Sunday, 1 March 2020

Ghost story of bloody mary in hindi

Ghost story of bloody mary in hindi

story of bloody mary in hindi, ब्लडी मैरी ने उस लड़के को देख लिया था, जो उससे डर के भाग रहा था अब उस लड़के को ब्लडी मैरी अपने साथ ले जाना चाहती थी, वह लड़का एक बड़े से पाइप के अंदर बैठा था उस समय अँधेरा बहुत था जब अँधेरा होता है

सपने में ब्लडी मैरी की कहानी : Ghost story of bloody mary in hindi

bloody mary.jpg
story of bloody mary

story of bloody mary in hindi, तो ब्लडी मैरी बहुत ज्यादा शक्तिशाली हो जाती है ब्लडी मैरी उस लड़के की और धीरे-धीरे बढ़ रही थी, लड़के को अब लग रहा था की अब उसका बचना बहुत मुश्किल है, but यह क्या हुआ अचानक ही बदल हठ गए थे, रौशनी की किरण चारो और फेल गयी थी ब्लडी मैरी अब पूरी तरह से डर चुकी थी उसको धूप बिलकुल भी बर्दाश नहीं है इसलिए वह अचानक ही गायब हो चुकी थी,

एक पुराना किला

लड़का काफी डरा हुआ लग रहा था, धूप को देख लड़का अपने घर की और भागा अब उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, वह अपने घर जल्दी ही पहुंचना चाह रहा था, पर किस्मत न जाने क्या खेल खेल रही थी, फिर से बदल आ गए थे, डरा हुआ लड़का और भी ज्यादा डरने लगा था,

दहशत की एक रात कहानी

कुछ पल में रौशनी फिर से चली गयी थी अब डर का साया उसके सामने आ खड़ा हुआ जिससे वह भाग रहा था वो उसके सामने थी ब्लडी मैरी ने उसे पकड़ लिया था, अब बचने का कोई रास्ता नहीं था ब्लडी मैरी उसकी और भढने लगी, लड़का अब कुछ भी नहीं कर पा रहा था, तभी अचानक ही उसकी नींद खुल गयी और उसे लगा की यह सपना था मुझे अब डरने की ज़रूरत नहीं है,      

वो सुनसान रास्ता

ये बात यही पर खत्म नहीं होती है क्योकि ब्लडी मैरी का राज तो सपनो पर भी है लड़के को केवल सपना आया था लेकिन असल बात यह है की सपने आने के बाद ही सब शुरू होता है, लड़के ने अपनी आँखे खोली ही थी की ब्लडी मैरी उसका इंतज़ार खिड़की के बाहर कर रही थी, जब उसकी नज़र ब्लडी मैरी पर गयी तो अब वह पूरी तरह से पसीने में भीग चुका था, जिसे वह सपना सोच रहा था वो उसके सामने हक्कीकत में थी,

डरावनी रात एक कहानी

story of bloody mary in hindi, ब्लडी मैरी से बचना अब मुश्किल था तभी उसने अपने माता-पिता को आवाज लगायी तब तक ब्लडी मैरी वहा से जा चुकी थी, लड़को को वह कभी गेट के बाहर दिखाई देती और कभी खिड़की पर, उसे इस डर के साये में जीना ही पढ़ रहा था ब्लडी मैरी एक बार आ जाये तो उससे बचना बहुत मुश्किल होता है,

 

ब्लडी मैरी का सपना हिंदी कहानी

ब्लडी मैरी उसे सपने में नज़र आ रही थी, but जब उस लड़के की आंखे खुली तो कोई भी ब्लडी मैरी नहीं थी but वह बहुत अधिक डर गया था की Because उसे लगता था की वह ब्लडी मैरी नज़र आ गयी है but वह सोचता है की ब्लडी मैरी का सपना मुझे आया था इसलिए यह सपना हो सकता है वह बाहर नहीं आएगी, वह सोने की कोशिश करता है but उसे कोई आवाज आती है, यह आवाज किसकी हो सकती है,

अनहोनी एक कहानी

वह खिड़की की और देखता है खिड़की उसकी बंद थी, but वह ब्लडी मैरी उसे खिड़की के बाहर नज़र आती है वह डर जाता है Because वह तो सपने में उसे देख रहा था यह सपना सच कैसे हो सकता है उसे समझ नहीं आ रहा था वह सोचता है की यह मुझ पर हमला कर सकती है, वह बहुत अधिक डर जाता है वह अपनी माता को आवाज लगाता है, कुछ समय बाद माता आती है, वह कहती है, की क्या बात है, वह अपनी माता से कहता है की मुझे ब्लडी मैरी नज़र आयी थी उसकी बात सुनकर वह कहती है की कुछ भी नहीं है,

एक हवैली

but वह ब्लडी मैरी नज़र नहीं आयी थी, वह लड़का सभी को यह बात कहता है but कोई भी यकीन नहीं करता है उस दिन वह खिड़की के पास नज़र आयी थी, but अब कही भी नहीं है, शायद वह इसलिए नज़र आयी थी Because वह उसका सपना देख रहा था, but वह आज भी इस बाद से डरता है, Because वह जानता है की ब्लडी मैरी कुछ भी कर सकती है,

