Thursday, 29 August 2019

विदेश में नौकरी के नाम पर 16 युवकों से ठगी Hindi Latest News

खाड़ी देशों में नौकरी का झांसा देकर 16 युवकों से ठगीविभूतिखंड के साइबर टॉवर स्थित ईगल सिक्योरिटी कंपनी के ...

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Motivational thoughts for students in hindi and student thought in hindi

Motivational thoughts for students in hindi and student thought in hindi

स्टूडेंट्स (motivational thoughts for students in hindi) के जीवन में अगर कुछ है तो वह उसका समय है अगर वह अपना समय बहुत अच्छे प्रयोग कर सकता है तो उससे अच्छी बात नहीं हो सकती है मगर कभी कभी ऐसा भी होता है की students उसका सही use नहीं कर पाता है क्योकि वह इसका महत्व नहीं समझता है जब तक हम किसी चीज का सही Importance नहीं समझते है तब तक उसकी value हमे समझ नहीं आती है जब हम उसकी value समझते है तब तक समय निकल जाता है

Motivational thoughts for students in hindi

motivational thoughts for students in hindi

motivational thoughts for students in hindi

students की life ऐसी होनी चाहिए की वह उसका use सही तरीके से कर सके क्योकि students की लाइफ जब तक उसे समझाती है तब तक उसे समझना जरुरी होता है हम बहुत सी बाते समझ नहीं सकते है मगर उन बातो को समझना बहुत जरुरी होता है अगर आप नहीं समझते है तो आने वाले life में आपको कुछ नज़र नहीं आएगा students को यह समझना चाहिए जब तक वह students है तब तक उसे कुछ न कुछ सीखना होगा मगर सच यह भी है की students जीवन भर students ही रहता है

 

क्योकि हम life भर कुछ न कुछ सीखते रहते है यही कारन है की हम सभी students ही होते है अगर हम अपने आपको students ही माने तो बहुत अच्छा होगा क्योकि हम सभी students ही है हमे life कुछ न कुछ हर रोज सिखाती है  और जो सीखता है वही students होता है students को अपने समय का प्रयोग बहुत ध्यान से करना होता है उसे समय का use अच्छे से आना चाहिए यह बात सभी जानते है की जो time का प्रयोग करता है वह आगे life में बहुत कुछ करता है समय का हमारे life में बहुत Importance है

समय का महत्व हिंदी विचार

जब students पहली बार अपनी study पर ध्याना देता है तो उसे यही लगता है की सब कुछ आसान है वह आसानी से सब कुछ कर सकता है मगर ऐसा नहीं है जब वह सभी को देखना शुरू करता है तो उसे पता चलता है की सब कुछ आसान नहीं है जब तक हम कोई work नहीं करते है तब तक उसका पता हमे नहीं चलता है मगर जब हम work को करते रहते है तो वह हमे आसान लगता है तब हम यह कह सकते है की आप उस काम को कर सकते है हमे चीजों को सीखना आना चाहिए यह बहुत जरुरी होता है

अनमोल वचन का सार

जब तक आपके मन में चीजों का सीखना नहीं आता है तब तक आप कुछ नहीं कर सकते है यह mind हमारे लिए बहुत जरुरी होता है जब हमारा mind किसी काम में नहीं चलता है तब तक हमारे लिए वह work जरुरी नहीं लगता है मगर ऐसा नहीं है हमे काम की जरूरत है इसलिए काम को करने के लिए उसके प्रति आपका mind होना चाहिए तभी आप उस work को कर सकते है students का life आसान नहीं होता है उसे बहुत सी problem का सामना करना होता है तभी वह life में आगे बढ़ता है    

जीवन में सफलता कैसे लाये

students को life में यही बात सोचनी चाहिए की जो वह आज कर रहा है उससे उसका आने वाला future बनेगा अगर वह यह बता सोच कर अपनी study पर ध्याना देता है तो वह जीवन में आगे तक जा सकता है हमारे जीवन में बहुत कुछ चलता रहता है यह life जितना हमे देखने में आसान लगता है वह उतना आसान नहीं है, students की life जैसा की हम जानते है आसान नहीं है क्योकि यह time वही होता है जिसमे उसे बहुत कुछ करना है

जीवन क्या है अच्छे विचार 

अगर वह समय का सही use करके अपनी लाइफ को अच्छा कर सकता है तो उसकी आने वाली life बहुत होगी, students की यह life बहुत पसंद आती है क्योकि उसे लगता है की अभी बहुत समय है वह बहुत कुछ कर सकता है मगर ऐसा नहीं है उसे अपनी इस लाइफ में बहुत कुछ एक साथ सीखना होता है उसे बहुत से काम इसी time पर करने होते है यह उसका life आगे उसे हमेशा Succeed की और ले जाता है अगर वह इस बात को समझता है तो वह life में आगे बढ़ जाता है   

जीवन के नये विचार

students को पता होना चाहिए की उसे अपना कीमती time किस चीज पर लगाना है क्योकि अगर वह अपना समय use करके देखना चाहता है तो उसे ऐसा नहीं करना चाहिए ऐसा करना उसे कुछ तो नया सीखा सकता है मगर उसका बीता समय वापिस नहीं आ सकता है यह बात सभी जानते है की जीवन में एक बार जो समय चला गया वह वापिस नहीं होता है अगर यह बात  students अपने life में समझ गया तो उसे कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं है

जीवन के अच्छे हिंदी विचार

क्योकि हम अपनी life में एक छोटी सी बात नहीं समझ सकते है की बीता हुआ time वापिस नहीं आता है बहुत से लोगो के life में यही चलता रहता है की आज नहीं तो कल कर लेंगे और कल नहीं तो परसो हो जाएगा मगर वह इस बात को नहीं समझ रहा है की time निकल रहा है वह किसी के लिए नहीं रुक रहा है वह तो लगातार बढ़ रहा है उसे कोई नहीं रोक सकता है वह रुक भी नहीं सकता है कभी कभी आपने देखा होगा की पूरा साल बीत जाता है और आपको लगता है की मुझे तो पता ही नहीं चला की समय निकल गया है 

Motivational thoughts for students in hindi

अगर आप अपनी students life को अच्छा करना चाहते है आप भी यही चाहते है की में अपनी life में अच्छे काम कर सकू तो आपको अपनी habit बदलनी होगी जब तक आप नहीं बदलते है तो कुछ भी नहीं बदलेगा आप को खुद बदलना होगा तभी तो आप बदल सकते है जब आप बदलते है तो सब कुछ change जाता है आप अपनी life को भी अच्छा कर पाते है, यह students का life बहुत अच्छा होता है क्योकि इसमें हम बहुत कुछ सीखते है और आपका जीवन इसी बात पर dependent करता है की आप यहां पर अपनी पहली नीव रखते है जिसके बाद आप उस पर अपने सपनो का महल बनाते है 

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सफलता की भावना

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इंफाल: धरती का फेफड़ा कहे जाने वाले ब्राजील स्थित अमेजन के जंगलों में पिछले दो सप्ताह से भीषण आग लगी है.

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बच्चों की भावना: भाग-2

बच्चों की भावना: भाग-1

अब आगे पढ़ें- 

आखिरी किस्त

अभी अकी को एक सप्ताह और स्कूल जाना था, ठंड इस साल कुछ अधिक थी. सुबह जबरदस्त कोहरा होने लगा. रोज सुबह अकी को इतनी जल्दी स्कूल के लिए तैयार होते देख कर नानी ने स्नेह से कहा, ‘‘बेटी, किसी पास के स्कूल में अकी को दाखिल करवा दे. इतना अधिक परिश्रम छोटे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए घातक है.’’

‘‘मां, मैं स्कूल चेंज नहीं कराऊंगी. बहुत नामी और बढि़या स्कूल है.’’

इस का जवाब अनुभव ने दिया, ‘‘स्नेह, नानी ठीक कह रही हैं, मैं ने सोच लिया है कि इस साल रिजल्ट निकलने पर अकी का दाखिला किसी पास के स्कूल में करवा दूंगा,’’ और फिर उस ने पूरी बात स्नेह को विस्तारपूर्वक बताई कि कैसे फटकार लगा कर प्रिंसिपल ने उसे अपमानित किया. ऐसी बात सुन कर स्नेह उदास हो गई कि उस का अकी को एक नामी स्कूल में पढ़ाने का अरमान साकार नहीं हो पाएगा. लेकिन अनुभव के दृढ़ निश्चय और नानी के सहयोग के आगे स्नेह को झुकना पड़ा.

आकृति यह सुन कर बहुत खुश हुई कि अब उसे नए सत्र से पास के किसी स्कूल में जाना होगा. इतनी जल्दी भी नहीं उठना पड़ेगा. स्कूल बस में वह बहुत अधिक परेशान होती थी. बड़े बच्चे बस की सीटों पर छोटे बच्चों को बैठने नहीं देते थे. स्कूल टीचर भी उन्हें कुछ नहीं कहती थीं. उलटे सब से आगे की सीटों पर बैठ जाती थीं.

गरमियों में तो इतना ज्यादा पसीना आता, घबराहट होती कि तबीयत खराब हो जाती थी, लेकिन पापामम्मी तो इस बारे में सोचते ही नहीं. सर्दियों में कितनी ज्यादा ठंड होती है. स्कर्ट पहन कर जाना पड़ता है. ऊपर से कोट पहना देते हैं, लेकिन स्कर्ट पहनने से टांगों में बहुत ज्यादा ठंड लगती है. छोटे बच्चों की परेशानी कोई नहीं समझता.

ठंड बढ़ती जा रही थी. बच्चों की परेशानी को महसूस कर प्रशासन ने सरकारी स्कूलों की छुट्टी समय से पहले घोषित कर दी. अभिभावकों के दबाव में आ कर निजी स्कूलों में भी निर्धारित समय से पहले सर्दियों की छुट्टियां घोषित कर दीं. जिस दिन छुट्टियों की घोषणा की, आकृति अत्याधिक खुशी के साथ झूमती हुई, नाचती हुई स्कूल से वापस आई. जैसे नानी ने फ्लैट का दरवाजा खोला, आकृति नानी से लिपट गई.

‘‘नानी, मेरी प्यारी नानी, आज मैं आजाद पंछी हूं. हमारी कल से पूरे 20 दिन की छुट्टी. अब मैं रोज छोटे काका के संग खेलूंगी,’’ और अपना स्कूल बैग एक तरफ पटक दिया और आईने के सामने कमर मटकाते हुए गीत गाने लगी.

