Monday, 29 June 2020

जिद-भाग 3: शिशिर चंचल पर क्यों चिल्लाया ?

लेखिका–रिजवाना बानो ‘इकरा’

‘‘हम्म… मुझे लगता था कि तेरे पास बंगला है, गाड़ी है, पैसा है, सब है तो तू तो बहुत खुश होगी. लेकिन जब अंकल ने बताया कि तुम साल में एक ही बार पीहर आती हो, तो कुछ खटका सा हुआ. सब ठीक है न चंचल? तुम बिजी रहती हो, इसीलिए कम आ पाती हो न घर?‘‘

अब बारी चंचल की थी, ‘‘हां, बिजी तो रहती हूं. 2 बच्चे, सासससुर, जेठजेठानी और पतिदेव. उस पर से इतनी बड़ी कोठी. कहां समय मिलता है?‘‘

चंचल की आंखों का शून्य, लेकिन आकांक्षा पढ़ चुकी थी, ‘‘और जौब…? तुझे तो अपनी आजादी बहुत पसंद थी. जौब क्यों नहीं की तुम ने?‘‘

‘‘शिशिर…‘‘

‘‘शिशिर? तुम ने बात की थी न शादी से पहले ही उस से तो…? फिर क्या बात हुई?‘‘

‘‘हां, की थी, लेकिन मांजी को पसंद नहीं और शिशिर भी मां का कहा नहीं टाल सकते. सो, अब सुहाना और आशु ही जौब है मेरी,‘‘ मुसकराते हुए चंचल बोली.

‘‘हम्म…तू खुश है?‘‘

‘‘हां बहुत, सबकुछ तो है मेरे पास, किस बात की कमी है?‘‘

तभी भाई का फोन आ गया, ‘‘दीदी, आशु आप को ढ़ूंढ़ रहा है तब से. रोरो कर बुरा हाल कर लिया है अपना. आप आ जाइए, जल्दी.‘‘

‘‘ओह्ह, आई मैं बस. तब तक उसे तुम किंडर जौय दिला लाओ. थोड़ा ध्यान भटकेगा उस का. मैं पहुंच ही रही हूं बस,‘‘ फोन डिस्कनैक्ट होने के साथ ही चंचल उठ खड़ी हुई.

‘‘निकलना होगा अक्कू मुझे. आशु रो रहा है. आते वक्त नाना के साथ खेलने में इतना बिजी था कि मैं ने डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा.‘‘

‘‘अच्छा सुन, फोन करना… और मिलती भी रहना अब, बिजी मैडम,‘‘ गले लगाते हुए आकांक्षा ने बोला.

हड़बड़ाहट में भी चंचल के चेहरे पर मुसकान आ गई. ‘‘मिलते हैं. चल, बाय. खयाल रखना अपना. मैं फोन करती हूं.‘‘

10 मिनट बाद चंचल अपने घर थी और आशु में बिजी हो गई. उधर आकांक्षा भी अपने वीकेंड वाले काम निबटाने में लग गई है. सबकुछ रुटीन जैसा दिख रहा है, चल भी रहा है, लेकिन दोनों के मन में उथलपुथल मची है.

अपनेअपने रुटीन में बिजी ये दोनों सहेलियां, जिन के पास खुद के बारे में सोचने का समय नहीं होता, वो दोनों ही एकदूसरे के बारे में सोच रही हैं, बल्कि सोचे ही जा रही हैं.

चंचल की आंखों के सामने से आकांक्षा को रोना नहीं आ रहा. और आकांक्षा के जेहन से चंचल के ये शब्द, ‘‘सबकुछ तो है मेरे पास, किस बात की कमी है?‘‘

आकांक्षा जानती है कि इस बात का मतलब है कि जो दिख रहा है, वो सच नहीं है. इधर चंचल आकांक्षा के साथसाथ मौडल मीनाक्षी के बारे में भी सोच रही थी. सब से कमजोर बैकग्राउंड होने के बाद भी उस ने वो पा लिया, जो उस ने चाहा था. उस के पास सब से ज्यादा जो था, वो थी ‘जिद‘, वरना उस के सपनों का कौन मजाक नहीं उड़ाता था कालेज में.

रविवार के बाद सोमवार भी इसी तरह गुजर गया. न औफिस में मन लगा आकांक्षा का, न घर में. मांपापा, भाईबच्चे, सब के होते हुए भी चंचल अपने में खोई सी रही. जाने क्या था वो, जो दोनों के मन में बीज ले रहा था.

मंगल की शाम को चंचल ने भाई को आवाज लगाई, ‘‘मनु, ओ मनु…‘‘

‘‘आया दीदी.‘‘

‘‘एक बात बता… एमबीए कंपलीट हुए मुझे 10 साल हो गए न, इतना गैप हो जाने के बाद कोई जौब मिलेगी क्या मुझे?‘‘

‘‘जौब? अचानक से दीदी? जीजाजी से पूछा आप ने? और समधिनजी, उन को बुरा लगा तो…?‘‘

‘‘मैं ने जो पूछा, उस में से किसी एक बात का भी जवाब नहीं दिया तू ने. तेरे जीजाजी और समधिनजी को नहीं करनी जौब. मुझे करनी है जौब. अब तू कुछ हैल्प कर सकता है तो बता या मैं कुछ और सोचूं?‘‘

अपनी दीदी में अचानक से आए आत्मविश्वास को देख आश्चर्यमिश्रित खुशी से मनु बोला, ‘‘अरे, करूंगा क्यों नहीं? लेकिन सच बात यह है कि इतने गैप के बाद आप को अच्छा पैकेज मिलना मुश्किल है. बहुत स्ट्रगल रहेगा, जौब मिलना भी एक मुश्किल टास्क रहेगा. कंपनियां एक्सपीरियंस्ड लोगों को पहले बुलाती हंै.‘‘

‘‘अच्छा…‘‘ मायूस हो गई चंचल.

‘‘अरे, इस में उदास होने वाली क्या बात है? पूरी बात तो सुनिए.‘‘

‘‘सुना…‘‘

‘‘वर्क फ्रौम होम कर सकती हैं आप दीदी. शेयर मार्केट की करंट स्ट्रेटेजी समझने के लिए एक सर्टिफिकेट कोर्स कर लो आप. फिर आप अपने हिसाब से औनलाइन टाइम स्पैन सलैक्ट कर पाएंगी. और बच्चों को भी देख पाएंगी.‘‘

‘‘हम्म…. ठीक.‘‘

‘‘मुझे कल तक का समय दो, मैं पूरी डिटेल्स पता कर के बताता हूं आप को.‘‘

इधर, डिनर पर पंकज, हमेशा की तरह अपनी कंपनी और मालिक संचेती के बखान किए जा रहा था, लेकिन आकांक्षा का ध्यान न खाने में था और न ही पंकज की बातों में. डिनर के बाद पंकज ने पूछा भी, ‘‘तबीयत तो ठीक है न तुम्हारी? इतवार से देख रहा हूं तुम्हें, बुझीबुझी सी हो. और तुम ने बताया भी नहीं कि तुम्हारी सहेली से मुलाकात कैसी रही? क्या झटका दे दिया उस ने मेरी जान को?‘‘

‘‘कुछ भी तो नहीं,‘‘ एक फीकी मुसकान के साथ आकांक्षा उठ कर अपने काम में लग गई.

पंकज ने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया. वह अपनी जिम्मेदारी पूरी कर चुका है. अब न बताएं तो आकांक्षा की मरजी. आकांक्षा भी जानती थी कि औपचारिकता थी वो, दोबारा नहीं पूछने वाला पंकज.

मंगल की रात दोनों सहेलियों के लिए मंगलकारी या यों ही कहिए, क्रांतिकारी रही. आकांक्षा ने खुद को इस बात के लिए तैयार किया कि वो पंकज को साफसाफ शब्दों में बात करेगी कि वो मां बनने की खुशी से अब और दूर नहीं रह सकती और चंचल ने तमाम कोर्सेज देख कर, दिल्ली के एमिटी कालेज में एप्लाई भी कर दिया.

बुधवार की सुबह दोनों के लिए परीक्षा की घड़ी थी जैसे. चंचल शिशिर के फोन का इंतजार कर रही थी और आकांक्षा पंकज के जागने का.

‘‘हैलो, कैसी है मेरी दो जान? और जान की स्वीट सी मम्मी? सुबह हुई या नहीं?‘‘

‘‘हैलो शिशिर, हम सब अच्छे हैं. आप लोग सब कैसे हैं?‘‘

शिशिर को याद आया कि सालों से चंचल ने उसे नाम से नहीं बुलाया है, एकदम से अपना नाम सुन कर चैंक सा गया, ‘‘हम भी बढ़िया. क्या बात है चंचल? सब ठीक है न?‘‘

‘‘हां, सब बढ़िया. क्यों, क्या हुआ?‘‘

‘‘लगा मुझे, अच्छा सुहाना से बात कराओ तो…‘‘

‘‘शिशिर, मुझे आप से कुछ बात करनी है?‘‘

‘‘हां, हां, बताओ.‘‘

‘‘मैंने एमिटी से शेयर मार्केट में स्पेशलाइजेशन सर्टिफिकेट कोर्स एप्लाई किया है.‘‘

‘‘अच्छा? क्यों अपने गरीब भाई को हैल्प करनी है क्या तुम्हें?‘‘ व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए शिशिर बोला.

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लेखिका–रिजवाना बानो ‘इकरा’

‘‘हम्म… मुझे लगता था कि तेरे पास बंगला है, गाड़ी है, पैसा है, सब है तो तू तो बहुत खुश होगी. लेकिन जब अंकल ने बताया कि तुम साल में एक ही बार पीहर आती हो, तो कुछ खटका सा हुआ. सब ठीक है न चंचल? तुम बिजी रहती हो, इसीलिए कम आ पाती हो न घर?‘‘

अब बारी चंचल की थी, ‘‘हां, बिजी तो रहती हूं. 2 बच्चे, सासससुर, जेठजेठानी और पतिदेव. उस पर से इतनी बड़ी कोठी. कहां समय मिलता है?‘‘

चंचल की आंखों का शून्य, लेकिन आकांक्षा पढ़ चुकी थी, ‘‘और जौब…? तुझे तो अपनी आजादी बहुत पसंद थी. जौब क्यों नहीं की तुम ने?‘‘

‘‘शिशिर…‘‘

‘‘शिशिर? तुम ने बात की थी न शादी से पहले ही उस से तो…? फिर क्या बात हुई?‘‘

‘‘हां, की थी, लेकिन मांजी को पसंद नहीं और शिशिर भी मां का कहा नहीं टाल सकते. सो, अब सुहाना और आशु ही जौब है मेरी,‘‘ मुसकराते हुए चंचल बोली.

‘‘हम्म…तू खुश है?‘‘

‘‘हां बहुत, सबकुछ तो है मेरे पास, किस बात की कमी है?‘‘

तभी भाई का फोन आ गया, ‘‘दीदी, आशु आप को ढ़ूंढ़ रहा है तब से. रोरो कर बुरा हाल कर लिया है अपना. आप आ जाइए, जल्दी.‘‘

‘‘ओह्ह, आई मैं बस. तब तक उसे तुम किंडर जौय दिला लाओ. थोड़ा ध्यान भटकेगा उस का. मैं पहुंच ही रही हूं बस,‘‘ फोन डिस्कनैक्ट होने के साथ ही चंचल उठ खड़ी हुई.

‘‘निकलना होगा अक्कू मुझे. आशु रो रहा है. आते वक्त नाना के साथ खेलने में इतना बिजी था कि मैं ने डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा.‘‘

‘‘अच्छा सुन, फोन करना… और मिलती भी रहना अब, बिजी मैडम,‘‘ गले लगाते हुए आकांक्षा ने बोला.

हड़बड़ाहट में भी चंचल के चेहरे पर मुसकान आ गई. ‘‘मिलते हैं. चल, बाय. खयाल रखना अपना. मैं फोन करती हूं.‘‘

10 मिनट बाद चंचल अपने घर थी और आशु में बिजी हो गई. उधर आकांक्षा भी अपने वीकेंड वाले काम निबटाने में लग गई है. सबकुछ रुटीन जैसा दिख रहा है, चल भी रहा है, लेकिन दोनों के मन में उथलपुथल मची है.

अपनेअपने रुटीन में बिजी ये दोनों सहेलियां, जिन के पास खुद के बारे में सोचने का समय नहीं होता, वो दोनों ही एकदूसरे के बारे में सोच रही हैं, बल्कि सोचे ही जा रही हैं.

चंचल की आंखों के सामने से आकांक्षा को रोना नहीं आ रहा. और आकांक्षा के जेहन से चंचल के ये शब्द, ‘‘सबकुछ तो है मेरे पास, किस बात की कमी है?‘‘

आकांक्षा जानती है कि इस बात का मतलब है कि जो दिख रहा है, वो सच नहीं है. इधर चंचल आकांक्षा के साथसाथ मौडल मीनाक्षी के बारे में भी सोच रही थी. सब से कमजोर बैकग्राउंड होने के बाद भी उस ने वो पा लिया, जो उस ने चाहा था. उस के पास सब से ज्यादा जो था, वो थी ‘जिद‘, वरना उस के सपनों का कौन मजाक नहीं उड़ाता था कालेज में.

रविवार के बाद सोमवार भी इसी तरह गुजर गया. न औफिस में मन लगा आकांक्षा का, न घर में. मांपापा, भाईबच्चे, सब के होते हुए भी चंचल अपने में खोई सी रही. जाने क्या था वो, जो दोनों के मन में बीज ले रहा था.

मंगल की शाम को चंचल ने भाई को आवाज लगाई, ‘‘मनु, ओ मनु…‘‘

‘‘आया दीदी.‘‘

‘‘एक बात बता… एमबीए कंपलीट हुए मुझे 10 साल हो गए न, इतना गैप हो जाने के बाद कोई जौब मिलेगी क्या मुझे?‘‘

‘‘जौब? अचानक से दीदी? जीजाजी से पूछा आप ने? और समधिनजी, उन को बुरा लगा तो…?‘‘

‘‘मैं ने जो पूछा, उस में से किसी एक बात का भी जवाब नहीं दिया तू ने. तेरे जीजाजी और समधिनजी को नहीं करनी जौब. मुझे करनी है जौब. अब तू कुछ हैल्प कर सकता है तो बता या मैं कुछ और सोचूं?‘‘

अपनी दीदी में अचानक से आए आत्मविश्वास को देख आश्चर्यमिश्रित खुशी से मनु बोला, ‘‘अरे, करूंगा क्यों नहीं? लेकिन सच बात यह है कि इतने गैप के बाद आप को अच्छा पैकेज मिलना मुश्किल है. बहुत स्ट्रगल रहेगा, जौब मिलना भी एक मुश्किल टास्क रहेगा. कंपनियां एक्सपीरियंस्ड लोगों को पहले बुलाती हंै.‘‘

‘‘अच्छा…‘‘ मायूस हो गई चंचल.

‘‘अरे, इस में उदास होने वाली क्या बात है? पूरी बात तो सुनिए.‘‘

‘‘सुना…‘‘

‘‘वर्क फ्रौम होम कर सकती हैं आप दीदी. शेयर मार्केट की करंट स्ट्रेटेजी समझने के लिए एक सर्टिफिकेट कोर्स कर लो आप. फिर आप अपने हिसाब से औनलाइन टाइम स्पैन सलैक्ट कर पाएंगी. और बच्चों को भी देख पाएंगी.‘‘

‘‘हम्म…. ठीक.‘‘

‘‘मुझे कल तक का समय दो, मैं पूरी डिटेल्स पता कर के बताता हूं आप को.‘‘

इधर, डिनर पर पंकज, हमेशा की तरह अपनी कंपनी और मालिक संचेती के बखान किए जा रहा था, लेकिन आकांक्षा का ध्यान न खाने में था और न ही पंकज की बातों में. डिनर के बाद पंकज ने पूछा भी, ‘‘तबीयत तो ठीक है न तुम्हारी? इतवार से देख रहा हूं तुम्हें, बुझीबुझी सी हो. और तुम ने बताया भी नहीं कि तुम्हारी सहेली से मुलाकात कैसी रही? क्या झटका दे दिया उस ने मेरी जान को?‘‘

‘‘कुछ भी तो नहीं,‘‘ एक फीकी मुसकान के साथ आकांक्षा उठ कर अपने काम में लग गई.

पंकज ने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया. वह अपनी जिम्मेदारी पूरी कर चुका है. अब न बताएं तो आकांक्षा की मरजी. आकांक्षा भी जानती थी कि औपचारिकता थी वो, दोबारा नहीं पूछने वाला पंकज.

मंगल की रात दोनों सहेलियों के लिए मंगलकारी या यों ही कहिए, क्रांतिकारी रही. आकांक्षा ने खुद को इस बात के लिए तैयार किया कि वो पंकज को साफसाफ शब्दों में बात करेगी कि वो मां बनने की खुशी से अब और दूर नहीं रह सकती और चंचल ने तमाम कोर्सेज देख कर, दिल्ली के एमिटी कालेज में एप्लाई भी कर दिया.

बुधवार की सुबह दोनों के लिए परीक्षा की घड़ी थी जैसे. चंचल शिशिर के फोन का इंतजार कर रही थी और आकांक्षा पंकज के जागने का.

‘‘हैलो, कैसी है मेरी दो जान? और जान की स्वीट सी मम्मी? सुबह हुई या नहीं?‘‘

‘‘हैलो शिशिर, हम सब अच्छे हैं. आप लोग सब कैसे हैं?‘‘

शिशिर को याद आया कि सालों से चंचल ने उसे नाम से नहीं बुलाया है, एकदम से अपना नाम सुन कर चैंक सा गया, ‘‘हम भी बढ़िया. क्या बात है चंचल? सब ठीक है न?‘‘

‘‘हां, सब बढ़िया. क्यों, क्या हुआ?‘‘

‘‘लगा मुझे, अच्छा सुहाना से बात कराओ तो…‘‘

‘‘शिशिर, मुझे आप से कुछ बात करनी है?‘‘

‘‘हां, हां, बताओ.‘‘

‘‘मैंने एमिटी से शेयर मार्केट में स्पेशलाइजेशन सर्टिफिकेट कोर्स एप्लाई किया है.‘‘

‘‘अच्छा? क्यों अपने गरीब भाई को हैल्प करनी है क्या तुम्हें?‘‘ व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए शिशिर बोला.

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June 30, 2020 at 10:00AM

जिद-भाग 2: शिशिर चंचल पर क्यों चिल्लाया ?

लेखिका–रिजवाना बानो ‘इकरा’

चंचल को अपनी इन खयालों की दुनिया से बाहर ले कर आई शिशिर की आवाज, “चंचल, मां बुला रही है, ड्राइंगरूम में, जल्दी आओ.“

यह सुन कर चंचल का दिल जोरों से धड़कने लगा कि अब खैर नहीं. डिनर का वक्त तो टल गया, लेकिन अब पक्की तरह से क्लास लगेगी.

ड्राइंगरूम में पहुंच कर देखा तो सब शांत था यानी कि कोई और बात है, चलो अच्छा हुआ.

मिसेज रस्तोगी ने बिठाया दोनों बहुओं को और अपने फौरेन टूर के बारे में बताने लगीं. इस बार रक्षाबंधन पर उन का यूरोप घूमने का प्लान है, अपनी दोनों बेटियों और दोनों बेटों के साथ. दोनों बहुओं को इस के एवज में छूट दी गई थी कि वो एक हफ्ता अपने पीहर रह कर आ सकती हैं, चाहें तो…

चंचल की आंखों में चमक आ गई, जैसे कि मांगी मुराद मिल गई हो, बल्कि उस से ज्यादा. अब वो आकांक्षा के साथ कितना सारा वक्त बिता पाएगी. बाकी घर वालों को उस की खुशी का राज समझ नहीं आ रहा था, लेकिन चंचल बहुत खुश थी.