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Friday, 28 February 2020

बड़े ताऊजी

बड़ेबुजुर्ग बैठे हों तो सिर पर एक आसमान जैसी अनुभूति होती है. ताऊजी हमारे लिए वही आसमान थे लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ जिस ने इस खुशफहमी को गलतफहमी में बदल दिया?
रिटायरमैंट के बाद अपने ही जन्मस्थान में जा कर बसने का मेरा अनमोल सपना था. जहां पैदा हुआ, जहां गलियों में खेला व बड़ा हुआ, वह जगह कितनी ही यादों को जिंदा रखे है. कक्षा 12 तक पढ़ने के बाद जो अपना शहर छोड़ा तो बस मुड़ कर देख ही नहीं पाया. नौकरी सारा भारत घुमाती रही और मैं घूमता रहा. जितनी दूर मैं अपने शहर से होता गया उतना ही वह मेरे मन के भीतर कहीं समाता गया. छुट्टियों में जब घर आते तब सब से मिलने जाते रहे. सभी आवभगत करते रहे, प्यार और अपनत्व से मिलते रहे. कितना प्यार है न मेरे शहर में. सब कितने प्यार से मिलते हैं, सुखदुख पूछते हैं. ‘कैसे हो?’ सब के होंठों पर यही प्रश्न होता है.
रिटायरमैंट में सालभर रह गया. बच्चों का ब्याह कर, उन के अपनेअपने स्थानों पर उन्हें भेज कर मैं ने गंभीरता से इस विषय पर विचार किया. लंबी छुट्टी ले कर अपने शहर, अपने रिश्तेदारों के साथ थोड़ाथोड़ा समय बिता कर यह सर्वेक्षण करना चाहा कि रहने के लिए कौन सी जगह उपयुक्त रहेगी, घर बनवाना पड़ेगा या बनाबनाया ही कहीं खरीद लेंगे.
मुझे याद है, पिछली बार जब मैं आया था तब विजय चाचा के साथ छोटे भाई की अनबन चल रही थी. मैं ने सुलह करवा कर अपना कर्तव्य निभा लिया था. छोटी बूआ और बड़ी बूआ भी ठंडा सा व्यवहार कर रही थीं. मगर मेरे साथ सब ने प्यार भरा व्यवहार ही किया था. अच्छा नहीं लगा था तब मुझे चाचाभतीजे का मनमुटाव.
इस बार भी कुछ ऐसा ही लगा तो पत्नी ने समझाया, ‘‘जहां चार बरतन होते हैं तो वे खड़कते ही हैं. मैं तो हर बार देखती हूं. जब भी घर आओ किसी न किसी से किसी न किसी का तनाव चल रहा होता है. 4 साल पहले भी विजय चाचा के परिवार से अबोला चल रहा था.’’
‘‘लेकिन हम तो उन से मिलने गए न. तुम चाची के लिए साड़ी लाई थीं.’’
‘‘तब छोटी का मुंह सूज गया था. मैं ने बताया तो था आप को. साफसाफ तो नहीं मगर इतना इशारा आप के भाई ने भी किया था कि जो उस का रिश्तेदार है वह चाचा से नहीं मिल सकता.’’
‘‘अच्छा? मतलब मेरा अपना व्यवहार, मेरी अपनी बुद्धि गई भाड़ में. जिसे छोटा पसंद नहीं करेगा उसे मुझे भी छोड़ना पड़ेगा.’’
‘‘और इस बार छोटे का परिवार विजय चाचा के साथ तो घीशक्कर जैसा है. लेकिन बड़ी बूआ के साथ नाराज चल रहा है.’’
‘‘वह क्यों?’’
‘‘आप खुद ही देखसुन लीजिए न. मैं अपने मुंह से कुछ कहना नहीं चाहती. कुछ कहा तो आप कहेंगे कि नमकमिर्च लगा कर सुना रही हूं.’’
पत्नी का तुनकना भी सही था. वास्तव में आंखें बंद कर के मैं किसी भी औरत की बात पर विश्वास नहीं करता, वह चाहे मेरी मां ही क्यों न हो. अकसर औरतें ही हर फसाद और कलहक्लेश का बीज रोपती हैं. 10 भाई सालों तक साथसाथ रहते हैं लेकिन 2 औरतें आई नहीं कि सब तितरबितर. मायके में बहनों का आपस में झगड़ा हो जाएगा तो जल्दी ही भूल कर माफ भी कर देंगी और समय पड़ने पर संगसंग हो लेंगी लेकिन ससुराल में भाइयों में अनबन हो जाए तो उस आग में सारी उम्र घी डालने का काम करेंगी. अपनी मां को भी मैं ने अकसर बात घुमाफिरा कर करते देखा है.
नौकरी के सिलसिले में लगभग
100-200 परिवारों की कहानी तो बड़ी नजदीक से देखीसुनी ही है मैं ने. हर घर में वही सब. वही अधिकार का रोना, वही औरत का अपने परिवार को ले कर सदा असुरक्षित रहना. ज्यादा झगड़ा सदा औरतें ही करती हैं.
मेरी पत्नी शुभा यह सब जानती है इसीलिए कभी कोई राय नहीं देती. मेरे यहां घर बना कर सदा के लिए रहने के लिए भी वह तैयार नहीं है. इसीलिए चाहती है लंबा समय यहां टिक कर जरा सी जांचपड़ताल तो करूं कि दूर के ढोल ही सुहावने हैं या वास्तव में यहां पे्रम की पवित्र नदी, जलधारा बहती है. कभीकभी कोई आया और उस से आप ने लाड़प्यार कर लिया, उस का मतलब यह तो नहीं कि लाड़प्यार करना ही उन का चरित्र है. 10-15 मिनट में किसी का मन भला कैसे टटोला जा सकता है. हमारे खानदान के एक ताऊजी हैं जिन से हमारा सामना सदा इस तरह होता रहा है मानो सिर पर उन की छत न होती तो हम अनाथ  ही होते. सारे काम छोड़छाड़ कर हम उन के चरणस्पर्श करने दौड़ते हैं. सब से बड़े हैं, इसलिए छोटीमोटी सलाह भी उन से की जाती है. उम्रदराज हैं इसलिए उन की जानपहचान का लाभ भी अकसर हमें मिलता है. राजनीति में भी उन का खासा दखल है जिस वजह से अकसर परिवार का कोई काम रुक जाता है तो भागेभागे उन्हीं के पास जाते हैं हम, ‘ताऊजी यह, ताऊजी वह.’
हमें अच्छाखासा सहारा लगता है उन का. बड़ेबुजुर्ग बैठे हों तो सिर पर एक आसमान जैसी अनुभूति होती है और वही आसमान हैं वे ताऊजी. हमारे खानदान में वही अब बड़े हैं. उन का नाम हम बड़ी इज्जत, बड़े सम्मान से लेते हैं. छोटा भाई इस बार कुछ ज्यादा ही परेशान लगा. मैं ताऊजी के लिए शाल लाया था उपहार में. शुभा से कहा कि वह शाम को तैयार रहे, उन के घर जाना है. छोटा भाई मुझे यों देखने लगा, मानो उस के कानों में गरम सीसा डाल दिया हो किसी ने. शायद इस बार उन से भी अनबन हो गई हो, क्योंकि हर बार किसी न किसी से उस का झगड़ा होता ही है.