तभी स्नेह ने आवाज लगाई, ‘‘अकी, काका सो रहा है, शोर मत मचाओ.’’

‘‘गाना भी नहीं गाने देते,’’ कह कर अकी बाथरूम में मुंह धोने के लिए चली गई और गीत गाने लगी, ‘‘मैं ने जिसे अभी देखा है, उसे कह दूं, प्रीटी वूमन, देखो, देखो न प्रीटी वूमन, तुम भी कहो न प्रीटी वूमन.’’

अकी का गाना सुन कर स्नेह ने उस की नानी से कहा, ‘‘मम्मी, जा कर अकी को बाथरूम से निकालो, वरना वह 2 घंटे से पहले बाहर नहीं आएगी.’’

नानी ने अकी को बाथरूम में जा कर कहा, ‘‘प्रीटी वूमन, बहुत बनसंवर लिए. अब बाहर आ जाइए. छोटा काका आप को बुला रहा है.’’

‘‘सच्ची,’’ कह कर अकी ने फर्राटे की दौड़ लगाई, ‘‘यह क्या नानी, छोटा काका तो सो रहा है, आप ने मेरा मजाक उड़ा कर सारा मूड खराब कर दिया,’’ अकी ने मुंह बनाते हुए कहा.

ये भी पढ़ें- बंटी हुई औरत

‘‘मूड कैसे बनेगा, मेरी लाड़ो का,’’ नानी ने अकी को अपनी गोद में बिठाते हुए पूछा.

‘‘जब पापा गाना गाएंगे तब मैं पापा के साथ मिल कर गाऊंगी.’’

‘‘वह क्यों?’’

‘‘नानी, आप को नहीं पता, पापा को यह गाना बहुत अच्छा लगता है. मम्मी को देख कर गाते हैं.’’

‘‘अच्छा अकी, पापा का गाना तो बता दिया, मम्मी कौन सा गाना गाती हैं, पापा को देख कर?’’ इस से पहले अकी कुछ कहती, स्नेह तुनक कर बोली, ‘‘मां, तुम यह क्या बातें ले कर बैठ गईं.’’

यह सुनते ही अकी नानी के कान में धीरे से बोली, ‘‘नानी, मम्मी को थोड़ा समझाओ. हमेशा डांटती रहती हैं.’’

छुट्टियों में अकी को बेफिक्र देख कर नानी ने स्नेह से कहा कि बच्चों के कुदरती विकास के लिए जरूरी है कि उन्हें पूरा समय मिले, पढ़ने के साथ खेलने का मौका मिले. क्या तू भूल गई, किस तरह बचपन में तू पड़ोस की लड़कियों के साथ खेलती थी और पूरा महल्ला शोर से सिर पर उठाती थी. हम अपना बचपन भूल जाते हैं कि हम ने भी शैतानियां की थीं. बच्चों पर आदर्श थोपते हैं, जो एकदम अनुचित है.

‘‘मां, तुम भाषण पर आ गई हो,’’ स्नेह ने तुनक कर कहा.

‘‘तुम खुद देखो कि अकी आजकल कितनी खुश है, जितने दिन स्कूल गई, एकदम थकी सी रहती थी, अब एकदम चुस्त रहती है. इसलिए कहती हूं कि अनुभव की बात मान ले.’’

‘‘मम्मी, तुम और अनु एक जैसे हो, एकदूसरे की हां में हां मिलाते रहते हो. मेरी भावनाओं की तरफ सोचते भी नहीं हो. आखिर आप ने मुझे इतना क्यों पढ़ाया. एमबीए के बाद शादी कर दी. मेरा कैरियर भी नहीं बनने दिया. मुश्किल से 1 साल भी नौकरी नहीं की, शादी हो गई. शादी के बाद शहर बदल गया, फिर अकी के जन्म के कारण नौकरी नहीं की. अकी स्कूल जाने लगी, तब बड़ी मुश्किल से अनु को राजी किया. 3-4 साल ही नौकरी की, अब फिर छोटे काका के जन्म पर नौकरी छोड़नी पड़ रही है.’’

‘‘स्नेह, एक बात तुम समझ लो, परिवार के लालनपालन और बच्चों में अच्छी आदतों की नींव डालने के लिए मांबाप को अपनी कई इच्छाओं को मारना पड़ता है. परिवार को सही तरीके से पालना नौकरी करने से अधिक कठिन है. गृहस्थी की कठिन राह से परेशान लोग संन्यास लेते हैं, लेकिन दरदर भटकने पर भी न तो शांति मिलती है और न ही सुख. कठिन गृहस्थी में ही सच्चा सुख है.’’

स्नेह मां के आगे निरुत्तर हो गई और आकृति को घर के पास वाले स्कूल में दाखिल करने को राजी हो गई. सर्दियों की छुट्टियों में वर्माजी की लड़की भी अपने परिवार के साथ रहने आ गई. वर्माजी की नातिन वृंदा आकृति की हमउम्र थी. दोनों सारा दिन एकसाथ धमाचौकड़ी करती रहतीं और नानी, स्नेह, छोटा काका वर्मा परिवार के साथ सोसाइटी के लौन में धूप सेंकते. एक दिन धूप सेंकते वर्माजी ने अपनी लड़की को सलाह दी कि वह भी वृंदा को पास के स्कूल में दाखिल करवा दे. वे आकृति की नानी के गुण गाने लगे कि उन्होंने स्नेह को आकृति के स्कूल बदलने के लिए राजी कर लिया है.

स्नेह मुंह बना कर बोली, ‘‘क्या अंकल आप भी स्कूल पुराण ले कर बैठ गए. बड़ी मुश्किल से तो नानी की कथा बंद की है.’’

‘‘बेटे, इस का जिक्र बहुत जरूरी है. देखो, जब हम स्कूल में पढ़ते थे तब गरमियों और सर्दियों में स्कूल का अलग समय होता था. गरमी में सुबह 7 बजे और सर्दियों में 10 बजे स्कूल लगता था. गरमी में 12 बजे घर वापस आ जाते थे और सर्दी में धूप में बैठ कर पढ़ते थे.’’

‘‘अच्छा,’’ वृंदा ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘आप कुरसीमेज क्लास से रोज बाहर लाते थे और फिर अंदर करते थे. अपने सर पर उठाते थे, क्या नानाजी?’’

‘‘नहीं बेटे, हमारे समय में तो मेजकुरसी नहीं होते थे. जमीन पर दरी बिछा कर बैठते थे. धूप निकलते ही मास्टरजी हुक्म देते थे और सारे बच्चे फटाफट दरियां उठा कर क्लासरूम के बाहर धूप में बैठ जाते थे. मजे की बात तो बरसात में होती थी. स्कूल की छत टपकती थी. जिस दिन बारिश होती थी, उस दिन छुट्टी हो जाती थी, मास्टरजी कहते थे, रेनी डे, बच्चो, आज की छुट्टी.’’

यह सुन कर वृंदा और आकृति जोरजोर से हंसने लगीं…रेनी डे, होलीडे, कहतेकहते और हंसतेहंसते दोनों लोटपोट हो गईं.

अब अनुभव कहने लगा, ‘‘वर्मा अंकल के बाद मेरी भी सुनो, मेरा स्कूल 2 शिफ्टों में लगता था. छठी क्लास तक दूसरी शिफ्ट में स्कूल लगता था. खाना खा कर 1 बजे स्कूल जाते थे. 6 बजे वापस आते थे, मजे से सुबह 7-8 बजे सो कर उठते थे, सुबह स्कूल जाने की कोई जल्दी नहीं होती थी.’’

आकृति और वृंदा को स्कूल की बातों में बहुत अधिक रस आ रहा था और वे हंसतेहंसते लोटपोट होती जा रही थीं.

अकी को छुट्टियों में इतना अधिक खुश देख कर स्नेह ने पास के स्कूल का महत्त्व समझा और फाइनल परीक्षा के बाद नए सत्र में घर के पास स्कूल में अकी का दाखिला करा दिया. घर से स्कूल का पैदल रास्ता सिर्फ 5 मिनट का था. 2 दिन में ही अकी इतनी अधिक खुश हुई और स्नेह से कहा, ‘‘मम्मी, यह स्कूल बहुत अच्छा है, मेरी 2 फ्रेंड्स साथ वाली सोसाइटी में रहती हैं. मम्मी, आप को मालूम है, वे साइकिल पर स्कूल आती हैं, मुझे भी साइकिल दिला दो, 2 मिनट में स्कूल पहुंच जाऊंगी.’’

अनुभव ने आकृति को साइकिल दिला दी. अब अकी को न तो टेंशन था सुबह जल्दी उठ कर स्कूल जाने की और न स्कूल बस मिस हो जाने का. सारा दिन वह खुश रहती था. होमवर्क करने के बाद काफी समय छोटे काका के साथ खेलती और बेफिक्र चहकती रहती.

6 महीने में एकदम लंबा कद पा गई आकृति को देख कर स्नेह खुशी से फूली नहीं समाती थी. जो अकी कल तक सारा दिन थकीथकी रहती थी, आज वह कहने लगी, ‘‘मम्मी, मुझे चाय बनाना सिखाओ, मैं आप को सुबह बेड टी पिलाया करूंगी.’’

ये भी पढ़ें- मधु बना विष

सुन कर स्नेह को अपनी मां की कही बातें बारबार याद आतीं कि बच्चों के बहुमुखी विकास के लिए उन का बेफिक्र होना बहुत जरूरी है. उन पर उन की क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालना चाहिए. बच्चों की खुशी में ही हमारी खुशी होती है.

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बच्चों की भावना: भाग-1

अब आगे पढ़ें- 

आखिरी किस्त

अभी अकी को एक सप्ताह और स्कूल जाना था, ठंड इस साल कुछ अधिक थी. सुबह जबरदस्त कोहरा होने लगा. रोज सुबह अकी को इतनी जल्दी स्कूल के लिए तैयार होते देख कर नानी ने स्नेह से कहा, ‘‘बेटी, किसी पास के स्कूल में अकी को दाखिल करवा दे. इतना अधिक परिश्रम छोटे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए घातक है.’’

‘‘मां, मैं स्कूल चेंज नहीं कराऊंगी. बहुत नामी और बढि़या स्कूल है.’’

