनी देर तक वहां बैठे रहने की?’’

‘‘मु?ो तुम्हारा डांस बहुत अच्छा लग रहा था.’’‘‘ज्यादा बहाने बनाने की जरूरत नहीं है मम्मी. मु?ो सब पता है कि आप मेरी चौकीदारी के लिए वहां बैठी थीं.’’‘‘ऐसा क्यों सोचती है तू? मु?ो तेरी चिंता रहती है, बस.’’‘‘ऐसी चिंता किस काम की, जिस पर मम्मीपापा चौकीदार नजर आने लगें.’’

अनन्या की बात पर हिना कुछ नहीं बोली और चुपचाप बिस्तर पर लेट गई. उसे सम?ा नहीं आ रहा था कि वे अनन्या को किस तरह सम?ाएं. आज के जमाने में युवा लड़कियों को जितना खतरा बाहर से है, उस से अधिक खतरा अपने लोगों से है. बाहर वालों के खिलाफ तो खुल कर आवाज उठाई जा सकती है, लेकिन घर वालों के खिलाफ मुंह खोलने के लिए बहुत अधिक साहस चाहिए.

यह सोच कर वे अतीत में गोते लगाने लगीं. वह बचपन से मम्मीपापा के साथ कानपुर में रहती थी. शहर के नजदीक होने की वजह से उन के घर मेहमानों का आनाजाना लगा रहता. ताऊजी, चाचाजी, बूआजी, मामाजी व अन्य दूर के सभी रिश्तेदार अकसर मम्मीपापा से मिलने आ जाते. कभी कोई बीमार पड़ता तो वह उन्हीं के घर पर महीनों तक डेरा डाल लेता.

मम्मी के बड़े भाई गणेश मामा के 2 जवान बेटे थे. उन में से बड़े बेटे शेखर की कम उम्र में ही शादी हो गई थी और वे एक कंपनी में नौकरी करते थे. जबकि छोटा बेटा अभी पढ़ाई कर रहा था. वह हिना के बड़े भाई रमेश का हमउम्र था. बचपन से हिना उन के साथ घुलीमिली थी. अकसर वे उन के घर आतेजाते रहते. गणेश मामा कानपुर में ही रहते थे. मम्मी अपने भतीजों का बहुत ध्यान रखती.

एक बार शेखर की तबीयत खराब हो गई. उन के फेफड़ों में पानी भर गया था.मामा को शेखर की देखभाल करने में परेशानी हो रही थी. यह देख कर मम्मी ने उन्हें अपने घर पर बुला लिया, जिस से उन की ठीक से देखभाल हो सके.

शेखर की उम्र तकरीबन 26 साल की थी और वे एक बच्चे के पिता भी बन चुके थे. उन की पत्नी रूपा मामी गांव में थी. मम्मी ने बड़े भैया का कमरा उन्हें दे दिया. वह दिनरात उन की खिदमत में लगी रहती ताकि वे जल्दी ठीक हो कर नौकरी पर चले जाएं.

हिना और उस का छोटा भाई अरुण एक ही कमरे में अलग बिस्तर पर सोते. मम्मीपापा का अलग कमरा था. हिना के कमरे से लगा हुआ बड़े भैया का कमरा था. गरमी में मच्छरों के आतंक से बचने के लिए सभी के बिस्तर पर मच्छरदानी लगी रहती.

एक दिन उस ने महसूस किया कि रात में कोई उस की मच्छरदानी खींच रहा है.  कुछ देर बाद एक हाथ मच्छरदानी के अंदर उस के पैरों तक पहुंच गया. हिना ने पूरा जोर लगा कर उसे ?ाटक दिया. कुछ देर बाद उसे वही हाथ अपने शरीर पर रेंगता हुआ महसूस हुआ. उस ने उस पर दांत गड़ा दिए तो हाथ तेजी से मच्छरदानी से बाहर निकल गया.

