Friday, 1 May 2020
राहत / 11 महीने बाद एचएमटी का पेट्रोल पंप हुआ शुरू, लोगों को मिली राहत
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... लगाकर नौकरी से निकाल दिया गया। सोसायटी में काम कर रहे इन 18 कर्मचारियों को एचएमटी इंम्पलाॅइज कॉअापरेटिव ...
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कोविड-19 से अर्थव्यवस्था में आयी सुस्ती को खत्म करने के …
Government Job Opportunity For 12th Pass, Will Get Millions Of Rupees
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Government Job Opportunity For 12th Pass, Will Get Millions Of Rupees – 12वीं पास के लिए सरकारी नौकरी का मौका, लाखों रुपए ...
Thursday, 30 April 2020
19 दिन 19 कहानियां: सूनी आंखें
सुबह के समय अरुण ने पत्नी सीमा से कहा,”आज मुझे दफ्तर जरा जल्दी जाना है. मैं जब तक तैयार होता हूं तुम तब तक लंच बना दो ब्रेकफास्ट भी तैयार कर दो, खा कर जाऊंगा.”
बिस्तर छोड़ते हुए सीमा तुनक कर बोली,”आरर… आज ऐसा कौन सा काम है जो इतनी जल्दी मचा रहे हैं.”अरुण ने कहा,”आज सुबह 11 बजे जरूरी मीटिंग है. सभी को समय पर बुलाया है.”
“ठीक है जी, तुम तैयार हो जाओ. मैं किचन देखती हूं,” सीमा मुस्कान बिखेरते हुए बोली.अरुण नहाधो कर तैयार हो गया और ब्रेकफास्ट मांगने लगा, क्योंकि उस के दफ्तर जाने का समय हो चुका था, इसलिए वह जल्दबाजी कर रहा था.
ये भी पढ़ें-धारावाहिक कहानी: अजीब दास्तान
गैराज से कार निकाली और सड़क पर फर्राटा भर अरुण समय पर दफ्तर पहुंच गया. दफ्तर के कामों से फुरसत पा कर अरुण आराम से कुरसी पर बैठा था, तभी दफ्तर के दरवाजे पर एक अनजान औरत खड़ी अजीब नजरों से चारों ओर देख रही थी.
चपरासी दीपू के पूछने पर उस औरत ने बताया कि वह अरुण साहब से मिलना चाहती है. उस औरत को वहां रखे सोफे पर बिठा कर चपरासी दीपू अरुण को बताने चला गया.
‘‘साहब, दरवाजे पर एक औरत खड़ी है, जो आप से मिलना चाहती है,’’ दीपू ने अरुण से कहा.‘‘कौन है?’’ अरुण ने पूछा.‘‘मैं नहीं जानता साहब,’’ दीपू ने जवाब दिया.
‘‘बुला लो. देखें, किस काम से आई है?’’ अरुण ने कहा.चपरासी दीपू उस औरत को अरुण के केबिन तक ले गया.केबिन खोलने के साथ ही उस अजनबी औरत ने अंदर आने की इजाजत मांगी.
ये भी पढ़ें-अजीब दास्तान: भाग 3
अरुण के हां कहने पर वह औरत अरुण के सामने खड़ी हो गई. अरुण ने उस औरत को बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘बताइए, मैं आप के लिए क्या कर सकता हूं?”
“सर, मेरा नाम संगीता है. मेरे पति सुरेश आप के दफ्तर में काम करते हैं.” अरुण बोला,”जी, ऑफिस के बहुत से काम वे देखते हैं. उन के बिना कई काम रुके हुए हैं.”
अरुण ने चपरासी दीपू को बुला कर चाय लाने को कहा.चपरासी दीपू टेबल पर पानी रख गया और चाय लेने चला गया.कुछ देर बाद ही चपरासी दीपू चाय ले आया.
चाय की चुस्की लेते हुए अरुण पूछने लगा, ” कहो, कैसे आना हुआ?’’‘‘मैं बताने आई थी कि मेरे पति सुरेश की तबीयत आजकल ठीक नहीं रहती है, इसलिए वे कुछ दिनों के लिए दफ्तर नहीं आ सकेंगे.”
“क्या हुआ सुरेश को,” हैरान होते हुए अरुण बोला”डाक्टर उन्हें अजीब सी बीमारी बता रहे हैं. अस्पताल से उन्हें आने ही नहीं दे रहे,”संगीता रोने वाले अंदाज में बोली.
संगीता को रोता हुआ देख कर अरुण बोला, “रोइए नहीं. पूरी बात बताइए कि उन को यह बीमारी कैसे लगी?””कुछ दिनों से ये लगातार गले में दर्द बता रहे थे, फिर तेज बुखार आया. पहले तो पास के डाक्टर से इलाज कराया, पर जब कोई फायदा न हुआ तो सरकारी अस्पताल चले गए.
“सरकारी अस्पताल में डाक्टर को दिखाया तो देखते ही उन्हें भर्ती कर लिया गया. “ये तो समझ ही नहींपाए कि इन के साथ हो क्या गया है?””जब अस्पताल से इन का फोन आया तो मैं भी सुन कर हैरान रह गई,” संगीता ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा.
“अभी वे अस्पताल में ही हैं,” संगीता से अरुण ने पूछा.”जी,” संगीता ने जवाब दिया.अरुण यह सुन कर परेशान हो गया. सुरेश का काम किसी और को देने के लिए चपरासी दीपू से कहा.
अरुण ने सुरेश की पत्नी संगीता को समझाते हुए कहा कि तुम अब बिलकुल चिंता न करो. घर जाओ और बेफिक्र रहो, उन्हें कुछ नहीं होगा.संगीता अरुण से आश्वस्त हो कर घर आ गई और उसे भी घर आने के लिए कहा. अरुण ने भी जल्द समय निकाल कर घर आने के लिए कहा.
“सर, कुछ कहना चाहती हूं,” कुर्सी से उठते समय संगीता ने झिझकते हुए पूछा.”हां, हां, कहिए, क्या कहना चाहती हैं आप,” अरुण ने संगीता की ओर देखते हुए कहा.”जी, मुझे कुछ पैसों की जरूरत है. इन की तनख्वाह मिलने पर काट लेना,” संगीता ने सकुचाते हुए कहा.
“बताइए, कितने पैसे चाहिए?” अरुण ने पूछा.”जी, 20 हजार रुपए चाहिए थे…” संगीता संकोच करते हुए बोली.”अभी तो इतने पैसे नहीं है, आप कलपरसों में आ कर ले जाना,” अरुण ने कहा. “ठीक है,” यह सुन कर संगीता का उदास चेहरा हो गया.
“आप जरा भी परेशान न होइए. मैं आप को पैसे दे दूंगा,” संगीता के उदास चेहरे को देख कर कहा.अरुण के दफ्तर से निकलने का समय हो चुका था, इसलिए संगीता भी अपने घर लौट आई.
अगले दिन दफ्तर के काम जल्द निबटा कर अरुण कुछ सोच में डूबा था, तभी उस के मन में अचानक ही सुरेश की पत्नी संगीता की पैसों वाली बात याद आ गई.2 दिन बाद ही संगीता अरुण के दफ्तर पहुंची. चपरासी दीपू ने चायपानी ला कर दी.
ये भी पढ़ें-#coronavirus: ये चार दीवारें
अरुण ने सुरेश की तबीयत के बारे में जानना चाहा. संगीता आंखों में आंसू लाते हुए बोली,”वहां तो अभी वे ठीक नहीं हैं. मैं अस्पताल गई थी, पर वहां किसी को मिलने नहीं दे रहे.”
“क्या…” अरुण हैरानी से बोला.”अस्पताल वाले कहते हैं, जब वे ठीक हो जाएंगे तो खुद ही घर आ जाएंगे.”यह जान कर अरुण हैरान हो गया कि अस्पताल वाले किसी से मिलने नहीं दे रहे. वह आज शाम को उस से मिलने जाने वाला था.
अरुण ने संगीता को 20 हजार के बजाय 30 हजार रुपए दिए और कहा कि और भी पैसे की जरूरत हो तो बताना.संगीता पैसे ले कर घर लौट आई. 21 मार्च की शाम जब अरुण हाथपैर धो कर बिस्तर पर बैठा, तभी उस की पत्नी सीमा चाय ले आई और बताने लगी कि रात 8 बजे रास्ट्र के नाम संदेश आएगा.
अरुण टीवी खोल कर तय समय पर बैठ गया. मोदी का संदेश सुनने के बाद अरुण ने पत्नी सीमा को अगले दिन रविवार को जनता कर्फ्यू के बारे में बताया कि घर से किसी को बाहर नहीं निकलना है. साथ ही, यह भी बताया कि शाम 5 बजे अपनेअपने घरों से बाहर निकल कर थाली या बरतन, कुछ भी बजाएं.
उस दिन शाम को जब पड़ोसी ने घर से बाहर निकल थाली बजाई तो अरुण भी शोर सुन कर बाहर आया. पत्नी सीमा भी खुश होते हुए थाली हाथ में लिए बाहर जोरजोर से बजाने लगी. उसे देख अरुण भी खुश हुआ.
सोमवार 23 मार्च को अरुण किसी जरूरी काम के निकल आने की वजह से ऑफिस नहीं गया.उसी दिनशाम को फिर से रास्ट्र के नाम संदेश आया. 21 दिनों के लॉक डाउन की खबर से वह भी हैरत में पड़ गया.
अगले दिन किसी तरह अरुण ऑफिस गया और जल्दी से सारे काम निबटा कर घर आ गया.घर पर अरुण ने सीमा को ऑफिस में साथ काम करने वाले सुरेश के बारे में बताया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है.
अगले दिन सड़क पर सख्ती होने से अरुण दफ्तर न जा सका. लॉक डाउन होने की वजह से अरुण घर में रहने को विवश था.इधर जब सुरेश को कोरोना होने की तसदीक हो गई तो संगीता के घर को क्वारन्टीन कर दिया. अब वह घर से जरा भी बाहर नहीं निकल सकती थी.
उधर क्वारन्टीन होने के कुछ दिन बाद ही अस्पताल से सुरेश के मरने की खबर आई तो क्वारन्टीन होने की वजह से वह घर से निकल नहीं सकती थी.
संगीता को अस्पताल वालों ने फोन पर ही सुरेश की लाश न देने की वजह बताई. वजह यह कि ऐसे मरीजों को वही लोग जलाते हैं ताकि किसी और को यह बीमारी न लगे.
यह सुन कर संगीता घर में ही दहाड़े मारते हुए गश खा कर गिर पड़ी. ऑफिस में भी सुरेश के मरने की खबर भिजवाई गई, पर ऑफिस बंद होने से किसी ने फोन नहीं उठाया.जब लॉक डाउन हटा तो अरुण यों ही संगीता के दिए पते पर घर पहुंच गया.
अरुण ने सुरेश के घर का दरवाजा खटखटाया तो संगीता ने ही खोला.संगीता को देख अरुण मुस्कुराते हुए बोला, “कैसे हैं सुरेश? उस की तबीयत पूछने चला आया.”संगीता ने अंदर आने के लिए कहा, तो वह संगीता के पीछेपीछे चल दिया.
कमरे में अरुण को बिठा कर संगीता चाय बनाने किचन में चली गई. कमरे का नजारा देख अरुण हैरत में पड़ गया क्योंकि सुरेश की तसवीर पर फूल चढ़े हुए थे, अरुण समझ गया कि सुरेश अब नहीं रहा.
संगीता जब चाय लाई तो अरुण ने हैरानी से संगीता से पूछा तो उस ने रोते हुए बताया कि ये तो 30 मार्च को ही चल बसे थे. अस्पताल से खबर आई थी. मुझे तो क्वारन्टीन कर दिया गया. फोन पर ही अस्पताल वालों ने लाश देने से मना कर दिया.
क्या करती,घर में फूटफूट कर रोने के सिवा.अरुण ने गौर किया कि सुरेश की फोटो के पास ही पैसे रखे थे, जो उस ने संगीता को दिए थे.संगीता ने उन पैसों की ओर देखा और अरुण ने संगीता की इन सूनी आंखों में देखा. थके कदमों से अरुण वहां से लौट आया.इन सूनी आंखों में अरुण को जाते देख संगीता की आंखों में आंसू आ गए.
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सुबह के समय अरुण ने पत्नी सीमा से कहा,”आज मुझे दफ्तर जरा जल्दी जाना है. मैं जब तक तैयार होता हूं तुम तब तक लंच बना दो ब्रेकफास्ट भी तैयार कर दो, खा कर जाऊंगा.”
बिस्तर छोड़ते हुए सीमा तुनक कर बोली,”आरर… आज ऐसा कौन सा काम है जो इतनी जल्दी मचा रहे हैं.”अरुण ने कहा,”आज सुबह 11 बजे जरूरी मीटिंग है. सभी को समय पर बुलाया है.”