इस का जवाब अनुभव ने दिया, ‘‘स्नेह, नानी ठीक कह रही हैं, मैं ने सोच लिया है कि इस साल रिजल्ट निकलने पर अकी का दाखिला किसी पास के स्कूल में करवा दूंगा,’’ और फिर उस ने पूरी बात स्नेह को विस्तारपूर्वक बताई कि कैसे फटकार लगा कर प्रिंसिपल ने उसे अपमानित किया. ऐसी बात सुन कर स्नेह उदास हो गई कि उस का अकी को एक नामी स्कूल में पढ़ाने का अरमान साकार नहीं हो पाएगा. लेकिन अनुभव के दृढ़ निश्चय और नानी के सहयोग के आगे स्नेह को झुकना पड़ा.

आकृति यह सुन कर बहुत खुश हुई कि अब उसे नए सत्र से पास के किसी स्कूल में जाना होगा. इतनी जल्दी भी नहीं उठना पड़ेगा. स्कूल बस में वह बहुत अधिक परेशान होती थी. बड़े बच्चे बस की सीटों पर छोटे बच्चों को बैठने नहीं देते थे. स्कूल टीचर भी उन्हें कुछ नहीं कहती थीं. उलटे सब से आगे की सीटों पर बैठ जाती थीं.

गरमियों में तो इतना ज्यादा पसीना आता, घबराहट होती कि तबीयत खराब हो जाती थी, लेकिन पापामम्मी तो इस बारे में सोचते ही नहीं. सर्दियों में कितनी ज्यादा ठंड होती है. स्कर्ट पहन कर जाना पड़ता है. ऊपर से कोट पहना देते हैं, लेकिन स्कर्ट पहनने से टांगों में बहुत ज्यादा ठंड लगती है. छोटे बच्चों की परेशानी कोई नहीं समझता.

ठंड बढ़ती जा रही थी. बच्चों की परेशानी को महसूस कर प्रशासन ने सरकारी स्कूलों की छुट्टी समय से पहले घोषित कर दी. अभिभावकों के दबाव में आ कर निजी स्कूलों में भी निर्धारित समय से पहले सर्दियों की छुट्टियां घोषित कर दीं. जिस दिन छुट्टियों की घोषणा की, आकृति अत्याधिक खुशी के साथ झूमती हुई, नाचती हुई स्कूल से वापस आई. जैसे नानी ने फ्लैट का दरवाजा खोला, आकृति नानी से लिपट गई.

‘‘नानी, मेरी प्यारी नानी, आज मैं आजाद पंछी हूं. हमारी कल से पूरे 20 दिन की छुट्टी. अब मैं रोज छोटे काका के संग खेलूंगी,’’ और अपना स्कूल बैग एक तरफ पटक दिया और आईने के सामने कमर मटकाते हुए गीत गाने लगी.

तभी स्नेह ने आवाज लगाई, ‘‘अकी, काका सो रहा है, शोर मत मचाओ.’’

‘‘गाना भी नहीं गाने देते,’’ कह कर अकी बाथरूम में मुंह धोने के लिए चली गई और गीत गाने लगी, ‘‘मैं ने जिसे अभी देखा है, उसे कह दूं, प्रीटी वूमन, देखो, देखो न प्रीटी वूमन, तुम भी कहो न प्रीटी वूमन.’’

अकी का गाना सुन कर स्नेह ने उस की नानी से कहा, ‘‘मम्मी, जा कर अकी को बाथरूम से निकालो, वरना वह 2 घंटे से पहले बाहर नहीं आएगी.’’

नानी ने अकी को बाथरूम में जा कर कहा, ‘‘प्रीटी वूमन, बहुत बनसंवर लिए. अब बाहर आ जाइए. छोटा काका आप को बुला रहा है.’’

‘‘सच्ची,’’ कह कर अकी ने फर्राटे की दौड़ लगाई, ‘‘यह क्या नानी, छोटा काका तो सो रहा है, आप ने मेरा मजाक उड़ा कर सारा मूड खराब कर दिया,’’ अकी ने मुंह बनाते हुए कहा.

ये भी पढ़ें- बंटी हुई औरत

‘‘मूड कैसे बनेगा, मेरी लाड़ो का,’’ नानी ने अकी को अपनी गोद में बिठाते हुए पूछा.

‘‘जब पापा गाना गाएंगे तब मैं पापा के साथ मिल कर गाऊंगी.’’

‘‘वह क्यों?’’

‘‘नानी, आप को नहीं पता, पापा को यह गाना बहुत अच्छा लगता है. मम्मी को देख कर गाते हैं.’’

‘‘अच्छा अकी, पापा का गाना तो बता दिया, मम्मी कौन सा गाना गाती हैं, पापा को देख कर?’’ इस से पहले अकी कुछ कहती, स्नेह तुनक कर बोली, ‘‘मां, तुम यह क्या बातें ले कर बैठ गईं.’’

यह सुनते ही अकी नानी के कान में धीरे से बोली, ‘‘नानी, मम्मी को थोड़ा समझाओ. हमेशा डांटती रहती हैं.’’

छुट्टियों में अकी को बेफिक्र देख कर नानी ने स्नेह से कहा कि बच्चों के कुदरती विकास के लिए जरूरी है कि उन्हें पूरा समय मिले, पढ़ने के साथ खेलने का मौका मिले. क्या तू भूल गई, किस तरह बचपन में तू पड़ोस की लड़कियों के साथ खेलती थी और पूरा महल्ला शोर से सिर पर उठाती थी. हम अपना बचपन भूल जाते हैं कि हम ने भी शैतानियां की थीं. बच्चों पर आदर्श थोपते हैं, जो एकदम अनुचित है.

‘‘मां, तुम भाषण पर आ गई हो,’’ स्नेह ने तुनक कर कहा.

‘‘तुम खुद देखो कि अकी आजकल कितनी खुश है, जितने दिन स्कूल गई, एकदम थकी सी रहती थी, अब एकदम चुस्त रहती है. इसलिए कहती हूं कि अनुभव की बात मान ले.’’

‘‘मम्मी, तुम और अनु एक जैसे हो, एकदूसरे की हां में हां मिलाते रहते हो. मेरी भावनाओं की तरफ सोचते भी नहीं हो. आखिर आप ने मुझे इतना क्यों पढ़ाया. एमबीए के बाद शादी कर दी. मेरा कैरियर भी नहीं बनने दिया. मुश्किल से 1 साल भी नौकरी नहीं की, शादी हो गई. शादी के बाद शहर बदल गया, फिर अकी के जन्म के कारण नौकरी नहीं की. अकी स्कूल जाने लगी, तब बड़ी मुश्किल से अनु को राजी किया. 3-4 साल ही नौकरी की, अब फिर छोटे काका के जन्म पर नौकरी छोड़नी पड़ रही है.’’

‘‘स्नेह, एक बात तुम समझ लो, परिवार के लालनपालन और बच्चों में अच्छी आदतों की नींव डालने के लिए मांबाप को अपनी कई इच्छाओं को मारना पड़ता है. परिवार को सही तरीके से पालना नौकरी करने से अधिक कठिन है. गृहस्थी की कठिन राह से परेशान लोग संन्यास लेते हैं, लेकिन दरदर भटकने पर भी न तो शांति मिलती है और न ही सुख. कठिन गृहस्थी में ही सच्चा सुख है.’’

स्नेह मां के आगे निरुत्तर हो गई और आकृति को घर के पास वाले स्कूल में दाखिल करने को राजी हो गई. सर्दियों की छुट्टियों में वर्माजी की लड़की भी अपने परिवार के साथ रहने आ गई. वर्माजी की नातिन वृंदा आकृति की हमउम्र थी. दोनों सारा दिन एकसाथ धमाचौकड़ी करती रहतीं और नानी, स्नेह, छोटा काका वर्मा परिवार के साथ सोसाइटी के लौन में धूप सेंकते. एक दिन धूप सेंकते वर्माजी ने अपनी लड़की को सलाह दी कि वह भी वृंदा को पास के स्कूल में दाखिल करवा दे. वे आकृति की नानी के गुण गाने लगे कि उन्होंने स्नेह को आकृति के स्कूल बदलने के लिए राजी कर लिया है.

स्नेह मुंह बना कर बोली, ‘‘क्या अंकल आप भी स्कूल पुराण ले कर बैठ गए. बड़ी मुश्किल से तो नानी की कथा बंद की है.’’

‘‘बेटे, इस का जिक्र बहुत जरूरी है. देखो, जब हम स्कूल में पढ़ते थे तब गरमियों और सर्दियों में स्कूल का अलग समय होता था. गरमी में सुबह 7 बजे और सर्दियों में 10 बजे स्कूल लगता था. गरमी में 12 बजे घर वापस आ जाते थे और सर्दी में धूप में बैठ कर पढ़ते थे.’’

‘‘अच्छा,’’ वृंदा ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘आप कुरसीमेज क्लास से रोज बाहर लाते थे और फिर अंदर करते थे. अपने सर पर उठाते थे, क्या नानाजी?’’

‘‘नहीं बेटे, हमारे समय में तो मेजकुरसी नहीं होते थे. जमीन पर दरी बिछा कर बैठते थे. धूप निकलते ही मास्टरजी हुक्म देते थे और सारे बच्चे फटाफट दरियां उठा कर क्लासरूम के बाहर धूप में बैठ जाते थे. मजे की बात तो बरसात में होती थी. स्कूल की छत टपकती थी. जिस दिन बारिश होती थी, उस दिन छुट्टी हो जाती थी, मास्टरजी कहते थे, रेनी डे, बच्चो, आज की छुट्टी.’’

यह सुन कर वृंदा और आकृति जोरजोर से हंसने लगीं…रेनी डे, होलीडे, कहतेकहते और हंसतेहंसते दोनों लोटपोट हो गईं.

अब अनुभव कहने लगा, ‘‘वर्मा अंकल के बाद मेरी भी सुनो, मेरा स्कूल 2 शिफ्टों में लगता था. छठी क्लास तक दूसरी शिफ्ट में स्कूल लगता था. खाना खा कर 1 बजे स्कूल जाते थे. 6 बजे वापस आते थे, मजे से सुबह 7-8 बजे सो कर उठते थे, सुबह स्कूल जाने की कोई जल्दी नहीं होती थी.’’

आकृति और वृंदा को स्कूल की बातों में बहुत अधिक रस आ रहा था और वे हंसतेहंसते लोटपोट होती जा रही थीं.