‘‘आप का दिमाग तो ठीक है न भाई साहब. आप ताऊ के घर शाल ले कर जाएंगे? बेहतर है मुझे गोली मार कर मुझ पर इस का कफन डाल दीजिए.’’
स्तब्ध तो रहना ही था मुझे. यह क्या कह रहा है, छोटा. इस तरह क्यों?
‘‘बाहर रहते हैं न आप, आप नहीं जानते यहां घर पर क्याक्या होता है. मैं पागल नहीं हूं जो सब से लड़ता रहता हूं. मुकदमा चल रहा है विजय चाचा का और मेरा ताऊ के साथ. और दोनों बूआ उन का साथ दे रही हैं. सबकुछ है ताऊ के पास. 10 दुकानें हैं, बाजार में 4 कोठियां हैं, ट्रांसपोर्ट कंपनी है, शोरूम हैं. औलाद एक ही है. और कितना चाहिए इंसान को जीने के लिए?’’
‘‘तो? सच है लेकिन उन के पास जो है वह उन का अपना है. इस में हमें कोई जलन नहीं होनी चाहिए.’’
‘‘हमारा जो है उसे तो हमारे पास रहने दें. कोई सरकारी कागज है ताऊ के पास. उसी के बल पर उन्होंने हम पर और विजय चाचा पर मुकदमा ठोंक रखा है कि हम दोनों का घर हमारा नहीं है, उन का है. नीचे से ले कर ऊपर तक हर जगह तो ताऊ का ही दरबार है. हर वकील उन का दोस्त है और हर जज, हर कलैक्टर उन का यार. मैं कहां जाऊं रोने? बच्चा रोता हुआ बाप के पास आता है. मेरा तो गला मेरा बाप ही काट रहा है. ताऊ की भूख इतनी बढ़ चुकी है कि …’’
आसमान से नीचे गिरा मैं. मानो समूल अस्तित्व ही पारापारा हो कर छोटेछोटे दानों में इधरउधर बिखर गया. शाल हाथ से छूट गया. समय लग गया मुझे अपने कानों पर विश्वास करने में. क्या कभी मैं ऐसा कर पाऊंगा छोटे के बच्चों के साथ? करोड़ों का मानसम्मान अगर मुझे मेरे बच्चे दे रहे होंगे तो क्या मैं लाखों के लिए अपने ही बच्चों के मुंह का निवाला छीन पाऊंगा कभी? कितना चाहिए किसी को जीने के लिए, मैं तो आज तक यही समझ नहीं पाया. रोटी की भूख और 6 फुट जगह सोने को और मरणोपरांत खाक हो जाने के बाद तो वह भी नहीं. क्यों इतना संजोता है इंसान जबकि कल का पता ही नहीं. अपने छोटे भाई का दर्द मैं ही समझ नहीं पाया. मैं भी तो कम दोषी नहीं हूं न. मुझे उस की परेशानी जाननी तो चाहिए थी.
मन में एक छोटी सी उम्मीद जागी. शाल ले कर मैं और शुभा शाम ताऊजी के घर चले ही गए, जैसे सदा जाते थे इज्जत और मानसम्मान के साथ. स्तब्ध था मैं उन का व्यवहार देख कर.
‘‘भाई की वकालत करने आए हो तो मत करना. वह घर और विजय का घर मेरे पिता ने मेरे लिए खरीदा था.’’
‘‘आप के पिता ने आप के लिए क्या खरीदा था, क्या नहीं, उस का पता हम कैसे लगाएं. आप के पिता हमारे पिता के भी तो पिता ही थे न. किसी पिता ने अपनी किस औलाद को कुछ भी नहीं दिया और किस को इतना सब दे दिया, उस का पता कैसे चले?’’
‘‘तो जाओ, पता करो न. तहसील में जाओ… कागज निकलवाओ.’’
‘‘तहसीलदार से हम क्या पता करें, ताऊजी. वहां तो चपरासी से ले कर ऊपर तक हर इंसान आप का खरीदा हुआ है. आज तक तो हम हर समस्या में आप के पास आते रहे. अब जब आप ही समस्या बन गए तो कहां जाएंगे? आप बड़े हैं. मेरी भी उम्र  60 साल की होने को आई. इतने सालों से तो वह घर हमारा ही है, आज एकाएक वह आप का कैसे हो गया? और माफ कीजिएगा, ताऊजी, मैं आप के सामने जबान खोल रहा हूं. क्या हमारे पिताजी इतने नालायक थे जो दादाजी ने उन्हें कुछ न दे कर सब आप को ही दे दिया और विजय चाचा को भी कुछ नहीं दिया?’’
‘‘मेरे सामने जबान खोलना तुम्हें भी आ गया, अपने भाई की तरह.’’
‘‘मैं गूंगा हूं, यह आप से किस ने कह दिया, ताऊजी? इज्जत और सम्मान करना जानता हूं तो क्या बात करना नहीं आता होगा मुझे. ताऊजी, आप का एक ही बच्चा है और आप भी कोई अमृत का घूंट पी कर नहीं आए. यहां की अदालतों में आप की चलती है, मैं जानता हूं मगर प्रकृति की अपनी एक अदालत है, जहां हमारे साथ अन्याय नहीं होगा, इतना विश्वास है मुझे. आप क्यों अपने बच्चों के लिए बद्दुआओं की लंबीचौड़ी फेहरिस्त तैयार कर रहे हैं? हमारे सिर से यदि आप छत छीन लेंगे तो क्या हमारा मन आप का भला चाहेगा?’’
‘‘दिमाग मत चाटो मेरा. जाओ, तुम से जो बन पाए, कर लो.’’
‘‘हम कुछ नहीं कर सकते, आप जानते हैं, तभी तो मैं समझाने आया हूं, ताऊजी.’’
ताऊजी ने मेरा लाया शाल उठा कर दहलीज के पार फेंक दिया और उठ कर अंदर चले गए, मानो मेरी बात भी सुनना अब उन्हें पसंद नहीं. हम अवाक् खड़े रहे. पत्नी शुभा कभी मुझे देखती और कभी जाते हुए ताऊजी की पीठ को. अपमान का घूंट पी कर रह गए हम दोनों.
85 साल के वृद्ध की आंखों में पैसे और सत्ता के लिए इतनी भूख. फिल्मों में तो देखी थी, अपने ही घर में स्वार्थ का नंगा नाच मैं पहली बार देख रहा था. सोचने लगा, मुझे वापस घर आना ही नहीं चाहिए था. सावन के अंधे की तरह यह खुशफहमी तो रहती कि मेरे शहर में मेरे अपनों का आपस में बड़ा प्यार है.
उस रात बहुत रोया मैं. छोटे भाई और विजय चाचा की लड़ाई में मैं भावनात्मक रूप से तो उन के साथ हूं मगर उन की मदद नहीं कर सकता क्योंकि मैं अपने भारत देश का एक आम नागरिक हूं जिसे दो वक्त की रोटी कमाना ही आसान नहीं, वह गुंडागर्दी और बदमाशी से सामना कैसे करे. बस, इतना ही कह सकता हूं कि ताऊ जैसे इंसान को सद्बुद्धि प्राप्त हो और हम जैसों को सहने की ताकत, क्योंकि एक आम आदमी सहने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता.