आखिरकार रक्षाबंधन का समय भी आ गया. इधर, सुहाना और आशु खुश थे कि एक सप्ताह ननिहाल में धमाल मचाएंगे. तो उधर, चंचल के मन में भाई के साथसाथ आकांक्षा से मिलने की बेचैनी. चंचल के मातापिता तो तब से अपने नातीनातिन को खिलाने को बेताब थे. सालभर में, एक रक्षाबंधन पर ही चंचल घर आती थी और वो भी सिर्फ एक दिन के लिए, आज पूरे सप्ताह के लिए आ रही थी.

शनिवार का दिन त्योहार में गुजर गया, अगला दिन इतवार था, आकांक्षा को भी औफिस से फुरसत थी और चंचल को भी, अपने ससुराल की ड्यूटी से. आकांक्षा के घर मिलना तय हुआ. सुबहसुबह, 11 बजे ही चंचल को भाई आकांक्षा के यहां छोड़ आया.

घंटी बजाते ही उस की आवाज गूंज गई, चारों तरफ.

‘‘आ रही हूं…‘‘

दरवाजा खुलते ही चंचल का मानो सपना टूट गया, इतनी कमजोर सी, बीमार सी आकांक्षा. गले लगाते ही आंसू आ गए उस के, ‘‘क्या हाल बना लिया है अपना तू ने, ये हड्डियांहड्डियां क्यों निकाल रखी हैं? बीमार है क्या?‘‘

आकांक्षा हंसते हुए बोली, ‘‘जैसे, तू खुद बड़ी मुटा गई हो. किधर से दो बच्चों की मां लग रही हो तुम? चल अब अंदर भी आ… सारी चिंता चैखट पर ही कर लोगी क्या?‘‘

घर छोटा सा था आकांक्षा का, लेकिन एकदम रौयल सजा हुआ था. ‘‘तो मैडम को अब महंगी चीजों का शौक भी हो चला है…हम्म…‘‘

‘‘ये सब तो पंकज की पसंद है, शादी के बाद कहां अपना कुछ बच ही जाता है. जो पतिदेव चाहें, बस वही सत्य है.‘‘

आकांक्षा की आंखों में उदासी देख, चंचल ने बात पलटी, ‘‘और बच्चे? बच्चे कहां हैं? वो तो पतिदेव को पसंद हैं या वो भी नहीं?‘‘

‘‘चल तू भी न, देख तेरे फेवरेट वाले दालपकौड़े बनाए हैं. चाय बस बन ही रही है.‘‘

‘‘बन क्या रही है चाय? 8 साल बाद मिलेंगे तो तू मेहमान की तरह चाय पिलाएगी मुझे? तू तो वैसे भी मेरे हाथ की चाय की दीवानी है.‘‘

अब दोनों सहेलियां किचन में हैं और चंचल चाय बना रही है.

‘‘चंचल, तुझे याद है वो मीनाक्षी…?‘‘

‘‘हां, वही मौडल मीनाक्षी न, जिस को सजनेसंवरने से फुरसत नहीं होती थी. हां याद है. हमारी तो कभी बनी ही नहीं थी उस से. वो कहां मिल गई तुझे?‘‘

‘‘मैड़म, सच में मौडलिंग कर रही है. पिछले महीने मैगजीन में उस का फोटो देखा तो आंखें खुली रह गईं. उस ने जो चाहा पा लिया. एक बड़ा नाम है मौडलिंग की दुनिया में वो आज.‘‘

‘‘वाअव… अच्छा है, किसी को तो कुछ मिला.‘‘

‘‘तुम्हें भी तो शिशिर मिल ही गया, क्यों? नहीं मिला क्या?‘‘ आकांक्षा की शरारत शुरू हो चुकी थी.

शिशिर के नाम पर चंचल आज भी झेंप सी गई. चायपकौड़े ले कर दोनों रौयल बैठक में आ कर बैठ गए. चाय पीते हुए चंचल ने फिर आकांक्षा से पूछा, ‘‘अब बता भी… बच्चे कहां हैं? दिख ही नहीं रहे. दादादादी के पास हैं? या सुबहसुबह खेलने निकल लिए.‘‘

इतनी देर से इधरउधर की बातें करते हुए आखिरकार आकांक्षा की आंख में आसूं आ गए.

‘‘आकांक्षा… अक्कू… क्या हुआ बच्चे? बता… सब ठीक है न? तेरी आंख में आंसू, मतलब बहुत बड़ी बात है.‘‘

गले लगा कर चंचल ने फिर से कहा, ‘‘अच्छा सब छोड़, पहले शांत हो जा तू. मेरी अक्कू रोते हुए बिलकुल अच्छी नहीं लगती.‘‘

चंचल ने नाक खींची, तो आकांक्षा के चेहरे पर भी मुसकान आ गई. अब दोनों सहेलियां बिना कुछ बोले, चाय पीने लगीं. चंचल ने अब कुछ नहीं पूछा. वो आकांक्षा को जानती है. कुछ समय ले कर वो खुद बता देगी कि क्या बात है.

‘‘बच्चे नहीं हैं चंचल, नहीं हैं बच्चे,‘‘ फिर से रो पड़ी आकांक्षा.

‘‘ठीक है बाबा, नहीं हैं तो आ जाएंगे. वादा, अब दोबारा नहीं पूछूंगी. तू रो मत बस यार.‘‘

‘‘पंकज को अपना स्टेटस बनाना है. वो हमारी मिडिल क्लास वाली जिंदगी से बिलकुल खुश नहीं हैं. 8 साल हो गए शादी को, इन्हें लगता है, जिंदगी बस महंगी चीजों के पीछे भागने का नाम है.‘‘

एक गहरी सांस ले कर आकांक्षा ने कहा, ‘‘पता नहीं किस की बराबरी करना चाहते हैं. यह घर मुझे अपना घर लगता ही नहीं है. ब्रांडेड और महंगी चीजें बस, मेरी सादगी कहीं पीछे छूट गई है. पहननाओढ़ना, सब उन्हीं के हिसाब से होना चाहिए.‘‘

‘‘अब जब घर में लगभग हर सामान अपनी मरजी का खरीद चुके हैं तो अब इन्हें एक विला खरीदना है. जब तक इतना पैसा जमा नहीं कर लेंगे, विला खरीद नहीं लेंगे, तब तक कुछ और सुध नहीं लेनी.‘‘

‘‘आज संडे भी औफिस गए हैं. मेरी सरकारी नौकरी है. सो, मुझ पर बस नहीं चलता इन का, नहीं तो संडे भी औफिस भेज दें मुझे ये.‘‘

‘‘तुम्हारी बातों से ऐसा लग रहा है अक्कू, मानो मशीन हो तुम दोनों. और इसीलिए पंकजजी बच्चे नहीं चाहते हैं? एम आई राइट?‘‘

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लेखिका–रिजवाना बानो ‘इकरा’

चंचल को अपनी इन खयालों की दुनिया से बाहर ले कर आई शिशिर की आवाज, “चंचल, मां बुला रही है, ड्राइंगरूम में, जल्दी आओ.“

यह सुन कर चंचल का दिल जोरों से धड़कने लगा कि अब खैर नहीं. डिनर का वक्त तो टल गया, लेकिन अब पक्की तरह से क्लास लगेगी.

ड्राइंगरूम में पहुंच कर देखा तो सब शांत था यानी कि कोई और बात है, चलो अच्छा हुआ.

मिसेज रस्तोगी ने बिठाया दोनों बहुओं को और अपने फौरेन टूर के बारे में बताने लगीं. इस बार रक्षाबंधन पर उन का यूरोप घूमने का प्लान है, अपनी दोनों बेटियों और दोनों बेटों के साथ. दोनों बहुओं को इस के एवज में छूट दी गई थी कि वो एक हफ्ता अपने पीहर रह कर आ सकती हैं, चाहें तो…

चंचल की आंखों में चमक आ गई, जैसे कि मांगी मुराद मिल गई हो, बल्कि उस से ज्यादा. अब वो आकांक्षा के साथ कितना सारा वक्त बिता पाएगी. बाकी घर वालों को उस की खुशी का राज समझ नहीं आ रहा था, लेकिन चंचल बहुत खुश थी.

आखिरकार रक्षाबंधन का समय भी आ गया. इधर, सुहाना और आशु खुश थे कि एक सप्ताह ननिहाल में धमाल मचाएंगे. तो उधर, चंचल के मन में भाई के साथसाथ आकांक्षा से मिलने की बेचैनी. चंचल के मातापिता तो तब से अपने नातीनातिन को खिलाने को बेताब थे. सालभर में, एक रक्षाबंधन पर ही चंचल घर आती थी और वो भी सिर्फ एक दिन के लिए, आज पूरे सप्ताह के लिए आ रही थी.

शनिवार का दिन त्योहार में गुजर गया, अगला दिन इतवार था, आकांक्षा को भी औफिस से फुरसत थी और चंचल को भी, अपने ससुराल की ड्यूटी से. आकांक्षा के घर मिलना तय हुआ. सुबहसुबह, 11 बजे ही चंचल को भाई आकांक्षा के यहां छोड़ आया.

घंटी बजाते ही उस की आवाज गूंज गई, चारों तरफ.

‘‘आ रही हूं…‘‘

दरवाजा खुलते ही चंचल का मानो सपना टूट गया, इतनी कमजोर सी, बीमार सी आकांक्षा. गले लगाते ही आंसू आ गए उस के, ‘‘क्या हाल बना लिया है अपना तू ने, ये हड्डियांहड्डियां क्यों निकाल रखी हैं? बीमार है क्या?‘‘

आकांक्षा हंसते हुए बोली, ‘‘जैसे, तू खुद बड़ी मुटा गई हो. किधर से दो बच्चों की मां लग रही हो तुम? चल अब अंदर भी आ… सारी चिंता चैखट पर ही कर लोगी क्या?‘‘

घर छोटा सा था आकांक्षा का, लेकिन एकदम रौयल सजा हुआ था. ‘‘तो मैडम को अब महंगी चीजों का शौक भी हो चला है…हम्म…‘‘

‘‘ये सब तो पंकज की पसंद है, शादी के बाद कहां अपना कुछ बच ही जाता है. जो पतिदेव चाहें, बस वही सत्य है.‘‘

आकांक्षा की आंखों में उदासी देख, चंचल ने बात पलटी, ‘‘और बच्चे? बच्चे कहां हैं? वो तो पतिदेव को पसंद हैं या वो भी नहीं?‘‘

‘‘चल तू भी न, देख तेरे फेवरेट वाले दालपकौड़े बनाए हैं. चाय बस बन ही रही है.‘‘

‘‘बन क्या रही है चाय? 8 साल बाद मिलेंगे तो तू मेहमान की तरह चाय पिलाएगी मुझे? तू तो वैसे भी मेरे हाथ की चाय की दीवानी है.‘‘

अब दोनों सहेलियां किचन में हैं और चंचल चाय बना रही है.

‘‘चंचल, तुझे याद है वो मीनाक्षी…?‘‘

‘‘हां, वही मौडल मीनाक्षी न, जिस को सजनेसंवरने से फुरसत नहीं होती थी. हां याद है. हमारी तो कभी बनी ही नहीं थी उस से. वो कहां मिल गई तुझे?‘‘

‘‘मैड़म, सच में मौडलिंग कर रही है. पिछले महीने मैगजीन में उस का फोटो देखा तो आंखें खुली रह गईं. उस ने जो चाहा पा लिया. एक बड़ा नाम है मौडलिंग की दुनिया में वो आज.‘‘

‘‘वाअव… अच्छा है, किसी को तो कुछ मिला.‘‘

‘‘तुम्हें भी तो शिशिर मिल ही गया, क्यों? नहीं मिला क्या?‘‘ आकांक्षा की शरारत शुरू हो चुकी थी.

शिशिर के नाम पर चंचल आज भी झेंप सी गई. चायपकौड़े ले कर दोनों रौयल बैठक में आ कर बैठ गए. चाय पीते हुए चंचल ने फिर आकांक्षा से पूछा, ‘‘अब बता भी… बच्चे कहां हैं? दिख ही नहीं रहे. दादादादी के पास हैं? या सुबहसुबह खेलने निकल लिए.‘‘

इतनी देर से इधरउधर की बातें करते हुए आखिरकार आकांक्षा की आंख में आसूं आ गए.

‘‘आकांक्षा… अक्कू… क्या हुआ बच्चे? बता… सब ठीक है न? तेरी आंख में आंसू, मतलब बहुत बड़ी बात है.‘‘

गले लगा कर चंचल ने फिर से कहा, ‘‘अच्छा सब छोड़, पहले शांत हो जा तू. मेरी अक्कू रोते हुए बिलकुल अच्छी नहीं लगती.‘‘

चंचल ने नाक खींची, तो आकांक्षा के चेहरे पर भी मुसकान आ गई. अब दोनों सहेलियां बिना कुछ बोले, चाय पीने लगीं. चंचल ने अब कुछ नहीं पूछा. वो आकांक्षा को जानती है. कुछ समय ले कर वो खुद बता देगी कि क्या बात है.

‘‘बच्चे नहीं हैं चंचल, नहीं हैं बच्चे,‘‘ फिर से रो पड़ी आकांक्षा.

‘‘ठीक है बाबा, नहीं हैं तो आ जाएंगे. वादा, अब दोबारा नहीं पूछूंगी. तू रो मत बस यार.‘‘

‘‘पंकज को अपना स्टेटस बनाना है. वो हमारी मिडिल क्लास वाली जिंदगी से बिलकुल खुश नहीं हैं. 8 साल हो गए शादी को, इन्हें लगता है, जिंदगी बस महंगी चीजों के पीछे भागने का नाम है.‘‘

एक गहरी सांस ले कर आकांक्षा ने कहा, ‘‘पता नहीं किस की बराबरी करना चाहते हैं. यह घर मुझे अपना घर लगता ही नहीं है. ब्रांडेड और महंगी चीजें बस, मेरी सादगी कहीं पीछे छूट गई है. पहननाओढ़ना, सब उन्हीं के हिसाब से होना चाहिए.‘‘

‘‘अब जब घर में लगभग हर सामान अपनी मरजी का खरीद चुके हैं तो अब इन्हें एक विला खरीदना है. जब तक इतना पैसा जमा नहीं कर लेंगे, विला खरीद नहीं लेंगे, तब तक कुछ और सुध नहीं लेनी.‘‘

‘‘आज संडे भी औफिस गए हैं. मेरी सरकारी नौकरी है. सो, मुझ पर बस नहीं चलता इन का, नहीं तो संडे भी औफिस भेज दें मुझे ये.‘‘

‘‘तुम्हारी बातों से ऐसा लग रहा है अक्कू, मानो मशीन हो तुम दोनों. और इसीलिए पंकजजी बच्चे नहीं चाहते हैं? एम आई राइट?‘‘

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June 30, 2020 at 10:00AM

जिद-भाग 1: शिशिर चंचल पर क्यों चिल्लाया ?

लेखिका–रिजवाना बानो ‘इकरा’

‘‘हैलो चंचल, मैं… आकांक्षा बोल रही हूं.‘‘

‘‘आकांक्षा… व्हाट ए बिग सरप्राइज… कैसी है तू? तुझे मेरा नंबर कहां से मिला? और कहां है तू आजकल?‘‘

‘‘अरे बस… बस, एक ही सांस में सारे सवाल पूछ लेगी क्या? थमो थोड़ा, और यह बताओ कि रक्षाबंधन पर घर आ रही हो न इस बार? ससुराल से एक दिन की एक्स्ट्रा छुट्टी ले कर आइएगा मैडम… कितनी सारी बातें करनी हैं…‘‘

एक्स्ट्रा छुट्टी के नाम पर थोड़ा सकपकाते और तुरंत ही खुद को संभालते हुए चंचल बोली, ‘‘बड़ी आई छुट्टी वाली… मैडम, आप हैं नौकरी वालीं… हम तो खाली लोग हैं… ये बताइए, आप को कैसे इतनी फुरसत मिल जाएगी. आखिरी बार ज्वाइन करते समय काल की थी. तब से मैडम बस नौकरी की ही हो कर रह गई हैं.‘‘

‘‘चल झूठी, तेरे घर शादी का कार्ड भिजवाया था, तुझे ही फुरसत नहीं मिली.‘‘

‘‘हम्म… तब नहीं आ पाई थी मैं. ये बता कि अभी कहां है?‘‘

‘‘पिछले हफ्ते ही नासिक ज्वाइन किया है और फ्लैट भी तेरी कालोनी में ही मिल गया है. कल शाम को ही अंकलआंटी से मिल कर आई हूं और नंबर लिया तेरा. मुझ से नंबर मिस हो गया था तेरा और तुझ से तो उम्मीद रखना भी बेकार है.‘‘

कभी एकदूसरे की जान के नाम से फेमस लड़कियां 8 साल बाद एकदूसरे से बात कर रही हैं.

चंचल की शादी के बाद आकांक्षा ने सरकारी नौकरी की तैयारी की. सालभर बाद ही नौकरी लग गई और उस के सालभर बाद शादी.

आकांक्षा की शादी का कार्ड तो मिला था चंचल को, लेकिन शादी में जाने की परमिशन नहीं मिल पाई थी, ससुराल से.

‘‘अच्छा अब सेंटी मत हो, औफिस वाले हंसेंगे मेरी बोल्ड आकांक्षा को ऐसे देखेंगे तो.‘‘

‘‘हां यार, चल रखती हूं फोन. मिलते हैं… हां… छुट्टी ले लियो ससुराल से देवी मां, नहीं तो पिटाई होगी तुम्हारी, बता दे रही हूं. चल बाय… आ गया खड़ूस बौस‘‘

‘‘बाय… बाय,‘‘ हंसते हुए फोन कटा, तो चंचल ने देखा कि सासू मां पीछे खड़ी हैं और उन के चेहरे पर सवालिया निशान हैं. कपूर की तरह जिस गति से हंसी चेहरे से गायब हुई, उस से अधिक गति से चंचल रसोई में चली गई. सासू मां की चाय का वक्त था ये और चाय में 5 मिनट की देरी हो चुकी थी.

‘मांजी को ये लापरवाही बिलकुल भी पसंद नहीं. पता नहीं, अब क्याक्या सुनना पड़ेगा? मुझे भी न, ध्यान रखना चाहिए था, ऐसा भी क्या बातों में खो जाना,‘ खुद को मन ही मन डांटते हुए चंचल फिर से आकांक्षा की बात याद करने लगी, ‘‘पिटाई होगी तुम्हारी… बता दे रही हूं.‘‘

‘‘बिलकुल नहीं बदली है ये लड़की,‘‘ आखिर मुसकराहट आ ही गई चंचल के चेहरे पर.

चंचल को पता है कि आकांक्षा न तो एक दिन की एक्स्ट्रा छुट्टी ले सकती है, न ही मिलनामिलाना होगा. लेकिन फिर भी वो बहुत खुश है, 10 साल साथ गुजारे हैं चंचल और आकांक्षा ने, स्कूलकालेज, होमवर्क, ट्यूशन, क्लास बंक, लड़कों से लड़नाझगड़ना, क्याक्या नहीं किया है दोनों ने साथ? सारी यादें एकदम ताजा हो गई हैं.

यही सब सोचतेसोचते चंचल सासू मां को चाय पकड़ा आई.