अकी को छुट्टियों में इतना अधिक खुश देख कर स्नेह ने पास के स्कूल का महत्त्व समझा और फाइनल परीक्षा के बाद नए सत्र में घर के पास स्कूल में अकी का दाखिला करा दिया. घर से स्कूल का पैदल रास्ता सिर्फ 5 मिनट का था. 2 दिन में ही अकी इतनी अधिक खुश हुई और स्नेह से कहा, ‘‘मम्मी, यह स्कूल बहुत अच्छा है, मेरी 2 फ्रेंड्स साथ वाली सोसाइटी में रहती हैं. मम्मी, आप को मालूम है, वे साइकिल पर स्कूल आती हैं, मुझे भी साइकिल दिला दो, 2 मिनट में स्कूल पहुंच जाऊंगी.’’

अनुभव ने आकृति को साइकिल दिला दी. अब अकी को न तो टेंशन था सुबह जल्दी उठ कर स्कूल जाने की और न स्कूल बस मिस हो जाने का. सारा दिन वह खुश रहती था. होमवर्क करने के बाद काफी समय छोटे काका के साथ खेलती और बेफिक्र चहकती रहती.

6 महीने में एकदम लंबा कद पा गई आकृति को देख कर स्नेह खुशी से फूली नहीं समाती थी. जो अकी कल तक सारा दिन थकीथकी रहती थी, आज वह कहने लगी, ‘‘मम्मी, मुझे चाय बनाना सिखाओ, मैं आप को सुबह बेड टी पिलाया करूंगी.’’

ये भी पढ़ें- मधु बना विष

सुन कर स्नेह को अपनी मां की कही बातें बारबार याद आतीं कि बच्चों के बहुमुखी विकास के लिए उन का बेफिक्र होना बहुत जरूरी है. उन पर उन की क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालना चाहिए. बच्चों की खुशी में ही हमारी खुशी होती है.

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August 30, 2019 at 08:47AM

औरत एक पहेली: भाग-2

औरत एक पहेली: भाग-1

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आखिरी किस्त

कभी ऐसा भी हो जाता कि विनीता अपने किसी निजी कार्यवश संदीप को कार में बैठा कर कहीं ले जातीं. संदीप घंटों के पश्चात प्रसन्न मुद्रा में वापस लौटते और बताते कि वह किसी बड़े होटल में विनीता के साथ भोजन कर के आ रहे हैं.

मेरे अंदर की औरत यह सब सहन नहीं कर पा रही थी. मैं यह सोच कर ईर्ष्या से जलती भुनती रहती कि विनीता की खूबसूरती ने संदीप के मन को बांध लिया है. अब उन्हें मैं फीकी लगने लगी हूं. उन के मन में मेरा स्थान विनीता लेती जा रही है.

कभी मैं क्षुब्ध हो कर सोचने लगती, इस शहर में मकान बनवाने से मेरा जीवन ही नीरस हो गया. एक शहर में रहते हुए संदीप और विनीता का साथ कभी नहीं छूट पाएगा. अब संदीप मुझे पहले की भांति कभी प्यार नहीं दे पाएंगे. विनीता अदृश्य रूप से मेरी सौत बन चुकी है, हो सकता है दोनों हमबिस्तर हो चुके हों. आखिर होटलों में जाने का और मकसद भी क्या हो सकता है?’

हमारा मकान पूरा बन गया तो मुहूर्त्त करने के पश्चात हम अपने घर में आ कर रहने लगे.

विनीता का आनाजाना और संदीप के साथ घुलमिल कर बातें करना कम नहीं हो पाया था.

एक दिन मेरे मन का आक्रोश जबान पर फूट पड़ा, ‘‘अब इस औरत के यहां आनाजाना बंद क्यों नहीं कर देते? मकान कभी का बन कर पूरा हो चुका है, अब इस फालतू मेलजोल का समापन हो जाना ही बेहतर है.’’

‘‘कैसी स्वार्थियों जैसी बातें करने लगी हो. विनीताजी ने हमारी कितनी सहायता की थी, अब हम उन का तिरस्कार कर दें, क्या यह अच्छा लगता है?’’

‘‘तब क्या जीवन भर उसे गले से लगाए रहोगे.’’

‘‘तुम्हें जलन होती है उस की खूबसूरती से,’’ संदीप मेरे क्रोध की परवा न कर के मुसकराते रहे. फिर लापरवाही से बाहर चले गए.

क्रोध और उत्तेजना से मैं कांप रही थी. जी चाह रहा था कि अभी जा कर उस आवारा, चरित्रहीन औरत का मुंह नोच डालूं.

अपने अपाहिज पति की आंखों में धूल झोंक कर पराए मर्दों के साथ गुलछर्रे उड़ाती फिरती है. अब तक न मालूम कितने पुरुषों के साथ मुंह काला कर चुकी होगी.

मुझे उस अपरिचित अनदेखे व्यक्ति से गहरी सहानुभूति होने लगी, जिस की पत्नी बन कर विनीता उस के प्रति विश्वासघात कर रही थी.

मैं सोचने लगी, ‘अगर यह कांटा अभी से उखाड़ कर नहीं फेंका गया तो मेरा मन जख्मी हो कर लहूलुहान हो जाएगा. इस से पहले कि मामला और आगे बढ़े मुझे विनीता के पति के पास जा कर सबकुछ साफसाफ बता देना चाहिए कि वे अपनी बदचलन पत्नी के ऊपर अंकुश लगाना शुरू कर दें. वह दूसरों के घर उजाड़ती फिरती है.’

उन के घर का पता मुझे मालूम था. एक बार मैं संदीप के साथ घर के बाहर तक जा चुकी थी. उस वक्त विनीता घर पर नहीं थीं. नौकर के बताने पर हम बाहर से ही लौट आए थे.

घर के सभी काम बच्चों पर छोड़ कर मैं विनीता के घर जाने के लिए तैयार हो गई. एक रिकशे में बैठ कर मैं उन के घर पहुंच गई.

विनीता घर में नहीं थीं. नौकर से साहब का कमरा पूछ कर मैं दनदनाती हुई सीढि़यां चढ़ कर ऊपर पहुंची.

नौकर ने कमरे के अंदर जा कर साहब को मेरे आगमन की सूचना दे दी. फिर मुझे अंदर जाने का इशारा कर के वह किसी काम में लग गया.

दरवाजे पर लहराता परदा एक ओर खिसका कर मैं ने अंदर प्रवेश किया तो सभी शब्द मेरे हलक में ही सूख गए. सामने कुरसी पर एक ऐसा इनसान बैठा हुआ था, जिस की कमर के नीचे दोनों टांग गायब थीं. उसे इनसान न कह कर सिर्फ एक धड़ कहा जाए तो बेहतर होगा.

‘‘आ जाओ, रेखा, मुझे विश्वास था  जीवन में दोबारा तुम से मुलाकात अवश्य होगी,’’ एक दर्दीला चिरपरिचित स्वर गूंज उठा.

उस पुरुष को पहचान कर मेरा रोंआरोंआ सिहर उठा था. पैरों तले जमीन खिसकती जा रही थी.

यह कोई और नहीं, मेरे भूतपूर्व पति सूरज थे. इन से वर्षों पहले मेरा तलाक हो चुका था. फिर मैं ने संदीप के साथ नई दुनिया बसा ली थी और संदीप को अपने अतीत से हमेशा अनभिज्ञ रखा था.

अब सूरज को देख कर मेरे कड़वे अतीत का वह काला पन्ना फिर से उजागर हो गया था, जिस की यादें मेरे मन की गहराइयों में दफन हो चुकी थीं.

वर्षों पहले मांबाप ने बड़ी धूमधाम से मेरा विवाह सूरज के साथ किया था. सूरज एक कुशल वास्तुकार थे. घर भी संपन्न था. विवाह के प्रथम वर्ष में ही मैं एक सुंदर, स्वस्थ बेटे की मां बन गई थी.

फिर हमारी खुशियों पर एकाएक वज्रपात हुआ. एक सड़क दुर्घटना में सूरज की दोनों टांगों की हड्डियां टूट कर चूरचूर हो गई थीं. जान बचाने हेतु डाक्टरों को उन की टांगें काट देनी पड़ी थीं.

एक अपाहिज पति को मेरा मन स्वीकार नहीं कर पाया. मैं खिन्न हो उठी. बातबात पर लड़ने, चिड़चिड़ाने लगी. मन का असंतोष अधिक बढ़ गया तो मैं सूरज को छोड़ कर मायके  में जा कर रहने लगी थी.

मायके वालों के प्रयासों के बाद भी मैं ससुराल जाने को तैयार नहीं हो पाई तो सब ने मुझे दुखी देख कर मेरा तलाक कराने के लिए कचहरी में प्रार्थनापत्र दिलवा दिया. मैं सूरज से छुटकारा पा कर किसी समर्थ पूर्ण पुरुष से विवाह करने के लिए अत्यंत इच्छुक थी.

एक दिन हमेशा के लिए हमारा संबंधविच्छेद हो गया. कानून ने सूरज की विकलांगता के कारण हमारे बेटे विक्की को मेरी सुपुर्दगी में दे दिया.

विक्की की वजह से मेरे पुनर्विवाह में अड़चनें आने लगीं. बच्चे वाली स्त्री से विवाह करने के लिए कौन पुरुष तैयार हो सकता था. मेरे मायके वाले भी विक्की की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लादने के लिए तैयार नहीं हो पाए.

इन सब बातों की जानकारी हो जाने पर एक दिन सूरज की माताजी मेरे मायके आ पहुंचीं. उन्होंने रोरो कर विक्की को मुझ से ले लिया.

ये भी पढ़ें- उलझन

सूरज की माताजी प्रसन्न मन से वापस लौट आईं. मेरा बोझ हलका हो गया था. विक्की की जुदाई के गम से अधिक मुझे दूसरे विवाह की अभिलाषा थी.

एक दिन मेरा विवाह संदीप से संपन्न हो गया. हम दोनों का यह दूसरा विवाह था. संदीप विधुर थे. विवाह की पहली रात ही हम दोनों ने अपनेअपने अतीत को हमेशा के लिए भुला देने की प्रतिज्ञा कर ली थी.

फिर एक दिन मायके जाने पर मुझे मालूम हुआ कि सूरज की माताजी सूरज और विक्की को ले कर किसी अन्य शहर में चली गई हैं.