इस घटना के बाद वह सुकून से सो न सकी. उसे महसूस हो गया कि यह किस का हाथ था, लेकिन वह कुछ कह न पाई.सुबह उठ कर उस ने मम्मी से इस का जिक्र नहीं किया. छोटा भाई निश्ंिचत हो कर बगल की चारपाई पर सोया था. उसे इस का इल्म तक न था. दूसरे दिन उस ने मम्मी से पूछा, ‘‘शेखर भैया कब तक यहां रहेंगे?’’‘‘अभी उन की तबीयत ठीक नहीं है. हो सकता है कि कुछ हफ्ते और लग जाएं.’’

‘‘मम्मी, आप उन्हें उन के घर भेज दो.’’‘‘तु?ो क्या परेशानी है उन से? बेचारा एक कमरे में पड़ा रहता है. उस की तबीयत सुधर जाएगी, तो मैं खुद ही उसे जाने के लिए कह दूंगी. तू जानती है कि तेरी मामी यहां नहीं रहती. घर में उस की देखभाल करने वाला कोई नहीं है,’’ मम्मी बोली.

‘‘अब उन की तबीयत काफी सुधर गई है. वे चाहें तो मामी को गांव से बुला सकते हैं.’’ ‘‘बहकीबहकी बातें कर रही है तू? वह मेरा भतीजा और तेरा भाई है. रमेश और उस में क्या फर्क है? तु?ो भी उस का खयाल रखना चाहिए.’’ उन का तर्क सुन कर वह चुप हो गई.

अगले दिन रात को फिर वही घटना घटी. इस बार सुरक्षा के तौर पर हिना ने मच्छरदानी बहुत अच्छी तरह से गद्दे के नीचे दबा दी और अपने साथ बिस्तर पर टौर्च रख ली. मच्छरदानी खिंचने के साथ हाथ महसूस करते ही वह ?ाट से उठ कर बैठ गई और जोर से बोली, ‘‘कौन है?’’उस की आवाज और टौर्च की रोशनी से मम्मी उठ गईं. वे तुरंत उस के पास पहुंच कर बोलीं, ‘‘क्या हुआ हिना?’’

‘‘मम्मी, मु?ो लगा जैसे कोई मेरी मच्छरदानी खींच रहा है. खतरा महसूस होते ही मैं ने टौर्च जला दी. सामने शेखर भैया खड़े थे.’’उसे देख कर मम्मी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या हुआ शेखर? तुम यहां कैसे चले आए?’’ ‘‘बूआजी, बहुत जोर की प्यास लगी थी. पानी खत्म हो गया. वही लेने जा रहा था. शायद दरवाजा खुलने की आवाज से हिना डर कर उठ गई.’’

‘‘कोई बात नहीं बेटा. तू आराम कर. मैं पानी ला कर रख देती हूं,’’ कह कर उस ने जग भर पानी उन के कमरे में रख दिया.आज रात इतना कुछ अपनी आंखों से देख कर भी मम्मी को कुछ सम?ा नहीं आया था. हिना परेशान थी कि यह बात उन्हें कैसे सम?ाए? सीधे इलजाम लगाने पर बात बहुत बढ़ सकती थी और अंत में उसे ही चुप करा दिया जाता. लिहाजा, वह चुप ही रही.

अगली रात सोने से पहले उस ने मम्मी को हिदायत दे दी, ‘‘मम्मी, शेखर भैया के कमरे में हर चीज पहले से ही रख दिया करो. जरा सी खटपट होने पर मेरी नींद खुल जाती है. मु?ो रात में किसी का कमरे में आना अच्छा नहीं लगता.’’

 

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October 29, 2021 at 10:00AM

खौफ- भाग 1: हिना की मां के मन में किस बात का डर था

लेखिका- डा. के रानी 

शाम का समय था. राशि दी का फोन आ रहा था. यह देख कर हिना की खुशी का ठिकाना न रहा. वह सम?ा गई कि जरूर कोई खास बात होगी, जिस की वजह से उन्होंने इस समय फोन किया वरना वह रोज रात 10 बजे फोन करती है.