डिनर का समय आसानी से कट गया, बिना किसी शिकवाशिकायत के. चंचल को उम्मीद थी कि बहुत जबरदस्त डांट पड़ेगी और शिशिर भी गुस्सा करेगा. पिछली बार जब छोटे बेटे आशु ने सोफा गीला कर दिया था तो कितनी आफत आ गई थी, याद कर के ही रूह कांप गई चंचल की.

देखा जाए तो चंचल की शादी आकांक्षा के मुकाबले बड़े खानदान में हुई थी. साउथ दिल्ली की बड़ी सी कोठी, हीरों के व्यापारी रस्तोगीजी, सारे शहर में उन का बड़ा नाम, रस्तोगीजी के छोटे और स्मार्ट बेटे शिशिर ने जब चंचल को पसंद किया तो बधाइयों का तांता लग गया था चंचल के घर.

चंचल के भी अरमान पंख लगा कर उड़ने लगे थे. उम्र ही ऐसी थी वो और शिशिर चंचल को भी पहली ही नजर में पसंद आ गए थे. इधर शिशिर के घरपरिवार में भी चंचल की खूब चर्चा थी. चंचल की सुंदरता भी कालेज की सारी लड़कियों को मात देती थी. साथ ही साथ पढ़नेलिखने में इतनी तेज, फाइनेंस से एमबीए किया है. और क्या चाहिए था, रस्तोगियों को अपनी बहू में.

शादी की तैयारियां और इतना अच्छा रिश्ता मिलने की खुशी के बीच, चंचल को भी अपनी जौब का खयाल नहीं आया. उसे शिशिर से बात कर के लगा नहीं कि उन्हें कभी कोई इशू होगा इस से. आकांक्षा ने 1-2 बार कहा कि उसे बात करनी चाहिए शिशिर से, तो चंचल ने बात भी की.

शिशिर ने उसे पूरा विश्वास दिलाया कि किसी को कोई समस्या नहीं है, वो जो चाहे करे.

शादी के 3-4 महीने बाद वहीं दिल्ली में कर लेना जौब एप्लाई. और तुम हो भी इतनी क्वालीफाइड… तुम्हें कौन मना करने वाला है जौब के लिए? मेरी चंचल को तो यों ही मिल जाएगी जौब, चुटकी में,” सुन कर शर्म से चेहरा लाल हो गया था चंचल का इस तारीफ पर.

रस्मोरिवाज और घूमनेफिरने में दिन पंख लगा कर उड़ गए. शादी के 3 महीने बाद चंचल ने अपनी सासू मां से बहुत आराम से बात की, ‘‘मांजी, अब तो सारी रस्में, घूमनाफिरना, सब हो चुका आराम से. मैं जौब के लिए एप्लाई कर देती हूं.‘‘

सासू मां ने बड़ी कुटिल मुसकान के साथ जवाब दिया, ‘‘आराम से तो होगा ही बहूरानी… शिशिर के पापा ने इतना बड़ा बिजनेस किस के लिए खड़ा किया है? अपने बच्चों की खुशियों के लिए ही न.”

जौब के लिए उत्तर न मिलता देख चंचल ने आगे कहा, ‘‘जी, मांजी, मैं जौब के लिए अब एप्लाई कर ही देती हूं. मन नहीं लगता मेरा भी सारा दिन घर में.‘‘

इस बार, सासू मां का पारा सातवें आसमान पर था, लगभग चिल्लाते हुए शिशिर को आवाज लगाई, ‘‘शिशिर… ओ शिशिर, मैं ने मना किया था न इतनी ज्यादा पढ़ीलिखी लड़की के लिए. तुझे ही पसंद थी न, ले अब, जौब करनी है इसे… संभाल ले इसे और न मन लगे इस का तो छोड़ आ उसी 2 बीएचके में. वहीं मन लगता है इस का.‘‘

शिशिर सिर झुकाए खड़ा रहा और चंचल को अंदर जाने का इशारा किया.

चंचल के जाने के बाद शिशिर बोला, ‘‘मां, समझा दूंगा मैं उसे, आप नाराज न होइए. दोबारा जबान नहीं खोलेगी वह आप के सामने.‘‘

अंदर जाते ही अब शिशिर को चंचल पर चिल्लाना था, ‘‘क्या जरूरत है तुम्हें जौब करने की? क्या कमी है इस घर में? इतनी बड़ी कोठी की रानी हो तुम, रानी बन कर रहो. क्या तकलीफ है तुम्हें?

‘‘और मां… उन के सामने किसे जबान खोलते हुए देखा तुम ने, जो इतना बोलती हो? मिडिल क्लास से हो कर भी संस्कार नाम की कोई चीज नहीं है तुम में.‘‘

शिशिर को इतना गुस्से में देख, अपनी पढ़ाई पर गर्व करने वाली, अपने चुनाव पर गर्व करने वाली चंचल सहम गई. उस दिन के बाद से उस ने जौब का दोबारा नाम नहीं लिया.

मां ने शिशिर को समझा दिया था, ‘‘जल्दी बच्चेवच्चे कर लो. ज्यादा फैमिली प्लानिंग के चक्कर में न पड़ना. बहू का मन घरगृहस्थी में उलझना भी जरूरी है.‘‘

देखते ही देखते चंचल एक प्यारी सी बेटी सुहाना और एक शैतान से बेटे आशु की जिम्मेदार मां बन गई.

अब चंचल के पास इतना भी समय नहीं होता कि वो खुद पर या खुद से जुड़ी किसी भी बात पर ध्यान दे सके. धीरेधीरे हालात ऐसे हो गए कि चंचल को अपने लिए चप्पल खरीदनी हो या बच्चों के लिए डाइपर, सासू मां से पूछे बिना नहीं ले सकती थी. घर में आने वाली सूई से ले कर सैनिटरी पैड्स तक पर उन की नजर रहती हमेशा. कुछ अपने मांबाप की इज्जत, कुछ अब बच्चों की चिंता, चंचल ने अपनी इस नियति को स्वीकार कर लिया है.

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लेखिका–रिजवाना बानो ‘इकरा’

‘‘हैलो चंचल, मैं… आकांक्षा बोल रही हूं.‘‘

‘‘आकांक्षा… व्हाट ए बिग सरप्राइज… कैसी है तू? तुझे मेरा नंबर कहां से मिला? और कहां है तू आजकल?‘‘

‘‘अरे बस… बस, एक ही सांस में सारे सवाल पूछ लेगी क्या? थमो थोड़ा, और यह बताओ कि रक्षाबंधन पर घर आ रही हो न इस बार? ससुराल से एक दिन की एक्स्ट्रा छुट्टी ले कर आइएगा मैडम… कितनी सारी बातें करनी हैं…‘‘

एक्स्ट्रा छुट्टी के नाम पर थोड़ा सकपकाते और तुरंत ही खुद को संभालते हुए चंचल बोली, ‘‘बड़ी आई छुट्टी वाली… मैडम, आप हैं नौकरी वालीं… हम तो खाली लोग हैं… ये बताइए, आप को कैसे इतनी फुरसत मिल जाएगी. आखिरी बार ज्वाइन करते समय काल की थी. तब से मैडम बस नौकरी की ही हो कर रह गई हैं.‘‘

‘‘चल झूठी, तेरे घर शादी का कार्ड भिजवाया था, तुझे ही फुरसत नहीं मिली.‘‘

‘‘हम्म… तब नहीं आ पाई थी मैं. ये बता कि अभी कहां है?‘‘

‘‘पिछले हफ्ते ही नासिक ज्वाइन किया है और फ्लैट भी तेरी कालोनी में ही मिल गया है. कल शाम को ही अंकलआंटी से मिल कर आई हूं और नंबर लिया तेरा. मुझ से नंबर मिस हो गया था तेरा और तुझ से तो उम्मीद रखना भी बेकार है.‘‘

कभी एकदूसरे की जान के नाम से फेमस लड़कियां 8 साल बाद एकदूसरे से बात कर रही हैं.

चंचल की शादी के बाद आकांक्षा ने सरकारी नौकरी की तैयारी की. सालभर बाद ही नौकरी लग गई और उस के सालभर बाद शादी.

आकांक्षा की शादी का कार्ड तो मिला था चंचल को, लेकिन शादी में जाने की परमिशन नहीं मिल पाई थी, ससुराल से.

‘‘अच्छा अब सेंटी मत हो, औफिस वाले हंसेंगे मेरी बोल्ड आकांक्षा को ऐसे देखेंगे तो.‘‘

‘‘हां यार, चल रखती हूं फोन. मिलते हैं… हां… छुट्टी ले लियो ससुराल से देवी मां, नहीं तो पिटाई होगी तुम्हारी, बता दे रही हूं. चल बाय… आ गया खड़ूस बौस‘‘

‘‘बाय… बाय,‘‘ हंसते हुए फोन कटा, तो चंचल ने देखा कि सासू मां पीछे खड़ी हैं और उन के चेहरे पर सवालिया निशान हैं. कपूर की तरह जिस गति से हंसी चेहरे से गायब हुई, उस से अधिक गति से चंचल रसोई में चली गई. सासू मां की चाय का वक्त था ये और चाय में 5 मिनट की देरी हो चुकी थी.

‘मांजी को ये लापरवाही बिलकुल भी पसंद नहीं. पता नहीं, अब क्याक्या सुनना पड़ेगा? मुझे भी न, ध्यान रखना चाहिए था, ऐसा भी क्या बातों में खो जाना,‘ खुद को मन ही मन डांटते हुए चंचल फिर से आकांक्षा की बात याद करने लगी, ‘‘पिटाई होगी तुम्हारी… बता दे रही हूं.‘‘

‘‘बिलकुल नहीं बदली है ये लड़की,‘‘ आखिर मुसकराहट आ ही गई चंचल के चेहरे पर.

चंचल को पता है कि आकांक्षा न तो एक दिन की एक्स्ट्रा छुट्टी ले सकती है, न ही मिलनामिलाना होगा. लेकिन फिर भी वो बहुत खुश है, 10 साल साथ गुजारे हैं चंचल और आकांक्षा ने, स्कूलकालेज, होमवर्क, ट्यूशन, क्लास बंक, लड़कों से लड़नाझगड़ना, क्याक्या नहीं किया है दोनों ने साथ? सारी यादें एकदम ताजा हो गई हैं.

यही सब सोचतेसोचते चंचल सासू मां को चाय पकड़ा आई.

डिनर का समय आसानी से कट गया, बिना किसी शिकवाशिकायत के. चंचल को उम्मीद थी कि बहुत जबरदस्त डांट पड़ेगी और शिशिर भी गुस्सा करेगा. पिछली बार जब छोटे बेटे आशु ने सोफा गीला कर दिया था तो कितनी आफत आ गई थी, याद कर के ही रूह कांप गई चंचल की.

देखा जाए तो चंचल की शादी आकांक्षा के मुकाबले बड़े खानदान में हुई थी. साउथ दिल्ली की बड़ी सी कोठी, हीरों के व्यापारी रस्तोगीजी, सारे शहर में उन का बड़ा नाम, रस्तोगीजी के छोटे और स्मार्ट बेटे शिशिर ने जब चंचल को पसंद किया तो बधाइयों का तांता लग गया था चंचल के घर.

चंचल के भी अरमान पंख लगा कर उड़ने लगे थे. उम्र ही ऐसी थी वो और शिशिर चंचल को भी पहली ही नजर में पसंद आ गए थे. इधर शिशिर के घरपरिवार में भी चंचल की खूब चर्चा थी. चंचल की सुंदरता भी कालेज की सारी लड़कियों को मात देती थी. साथ ही साथ पढ़नेलिखने में इतनी तेज, फाइनेंस से एमबीए किया है. और क्या चाहिए था, रस्तोगियों को अपनी बहू में.

शादी की तैयारियां और इतना अच्छा रिश्ता मिलने की खुशी के बीच, चंचल को भी अपनी जौब का खयाल नहीं आया. उसे शिशिर से बात कर के लगा नहीं कि उन्हें कभी कोई इशू होगा इस से. आकांक्षा ने 1-2 बार कहा कि उसे बात करनी चाहिए शिशिर से, तो चंचल ने बात भी की.

शिशिर ने उसे पूरा विश्वास दिलाया कि किसी को कोई समस्या नहीं है, वो जो चाहे करे.

शादी के 3-4 महीने बाद वहीं दिल्ली में कर लेना जौब एप्लाई. और तुम हो भी इतनी क्वालीफाइड… तुम्हें कौन मना करने वाला है जौब के लिए? मेरी चंचल को तो यों ही मिल जाएगी जौब, चुटकी में,” सुन कर शर्म से चेहरा लाल हो गया था चंचल का इस तारीफ पर.

रस्मोरिवाज और घूमनेफिरने में दिन पंख लगा कर उड़ गए. शादी के 3 महीने बाद चंचल ने अपनी सासू मां से बहुत आराम से बात की, ‘‘मांजी, अब तो सारी रस्में, घूमनाफिरना, सब हो चुका आराम से. मैं जौब के लिए एप्लाई कर देती हूं.‘‘

सासू मां ने बड़ी कुटिल मुसकान के साथ जवाब दिया, ‘‘आराम से तो होगा ही बहूरानी… शिशिर के पापा ने इतना बड़ा बिजनेस किस के लिए खड़ा किया है? अपने बच्चों की खुशियों के लिए ही न.”

जौब के लिए उत्तर न मिलता देख चंचल ने आगे कहा, ‘‘जी, मांजी, मैं जौब के लिए अब एप्लाई कर ही देती हूं. मन नहीं लगता मेरा भी सारा दिन घर में.‘‘

इस बार, सासू मां का पारा सातवें आसमान पर था, लगभग चिल्लाते हुए शिशिर को आवाज लगाई, ‘‘शिशिर… ओ शिशिर, मैं ने मना किया था न इतनी ज्यादा पढ़ीलिखी लड़की के लिए. तुझे ही पसंद थी न, ले अब, जौब करनी है इसे… संभाल ले इसे और न मन लगे इस का तो छोड़ आ उसी 2 बीएचके में. वहीं मन लगता है इस का.‘‘

शिशिर सिर झुकाए खड़ा रहा और चंचल को अंदर जाने का इशारा किया.

चंचल के जाने के बाद शिशिर बोला, ‘‘मां, समझा दूंगा मैं उसे, आप नाराज न होइए. दोबारा जबान नहीं खोलेगी वह आप के सामने.‘‘

अंदर जाते ही अब शिशिर को चंचल पर चिल्लाना था, ‘‘क्या जरूरत है तुम्हें जौब करने की? क्या कमी है इस घर में? इतनी बड़ी कोठी की रानी हो तुम, रानी बन कर रहो. क्या तकलीफ है तुम्हें?

‘‘और मां… उन के सामने किसे जबान खोलते हुए देखा तुम ने, जो इतना बोलती हो? मिडिल क्लास से हो कर भी संस्कार नाम की कोई चीज नहीं है तुम में.‘‘

शिशिर को इतना गुस्से में देख, अपनी पढ़ाई पर गर्व करने वाली, अपने चुनाव पर गर्व करने वाली चंचल सहम गई. उस दिन के बाद से उस ने जौब का दोबारा नाम नहीं लिया.

मां ने शिशिर को समझा दिया था, ‘‘जल्दी बच्चेवच्चे कर लो. ज्यादा फैमिली प्लानिंग के चक्कर में न पड़ना. बहू का मन घरगृहस्थी में उलझना भी जरूरी है.‘‘

देखते ही देखते चंचल एक प्यारी सी बेटी सुहाना और एक शैतान से बेटे आशु की जिम्मेदार मां बन गई.

अब चंचल के पास इतना भी समय नहीं होता कि वो खुद पर या खुद से जुड़ी किसी भी बात पर ध्यान दे सके. धीरेधीरे हालात ऐसे हो गए कि चंचल को अपने लिए चप्पल खरीदनी हो या बच्चों के लिए डाइपर, सासू मां से पूछे बिना नहीं ले सकती थी. घर में आने वाली सूई से ले कर सैनिटरी पैड्स तक पर उन की नजर रहती हमेशा. कुछ अपने मांबाप की इज्जत, कुछ अब बच्चों की चिंता, चंचल ने अपनी इस नियति को स्वीकार कर लिया है.

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June 30, 2020 at 10:00AM

Short Story:पछतावा-रजनीश रात में क्या चीखता था?

दीनानाथ नगरनिगम में चपरासी था. वह स्वभाव से गुस्सैल था. दफ्तर में वह सब से झगड़ा करता रहता था. उस की इस आदत से सभी दफ्तर वाले परेशान थे, मगर यह सोच कर सहन कर जाते थे कि गरीब है, नौकरी से हटा दिया गया, तो उस का परिवार मुश्किल में आ जाएगा. दीनानाथ काम पर भी कई बार शराब पी कर आ जाता था. उस के इस रवैए से भी लोग परेशान रहते थे. उस के परिवार में पत्नी शांति और 7 साल का बेटा रजनीश थे. शांति अपने नाम के मुताबिक शांत रहती थी. कई बार उसे दीनानाथ गालियां देता था, उस के साथ मारपीट करता था, मगर वह सबकुछ सहन कर लेती थी.

दीनानाथ का बेटा रजनीश तीसरी जमात में पढ़ता था. वह पढ़ने में होशियार था, मगर अपने एकलौते बेटे के साथ भी पिता का रवैया ठीक नहीं था. उस का गुस्सा जबतब बेटे पर उतरता रहता था.

‘‘रजनीश, क्या कर रहा है  इधर आ,’’ दीनानाथ चिल्लाया.

‘‘मैं पढ़ रहा हूं बापू,’’ रजनीश ने जवाब दिया.

‘‘तेरा बाप भी कभी पढ़ा है, जो तू पढ़ेगा. जल्दी से इधर आ.’’

‘‘जी, बापू, आया. हां, बापू बोलो, क्या काम है ’’

‘‘ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ.’’

‘‘आप का दफ्तर जाने का समय हो रहा है, जाओगे नहीं बापू ’’

ये भी पढ़ें-Short Story: दिल को देखो

‘‘तुझ से पूछ कर जाऊंगा क्या ’’ इतना कह कर दीनानाथ ने रजनीश के चांटा जड़ दिया. रजनीश रोता हुआ 20 रुपए ले कर सोडा लेने चला गया. दीनानाथ सोडा ले कर शराब पीने बैठ गया.

‘‘अरे रजनीश, इधर आ.’’

‘‘अब क्या बापू ’’

‘‘अबे आएगा, तब बताऊंगा न ’’

‘‘हां बापू.’’

‘‘जल्दी से मां को बोल कि एक प्याज काट कर देगी.’’

‘‘मां मंदिर गई हैं… बापू.’’

‘‘तो तू ही काट ला.’’

रजनीश प्याज काट कर लाया. प्याज काटते समय उस की आंखों में आंसू आ गए, पर पिता के डर से वह मना भी नहीं कर पाया. दीनानाथ प्याज चबाता हुआ साथ में शराब के घूंट लगाने लगा. शाम के 4 बज रहे थे. दीनानाथ की शाम की शिफ्ट में ड्यूटी थी. वह लड़खड़ाता हुआ दफ्तर चला गया. यह रोज की बात थी. दीनानाथ अपने बेटे के साथ बुरा बरताव करता था. वह बातबात पर रजनीश को बाजार भेजता था. डांटना तो आम बात थी. शांति अगर कुछ कहती थी, तो वह उस के साथ भी गालीगलौज करता था. बेटे रजनीश के मन में पिता का खौफ भीतर तक था. कई बार वह रात में नींद में भी चीखता था, ‘बापू मुझे मत मारो.’