‘‘बैठो, रेखा. खड़ी क्यों हो? लगता है, मुझे अचानक देख कर हैरान रह गई हो. तुम ने तो समझ लिया होगा मैं कहीं मरखप गया होऊंगा.’’

‘‘नहीं, सूरज, ऐसा मत कहो. सभी को जीवित रहने का पूरापूरा अधिकार है,’’ मेरे मुंह से अचानक निकल गया और मैं एक कुरसी पर निढाल सी बैठ गई.

‘‘मेरे जीवित रहने का अधिकार तो तुम छीन कर ले गई थीं. रेखा, तुम छोड़ कर चली गईं तो मैं लाश बन कर रह गया था. अगर विनीता का सहारा नहीं मिलता तो मैं अब तक अवश्य मर चुका होता. आज विनीता की बदौलत ही मैं इतनी बड़ी फर्म का मालिक बना बैठा हूं.’’

बहुत प्रयत्न करने के बाद भी मेरे आंसू रुक नहीं पाए. मैं ने मुंह फेर कर रूमाल से अपना चेहरा साफ किया.

सूरज कहते जा रहे थे, ‘‘तुम्हें वह नर्स याद है जो मेरी देखभाल के लिए मां ने घर में रखी थी. वह शर्मीली सी छुईमुई लड़की विनी.’’

‘ओह, अब मैं समझी कि मुझे विनीताजी का चेहरा इतना जानापहचाना क्यों लग रहा था.’

‘‘तुम विनी को नहीं पहचान पाईं, परंतु विनी ने पहली बार देख कर ही तुम्हें पहचान लिया था. उस ने मुझे तुम्हारे बारे में, तुम्हारी आर्थिक स्थिति और रहनसहन के बारे में सभी कुछ बतला दिया था. मैं तुम्हारी यथासंभव सहायता करने के लिए तुरंत तैयार हो गया था. मेरे आग्रह पर विनीता ने कदमकदम पर तुम्हारी और तुम्हारे पति की मदद की थी.

‘‘मेरे पैर मौजूद होते तो मैं खुद चल कर तुम्हारे घर आता. तुम्हारे सामने दौलत के ढेर लगा कर कहता, ‘जितनी दौलत की आवश्यकता हो, ले कर अपनी भूख मिटा लो. तुम इसी वजह से मुझे छोड़ कर गई थीं कि मैं अपाहिज हूं. दौलत पैदा करने में असमर्थ हूं…तुम्हें पूर्ण शारीरिक सुख नहीं दे पाऊंगा…’’ कहतेकहते सूरज का गला भर आया था.

‘‘बस, रहने दो सूरज, मैं और अधिक नहीं सुन सकूंगी,’’ मैं रो पड़ी, ‘‘एक जहरीली चुभती हुई यादगार ही तो हूं, भुला क्यों नहीं दिया मुझे.’’

‘‘कैसे भुला पाता कि मेरे विक्की की तुम मां हो…’’

‘‘विक्की कहां है, सूरज? वह कैसा है, क्या मैं उसे देख सकती हूं,’’ मैं व्यग्र हो कर कुरसी से उठ कर खड़ी हो गई.

सूरज अपनेआप को संयत कर चुके थे, ‘‘विक्की यानी विकास से तुम विनीता के दफ्तर में मिल चुकी हो. वह विनीता के बराबर वाली कुरसी पर बैठ कर दफ्तर के कामों में उस का हाथ बंटाता है. अब वह एक प्रसिद्ध वास्तुकार है. तुम्हारे मकान का नक्शा उसी ने तैयार किया था.’’

‘‘सच, वही मेरा विक्की है,’’ हर्ष व उत्तेजना से मैं गद्गद हो उठी. मेरी आंखों के सामने वह गोरा, स्वस्थ युवक घूम गया, जिस से मैं कई बार मिल चुकी थी, बातें कर चुकी थी. मेरे मकान के मुहूर्त पर वह विनीता के साथ मेरे घर भी आया था.

अचानक मेरे मन में एक अनजाना डर उभर आया, ‘‘क्या विक्की जानता है कि मैं उस की मां हूं?’’

‘‘नहीं, वह उस मां से नफरत करता है जो उस के अपाहिज पिता को छोड़ कर सुख की तलाश में अन्यत्र चली गई थी. वह विनीता को ही अपनी सगी मां मानता है. जानती हो रेखा, वह मुझे कितना चाहता है, मेरे बिना भोजन भी नहीं करता.’’

‘‘सूरज, मेरी एक बात मानोगे.’’

‘‘कहो, रेखा.’’

‘‘विक्की से कभी मत कहना कि मैं उस की मां हूं. यही कहना कि विनीता ही उस की असली मां है,’’ रोती हुई मैं सूरज के कमरे से बाहर निकल आई.

जिस पौधे को मैं उजाड़ कर चली गई थी, विनीता ने उसे जीवनदान दे कर हराभरा कर दिया था, मैं सोचती रह गई कि स्वार्थी विनीता है या मैं. कितना गलत समझ बैठी थी मैं विनीता को. इस महान नारी ने 2 बार मेरा घर बसाया था. एक बार अपाहिज सूरज और मासूम बेसहारा विक्की को अपनाकर और दूसरी बार मेरा मकान बनवा कर.

मैं सीढि़यां उतर कर नीचे आ गई.

घर वापस लौटी तो मेरे चेहरे की उड़ी हुई रंगत देख कर बच्चे और संदीप सब सोच में पड़ गए. एकसाथ ही मुझ से कारण पूछने लगे. मैं ने एक गिलास पानी पिया और इत्मीनान से बिस्तर पर बैठ कर संदीप से कहने लगी, ‘‘सुनो, तुम विनीताजी के दफ्तर में जा कर उन्हें और उन के पूरे परिवार को रात के खाने के लिए आमंत्रित कर आओ. उन्होंने हमारे लिए इतना सब किया है, हमारा भी तो उन के प्रति कुछ फर्ज है.’’

ये भी पढ़ें- कैक्टस के फूल

बच्चे हैरानी से एकदूसरे का मुंह ताकते रह गए. संदीप मेरी ओर ऐसे देखने लगे, जैसे कह रहे हों, ‘औरत सचमुच एक पहेली होती है. उसे समझ पाना असंभव है.’

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औरत एक पहेली: भाग-1

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आखिरी किस्त

कभी ऐसा भी हो जाता कि विनीता अपने किसी निजी कार्यवश संदीप को कार में बैठा कर कहीं ले जातीं. संदीप घंटों के पश्चात प्रसन्न मुद्रा में वापस लौटते और बताते कि वह किसी बड़े होटल में विनीता के साथ भोजन कर के आ रहे हैं.

मेरे अंदर की औरत यह सब सहन नहीं कर पा रही थी. मैं यह सोच कर ईर्ष्या से जलती भुनती रहती कि विनीता की खूबसूरती ने संदीप के मन को बांध लिया है. अब उन्हें मैं फीकी लगने लगी हूं. उन के मन में मेरा स्थान विनीता लेती जा रही है.

कभी मैं क्षुब्ध हो कर सोचने लगती, इस शहर में मकान बनवाने से मेरा जीवन ही नीरस हो गया. एक शहर में रहते हुए संदीप और विनीता का साथ कभी नहीं छूट पाएगा. अब संदीप मुझे पहले की भांति कभी प्यार नहीं दे पाएंगे. विनीता अदृश्य रूप से मेरी सौत बन चुकी है, हो सकता है दोनों हमबिस्तर हो चुके हों. आखिर होटलों में जाने का और मकसद भी क्या हो सकता है?’

हमारा मकान पूरा बन गया तो मुहूर्त्त करने के पश्चात हम अपने घर में आ कर रहने लगे.

विनीता का आनाजाना और संदीप के साथ घुलमिल कर बातें करना कम नहीं हो पाया था.

एक दिन मेरे मन का आक्रोश जबान पर फूट पड़ा, ‘‘अब इस औरत के यहां आनाजाना बंद क्यों नहीं कर देते? मकान कभी का बन कर पूरा हो चुका है, अब इस फालतू मेलजोल का समापन हो जाना ही बेहतर है.’’

‘‘कैसी स्वार्थियों जैसी बातें करने लगी हो. विनीताजी ने हमारी कितनी सहायता की थी, अब हम उन का तिरस्कार कर दें, क्या यह अच्छा लगता है?’’

‘‘तब क्या जीवन भर उसे गले से लगाए रहोगे.’’

‘‘तुम्हें जलन होती है उस की खूबसूरती से,’’ संदीप मेरे क्रोध की परवा न कर के मुसकराते रहे. फिर लापरवाही से बाहर चले गए.

क्रोध और उत्तेजना से मैं कांप रही थी. जी चाह रहा था कि अभी जा कर उस आवारा, चरित्रहीन औरत का मुंह नोच डालूं.

अपने अपाहिज पति की आंखों में धूल झोंक कर पराए मर्दों के साथ गुलछर्रे उड़ाती फिरती है. अब तक न मालूम कितने पुरुषों के साथ मुंह काला कर चुकी होगी.

मुझे उस अपरिचित अनदेखे व्यक्ति से गहरी सहानुभूति होने लगी, जिस की पत्नी बन कर विनीता उस के प्रति विश्वासघात कर रही थी.

मैं सोचने लगी, ‘अगर यह कांटा अभी से उखाड़ कर नहीं फेंका गया तो मेरा मन जख्मी हो कर लहूलुहान हो जाएगा. इस से पहले कि मामला और आगे बढ़े मुझे विनीता के पति के पास जा कर सबकुछ साफसाफ बता देना चाहिए कि वे अपनी बदचलन पत्नी के ऊपर अंकुश लगाना शुरू कर दें. वह दूसरों के घर उजाड़ती फिरती है.’

उन के घर का पता मुझे मालूम था. एक बार मैं संदीप के साथ घर के बाहर तक जा चुकी थी. उस वक्त विनीता घर पर नहीं थीं. नौकर के बताने पर हम बाहर से ही लौट आए थे.

घर के सभी काम बच्चों पर छोड़ कर मैं विनीता के घर जाने के लिए तैयार हो गई. एक रिकशे में बैठ कर मैं उन के घर पहुंच गई.

विनीता घर में नहीं थीं. नौकर से साहब का कमरा पूछ कर मैं दनदनाती हुई सीढि़यां चढ़ कर ऊपर पहुंची.