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बड़ेबुजुर्ग बैठे हों तो सिर पर एक आसमान जैसी अनुभूति होती है. ताऊजी हमारे लिए वही आसमान थे लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ जिस ने इस खुशफहमी को गलतफहमी में बदल दिया?
रिटायरमैंट के बाद अपने ही जन्मस्थान में जा कर बसने का मेरा अनमोल सपना था. जहां पैदा हुआ, जहां गलियों में खेला व बड़ा हुआ, वह जगह कितनी ही यादों को जिंदा रखे है. कक्षा 12 तक पढ़ने के बाद जो अपना शहर छोड़ा तो बस मुड़ कर देख ही नहीं पाया. नौकरी सारा भारत घुमाती रही और मैं घूमता रहा. जितनी दूर मैं अपने शहर से होता गया उतना ही वह मेरे मन के भीतर कहीं समाता गया. छुट्टियों में जब घर आते तब सब से मिलने जाते रहे. सभी आवभगत करते रहे, प्यार और अपनत्व से मिलते रहे. कितना प्यार है न मेरे शहर में. सब कितने प्यार से मिलते हैं, सुखदुख पूछते हैं. ‘कैसे हो?’ सब के होंठों पर यही प्रश्न होता है.
रिटायरमैंट में सालभर रह गया. बच्चों का ब्याह कर, उन के अपनेअपने स्थानों पर उन्हें भेज कर मैं ने गंभीरता से इस विषय पर विचार किया. लंबी छुट्टी ले कर अपने शहर, अपने रिश्तेदारों के साथ थोड़ाथोड़ा समय बिता कर यह सर्वेक्षण करना चाहा कि रहने के लिए कौन सी जगह उपयुक्त रहेगी, घर बनवाना पड़ेगा या बनाबनाया ही कहीं खरीद लेंगे.
मुझे याद है, पिछली बार जब मैं आया था तब विजय चाचा के साथ छोटे भाई की अनबन चल रही थी. मैं ने सुलह करवा कर अपना कर्तव्य निभा लिया था. छोटी बूआ और बड़ी बूआ भी ठंडा सा व्यवहार कर रही थीं. मगर मेरे साथ सब ने प्यार भरा व्यवहार ही किया था. अच्छा नहीं लगा था तब मुझे चाचाभतीजे का मनमुटाव.
इस बार भी कुछ ऐसा ही लगा तो पत्नी ने समझाया, ‘‘जहां चार बरतन होते हैं तो वे खड़कते ही हैं. मैं तो हर बार देखती हूं. जब भी घर आओ किसी न किसी से किसी न किसी का तनाव चल रहा होता है. 4 साल पहले भी विजय चाचा के परिवार से अबोला चल रहा था.’’
‘‘लेकिन हम तो उन से मिलने गए न. तुम चाची के लिए साड़ी लाई थीं.’’
‘‘तब छोटी का मुंह सूज गया था. मैं ने बताया तो था आप को. साफसाफ तो नहीं मगर इतना इशारा आप के भाई ने भी किया था कि जो उस का रिश्तेदार है वह चाचा से नहीं मिल सकता.’’
‘‘अच्छा? मतलब मेरा अपना व्यवहार, मेरी अपनी बुद्धि गई भाड़ में. जिसे छोटा पसंद नहीं करेगा उसे मुझे भी छोड़ना पड़ेगा.’’
‘‘और इस बार छोटे का परिवार विजय चाचा के साथ तो घीशक्कर जैसा है. लेकिन बड़ी बूआ के साथ नाराज चल रहा है.’’
‘‘वह क्यों?’’
‘‘आप खुद ही देखसुन लीजिए न. मैं अपने मुंह से कुछ कहना नहीं चाहती. कुछ कहा तो आप कहेंगे कि नमकमिर्च लगा कर सुना रही हूं.’’
पत्नी का तुनकना भी सही था. वास्तव में आंखें बंद कर के मैं किसी भी औरत की बात पर विश्वास नहीं करता, वह चाहे मेरी मां ही क्यों न हो. अकसर औरतें ही हर फसाद और कलहक्लेश का बीज रोपती हैं. 10 भाई सालों तक साथसाथ रहते हैं लेकिन 2 औरतें आई नहीं कि सब तितरबितर. मायके में बहनों का आपस में झगड़ा हो जाएगा तो जल्दी ही भूल कर माफ भी कर देंगी और समय पड़ने पर संगसंग हो लेंगी लेकिन ससुराल में भाइयों में अनबन हो जाए तो उस आग में सारी उम्र घी डालने का काम करेंगी. अपनी मां को भी मैं ने अकसर बात घुमाफिरा कर करते देखा है.
नौकरी के सिलसिले में लगभग
100-200 परिवारों की कहानी तो बड़ी नजदीक से देखीसुनी ही है मैं ने. हर घर में वही सब. वही अधिकार का रोना, वही औरत का अपने परिवार को ले कर सदा असुरक्षित रहना. ज्यादा झगड़ा सदा औरतें ही करती हैं.
मेरी पत्नी शुभा यह सब जानती है इसीलिए कभी कोई राय नहीं देती. मेरे यहां घर बना कर सदा के लिए रहने के लिए भी वह तैयार नहीं है. इसीलिए चाहती है लंबा समय यहां टिक कर जरा सी जांचपड़ताल तो करूं कि दूर के ढोल ही सुहावने हैं या वास्तव में यहां पे्रम की पवित्र नदी, जलधारा बहती है. कभीकभी कोई आया और उस से आप ने लाड़प्यार कर लिया, उस का मतलब यह तो नहीं कि लाड़प्यार करना ही उन का चरित्र है. 10-15 मिनट में किसी का मन भला कैसे टटोला जा सकता है. हमारे खानदान के एक ताऊजी हैं जिन से हमारा सामना सदा इस तरह होता रहा है मानो सिर पर उन की छत न होती तो हम अनाथ  ही होते. सारे काम छोड़छाड़ कर हम उन के चरणस्पर्श करने दौड़ते हैं. सब से बड़े हैं, इसलिए छोटीमोटी सलाह भी उन से की जाती है. उम्रदराज हैं इसलिए उन की जानपहचान का लाभ भी अकसर हमें मिलता है. राजनीति में भी उन का खासा दखल है जिस वजह से अकसर परिवार का कोई काम रुक जाता है तो भागेभागे उन्हीं के पास जाते हैं हम, ‘ताऊजी यह, ताऊजी वह.’
हमें अच्छाखासा सहारा लगता है उन का. बड़ेबुजुर्ग बैठे हों तो सिर पर एक आसमान जैसी अनुभूति होती है और वही आसमान हैं वे ताऊजी. हमारे खानदान में वही अब बड़े हैं. उन का नाम हम बड़ी इज्जत, बड़े सम्मान से लेते हैं. छोटा भाई इस बार कुछ ज्यादा ही परेशान लगा. मैं ताऊजी के लिए शाल लाया था उपहार में. शुभा से कहा कि वह शाम को तैयार रहे, उन के घर जाना है. छोटा भाई मुझे यों देखने लगा, मानो उस के कानों में गरम सीसा डाल दिया हो किसी ने. शायद इस बार उन से भी अनबन हो गई हो, क्योंकि हर बार किसी न किसी से उस का झगड़ा होता ही है.