‘‘मां, बापू से कह कर अंगरेजी की कौपी मंगवा दो न,’’ एक दिन रजनीश अपनी मां से बोला.

‘‘तू खुद क्यों नहीं कहता बेटा ’’ मां बोलीं.

‘‘मां, मुझे बापू से डर लगता है. कौपी मांगने पर वे पिटाई करेंगे,’’ रजनीश सहमते हुए बोला.

‘‘अच्छा बेटा, मैं बात करती हूं,’’ मां ने कहा.

‘‘सुनो, रजनीश के लिए कल अंगरेजी की कौपी ले आना.’’

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‘‘तेरे बाप ने पैसे दिए हैं, जो कौपी लाऊं  अपने लाड़ले को इधर भेज.’’ रजनीश डरताडरता पिता के पास गया. दीनानाथ ने रजनीश का कान पकड़ा और थप्पड़ लगाते हुए चिल्लाया, ‘‘क्यों, तेरी मां कमाती है, जो कौपी लाऊं  पैसे पेड़ पर नहीं उगते. जब तू खुद कमाएगा न, तब पता चलेगा कि कौपी कैसे आती है  चल, ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ…’’

‘‘बापू, आज आप शराब बिना सोडे के पी लो, इन रुपयों से मेरी कौपी आ जाएगी…’’ ‘‘बाप को नसीहत देता है. तेरी कौपी नहीं आई तो चल जाएगा, लेकिन मेरी खुराक नहीं आई, तो कमाएगा कौन अगर मैं कमाऊंगा नहीं, तो फिर तेरी कौपी नहीं आएगी…’’ दीनानाथ गंदी हंसी हंसा और बेटे को धक्का देते हुए बोला, ‘‘अबे, मेरा मुंह क्या देखता है. जा, सोडा ले कर आ.’’

दीनानाथ की यह रोज की आदत थी. कभी वह बेटे को कौपीकिताब के लिए सताता, तो कभी वह उस से बाजार के काम करवाता. बेटा पढ़ने बैठता, तो उसे तंग करता. घर का माहौल ऐसा ही था. इस बीच रात में शांति अपने बेटे रजनीश को आंचल में छिपा लेती और खुद भी रोती. दीनानाथ ने बेटे को कभी वह प्यार नहीं दिया, जिस का वह हकदार था. बेटा हमेशा डराडरा सा रहता था. ऐसे माहौल में भी वह पढ़ता और अपनी जमात में हमेशा अव्वल आता. मां रजनीश से कहती, ‘‘बेटा, तेरे बापू तो ऐसे ही हैं. तुझे अपने दम पर ही कुछ बन कर दिखाना होगा.’’ मां कभीकभार पैसे बचा कर रखती और बेटे की जरूरत पूरी करती. बाप दीनानाथ के खौफ से बेटे रजनीश के बाल मन पर ऐसा डर बैठा कि वह सहमासहमा ही रहता.

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समय बीतता गया. अब रजनीश 21 साल का हो गया था. उस ने बैंक का इम्तिहान दिया. नतीजा आया, तो वह फिर अव्वल रहा. इंटरव्यू के बाद उसे जयपुर में पोस्टिंग मिल गई. उधर दीनानाथ की झगड़ा करने की आदत से नगर निगम दफ्तर से उसे निकाल दिया गया था. घर में खुशी का माहौल था. बेटे ने मां के पैर छुए और उन से आशीर्वाद लिया. पिता घर के किसी कोने में बैठा रो रहा था. उस के मन में एक तरफ नौकरी छूटने का दुख था, तो दूसरी ओर यह चिंता सताने लगी थी कि बेटा अब उस से बदला लेगा, क्योंकि उस ने उसे कोई सुख नहीं दिया था. मां रजनीश से बोलीं, ‘‘बेटा, अब हम दोनों जयपुर रहेंगे. तेरे बापू के साथ नहीं रहेंगे. तेरे बापू ने तुझे और मुझे जानवर से ज्यादा कुछ नहीं समझा…

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‘‘अब तू अपने पैरों पर खड़ा हो गया है. तेरी जिंदगी में तेरे बापू का अब मैं साया भी नहीं पड़ने दूंगी.’’ रजनीश कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘नहीं मां, मैं बापू से बदला नहीं लूंगा. उन्होंने जो मेरे साथ बरताव किया, वैसा बरताव मैं नहीं करूंगा. मैं अपने बेटे को ऐसी तालीम नहीं देना चाहता, जो मेरे पिता ने मुझे दी.’’ रजनीश उठा और बापू के पैर छू कर बोला, ‘‘बापू, मैं अफसर बन गया हूं, मुझे आशीर्वाद दें. आप की नौकरी छूट गई तो कोई बात नहीं, मैं अब अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं. चलो, आप अब जयपुर में मेरे साथ रहो, हम मिल कर रहेंगे.‘‘ यह सुन कर दीनानाथ की आंखों में आंसू आ गए. वह बोला, ‘‘बेटा, मैं ने तुझे बहुत सताया है, लेकिन तू ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. मुझे तुझ पर गर्व है.’’ दीनानाथ को अपने किए पर खूब पछतावा हो रहा था. रजनीश ने बापू की आंखों से  आंसू पोंछे, तो दीनानाथ ने खुश हो कर उसे गले लगा लिया.

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दीनानाथ नगरनिगम में चपरासी था. वह स्वभाव से गुस्सैल था. दफ्तर में वह सब से झगड़ा करता रहता था. उस की इस आदत से सभी दफ्तर वाले परेशान थे, मगर यह सोच कर सहन कर जाते थे कि गरीब है, नौकरी से हटा दिया गया, तो उस का परिवार मुश्किल में आ जाएगा. दीनानाथ काम पर भी कई बार शराब पी कर आ जाता था. उस के इस रवैए से भी लोग परेशान रहते थे. उस के परिवार में पत्नी शांति और 7 साल का बेटा रजनीश थे. शांति अपने नाम के मुताबिक शांत रहती थी. कई बार उसे दीनानाथ गालियां देता था, उस के साथ मारपीट करता था, मगर वह सबकुछ सहन कर लेती थी.

दीनानाथ का बेटा रजनीश तीसरी जमात में पढ़ता था. वह पढ़ने में होशियार था, मगर अपने एकलौते बेटे के साथ भी पिता का रवैया ठीक नहीं था. उस का गुस्सा जबतब बेटे पर उतरता रहता था.

‘‘रजनीश, क्या कर रहा है  इधर आ,’’ दीनानाथ चिल्लाया.

‘‘मैं पढ़ रहा हूं बापू,’’ रजनीश ने जवाब दिया.

‘‘तेरा बाप भी कभी पढ़ा है, जो तू पढ़ेगा. जल्दी से इधर आ.’’

‘‘जी, बापू, आया. हां, बापू बोलो, क्या काम है ’’

‘‘ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ.’’

‘‘आप का दफ्तर जाने का समय हो रहा है, जाओगे नहीं बापू ’’

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‘‘तुझ से पूछ कर जाऊंगा क्या ’’ इतना कह कर दीनानाथ ने रजनीश के चांटा जड़ दिया. रजनीश रोता हुआ 20 रुपए ले कर सोडा लेने चला गया. दीनानाथ सोडा ले कर शराब पीने बैठ गया.

‘‘अरे रजनीश, इधर आ.’’

‘‘अब क्या बापू ’’

‘‘अबे आएगा, तब बताऊंगा न ’’

‘‘हां बापू.’’

‘‘जल्दी से मां को बोल कि एक प्याज काट कर देगी.’’

‘‘मां मंदिर गई हैं… बापू.’’

‘‘तो तू ही काट ला.’’

रजनीश प्याज काट कर लाया. प्याज काटते समय उस की आंखों में आंसू आ गए, पर पिता के डर से वह मना भी नहीं कर पाया. दीनानाथ प्याज चबाता हुआ साथ में शराब के घूंट लगाने लगा. शाम के 4 बज रहे थे. दीनानाथ की शाम की शिफ्ट में ड्यूटी थी. वह लड़खड़ाता हुआ दफ्तर चला गया. यह रोज की बात थी. दीनानाथ अपने बेटे के साथ बुरा बरताव करता था. वह बातबात पर रजनीश को बाजार भेजता था. डांटना तो आम बात थी. शांति अगर कुछ कहती थी, तो वह उस के साथ भी गालीगलौज करता था. बेटे रजनीश के मन में पिता का खौफ भीतर तक था. कई बार वह रात में नींद में भी चीखता था, ‘बापू मुझे मत मारो.’

‘‘मां, बापू से कह कर अंगरेजी की कौपी मंगवा दो न,’’ एक दिन रजनीश अपनी मां से बोला.

‘‘तू खुद क्यों नहीं कहता बेटा ’’ मां बोलीं.

‘‘मां, मुझे बापू से डर लगता है. कौपी मांगने पर वे पिटाई करेंगे,’’ रजनीश सहमते हुए बोला.

‘‘अच्छा बेटा, मैं बात करती हूं,’’ मां ने कहा.

‘‘सुनो, रजनीश के लिए कल अंगरेजी की कौपी ले आना.’’

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‘‘तेरे बाप ने पैसे दिए हैं, जो कौपी लाऊं  अपने लाड़ले को इधर भेज.’’ रजनीश डरताडरता पिता के पास गया. दीनानाथ ने रजनीश का कान पकड़ा और थप्पड़ लगाते हुए चिल्लाया, ‘‘क्यों, तेरी मां कमाती है, जो कौपी लाऊं  पैसे पेड़ पर नहीं उगते. जब तू खुद कमाएगा न, तब पता चलेगा कि कौपी कैसे आती है  चल, ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ…’’

‘‘बापू, आज आप शराब बिना सोडे के पी लो, इन रुपयों से मेरी कौपी आ जाएगी…’’ ‘‘बाप को नसीहत देता है. तेरी कौपी नहीं आई तो चल जाएगा, लेकिन मेरी खुराक नहीं आई, तो कमाएगा कौन अगर मैं कमाऊंगा नहीं, तो फिर तेरी कौपी नहीं आएगी…’’ दीनानाथ गंदी हंसी हंसा और बेटे को धक्का देते हुए बोला, ‘‘अबे, मेरा मुंह क्या देखता है. जा, सोडा ले कर आ.’’

दीनानाथ की यह रोज की आदत थी. कभी वह बेटे को कौपीकिताब के लिए सताता, तो कभी वह उस से बाजार के काम करवाता. बेटा पढ़ने बैठता, तो उसे तंग करता. घर का माहौल ऐसा ही था. इस बीच रात में शांति अपने बेटे रजनीश को आंचल में छिपा लेती और खुद भी रोती. दीनानाथ ने बेटे को कभी वह प्यार नहीं दिया, जिस का वह हकदार था. बेटा हमेशा डराडरा सा रहता था. ऐसे माहौल में भी वह पढ़ता और अपनी जमात में हमेशा अव्वल आता. मां रजनीश से कहती, ‘‘बेटा, तेरे बापू तो ऐसे ही हैं. तुझे अपने दम पर ही कुछ बन कर दिखाना होगा.’’ मां कभीकभार पैसे बचा कर रखती और बेटे की जरूरत पूरी करती. बाप दीनानाथ के खौफ से बेटे रजनीश के बाल मन पर ऐसा डर बैठा कि वह सहमासहमा ही रहता.

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समय बीतता गया. अब रजनीश 21 साल का हो गया था. उस ने बैंक का इम्तिहान दिया. नतीजा आया, तो वह फिर अव्वल रहा. इंटरव्यू के बाद उसे जयपुर में पोस्टिंग मिल गई. उधर दीनानाथ की झगड़ा करने की आदत से नगर निगम दफ्तर से उसे निकाल दिया गया था. घर में खुशी का माहौल था. बेटे ने मां के पैर छुए और उन से आशीर्वाद लिया. पिता घर के किसी कोने में बैठा रो रहा था. उस के मन में एक तरफ नौकरी छूटने का दुख था, तो दूसरी ओर यह चिंता सताने लगी थी कि बेटा अब उस से बदला लेगा, क्योंकि उस ने उसे कोई सुख नहीं दिया था. मां रजनीश से बोलीं, ‘‘बेटा, अब हम दोनों जयपुर रहेंगे. तेरे बापू के साथ नहीं रहेंगे. तेरे बापू ने तुझे और मुझे जानवर से ज्यादा कुछ नहीं समझा…

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‘‘अब तू अपने पैरों पर खड़ा हो गया है. तेरी जिंदगी में तेरे बापू का अब मैं साया भी नहीं पड़ने दूंगी.’’ रजनीश कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘नहीं मां, मैं बापू से बदला नहीं लूंगा. उन्होंने जो मेरे साथ बरताव किया, वैसा बरताव मैं नहीं करूंगा. मैं अपने बेटे को ऐसी तालीम नहीं देना चाहता, जो मेरे पिता ने मुझे दी.’’ रजनीश उठा और बापू के पैर छू कर बोला, ‘‘बापू, मैं अफसर बन गया हूं, मुझे आशीर्वाद दें. आप की नौकरी छूट गई तो कोई बात नहीं, मैं अब अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं. चलो, आप अब जयपुर में मेरे साथ रहो, हम मिल कर रहेंगे.‘‘ यह सुन कर दीनानाथ की आंखों में आंसू आ गए. वह बोला, ‘‘बेटा, मैं ने तुझे बहुत सताया है, लेकिन तू ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. मुझे तुझ पर गर्व है.’’ दीनानाथ को अपने किए पर खूब पछतावा हो रहा था. रजनीश ने बापू की आंखों से  आंसू पोंछे, तो दीनानाथ ने खुश हो कर उसे गले लगा लिया.

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June 30, 2020 at 10:00AM

Short Story: यादों के सहारे

वह बीते हुए पलों की यादों को भूल जाना चाहता था. और दिनों के बजाय वह आज  ज्यादा गुमसुम था. वह सविता सिनेमा के सामने वाले मैदान में अकेला बैठा था. उस के दोस्त उसे अकेला छोड़ कर जा चुके थे. उस ने घंटों से कुछ खाया तक नहीं था, ताकि भूख से उस लड़की की यादों को भूल जाए. पर यादें जाती ही नहीं दिल से, क्या करे. कैसे भुलाए, उस की समझ में नहीं आया.

उस ने उठने की कोशिश की, तो कमजोरी से पैर लड़खड़ा रहे थे. अगलबगल वाले लोग आपस में बतिया रहे थे, ‘भले घर का लगता है. जरूर किसी से प्यार का चक्कर होगा. लड़की ने इसे धोखा दिया होगा या लड़की के मांबाप ने उस की शादी कहीं और कर दी होगी…

‘प्यार में अकसर ऐसा हो जाता है, बेचारा…’ फिर एक चुप्पी छा गई थी. लोग फिर आपसी बातों में मशगूल हो गए. वह वहां से उठ कर कहीं दूर जा चुका था. उस ने उस लड़की को अपने मकान के सामने वाली सड़क से गुजरते देखा था. उसे देख कर वह लड़की भी एक हलकी सी मुसकान छोड़ जाती थी. वह यहीं के कालेज में पढ़ती थी. धीरेधीरे उस लड़की की मुसकान ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया था. जब वे आपस में मिले, तो उस ने लड़की से कहा था, ‘‘तुम हर पल आंखों में छाई रहती हो. क्यों न हम हमेशा के लिए एकदूजे के हो जाएं?’’ उस लड़की ने कुछ नहीं कहा था. वह कैमिस्ट से दवा खरीद कर चली गई थी. उस का चेहरा उदासी में डूबा था.

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उस लड़की का नाम नीलू था. नीलू के मातापिता उस के उदास चेहरे को देख कर चिंतित हो उठे थे. पिता ने कहा था, ‘‘पहले तो नीलू के चेहरे पर मुसकराहट तैरती थी. लेकिन कई दिनों से उस के चेहरे पर गुलाब के फूल की तरह रंगत नहीं, वह चिडि़यों की तरह फुदकती नहीं, बल्कि किसी बासी फूल की तरह उस के चेहरे पर पीलापन छाया रहता है.’’

नीलू की मां बोली, ‘‘लड़की सयानी हो गई है. कुछ सोचती होगी.’’

नीलू के पिता बोले, ‘‘क्यों नहीं इस के हाथ पीले कर दिए जाएं?’’

मां ने कहा, ‘‘कोई ऊंचनीच न हो जाए, इस से तो यही अच्छा रहेगा.’’ नीलू की यादों को न भूल पाने वाले लड़के का नाम प्रकाश था. वह खुद इस कशिश के बारे में नहीं जानता था. वह अपनेआप को संभाल नहीं सका था. उसे अकेलापन खलने लगा था. उस की आंखों के सामने हर घड़ी नीलू का चेहरा तैरता रहता था. एक दिन प्रकाश नीलू से बोला, ‘‘नीलू, क्यों न हम अपनेअपने मम्मीडैडी से इस बारे में बात करें?’’

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‘‘मेरे मम्मीडैडी पुराने विचारों के हैं. वे इस संबंध को कभी नहीं स्वीकारेंगे,’’ नीलू ने कहा.

‘‘क्यों?’’ प्रकाश ने पूछा था.

‘‘क्योंकि जाति आड़े आ सकती है प्रकाश. उन के विचार हम लोगों के विचारों से अलग हैं. उन की सोच को कोई बदल नहीं सकता.’’

‘‘कोई रास्ता निकालो नीलू. मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता.’’ नीलू कुछ जवाब नहीं दे पाई थी. एक खामोशी उस के चेहरे पर घिर गई थी. दोनों निराश मन लिए अलग हो गए. पूरे महल्ले में उन दोनों के प्यार की चर्चा होने लगी थी.

‘‘जानती हो फूलमती, आजकल प्रकाश और नीलू का चक्कर चल रहा है. दोनों आपस में मिल रहे हैं.’’

‘‘हां दीदी, मैं ने भी स्कूल के पास उन्हें मिलते देखा है. आपस में दोनों हौलेहौले बतिया रहे थे. मुझ पर नजर पड़ते ही दोनों वहां से खिसक लिए थे.’’

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‘‘हां, मैं ने भी दोनों को बैंक्वेट हाल के पास देखा है.’’

‘‘ऐसा न हो कि बबीता की कहानी दोहरा दी जाए.’’

‘‘यह प्यारव्यार का चक्कर बहुत ही बेहूदा है. प्यार की आंधी में बह कर लोग अपनी जिंदगी खराब कर लेते हैं.’’

‘‘आज का प्यार वासना से भरा है, प्यार में गंभीरता नहीं है.’’

‘‘देखो, इन दोनों की प्रेम कहानी का नतीजा क्या होता है.’’ प्रकाश के पिता उदय बाबू अपने महल्ले के इज्जतदार लोगों में शुमार थे. किसी भी शख्स के साथ कोई समस्या होती, तो वे ही समाधान किया करते थे. धीरेधीरे यह चर्चा उन के कानों तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने घर आ कर अपनी पत्नी से कहा था, ‘‘सुनती हो…’’ पत्नी निशा ने रसोईघर से आ कर पूछा, ‘‘क्या है जी?’’

‘‘महल्ले में प्रकाश और नीलू के प्यार की चर्चा फैली हुई है,’’ उदय बाबू ने कहा.

‘‘तभी तो मैं मन ही मन सोचूं कि आजकल वह उखड़ाउखड़ा सा क्यों रहता है? वह खुल कर किसी से बात भी नहीं करता है.’’

‘‘मैं प्रोफैसर साहब के यहां से आ रहा था. गली में 2-4 औरतें उसी के बारे में बातें कर रही थीं.’’