नौकर ने कमरे के अंदर जा कर साहब को मेरे आगमन की सूचना दे दी. फिर मुझे अंदर जाने का इशारा कर के वह किसी काम में लग गया.

दरवाजे पर लहराता परदा एक ओर खिसका कर मैं ने अंदर प्रवेश किया तो सभी शब्द मेरे हलक में ही सूख गए. सामने कुरसी पर एक ऐसा इनसान बैठा हुआ था, जिस की कमर के नीचे दोनों टांग गायब थीं. उसे इनसान न कह कर सिर्फ एक धड़ कहा जाए तो बेहतर होगा.

‘‘आ जाओ, रेखा, मुझे विश्वास था  जीवन में दोबारा तुम से मुलाकात अवश्य होगी,’’ एक दर्दीला चिरपरिचित स्वर गूंज उठा.

उस पुरुष को पहचान कर मेरा रोंआरोंआ सिहर उठा था. पैरों तले जमीन खिसकती जा रही थी.

यह कोई और नहीं, मेरे भूतपूर्व पति सूरज थे. इन से वर्षों पहले मेरा तलाक हो चुका था. फिर मैं ने संदीप के साथ नई दुनिया बसा ली थी और संदीप को अपने अतीत से हमेशा अनभिज्ञ रखा था.

अब सूरज को देख कर मेरे कड़वे अतीत का वह काला पन्ना फिर से उजागर हो गया था, जिस की यादें मेरे मन की गहराइयों में दफन हो चुकी थीं.

वर्षों पहले मांबाप ने बड़ी धूमधाम से मेरा विवाह सूरज के साथ किया था. सूरज एक कुशल वास्तुकार थे. घर भी संपन्न था. विवाह के प्रथम वर्ष में ही मैं एक सुंदर, स्वस्थ बेटे की मां बन गई थी.

फिर हमारी खुशियों पर एकाएक वज्रपात हुआ. एक सड़क दुर्घटना में सूरज की दोनों टांगों की हड्डियां टूट कर चूरचूर हो गई थीं. जान बचाने हेतु डाक्टरों को उन की टांगें काट देनी पड़ी थीं.

एक अपाहिज पति को मेरा मन स्वीकार नहीं कर पाया. मैं खिन्न हो उठी. बातबात पर लड़ने, चिड़चिड़ाने लगी. मन का असंतोष अधिक बढ़ गया तो मैं सूरज को छोड़ कर मायके  में जा कर रहने लगी थी.

मायके वालों के प्रयासों के बाद भी मैं ससुराल जाने को तैयार नहीं हो पाई तो सब ने मुझे दुखी देख कर मेरा तलाक कराने के लिए कचहरी में प्रार्थनापत्र दिलवा दिया. मैं सूरज से छुटकारा पा कर किसी समर्थ पूर्ण पुरुष से विवाह करने के लिए अत्यंत इच्छुक थी.

एक दिन हमेशा के लिए हमारा संबंधविच्छेद हो गया. कानून ने सूरज की विकलांगता के कारण हमारे बेटे विक्की को मेरी सुपुर्दगी में दे दिया.

विक्की की वजह से मेरे पुनर्विवाह में अड़चनें आने लगीं. बच्चे वाली स्त्री से विवाह करने के लिए कौन पुरुष तैयार हो सकता था. मेरे मायके वाले भी विक्की की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लादने के लिए तैयार नहीं हो पाए.

इन सब बातों की जानकारी हो जाने पर एक दिन सूरज की माताजी मेरे मायके आ पहुंचीं. उन्होंने रोरो कर विक्की को मुझ से ले लिया.

ये भी पढ़ें- उलझन

सूरज की माताजी प्रसन्न मन से वापस लौट आईं. मेरा बोझ हलका हो गया था. विक्की की जुदाई के गम से अधिक मुझे दूसरे विवाह की अभिलाषा थी.

एक दिन मेरा विवाह संदीप से संपन्न हो गया. हम दोनों का यह दूसरा विवाह था. संदीप विधुर थे. विवाह की पहली रात ही हम दोनों ने अपनेअपने अतीत को हमेशा के लिए भुला देने की प्रतिज्ञा कर ली थी.

फिर एक दिन मायके जाने पर मुझे मालूम हुआ कि सूरज की माताजी सूरज और विक्की को ले कर किसी अन्य शहर में चली गई हैं.

‘‘बैठो, रेखा. खड़ी क्यों हो? लगता है, मुझे अचानक देख कर हैरान रह गई हो. तुम ने तो समझ लिया होगा मैं कहीं मरखप गया होऊंगा.’’

‘‘नहीं, सूरज, ऐसा मत कहो. सभी को जीवित रहने का पूरापूरा अधिकार है,’’ मेरे मुंह से अचानक निकल गया और मैं एक कुरसी पर निढाल सी बैठ गई.

‘‘मेरे जीवित रहने का अधिकार तो तुम छीन कर ले गई थीं. रेखा, तुम छोड़ कर चली गईं तो मैं लाश बन कर रह गया था. अगर विनीता का सहारा नहीं मिलता तो मैं अब तक अवश्य मर चुका होता. आज विनीता की बदौलत ही मैं इतनी बड़ी फर्म का मालिक बना बैठा हूं.’’

बहुत प्रयत्न करने के बाद भी मेरे आंसू रुक नहीं पाए. मैं ने मुंह फेर कर रूमाल से अपना चेहरा साफ किया.

सूरज कहते जा रहे थे, ‘‘तुम्हें वह नर्स याद है जो मेरी देखभाल के लिए मां ने घर में रखी थी. वह शर्मीली सी छुईमुई लड़की विनी.’’

‘ओह, अब मैं समझी कि मुझे विनीताजी का चेहरा इतना जानापहचाना क्यों लग रहा था.’

‘‘तुम विनी को नहीं पहचान पाईं, परंतु विनी ने पहली बार देख कर ही तुम्हें पहचान लिया था. उस ने मुझे तुम्हारे बारे में, तुम्हारी आर्थिक स्थिति और रहनसहन के बारे में सभी कुछ बतला दिया था. मैं तुम्हारी यथासंभव सहायता करने के लिए तुरंत तैयार हो गया था. मेरे आग्रह पर विनीता ने कदमकदम पर तुम्हारी और तुम्हारे पति की मदद की थी.

‘‘मेरे पैर मौजूद होते तो मैं खुद चल कर तुम्हारे घर आता. तुम्हारे सामने दौलत के ढेर लगा कर कहता, ‘जितनी दौलत की आवश्यकता हो, ले कर अपनी भूख मिटा लो. तुम इसी वजह से मुझे छोड़ कर गई थीं कि मैं अपाहिज हूं. दौलत पैदा करने में असमर्थ हूं…तुम्हें पूर्ण शारीरिक सुख नहीं दे पाऊंगा…’’ कहतेकहते सूरज का गला भर आया था.

‘‘बस, रहने दो सूरज, मैं और अधिक नहीं सुन सकूंगी,’’ मैं रो पड़ी, ‘‘एक जहरीली चुभती हुई यादगार ही तो हूं, भुला क्यों नहीं दिया मुझे.’’

‘‘कैसे भुला पाता कि मेरे विक्की की तुम मां हो…’’

‘‘विक्की कहां है, सूरज? वह कैसा है, क्या मैं उसे देख सकती हूं,’’ मैं व्यग्र हो कर कुरसी से उठ कर खड़ी हो गई.

सूरज अपनेआप को संयत कर चुके थे, ‘‘विक्की यानी विकास से तुम विनीता के दफ्तर में मिल चुकी हो. वह विनीता के बराबर वाली कुरसी पर बैठ कर दफ्तर के कामों में उस का हाथ बंटाता है. अब वह एक प्रसिद्ध वास्तुकार है. तुम्हारे मकान का नक्शा उसी ने तैयार किया था.’’

‘‘सच, वही मेरा विक्की है,’’ हर्ष व उत्तेजना से मैं गद्गद हो उठी. मेरी आंखों के सामने वह गोरा, स्वस्थ युवक घूम गया, जिस से मैं कई बार मिल चुकी थी, बातें कर चुकी थी. मेरे मकान के मुहूर्त पर वह विनीता के साथ मेरे घर भी आया था.

अचानक मेरे मन में एक अनजाना डर उभर आया, ‘‘क्या विक्की जानता है कि मैं उस की मां हूं?’’

‘‘नहीं, वह उस मां से नफरत करता है जो उस के अपाहिज पिता को छोड़ कर सुख की तलाश में अन्यत्र चली गई थी. वह विनीता को ही अपनी सगी मां मानता है. जानती हो रेखा, वह मुझे कितना चाहता है, मेरे बिना भोजन भी नहीं करता.’’

‘‘सूरज, मेरी एक बात मानोगे.’’

‘‘कहो, रेखा.’’

‘‘विक्की से कभी मत कहना कि मैं उस की मां हूं. यही कहना कि विनीता ही उस की असली मां है,’’ रोती हुई मैं सूरज के कमरे से बाहर निकल आई.

जिस पौधे को मैं उजाड़ कर चली गई थी, विनीता ने उसे जीवनदान दे कर हराभरा कर दिया था, मैं सोचती रह गई कि स्वार्थी विनीता है या मैं. कितना गलत समझ बैठी थी मैं विनीता को. इस महान नारी ने 2 बार मेरा घर बसाया था. एक बार अपाहिज सूरज और मासूम बेसहारा विक्की को अपनाकर और दूसरी बार मेरा मकान बनवा कर.

मैं सीढि़यां उतर कर नीचे आ गई.

घर वापस लौटी तो मेरे चेहरे की उड़ी हुई रंगत देख कर बच्चे और संदीप सब सोच में पड़ गए. एकसाथ ही मुझ से कारण पूछने लगे. मैं ने एक गिलास पानी पिया और इत्मीनान से बिस्तर पर बैठ कर संदीप से कहने लगी, ‘‘सुनो, तुम विनीताजी के दफ्तर में जा कर उन्हें और उन के पूरे परिवार को रात के खाने के लिए आमंत्रित कर आओ. उन्होंने हमारे लिए इतना सब किया है, हमारा भी तो उन के प्रति कुछ फर्ज है.’’

ये भी पढ़ें- कैक्टस के फूल

बच्चे हैरानी से एकदूसरे का मुंह ताकते रह गए. संदीप मेरी ओर ऐसे देखने लगे, जैसे कह रहे हों, ‘औरत सचमुच एक पहेली होती है. उसे समझ पाना असंभव है.’