“ठीक है जी, तुम तैयार हो जाओ. मैं किचन देखती हूं,” सीमा मुस्कान बिखेरते हुए बोली.अरुण नहाधो कर तैयार हो गया और ब्रेकफास्ट मांगने लगा, क्योंकि उस के दफ्तर जाने का समय हो चुका था, इसलिए वह जल्दबाजी कर रहा था.
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गैराज से कार निकाली और सड़क पर फर्राटा भर अरुण समय पर दफ्तर पहुंच गया. दफ्तर के कामों से फुरसत पा कर अरुण आराम से कुरसी पर बैठा था, तभी दफ्तर के दरवाजे पर एक अनजान औरत खड़ी अजीब नजरों से चारों ओर देख रही थी.
चपरासी दीपू के पूछने पर उस औरत ने बताया कि वह अरुण साहब से मिलना चाहती है. उस औरत को वहां रखे सोफे पर बिठा कर चपरासी दीपू अरुण को बताने चला गया.
‘‘साहब, दरवाजे पर एक औरत खड़ी है, जो आप से मिलना चाहती है,’’ दीपू ने अरुण से कहा.‘‘कौन है?’’ अरुण ने पूछा.‘‘मैं नहीं जानता साहब,’’ दीपू ने जवाब दिया.
‘‘बुला लो. देखें, किस काम से आई है?’’ अरुण ने कहा.चपरासी दीपू उस औरत को अरुण के केबिन तक ले गया.केबिन खोलने के साथ ही उस अजनबी औरत ने अंदर आने की इजाजत मांगी.
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अरुण के हां कहने पर वह औरत अरुण के सामने खड़ी हो गई. अरुण ने उस औरत को बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘बताइए, मैं आप के लिए क्या कर सकता हूं?”
“सर, मेरा नाम संगीता है. मेरे पति सुरेश आप के दफ्तर में काम करते हैं.” अरुण बोला,”जी, ऑफिस के बहुत से काम वे देखते हैं. उन के बिना कई काम रुके हुए हैं.”
अरुण ने चपरासी दीपू को बुला कर चाय लाने को कहा.चपरासी दीपू टेबल पर पानी रख गया और चाय लेने चला गया.कुछ देर बाद ही चपरासी दीपू चाय ले आया.
चाय की चुस्की लेते हुए अरुण पूछने लगा, ” कहो, कैसे आना हुआ?’’‘‘मैं बताने आई थी कि मेरे पति सुरेश की तबीयत आजकल ठीक नहीं रहती है, इसलिए वे कुछ दिनों के लिए दफ्तर नहीं आ सकेंगे.”
“क्या हुआ सुरेश को,” हैरान होते हुए अरुण बोला”डाक्टर उन्हें अजीब सी बीमारी बता रहे हैं. अस्पताल से उन्हें आने ही नहीं दे रहे,”संगीता रोने वाले अंदाज में बोली.
संगीता को रोता हुआ देख कर अरुण बोला, “रोइए नहीं. पूरी बात बताइए कि उन को यह बीमारी कैसे लगी?””कुछ दिनों से ये लगातार गले में दर्द बता रहे थे, फिर तेज बुखार आया. पहले तो पास के डाक्टर से इलाज कराया, पर जब कोई फायदा न हुआ तो सरकारी अस्पताल चले गए.
“सरकारी अस्पताल में डाक्टर को दिखाया तो देखते ही उन्हें भर्ती कर लिया गया. “ये तो समझ ही नहींपाए कि इन के साथ हो क्या गया है?””जब अस्पताल से इन का फोन आया तो मैं भी सुन कर हैरान रह गई,” संगीता ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा.
“अभी वे अस्पताल में ही हैं,” संगीता से अरुण ने पूछा.”जी,” संगीता ने जवाब दिया.अरुण यह सुन कर परेशान हो गया. सुरेश का काम किसी और को देने के लिए चपरासी दीपू से कहा.
अरुण ने सुरेश की पत्नी संगीता को समझाते हुए कहा कि तुम अब बिलकुल चिंता न करो. घर जाओ और बेफिक्र रहो, उन्हें कुछ नहीं होगा.संगीता अरुण से आश्वस्त हो कर घर आ गई और उसे भी घर आने के लिए कहा. अरुण ने भी जल्द समय निकाल कर घर आने के लिए कहा.
“सर, कुछ कहना चाहती हूं,” कुर्सी से उठते समय संगीता ने झिझकते हुए पूछा.”हां, हां, कहिए, क्या कहना चाहती हैं आप,” अरुण ने संगीता की ओर देखते हुए कहा.”जी, मुझे कुछ पैसों की जरूरत है. इन की तनख्वाह मिलने पर काट लेना,” संगीता ने सकुचाते हुए कहा.
“बताइए, कितने पैसे चाहिए?” अरुण ने पूछा.”जी, 20 हजार रुपए चाहिए थे…” संगीता संकोच करते हुए बोली.”अभी तो इतने पैसे नहीं है, आप कलपरसों में आ कर ले जाना,” अरुण ने कहा. “ठीक है,” यह सुन कर संगीता का उदास चेहरा हो गया.
“आप जरा भी परेशान न होइए. मैं आप को पैसे दे दूंगा,” संगीता के उदास चेहरे को देख कर कहा.अरुण के दफ्तर से निकलने का समय हो चुका था, इसलिए संगीता भी अपने घर लौट आई.
अगले दिन दफ्तर के काम जल्द निबटा कर अरुण कुछ सोच में डूबा था, तभी उस के मन में अचानक ही सुरेश की पत्नी संगीता की पैसों वाली बात याद आ गई.2 दिन बाद ही संगीता अरुण के दफ्तर पहुंची. चपरासी दीपू ने चायपानी ला कर दी.
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अरुण ने सुरेश की तबीयत के बारे में जानना चाहा. संगीता आंखों में आंसू लाते हुए बोली,”वहां तो अभी वे ठीक नहीं हैं. मैं अस्पताल गई थी, पर वहां किसी को मिलने नहीं दे रहे.”
“क्या…” अरुण हैरानी से बोला.”अस्पताल वाले कहते हैं, जब वे ठीक हो जाएंगे तो खुद ही घर आ जाएंगे.”यह जान कर अरुण हैरान हो गया कि अस्पताल वाले किसी से मिलने नहीं दे रहे. वह आज शाम को उस से मिलने जाने वाला था.
अरुण ने संगीता को 20 हजार के बजाय 30 हजार रुपए दिए और कहा कि और भी पैसे की जरूरत हो तो बताना.संगीता पैसे ले कर घर लौट आई. 21 मार्च की शाम जब अरुण हाथपैर धो कर बिस्तर पर बैठा, तभी उस की पत्नी सीमा चाय ले आई और बताने लगी कि रात 8 बजे रास्ट्र के नाम संदेश आएगा.
अरुण टीवी खोल कर तय समय पर बैठ गया. मोदी का संदेश सुनने के बाद अरुण ने पत्नी सीमा को अगले दिन रविवार को जनता कर्फ्यू के बारे में बताया कि घर से किसी को बाहर नहीं निकलना है. साथ ही, यह भी बताया कि शाम 5 बजे अपनेअपने घरों से बाहर निकल कर थाली या बरतन, कुछ भी बजाएं.
उस दिन शाम को जब पड़ोसी ने घर से बाहर निकल थाली बजाई तो अरुण भी शोर सुन कर बाहर आया. पत्नी सीमा भी खुश होते हुए थाली हाथ में लिए बाहर जोरजोर से बजाने लगी. उसे देख अरुण भी खुश हुआ.
सोमवार 23 मार्च को अरुण किसी जरूरी काम के निकल आने की वजह से ऑफिस नहीं गया.उसी दिनशाम को फिर से रास्ट्र के नाम संदेश आया. 21 दिनों के लॉक डाउन की खबर से वह भी हैरत में पड़ गया.
अगले दिन किसी तरह अरुण ऑफिस गया और जल्दी से सारे काम निबटा कर घर आ गया.घर पर अरुण ने सीमा को ऑफिस में साथ काम करने वाले सुरेश के बारे में बताया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है.
अगले दिन सड़क पर सख्ती होने से अरुण दफ्तर न जा सका. लॉक डाउन होने की वजह से अरुण घर में रहने को विवश था.इधर जब सुरेश को कोरोना होने की तसदीक हो गई तो संगीता के घर को क्वारन्टीन कर दिया. अब वह घर से जरा भी बाहर नहीं निकल सकती थी.
उधर क्वारन्टीन होने के कुछ दिन बाद ही अस्पताल से सुरेश के मरने की खबर आई तो क्वारन्टीन होने की वजह से वह घर से निकल नहीं सकती थी.
संगीता को अस्पताल वालों ने फोन पर ही सुरेश की लाश न देने की वजह बताई. वजह यह कि ऐसे मरीजों को वही लोग जलाते हैं ताकि किसी और को यह बीमारी न लगे.
यह सुन कर संगीता घर में ही दहाड़े मारते हुए गश खा कर गिर पड़ी. ऑफिस में भी सुरेश के मरने की खबर भिजवाई गई, पर ऑफिस बंद होने से किसी ने फोन नहीं उठाया.जब लॉक डाउन हटा तो अरुण यों ही संगीता के दिए पते पर घर पहुंच गया.
अरुण ने सुरेश के घर का दरवाजा खटखटाया तो संगीता ने ही खोला.संगीता को देख अरुण मुस्कुराते हुए बोला, “कैसे हैं सुरेश? उस की तबीयत पूछने चला आया.”संगीता ने अंदर आने के लिए कहा, तो वह संगीता के पीछेपीछे चल दिया.
कमरे में अरुण को बिठा कर संगीता चाय बनाने किचन में चली गई. कमरे का नजारा देख अरुण हैरत में पड़ गया क्योंकि सुरेश की तसवीर पर फूल चढ़े हुए थे, अरुण समझ गया कि सुरेश अब नहीं रहा.
संगीता जब चाय लाई तो अरुण ने हैरानी से संगीता से पूछा तो उस ने रोते हुए बताया कि ये तो 30 मार्च को ही चल बसे थे. अस्पताल से खबर आई थी. मुझे तो क्वारन्टीन कर दिया गया. फोन पर ही अस्पताल वालों ने लाश देने से मना कर दिया.
क्या करती,घर में फूटफूट कर रोने के सिवा.अरुण ने गौर किया कि सुरेश की फोटो के पास ही पैसे रखे थे, जो उस ने संगीता को दिए थे.संगीता ने उन पैसों की ओर देखा और अरुण ने संगीता की इन सूनी आंखों में देखा. थके कदमों से अरुण वहां से लौट आया.इन सूनी आंखों में अरुण को जाते देख संगीता की आंखों में आंसू आ गए.
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May 01, 2020 at 10:00AMकोरोना वायरस के जाल में: भाग 2
लेखक- डा. भारत खुशालानी
वान के नाक का निचला हिस्सा लाल हो चुका था. उस ने अपनी आंखें जमीन पर गड़ा दीं, बोली, ‘‘दस्तखत करते वक्त उस को छींक आई थी. उस छींक के कण कौपी पर और पैन पर आ गए थे.’’मू को मसला समझ में आ गया. उस ने वान को सांत्वना दी और तुरंत उस ओर चल दिया जहां सिक्योरिटी कैमरा से रिकौर्डिंग रखी जाती थी. रिकौर्डिंग कमरे में पहुंच कर उस ने वहां टैक्नीशियन से 4 दिन पहले की सुबह की रिकौर्डिंग मांगी. रिकौर्डिंग पर उसे डा. वान लीजुंग के कक्ष में घटित होने वाली वही घटना दिखी जिस में बीमार से दिखने वाले, समुद्री खाद्य को ले कर जाने वाले व्यक्ति ने पैन से कौपी पर हस्ताक्षर करते हुए छींका था. रिकौर्डिंग कमरे से ही मू ने रजिस्ट्रेशन कक्ष को फोन लगाया और बाद में डाक्टरपेशेंट रिपोर्ट रूम से डा. वान लीजुंग की कौपी मंगाई. वुहान, हूबे प्रांत के अंतर्गत आने वाला शहर है.
वुहान में ही, हूबे के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग में उस रोज जब पुलिसकर्मी भी थोड़ी तादाद में नजर आने लगे, तो स्वास्थ्य विभाग के बाकी कर्मचारी उन को देखने लगे. एक बड़े सम्मलेन कक्ष में स्वास्थ्य विभाग के बड़े ओहदे वाले 15-20 कर्मचारी बैठे थे और उन के पीछे पुलिसवाले खड़े हो कर आने वाले समाचार की प्रतीक्षा कर रहे थे. सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के अध्यक्ष ने तेजी से प्रवेश किया और मुख्य कुरसी पर बैठते ही पौलीकौम का बटन दबाया और पौलीकौम में बात करना शुरू किया. पौलीकौम के दूसरे छोर पर डा. चाओ मू मौजूद थे. पौलीकौम से डा. मू की आवाज पूरे कमरे में गूंजी, ‘‘हुआनान समुद्री खाद्य मार्केट से आमतौर पर सी फूड खरीदने वाले व्यक्ति का नाम, पता और मोबाइल नंबर शेयर कर रहा हूं. तुरंत इस का पता लगा कर इस को अस्पताल ले कर आना है पूरे निरीक्षण के लिए. साथ ही, सिक्योरिटी फुटेज भी शेयर कर रहा हूं कि वह कैसा दिखता है.’’अध्यक्ष ने कहा, ‘‘डा. मू, यहां बैठे सब अधिकारी यह जानना चाहते हैं कि क्या चल रहा है? उन के हिसाब से यह संभावित फ्लू के प्रकोप का मामला है. यहां पूरे प्रांत के और शहर के अधिकारी मौजूद हैं. केंद्रीय शासन वाले अभी पहुंचे नहीं हैं.’’