‘‘हैलो दी, कैसी हो? आज आप ने इस वक्त फोन कर दिया.’’ ‘‘क्या बताऊं, मु?ा से सब्र नहीं हो रहा था.’’ ‘‘ऐसी क्या बात हो गई?’’ ‘‘ईशा का रिश्ता पक्का हो गया है. बस, चट मंगनी पट ब्याह होना है. आज से ठीक 10 दिनों बाद सगाई है और उस के अगले दिन ही शादी है. तुम सब को आना है.’’

‘‘यह भी कोई कहने की बात है, दी. मैं जरूर आऊंगी.’’‘‘मैं तेरी ही बात नहीं कर रही हूं, बल्कि राजीव, अनन्या और विनय को भी आना है.’’‘‘राजीव की मैं कह नहीं सकती. विनय के अगले महीने इम्तिहान हैं. एक को उस के साथ घर पर रहना होगा. मैं और अनन्या जरूर आएंगे, यह तो पक्का है. कुछ दामाद के बारे में भी बताओ,’’ हिना ने कहा तो राशि दी फोन पर उसे सारी बातें विस्तार से बताने लगीं. बातें करते हुए दोनों को एक घंटा हो गया था, तभी अनन्या ने आवाज लगाई,

‘‘मम्मी, बाहर कोई आया है आप से मिलने.’’‘‘अच्छा दी, बाद में बात करती हूं,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया. खुशी के मारे उस के पैर धरती पर नहीं पड़ रहे थे.राशि दी ईशा के रिश्ते को ले कर कब से परेशान थीं. इतना पढ़लिखने के बाद भी उस के लिए कोई अच्छा रिश्ता नहीं मिल रहा था. अब ऊपर वाले ने उन की सुन ली थी और ?ाट से उस का रिश्ता तय हो गया था. लड़का मल्टीनैशनल कंपनी में इंजीनियर था. अच्छाखासा परिवार था. वहां कोई कमी नहीं थी.

हिना ने खुशखबरी अनन्या और राजीव को भी सुना दी.‘‘मम्मी, ईशा दी की शादी में मजा आ जाएगा. मैं पूरे एक हफ्ते वहीं रहूंगी,’’ अनन्या बोली.‘‘यह क्या कह रही है? शादी के माहौल में इतने दिन कैसे रहा जा सकता है?’’‘‘मम्मी, यही तो मौका होता है सब से मिलने का. शादी में हमारे सारे कजिन आएंगे. वैसे, उन से व्हाट्सऐप पर चैट हो जाती है लेकिन आमनेसामने बात करने का मजा ही कुछ और है.’’

‘‘यह सब छोड़ो, पहले शादी के लिए ड्रैस तैयार करवानी है. समय बहुत कम है.’’‘‘आप ठीक कह रही हैं मम्मी. हम कल ही बाजार जा कर सब से पहले अपने लिए ड्रैस तैयार करवा लेते हैं, बाकी काम तो होते रहेंगे,’’ अनन्या बोली.मांबेटी दोनों ही शादी की तैयारी में उसी दिन से जुट गई थीं.

हिना को अब इस से आगे कुछ सू?ा ही नहीं रहा था. राजीव बोले, ‘‘हिना, मैं एक दिन के लिए ही शादी में आ सकता हूं, उस से ज्यादा नहीं. बेटे के इम्तिहान सिर पर हैं. मैं इस समय इतना बड़ा रिस्क नहीं ले सकता.’’‘‘जैसा तुम्हें ठीक लगे. मैं तो अनन्या के साथ 2 दिन पहले ही चली जाऊंगी. आप को अभी से बता देती हूं.’’

‘‘तुम्हारी जो मरजी, वह करो. इस मामले में मैं कुछ नहीं बोलूंगा. मैं ने अपनी दिक्कत तुम्हें बता दी है, बाकी उन लोगों से तुम खुद ही निबट लेना.’’एक हफ्ता कब गुजर गया, पता ही नहीं लगा. अब शादी में केवल 3 दिन रह गए थे.