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August 30, 2019 at 08:46AM

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-2

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-1

अब आगे पढ़ें-

‘खट… खट… खट…’ दरवाजे की दस्तक ने निकहत को चौंका दिया. वह पलंग पर बैठी एक रोमान्टिक सा गीत लिखने में मशगूल थी. दरवाजे पर संजीव के होने के ख्याल से उसका दिल बल्लियों उछलने लगा. वह लगभग भागती हुई सी दरवाजे तक पहुंची. कुंडी खोली तो उसके चेहरे पर खुशियों के हजारों रंग बिखर गये. सामने उसका संजीव खड़ा था. वो उससे लगभग लिपटते हुए बोली…

‘आज जल्दी कैसे आ गये…?’

‘कुछ काम था…’ छोटा सा जवाब देकर संजीव तख्त की ओर बढ़ गया, ‘अम्मी नहीं हैं…?’ उसने इधर-उधर दृष्टि घुमायी.

‘नहीं, जाहिद के साथ वैद्यजी के पास गयी हैं, मालिश का तेल लेने…’ निकहत ने उसे प्यार से देखते हुए कहा और उसके बगल में बैठ गयी.

‘निकहत… मैं बिजनेस के काम से कुछ दो-तीन महीने के लिए बाहर जा रहा हूं…?’

‘दो-तीन महीने के लिए… क्यों… कहां…?’ निकहत ने बेचैनी से पूछा.

‘कोलकाता…’ संजीव ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, ‘पापा चाहते हैं कि वहां हमारा एक नया शोरूम खुल जाए… वो अब बिजनेस बढ़ाना चाहते हैं…. इसके लिए मेरा जाना जरूरी है…’

‘कब तक वापस आ जाओगे…’ निकहत ने उदास होते हुए पूछा.

‘कम से कम तीन महीने तो लग ही जाएंगे… ज्यादा वक्त भी लग सकता है…’ संजीव ने जवाब दिया.

‘मैं यहां तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी…’ निकहत परेशान हो गयी.

‘अरे यार, समय जाते देर नहीं लगती, फिर ये भी तो सोचो अगर कोलकाता में हमारा बिजनेस सेट हो गया तो हमें कितना फायदा होगा… फिर पापा भी मुझसे खुश हो जाएंगे… क्या तुम यह नहीं चाहतीं…?’ संजीव प्यार से उसका चेहरा अपनी हथेलियों के बीच लेते हुए बोला.

‘वो तो ठीक है मगर…’ निकहत की आंखों में आंसू आ गये.

‘देखो निकहत, बात समझने की कोशिश करो, अगर मेरी वजह से पापा का बिजनेस बढ़ता है तो मेरे ऊपर उनका भरोसा बढ़ेगा, वो मेरी बात मानेंगे और तब हम दोनों की शादी के लिए मैं उनको आसानी से मना भी सकता हूं, वरना…’ संजीव ने उसे फुसलाने की कोशिश की.

निकहत की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे. संजीव से एक दिन की दूरी भी उसे बर्दाश्त नहीं थी और वह तीन महीने के लिए दूर जाने की बात कर रहा था, ‘मैं…’ कुछ कहते-कहते निकहत के होंठ थरथराने लगे. शब्द उसके हलक में ही अटक कर रह गये.

‘मैं तुम्हें फोन करता रहूंगा…’ संजीव उठ खड़ा हुआ. उसे डर था कि निकहत के आंसुओं के सामने वह अपने झूठ को ज्यादा देर संभाल नहीं पाएगा.

‘मैं अभी चलता हूं… पैकिंग वगैरह भी करनी है, अपना ख्याल रखना… परेशान मत होना…’ वह दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा.

निकहत अपने आंसुओं को समेटती उसके पीछे उठ खड़ी हुई.

‘देखो… तुम खुद कोई फोन मत करना, वहां मैं काफी बिजी रहूंगा… मैं ही टाइम मिलने पर तुम्हारे स्टूडियो फोन कर लिया करूंगा… ठीक है न…?’ संजीव ने पलट कर कहा.

‘हूं…’ निकहत ने सिर हिलाया.

संजीव चला गया, मगर आज जाते वक्त न तो उसने निकहत के माथे पर अपने प्यार की मुहर लगायी थी, न ही उसे मुड़ कर देखा था. वह तो जैसे उसकी निगाहों की पकड़ से जल्द ही बहुत दूर हो जाना चाहता था. उसे डर था कि अगर उसने पलट कर देखा तो वहीं जकड़ जाएगा, उसके पैर उसका साथ नहीं देंगे. वह अपने पीछे आंसुओं में डूबी निकहत को छोड़ कर तेज-तेज कदमों से बढ़ता चला गया.

जिन्दगी अपनी रफ्तार से चलने लगी. तीन हफ्ते गुजर गये. इस बीच सिर्फ दो बार ही संजीव का फोन आया था. औपचारिक सी बातचीत ही हो पायी थी. हालचाल पूछने, काम अच्छा चलने की खबर और अपना ख्याल रखने की नसीहतों के साथ ही फोन कट गया था. निकहत ने पूछा भी था कि कब तक लौटेगा?

‘अभी कुछ कह नहीं सकता… समय लगेगा…’ संजीव ने गोलमोल सा जवाब दिया था.

निकहत मुरझाने लगी थी. इसी आशा के साथ वह रोजाना स्टूडियो जाती थी कि न जाने किस दिन संजीव का फोन आ जाए. रिकॉर्डिंग या रिहर्सल नहीं भी होती, तब भी वह वहां जाकर घंटों बैठी रहती थी. दो महीने बीत चुके थे. इधर प्रेमभाई ने निकहत को कई गीत लिखने के लिए कहे थे. उसकी आवाज भी मार्केट में ठीक बिजनेस दे रही थी. अक्सर ही किसी न किसी रेडियो विज्ञापन की रिकॉर्डिंग होती रहती थी. काफी समय बीत चुका था संजीव का फोन आये. बीते दो हफ्ते से उसका फोन नहीं आया था. कोलकाता का फोन नम्बर निकहत के पास नहीं था, वरना वह खुद ही बात कर लेती. संजीव ने फोन नम्बर दिया ही नहीं, बोला कि स्टूडियो के लैंड लाइन पर मैं खुद ही फोन करूंगा.

‘शायद काम ज्यादा बढ़ गया हो’ निकहत सोचती. कई बार सोचा कि उसके घर पर फोन करके पता करे, मगर संजीव की हिदायत याद आ जाती, ‘घर पर फोन मत करना…’ और वह दिल मसोस कर रह जाती.

‘पता नहीं वो कैसा होगा…?’ निकहत स्टूडियो में बैठी अपने ख्यालों में गुम थी.

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अचानक…

‘एक गाने की रिकॉर्डिंग फिर से होगी…’ प्रेमभाई ने अन्दर प्रवेश करते हुए उससे कहा. वह चौंकर उनकी तरफ देखने लगी.

‘क्या सोच रही हो निकहत…?’ उन्होंने स्नेहिल स्वरों में पूछा.

‘जी कुछ नहीं… आप कुछ कह रहे थे…?’ निकहत उनकी तरफ देखने लगी.

‘हां… वो पिछले महीने डिटर्जेंट पाउडर के लिए जो जिंगल तैयार किया था, उसकी धुन थोड़ी बदलनी है, वो फिर से रिकॉर्ड होना होगा… मास्टर जी को भी बुलाया है… आते ही होंगे…’ प्रेमभाई ने संगीतकार के बारे में बताया, ‘तुम्हारे पास तो लिखा होगा वो गाना…?’ उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि निकहत पर डाली.

‘जी लिखा तो है, मगर वह डायरी तो घर पर पड़ी है…’

‘घर पर…! अच्छा तुम यहां किसी डायरी में देखो, कहीं न कहीं लिखा रखा होगा. मैं जब तक उधर रिकॉर्डिंग रूम सेट करवाता हूं…’ प्रेमभाई कहते हुए कमरे से निकल गये.

निकहत मेज पर रखी डायरियों के पन्ने पलट कर देखने लगी. ‘यहां तो किसी में भी नहीं है…’ वह बड़बड़ायी, ‘शायद दराज के अन्दर रखी डायरियों में मिले…’ सोचते हुए उसने प्रेमभाई की मेज वाली दराज बाहर खींची. पहली डायरी खोलते ही एक कार्ड जमीन पर गिरा. निकहत ने झुककर उसे उठाया, मेज पर डालने ही वाली थी कि उस पर संजीव का नाम पढ़ते ही चौंक पड़ी. उसने जल्दी से कार्ड खोला.

संजीव वेड्स मोनिका’ पढ़ते ही उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. कार्ड पर संजीव के घर का पता लिखा था और शादी की तारीख पिछले महीने की थी. उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया… खड़ा न रहा गया… वह धड़ाम से कुर्सी पर गिर पड़ी. उसे लगा जैसे सारे जिस्म की ताकत किसी ने निचोड़ ली हो. न जाने कितनी देर तक वह सन्नाटे में बैठी रही. एकाएक दरवाजा खुला…

‘निकहत… गाना मिल गया…?’ पूछते हुए प्रेमभाई अन्दर आये तो निकहत की हालत देखकर उनके होश उड़ गये.

‘निकहत…!’ वह उसकी ओर बढ़े और उसके कंपकपाते हाथों में संजीव की शादी का कार्ड देखकर पलक झपकते ही सब कुछ समझ गये. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वो उससे क्या कहें.

संजीव ने उन्हें निकहत को कुछ न बताने की कसम दी थी. उन्हें स्वयं संजीव की यह हरकत बड़ी नागवार गुजरी थी मगर वह कुछ भी नहीं कर पाये. संजीव ने अपनी दोस्ती का वास्ता देकर उन्हें अपनी मजबूरी कुछ इस ढंग से समझा दी थी कि वह खामोश होकर रह गये थे. उसका कार्ड लेकर उन्होंने चुपचाप अपनी दराज में रखी एक पुरानी डायरी में डाल दिया था, और आज… निकहत के हाथ वह कार्ड लग गया. उन्हें समझ में नहीं आया कि वह निकहत को किस तरह सांत्वना दें. उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे और वह सूनी-सूनी नजरों से प्रेमभाई को ताक रही थी.