डा. मू ने दूसरी ओर से चिंतापूर्ण लहजे में कहा, ‘‘इतने सारे महत्त्वपूर्ण लोगों को सिर्फ फ्लू का इंजैक्शन दिलाने के लिए नहीं बुलाया गया है. जिस व्यक्ति का फुटेज मैं भेज रहा हूं, वह व्यक्ति संक्रामक है. उस के छूने से ही रोग लगने के बेहद आसार हैं.’’अध्यक्ष ने मुख्य पुलिस अधिकारी को संबोधित किया, ‘‘चीफ, स्थानीय पुलिस की मदद ले कर इस आदमी का पता लगाओ और इस से पहले कि वह शहर में प्लेग फैला दे, इसे वुहान शहरी अस्पताल में डा. मू के पास ले कर जाओ.’’चीफ ने हामी भरी.डा. मू ने चीफ और अध्यक्ष को अधिक जानकारी देना उचित समझा, ‘‘पेशेंट उत्तेजित था, आप सिक्योरिटी फुटेज में भी देख सकते हैं. वह ग्रसनी शोथ से पीडि़त है और खांस रहा है. उस को सांस की तकलीफ हो रही है. कौपी में लिखा है कि उस ने सिरदर्द की भी शिकायत की है. ‘‘डा. वान की जांच कौपी में यह भी लिखा हुआ है कि उस के लसिका गांठ सूजे हुए हैं. उस समय राउंड पर डा. वान लीजुंग थी और वह ही पेशेंट देख रही थी. उस व्यक्ति का निरीक्षण करने के 4 दिनों के अंदर डा. लीजुंग रोगसूचक हो गई है और उस में उसी रोग के लक्षण नजर आ रहे हैं. इस से पता चलता है कि जो वायरस सी फूड वाला व्यक्ति ले कर घूम रहा है, वह वायरस चंद दिनों के भीतर ही अपनेआप को दोहरा सकता है.’’अध्यक्ष ने पूछा, ‘‘डा. मू, आप को लगता है कि सी फूड वाला यह व्यक्ति इस वायरस का पहला शिकार है? या आप की नजर में इस से पहले भी ऐसे लक्षणों वाला इस या दूसरे अस्पताल में आया था?’’चीफ ने आश्चर्य जताते हुए कहा, ‘‘फ्लू जैसी आम बीमारी के लिए तो कोई भी पहले पेशेंट को ढूंढ़ने की इतनी तकलीफ नहीं करता है.’’डा. मू ने दुख से कहा,
‘‘इस के बाद अस्पताल की 2 और नर्सें, और डा. लीजुंग के पति भी इस वायरस का शिकार हो गए हैं. दोनों नर्सों और उन के पतियों को यह वायरस डा. लीजुंग के संपर्क में आने की वजह से हुआ है.’’चीफ ने कहा, ‘‘इस घटना को 4 दिन हो गए, और आप हमें आज बता रहे हैं?’’ अध्यक्ष ने चीफ से कहा, ‘‘स्थानीय पुलिस को प्रोटोकौल के अनुसार तब ही शामिल किया जा सकता है जब उस की जरूरत महसूस हो,’’ फिर डा. मू से कहा, ‘‘डा. मू, आप क्या सुझाव देंगे?’’बहुत ही गंभीरता से डा. मू ने कहा, ‘‘जब तक हम इस सी फूड वाले व्यक्ति का निरीक्षण कर के यह नहीं पता लगा लेते कि उस से पहले कोई और इस वायरस से संक्रमित नहीं था, तब तक वुहान शहरी अस्पताल की तालाबंदी कर देनी चाहिए.’’यह सुनते ही वहां बैठे सब अधिकारी आपस में फुसफुसाने लगे. डा. मू ने उन की फुसफुसाहट को नजरअंदाज करते हुए अपना सुझाव जारी रखा, ‘‘इस प्रकोप को नियंत्रण में लाने के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि वह किसकिस के संपर्क में आया है और वे लोग कहां हैं जिन के संपर्क में वह आया है. ऐसे लोगों को भी अस्पताल में जल्दी से जल्दी ले कर आना है. अस्पताल में डा. लीजुंग के संपर्क में और कौनकौन आया है, इस की पूरी तहकीकात की जरूरत है, इसीलिए अस्पताल की तुरंत तालाबंदी की इजाजत चाहिए.’’अध्यक्ष बोले, ‘‘डा. मू, मैं तुम्हारी राय से सहमत हूं.’’चीफ बोले, ‘‘हम लोग किस वायरस के बारे में बात कर रहे हैं?
’’डा. मू ने बताया, ‘‘अभी तक तो यह वायरस सिर्फ श्वसन प्रणाली पर हमला करते हुए दिख रहा है. वर्तमान में यह ऐसे कुछ खास लक्षण नहीं प्रस्तुत कर रहा है जिस से हम इस की पहचान कर सकें.’’थोड़ी ही देर में गरिमा के साथ चल रहे युवक मिन झोउ का मोबाइल फोन बजा. उस ने फोन पर बात की जिस के बाद उस के हावभाव पूरी तरह बदल गए. पिछले 2 घंटों में मिन ने गरिमा को अस्पताल का निरीक्षण करवाया था और दोचार चुनिंदा प्रयोगशालाएं दिखाई थीं. आने वाले कुछ वर्षों के दौरान गरिमा इन्हीं प्रयोगशालाओं में कुछ शोधकार्य करने की सोच रही थी. इस के लिए आज उस की मुलाकात डा. वान लीजुंग से थी, लेकिन शायद वह व्यस्त थी, इसीलिए उस की जगह मिन झोउ ने ले ली थी.फोन जेब में रख कर मिन ने गरिमा से कहा, ‘‘थोड़ी सी समस्या है.’’गरिमा ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्या?’’ अब उस के वापस अपने विश्वविद्यालय लौटने का समय आ गया था, जहां होस्टल में एक कमरे में वह रहती थी. वुहान वाएरोलौजी विश्वविद्यालय, चीन का सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय है जहां उच्चकोटि की पढ़ाई तथा शोधकार्य होता है. वुहान शहरी अस्पताल की प्रयोगशालाओं का शोधकार्य, गरिमा को अपनी डाक्टरेट डिग्री के लिए जरूरी था. किसी अनुमानित परिप्रश्न के बदले वह एक व्यावहारिक और प्रयोगात्मक प्रश्न का हल अपने शोधकार्य में निकालना चाहती थी, इसीलिए उस ने विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों की मदद से वुहान शहरी अस्पताल में संपर्क किया था. विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, अकसर अस्पताल के डाक्टरों के साथ मिल कर शोधकार्य करते थे. अपने ज्यादातर डेटा के लिए प्राध्यापक अस्पताल के मरीजों के डेटा पर निर्भर रहते थे. मिन ने गरिमा को अपने फोनकौल के बारे में बताया, ‘‘ऐसा लगता है कि अभी हम लोग इस अस्पताल से नहीं जा सकते.’’गरिमा ने कहा, ‘‘क्या मतलब?’’दोनों वापस जाने के लिए तकरीबन मुख्यद्वार तक पहुंच ही गए थे कि एक अधिकारी सा दिखने वाला व्यक्ति उन के पीछे दौड़ता हुआ आया. दोनों ने पलट कर उस को देखा. अधिकारी ने रुक कर शिष्टाचारपूर्वक कहा, ‘‘माफी चाहता हूं, लेकिन आप दोनों को वापस अंदर आना पड़ेगा.’’मिन ने एक कोशिश की, ‘‘मुझे पहले ही देरी हो रही है.’’लेकिन उस अधिकारी ने फिर शिष्टाचार लेकिन दृढ़तापूर्वक कहा, ‘‘मुझे मालूम है, लेकिन मैं अभी आप लोगों को यहां से नहीं जाने दे सकता हूं. आप कृपया अंदर आ जाएं, फिर मैं सब समझा दूंगा.’’
मिन ने गरिमा से कहा, ‘‘डाक्टरों से ज्यादा अस्पताल प्रशासन की चलती है. इसलिए इन की बात हमें माननी ही पड़ेगी.’’गरिमा बोली, ‘‘ऐसा लगता है मेरा आज का दौरा पूरा नहीं हुआ है. अब तो यह और बढ़ गया है. आज शायद पूरा अस्पताल ही देखने को मिलेगा मुझे.’’अधिकारी ने एक और बात कही, जिस से दोनों चौंक गए, ‘‘तुम दोनों को कम से कम एक पूरे हाथ की दूरी पर रहना पड़ेगा.’’ यह सुन कर दोनों ने अपने बीच थोड़ी दूरी बना ली. अधिकारी ने मुख्यद्वार पर मौजूद 2 रिसैप्शनिस्ट्स को थोड़ी हिदायतें दीं. दोनों रिसैप्शनिस्ट्स ने बहुत ही गंभीरताभरी निगाहों से अधिकारी की बात सुनी और माना.
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लेखक- डा. भारत खुशालानी
वान के नाक का निचला हिस्सा लाल हो चुका था. उस ने अपनी आंखें जमीन पर गड़ा दीं, बोली, ‘‘दस्तखत करते वक्त उस को छींक आई थी. उस छींक के कण कौपी पर और पैन पर आ गए थे.’’मू को मसला समझ में आ गया. उस ने वान को सांत्वना दी और तुरंत उस ओर चल दिया जहां सिक्योरिटी कैमरा से रिकौर्डिंग रखी जाती थी. रिकौर्डिंग कमरे में पहुंच कर उस ने वहां टैक्नीशियन से 4 दिन पहले की सुबह की रिकौर्डिंग मांगी. रिकौर्डिंग पर उसे डा. वान लीजुंग के कक्ष में घटित होने वाली वही घटना दिखी जिस में बीमार से दिखने वाले, समुद्री खाद्य को ले कर जाने वाले व्यक्ति ने पैन से कौपी पर हस्ताक्षर करते हुए छींका था. रिकौर्डिंग कमरे से ही मू ने रजिस्ट्रेशन कक्ष को फोन लगाया और बाद में डाक्टरपेशेंट रिपोर्ट रूम से डा. वान लीजुंग की कौपी मंगाई. वुहान, हूबे प्रांत के अंतर्गत आने वाला शहर है.
वुहान में ही, हूबे के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग में उस रोज जब पुलिसकर्मी भी थोड़ी तादाद में नजर आने लगे, तो स्वास्थ्य विभाग के बाकी कर्मचारी उन को देखने लगे. एक बड़े सम्मलेन कक्ष में स्वास्थ्य विभाग के बड़े ओहदे वाले 15-20 कर्मचारी बैठे थे और उन के पीछे पुलिसवाले खड़े हो कर आने वाले समाचार की प्रतीक्षा कर रहे थे. सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के अध्यक्ष ने तेजी से प्रवेश किया और मुख्य कुरसी पर बैठते ही पौलीकौम का बटन दबाया और पौलीकौम में बात करना शुरू किया. पौलीकौम के दूसरे छोर पर डा. चाओ मू मौजूद थे. पौलीकौम से डा. मू की आवाज पूरे कमरे में गूंजी, ‘‘हुआनान समुद्री खाद्य मार्केट से आमतौर पर सी फूड खरीदने वाले व्यक्ति का नाम, पता और मोबाइल नंबर शेयर कर रहा हूं. तुरंत इस का पता लगा कर इस को अस्पताल ले कर आना है पूरे निरीक्षण के लिए. साथ ही, सिक्योरिटी फुटेज भी शेयर कर रहा हूं कि वह कैसा दिखता है.’’अध्यक्ष ने कहा, ‘‘डा. मू, यहां बैठे सब अधिकारी यह जानना चाहते हैं कि क्या चल रहा है? उन के हिसाब से यह संभावित फ्लू के प्रकोप का मामला है. यहां पूरे प्रांत के और शहर के अधिकारी मौजूद हैं. केंद्रीय शासन वाले अभी पहुंचे नहीं हैं.’’