अगले दिन हिना और अनन्या को शादी में राशि दी के घर जाना था. अनन्या बोली, ‘‘मम्मी, आप ने स्कूल से कितने दिन की छुट्टी ली है?’’‘‘3 दिन और क्या…? बीच में एक दिन इतवार है. कुल मिला कर 4 दिन हो जाएंगे.’’‘‘आप चली आना, मैं तो वहीं रुकूंगी,’’ अनन्या बोली, तो हिना ने उसे घूर कर देखा. वह जानती थी कि मम्मी किसी भी कीमत पर उसे अकेले नहीं छोड़ेंगी और अपने साथ ही वापस ले आएंगी.

बचपन से वह यही सब देखती आई थी. मम्मी जहां कहीं भी जाती हैं, उसे अपने साथ ले कर जाती हैं. कहीं छोड़ने की नौबत आती तो बहाना बना कर टाल देतीं.पता नहीं क्यों मम्मी बेटी को किसी के भी घर पर अकेले छोड़ने में बहुत डरती थीं. इतना ही नहीं, घर पर कोई मेहमान आता तो वे उन की हर सुविधा का खयाल रखतीं. रात में कोई प्रोग्राम हो तो वे अनन्या के शामिल होने पर पहले ही एतराज जता देती थीं.

मम्मी का रुख देख कर अनन्या ने अब कुछ कहना ही छोड़ दिया था.अलीगढ़ से आगरा का केवल 2 घंटे का रास्ता था. वे टैक्सी से वहां पहुंच गए थे. उन्हें देख कर राशि दी बहुत खुश हुईं.‘‘हिना, तेरे आ जाने से मेरी हिम्मत बहुत बढ़ गई है, नहीं तो मैं बड़ा नर्वस हो रही थी. घर पर पहलीपहली शादी है, इसीलिए मु?ो थोड़ा डर लग रहा है.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है दी. हम मिलजुल कर काम करेंगे तो सबकुछ अच्छे से निबट जाएगा.’’‘‘हां, यह बात तो है. लड़के वालों की कोई डिमांड नहीं है. वे बहुत शरीफ लोग हैं. इसी वजह से मु?ो और ज्यादा हिचक हो रही है. हम अपनी बेटी की शादी में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. भले ही वे अपने मुंह से कुछ नहीं कह रहे.’’काफी देर तक वे बातें करती रहीं. अनन्या ईशा के पास आ गई और बोली, ‘‘कैसे हैं हमारे जीजू?’’

‘‘तुम खुद ही देख लेना.’’‘‘वह तो मैं देख लूंगी. तुम भी तो कुछ बताओ.’’‘‘मु?ो तो वे बहुत अच्छे लगे. वे बहुत सुल?ो हुए हैं. वे किसी से ज्यादा बात नहीं करते.’’‘‘अभी बात करने में डरते होंगे. धीरेधीरे तुम से और हम से भी उन की खूब बातें होने लगेंगी और कौनकौन आ रहा है?’’ अनन्या ईशा को चिढ़ाते हुए बोली.‘‘सब आ रहे हैं. मामा के दोनों बेटे और बूआ की दोनों लड़कियां कल  तक पहुंच जाएंगे. तुम्हारे आने से घर  में शादी के माहौल की शुरुआत हो  गई है.’’बातें करते हुए रात हो गई थी. हिना ने कहा, ‘‘दी, मेरे लिए अलग कमरे की व्यवस्था कर देना.’’

‘‘तु?ो कहने की जरूरत नहीं है. मैं जानती हूं कि तू क्या चाहती है? मैं ने तेरे लिए पहले से ही व्यवस्था कर दी है. तुम और अनन्या ऊपर के कमरे में आराम से रहना.’’‘‘थैंक्यू दी,’’ कह कर हिना अनन्या के साथ वहां आ गई. उन्होंने अच्छे से अपना सामान व्यवस्थित कर लिया. हिना ने हमेशा की तरह यहां आ कर अनन्या को ढेर सारी नसीहतें दे डालीं.

 

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लेखिका- डा. के रानी 

शाम का समय था. राशि दी का फोन आ रहा था. यह देख कर हिना की खुशी का ठिकाना न रहा. वह सम?ा गई कि जरूर कोई खास बात होगी, जिस की वजह से उन्होंने इस समय फोन किया वरना वह रोज रात 10 बजे फोन करती है.