‘‘मैं प्रकाश को समझाऊंगी कि हमें यह रिश्ता कबूल नहीं है,’’ निशा ने कहा. उधर नीलू के मम्मीडैडी ने सोचा कि जितना जल्दी हो सके, इस के हाथ पीले करवा दें और वे इस जुगाड़ में जुट गए.

नीलू को जब इस बारे में मालूम हुआ था, तो उस ने प्रकाश से कहा, ‘‘प्रकाश, अब हम कभी नहीं मिल सकेंगे.’’

‘‘क्यों?’’ उस ने पूछा था.

‘‘डैडी मेरा रिश्ता करने की बात चला रहे हैं. हो सकता है कि कुछ ही दिनों में ऐसा हो जाए,’’ इतना कह कर नीलू की आंखों में आंसू डबडबा गए थे.

‘‘क्या तुम ने…?’’

‘‘नहीं प्रकाश, मैं उन के विचारों का विरोध नहीं कर सकती.’’

‘‘तो तुम ने मुझे इतना प्यार क्यों किया था?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘हम एकदूसरे के हो जाएं, क्या इसे प्यार कहते हैं? क्या जिस्मानी संबंध को ही तुम प्यार का नाम देते हो?’’

यह सुन कर प्रकाश चुप था.

‘‘क्या अलग रह कर हम एकदूसरे को प्यार नहीं करते रहेंगे?’’ कुछ देर चुप रह कर नीलू बोली, ‘‘मुझे गलत मत समझना. मेरे मम्मीडैडी मुझे बहुत प्यार करते हैं. मैं उन के प्यार को ठेस नहीं पहुंचा सकती.’’

‘‘क्या तुम उन का विरोध नहीं कर सकती?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘जिस ने हमें यह रूप दिया है, हमें बचपन से ले कर आज तक लाड़प्यार दिया है, क्या उन का विरोध करना ठीक होगा?’’ नीलू ने समझाया.

‘‘तो फिर क्या होगा हमारे प्यार का?’’ प्रकाश ने पूछा.

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‘‘अपनी चाहत को पाने के लिए मैं उन के अरमानों को नहीं तोड़ सकती. उन की सोच हम से बेहतर है.’’ इस के बाद वे दोनों अलग हो गए थे, क्योंकि लोगों की नजरें उन्हें घूर रही थीं. नीलू के मम्मीडैडी की आंखों के सामने बरसों पुराना एक मंजर घूम गया था. उसी महल्ले के गिरधारी बाबू की लड़की बबीता को भी पड़ोस के लड़के से प्यार हो गया था. उस लड़के ने बबीता को खूब सब्जबाग दिखाए थे और जब उस का मकसद पूरा हो गया था, तो वह दिल्ली भाग गया था. कुछ दिनों तक बबीता ने इंतजार भी किया था. गिरधारी बाबू की बड़ी बेइज्जती हुई थी. कई दिनों तक तो वे घर से बाहर निकले नहीं थे. इतना बोले थे, ‘यह तुम ने क्या किया बेटी?’

बबीता मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह गई थी. एक दिन चुपके से मुंहअंधेरे घर से निकल पड़ी और हमेशाहमेशा के लिए नदी की गोद में समा गई. गिरधारी बाबू को जब पता चला, तो उन्होंने अपना सिर पीट लिया था. नीलू की शादी उमाकांत बाबू के यहां तय हो गई थी. जब प्रकाश को शादी की जानकारी हुई, तो उस की आंखों में आंसू डबडबा आए थे. वह अपनेआप को संभाल नहीं पा रहा था. प्रकाश का एक मन कहता, ‘महल्ले को छोड़ दूं, खुदकुशी कर लूं…’ दूसरा मन कहता, ‘ऐसा कर के अपने प्यार को बदनाम करना चाहते हो तुम? नीलू के दिल को ठेस पहुंचाना चाहते हो तुम?’

कुछ पल तक यही हालत रही, फिर प्रकाश ने सोचा कि यह बेवकूफी होगी, बुजदिली होगी. उस ने उम्रभर नीलू की यादों के सहारे जीने की कमस खाई. नीलू की शादी हो रही थी. खूब चहलपहल थी. मेहमानों के आनेजाने का सिलसिला शुरू हो गया था. गाजेबाजे के साथ लड़के की बरात निकल चुकी थी. प्रकाश के घर के सामने वाली सड़क से बरात गुजर रही थी. वह अपनी छत पर खड़ा देख रहा था. वह अपनेआप से बोल रहा था, ‘मैं तुम्हें बदनाम नहीं करूंगा नीलू. इस में मेरे प्यार की रुसवाई होगी. तुम खुश रहो. मैं तुम्हारी यादों के सहारे ही अपनी जिंदगी गुजार दूंगा…’

प्रकाश ने देखा कि बरात बहुत दूर जा चुकी थी. प्रकाश छत से नीचे उतर आया था. वह अपने कमरे में आ कर कागज के पन्नों पर दूधिया रोशनी में लिख रहा था:

‘प्यारी नीलू,

‘वे पल कितने मधुर थे, जब बाग में शुरूशुरू में हमतुम मिले थे. तुम्हारा साथ पा कर मैं निहाल हो उठा था. ‘मैं रातभर यही सोचता था कि वे पल, जो हम दोनों ने एकसाथ बिताए थे, वे कभी खत्म न हों, पर मेरी चाहत के टीले को जमीन से उखाड़ कर टुकड़ेटुकड़े कर दिया गया. ‘मैं चाहता तो जमाने से रूबरू हो कर लड़ता, पर ऐसा कर के मैं अपनी मुहब्बत को बदनाम नहीं करना चाहता था. मेरे मन में हमेशा यही बात आती रही कि वे पल हमारी जिंदगी में क्यों आए? ‘तुम मेरी जिंदगी से दूर हो गई हो. मैं बेजान हो गया हूं. एक अजीब सा खालीपन पूरे शरीर में पसर गया है. संभाल कर रखूंगा उन मधुर पलों को, जो हम दोनों ने साथ बिताए थे.

‘तुम्हारा प्रकाश…’

प्रकाश की आंखें आंसुओं से टिमटिमा रही थीं. धीरेधीरे नीलू की यादों में खोया वह सो गया था.

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वह बीते हुए पलों की यादों को भूल जाना चाहता था. और दिनों के बजाय वह आज  ज्यादा गुमसुम था. वह सविता सिनेमा के सामने वाले मैदान में अकेला बैठा था. उस के दोस्त उसे अकेला छोड़ कर जा चुके थे. उस ने घंटों से कुछ खाया तक नहीं था, ताकि भूख से उस लड़की की यादों को भूल जाए. पर यादें जाती ही नहीं दिल से, क्या करे. कैसे भुलाए, उस की समझ में नहीं आया.

उस ने उठने की कोशिश की, तो कमजोरी से पैर लड़खड़ा रहे थे. अगलबगल वाले लोग आपस में बतिया रहे थे, ‘भले घर का लगता है. जरूर किसी से प्यार का चक्कर होगा. लड़की ने इसे धोखा दिया होगा या लड़की के मांबाप ने उस की शादी कहीं और कर दी होगी…

‘प्यार में अकसर ऐसा हो जाता है, बेचारा…’ फिर एक चुप्पी छा गई थी. लोग फिर आपसी बातों में मशगूल हो गए. वह वहां से उठ कर कहीं दूर जा चुका था. उस ने उस लड़की को अपने मकान के सामने वाली सड़क से गुजरते देखा था. उसे देख कर वह लड़की भी एक हलकी सी मुसकान छोड़ जाती थी. वह यहीं के कालेज में पढ़ती थी. धीरेधीरे उस लड़की की मुसकान ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया था. जब वे आपस में मिले, तो उस ने लड़की से कहा था, ‘‘तुम हर पल आंखों में छाई रहती हो. क्यों न हम हमेशा के लिए एकदूजे के हो जाएं?’’ उस लड़की ने कुछ नहीं कहा था. वह कैमिस्ट से दवा खरीद कर चली गई थी. उस का चेहरा उदासी में डूबा था.

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उस लड़की का नाम नीलू था. नीलू के मातापिता उस के उदास चेहरे को देख कर चिंतित हो उठे थे. पिता ने कहा था, ‘‘पहले तो नीलू के चेहरे पर मुसकराहट तैरती थी. लेकिन कई दिनों से उस के चेहरे पर गुलाब के फूल की तरह रंगत नहीं, वह चिडि़यों की तरह फुदकती नहीं, बल्कि किसी बासी फूल की तरह उस के चेहरे पर पीलापन छाया रहता है.’’

नीलू की मां बोली, ‘‘लड़की सयानी हो गई है. कुछ सोचती होगी.’’

नीलू के पिता बोले, ‘‘क्यों नहीं इस के हाथ पीले कर दिए जाएं?’’

मां ने कहा, ‘‘कोई ऊंचनीच न हो जाए, इस से तो यही अच्छा रहेगा.’’ नीलू की यादों को न भूल पाने वाले लड़के का नाम प्रकाश था. वह खुद इस कशिश के बारे में नहीं जानता था. वह अपनेआप को संभाल नहीं सका था. उसे अकेलापन खलने लगा था. उस की आंखों के सामने हर घड़ी नीलू का चेहरा तैरता रहता था. एक दिन प्रकाश नीलू से बोला, ‘‘नीलू, क्यों न हम अपनेअपने मम्मीडैडी से इस बारे में बात करें?’’

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‘‘मेरे मम्मीडैडी पुराने विचारों के हैं. वे इस संबंध को कभी नहीं स्वीकारेंगे,’’ नीलू ने कहा.

‘‘क्यों?’’ प्रकाश ने पूछा था.

‘‘क्योंकि जाति आड़े आ सकती है प्रकाश. उन के विचार हम लोगों के विचारों से अलग हैं. उन की सोच को कोई बदल नहीं सकता.’’

‘‘कोई रास्ता निकालो नीलू. मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता.’’ नीलू कुछ जवाब नहीं दे पाई थी. एक खामोशी उस के चेहरे पर घिर गई थी. दोनों निराश मन लिए अलग हो गए. पूरे महल्ले में उन दोनों के प्यार की चर्चा होने लगी थी.

‘‘जानती हो फूलमती, आजकल प्रकाश और नीलू का चक्कर चल रहा है. दोनों आपस में मिल रहे हैं.’’

‘‘हां दीदी, मैं ने भी स्कूल के पास उन्हें मिलते देखा है. आपस में दोनों हौलेहौले बतिया रहे थे. मुझ पर नजर पड़ते ही दोनों वहां से खिसक लिए थे.’’

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‘‘हां, मैं ने भी दोनों को बैंक्वेट हाल के पास देखा है.’’

‘‘ऐसा न हो कि बबीता की कहानी दोहरा दी जाए.’’

‘‘यह प्यारव्यार का चक्कर बहुत ही बेहूदा है. प्यार की आंधी में बह कर लोग अपनी जिंदगी खराब कर लेते हैं.’’

‘‘आज का प्यार वासना से भरा है, प्यार में गंभीरता नहीं है.’’

‘‘देखो, इन दोनों की प्रेम कहानी का नतीजा क्या होता है.’’ प्रकाश के पिता उदय बाबू अपने महल्ले के इज्जतदार लोगों में शुमार थे. किसी भी शख्स के साथ कोई समस्या होती, तो वे ही समाधान किया करते थे. धीरेधीरे यह चर्चा उन के कानों तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने घर आ कर अपनी पत्नी से कहा था, ‘‘सुनती हो…’’ पत्नी निशा ने रसोईघर से आ कर पूछा, ‘‘क्या है जी?’’

‘‘महल्ले में प्रकाश और नीलू के प्यार की चर्चा फैली हुई है,’’ उदय बाबू ने कहा.

‘‘तभी तो मैं मन ही मन सोचूं कि आजकल वह उखड़ाउखड़ा सा क्यों रहता है? वह खुल कर किसी से बात भी नहीं करता है.’’

‘‘मैं प्रोफैसर साहब के यहां से आ रहा था. गली में 2-4 औरतें उसी के बारे में बातें कर रही थीं.’’

‘‘मैं प्रकाश को समझाऊंगी कि हमें यह रिश्ता कबूल नहीं है,’’ निशा ने कहा. उधर नीलू के मम्मीडैडी ने सोचा कि जितना जल्दी हो सके, इस के हाथ पीले करवा दें और वे इस जुगाड़ में जुट गए.

नीलू को जब इस बारे में मालूम हुआ था, तो उस ने प्रकाश से कहा, ‘‘प्रकाश, अब हम कभी नहीं मिल सकेंगे.’’

‘‘क्यों?’’ उस ने पूछा था.

‘‘डैडी मेरा रिश्ता करने की बात चला रहे हैं. हो सकता है कि कुछ ही दिनों में ऐसा हो जाए,’’ इतना कह कर नीलू की आंखों में आंसू डबडबा गए थे.

‘‘क्या तुम ने…?’’

‘‘नहीं प्रकाश, मैं उन के विचारों का विरोध नहीं कर सकती.’’

‘‘तो तुम ने मुझे इतना प्यार क्यों किया था?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘हम एकदूसरे के हो जाएं, क्या इसे प्यार कहते हैं? क्या जिस्मानी संबंध को ही तुम प्यार का नाम देते हो?’’

यह सुन कर प्रकाश चुप था.

‘‘क्या अलग रह कर हम एकदूसरे को प्यार नहीं करते रहेंगे?’’ कुछ देर चुप रह कर नीलू बोली, ‘‘मुझे गलत मत समझना. मेरे मम्मीडैडी मुझे बहुत प्यार करते हैं. मैं उन के प्यार को ठेस नहीं पहुंचा सकती.’’

‘‘क्या तुम उन का विरोध नहीं कर सकती?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘जिस ने हमें यह रूप दिया है, हमें बचपन से ले कर आज तक लाड़प्यार दिया है, क्या उन का विरोध करना ठीक होगा?’’ नीलू ने समझाया.

‘‘तो फिर क्या होगा हमारे प्यार का?’’ प्रकाश ने पूछा.

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‘‘अपनी चाहत को पाने के लिए मैं उन के अरमानों को नहीं तोड़ सकती. उन की सोच हम से बेहतर है.’’ इस के बाद वे दोनों अलग हो गए थे, क्योंकि लोगों की नजरें उन्हें घूर रही थीं. नीलू के मम्मीडैडी की आंखों के सामने बरसों पुराना एक मंजर घूम गया था. उसी महल्ले के गिरधारी बाबू की लड़की बबीता को भी पड़ोस के लड़के से प्यार हो गया था. उस लड़के ने बबीता को खूब सब्जबाग दिखाए थे और जब उस का मकसद पूरा हो गया था, तो वह दिल्ली भाग गया था. कुछ दिनों तक बबीता ने इंतजार भी किया था. गिरधारी बाबू की बड़ी बेइज्जती हुई थी. कई दिनों तक तो वे घर से बाहर निकले नहीं थे. इतना बोले थे, ‘यह तुम ने क्या किया बेटी?’

बबीता मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह गई थी. एक दिन चुपके से मुंहअंधेरे घर से निकल पड़ी और हमेशाहमेशा के लिए नदी की गोद में समा गई. गिरधारी बाबू को जब पता चला, तो उन्होंने अपना सिर पीट लिया था. नीलू की शादी उमाकांत बाबू के यहां तय हो गई थी. जब प्रकाश को शादी की जानकारी हुई, तो उस की आंखों में आंसू डबडबा आए थे. वह अपनेआप को संभाल नहीं पा रहा था. प्रकाश का एक मन कहता, ‘महल्ले को छोड़ दूं, खुदकुशी कर लूं…’ दूसरा मन कहता, ‘ऐसा कर के अपने प्यार को बदनाम करना चाहते हो तुम? नीलू के दिल को ठेस पहुंचाना चाहते हो तुम?’

कुछ पल तक यही हालत रही, फिर प्रकाश ने सोचा कि यह बेवकूफी होगी, बुजदिली होगी. उस ने उम्रभर नीलू की यादों के सहारे जीने की कमस खाई. नीलू की शादी हो रही थी. खूब चहलपहल थी. मेहमानों के आनेजाने का सिलसिला शुरू हो गया था. गाजेबाजे के साथ लड़के की बरात निकल चुकी थी. प्रकाश के घर के सामने वाली सड़क से बरात गुजर रही थी. वह अपनी छत पर खड़ा देख रहा था. वह अपनेआप से बोल रहा था, ‘मैं तुम्हें बदनाम नहीं करूंगा नीलू. इस में मेरे प्यार की रुसवाई होगी. तुम खुश रहो. मैं तुम्हारी यादों के सहारे ही अपनी जिंदगी गुजार दूंगा…’

प्रकाश ने देखा कि बरात बहुत दूर जा चुकी थी. प्रकाश छत से नीचे उतर आया था. वह अपने कमरे में आ कर कागज के पन्नों पर दूधिया रोशनी में लिख रहा था:

‘प्यारी नीलू,

‘वे पल कितने मधुर थे, जब बाग में शुरूशुरू में हमतुम मिले थे. तुम्हारा साथ पा कर मैं निहाल हो उठा था. ‘मैं रातभर यही सोचता था कि वे पल, जो हम दोनों ने एकसाथ बिताए थे, वे कभी खत्म न हों, पर मेरी चाहत के टीले को जमीन से उखाड़ कर टुकड़ेटुकड़े कर दिया गया. ‘मैं चाहता तो जमाने से रूबरू हो कर लड़ता, पर ऐसा कर के मैं अपनी मुहब्बत को बदनाम नहीं करना चाहता था. मेरे मन में हमेशा यही बात आती रही कि वे पल हमारी जिंदगी में क्यों आए? ‘तुम मेरी जिंदगी से दूर हो गई हो. मैं बेजान हो गया हूं. एक अजीब सा खालीपन पूरे शरीर में पसर गया है. संभाल कर रखूंगा उन मधुर पलों को, जो हम दोनों ने साथ बिताए थे.

‘तुम्हारा प्रकाश…’

प्रकाश की आंखें आंसुओं से टिमटिमा रही थीं. धीरेधीरे नीलू की यादों में खोया वह सो गया था.

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June 30, 2020 at 10:00AM

Short Story: छुटकारा- सुगना किसके यहां जाकर बैठती थी?

खुला सा आंगन. आंगन में ही है टूटाफूटा सा बड़ा दरवाजा और उस दरवाजे से लग कर 2 कमरे. कमरों से सटे हुए बरामदे में रसोई. यह है गंजोई का घर. 4 बेटियां और पत्नी है गंजोई के परिवार में. गंजोई की पत्नी सुगना पुरानी साड़ी की फटी पट्टियों से गुंथी रहती. मैली सी चारपाई पर गंजोई पैर फैला कर लेटा रहता और सुगना अपनी बातों से उस का मन बहलाया करती.  सुगना को पति की सेवा से फुरसत मिलती, तो घर की खोजखबर लेती. गंजोई तो अजगर था. दास मलूका का शुक्रिया अदा करता और अपने दाने के इंतजार में पड़ा रहता. गंजोई की बड़ी बेटी अंजू 15 साल से कुछ ऊपर. काली, ठिगनी, सुस्त, थोड़ी मोटी और चुपचुप सी रहती थी. वह लोगों के घरों में झाड़ूबरतन किया करती और धीरेधीरे उस ने अपनी दोनों छोटी बहनों को भी जानपहचान के घरों में काम पर लगवा दिया था.