डा. मू ने दूसरी ओर से चिंतापूर्ण लहजे में कहा, ‘‘इतने सारे महत्त्वपूर्ण लोगों को सिर्फ फ्लू का इंजैक्शन दिलाने के लिए नहीं बुलाया गया है. जिस व्यक्ति का फुटेज मैं भेज रहा हूं, वह व्यक्ति संक्रामक है. उस के छूने से ही रोग लगने के बेहद आसार हैं.’’अध्यक्ष ने मुख्य पुलिस अधिकारी को संबोधित किया, ‘‘चीफ, स्थानीय पुलिस की मदद ले कर इस आदमी का पता लगाओ और इस से पहले कि वह शहर में प्लेग फैला दे, इसे वुहान शहरी अस्पताल में डा. मू के पास ले कर जाओ.’’चीफ ने हामी भरी.डा. मू ने चीफ और अध्यक्ष को अधिक जानकारी देना उचित समझा, ‘‘पेशेंट उत्तेजित था, आप सिक्योरिटी फुटेज में भी देख सकते हैं. वह ग्रसनी शोथ से पीडि़त है और खांस रहा है. उस को सांस की तकलीफ हो रही है. कौपी में लिखा है कि उस ने सिरदर्द की भी शिकायत की है. ‘‘डा. वान की जांच कौपी में यह भी लिखा हुआ है कि उस के लसिका गांठ सूजे हुए हैं. उस समय राउंड पर डा. वान लीजुंग थी और वह ही पेशेंट देख रही थी. उस व्यक्ति का निरीक्षण करने के 4 दिनों के अंदर डा. लीजुंग रोगसूचक हो गई है और उस में उसी रोग के लक्षण नजर आ रहे हैं. इस से पता चलता है कि जो वायरस सी फूड वाला व्यक्ति ले कर घूम रहा है, वह वायरस चंद दिनों के भीतर ही अपनेआप को दोहरा सकता है.’’अध्यक्ष ने पूछा, ‘‘डा. मू, आप को लगता है कि सी फूड वाला यह व्यक्ति इस वायरस का पहला शिकार है? या आप की नजर में इस से पहले भी ऐसे लक्षणों वाला इस या दूसरे अस्पताल में आया था?’’चीफ ने आश्चर्य जताते हुए कहा, ‘‘फ्लू जैसी आम बीमारी के लिए तो कोई भी पहले पेशेंट को ढूंढ़ने की इतनी तकलीफ नहीं करता है.’’डा. मू ने दुख से कहा,
‘‘इस के बाद अस्पताल की 2 और नर्सें, और डा. लीजुंग के पति भी इस वायरस का शिकार हो गए हैं. दोनों नर्सों और उन के पतियों को यह वायरस डा. लीजुंग के संपर्क में आने की वजह से हुआ है.’’चीफ ने कहा, ‘‘इस घटना को 4 दिन हो गए, और आप हमें आज बता रहे हैं?’’ अध्यक्ष ने चीफ से कहा, ‘‘स्थानीय पुलिस को प्रोटोकौल के अनुसार तब ही शामिल किया जा सकता है जब उस की जरूरत महसूस हो,’’ फिर डा. मू से कहा, ‘‘डा. मू, आप क्या सुझाव देंगे?’’बहुत ही गंभीरता से डा. मू ने कहा, ‘‘जब तक हम इस सी फूड वाले व्यक्ति का निरीक्षण कर के यह नहीं पता लगा लेते कि उस से पहले कोई और इस वायरस से संक्रमित नहीं था, तब तक वुहान शहरी अस्पताल की तालाबंदी कर देनी चाहिए.’’यह सुनते ही वहां बैठे सब अधिकारी आपस में फुसफुसाने लगे. डा. मू ने उन की फुसफुसाहट को नजरअंदाज करते हुए अपना सुझाव जारी रखा, ‘‘इस प्रकोप को नियंत्रण में लाने के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि वह किसकिस के संपर्क में आया है और वे लोग कहां हैं जिन के संपर्क में वह आया है. ऐसे लोगों को भी अस्पताल में जल्दी से जल्दी ले कर आना है. अस्पताल में डा. लीजुंग के संपर्क में और कौनकौन आया है, इस की पूरी तहकीकात की जरूरत है, इसीलिए अस्पताल की तुरंत तालाबंदी की इजाजत चाहिए.’’अध्यक्ष बोले, ‘‘डा. मू, मैं तुम्हारी राय से सहमत हूं.’’चीफ बोले, ‘‘हम लोग किस वायरस के बारे में बात कर रहे हैं?
’’डा. मू ने बताया, ‘‘अभी तक तो यह वायरस सिर्फ श्वसन प्रणाली पर हमला करते हुए दिख रहा है. वर्तमान में यह ऐसे कुछ खास लक्षण नहीं प्रस्तुत कर रहा है जिस से हम इस की पहचान कर सकें.’’थोड़ी ही देर में गरिमा के साथ चल रहे युवक मिन झोउ का मोबाइल फोन बजा. उस ने फोन पर बात की जिस के बाद उस के हावभाव पूरी तरह बदल गए. पिछले 2 घंटों में मिन ने गरिमा को अस्पताल का निरीक्षण करवाया था और दोचार चुनिंदा प्रयोगशालाएं दिखाई थीं. आने वाले कुछ वर्षों के दौरान गरिमा इन्हीं प्रयोगशालाओं में कुछ शोधकार्य करने की सोच रही थी. इस के लिए आज उस की मुलाकात डा. वान लीजुंग से थी, लेकिन शायद वह व्यस्त थी, इसीलिए उस की जगह मिन झोउ ने ले ली थी.फोन जेब में रख कर मिन ने गरिमा से कहा, ‘‘थोड़ी सी समस्या है.’’गरिमा ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्या?’’ अब उस के वापस अपने विश्वविद्यालय लौटने का समय आ गया था, जहां होस्टल में एक कमरे में वह रहती थी. वुहान वाएरोलौजी विश्वविद्यालय, चीन का सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय है जहां उच्चकोटि की पढ़ाई तथा शोधकार्य होता है. वुहान शहरी अस्पताल की प्रयोगशालाओं का शोधकार्य, गरिमा को अपनी डाक्टरेट डिग्री के लिए जरूरी था. किसी अनुमानित परिप्रश्न के बदले वह एक व्यावहारिक और प्रयोगात्मक प्रश्न का हल अपने शोधकार्य में निकालना चाहती थी, इसीलिए उस ने विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों की मदद से वुहान शहरी अस्पताल में संपर्क किया था. विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, अकसर अस्पताल के डाक्टरों के साथ मिल कर शोधकार्य करते थे. अपने ज्यादातर डेटा के लिए प्राध्यापक अस्पताल के मरीजों के डेटा पर निर्भर रहते थे. मिन ने गरिमा को अपने फोनकौल के बारे में बताया, ‘‘ऐसा लगता है कि अभी हम लोग इस अस्पताल से नहीं जा सकते.’’गरिमा ने कहा, ‘‘क्या मतलब?’’दोनों वापस जाने के लिए तकरीबन मुख्यद्वार तक पहुंच ही गए थे कि एक अधिकारी सा दिखने वाला व्यक्ति उन के पीछे दौड़ता हुआ आया. दोनों ने पलट कर उस को देखा. अधिकारी ने रुक कर शिष्टाचारपूर्वक कहा, ‘‘माफी चाहता हूं, लेकिन आप दोनों को वापस अंदर आना पड़ेगा.’’मिन ने एक कोशिश की, ‘‘मुझे पहले ही देरी हो रही है.’’लेकिन उस अधिकारी ने फिर शिष्टाचार लेकिन दृढ़तापूर्वक कहा, ‘‘मुझे मालूम है, लेकिन मैं अभी आप लोगों को यहां से नहीं जाने दे सकता हूं. आप कृपया अंदर आ जाएं, फिर मैं सब समझा दूंगा.’’
मिन ने गरिमा से कहा, ‘‘डाक्टरों से ज्यादा अस्पताल प्रशासन की चलती है. इसलिए इन की बात हमें माननी ही पड़ेगी.’’गरिमा बोली, ‘‘ऐसा लगता है मेरा आज का दौरा पूरा नहीं हुआ है. अब तो यह और बढ़ गया है. आज शायद पूरा अस्पताल ही देखने को मिलेगा मुझे.’’अधिकारी ने एक और बात कही, जिस से दोनों चौंक गए, ‘‘तुम दोनों को कम से कम एक पूरे हाथ की दूरी पर रहना पड़ेगा.’’ यह सुन कर दोनों ने अपने बीच थोड़ी दूरी बना ली. अधिकारी ने मुख्यद्वार पर मौजूद 2 रिसैप्शनिस्ट्स को थोड़ी हिदायतें दीं. दोनों रिसैप्शनिस्ट्स ने बहुत ही गंभीरताभरी निगाहों से अधिकारी की बात सुनी और माना.
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May 01, 2020 at 10:00AMकोरोना वायरस के जाल में: भाग 1
लेखक- डा. भारत खुशालानी
सुबह का चमकता हुआ लाल सूरज जब चीन के वुहान शहर पर पड़ा, तो उस की बड़ीबड़ी कांच से बनी हुई इमारतें सूरज की किरणों को प्रतिबिंबित करती हुई नींद से जागने लगीं.
मुंबई जितना बड़ा, एक करोड़ की आबादी वाला यह शहर अंगड़ाई ले कर उठने लगा, हालांकि मछली, सब्जी, फल, समुद्री खाद्य बेचने वालों की सुबह 2 घंटे पहले ही हो चुकी थी. आसमान साफ था, लेकिन दिसंबर की ठंड चरम पर थी. आज फिर पारा 5 डिग्री सैल्सियस तक गिर जाने की संभावना थी, इसीलिए लोगों ने अपने ऊनी कपडे़ और गरम जैकेट बाहर निकाल कर रखे थे. वैसे भी वहां रहने वालों को यह ठंड ज्यादा महसूस नहीं होती थी. इस ठंड के वे आदी थे. और ऐसी ठंड में सुहानी धूप सेंकने के लिए अपने जैकेट उतार कर बाहर की सैर करते और सुबह की दौड़ लगाते अकसर पाए जाते थे. दूर से, गगनचुंबी इमारतों के इस बड़े महानगर के भीतर प्रवेश करने वाला सड़कमार्ग पहले से ही गाडि़यों से सज्जित हो चुका था. सुबह के सूरज से हुआ सुनहरा पानी ले कर यांग्त्जी नदी, और इस की सब से बड़ी सहायक नदी, हान नदी, शहरी क्षेत्र को पार करती हुई शान से वुहान को उस के 3 बड़े जिलों वुचांग, हानकोउ और हान्यांग में विभाजित करते हुए उसी प्रकार बह रही थी जैसे कल बह रही थी.कुछ घंटों के बाद जब शहर पूरी तरह से जाग कर हरकत में आ गया, तो वुहान शहरी अस्पताल के बाहर रोड पर जो निर्माणकार्य चल रहा था,
उस पर दोनों तरफ ‘रास्ता बंद’ का चिह्न लगा कर कामगार मुस्तैदी से अपने काम में जुट गए थे. पीली टोपी और नारंगी रंग के बिना आस्तीन वाले पतले जैकेट पहने कामगार फुरती से आनेजाने वाले ट्रैफिक को हाथों से इशारा कर दिशा दे रहे थे. हालांकि, अस्पताल के अंदर आनेजाने वाले रास्ते पर कोई पाबंदी नहीं थी. गरिमा जब अस्पताल के पास के बसस्टौप पर बस से उतरी, तो काफी उत्साहित थी. उस का काम अस्पताल के बीमार मरीजों को अच्छा करना नहीं था, यह काम वहां के डाक्टरों और उन की नर्सों का था. गरिमा ने अस्पताल की लौबी में जाने वाले चबूतरे में प्रवेश किया तो तकरीबन 60 बरस के एक बूढ़े चीनी व्यक्ति को अपने सामने से गुजरते हुए पाया. बूढ़े के हाथ में कांच का एक थोड़ा सा बड़ा डब्बा था, जिस में करीब 10-12 सफेद चूहे तेजी से यहांवहां घूम रहे थे. उन चूहों की बेचैनी शायद इस बात का हश्र थी कि उन को अंदेशा था कि उन के साथ क्या होने वाला है.अस्पताल की प्रयोगशाला में इस्तेमाल हो कर, अपनी कुर्बानी दे कर, मानव के स्वास्थ्य को और उस की गुणवत्ता को बढ़ाने का जिम्मा, जैसे प्रयोगकर्ताओं ने सिर्फ उन की ही प्रजाति पर डाल दिया हो. चबूतरे से निकल कर, एक ढलान, लौबी के अंदर न जाती हुई, उस ओर जा रही थी जहां बाहर से आने वाला सामान अस्पताल के अंदर जाता था. ढलान की शुरुआत पर लिखा हुआ था.