‘‘हैलो दी, कैसी हो? आज आप ने इस वक्त फोन कर दिया.’’ ‘‘क्या बताऊं, मु?ा से सब्र नहीं हो रहा था.’’ ‘‘ऐसी क्या बात हो गई?’’ ‘‘ईशा का रिश्ता पक्का हो गया है. बस, चट मंगनी पट ब्याह होना है. आज से ठीक 10 दिनों बाद सगाई है और उस के अगले दिन ही शादी है. तुम सब को आना है.’’

‘‘यह भी कोई कहने की बात है, दी. मैं जरूर आऊंगी.’’‘‘मैं तेरी ही बात नहीं कर रही हूं, बल्कि राजीव, अनन्या और विनय को भी आना है.’’‘‘राजीव की मैं कह नहीं सकती. विनय के अगले महीने इम्तिहान हैं. एक को उस के साथ घर पर रहना होगा. मैं और अनन्या जरूर आएंगे, यह तो पक्का है. कुछ दामाद के बारे में भी बताओ,’’ हिना ने कहा तो राशि दी फोन पर उसे सारी बातें विस्तार से बताने लगीं. बातें करते हुए दोनों को एक घंटा हो गया था, तभी अनन्या ने आवाज लगाई,

‘‘मम्मी, बाहर कोई आया है आप से मिलने.’’‘‘अच्छा दी, बाद में बात करती हूं,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया. खुशी के मारे उस के पैर धरती पर नहीं पड़ रहे थे.राशि दी ईशा के रिश्ते को ले कर कब से परेशान थीं. इतना पढ़लिखने के बाद भी उस के लिए कोई अच्छा रिश्ता नहीं मिल रहा था. अब ऊपर वाले ने उन की सुन ली थी और ?ाट से उस का रिश्ता तय हो गया था. लड़का मल्टीनैशनल कंपनी में इंजीनियर था. अच्छाखासा परिवार था. वहां कोई कमी नहीं थी.

हिना ने खुशखबरी अनन्या और राजीव को भी सुना दी.‘‘मम्मी, ईशा दी की शादी में मजा आ जाएगा. मैं पूरे एक हफ्ते वहीं रहूंगी,’’ अनन्या बोली.‘‘यह क्या कह रही है? शादी के माहौल में इतने दिन कैसे रहा जा सकता है?’’‘‘मम्मी, यही तो मौका होता है सब से मिलने का. शादी में हमारे सारे कजिन आएंगे. वैसे, उन से व्हाट्सऐप पर चैट हो जाती है लेकिन आमनेसामने बात करने का मजा ही कुछ और है.’’

‘‘यह सब छोड़ो, पहले शादी के लिए ड्रैस तैयार करवानी है. समय बहुत कम है.’’‘‘आप ठीक कह रही हैं मम्मी. हम कल ही बाजार जा कर सब से पहले अपने लिए ड्रैस तैयार करवा लेते हैं, बाकी काम तो होते रहेंगे,’’ अनन्या बोली.मांबेटी दोनों ही शादी की तैयारी में उसी दिन से जुट गई थीं.

हिना को अब इस से आगे कुछ सू?ा ही नहीं रहा था. राजीव बोले, ‘‘हिना, मैं एक दिन के लिए ही शादी में आ सकता हूं, उस से ज्यादा नहीं. बेटे के इम्तिहान सिर पर हैं. मैं इस समय इतना बड़ा रिस्क नहीं ले सकता.’’‘‘जैसा तुम्हें ठीक लगे. मैं तो अनन्या के साथ 2 दिन पहले ही चली जाऊंगी. आप को अभी से बता देती हूं.’’

‘‘तुम्हारी जो मरजी, वह करो. इस मामले में मैं कुछ नहीं बोलूंगा. मैं ने अपनी दिक्कत तुम्हें बता दी है, बाकी उन लोगों से तुम खुद ही निबट लेना.’’एक हफ्ता कब गुजर गया, पता ही नहीं लगा. अब शादी में केवल 3 दिन रह गए थे.