अंजू के बाद वाली संजू 13 साल की दुबलीपतली, गठी हुई, उम्र के मुताबिक सही कदकाठी. खूबसूरत तो नहीं, पर बदसूरत भी नहीं थी वह. धीमी और मीठी आवाज. जल्दीजल्दी काम निबटाती. जिन घरों में काम करती, वहीं के बच्चों से वह अपना मन बहलाती. 8 साल की रंजू बेहद दुबली. गेहुआं रंग. उलझेउलझे तेल चुपड़े बाल और मैली सी फ्रौक. उस के काम में सब से ज्यादा फुरती थी. उस का मन मचलता था अपने साथ के बच्चों के साथ खेलने और भागनेदौड़ने के लिए, इसलिए वह जल्दीजल्दी काम करने की कोशिश में कुछ न कुछ गड़बड़ करती रहती और डांट सुनती रहती, पर थी धुन की पक्की. सब से छोटी रीना 6 साल की थी. अंजू के साथ काम पर जाती और उस की मदद करती. बरतन मांजना अभी वह सीख रही थी और झाड़ू ठीकठाक लगा लेती थी. कुलमिला कर सारी बहनें मिल कर दालरोटी का जुगाड़ कर लेती थीं.

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एक चीज थी, जो चारों बहनों में एकजैसी थी. उन की खाली आंखों में जिंदगी की चमक. खूब जीना चाहती थीं. वे सब जो भी थीं, जैसे भी थीं, खूब हंसना और कुछ न कुछ गुनगुनाते रहना उन की आदत थी. महल्ले की औरतें ज्यादातर मजदूर थीं या फिर लोगों के यहां आया, महरी का काम करती थीं. गंजोई जब घर पर नहीं होता था, तो सुगना रेशमी साड़ी पहन कर किसी पड़ोसन के यहां जा बैठती. औरतें भी बातोंबातों मे ंउसे छेड़तीं, ‘ये चटकमटक के दिन तेरे नहीं तेरी बेटियों के हैं. जवानी में भी उन से अपने ही घर का पानी भरवाएगी क्या? ‘लड़कियां बड़ी हो रही हैं. भेज अपने निठल्ले मरद को बाहर. घरबार देखे. रिश्ताकुनबा देखे. ऐसे घर बैठे तो कोई तुम्हारे दरवाजे चढ़ेगा नहीं.’

सुगना खिसियानी सी हंसी हंसती और बोलती, ‘‘तू ही बता सरोज, हमारे पास न जेवर है, न जमीन. जो थोड़ाबहुत मेरी सास के गांठपल्ले था, वह पहले ही अंजू के बापू ने दारू में घोल कर चढ़ा लिया. अब तो ऐसा है कि चूल्हा भी अनाज देख कर ही गरम होता है.’’

‘‘अरे तो उसे काम पर क्यों नहीं भेजती? इतनी बड़ी अनाज की मंडी है, बड़ेबड़े आढ़ती बैठते हैं. जाए किसी के पास. कोई न कोई काम मिल ही जाएगा, बेटियों की कमाई से घर चलता है कोई,’’ सरोज की सास ने दोटूक सुनाया. अब सुगना ने वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी. ऐसा नहीं है कि सुगना और गंजोई को अपनी जवान होती बेटियों की फिक्र नहीं थी, पर वे दोनों ठहरे मिजाज के मस्तमौला. उन्हें लगता था कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा. सुगना और गंजोई का परिवार समय की ताल में ताल मिलाता एकएक कदम उस के साथ चलता चला जा रहा था. समय भी चिकनी सड़क पर सरपट चाल चल रहा था बिना किसी रुकावट के, बिना किसी मुश्किल के. अंजू की ज्यादातर सखियों का ब्याह हो चुका था, पर उसे अपने ब्याह न होने का मलाल न था. न ही उसे जरूरत महसूस होती थी. सुगना और गंजोई को उस के ब्याह की काई आस न थी. इसलिए कोशिश करने का खयाल भी किसी के धकियाने से ही आता था और धक्का हटते ही वे फिर आराम की मुद्रा में टेक लगा लेते और फिर घर चलाने में अंजू का अहम योगदान था.

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संजू भी 14 साल की उम्र में ज्यादा तीखी और मुखर हो गई थी. अब वह घर से निकलती, तो उस की उभरती देह पर चुस्त फिटिंग वाला सूट होता. अपनी मालकिनों की उतरन को सजाचमका कर जब वह अपने तन पर डालती, तो उन पुराने कपड़ों से भी ताजगी फूट पड़ती. महल्ले के जवान होते मजदूर बच्चे छिपछिप कर उसे देखते और वह उन्हें देख कर बड़ी अदा से अनदेखा कर देती, मानो सावन को पता ही न हो कि उस की बारिश में सब भीग जाता है. अब संजू का ध्यान काम में कम लगता, सोचती और मुसकराती रहती. उस के साथ की लड़कियां उस से चिढ़तीं, ‘बड़ी फैशन वाली बन गई है. बरतन मांजने जाती है या थाली में मुंह देखने? ’

अंजू भी पीछे न रहती. वह कहती, ‘‘अरे, बरतन तो मुझे देखते ही चमक जाते हैं. तुम्हारी तरह नहीं कि शक्ल देख कर घूरा भी छींक दे.’’ गंजोई के घर से बाईं तरफ 3 मकान छोड़ कर कमलकिशोर का घर था. वह एक 17 साल का ठीकठाक सी शक्ल वाला लड़का था, जो बाजार में साइकिल की दुकान पर पंचर लगाने का काम करता था. वह जवानी के उस पायदान पर था, जहां सबकुछ खूबसूरत और आसान लगता है. खाली समय में रंगीन चश्मा लगा कर वह फिल्मी गाने गुनगुनाता.

उस ने मालिक से बड़ी मिन्नत कर के दुकान से एक पुरानी साइकिल ले ली थी और साइकिल की दुकान पर मंजे हुए अपने हुनर को आजमा कर उस साइकिल को नई जिंदगी दे डाली थी. एक दिन कमलकिशोर घर के बाहर खड़ा हो कर अपनी साइकिल को साफ कर रहा था और साथ ही कुछ गाना गुनगुना रहा था, ‘‘चोरीचोरी आ जा गोरी पीपल की छांव में, कहीं कोई…’’ तभी उस की नजर संजू पर पड़ी, ‘‘यह कौन है. बड़ी मस्त दिख रही है.’’ इतने में संजू की नजर कमलकिशोर पर पड़ी. आंखें सिकोड़, कमर पर हाथ रख संजू थोड़ा गुस्से और बड़ी अदा से गुर्रा कर बोली, ‘‘आंखें फाड़ कर क्या देख रहा है? बोलूं तेरे बापू को?’’

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‘‘भड़क क्यों रही है? देख ही तो रहा हूं. तू सुगना काकी की बेटी है न? चल, नाम बता अपना?’’ कमलकिशोर ने उस की तरफ बढ़ते हुए फिल्मी अंदाज में पूछा. संजू को हंसी आ गई, ‘‘चल जा अपना काम कर,’’ कह कर वह घर में घुस गई.

कमलकिशोर का मन गुदगुदाहट से भर गया. संजू को गए बहुत वक्त बीत चुका था, पर वह वहीं खड़ा अब भी उन पलों को आगेपीछे कर के अपने सपनों में जी रहा था. ‘‘संजू, जरा चूल्हा जला दे और आटे में थोड़ा नमक डाल कर मुझे दे दे. खाने का समय हो गया है. बस, अभी सब खाना मांगने वाले हैं,’’ अंजू ने कहा. इतने में ही सुगना की आवाज आई, ‘‘ऐ अंजू, खाना कब देगी? मुझे जोरों की भूख लगी है.’’ सुगना और गंजोई आंगन में पड़ी खाट पर जमे हुए थे. गंजोई आसमान की ओर मुंह कर के लेटा था और सुगना उस के पैर दबा रही थी. रसोई में जान खपाने से ज्यादा आसान था यह काम. गंजोई के खाते ही सुगना खुद खाने बैठ जाती, फिर बाद में बच्चे आपस में मिलबैठ कर खा लेते. ‘हांहां, खाना बन रहा है,’’ संजू ने चिढ़ कर जवाब दिया. अंजू ने संजू की तरफ देखा, पर बोली कुछ भी नहीं. अब उसे संजू के लिए फिक्र होने लगी थी. जब तक उस का खुद का ब्याह न हो जाता, तब तक संजू का ब्याह होना मुश्किल था. अपनी आस उसे थी नहीं, पर संजू…

आज रात संजू को भी नींद नहीं आ रही थी. ‘चल, नाम बता अपना’ उस के कानों में गूंज रहा था. उसे फिर हंसी आने लगी. वह कमलकिशोर ही तो था. कितनी ही बार तो देखा है उसे, फिर आज क्या बात हो गई? संजू समझने की कोशिश कर रही थी. आज संजू की लाली में कुछ ज्यादा ही चमक थी. शायद सुबह की धूप का असर था या फिर रात को दबे पैर उस की चारपाई में घुस आए खयालों का, पता नहीं. घर से पहला कदम ही निकला था कि नजर बाईं ओर मुड़ गई. हड़बड़ाहट में दूसरा कदम तो बाहर निकला नहीं, पहला भी अंदर चला गया. दरवाजे की ओट ले कर संजू अपनी घबराहट पर काबू पाने की कोशिश करने लगी. अपने घर के बाहर कमलकिशोर पूरी तरह मुस्तैद खड़ा था. आखिर संजू की चारपाई से निकल कर वह खयाल उस के भी तो बिस्तर में घुसा था. कमलकिशोर की नजर संजू पर पड़ चुकी थी. वह समझ गया था कि संजू काम पर जाने वाली है. वह पहले ही साइकिल ले कर उस के काम की दिशा की ओर चल पड़ा था. इधर संजू भी संभल चुकी थी. वह तन कर बाहर निकली, बाएं देखा, फिर दाएं देखा, फिर एक निराशा की ढीली सांस, जिस में राहत पाने की भरसक कोशिश की गई थी, छोड़ते हुए अनमनी सी काम पर चल दी. ‘‘संजू, तेरे मांबापू तेरा ब्याह मुझ से तो क्या किसी से भी नहीं होने देंगे,’’ कमलकिशोर संजू से कह रहा था.

कमलकिशोर और संजू को एकदूसरे के नजदीक आने में ज्यादा समय नहीं लगा था. दोनों को एकदूसरे का साथ अच्छा लगता. अपना काम खत्म कर दोनों रोज मिलते, एकदूसरे के साथ जीने के सपने देखते. सुगना और गंजोई की बेजारी संजू की चाह को और हवा देती, पर वह अंजू के बारे में सोच कर बेचैन हो जाती. उसे कोई रास्ता नजर नहीं आता था, जो उस घर की बेटियों को ससुराल के दरवाजे तक पहुंचाता हो. मांबाप को अपनी कमाऊ बेटियों को विदा करने की कोई जल्दी न थी.

अंजू को संजू और कमलकिशोर के इश्क की खबर थी, संजू ने ही उसे बताया था एक दिन.

‘‘संजू, भाग कर जाएगी मेरे साथ?’’

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‘‘चल हट. बड़ा आया भगा कर ले जाने वाला. कहां रखेगा? क्या खिलाएगा मुझे? और मेरे घर वाले? महल्ले वाले जीने नहीं देंगे. मेरी बहनों की जिंदगी खराब हो जाएगी,’’ संजू ने उसे घुड़का और आखिरी बात कहतेकहते उसे खुद की आवाज सुनाई नहीं दी, आंखें सिकुड़ गईं और चेहरे पर उदासी उभर आई. कमलकिशोर ने हलके से झिड़क कर कहा, ‘‘तो यहां रह कर तू कौन सा उन का घर भर देगी. भाग चल. तेरे बाप का बोझ कुछ कम हो जाएगा. यहां रह कर जिंदा भूत की तरह बरतन ही तो घिसेगी. मेरे साथ चल, तेरी जिंदगी संवार दूंगा.’’ संजू ने उसे घूर कर देखा, पर बोली कुछ नहीं. गरमी की रात में सभी आंगन और बरामदे में ही सोते थे. आज संजू ने अपना बिस्तर अंजू के साथ जमीन पर ही बिछा लिया था. चारपाइयां कम थीं, सो अंजू जमीन पर ही सोती थी. रीना और रंजू भी एक चारपाई पर वहां बेसुध सो रही थीं. सुगना बरामदे में थी. संजू और अंजू दोनों चुपचाप सी आसमान को घूर रही थीं. दोनों को नींद नहीं आ रही थी. वे चुप थीं, पर शायद उन के मन के बीच संवाद चल रहा था. संजू जरा बेचैन दिखी, तो अंजू ने अपना हाथ उस के सिर पर रखते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ संजू, नींद नहीं आ रही है?’’

बेहद अपनेपन में भीगे शब्दों की नमी में संजू भी नहा गई, ‘‘हां दीदी, आज तो नींद सचमुच नहीं आ रही.’’

‘‘अच्छा, यह बता कि कमलकिशोर कैसा है? क्या लाया वह आज तेरे लिए? आजकल तो तू कुछ बताती ही नहीं मुझे,’’ अंजू ने बनावटी गुस्से से मुंह फुला कर कहा. संजू ने अंजू की तरफ देखा और खिलखिला कर हंस दी, ‘‘दीदी, तुम बड़ी चालाक हो. मेरा मुंह खुलवाने के लिए कमलकिशोर का नाम ले दिया.’’ कमलकिशोर का नाम लेते ही संजू जरा संजीदा हो गई. ठंडी सांस छोड़ते हुए उस ने कहा, ‘‘दीदी, आज वह मुझे अपने साथ भाग चलने के लिए कह रहा था.’’

‘‘तो भाग जा. किस के लिए रुकी हुई है?’’ अंजू ने सहज भाव से कहा. और एक दिन महल्ले में आग लग गई. गंजोई पहली बार हरकत में आया, ‘‘अरी सुगना, संजू आई क्या?’’

‘‘नहीं. अंजू के बापू,’’ कहते हुए सुगना बीच आंगन में बैठ छाती पीटपीट कर रो रही थी. दिन ढल रहा था. सुबह से निकली संजू का अब तक कुछ पता न था. गंजोई ने हर जगह खबर ले ली थी और यह बात अब पूरे महल्ले को पता थी. पता चला था कि कमलकिशोर भी सुबह से गायब था. दो और दो चार भांपने में किसी ने समय न गंवाया. गंजोई ने अपना सिर पीट लिया. सुगना रोरो कर बच्चियों को कोस रही थी, ‘‘जाओ, तुम लोग भी भाग जाओ, कोई न कोई मिल ही जाएगा चौक पर. अरे, भागना ही था तो तू ही भाग जाती,’’ उस ने अंजू की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘भगोड़ों का घर नाम धरा जाएगा हमारा. अंजू के बापू कुछ करो. हाय, यह क्या कर दिया? अब तो जिंदगी पत्थर जैसी भारी हो जाएगी. लोग हमें जीने नहीं देंगे, कौन ब्याहेगा इन बेटियों को?’’

गंजोई महल्ले के बड़ेबूढ़ों के आगे रो रहा था. एक बुजुर्ग ने अपनी घरघराती आवाज में लताड़ा, ‘‘देख गंजोई, तू ने तो कभी खबर ली नहीं अपने बच्चों की, अब पछताने से क्या होगा. लड़की भाग गई और धर गई कलंक तेरी सात पुश्तों पर. अब जरा सुध ले और बाकियों को संभाल.’’

‘‘देख, अब तू हमारी बिरादरी से बाहर हो गया है. हमारे भी लड़केलड़कियां हैं. कुछ तो कायदाकानून रखना पड़ेगा,’’ एक ने कहा था. यह सुन कर गंजोई फफक कर रो पड़ा. वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘देखिए, आप लोग ऐसा मत कहिए. आप ही साथ छोड़ने की बात करेंगे, तो हम किस से मदद मांगेंगे. मुश्किल में तो अपने ही काम आते हैं.’’ हुमेशा यहां के एक मंदिर के बुजुर्ग थे. वे बहुत ही कांइयां मिजाज के थे. कुछ सोच कर उन्होंने कहा, ‘‘देख गंजोई, जब हम गांव में रहते थे, वहां के नियमकानून अलग थे. या यों कह लो कि बड़ेबुजुर्गों ने बड़ी सूझबूझ के साथ परिवार पर विपत्ति का तोड़ निकाला था. जो तब भी सही थे और अब भी सही ही माने जाएंगे.

‘‘गांव में जब कोई लड़की भाग जाती थी, तो उस परिवार को जाति से बाहर कर दिया जाता था और बच्चे की एक नादानी की वजह से पूरा कुनबा बरबाद हो जाता था. ‘‘तू अपनी लड़की को न खोज, न ही उसे दोबारा घर में घुसने देना. तू उस का श्राद्ध कर दे, ऐसा करने से माना जाता है कि लड़की भागी नहीं मर गई. फिर कोई उंगली नहीं उठाता. यह हमारी जाति का एक रिवाज है, जो गांव में आज भी माना जाता है. गांव वालों को खूब खिलापिला कर खुश कर दिया जाता है. फिर सब उसे मरा मान कर भूल जाते हैं.’’ गंजोई ने संजू का श्राद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उस ने तय भोजन से 2 अतिरिक्त पकवान बनवाए. सुगना ने चाव से सब को परोसा. अंजू ने भी जलेबी खाई. हुमेशा को 2 जोड़ी कपड़े भी दिए गए. कमलकिशोर के परिवार को उस का श्राद्ध करने की जरूरत नहीं थी. वह तो लड़का था न.

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खुला सा आंगन. आंगन में ही है टूटाफूटा सा बड़ा दरवाजा और उस दरवाजे से लग कर 2 कमरे. कमरों से सटे हुए बरामदे में रसोई. यह है गंजोई का घर. 4 बेटियां और पत्नी है गंजोई के परिवार में. गंजोई की पत्नी सुगना पुरानी साड़ी की फटी पट्टियों से गुंथी रहती. मैली सी चारपाई पर गंजोई पैर फैला कर लेटा रहता और सुगना अपनी बातों से उस का मन बहलाया करती.  सुगना को पति की सेवा से फुरसत मिलती, तो घर की खोजखबर लेती. गंजोई तो अजगर था. दास मलूका का शुक्रिया अदा करता और अपने दाने के इंतजार में पड़ा रहता. गंजोई की बड़ी बेटी अंजू 15 साल से कुछ ऊपर. काली, ठिगनी, सुस्त, थोड़ी मोटी और चुपचुप सी रहती थी. वह लोगों के घरों में झाड़ूबरतन किया करती और धीरेधीरे उस ने अपनी दोनों छोटी बहनों को भी जानपहचान के घरों में काम पर लगवा दिया था.

अंजू के बाद वाली संजू 13 साल की दुबलीपतली, गठी हुई, उम्र के मुताबिक सही कदकाठी. खूबसूरत तो नहीं, पर बदसूरत भी नहीं थी वह. धीमी और मीठी आवाज. जल्दीजल्दी काम निबटाती. जिन घरों में काम करती, वहीं के बच्चों से वह अपना मन बहलाती. 8 साल की रंजू बेहद दुबली. गेहुआं रंग. उलझेउलझे तेल चुपड़े बाल और मैली सी फ्रौक. उस के काम में सब से ज्यादा फुरती थी. उस का मन मचलता था अपने साथ के बच्चों के साथ खेलने और भागनेदौड़ने के लिए, इसलिए वह जल्दीजल्दी काम करने की कोशिश में कुछ न कुछ गड़बड़ करती रहती और डांट सुनती रहती, पर थी धुन की पक्की. सब से छोटी रीना 6 साल की थी. अंजू के साथ काम पर जाती और उस की मदद करती. बरतन मांजना अभी वह सीख रही थी और झाड़ू ठीकठाक लगा लेती थी. कुलमिला कर सारी बहनें मिल कर दालरोटी का जुगाड़ कर लेती थीं.