‘यहां सिर्फ सामान पहुंचाने वाली गाडि़यां और ट्रक’ और इस के ऊपर एक बोर्ड लगा था जिस पर अस्पताल के ‘प्लस’ चिह्न के साथ बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था ‘संक्रामक रोग विभाग’ और उस के नीचे छोटे अक्षरों में ‘वुहान शहरी अस्पताल.’ बूढ़ा आदमी चूहों का डब्बा ले कर उस ढलान से विभाग के अंदर प्रवेश कर गया. गरिमा ने लौबी में प्रवेश किया. लौबी में सामने ही एक 28-30 बरस का चीनी युवक खड़ा था, जिस ने शायद गरिमा को देखते ही पहचान लिया और गरिमा से पूछा, ‘‘गरिमा?’’गरिमा ने चौंक कर उसे देखा, फिर इंग्लिश में कहा, ‘‘हां.’’चीनी युवक ने कहा, ‘‘मेरा नाम मिन झोउ है.’’गरिमा ने पूछा, ‘‘डाक्टर वान लीजुंग से मुझे मुलाकात करनी थी. वे नहीं आईं?’’मिन ने सांस छोड़ते हुए कहा, ‘‘पता नहीं वे कहां हैं. खैर, मुझे मालूम है आज क्या करना है.’’ मिन ने सफेद कोट पहन रखा था, जो दर्शाता था कि वह भी डाक्टर है. गरिमा ने सोचा शायद मिन भी डा. वान लीजुंग के साथ काम करता हो. डा. लीजुंग खुद भी कम उम्र की थीं. उन की भी उम्र 32-35 से ऊपर की नहीं होगी. मिन ने कहा, ‘‘इस अस्पताल के अंदर कहीं हैं वे.’’गरिमा ने मुसकरा कर कहा, ‘‘एक डाक्टर तो अस्पताल में गायब नहीं हो सकता.’’मिन भी मुसकरा दिया. दोनों लौबी की ओर बढ़ चले. डा. लीजुंग ने अभी भी सफेद कोट पहना हुआ था. उस का चेहरा गंभीर था. माथा तना हुआ था. चेहरे पर पसीने की बूंदें थीं. वह एक ऐसे कमरे में थी जो छोटा और तंग तो था लेकिन जिस में एक बिस्तर डला हुआ था. कोने में लोहे की टेबल थी जिस पर पानी का जार रखा हुआ था.
ऊपर सफेद ट्यूबलाइट जल रही थी. कमरे का दरवाजा अच्छे से बंद था, लेकिन दरवाजे पर छोटी खिड़की जितना कांच लगा होने से बाहर दिखता था और बाहर से अंदर दिखता था. बाकी दरवाजा मजबूत प्लाईवुड का बना था. वान की आंखें लाल होती जा रही थीं. बाहर से एक तकरीबन 40 वर्ष के डाक्टर ने दरवाजे के कांच तक आ कर वान को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘तुम को मालूम है कि ये सब एहतियात बरतना क्यों जरूरी है?’’वान ने बिना उस की तरफ देखे धीरे से हामी भरी.दरवाजे के बाहर खड़े डा. के सफेद कोट पर बाईं ओर छाती के ऊपर एक आयाताकार बिल्ला लगा था जिस पर लिखा था ‘डा. चाओ मू.’डा. मू ने गंभीरता से वान से प्रश्न किया, ‘‘मुझे थोड़ा समझाओ कि क्या कारण हो सकता है?’’वान ने आंखें मीचीं. जिस कुरसी पर वह बैठी थी, उस पर थोड़ा घूम कर कहा, ‘‘मैं ने जितने भी राउंड लगाए हैं अस्पताल के पिछले कई दिनों में, उन में 4 दिन पहले का सुबह वाला राउंड मुझे सब से ज्यादा संदिग्ध लगता है. उस दिन के मेरे सब से पहले वाले पेशेंट को एक्सरेरूम ले जाया गया था, इसलिए उस से मेरी मुलाकात नहीं हुई थी उस सुबह. दूसरा पेशेंट सोया पड़ा था, उस से भी मेरा कोई संपर्क नहीं बना. तीसरा पेशेंट …,’’ वान ने रुक कर गहरी आंखों से डा. मू को देखा, ‘‘तीसरा पेशेंट थोड़ा मोटा सा था. उस के हाथ में सामान का एक थैला था. उस को बुखार लग रहा था और सर्दीजुकाम था. मैं ने बात करने के लिए उस से पूछा था कि थैले में क्या ले जा रहा है. उस ने बताया था कि हमेशा की तरह हुआनान यानी सीफूड (समुद्री खाद्य) मार्केट से खरीदारी कर के अपने घर जा रहा था.’’ वान ने याद करते हुए कहा, ‘‘मैं ने उस के बाएं कंधे को अपने दाएं हाथ से पकड़ कर स्टेथोस्कोप को पहले उस के दाईं ओर रखा, उस ने गहरी सांस खींची. फिर मैं ने स्टेथोस्कोप बाईं ओर रखा. मुझे ऐसा कुछ याद नहीं आ रहा है जो ज्यादा जोखिम वाला संपर्क हो.
किसी भी द्रव्य पदार्थ से संपर्क नहीं बना.’’मू बोला, ‘‘तुम्हें पूरा विश्वास है?’’वान ने कहा, ‘‘ऐसा लगता तो है.’’ वान का इतना कहना ही था कि उसे जोरों की छींक आ गई. उस ने तुरंत अपनी कुहनी से नाक और मुंह ढकने की कोशिश की तो उसे 3-4 बार जोर से खांसी आ गई. हड़बड़ाहट में वह कुरसी से उठ कर दरवाजे के कांच तक आ पहुंची. उस ने एक हाथ से दरवाजे को थाम कर खांसी रोकने का प्रयास किया. उस ने कांच के दूसरी ओर डा. मू की तरफ पहले तो दयनीय दृष्टि से देखा, फिर अपनेआप को संभालते हुए कहा, ‘‘उस से कहा था कि थोड़ी देर और रुक जाए वह, ताकि मैं उस का और परीक्षण कर सकूं. लेकिन वह बोला कि उस को जल्दी घर जाना है.‘‘रजिस्ट्रेशन करते समय उस ने अपना नामपता लिखा होगा. मेरी कौपी में उस के परीक्षण का ब्योरा लिखा है. मेरी कौपी…’’ वान ने थोड़ा जोर दे कर फिर सोचा और कहा, ‘‘मैं ने अपनी कौपी पर उस को अस्पताल से बरखास्त किए जाने के लिए दस्तखत करने के लिए अपना पैन दिया. उस ने अपना समुद्री खाद्य वाला थैला नीचे रखा, पैन ले कर कौपी पर दस्तखत किए. मैं ने कौपी और पैन दोनों वापस ले लिए.’’
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लेखक- डा. भारत खुशालानी
सुबह का चमकता हुआ लाल सूरज जब चीन के वुहान शहर पर पड़ा, तो उस की बड़ीबड़ी कांच से बनी हुई इमारतें सूरज की किरणों को प्रतिबिंबित करती हुई नींद से जागने लगीं.
मुंबई जितना बड़ा, एक करोड़ की आबादी वाला यह शहर अंगड़ाई ले कर उठने लगा, हालांकि मछली, सब्जी, फल, समुद्री खाद्य बेचने वालों की सुबह 2 घंटे पहले ही हो चुकी थी. आसमान साफ था, लेकिन दिसंबर की ठंड चरम पर थी. आज फिर पारा 5 डिग्री सैल्सियस तक गिर जाने की संभावना थी, इसीलिए लोगों ने अपने ऊनी कपडे़ और गरम जैकेट बाहर निकाल कर रखे थे. वैसे भी वहां रहने वालों को यह ठंड ज्यादा महसूस नहीं होती थी. इस ठंड के वे आदी थे. और ऐसी ठंड में सुहानी धूप सेंकने के लिए अपने जैकेट उतार कर बाहर की सैर करते और सुबह की दौड़ लगाते अकसर पाए जाते थे. दूर से, गगनचुंबी इमारतों के इस बड़े महानगर के भीतर प्रवेश करने वाला सड़कमार्ग पहले से ही गाडि़यों से सज्जित हो चुका था. सुबह के सूरज से हुआ सुनहरा पानी ले कर यांग्त्जी नदी, और इस की सब से बड़ी सहायक नदी, हान नदी, शहरी क्षेत्र को पार करती हुई शान से वुहान को उस के 3 बड़े जिलों वुचांग, हानकोउ और हान्यांग में विभाजित करते हुए उसी प्रकार बह रही थी जैसे कल बह रही थी.कुछ घंटों के बाद जब शहर पूरी तरह से जाग कर हरकत में आ गया, तो वुहान शहरी अस्पताल के बाहर रोड पर जो निर्माणकार्य चल रहा था,
उस पर दोनों तरफ ‘रास्ता बंद’ का चिह्न लगा कर कामगार मुस्तैदी से अपने काम में जुट गए थे. पीली टोपी और नारंगी रंग के बिना आस्तीन वाले पतले जैकेट पहने कामगार फुरती से आनेजाने वाले ट्रैफिक को हाथों से इशारा कर दिशा दे रहे थे. हालांकि, अस्पताल के अंदर आनेजाने वाले रास्ते पर कोई पाबंदी नहीं थी. गरिमा जब अस्पताल के पास के बसस्टौप पर बस से उतरी, तो काफी उत्साहित थी. उस का काम अस्पताल के बीमार मरीजों को अच्छा करना नहीं था, यह काम वहां के डाक्टरों और उन की नर्सों का था. गरिमा ने अस्पताल की लौबी में जाने वाले चबूतरे में प्रवेश किया तो तकरीबन 60 बरस के एक बूढ़े चीनी व्यक्ति को अपने सामने से गुजरते हुए पाया. बूढ़े के हाथ में कांच का एक थोड़ा सा बड़ा डब्बा था, जिस में करीब 10-12 सफेद चूहे तेजी से यहांवहां घूम रहे थे. उन चूहों की बेचैनी शायद इस बात का हश्र थी कि उन को अंदेशा था कि उन के साथ क्या होने वाला है.अस्पताल की प्रयोगशाला में इस्तेमाल हो कर, अपनी कुर्बानी दे कर, मानव के स्वास्थ्य को और उस की गुणवत्ता को बढ़ाने का जिम्मा, जैसे प्रयोगकर्ताओं ने सिर्फ उन की ही प्रजाति पर डाल दिया हो. चबूतरे से निकल कर, एक ढलान, लौबी के अंदर न जाती हुई, उस ओर जा रही थी जहां बाहर से आने वाला सामान अस्पताल के अंदर जाता था. ढलान की शुरुआत पर लिखा हुआ था.
‘यहां सिर्फ सामान पहुंचाने वाली गाडि़यां और ट्रक’ और इस के ऊपर एक बोर्ड लगा था जिस पर अस्पताल के ‘प्लस’ चिह्न के साथ बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था ‘संक्रामक रोग विभाग’ और उस के नीचे छोटे अक्षरों में ‘वुहान शहरी अस्पताल.’ बूढ़ा आदमी चूहों का डब्बा ले कर उस ढलान से विभाग के अंदर प्रवेश कर गया. गरिमा ने लौबी में प्रवेश किया. लौबी में सामने ही एक 28-30 बरस का चीनी युवक खड़ा था, जिस ने शायद गरिमा को देखते ही पहचान लिया और गरिमा से पूछा, ‘‘गरिमा?’’गरिमा ने चौंक कर उसे देखा, फिर इंग्लिश में कहा, ‘‘हां.’’चीनी युवक ने कहा, ‘‘मेरा नाम मिन झोउ है.’’गरिमा ने पूछा, ‘‘डाक्टर वान लीजुंग से मुझे मुलाकात करनी थी. वे नहीं आईं?’’मिन ने सांस छोड़ते हुए कहा, ‘‘पता नहीं वे कहां हैं. खैर, मुझे मालूम है आज क्या करना है.’’ मिन ने सफेद कोट पहन रखा था, जो दर्शाता था कि वह भी डाक्टर है. गरिमा ने सोचा शायद मिन भी डा. वान लीजुंग के साथ काम करता हो. डा. लीजुंग खुद भी कम उम्र की थीं. उन की भी उम्र 32-35 से ऊपर की नहीं होगी. मिन ने कहा, ‘‘इस अस्पताल के अंदर कहीं हैं वे.’’गरिमा ने मुसकरा कर कहा, ‘‘एक डाक्टर तो अस्पताल में गायब नहीं हो सकता.’’मिन भी मुसकरा दिया. दोनों लौबी की ओर बढ़ चले. डा. लीजुंग ने अभी भी सफेद कोट पहना हुआ था. उस का चेहरा गंभीर था. माथा तना हुआ था. चेहरे पर पसीने की बूंदें थीं. वह एक ऐसे कमरे में थी जो छोटा और तंग तो था लेकिन जिस में एक बिस्तर डला हुआ था. कोने में लोहे की टेबल थी जिस पर पानी का जार रखा हुआ था.