‘‘आप का दिमाग तो ठीक है न भाई साहब. आप ताऊ के घर शाल ले कर जाएंगे? बेहतर है मुझे गोली मार कर मुझ पर इस का कफन डाल दीजिए.’’
स्तब्ध तो रहना ही था मुझे. यह क्या कह रहा है, छोटा. इस तरह क्यों?
‘‘बाहर रहते हैं न आप, आप नहीं जानते यहां घर पर क्याक्या होता है. मैं पागल नहीं हूं जो सब से लड़ता रहता हूं. मुकदमा चल रहा है विजय चाचा का और मेरा ताऊ के साथ. और दोनों बूआ उन का साथ दे रही हैं. सबकुछ है ताऊ के पास. 10 दुकानें हैं, बाजार में 4 कोठियां हैं, ट्रांसपोर्ट कंपनी है, शोरूम हैं. औलाद एक ही है. और कितना चाहिए इंसान को जीने के लिए?’’
‘‘तो? सच है लेकिन उन के पास जो है वह उन का अपना है. इस में हमें कोई जलन नहीं होनी चाहिए.’’
‘‘हमारा जो है उसे तो हमारे पास रहने दें. कोई सरकारी कागज है ताऊ के पास. उसी के बल पर उन्होंने हम पर और विजय चाचा पर मुकदमा ठोंक रखा है कि हम दोनों का घर हमारा नहीं है, उन का है. नीचे से ले कर ऊपर तक हर जगह तो ताऊ का ही दरबार है. हर वकील उन का दोस्त है और हर जज, हर कलैक्टर उन का यार. मैं कहां जाऊं रोने? बच्चा रोता हुआ बाप के पास आता है. मेरा तो गला मेरा बाप ही काट रहा है. ताऊ की भूख इतनी बढ़ चुकी है कि …’’
आसमान से नीचे गिरा मैं. मानो समूल अस्तित्व ही पारापारा हो कर छोटेछोटे दानों में इधरउधर बिखर गया. शाल हाथ से छूट गया. समय लग गया मुझे अपने कानों पर विश्वास करने में. क्या कभी मैं ऐसा कर पाऊंगा छोटे के बच्चों के साथ? करोड़ों का मानसम्मान अगर मुझे मेरे बच्चे दे रहे होंगे तो क्या मैं लाखों के लिए अपने ही बच्चों के मुंह का निवाला छीन पाऊंगा कभी? कितना चाहिए किसी को जीने के लिए, मैं तो आज तक यही समझ नहीं पाया. रोटी की भूख और 6 फुट जगह सोने को और मरणोपरांत खाक हो जाने के बाद तो वह भी नहीं. क्यों इतना संजोता है इंसान जबकि कल का पता ही नहीं. अपने छोटे भाई का दर्द मैं ही समझ नहीं पाया. मैं भी तो कम दोषी नहीं हूं न. मुझे उस की परेशानी जाननी तो चाहिए थी.
मन में एक छोटी सी उम्मीद जागी. शाल ले कर मैं और शुभा शाम ताऊजी के घर चले ही गए, जैसे सदा जाते थे इज्जत और मानसम्मान के साथ. स्तब्ध था मैं उन का व्यवहार देख कर.
‘‘भाई की वकालत करने आए हो तो मत करना. वह घर और विजय का घर मेरे पिता ने मेरे लिए खरीदा था.’’
‘‘आप के पिता ने आप के लिए क्या खरीदा था, क्या नहीं, उस का पता हम कैसे लगाएं. आप के पिता हमारे पिता के भी तो पिता ही थे न. किसी पिता ने अपनी किस औलाद को कुछ भी नहीं दिया और किस को इतना सब दे दिया, उस का पता कैसे चले?’’
‘‘तो जाओ, पता करो न. तहसील में जाओ… कागज निकलवाओ.’’
‘‘तहसीलदार से हम क्या पता करें, ताऊजी. वहां तो चपरासी से ले कर ऊपर तक हर इंसान आप का खरीदा हुआ है. आज तक तो हम हर समस्या में आप के पास आते रहे. अब जब आप ही समस्या बन गए तो कहां जाएंगे? आप बड़े हैं. मेरी भी उम्र  60 साल की होने को आई. इतने सालों से तो वह घर हमारा ही है, आज एकाएक वह आप का कैसे हो गया? और माफ कीजिएगा, ताऊजी, मैं आप के सामने जबान खोल रहा हूं. क्या हमारे पिताजी इतने नालायक थे जो दादाजी ने उन्हें कुछ न दे कर सब आप को ही दे दिया और विजय चाचा को भी कुछ नहीं दिया?’’
‘‘मेरे सामने जबान खोलना तुम्हें भी आ गया, अपने भाई की तरह.’’
‘‘मैं गूंगा हूं, यह आप से किस ने कह दिया, ताऊजी? इज्जत और सम्मान करना जानता हूं तो क्या बात करना नहीं आता होगा मुझे. ताऊजी, आप का एक ही बच्चा है और आप भी कोई अमृत का घूंट पी कर नहीं आए. यहां की अदालतों में आप की चलती है, मैं जानता हूं मगर प्रकृति की अपनी एक अदालत है, जहां हमारे साथ अन्याय नहीं होगा, इतना विश्वास है मुझे. आप क्यों अपने बच्चों के लिए बद्दुआओं की लंबीचौड़ी फेहरिस्त तैयार कर रहे हैं? हमारे सिर से यदि आप छत छीन लेंगे तो क्या हमारा मन आप का भला चाहेगा?’’
‘‘दिमाग मत चाटो मेरा. जाओ, तुम से जो बन पाए, कर लो.’’
‘‘हम कुछ नहीं कर सकते, आप जानते हैं, तभी तो मैं समझाने आया हूं, ताऊजी.’’
ताऊजी ने मेरा लाया शाल उठा कर दहलीज के पार फेंक दिया और उठ कर अंदर चले गए, मानो मेरी बात भी सुनना अब उन्हें पसंद नहीं. हम अवाक् खड़े रहे. पत्नी शुभा कभी मुझे देखती और कभी जाते हुए ताऊजी की पीठ को. अपमान का घूंट पी कर रह गए हम दोनों.
85 साल के वृद्ध की आंखों में पैसे और सत्ता के लिए इतनी भूख. फिल्मों में तो देखी थी, अपने ही घर में स्वार्थ का नंगा नाच मैं पहली बार देख रहा था. सोचने लगा, मुझे वापस घर आना ही नहीं चाहिए था. सावन के अंधे की तरह यह खुशफहमी तो रहती कि मेरे शहर में मेरे अपनों का आपस में बड़ा प्यार है.
उस रात बहुत रोया मैं. छोटे भाई और विजय चाचा की लड़ाई में मैं भावनात्मक रूप से तो उन के साथ हूं मगर उन की मदद नहीं कर सकता क्योंकि मैं अपने भारत देश का एक आम नागरिक हूं जिसे दो वक्त की रोटी कमाना ही आसान नहीं, वह गुंडागर्दी और बदमाशी से सामना कैसे करे. बस, इतना ही कह सकता हूं कि ताऊ जैसे इंसान को सद्बुद्धि प्राप्त हो और हम जैसों को सहने की ताकत, क्योंकि एक आम आदमी सहने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता.