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एक चीज थी, जो चारों बहनों में एकजैसी थी. उन की खाली आंखों में जिंदगी की चमक. खूब जीना चाहती थीं. वे सब जो भी थीं, जैसे भी थीं, खूब हंसना और कुछ न कुछ गुनगुनाते रहना उन की आदत थी. महल्ले की औरतें ज्यादातर मजदूर थीं या फिर लोगों के यहां आया, महरी का काम करती थीं. गंजोई जब घर पर नहीं होता था, तो सुगना रेशमी साड़ी पहन कर किसी पड़ोसन के यहां जा बैठती. औरतें भी बातोंबातों मे ंउसे छेड़तीं, ‘ये चटकमटक के दिन तेरे नहीं तेरी बेटियों के हैं. जवानी में भी उन से अपने ही घर का पानी भरवाएगी क्या? ‘लड़कियां बड़ी हो रही हैं. भेज अपने निठल्ले मरद को बाहर. घरबार देखे. रिश्ताकुनबा देखे. ऐसे घर बैठे तो कोई तुम्हारे दरवाजे चढ़ेगा नहीं.’

सुगना खिसियानी सी हंसी हंसती और बोलती, ‘‘तू ही बता सरोज, हमारे पास न जेवर है, न जमीन. जो थोड़ाबहुत मेरी सास के गांठपल्ले था, वह पहले ही अंजू के बापू ने दारू में घोल कर चढ़ा लिया. अब तो ऐसा है कि चूल्हा भी अनाज देख कर ही गरम होता है.’’

‘‘अरे तो उसे काम पर क्यों नहीं भेजती? इतनी बड़ी अनाज की मंडी है, बड़ेबड़े आढ़ती बैठते हैं. जाए किसी के पास. कोई न कोई काम मिल ही जाएगा, बेटियों की कमाई से घर चलता है कोई,’’ सरोज की सास ने दोटूक सुनाया. अब सुगना ने वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी. ऐसा नहीं है कि सुगना और गंजोई को अपनी जवान होती बेटियों की फिक्र नहीं थी, पर वे दोनों ठहरे मिजाज के मस्तमौला. उन्हें लगता था कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा. सुगना और गंजोई का परिवार समय की ताल में ताल मिलाता एकएक कदम उस के साथ चलता चला जा रहा था. समय भी चिकनी सड़क पर सरपट चाल चल रहा था बिना किसी रुकावट के, बिना किसी मुश्किल के. अंजू की ज्यादातर सखियों का ब्याह हो चुका था, पर उसे अपने ब्याह न होने का मलाल न था. न ही उसे जरूरत महसूस होती थी. सुगना और गंजोई को उस के ब्याह की काई आस न थी. इसलिए कोशिश करने का खयाल भी किसी के धकियाने से ही आता था और धक्का हटते ही वे फिर आराम की मुद्रा में टेक लगा लेते और फिर घर चलाने में अंजू का अहम योगदान था.

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संजू भी 14 साल की उम्र में ज्यादा तीखी और मुखर हो गई थी. अब वह घर से निकलती, तो उस की उभरती देह पर चुस्त फिटिंग वाला सूट होता. अपनी मालकिनों की उतरन को सजाचमका कर जब वह अपने तन पर डालती, तो उन पुराने कपड़ों से भी ताजगी फूट पड़ती. महल्ले के जवान होते मजदूर बच्चे छिपछिप कर उसे देखते और वह उन्हें देख कर बड़ी अदा से अनदेखा कर देती, मानो सावन को पता ही न हो कि उस की बारिश में सब भीग जाता है. अब संजू का ध्यान काम में कम लगता, सोचती और मुसकराती रहती. उस के साथ की लड़कियां उस से चिढ़तीं, ‘बड़ी फैशन वाली बन गई है. बरतन मांजने जाती है या थाली में मुंह देखने? ’

अंजू भी पीछे न रहती. वह कहती, ‘‘अरे, बरतन तो मुझे देखते ही चमक जाते हैं. तुम्हारी तरह नहीं कि शक्ल देख कर घूरा भी छींक दे.’’ गंजोई के घर से बाईं तरफ 3 मकान छोड़ कर कमलकिशोर का घर था. वह एक 17 साल का ठीकठाक सी शक्ल वाला लड़का था, जो बाजार में साइकिल की दुकान पर पंचर लगाने का काम करता था. वह जवानी के उस पायदान पर था, जहां सबकुछ खूबसूरत और आसान लगता है. खाली समय में रंगीन चश्मा लगा कर वह फिल्मी गाने गुनगुनाता.

उस ने मालिक से बड़ी मिन्नत कर के दुकान से एक पुरानी साइकिल ले ली थी और साइकिल की दुकान पर मंजे हुए अपने हुनर को आजमा कर उस साइकिल को नई जिंदगी दे डाली थी. एक दिन कमलकिशोर घर के बाहर खड़ा हो कर अपनी साइकिल को साफ कर रहा था और साथ ही कुछ गाना गुनगुना रहा था, ‘‘चोरीचोरी आ जा गोरी पीपल की छांव में, कहीं कोई…’’ तभी उस की नजर संजू पर पड़ी, ‘‘यह कौन है. बड़ी मस्त दिख रही है.’’ इतने में संजू की नजर कमलकिशोर पर पड़ी. आंखें सिकोड़, कमर पर हाथ रख संजू थोड़ा गुस्से और बड़ी अदा से गुर्रा कर बोली, ‘‘आंखें फाड़ कर क्या देख रहा है? बोलूं तेरे बापू को?’’

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‘‘भड़क क्यों रही है? देख ही तो रहा हूं. तू सुगना काकी की बेटी है न? चल, नाम बता अपना?’’ कमलकिशोर ने उस की तरफ बढ़ते हुए फिल्मी अंदाज में पूछा. संजू को हंसी आ गई, ‘‘चल जा अपना काम कर,’’ कह कर वह घर में घुस गई.

कमलकिशोर का मन गुदगुदाहट से भर गया. संजू को गए बहुत वक्त बीत चुका था, पर वह वहीं खड़ा अब भी उन पलों को आगेपीछे कर के अपने सपनों में जी रहा था. ‘‘संजू, जरा चूल्हा जला दे और आटे में थोड़ा नमक डाल कर मुझे दे दे. खाने का समय हो गया है. बस, अभी सब खाना मांगने वाले हैं,’’ अंजू ने कहा. इतने में ही सुगना की आवाज आई, ‘‘ऐ अंजू, खाना कब देगी? मुझे जोरों की भूख लगी है.’’ सुगना और गंजोई आंगन में पड़ी खाट पर जमे हुए थे. गंजोई आसमान की ओर मुंह कर के लेटा था और सुगना उस के पैर दबा रही थी. रसोई में जान खपाने से ज्यादा आसान था यह काम. गंजोई के खाते ही सुगना खुद खाने बैठ जाती, फिर बाद में बच्चे आपस में मिलबैठ कर खा लेते. ‘हांहां, खाना बन रहा है,’’ संजू ने चिढ़ कर जवाब दिया. अंजू ने संजू की तरफ देखा, पर बोली कुछ भी नहीं. अब उसे संजू के लिए फिक्र होने लगी थी. जब तक उस का खुद का ब्याह न हो जाता, तब तक संजू का ब्याह होना मुश्किल था. अपनी आस उसे थी नहीं, पर संजू…

आज रात संजू को भी नींद नहीं आ रही थी. ‘चल, नाम बता अपना’ उस के कानों में गूंज रहा था. उसे फिर हंसी आने लगी. वह कमलकिशोर ही तो था. कितनी ही बार तो देखा है उसे, फिर आज क्या बात हो गई? संजू समझने की कोशिश कर रही थी. आज संजू की लाली में कुछ ज्यादा ही चमक थी. शायद सुबह की धूप का असर था या फिर रात को दबे पैर उस की चारपाई में घुस आए खयालों का, पता नहीं. घर से पहला कदम ही निकला था कि नजर बाईं ओर मुड़ गई. हड़बड़ाहट में दूसरा कदम तो बाहर निकला नहीं, पहला भी अंदर चला गया. दरवाजे की ओट ले कर संजू अपनी घबराहट पर काबू पाने की कोशिश करने लगी. अपने घर के बाहर कमलकिशोर पूरी तरह मुस्तैद खड़ा था. आखिर संजू की चारपाई से निकल कर वह खयाल उस के भी तो बिस्तर में घुसा था. कमलकिशोर की नजर संजू पर पड़ चुकी थी. वह समझ गया था कि संजू काम पर जाने वाली है. वह पहले ही साइकिल ले कर उस के काम की दिशा की ओर चल पड़ा था. इधर संजू भी संभल चुकी थी. वह तन कर बाहर निकली, बाएं देखा, फिर दाएं देखा, फिर एक निराशा की ढीली सांस, जिस में राहत पाने की भरसक कोशिश की गई थी, छोड़ते हुए अनमनी सी काम पर चल दी. ‘‘संजू, तेरे मांबापू तेरा ब्याह मुझ से तो क्या किसी से भी नहीं होने देंगे,’’ कमलकिशोर संजू से कह रहा था.

कमलकिशोर और संजू को एकदूसरे के नजदीक आने में ज्यादा समय नहीं लगा था. दोनों को एकदूसरे का साथ अच्छा लगता. अपना काम खत्म कर दोनों रोज मिलते, एकदूसरे के साथ जीने के सपने देखते. सुगना और गंजोई की बेजारी संजू की चाह को और हवा देती, पर वह अंजू के बारे में सोच कर बेचैन हो जाती. उसे कोई रास्ता नजर नहीं आता था, जो उस घर की बेटियों को ससुराल के दरवाजे तक पहुंचाता हो. मांबाप को अपनी कमाऊ बेटियों को विदा करने की कोई जल्दी न थी.

अंजू को संजू और कमलकिशोर के इश्क की खबर थी, संजू ने ही उसे बताया था एक दिन.

‘‘संजू, भाग कर जाएगी मेरे साथ?’’

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‘‘चल हट. बड़ा आया भगा कर ले जाने वाला. कहां रखेगा? क्या खिलाएगा मुझे? और मेरे घर वाले? महल्ले वाले जीने नहीं देंगे. मेरी बहनों की जिंदगी खराब हो जाएगी,’’ संजू ने उसे घुड़का और आखिरी बात कहतेकहते उसे खुद की आवाज सुनाई नहीं दी, आंखें सिकुड़ गईं और चेहरे पर उदासी उभर आई. कमलकिशोर ने हलके से झिड़क कर कहा, ‘‘तो यहां रह कर तू कौन सा उन का घर भर देगी. भाग चल. तेरे बाप का बोझ कुछ कम हो जाएगा. यहां रह कर जिंदा भूत की तरह बरतन ही तो घिसेगी. मेरे साथ चल, तेरी जिंदगी संवार दूंगा.’’ संजू ने उसे घूर कर देखा, पर बोली कुछ नहीं. गरमी की रात में सभी आंगन और बरामदे में ही सोते थे. आज संजू ने अपना बिस्तर अंजू के साथ जमीन पर ही बिछा लिया था. चारपाइयां कम थीं, सो अंजू जमीन पर ही सोती थी. रीना और रंजू भी एक चारपाई पर वहां बेसुध सो रही थीं. सुगना बरामदे में थी. संजू और अंजू दोनों चुपचाप सी आसमान को घूर रही थीं. दोनों को नींद नहीं आ रही थी. वे चुप थीं, पर शायद उन के मन के बीच संवाद चल रहा था. संजू जरा बेचैन दिखी, तो अंजू ने अपना हाथ उस के सिर पर रखते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ संजू, नींद नहीं आ रही है?’’

बेहद अपनेपन में भीगे शब्दों की नमी में संजू भी नहा गई, ‘‘हां दीदी, आज तो नींद सचमुच नहीं आ रही.’’

‘‘अच्छा, यह बता कि कमलकिशोर कैसा है? क्या लाया वह आज तेरे लिए? आजकल तो तू कुछ बताती ही नहीं मुझे,’’ अंजू ने बनावटी गुस्से से मुंह फुला कर कहा. संजू ने अंजू की तरफ देखा और खिलखिला कर हंस दी, ‘‘दीदी, तुम बड़ी चालाक हो. मेरा मुंह खुलवाने के लिए कमलकिशोर का नाम ले दिया.’’ कमलकिशोर का नाम लेते ही संजू जरा संजीदा हो गई. ठंडी सांस छोड़ते हुए उस ने कहा, ‘‘दीदी, आज वह मुझे अपने साथ भाग चलने के लिए कह रहा था.’’

‘‘तो भाग जा. किस के लिए रुकी हुई है?’’ अंजू ने सहज भाव से कहा. और एक दिन महल्ले में आग लग गई. गंजोई पहली बार हरकत में आया, ‘‘अरी सुगना, संजू आई क्या?’’

‘‘नहीं. अंजू के बापू,’’ कहते हुए सुगना बीच आंगन में बैठ छाती पीटपीट कर रो रही थी. दिन ढल रहा था. सुबह से निकली संजू का अब तक कुछ पता न था. गंजोई ने हर जगह खबर ले ली थी और यह बात अब पूरे महल्ले को पता थी. पता चला था कि कमलकिशोर भी सुबह से गायब था. दो और दो चार भांपने में किसी ने समय न गंवाया. गंजोई ने अपना सिर पीट लिया. सुगना रोरो कर बच्चियों को कोस रही थी, ‘‘जाओ, तुम लोग भी भाग जाओ, कोई न कोई मिल ही जाएगा चौक पर. अरे, भागना ही था तो तू ही भाग जाती,’’ उस ने अंजू की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘भगोड़ों का घर नाम धरा जाएगा हमारा. अंजू के बापू कुछ करो. हाय, यह क्या कर दिया? अब तो जिंदगी पत्थर जैसी भारी हो जाएगी. लोग हमें जीने नहीं देंगे, कौन ब्याहेगा इन बेटियों को?’’

गंजोई महल्ले के बड़ेबूढ़ों के आगे रो रहा था. एक बुजुर्ग ने अपनी घरघराती आवाज में लताड़ा, ‘‘देख गंजोई, तू ने तो कभी खबर ली नहीं अपने बच्चों की, अब पछताने से क्या होगा. लड़की भाग गई और धर गई कलंक तेरी सात पुश्तों पर. अब जरा सुध ले और बाकियों को संभाल.’’

‘‘देख, अब तू हमारी बिरादरी से बाहर हो गया है. हमारे भी लड़केलड़कियां हैं. कुछ तो कायदाकानून रखना पड़ेगा,’’ एक ने कहा था. यह सुन कर गंजोई फफक कर रो पड़ा. वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘देखिए, आप लोग ऐसा मत कहिए. आप ही साथ छोड़ने की बात करेंगे, तो हम किस से मदद मांगेंगे. मुश्किल में तो अपने ही काम आते हैं.’’ हुमेशा यहां के एक मंदिर के बुजुर्ग थे. वे बहुत ही कांइयां मिजाज के थे. कुछ सोच कर उन्होंने कहा, ‘‘देख गंजोई, जब हम गांव में रहते थे, वहां के नियमकानून अलग थे. या यों कह लो कि बड़ेबुजुर्गों ने बड़ी सूझबूझ के साथ परिवार पर विपत्ति का तोड़ निकाला था. जो तब भी सही थे और अब भी सही ही माने जाएंगे.

‘‘गांव में जब कोई लड़की भाग जाती थी, तो उस परिवार को जाति से बाहर कर दिया जाता था और बच्चे की एक नादानी की वजह से पूरा कुनबा बरबाद हो जाता था. ‘‘तू अपनी लड़की को न खोज, न ही उसे दोबारा घर में घुसने देना. तू उस का श्राद्ध कर दे, ऐसा करने से माना जाता है कि लड़की भागी नहीं मर गई. फिर कोई उंगली नहीं उठाता. यह हमारी जाति का एक रिवाज है, जो गांव में आज भी माना जाता है. गांव वालों को खूब खिलापिला कर खुश कर दिया जाता है. फिर सब उसे मरा मान कर भूल जाते हैं.’’ गंजोई ने संजू का श्राद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उस ने तय भोजन से 2 अतिरिक्त पकवान बनवाए. सुगना ने चाव से सब को परोसा. अंजू ने भी जलेबी खाई. हुमेशा को 2 जोड़ी कपड़े भी दिए गए. कमलकिशोर के परिवार को उस का श्राद्ध करने की जरूरत नहीं थी. वह तो लड़का था न.

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June 30, 2020 at 10:00AM

जिद-भाग 4: शिशिर चंचल पर क्यों चिल्लाया ?

लेखिका–रिजवाना बानो ‘इकरा’

‘‘नहीं, अपनी हैल्प करनी है मुझे,‘‘ आत्मविश्वास भरा जवाब आया चंचल का.

‘‘अपनी हैल्प? हाहाहा…दिमाग तो ठीक है न तुम्हारा चंचल? तुम को किस बात की कमी है?‘‘

‘‘ये जुमला 10 सालों से सुनती आ रही हूं, शिशिर. अब बस भी करो ये ड्रामा. मुझे कब, कैसे, क्या करना है, सबकुछ तो आप और मांजी फैसला लेते हैं. मेरी अपनी कोई मरजी, कोई अस्तित्व नहीं छोड़ा है आप ने. ये कमी है मुझे.‘‘

‘‘हां, तो सही सोचते हैं हम लोग. समझ है ही कहां तुम में. देखो, अपने पीहर 3 दिन रुकी हो और कैसी बातें करनी लगी हो. दिल्ली चली जाओ, आज ही.‘‘

‘‘नहीं, दिल्ली तो मैं रविवार को ही जाऊंगी. बस, आप को बतानी थी ये बात, सो बता दी मैं ने.‘‘

‘‘कह रहा हूं न मैं, आज ही जाओ. और ये कोर्स वगैरह का भूत उतारो अपने दिमाग से, बच्चों पर ध्यान दो बस.‘‘

‘‘शिशिर, बच्चे जितने मेरे हैं, उतने ही आप के भी हैं. और ये मेरा आखिरी फैसला है, सोच लीजिए आप,‘‘ फोन डिस्कनैक्ट हो गया. पीछे खड़ा मनु बहुत खुश है, दीदी को शादी के बाद आज अपने असली रूप में देख रहा है.

‘‘फैसला? मेरी चंचल फैसले कब से करने लगी? वो तो फैसले मानती है बस,‘‘ अब शिशिर को थोड़ी घबराहट हुई, चंचल की ‘जिद‘ दिख रही थी उसे.

आकांक्षा का घर, आज समय से पहले, ब्रैडआमलेट और चाय बना कर तैयार है. हालांकि आज आकांक्षा औफिस के लिए तैयार नहीं हुई है.

‘‘क्या बात है डार्लिंग? आज तो फेवरेट नाश्ता और वो भी समय से पहले? क्या डिमांड होने वाली है आज? हां, और तुम ये आज तैयार क्यों नहीं हुईं? नौकरीवौकरी छोड़ने का इरादा है क्या?‘‘

‘‘हां पंकज, नौकरी छोड़ने का ही इरादा है.‘‘

आमलेट गले में अटक गया पंकज के, ‘‘पगला गई हो क्या?‘‘ गुस्से में चिल्लाया, लेकिन तुरंत उसे अहसास हुआ कि गुस्से से बात नहीं संभाली जा सकती.