ऊपर सफेद ट्यूबलाइट जल रही थी. कमरे का दरवाजा अच्छे से बंद था, लेकिन दरवाजे पर छोटी खिड़की जितना कांच लगा होने से बाहर दिखता था और बाहर से अंदर दिखता था. बाकी दरवाजा मजबूत प्लाईवुड का बना था. वान की आंखें लाल होती जा रही थीं. बाहर से एक तकरीबन 40 वर्ष के डाक्टर ने दरवाजे के कांच तक आ कर वान को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘तुम को मालूम है कि ये सब एहतियात बरतना क्यों जरूरी है?’’वान ने बिना उस की तरफ देखे धीरे से हामी भरी.दरवाजे के बाहर खड़े डा. के सफेद कोट पर बाईं ओर छाती के ऊपर एक आयाताकार बिल्ला लगा था जिस पर लिखा था ‘डा. चाओ मू.’डा. मू ने गंभीरता से वान से प्रश्न किया, ‘‘मुझे थोड़ा समझाओ कि क्या कारण हो सकता है?’’वान ने आंखें मीचीं. जिस कुरसी पर वह बैठी थी, उस पर थोड़ा घूम कर कहा, ‘‘मैं ने जितने भी राउंड लगाए हैं अस्पताल के पिछले कई दिनों में, उन में 4 दिन पहले का सुबह वाला राउंड मुझे सब से ज्यादा संदिग्ध लगता है. उस दिन के मेरे सब से पहले वाले पेशेंट को एक्सरेरूम ले जाया गया था, इसलिए उस से मेरी मुलाकात नहीं हुई थी उस सुबह. दूसरा पेशेंट सोया पड़ा था, उस से भी मेरा कोई संपर्क नहीं बना. तीसरा पेशेंट …,’’ वान ने रुक कर गहरी आंखों से डा. मू को देखा, ‘‘तीसरा पेशेंट थोड़ा मोटा सा था. उस के हाथ में सामान का एक थैला था. उस को बुखार लग रहा था और सर्दीजुकाम था. मैं ने बात करने के लिए उस से पूछा था कि थैले में क्या ले जा रहा है. उस ने बताया था कि हमेशा की तरह हुआनान यानी सीफूड (समुद्री खाद्य) मार्केट से खरीदारी कर के अपने घर जा रहा था.’’ वान ने याद करते हुए कहा, ‘‘मैं ने उस के बाएं कंधे को अपने दाएं हाथ से पकड़ कर स्टेथोस्कोप को पहले उस के दाईं ओर रखा, उस ने गहरी सांस खींची. फिर मैं ने स्टेथोस्कोप बाईं ओर रखा. मुझे ऐसा कुछ याद नहीं आ रहा है जो ज्यादा जोखिम वाला संपर्क हो.
किसी भी द्रव्य पदार्थ से संपर्क नहीं बना.’’मू बोला, ‘‘तुम्हें पूरा विश्वास है?’’वान ने कहा, ‘‘ऐसा लगता तो है.’’ वान का इतना कहना ही था कि उसे जोरों की छींक आ गई. उस ने तुरंत अपनी कुहनी से नाक और मुंह ढकने की कोशिश की तो उसे 3-4 बार जोर से खांसी आ गई. हड़बड़ाहट में वह कुरसी से उठ कर दरवाजे के कांच तक आ पहुंची. उस ने एक हाथ से दरवाजे को थाम कर खांसी रोकने का प्रयास किया. उस ने कांच के दूसरी ओर डा. मू की तरफ पहले तो दयनीय दृष्टि से देखा, फिर अपनेआप को संभालते हुए कहा, ‘‘उस से कहा था कि थोड़ी देर और रुक जाए वह, ताकि मैं उस का और परीक्षण कर सकूं. लेकिन वह बोला कि उस को जल्दी घर जाना है.‘‘रजिस्ट्रेशन करते समय उस ने अपना नामपता लिखा होगा. मेरी कौपी में उस के परीक्षण का ब्योरा लिखा है. मेरी कौपी…’’ वान ने थोड़ा जोर दे कर फिर सोचा और कहा, ‘‘मैं ने अपनी कौपी पर उस को अस्पताल से बरखास्त किए जाने के लिए दस्तखत करने के लिए अपना पैन दिया. उस ने अपना समुद्री खाद्य वाला थैला नीचे रखा, पैन ले कर कौपी पर दस्तखत किए. मैं ने कौपी और पैन दोनों वापस ले लिए.’’
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May 01, 2020 at 10:00AMShort story: धर्म का कांटा
रात को साढ़े 10 बजे जब आलोक का मोबाइल बजा, सुरभि चौंकी, बोली, ‘‘इस समय कौन है?’’ तब तक ‘हैलो’ कहते हुए आलोक बात करना शुरू कर चुका था. आलोक की एकतरफा बात ही सुरभि के कानों में पड़ रही थी, ‘हां, हां, एकदम बढि़या, ठीक रहेगा, आ जाओ सब, बोल दो सबको, ठीक है, मिलते हैं, ओके.’ फिर आलोक उत्साहित हो कर सुरभि से बोला, ‘‘परसों संडे को अपनी मंडली यहीं घर में लंच करेगी. पूरा महीना हो गया सब से मिले हुए. चलो, कल भी छुट्टी है, कल ही डिस्कस करेंगे कि क्याक्या बनाना है.’’ आलोक स्वभाव से शांत और मृदुभाषी था. वह सुरभि का भी खयाल रखता था. पर उस की एक कमजोरी यह भी थी कि वह अपने दोस्तों के बिना नहीं रह सकता था. पर सुरभि उन के दोस्तों से घुलमिल नहीं पा रही थी.सुरभि का मन बुझ गया, पर फिर भी ‘‘हां, ठीक है, कल डिस्कस करेंगे,’’ कह कर वह सोने के लिए लेट गई. पर हमेशा की तरह आलोक की बात से उस की नींद उड़ गई थी.
क्या करे वह, क्यों वह आलोक के बचपन के ग्रु्रप में सहज नहीं रह पाती. पर किस से कहे और क्या कहे.आलोक से विवाह हुए एक साल ही तो हुआ था. आलोक और सुरभि मुंबई के गौरीपड़ा इलाके में शादी के बाद एक अपार्टमैंट में रहने आ गए थे. मेरठ से मुंबई आने पर आलोक के दोस्तों के इस गु्रप ने ही तो उस की गृहस्थी जमाने में मदद की थी. विवाह के एक महीने बाद ही तो आलोक का मुंबई ट्रांसफर हो गया था. सुरभि के मातापिता ने ही आलोक को पसंद किया था. आलोक के स्वभाव, व्यवहार पर सुरभि को अपनी पसंद पर गर्व ही हुआ था. सुरभि ने अच्छीखासी शिक्षा ले रखी थी. वह समय के साथ आधुनिक तो दिखती थी लेकिन धर्म के मामले में असहज हो जाया करती थी. जिस कारण वह दूसरों से ज्यादा घुलनामिलना पसंद नहीं करती थी.सुरभि अपने वैवाहिक जीवन से पूरी तरह खुश थी, पर आलोक की इन दोस्तों ने उस का चैन लूट रखा था. बचपन से ले कर आज तक आलोक के ये तीनों दोस्त एक परिवार की तरह ही रहते आए थे. सब एकएक कर के मुंबई आ गए थे. चारों एक ही सोसायटी में अलगअलग बिल्डिंग में रहते थे. सुयश और मेघा, विपिन और रिया, टोनी और जेनिस, सब जब उस के विवाह में आए थे.
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, सब की मस्ती देखते ही बनती थी. इन की मस्ती, शरारतों से दोनों के घर वाले आनंद उठाते रह गए थे. उस समय तो सुरभि ने ध्यान नहीं दिया था, पर यहां आने के कुछ दिनों बाद ही उसे सब की दोस्ती बोझ लगने लगी थी.सब से बड़ी बात जो थी वह यह कि सुरभि के कट्टरपंथी मातापिता ने उस के दिल में धर्मांधता कूटकूट कर भरी थी. उसे टोनी और जेनिस के घर जा कर खानापीना या उन का अपने घर खानापीना बिलकुल नहीं सुहाता था. पर मजबूर थी. इस चौकड़ी को तो धर्मजाति से बिलकुल मतलब ही नहीं था.मेघा और रिया कामकाजी थीं. दोनों सुरभि की उम्र की ही थीं. दोनों बड़ी खुशमिजाज थीं. आज में जीती थीं. घर और बाहर के काम में निपुण थीं. जेनिस सुरभि की तरह हाउसवाइफ थी. लेकिन उस की स्मार्टनैस भी मेघा और रिया से कम नहीं थी. अकसर लौंग स्कर्ट पहनती थी जो उस पर बहुत फबती थी. हर 15 दिनों में सब किसी एक के घर लंच या डिनर जरूर करते थे. अभी सिर्फ मेघा की ही 4 साल की बेटी चारू थी. मेघा टीचर थी. उस ने चारू का ऐडमिशन अपने स्कूल में ही करवा दिया था. सुरभि स्वभाव से अंतर्मुखी थी ही, टोनी और जेनिस के कारण इस गु्रप में अपनेआप को बिलकुल अनफिट पाती थी. अब तो उसे इस मंडली से छुटकारा दूरदूर तक मिलता नहीं दिख रहा था.वह शुरूशुरू में काफी चुप रही तो सुयश ने पूछ भी लिया था, ‘सुरभि, यह चौकड़ी पसंद नहीं आई क्या?’ सुरभि झेंप गई थी, ‘नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं है. आप सब तो बहुत अच्छे हैं.’ आलोक ने भी कई बार उस का उखड़ापन नोट किया था, पूछा भी था,
‘सुरभि, तुम इन लोगों के आने पर इतना सीरियस क्यों हो जाती हो?’‘नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं है.’‘कुछ तो है, बताओ.’‘शायद मेरा स्वभाव ही कुछ ऐसा है,’ सुरभि ने कह तो दिया था पर आलोक के चेहरे पर तनाव छा गया था. वह वहां से उठ कर चला गया था.दोस्तों के लिए उस के मन में एक अलग ही जगह थी. सुरभि का उन को ले कर रूखापन उसे कुछ अच्छा न लगा.उस के बाद जब भी सब के इकट्ठे होने की बात हुई, आलोक ने बहाना कर दिया कि वह बहुत व्यस्त है. सुरभि को आत्मग्लानि तो हुई, फिर उस ने स्वयं को समझा लिया कि ठीक है, सब को थोड़े दिनों में आदत हो जाएगी. उसे इतनी भीड़ के साथ नहीं रहना है. इस के बाद आलोक उसे कई बार उदास और गंभीर लगा तो सुरभि को दुख तो हुआ पर बोली कुछ नहीं. उस ने सोचा, एकदम से यह सब बंद नहीं होगा, टाइम लगेगा.वह आलोक के सामने टोनी और जेनिस के प्रति अपनी भावनाएं भी स्पष्ट नहीं करना चाह रही थी, इसलिए उस ने बहुत सोचसमझ कर आलोक से सब को बुलाने के लिए हां कह दी थी. आलोक ने सब को मिलने के लिए फोन कर दिया था. अब चौकड़ी उस के घर जमने वाली थी. फिर टोनी और जेनिस के बारे में खयाल आया. सुरभि की तो नींद ही उड़ गई थी. टोनी और जेनिस ईसाई दंपती थे और आलोक के सब से खास मित्रों में से एक. उन के लिए धर्म महज सांस्कृतिक चोगा था जिसे बस पहना ही जा सकता है. उसे आत्मसात कर लीन होने की जरूरत उन्हें कभी महसूस नहीं हुई.अगले दिन सवेरे ही आलोक नाश्ते के बाद उत्साह से सुरभि के साथ बैठ कर संडे का मैन्यू बनाने लगा. सुरभि भी झूठा उत्साह दिखाती रही. वह नहीं चाहती थी कि आलोक का मूड खराब हो.संडे को सब 12 बजे आ गए, चारू तो अपने खिलौने ही उठा लाई थी. जिस का जहां मन किया, बैठ गया. किसी को कोई फौर्मेलिटी आती ही नहीं थी. सब मस्त और खुशमिजाज थे. मेघा और रिया किचन में सुरभि के साथ व्यस्त हो गईं. टोनी और जेनिस चर्च गए हुए थे. वे थोड़ी देर बाद आने वाले थे. सुरभि उन्हें अनुपस्थित देख कर मन ही मन खुश हुई थी. पर जब उसे पता चला कि वे थोड़ी देर बाद आएंगे, उस का मूड खराब हो गया. उस के संस्कार, उस की परवरिश, आलोक के क्रिश्चियन दोस्तों से घुलनेमिलने में दीवार बन कर खड़े थे. वह उन्हें देख कर कुढ़ती ही रहती थी.