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February 29, 2020 at 10:00AM

काश ऐसा हो पाता भाग-4

सुमन के मम्मीपापा को इस में आपत्ति नहीं थी मगर उन्होंने इस के पूर्व सुधाकर से मिलने की इच्छा जताई.

सुधाकर मथुरा जा कर सुमन के मम्मीपापा से मिल आया. सुमन के पापा तब तक नहीं जान पाए थे कि सुधाकर उन्हीं के मित्र विमल शर्मा का पुत्र है, जिन को लोग उन के शत्रु के रूप में जानते हैं. उन्हें अपनी बेटी के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश थी, जो घरबैठे पूर्ण हो रही थी.

यह राज तो तब खुला जब सुधाकर के मम्मीपापा अपने बेटे के विवाह के लिए औपचारिक रस्म निभाने मथुरा आए.

थोड़ी देर के लिए तो वे दोनों अवाक् रह गए कि वे क्या देखसुन रहे हैं. और उन्हें क्या और कैसे बात करनी है.

‘मुझे माफ कर दो, विमल,’ आखिरकार सुमन के पापा रुंधे कंठ से बोले, ‘15 साल पहले की गई गलती का एहसास मुझे समय रहते हो गया था. मगर समय को वापस लौटाना कहां संभव है. अगर वह हादसा हो जाता जिसे करने की मैं ने कोशिश की थी, तो दोनों ही परिवार बरबाद हो जाते.’

‘अब उस बात को जाने भी दो.’

‘मैं सुमन का विवाह सुधाकर से करूं, यही मेरा प्रायश्चित्त होगा.’

‘अरे, यह प्रायश्चित्त की नहीं, प्रसन्नता की बात है. मैं अपने बेटे के लिए तुम्हारी बेटी का हाथ मांगने आया हूं,’ विमल शर्मा उन्हें गले लगाते हुए बोले, ‘उस दुस्वप्न को तो मैं कब का भूल चुका हूं.’

विवाह की रस्म पूर्ण होने के कुछ दिन बाद वह सुधाकर के घर चली आई थी.

‘‘अरे सुमन, कहां खो गईं,’’ सुधाकर बोला तो उस की तंद्रा टूटी, ‘‘जरा बाहर का नजारा तो देखो, कितना खूबसूरत है.’’

वह शीघ्रतापूर्वक संभल कर चैतन्य हुई. गाड़ी के शीशे से वह बाहर प्रकृति का नजारा देखने लगी. रास्ते की ढलान पर गाड़ी मंथर गति से आगे बढ़ रही थी. जरा सी फिसलन हुई नहीं, जरा सा चूके नहीं कि सैकड़ों फुट गहरी खाई में गिरने का खतरा था.

जैसा कि भय था, वही हुआ. बारिश अब बर्फबारी में बदल चुकी थी. रूई के फाहे के समान बर्फ के झोंके गिर रहे थे. देखते ही देखते पहाड़ों और घाटियों की हरियाली बर्फ की सफेद चादर से ढक गई थी. चारों तरफ दूरदूर तक निशब्द सन्नाटा था. वातावरण पर जैसे एक ही सफेद रंग पुत सा गया था. बर्फ की परत जमी कंक्रीट की सड़क पर गाडि़यों का काफिला बैलगाड़ी की गति से आगे बढ़ रहा था. जैसे किसी आसन्न खतरे का आभास हो, वैसी चुप्पी सब के चेहरे पर चस्पां थी. चूंकि गाडि़यों के ड्राइवर स्थानीय थे और एक्सपर्ट थे, यही एक बात आश्वस्त करने वाली थी कि दिक्कत नहीं आएगी.

रास्ते में कहींकहीं कुछ अर्द्धवृत्ताकार टिन के घर दिखे, जिन के बाहर सन्नाटा पसरा था. वहीं कहीं कुछ धर्मचक्र घुमाते बौद्ध भिक्षु दिखे. मंत्र लिखित सफेद पताकाओं की शृंखलाएं भी पहाड़ों और घाटियों के बीच दिख जाती थीं, जो हवाओं से लहराते हुए रहस्यमय वातावरण का सृजन करती प्रतीत होती थीं.

रास्ते में छोटेनाटे, मगर हृष्टपुष्ट कदकाठी के स्थानीय स्त्रीपुरुष दिखे, जो सड़क के निर्माण कार्य में व्यस्त थे. रबर के गमबूट और दस्ताने पहने, पत्थर तोड़ते और बिछाते हुए स्थानीय लोग. कभी खाली हाथ तो कभी बेलचोंकांटों की मदद से काम करते. भीमकाय डोजरक्रशर आदि कहीं पत्थरों में छेद करते तो कहीं काटतेतोड़ते, कहीं हटाते और डंपरों में भरते अथवा खाली करते थे.

जीवन में रोमांच क्या होता है और हजारों फुट ऊपर बर्फ से ढके पहाड़ों का जीवन कितना कठिन होता होगा, यह उसे अब समझ में आने लगा था. रास्ते के किनारे पैरों में गमबूट और हाथों में रबर के दस्ताने पहने रास्ते को ठीक करने वाले स्थानीय मजदूर इस जोखिम भरे मौसम में भी काम कर रहे थे.

सड़क के कार्यरत स्थल पर पहाड़ी कुत्ते रास्ते की बर्फ में ही कुलेल कर रहे थे. एक स्थान पर भैंसे समान याक पर सामान लादे कुछ स्थानीय लोग उधर से गुजर गए.

ओ, तो यही याक है. इसे देखना भी एक सुखद संयोग था.

बादलों के बीच सूर्य पता नहीं कहां छिप गया था. बर्फबारी रुकने का नाम नहीं ले रही थी. रास्ते की फिसलन बढ़ती जा रही थी. एक स्थान पर गाडि़यों का काफिला रुका तो सभी गाडि़यों के ड्राइवर गाड़ी के पिछले पहियों में लोहे की जंजीर पहनाने लगे ताकि फिसलन का दबाव कम हो. यह भी एक अलग रोमांचक अनुभव था.

लगभग 9 बजे रात में गाड़ी ने जब गंगटोक शहर की सीमा में प्रवेश किया तो सभी की जान में जान आई. इधर हिमपात के बजाय वर्षा हो रही थी. गाडि़यों की गति में अब तीव्रता आ गई थी. एक खतरनाक अनुभव से गुजर कर अब सभी जैसे चैन की सांस ले रहे थे.