अगले दिन हिना और अनन्या को शादी में राशि दी के घर जाना था. अनन्या बोली, ‘‘मम्मी, आप ने स्कूल से कितने दिन की छुट्टी ली है?’’‘‘3 दिन और क्या…? बीच में एक दिन इतवार है. कुल मिला कर 4 दिन हो जाएंगे.’’‘‘आप चली आना, मैं तो वहीं रुकूंगी,’’ अनन्या बोली, तो हिना ने उसे घूर कर देखा. वह जानती थी कि मम्मी किसी भी कीमत पर उसे अकेले नहीं छोड़ेंगी और अपने साथ ही वापस ले आएंगी.

बचपन से वह यही सब देखती आई थी. मम्मी जहां कहीं भी जाती हैं, उसे अपने साथ ले कर जाती हैं. कहीं छोड़ने की नौबत आती तो बहाना बना कर टाल देतीं.पता नहीं क्यों मम्मी बेटी को किसी के भी घर पर अकेले छोड़ने में बहुत डरती थीं. इतना ही नहीं, घर पर कोई मेहमान आता तो वे उन की हर सुविधा का खयाल रखतीं. रात में कोई प्रोग्राम हो तो वे अनन्या के शामिल होने पर पहले ही एतराज जता देती थीं.

मम्मी का रुख देख कर अनन्या ने अब कुछ कहना ही छोड़ दिया था.अलीगढ़ से आगरा का केवल 2 घंटे का रास्ता था. वे टैक्सी से वहां पहुंच गए थे. उन्हें देख कर राशि दी बहुत खुश हुईं.‘‘हिना, तेरे आ जाने से मेरी हिम्मत बहुत बढ़ गई है, नहीं तो मैं बड़ा नर्वस हो रही थी. घर पर पहलीपहली शादी है, इसीलिए मु?ो थोड़ा डर लग रहा है.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है दी. हम मिलजुल कर काम करेंगे तो सबकुछ अच्छे से निबट जाएगा.’’‘‘हां, यह बात तो है. लड़के वालों की कोई डिमांड नहीं है. वे बहुत शरीफ लोग हैं. इसी वजह से मु?ो और ज्यादा हिचक हो रही है. हम अपनी बेटी की शादी में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. भले ही वे अपने मुंह से कुछ नहीं कह रहे.’’काफी देर तक वे बातें करती रहीं. अनन्या ईशा के पास आ गई और बोली, ‘‘कैसे हैं हमारे जीजू?’’

‘‘तुम खुद ही देख लेना.’’‘‘वह तो मैं देख लूंगी. तुम भी तो कुछ बताओ.’’‘‘मु?ो तो वे बहुत अच्छे लगे. वे बहुत सुल?ो हुए हैं. वे किसी से ज्यादा बात नहीं करते.’’‘‘अभी बात करने में डरते होंगे. धीरेधीरे तुम से और हम से भी उन की खूब बातें होने लगेंगी और कौनकौन आ रहा है?’’ अनन्या ईशा को चिढ़ाते हुए बोली.‘‘सब आ रहे हैं. मामा के दोनों बेटे और बूआ की दोनों लड़कियां कल  तक पहुंच जाएंगे. तुम्हारे आने से घर  में शादी के माहौल की शुरुआत हो  गई है.’’बातें करते हुए रात हो गई थी. हिना ने कहा, ‘‘दी, मेरे लिए अलग कमरे की व्यवस्था कर देना.’’

‘‘तु?ो कहने की जरूरत नहीं है. मैं जानती हूं कि तू क्या चाहती है? मैं ने तेरे लिए पहले से ही व्यवस्था कर दी है. तुम और अनन्या ऊपर के कमरे में आराम से रहना.’’‘‘थैंक्यू दी,’’ कह कर हिना अनन्या के साथ वहां आ गई. उन्होंने अच्छे से अपना सामान व्यवस्थित कर लिया. हिना ने हमेशा की तरह यहां आ कर अनन्या को ढेर सारी नसीहतें दे डालीं.

 

The post खौफ- भाग 1: हिना की मां के मन में किस बात का डर था appeared first on Sarita Magazine.

October 29, 2021 at 10:00AM

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