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वे दोनों जब आए, तब सब ने खाना खाया. दोनों सुरभि की आंखों में खटकते रहे, पर वह आलोक की खुशी के आगे मजबूर थी. दीवाली की छुट्टियों में सुयश और मेघा, विपिन और रिया दिल्ली जाने की तैयारी कर रहे थे. आलोक को औफिस का जरूरी काम था. सो, वे दोनों दीवाली पर मुंबई में ही थे. दीवाली की शाम सब लोग मिल कर नीचे पटाखे छोड़ते थे. दीवाली की शाम बच्चों का हर तरफ शोर था. शाम को ही टोनी और जेनिस भी उन के घर आ गए थे. सुरभि का फ्लैट तीसरी फ्लोर पर था. बच्चे खूब धमाचौकड़ी कर रहे थे. जैसे ही आलोक सीढि़यों से नीचे उतर रहा था, ऊपर से बच्चे भागते हुए उतरे. उन में से ही किसी का भागते हुए आलोक को तेज धक्का लगा. जब तक वह खुद को संभालता तब तक उस का संतुलन बिगड़ गया. कई सीढि़यों से लुढ़कता हुआ वह काफी नीचे तक गिर गया. सिर फट गया, खून की धारा बह चली और पैर के तेज दर्द से वह कराह उठा. उस के पीछे ही टोनी, जेनिस और सुरभि उतर रहे थे.सुरभि की चीख निकल गई. आलोक खून से लथपथ हो गया. सुरभि घबरा गई. पलभर की देर किए बिना टोनी ने आलोक को बांहों में उठाया और तेज आवाज में बोला, ‘‘जेनिस, जल्दी से कार निकालो, भागो.’’जेनिस 2-2 सीढि़यां एकसाथ कूदती हुई भागी. आलोक का दर्द से बुरा हाल था. बांहों में आलोक को उठाए हुए टोनी ने सुरभि से कहा, ‘‘सुरभि, जल्दी गाड़ी में बैठो, हौस्पिटल चल रहे हैं.’’ पीछे की सीट पर आलोक को लिटा कर टोनी ने ड्राइविंग सीट संभाली और गाड़ी दौड़ा दी. सुरभि के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.
यह क्या हो गया, वह तो यहां किसी को जानती भी नहीं. क्या करेगी अकेली. आलोक के सिर पर चोट गहरी थी. 8 टांके लगे थे. पैर में भी फ्रैक्चर था, यह जान कर सुरभि का तो सिर ही चकरा गया. अब आलोक क्या करेगा.पैर पर प्लास्टर चढ़ गया था. डाक्टर ने 2 दिनों बाद डै्रसिंग के लिए बुलाया था.सुरभि तो खाली हाथ ही हौस्पिटल भाग आई थी. पेमैंट के समय उस ने खुद को बहुत असहज महसूस किया. टोनी ही सब कर रहा था. टोनी ने ही सहारा दे कर आलोक को गाड़ी में बिठाया और सब घर आ गए.जेनिस ने बहुत ही स्नेहपूर्वक सुरभि का कंधा थपथपाया, ‘‘चिंता मत करो, सुरभि, सब ठीक है.’’ रात काफी हो गई थी, हर तरफ दीवाली की धूमधाम थी. जो डिनर सुरभि ने बनाया था, सब रखा था. टोनी ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘बहुत तेज भूख लगी है, सुरभि, कुछ खाने को मिलेगा?’’सुरभि झट से सब के लिए खाना लगाने लगी. टोनी ने फिर आलोक को छेड़ा, ‘‘बड़े भारी हो गए हो यार, तुम्हें उठा कर लानेलेजाने में हालत खराब हो गई.’’ आलोक को हंसतेबोलते देख सुरभि की जान में जान आई. आलोक को अपने हाथ से खिला कर सुरभि ने टोनी और जेनिस के साथ ही थोड़ाबहुत खाया. रात एक बजे के करीब आलोक के सोने के बाद ही टोनी और जेनिस घर गए. सुरभि पूरी घटना को सोचते हुए रातभर सोतीजागती रही. अगले दिन सुबह 7 बजे ही टोनी आ गया. आलोक को सहारा दे कर बाथरूम तक ले गया. आलोक से कुछ नंबर ले कर आलोक के औफिस में कुछ लोगों को इस दुर्घटना के बारे में बता दिया. थोड़ी देर में जेनिस सब के लिए सैंडविच बना कर ले आई, बोली, ‘‘लो सुरभि, तुम रातभर ठीक से सो नहीं पाई होगी. सब यहीं साथ खा लेंगे.’’नाश्ता करते हुए टोनी ने कहा, ‘‘मैं ने आज की छुट्टी ले ली है आलोक. सेवा करवा लो बच्चू. सब को बताऊंगा कैसे तुम ने हमारी दीवाली की शाम खराब की है, उन लोगों को भी आने दो लौट कर.’’ आलोक जोर से हंस पड़ा, सुरभि को अच्छा लगा.सुयश और विपिन को भी टोनी ने फोन पर बता दिया था. उन लोगों के फोन आते रहे. आलोक ने अपने घर बताने के लिए मना कर दिया था क्योंकि उस की मम्मी की तबीयत कुछ खराब चल रही थी, वे परेशान ही होतीं. आलोक के कपड़े बदलने में टोनी ने ही उस की मदद की. लंच जेनिस ने सुरभि के साथ मिल कर ही बना लिया. फिर आलोक ने ही जबरदस्ती दोनों को आराम करने के लिए भेज दिया. दवाइयों के असर से आलोक की आंख लग गई थी.6 बजे टोनी फिर आ गया, ‘‘सुरभि, शाम को आलोक के कलीग्स उसे देखने जरूर आएंगे. तुम व्यस्त रहोगी. इसलिए जेनिस ही डिनर बना कर लाएगी.’’सुरभि सोचती रह गई कि इन दोनों को बिना कुछ कहेसुने एकदूसरे के सुखदुख का एहसास कैसे हो जाता है. शाम को यही तो हुआ. आलोक के कलीग्स और कुछ पड़ोसी आतेजाते रहे. सुरभि पूरी शाम सब के चायनाश्ते में ही व्यस्त रही. उसे बहुत थकान भी हो गई थी. 9 बजे सब के जाने के बाद चारों ने जेनिस का लाया हुआ शानदार डिनर किया. पूरा खाना आलोक की पसंद का था.
सुरभि यह देख कर मुसकरा दी.रात को आलोक के सोने के बाद उस के बराबर में लेटी सुरभि के मन में तो नए विचारों ने हलचल मचा रखी थी. कल से अब तक एक बार भी सुरभि के दिल में टोनी और जेनिस का दूसरे धर्म का होने का विचार भी नहीं आया था. वह तो पूरी तरह से दोनों के स्नेह में आकंठ डूबी हुई थी. यह क्या किया उस के मातापिता ने, क्यों उस की इतनी कट्टरपंथी सोच के साथ परवरिश की कि धर्म का कांटा उस के दिल में ऐसे चुभता रहा और वह इतने प्यारे दोस्तों से कभी खुल कर मिल नहीं पाई. कितने दिन उस ने इस सोच पर खराब कर दिए. आलोक का भी दिल दुखाया. वह स्वयं सुशिक्षित थी, उस ने क्यों आंखें बंद कर अपने मातापिता की पुरातनपंथी सोच का अनुसरण किया. उसे अपनी सोच पर आत्मग्लानि होती रही. सुबह का उजाला सुरभि के मन में बहुत सा स्नेह, सम्मान, अपनापन ले कर आया. वह फ्रैश हो कर बैठी ही थी कि आलोक भी उठ गया. आलोक उस के कंधे का सहारा ले कर बाथरूम तक गया. 8 बजे के आसपास टोनी और जेनिस भी आ गए. जेनिस ने एक टिफिन सुरभि को देते हुए कहा, ‘‘तुम बस चाय बना लो, पोहा बना कर ले आई हूं.’’आलोक को पोहा इतना पसंद था कि वह इसे रोज खा सकता था. सब एकदूसरे की पसंद कितनी अच्छी तरह जानते हैं, यह देख कर सुरभि को मन ही मन हंसी आ गई.नाश्ता करते हुए टोनी ने कहा, ‘‘जेनिस, यह गलत बात है, इस के ठीक होने तक क्या इसी की पसंद की चीजें खानी पड़ेंगी?’’ जेनिस ने भी शरारत से जवाब दिया, ‘‘हां, सही समझे.’’ टोनी ने फिर पूछा, ‘‘आलोक, छुट्टी ले लूं या औफिस चला जाऊं?’’ जवाब सुरभि ने दिया, ‘‘छुट्टी ही ले लो आप, दिन में साथ बैठेंगे, खाएंगेपीएंगे, ताश खेलेंगे, क्यों जेनिस?’’ जेनिस मुसकरा दी. सुरभि का यह अपनापन शायद जेनिस के दिल को छू गया था.आलोक ने हैरानी से सुरभि को देखा, सुरभि मुसकरा दी तो आलोक के चेहरे पर एक अलग ही चमक आई जिसे सिर्फ सुरभि ने महसूस किया था.
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रात को साढ़े 10 बजे जब आलोक का मोबाइल बजा, सुरभि चौंकी, बोली, ‘‘इस समय कौन है?’’ तब तक ‘हैलो’ कहते हुए आलोक बात करना शुरू कर चुका था. आलोक की एकतरफा बात ही सुरभि के कानों में पड़ रही थी, ‘हां, हां, एकदम बढि़या, ठीक रहेगा, आ जाओ सब, बोल दो सबको, ठीक है, मिलते हैं, ओके.’ फिर आलोक उत्साहित हो कर सुरभि से बोला, ‘‘परसों संडे को अपनी मंडली यहीं घर में लंच करेगी. पूरा महीना हो गया सब से मिले हुए. चलो, कल भी छुट्टी है, कल ही डिस्कस करेंगे कि क्याक्या बनाना है.’’ आलोक स्वभाव से शांत और मृदुभाषी था. वह सुरभि का भी खयाल रखता था. पर उस की एक कमजोरी यह भी थी कि वह अपने दोस्तों के बिना नहीं रह सकता था. पर सुरभि उन के दोस्तों से घुलमिल नहीं पा रही थी.सुरभि का मन बुझ गया, पर फिर भी ‘‘हां, ठीक है, कल डिस्कस करेंगे,’’ कह कर वह सोने के लिए लेट गई. पर हमेशा की तरह आलोक की बात से उस की नींद उड़ गई थी.
क्या करे वह, क्यों वह आलोक के बचपन के ग्रु्रप में सहज नहीं रह पाती. पर किस से कहे और क्या कहे.आलोक से विवाह हुए एक साल ही तो हुआ था. आलोक और सुरभि मुंबई के गौरीपड़ा इलाके में शादी के बाद एक अपार्टमैंट में रहने आ गए थे. मेरठ से मुंबई आने पर आलोक के दोस्तों के इस गु्रप ने ही तो उस की गृहस्थी जमाने में मदद की थी. विवाह के एक महीने बाद ही तो आलोक का मुंबई ट्रांसफर हो गया था. सुरभि के मातापिता ने ही आलोक को पसंद किया था. आलोक के स्वभाव, व्यवहार पर सुरभि को अपनी पसंद पर गर्व ही हुआ था. सुरभि ने अच्छीखासी शिक्षा ले रखी थी. वह समय के साथ आधुनिक तो दिखती थी लेकिन धर्म के मामले में असहज हो जाया करती थी. जिस कारण वह दूसरों से ज्यादा घुलनामिलना पसंद नहीं करती थी.सुरभि अपने वैवाहिक जीवन से पूरी तरह खुश थी, पर आलोक की इन दोस्तों ने उस का चैन लूट रखा था. बचपन से ले कर आज तक आलोक के ये तीनों दोस्त एक परिवार की तरह ही रहते आए थे. सब एकएक कर के मुंबई आ गए थे. चारों एक ही सोसायटी में अलगअलग बिल्डिंग में रहते थे. सुयश और मेघा, विपिन और रिया, टोनी और जेनिस, सब जब उस के विवाह में आए थे.