होटल पहुंच कर उन्होंने कपड़े बदले. होटल का नौकर खाना लगाने लगा.

‘‘बहुत दिक्कत हुआ न साहेब,’’ वह बोला, ‘‘अचानक ही मौसम खराब

हो गया. यहां अकसर ही ऐसा हो

जाता है.’’

‘‘हां भई, बड़ी मुश्किल से जान बची,’’ सुधाकर बोला, ‘‘बर्फ भरे रास्ते पर गाड़ी का चलना बहुत मुश्किल था. मुझे लगा कि अब हमें वहीं सड़क के किनारे रात काटनी होगी. अगर ऐसा होता तो हमारी तो कुल्फी ही जम जाती.’’

वह चुपचाप बाहर का दृश्य देख रही थी. बारिश बंद हो चुकी थी और सितारों से सजे आकाश के नीचे गंगटोक शहर  कृत्रिम रोशनी में झिलमिला रहा था. वैसे भी पहाड़ी शहर होते ही ऐसे हैं कि हमेशा वहां दीवाली सी रोशनी का आभास होता है. मगर वहां का नजारा ही कुछ अलग था. वहां के ऊंचेऊंचे दरख्त हरियाली से भरे पड़े थे.

‘‘अरे, तुम कुछ बोलो भी,’’ सुधाकर बोला, ‘‘लगता है तुम काफी डर गई हो.’’

‘‘डर तो गई ही थी, सुधाकर,’’ वह बोली, ‘‘फिलहाल मैं नाथुला की सीमाओं के बारे में सोच रही हूं, जहां भारतीय और चीनी सैनिक आमनेसामने खड़े थे. हम तो वहां से सुरक्षित निकल कर यहां आ गए. मगर उस बर्फबारी में भी वे अपनी सीमाओं पर डटे होंगे. मैं यह सोच रही हूं कि इस परिस्थिति में भी क्या उन्हें अपने परिवार की याद नहीं आती होगी, जैसे कि हमें आई थी?’’

‘‘क्यों नहीं याद आती होगी, सुमन,’’ सुधाकर गंभीर स्वर में बोला, ‘‘तमाम प्रशिक्षण के बावजूद आखिर वे भी मनुष्य हैं. उन के सीने में भी दिल धड़कते हैं. और उन के मन में भी मानवीय विचार अंगड़ाई लेते होंगे. उन के हृदय में भी भावनाएं हैं. मगर कर्तव्य सर्वोपरि होता है, इस का एहसास उन्हें है. इसी कारण हम यहां सुरक्षित हैं. देश और समाज इसी तरह आगे बढ़ता और सुरक्षित रहता है. तुम्हारे एक चाचाजी भी तो इसी प्रकार के सैनिक थे.’’

सुमन का मन एक गहरी टीस से

भर गया.

‘‘हमारे और तुम्हारे परिवार के बीच में भी एक खटास थी, जो हम ने खत्म कर दी. क्या इसी प्रकार राष्ट्रों के बीच की यह खटास खत्म नहीं हो सकती?’’

‘‘क्यों नहीं हो सकती,’’ वह बोला, ‘‘स्वार्थ और संघर्ष की व्यर्थता का एहसास होते ही दूरियां खत्म होने लगती हैं,’’ सुधाकर उस की बगल में आ कर खड़ा हो गया था, ‘‘काश ऐसा हो पाता, जैसा कि तुम सोच रही हो.’’

बाहर बारिश थम गई थी. बादल छंट गए थे और आकाश सितारों से सज गया था. धुला हुआ गंगटोक शहर अब कृत्रिम प्रकाश से और चमक उठा था.

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सुमन के मम्मीपापा को इस में आपत्ति नहीं थी मगर उन्होंने इस के पूर्व सुधाकर से मिलने की इच्छा जताई.

सुधाकर मथुरा जा कर सुमन के मम्मीपापा से मिल आया. सुमन के पापा तब तक नहीं जान पाए थे कि सुधाकर उन्हीं के मित्र विमल शर्मा का पुत्र है, जिन को लोग उन के शत्रु के रूप में जानते हैं. उन्हें अपनी बेटी के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश थी, जो घरबैठे पूर्ण हो रही थी.

यह राज तो तब खुला जब सुधाकर के मम्मीपापा अपने बेटे के विवाह के लिए औपचारिक रस्म निभाने मथुरा आए.

थोड़ी देर के लिए तो वे दोनों अवाक् रह गए कि वे क्या देखसुन रहे हैं. और उन्हें क्या और कैसे बात करनी है.

‘मुझे माफ कर दो, विमल,’ आखिरकार सुमन के पापा रुंधे कंठ से बोले, ‘15 साल पहले की गई गलती का एहसास मुझे समय रहते हो गया था. मगर समय को वापस लौटाना कहां संभव है. अगर वह हादसा हो जाता जिसे करने की मैं ने कोशिश की थी, तो दोनों ही परिवार बरबाद हो जाते.’

‘अब उस बात को जाने भी दो.’

‘मैं सुमन का विवाह सुधाकर से करूं, यही मेरा प्रायश्चित्त होगा.’

‘अरे, यह प्रायश्चित्त की नहीं, प्रसन्नता की बात है. मैं अपने बेटे के लिए तुम्हारी बेटी का हाथ मांगने आया हूं,’ विमल शर्मा उन्हें गले लगाते हुए बोले, ‘उस दुस्वप्न को तो मैं कब का भूल चुका हूं.’

विवाह की रस्म पूर्ण होने के कुछ दिन बाद वह सुधाकर के घर चली आई थी.

‘‘अरे सुमन, कहां खो गईं,’’ सुधाकर बोला तो उस की तंद्रा टूटी, ‘‘जरा बाहर का नजारा तो देखो, कितना खूबसूरत है.’’

वह शीघ्रतापूर्वक संभल कर चैतन्य हुई. गाड़ी के शीशे से वह बाहर प्रकृति का नजारा देखने लगी. रास्ते की ढलान पर गाड़ी मंथर गति से आगे बढ़ रही थी. जरा सी फिसलन हुई नहीं, जरा सा चूके नहीं कि सैकड़ों फुट गहरी खाई में गिरने का खतरा था.

जैसा कि भय था, वही हुआ. बारिश अब बर्फबारी में बदल चुकी थी. रूई के फाहे के समान बर्फ के झोंके गिर रहे थे. देखते ही देखते पहाड़ों और घाटियों की हरियाली बर्फ की सफेद चादर से ढक गई थी. चारों तरफ दूरदूर तक निशब्द सन्नाटा था. वातावरण पर जैसे एक ही सफेद रंग पुत सा गया था. बर्फ की परत जमी कंक्रीट की सड़क पर गाडि़यों का काफिला बैलगाड़ी की गति से आगे बढ़ रहा था. जैसे किसी आसन्न खतरे का आभास हो, वैसी चुप्पी सब के चेहरे पर चस्पां थी. चूंकि गाडि़यों के ड्राइवर स्थानीय थे और एक्सपर्ट थे, यही एक बात आश्वस्त करने वाली थी कि दिक्कत नहीं आएगी.