‘‘क्या हुआ बेटा? औफिस में कोई दिक्कत? मैं बात करूं चावला से?‘‘

‘‘नहीं, दिक्कत घर में है, औफिस में नहीं.‘‘

‘‘नाराज हो मुझ से? कुछ चाहिए मेरी प्यारी अक्कू को?‘‘

‘‘हां, चाहिए.‘‘

‘‘क्या चाहिए, मेरी प्यारी अक्कू को?‘‘

खूब समझती है इन चिकनीचुपडी बातों को आकांक्षा. पहले की तरह ही गंभीर रहते हुए आकांक्षा बोली, ‘‘बच्चा चाहिए मुझे.‘‘

‘‘क्या…?‘‘

‘‘मां बनना चाहती हूं मैं. कितने साल और इंतजार करूं अब मैं?‘‘

‘‘तुम जानती हो अक्कू, अभी हम तैयार नहीं हंै. विला ले लें, फिर जितने चाहे बच्चे करना. नहीं रोकने वाला मैं.‘‘

‘‘हम नहीं पंकज, केवल तुम तैयार नहीं हो. मैं पिछले 4 साल से कह रही हूं तुम्हें. पहले गाड़ी, फिर फ्लैट और अब विला. कल कुछ और शामिल हो जाएगा तुम्हारी लिस्ट में.‘‘

‘‘मैं खुश हूं पंकज, जो है उस में और मेरे बच्चे भी खुश रहेंगे, जानती हूं मैं. भौतिक सुखों का कोई अंत नहीं है, मैं थक गई हूं, इस तरह दौड़तेदौड़ते. मुझे ठहराव चाहिए, बच्चा चाहिए मुझे.‘‘

‘‘सुनो तो आकांक्षा…‘‘

‘‘नहीं पंकज, ये मेरा आखिरी फैसला है. अगर तुम्हें नहीं मंजूर, तो मैं कल ही इस्तीफा दे दूंगी. आज छुट्टी ली है बस,‘‘ मुसकराते हुए आकांक्षा बोली.

पंकज को समझ नहीं आ रहा था, वो छुट्टी की बात सुन कर खुश हो या बच्चे की बात सुन कर चिंतित. फिलहाल उसे अपना ‘विला‘ का सपना टूटते हुए दिख रहा था और दिख रही थी आकांक्षा की ‘जिद‘.

जिद तो दोनों ने कर ली थी, लेकिन जिद इतनी भी आसानी से पूरी नहीं होती. एक तरफ, चंचल की सासू मां ने हंगामा मचाया हुआ था, तो दूसरी तरफ, पंकज भी सारे दिन परेशान रहा कि कैसे अपनी बीवी को समझाए वो, कहां, बच्चों के चक्कर में पड़ गई है?

बुध का दिन इसी हलचल में गुजर गया. गुरुवार की सुबह शिशिर ने अपनी नाराजगी जताते हुए फोन नहीं किया, न ही चंचल का फोन उठाया. पंकज को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था, बात टालने के लिए वो भी टूर पर निकल गया, इतवार तक.

इतवार भी आ गया. चंचल को भी आज ही दिल्ली लौटना था, लेकिन चंचल ने न जाने का फैसला किया. इधर, आकांक्षा भी अपना सारा सामान पैक कर बैठी थी. पंकज को लगा था, 2-4 दिन दूर रहेगी आकांक्षा उस से तो खुद ही अक्ल आ जाएगी. पंकज के बिना आकांक्षा का कहां मन लगना था. लेकिन जो वो देख रहा था, वो अप्रत्याशित था.

‘‘आकांक्षा, क्या बचपना है ये?‘‘

‘‘बच्चों बिना कैसा बचपना? बच्चे तो इस घर में आने से रहे तो मैं ही बच्चा बन कर देख लेती हूं.‘‘

‘‘बस भी करो ये पागलपन… परेशान हो गया हूं मैं.‘‘

‘‘सो तो मैं भी. चलो परेशानी खत्म कर देते हैं. मैं ने साथ वाली कालोनी में एक रूम व किचन देख लिया है. तलाक के कागजात भिजवा दूंगी.‘‘

‘‘चलती हूं.‘‘

पंकज के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो मानो.

‘‘ठहरो आकांक्षा… बैठो, बात तो करो.‘‘

‘‘क्या बात करनी है पंकज? तुम्हारा फैसला मुझे पता है.‘‘

‘‘अच्छा, क्या पता है तुम को? यही ना कि मुझे अपने जैसा बेटा नहीं चाहिए, बल्कि तुम्हारे जैसी बेटी चाहिए. एकदम समझदार, मजबूत और निडर…‘‘

इस बार, आकांक्षा खुद को रोक नहीं पाई. पंकज को गले लगाते ही सालों का दर्द आंसुओं के साथ बहा दिया, आकांक्षा ने. रह गया तो उन दोनों के बीच का प्यार बस.

उधर, दिल्ली में जब शिशिर पूरे परिवार के साथ घर लौटा, तो चंचल और बच्चों को वहां न देख गुस्से से आगबबूला हो गया.

‘‘चंचल की इतनी हिम्मत? अभी बताता हूं उसे…‘‘

इस बार फोन नहीं किया, शिशिर ने, सीधा नासिक के लिए फ्लाइट ली. ‘‘बहुत बोलने लगी है, पीहर बैठ जाने को बोलूंगा न तो अपनेआप सीधी हो जाएगी.‘‘

रात होतेहोते शिशिर चंचल के घर पहुंच ही गया. चंचल जैसे उसी के इंतजार में बैठी थी. डोरबैल बजी, चंचल ने दरवाजा खोला, एकदम सपाट चेहरे के साथ. न खुशी, न नाराजगी. लेकिन शिशिर तो नाराज था ही.

‘‘अपना सामान पैक करो चंचल… और तुम घर में क्यों नहीं हो? यहां क्यों हो? चल क्या रहा है दिमाग में तुम्हारे.‘‘

‘‘हाथपैर धो कर खाना खा लो शिशिर, डिनर तैयार है. बाद में बात करते हैं.‘‘

तभी आशु आ कर शिशिर से लिपट गया, ‘‘पापा आ गए… पापा आ गए.‘‘

बेटे को देख कर शिशिर अपना गुस्सा भूल गया, कुछ देर को. और फ्रेश होने चला गया.

डिनर के बाद चंचल ने उसे छत पर बुलाया, ‘‘हम्म, बताइए, क्या बोल रहे थे आप?‘‘

‘‘क्या बोलूंगा? तुम फोन क्यों नहीं उठा रही हो? और घर क्यों नहीं पहुंची अब तक?‘‘

‘‘क्या आप को सच में नहीं पता शिशिर?‘‘

‘‘अगर ये तुम्हारे बेकार से सर्टिफिकेट कोर्स और जौब के लिए है तो मुझे कोई बात नहीं करनी इस बारे में. तुम अच्छे से जानती हो, मां को बिलकुल पसंद नहीं ये सब और बच्चे…? बच्चों का भी खयाल नहीं आया तुम्हें? उन्हें कौन देखेगा?‘‘

‘‘शांत हो जाओ शिशिर, बात तो मुझे भी करनी है आप से और इसी बारे में करनी है, लेकिन इस तरह नहीं.‘‘

‘‘जो कौर्स और जौब तुम्हारे लिए बेकार है, वो मेरी आत्मनिर्भरता है. और इतने सालों से बच्चों को देख रही हूं न, आगे भी देख लूंगी.‘‘

‘‘मुझे नहीं पसंद, कह दिया न…‘‘

‘‘बात आप की पसंद की नहीं है, मेरे अस्तित्व की है.‘‘

‘‘तो ठीक है, आज से मेरे घर के दरवाजे बंद तुम्हारे लिए…‘‘

‘‘ठीक है, आप जब चाहें, जा सकते हैं.‘‘

इतना शांत जवाब? शिशिर अंदर तक हिल गया. सिर पकड़ कर बैठ गया, दस मिनट.

‘‘चंचल, क्या तुम सच में मेरे बिना रहना चाहती हो?‘‘

‘‘नहीं… मैं आप के साथ रहना चाहती हूं, लेकिन अपनी पहचान के साथ.‘‘

सुबकते हुए शिशिर बोला, ‘‘ठीक है, सुबह चलो साथ.‘‘

‘‘और मांजी?‘‘

‘‘परेशान मत होओ, सुबह सब साथ चलते हैं. सुहाना मैं और तुम, जब सब साथ मिल कर मनाएंगे तो मां भी मान ही जाएगी.‘‘

दोनों के चेहरे पर प्यार भरी मुसकराहट आ जाती है.

 

 

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लेखिका–रिजवाना बानो ‘इकरा’

‘‘नहीं, अपनी हैल्प करनी है मुझे,‘‘ आत्मविश्वास भरा जवाब आया चंचल का.

‘‘अपनी हैल्प? हाहाहा…दिमाग तो ठीक है न तुम्हारा चंचल? तुम को किस बात की कमी है?‘‘

‘‘ये जुमला 10 सालों से सुनती आ रही हूं, शिशिर. अब बस भी करो ये ड्रामा. मुझे कब, कैसे, क्या करना है, सबकुछ तो आप और मांजी फैसला लेते हैं. मेरी अपनी कोई मरजी, कोई अस्तित्व नहीं छोड़ा है आप ने. ये कमी है मुझे.‘‘

‘‘हां, तो सही सोचते हैं हम लोग. समझ है ही कहां तुम में. देखो, अपने पीहर 3 दिन रुकी हो और कैसी बातें करनी लगी हो. दिल्ली चली जाओ, आज ही.‘‘

‘‘नहीं, दिल्ली तो मैं रविवार को ही जाऊंगी. बस, आप को बतानी थी ये बात, सो बता दी मैं ने.‘‘

‘‘कह रहा हूं न मैं, आज ही जाओ. और ये कोर्स वगैरह का भूत उतारो अपने दिमाग से, बच्चों पर ध्यान दो बस.‘‘

‘‘शिशिर, बच्चे जितने मेरे हैं, उतने ही आप के भी हैं. और ये मेरा आखिरी फैसला है, सोच लीजिए आप,‘‘ फोन डिस्कनैक्ट हो गया. पीछे खड़ा मनु बहुत खुश है, दीदी को शादी के बाद आज अपने असली रूप में देख रहा है.

‘‘फैसला? मेरी चंचल फैसले कब से करने लगी? वो तो फैसले मानती है बस,‘‘ अब शिशिर को थोड़ी घबराहट हुई, चंचल की ‘जिद‘ दिख रही थी उसे.

आकांक्षा का घर, आज समय से पहले, ब्रैडआमलेट और चाय बना कर तैयार है. हालांकि आज आकांक्षा औफिस के लिए तैयार नहीं हुई है.

‘‘क्या बात है डार्लिंग? आज तो फेवरेट नाश्ता और वो भी समय से पहले? क्या डिमांड होने वाली है आज? हां, और तुम ये आज तैयार क्यों नहीं हुईं? नौकरीवौकरी छोड़ने का इरादा है क्या?‘‘

‘‘हां पंकज, नौकरी छोड़ने का ही इरादा है.‘‘

आमलेट गले में अटक गया पंकज के, ‘‘पगला गई हो क्या?‘‘ गुस्से में चिल्लाया, लेकिन तुरंत उसे अहसास हुआ कि गुस्से से बात नहीं संभाली जा सकती.

‘‘क्या हुआ बेटा? औफिस में कोई दिक्कत? मैं बात करूं चावला से?‘‘

‘‘नहीं, दिक्कत घर में है, औफिस में नहीं.‘‘

‘‘नाराज हो मुझ से? कुछ चाहिए मेरी प्यारी अक्कू को?‘‘

‘‘हां, चाहिए.‘‘

‘‘क्या चाहिए, मेरी प्यारी अक्कू को?‘‘

खूब समझती है इन चिकनीचुपडी बातों को आकांक्षा. पहले की तरह ही गंभीर रहते हुए आकांक्षा बोली, ‘‘बच्चा चाहिए मुझे.‘‘

‘‘क्या…?‘‘

‘‘मां बनना चाहती हूं मैं. कितने साल और इंतजार करूं अब मैं?‘‘

‘‘तुम जानती हो अक्कू, अभी हम तैयार नहीं हंै. विला ले लें, फिर जितने चाहे बच्चे करना. नहीं रोकने वाला मैं.‘‘

‘‘हम नहीं पंकज, केवल तुम तैयार नहीं हो. मैं पिछले 4 साल से कह रही हूं तुम्हें. पहले गाड़ी, फिर फ्लैट और अब विला. कल कुछ और शामिल हो जाएगा तुम्हारी लिस्ट में.‘‘

‘‘मैं खुश हूं पंकज, जो है उस में और मेरे बच्चे भी खुश रहेंगे, जानती हूं मैं. भौतिक सुखों का कोई अंत नहीं है, मैं थक गई हूं, इस तरह दौड़तेदौड़ते. मुझे ठहराव चाहिए, बच्चा चाहिए मुझे.‘‘

‘‘सुनो तो आकांक्षा…‘‘

‘‘नहीं पंकज, ये मेरा आखिरी फैसला है. अगर तुम्हें नहीं मंजूर, तो मैं कल ही इस्तीफा दे दूंगी. आज छुट्टी ली है बस,‘‘ मुसकराते हुए आकांक्षा बोली.

पंकज को समझ नहीं आ रहा था, वो छुट्टी की बात सुन कर खुश हो या बच्चे की बात सुन कर चिंतित. फिलहाल उसे अपना ‘विला‘ का सपना टूटते हुए दिख रहा था और दिख रही थी आकांक्षा की ‘जिद‘.

जिद तो दोनों ने कर ली थी, लेकिन जिद इतनी भी आसानी से पूरी नहीं होती. एक तरफ, चंचल की सासू मां ने हंगामा मचाया हुआ था, तो दूसरी तरफ, पंकज भी सारे दिन परेशान रहा कि कैसे अपनी बीवी को समझाए वो, कहां, बच्चों के चक्कर में पड़ गई है?

बुध का दिन इसी हलचल में गुजर गया. गुरुवार की सुबह शिशिर ने अपनी नाराजगी जताते हुए फोन नहीं किया, न ही चंचल का फोन उठाया. पंकज को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था, बात टालने के लिए वो भी टूर पर निकल गया, इतवार तक.

इतवार भी आ गया. चंचल को भी आज ही दिल्ली लौटना था, लेकिन चंचल ने न जाने का फैसला किया. इधर, आकांक्षा भी अपना सारा सामान पैक कर बैठी थी. पंकज को लगा था, 2-4 दिन दूर रहेगी आकांक्षा उस से तो खुद ही अक्ल आ जाएगी. पंकज के बिना आकांक्षा का कहां मन लगना था. लेकिन जो वो देख रहा था, वो अप्रत्याशित था.

‘‘आकांक्षा, क्या बचपना है ये?‘‘

‘‘बच्चों बिना कैसा बचपना? बच्चे तो इस घर में आने से रहे तो मैं ही बच्चा बन कर देख लेती हूं.‘‘

‘‘बस भी करो ये पागलपन… परेशान हो गया हूं मैं.‘‘

‘‘सो तो मैं भी. चलो परेशानी खत्म कर देते हैं. मैं ने साथ वाली कालोनी में एक रूम व किचन देख लिया है. तलाक के कागजात भिजवा दूंगी.‘‘

‘‘चलती हूं.‘‘

पंकज के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो मानो.

‘‘ठहरो आकांक्षा… बैठो, बात तो करो.‘‘

‘‘क्या बात करनी है पंकज? तुम्हारा फैसला मुझे पता है.‘‘

‘‘अच्छा, क्या पता है तुम को? यही ना कि मुझे अपने जैसा बेटा नहीं चाहिए, बल्कि तुम्हारे जैसी बेटी चाहिए. एकदम समझदार, मजबूत और निडर…‘‘

इस बार, आकांक्षा खुद को रोक नहीं पाई. पंकज को गले लगाते ही सालों का दर्द आंसुओं के साथ बहा दिया, आकांक्षा ने. रह गया तो उन दोनों के बीच का प्यार बस.

उधर, दिल्ली में जब शिशिर पूरे परिवार के साथ घर लौटा, तो चंचल और बच्चों को वहां न देख गुस्से से आगबबूला हो गया.

‘‘चंचल की इतनी हिम्मत? अभी बताता हूं उसे…‘‘

इस बार फोन नहीं किया, शिशिर ने, सीधा नासिक के लिए फ्लाइट ली. ‘‘बहुत बोलने लगी है, पीहर बैठ जाने को बोलूंगा न तो अपनेआप सीधी हो जाएगी.‘‘

रात होतेहोते शिशिर चंचल के घर पहुंच ही गया. चंचल जैसे उसी के इंतजार में बैठी थी. डोरबैल बजी, चंचल ने दरवाजा खोला, एकदम सपाट चेहरे के साथ. न खुशी, न नाराजगी. लेकिन शिशिर तो नाराज था ही.

‘‘अपना सामान पैक करो चंचल… और तुम घर में क्यों नहीं हो? यहां क्यों हो? चल क्या रहा है दिमाग में तुम्हारे.‘‘

‘‘हाथपैर धो कर खाना खा लो शिशिर, डिनर तैयार है. बाद में बात करते हैं.‘‘

तभी आशु आ कर शिशिर से लिपट गया, ‘‘पापा आ गए… पापा आ गए.‘‘

बेटे को देख कर शिशिर अपना गुस्सा भूल गया, कुछ देर को. और फ्रेश होने चला गया.

डिनर के बाद चंचल ने उसे छत पर बुलाया, ‘‘हम्म, बताइए, क्या बोल रहे थे आप?‘‘

‘‘क्या बोलूंगा? तुम फोन क्यों नहीं उठा रही हो? और घर क्यों नहीं पहुंची अब तक?‘‘

‘‘क्या आप को सच में नहीं पता शिशिर?‘‘

‘‘अगर ये तुम्हारे बेकार से सर्टिफिकेट कोर्स और जौब के लिए है तो मुझे कोई बात नहीं करनी इस बारे में. तुम अच्छे से जानती हो, मां को बिलकुल पसंद नहीं ये सब और बच्चे…? बच्चों का भी खयाल नहीं आया तुम्हें? उन्हें कौन देखेगा?‘‘

‘‘शांत हो जाओ शिशिर, बात तो मुझे भी करनी है आप से और इसी बारे में करनी है, लेकिन इस तरह नहीं.‘‘

‘‘जो कौर्स और जौब तुम्हारे लिए बेकार है, वो मेरी आत्मनिर्भरता है. और इतने सालों से बच्चों को देख रही हूं न, आगे भी देख लूंगी.‘‘

‘‘मुझे नहीं पसंद, कह दिया न…‘‘

‘‘बात आप की पसंद की नहीं है, मेरे अस्तित्व की है.‘‘

‘‘तो ठीक है, आज से मेरे घर के दरवाजे बंद तुम्हारे लिए…‘‘

‘‘ठीक है, आप जब चाहें, जा सकते हैं.‘‘

इतना शांत जवाब? शिशिर अंदर तक हिल गया. सिर पकड़ कर बैठ गया, दस मिनट.

‘‘चंचल, क्या तुम सच में मेरे बिना रहना चाहती हो?‘‘

‘‘नहीं… मैं आप के साथ रहना चाहती हूं, लेकिन अपनी पहचान के साथ.‘‘

सुबकते हुए शिशिर बोला, ‘‘ठीक है, सुबह चलो साथ.‘‘

‘‘और मांजी?‘‘

‘‘परेशान मत होओ, सुबह सब साथ चलते हैं. सुहाना मैं और तुम, जब सब साथ मिल कर मनाएंगे तो मां भी मान ही जाएगी.‘‘

दोनों के चेहरे पर प्यार भरी मुसकराहट आ जाती है.

 

 

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June 30, 2020 at 10:00AM