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, सब की मस्ती देखते ही बनती थी. इन की मस्ती, शरारतों से दोनों के घर वाले आनंद उठाते रह गए थे. उस समय तो सुरभि ने ध्यान नहीं दिया था, पर यहां आने के कुछ दिनों बाद ही उसे सब की दोस्ती बोझ लगने लगी थी.सब से बड़ी बात जो थी वह यह कि सुरभि के कट्टरपंथी मातापिता ने उस के दिल में धर्मांधता कूटकूट कर भरी थी. उसे टोनी और जेनिस के घर जा कर खानापीना या उन का अपने घर खानापीना बिलकुल नहीं सुहाता था. पर मजबूर थी. इस चौकड़ी को तो धर्मजाति से बिलकुल मतलब ही नहीं था.मेघा और रिया कामकाजी थीं. दोनों सुरभि की उम्र की ही थीं. दोनों बड़ी खुशमिजाज थीं. आज में जीती थीं. घर और बाहर के काम में निपुण थीं. जेनिस सुरभि की तरह हाउसवाइफ थी. लेकिन उस की स्मार्टनैस भी मेघा और रिया से कम नहीं थी. अकसर लौंग स्कर्ट पहनती थी जो उस पर बहुत फबती थी. हर 15 दिनों में सब किसी एक के घर लंच या डिनर जरूर करते थे. अभी सिर्फ मेघा की ही 4 साल की बेटी चारू थी. मेघा टीचर थी. उस ने चारू का ऐडमिशन अपने स्कूल में ही करवा दिया था. सुरभि स्वभाव से अंतर्मुखी थी ही, टोनी और जेनिस के कारण इस गु्रप में अपनेआप को बिलकुल अनफिट पाती थी. अब तो उसे इस मंडली से छुटकारा दूरदूर तक मिलता नहीं दिख रहा था.वह शुरूशुरू में काफी चुप रही तो सुयश ने पूछ भी लिया था, ‘सुरभि, यह चौकड़ी पसंद नहीं आई क्या?’ सुरभि झेंप गई थी, ‘नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं है. आप सब तो बहुत अच्छे हैं.’ आलोक ने भी कई बार उस का उखड़ापन नोट किया था, पूछा भी था,
‘सुरभि, तुम इन लोगों के आने पर इतना सीरियस क्यों हो जाती हो?’‘नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं है.’‘कुछ तो है, बताओ.’‘शायद मेरा स्वभाव ही कुछ ऐसा है,’ सुरभि ने कह तो दिया था पर आलोक के चेहरे पर तनाव छा गया था. वह वहां से उठ कर चला गया था.दोस्तों के लिए उस के मन में एक अलग ही जगह थी. सुरभि का उन को ले कर रूखापन उसे कुछ अच्छा न लगा.उस के बाद जब भी सब के इकट्ठे होने की बात हुई, आलोक ने बहाना कर दिया कि वह बहुत व्यस्त है. सुरभि को आत्मग्लानि तो हुई, फिर उस ने स्वयं को समझा लिया कि ठीक है, सब को थोड़े दिनों में आदत हो जाएगी. उसे इतनी भीड़ के साथ नहीं रहना है. इस के बाद आलोक उसे कई बार उदास और गंभीर लगा तो सुरभि को दुख तो हुआ पर बोली कुछ नहीं. उस ने सोचा, एकदम से यह सब बंद नहीं होगा, टाइम लगेगा.वह आलोक के सामने टोनी और जेनिस के प्रति अपनी भावनाएं भी स्पष्ट नहीं करना चाह रही थी, इसलिए उस ने बहुत सोचसमझ कर आलोक से सब को बुलाने के लिए हां कह दी थी. आलोक ने सब को मिलने के लिए फोन कर दिया था. अब चौकड़ी उस के घर जमने वाली थी. फिर टोनी और जेनिस के बारे में खयाल आया. सुरभि की तो नींद ही उड़ गई थी. टोनी और जेनिस ईसाई दंपती थे और आलोक के सब से खास मित्रों में से एक. उन के लिए धर्म महज सांस्कृतिक चोगा था जिसे बस पहना ही जा सकता है. उसे आत्मसात कर लीन होने की जरूरत उन्हें कभी महसूस नहीं हुई.अगले दिन सवेरे ही आलोक नाश्ते के बाद उत्साह से सुरभि के साथ बैठ कर संडे का मैन्यू बनाने लगा. सुरभि भी झूठा उत्साह दिखाती रही. वह नहीं चाहती थी कि आलोक का मूड खराब हो.संडे को सब 12 बजे आ गए, चारू तो अपने खिलौने ही उठा लाई थी. जिस का जहां मन किया, बैठ गया. किसी को कोई फौर्मेलिटी आती ही नहीं थी. सब मस्त और खुशमिजाज थे. मेघा और रिया किचन में सुरभि के साथ व्यस्त हो गईं. टोनी और जेनिस चर्च गए हुए थे. वे थोड़ी देर बाद आने वाले थे. सुरभि उन्हें अनुपस्थित देख कर मन ही मन खुश हुई थी. पर जब उसे पता चला कि वे थोड़ी देर बाद आएंगे, उस का मूड खराब हो गया. उस के संस्कार, उस की परवरिश, आलोक के क्रिश्चियन दोस्तों से घुलनेमिलने में दीवार बन कर खड़े थे. वह उन्हें देख कर कुढ़ती ही रहती थी.
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वे दोनों जब आए, तब सब ने खाना खाया. दोनों सुरभि की आंखों में खटकते रहे, पर वह आलोक की खुशी के आगे मजबूर थी. दीवाली की छुट्टियों में सुयश और मेघा, विपिन और रिया दिल्ली जाने की तैयारी कर रहे थे. आलोक को औफिस का जरूरी काम था. सो, वे दोनों दीवाली पर मुंबई में ही थे. दीवाली की शाम सब लोग मिल कर नीचे पटाखे छोड़ते थे. दीवाली की शाम बच्चों का हर तरफ शोर था. शाम को ही टोनी और जेनिस भी उन के घर आ गए थे. सुरभि का फ्लैट तीसरी फ्लोर पर था. बच्चे खूब धमाचौकड़ी कर रहे थे. जैसे ही आलोक सीढि़यों से नीचे उतर रहा था, ऊपर से बच्चे भागते हुए उतरे. उन में से ही किसी का भागते हुए आलोक को तेज धक्का लगा. जब तक वह खुद को संभालता तब तक उस का संतुलन बिगड़ गया. कई सीढि़यों से लुढ़कता हुआ वह काफी नीचे तक गिर गया. सिर फट गया, खून की धारा बह चली और पैर के तेज दर्द से वह कराह उठा. उस के पीछे ही टोनी, जेनिस और सुरभि उतर रहे थे.सुरभि की चीख निकल गई. आलोक खून से लथपथ हो गया. सुरभि घबरा गई. पलभर की देर किए बिना टोनी ने आलोक को बांहों में उठाया और तेज आवाज में बोला, ‘‘जेनिस, जल्दी से कार निकालो, भागो.’’जेनिस 2-2 सीढि़यां एकसाथ कूदती हुई भागी. आलोक का दर्द से बुरा हाल था. बांहों में आलोक को उठाए हुए टोनी ने सुरभि से कहा, ‘‘सुरभि, जल्दी गाड़ी में बैठो, हौस्पिटल चल रहे हैं.’’ पीछे की सीट पर आलोक को लिटा कर टोनी ने ड्राइविंग सीट संभाली और गाड़ी दौड़ा दी. सुरभि के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.
यह क्या हो गया, वह तो यहां किसी को जानती भी नहीं. क्या करेगी अकेली. आलोक के सिर पर चोट गहरी थी. 8 टांके लगे थे. पैर में भी फ्रैक्चर था, यह जान कर सुरभि का तो सिर ही चकरा गया. अब आलोक क्या करेगा.पैर पर प्लास्टर चढ़ गया था. डाक्टर ने 2 दिनों बाद डै्रसिंग के लिए बुलाया था.सुरभि तो खाली हाथ ही हौस्पिटल भाग आई थी. पेमैंट के समय उस ने खुद को बहुत असहज महसूस किया. टोनी ही सब कर रहा था. टोनी ने ही सहारा दे कर आलोक को गाड़ी में बिठाया और सब घर आ गए.जेनिस ने बहुत ही स्नेहपूर्वक सुरभि का कंधा थपथपाया, ‘‘चिंता मत करो, सुरभि, सब ठीक है.’’ रात काफी हो गई थी, हर तरफ दीवाली की धूमधाम थी. जो डिनर सुरभि ने बनाया था, सब रखा था. टोनी ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘बहुत तेज भूख लगी है, सुरभि, कुछ खाने को मिलेगा?’’सुरभि झट से सब के लिए खाना लगाने लगी. टोनी ने फिर आलोक को छेड़ा, ‘‘बड़े भारी हो गए हो यार, तुम्हें उठा कर लानेलेजाने में हालत खराब हो गई.’’ आलोक को हंसतेबोलते देख सुरभि की जान में जान आई. आलोक को अपने हाथ से खिला कर सुरभि ने टोनी और जेनिस के साथ ही थोड़ाबहुत खाया. रात एक बजे के करीब आलोक के सोने के बाद ही टोनी और जेनिस घर गए. सुरभि पूरी घटना को सोचते हुए रातभर सोतीजागती रही. अगले दिन सुबह 7 बजे ही टोनी आ गया. आलोक को सहारा दे कर बाथरूम तक ले गया. आलोक से कुछ नंबर ले कर आलोक के औफिस में कुछ लोगों को इस दुर्घटना के बारे में बता दिया. थोड़ी देर में जेनिस सब के लिए सैंडविच बना कर ले आई, बोली, ‘‘लो सुरभि, तुम रातभर ठीक से सो नहीं पाई होगी. सब यहीं साथ खा लेंगे.’’नाश्ता करते हुए टोनी ने कहा, ‘‘मैं ने आज की छुट्टी ले ली है आलोक. सेवा करवा लो बच्चू. सब को बताऊंगा कैसे तुम ने हमारी दीवाली की शाम खराब की है, उन लोगों को भी आने दो लौट कर.’’ आलोक जोर से हंस पड़ा, सुरभि को अच्छा लगा.सुयश और विपिन को भी टोनी ने फोन पर बता दिया था. उन लोगों के फोन आते रहे. आलोक ने अपने घर बताने के लिए मना कर दिया था क्योंकि उस की मम्मी की तबीयत कुछ खराब चल रही थी, वे परेशान ही होतीं. आलोक के कपड़े बदलने में टोनी ने ही उस की मदद की. लंच जेनिस ने सुरभि के साथ मिल कर ही बना लिया. फिर आलोक ने ही जबरदस्ती दोनों को आराम करने के लिए भेज दिया. दवाइयों के असर से आलोक की आंख लग गई थी.6 बजे टोनी फिर आ गया, ‘‘सुरभि, शाम को आलोक के कलीग्स उसे देखने जरूर आएंगे. तुम व्यस्त रहोगी. इसलिए जेनिस ही डिनर बना कर लाएगी.’’सुरभि सोचती रह गई कि इन दोनों को बिना कुछ कहेसुने एकदूसरे के सुखदुख का एहसास कैसे हो जाता है. शाम को यही तो हुआ. आलोक के कलीग्स और कुछ पड़ोसी आतेजाते रहे. सुरभि पूरी शाम सब के चायनाश्ते में ही व्यस्त रही. उसे बहुत थकान भी हो गई थी. 9 बजे सब के जाने के बाद चारों ने जेनिस का लाया हुआ शानदार डिनर किया. पूरा खाना आलोक की पसंद का था.
सुरभि यह देख कर मुसकरा दी.रात को आलोक के सोने के बाद उस के बराबर में लेटी सुरभि के मन में तो नए विचारों ने हलचल मचा रखी थी. कल से अब तक एक बार भी सुरभि के दिल में टोनी और जेनिस का दूसरे धर्म का होने का विचार भी नहीं आया था. वह तो पूरी तरह से दोनों के स्नेह में आकंठ डूबी हुई थी. यह क्या किया उस के मातापिता ने, क्यों उस की इतनी कट्टरपंथी सोच के साथ परवरिश की कि धर्म का कांटा उस के दिल में ऐसे चुभता रहा और वह इतने प्यारे दोस्तों से कभी खुल कर मिल नहीं पाई. कितने दिन उस ने इस सोच पर खराब कर दिए. आलोक का भी दिल दुखाया. वह स्वयं सुशिक्षित थी, उस ने क्यों आंखें बंद कर अपने मातापिता की पुरातनपंथी सोच का अनुसरण किया. उसे अपनी सोच पर आत्मग्लानि होती रही. सुबह का उजाला सुरभि के मन में बहुत सा स्नेह, सम्मान, अपनापन ले कर आया. वह फ्रैश हो कर बैठी ही थी कि आलोक भी उठ गया. आलोक उस के कंधे का सहारा ले कर बाथरूम तक गया. 8 बजे के आसपास टोनी और जेनिस भी आ गए. जेनिस ने एक टिफिन सुरभि को देते हुए कहा, ‘‘तुम बस चाय बना लो, पोहा बना कर ले आई हूं.’’आलोक को पोहा इतना पसंद था कि वह इसे रोज खा सकता था. सब एकदूसरे की पसंद कितनी अच्छी तरह जानते हैं, यह देख कर सुरभि को मन ही मन हंसी आ गई.नाश्ता करते हुए टोनी ने कहा, ‘‘जेनिस, यह गलत बात है, इस के ठीक होने तक क्या इसी की पसंद की चीजें खानी पड़ेंगी?’’ जेनिस ने भी शरारत से जवाब दिया, ‘‘हां, सही समझे.’’ टोनी ने फिर पूछा, ‘‘आलोक, छुट्टी ले लूं या औफिस चला जाऊं?’’ जवाब सुरभि ने दिया, ‘‘छुट्टी ही ले लो आप, दिन में साथ बैठेंगे, खाएंगेपीएंगे, ताश खेलेंगे, क्यों जेनिस?’’ जेनिस मुसकरा दी. सुरभि का यह अपनापन शायद जेनिस के दिल को छू गया था.आलोक ने हैरानी से सुरभि को देखा, सुरभि मुसकरा दी तो आलोक के चेहरे पर एक अलग ही चमक आई जिसे सिर्फ सुरभि ने महसूस किया था.
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May 01, 2020 at 10:00AM