रास्ते में कहींकहीं कुछ अर्द्धवृत्ताकार टिन के घर दिखे, जिन के बाहर सन्नाटा पसरा था. वहीं कहीं कुछ धर्मचक्र घुमाते बौद्ध भिक्षु दिखे. मंत्र लिखित सफेद पताकाओं की शृंखलाएं भी पहाड़ों और घाटियों के बीच दिख जाती थीं, जो हवाओं से लहराते हुए रहस्यमय वातावरण का सृजन करती प्रतीत होती थीं.

रास्ते में छोटेनाटे, मगर हृष्टपुष्ट कदकाठी के स्थानीय स्त्रीपुरुष दिखे, जो सड़क के निर्माण कार्य में व्यस्त थे. रबर के गमबूट और दस्ताने पहने, पत्थर तोड़ते और बिछाते हुए स्थानीय लोग. कभी खाली हाथ तो कभी बेलचोंकांटों की मदद से काम करते. भीमकाय डोजरक्रशर आदि कहीं पत्थरों में छेद करते तो कहीं काटतेतोड़ते, कहीं हटाते और डंपरों में भरते अथवा खाली करते थे.

जीवन में रोमांच क्या होता है और हजारों फुट ऊपर बर्फ से ढके पहाड़ों का जीवन कितना कठिन होता होगा, यह उसे अब समझ में आने लगा था. रास्ते के किनारे पैरों में गमबूट और हाथों में रबर के दस्ताने पहने रास्ते को ठीक करने वाले स्थानीय मजदूर इस जोखिम भरे मौसम में भी काम कर रहे थे.

सड़क के कार्यरत स्थल पर पहाड़ी कुत्ते रास्ते की बर्फ में ही कुलेल कर रहे थे. एक स्थान पर भैंसे समान याक पर सामान लादे कुछ स्थानीय लोग उधर से गुजर गए.

ओ, तो यही याक है. इसे देखना भी एक सुखद संयोग था.

बादलों के बीच सूर्य पता नहीं कहां छिप गया था. बर्फबारी रुकने का नाम नहीं ले रही थी. रास्ते की फिसलन बढ़ती जा रही थी. एक स्थान पर गाडि़यों का काफिला रुका तो सभी गाडि़यों के ड्राइवर गाड़ी के पिछले पहियों में लोहे की जंजीर पहनाने लगे ताकि फिसलन का दबाव कम हो. यह भी एक अलग रोमांचक अनुभव था.

लगभग 9 बजे रात में गाड़ी ने जब गंगटोक शहर की सीमा में प्रवेश किया तो सभी की जान में जान आई. इधर हिमपात के बजाय वर्षा हो रही थी. गाडि़यों की गति में अब तीव्रता आ गई थी. एक खतरनाक अनुभव से गुजर कर अब सभी जैसे चैन की सांस ले रहे थे.

होटल पहुंच कर उन्होंने कपड़े बदले. होटल का नौकर खाना लगाने लगा.

‘‘बहुत दिक्कत हुआ न साहेब,’’ वह बोला, ‘‘अचानक ही मौसम खराब

हो गया. यहां अकसर ही ऐसा हो

जाता है.’’

‘‘हां भई, बड़ी मुश्किल से जान बची,’’ सुधाकर बोला, ‘‘बर्फ भरे रास्ते पर गाड़ी का चलना बहुत मुश्किल था. मुझे लगा कि अब हमें वहीं सड़क के किनारे रात काटनी होगी. अगर ऐसा होता तो हमारी तो कुल्फी ही जम जाती.’’

वह चुपचाप बाहर का दृश्य देख रही थी. बारिश बंद हो चुकी थी और सितारों से सजे आकाश के नीचे गंगटोक शहर  कृत्रिम रोशनी में झिलमिला रहा था. वैसे भी पहाड़ी शहर होते ही ऐसे हैं कि हमेशा वहां दीवाली सी रोशनी का आभास होता है. मगर वहां का नजारा ही कुछ अलग था. वहां के ऊंचेऊंचे दरख्त हरियाली से भरे पड़े थे.

‘‘अरे, तुम कुछ बोलो भी,’’ सुधाकर बोला, ‘‘लगता है तुम काफी डर गई हो.’’

‘‘डर तो गई ही थी, सुधाकर,’’ वह बोली, ‘‘फिलहाल मैं नाथुला की सीमाओं के बारे में सोच रही हूं, जहां भारतीय और चीनी सैनिक आमनेसामने खड़े थे. हम तो वहां से सुरक्षित निकल कर यहां आ गए. मगर उस बर्फबारी में भी वे अपनी सीमाओं पर डटे होंगे. मैं यह सोच रही हूं कि इस परिस्थिति में भी क्या उन्हें अपने परिवार की याद नहीं आती होगी, जैसे कि हमें आई थी?’’

‘‘क्यों नहीं याद आती होगी, सुमन,’’ सुधाकर गंभीर स्वर में बोला, ‘‘तमाम प्रशिक्षण के बावजूद आखिर वे भी मनुष्य हैं. उन के सीने में भी दिल धड़कते हैं. और उन के मन में भी मानवीय विचार अंगड़ाई लेते होंगे. उन के हृदय में भी भावनाएं हैं. मगर कर्तव्य सर्वोपरि होता है, इस का एहसास उन्हें है. इसी कारण हम यहां सुरक्षित हैं. देश और समाज इसी तरह आगे बढ़ता और सुरक्षित रहता है. तुम्हारे एक चाचाजी भी तो इसी प्रकार के सैनिक थे.’’

सुमन का मन एक गहरी टीस से

भर गया.

‘‘हमारे और तुम्हारे परिवार के बीच में भी एक खटास थी, जो हम ने खत्म कर दी. क्या इसी प्रकार राष्ट्रों के बीच की यह खटास खत्म नहीं हो सकती?’’

‘‘क्यों नहीं हो सकती,’’ वह बोला, ‘‘स्वार्थ और संघर्ष की व्यर्थता का एहसास होते ही दूरियां खत्म होने लगती हैं,’’ सुधाकर उस की बगल में आ कर खड़ा हो गया था, ‘‘काश ऐसा हो पाता, जैसा कि तुम सोच रही हो.’’

बाहर बारिश थम गई थी. बादल छंट गए थे और आकाश सितारों से सज गया था. धुला हुआ गंगटोक शहर अब कृत्रिम प्रकाश से और चमक उठा था.

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February 29, 2020 at 10:00AM

काश ऐसा हो पाता

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February 29, 2020 at 09:58AM

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