प्रेमभाई ने आगे बढ़कर अपना हाथ उसके कंधों पर टिका दिया, ‘निकहत… मैं तुम्हें सबकुछ…’ वह हकलाते हुए बोले, और बस… निकहत फट पड़ी. वह दहाड़े मार-मार कर रोने लगी. प्रेमभाई बौखला उठे, ‘निकहत… अपने आपको संभालो निकहत…’ वह बौखलाए हुए स्वरों में बोले.

‘आपने मुझे बताया क्यों नहीं, प्रेमभाई…?’ उसने बुरी तरह रोते हुए पूछा, ‘आपको तो मैं अपने बड़े भाई की जगह समझती थी, मगर… मगर आपने भी… आपको सबकुछ पता था… है न…?’ वह फफक रही थी.

‘निकहत…’ उन्होंने उसका कंधा थपथपाते हुए उसे चुप कराने की कोशिश की, ‘निकहत… तुम नहीं जानती, मैंने उसे समझाने की कितनी कोशिश की, मगर उस पर तो दौलत का नशा सवार था. अगर उसे तुम्हारे प्यार की जरा भी कद्र होती तो वह यह काम हरगिज नहीं करता, वह तो सिर्फ तुमसे अपना दिल बहला रहा था… व्यापार कर रहा था… प्यार का व्यापार…’ प्रेमभाई की आवाज कर्कश हो गयी.

‘प्रेमभाई…’

‘देखो निकहत… अब जो हुआ है उसे भूल जाओ… वो तुम्हारे काबिल नहीं था…’ प्रेमभाई ने समझाने की कोशिश की.

‘कैसे भूल जाऊं, प्रेमभाई…?’ निकहत रोते-रोते लगभग चीखने के अन्दाज में बोली, ‘कितना आसान है आपके लिए यह बात कह देना, भूल जाओ… कैसे भूल जाऊं? आप ही बताइये… कैसे भूल जाऊं?’ निकहत की हालत पागलों जैसी हो गयी.

पे्रमभाई निरुत्तर हो गये. वह आगे बढ़े और मेज पर रखे गिलास में पानी उंडेल कर उसकी ओर बढ़ाया. निकहत ने कंपकंपाते हाथों से गिलास लेकर अपने होंठों से लगा लिया, मगर अभी भी वह बुरी तरह सिसक रही थी. उसके प्रेम की बगिया को उसका ही माली उजाड़ गया था. गिलास वापस मेज पर रख कर वह आंसू पोछते उठ खड़ी हुई.

‘निकहत…’ प्रेमभाई ने उसे टोका, ‘चलो मैं तुम्हें घर छोड़ आऊं… रिकॉर्डिंग कल करेंगे…’ वह उसके साथ दरवाजे की ओर बढ़े. उन्हें डर था कि दु:ख के आवेश में कहीं वह कुछ उल्टा-सीधा न कर बैठे.

‘नहीं, प्रेमभाई…’ निकहत ने उन्हें रोक दिया, ‘मैं अकेली जाऊंगी… रिकौर्डिंग कल की रख लीजिए…’ कह कर वह तेजी के साथ दरवाजे से निकल गयी.

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उसके दिलो-दिमाग में एक सन्नाटा सा छाया हुआ था. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका संजीव उसके साथ ऐसा कर सकता है. टैक्सी लेकर वह सीधे उसके घर की ओर चल दी.

(धारावाहिक के तीसरे भाग में पढ़िये कि संजीव के नये आलीशान बंगले पर पहुंच कर निकहत को क्या पता चला और संजीव ने उसके साथ क्या किया.)

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धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-1

अब आगे पढ़ें-

‘खट… खट… खट…’ दरवाजे की दस्तक ने निकहत को चौंका दिया. वह पलंग पर बैठी एक रोमान्टिक सा गीत लिखने में मशगूल थी. दरवाजे पर संजीव के होने के ख्याल से उसका दिल बल्लियों उछलने लगा. वह लगभग भागती हुई सी दरवाजे तक पहुंची. कुंडी खोली तो उसके चेहरे पर खुशियों के हजारों रंग बिखर गये. सामने उसका संजीव खड़ा था. वो उससे लगभग लिपटते हुए बोली…

‘आज जल्दी कैसे आ गये…?’

‘कुछ काम था…’ छोटा सा जवाब देकर संजीव तख्त की ओर बढ़ गया, ‘अम्मी नहीं हैं…?’ उसने इधर-उधर दृष्टि घुमायी.

‘नहीं, जाहिद के साथ वैद्यजी के पास गयी हैं, मालिश का तेल लेने…’ निकहत ने उसे प्यार से देखते हुए कहा और उसके बगल में बैठ गयी.

‘निकहत… मैं बिजनेस के काम से कुछ दो-तीन महीने के लिए बाहर जा रहा हूं…?’

‘दो-तीन महीने के लिए… क्यों… कहां…?’ निकहत ने बेचैनी से पूछा.

‘कोलकाता…’ संजीव ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, ‘पापा चाहते हैं कि वहां हमारा एक नया शोरूम खुल जाए… वो अब बिजनेस बढ़ाना चाहते हैं…. इसके लिए मेरा जाना जरूरी है…’

‘कब तक वापस आ जाओगे…’ निकहत ने उदास होते हुए पूछा.

‘कम से कम तीन महीने तो लग ही जाएंगे… ज्यादा वक्त भी लग सकता है…’ संजीव ने जवाब दिया.

‘मैं यहां तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी…’ निकहत परेशान हो गयी.

‘अरे यार, समय जाते देर नहीं लगती, फिर ये भी तो सोचो अगर कोलकाता में हमारा बिजनेस सेट हो गया तो हमें कितना फायदा होगा… फिर पापा भी मुझसे खुश हो जाएंगे… क्या तुम यह नहीं चाहतीं…?’ संजीव प्यार से उसका चेहरा अपनी हथेलियों के बीच लेते हुए बोला.

‘वो तो ठीक है मगर…’ निकहत की आंखों में आंसू आ गये.

‘देखो निकहत, बात समझने की कोशिश करो, अगर मेरी वजह से पापा का बिजनेस बढ़ता है तो मेरे ऊपर उनका भरोसा बढ़ेगा, वो मेरी बात मानेंगे और तब हम दोनों की शादी के लिए मैं उनको आसानी से मना भी सकता हूं, वरना…’ संजीव ने उसे फुसलाने की कोशिश की.

निकहत की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे. संजीव से एक दिन की दूरी भी उसे बर्दाश्त नहीं थी और वह तीन महीने के लिए दूर जाने की बात कर रहा था, ‘मैं…’ कुछ कहते-कहते निकहत के होंठ थरथराने लगे. शब्द उसके हलक में ही अटक कर रह गये.

‘मैं तुम्हें फोन करता रहूंगा…’ संजीव उठ खड़ा हुआ. उसे डर था कि निकहत के आंसुओं के सामने वह अपने झूठ को ज्यादा देर संभाल नहीं पाएगा.

‘मैं अभी चलता हूं… पैकिंग वगैरह भी करनी है, अपना ख्याल रखना… परेशान मत होना…’ वह दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा.

निकहत अपने आंसुओं को समेटती उसके पीछे उठ खड़ी हुई.

‘देखो… तुम खुद कोई फोन मत करना, वहां मैं काफी बिजी रहूंगा… मैं ही टाइम मिलने पर तुम्हारे स्टूडियो फोन कर लिया करूंगा… ठीक है न…?’ संजीव ने पलट कर कहा.

‘हूं…’ निकहत ने सिर हिलाया.

संजीव चला गया, मगर आज जाते वक्त न तो उसने निकहत के माथे पर अपने प्यार की मुहर लगायी थी, न ही उसे मुड़ कर देखा था. वह तो जैसे उसकी निगाहों की पकड़ से जल्द ही बहुत दूर हो जाना चाहता था. उसे डर था कि अगर उसने पलट कर देखा तो वहीं जकड़ जाएगा, उसके पैर उसका साथ नहीं देंगे. वह अपने पीछे आंसुओं में डूबी निकहत को छोड़ कर तेज-तेज कदमों से बढ़ता चला गया.

जिन्दगी अपनी रफ्तार से चलने लगी. तीन हफ्ते गुजर गये. इस बीच सिर्फ दो बार ही संजीव का फोन आया था. औपचारिक सी बातचीत ही हो पायी थी. हालचाल पूछने, काम अच्छा चलने की खबर और अपना ख्याल रखने की नसीहतों के साथ ही फोन कट गया था. निकहत ने पूछा भी था कि कब तक लौटेगा?

‘अभी कुछ कह नहीं सकता… समय लगेगा…’ संजीव ने गोलमोल सा जवाब दिया था.

निकहत मुरझाने लगी थी. इसी आशा के साथ वह रोजाना स्टूडियो जाती थी कि न जाने किस दिन संजीव का फोन आ जाए. रिकॉर्डिंग या रिहर्सल नहीं भी होती, तब भी वह वहां जाकर घंटों बैठी रहती थी. दो महीने बीत चुके थे. इधर प्रेमभाई ने निकहत को कई गीत लिखने के लिए कहे थे. उसकी आवाज भी मार्केट में ठीक बिजनेस दे रही थी. अक्सर ही किसी न किसी रेडियो विज्ञापन की रिकॉर्डिंग होती रहती थी. काफी समय बीत चुका था संजीव का फोन आये. बीते दो हफ्ते से उसका फोन नहीं आया था. कोलकाता का फोन नम्बर निकहत के पास नहीं था, वरना वह खुद ही बात कर लेती. संजीव ने फोन नम्बर दिया ही नहीं, बोला कि स्टूडियो के लैंड लाइन पर मैं खुद ही फोन करूंगा.

‘शायद काम ज्यादा बढ़ गया हो’ निकहत सोचती. कई बार सोचा कि उसके घर पर फोन करके पता करे, मगर संजीव की हिदायत याद आ जाती, ‘घर पर फोन मत करना…’ और वह दिल मसोस कर रह जाती.

‘पता नहीं वो कैसा होगा…?’ निकहत स्टूडियो में बैठी अपने ख्यालों में गुम थी.

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अचानक…

‘एक गाने की रिकॉर्डिंग फिर से होगी…’ प्रेमभाई ने अन्दर प्रवेश करते हुए उससे कहा. वह चौंकर उनकी तरफ देखने लगी.

‘क्या सोच रही हो निकहत…?’ उन्होंने स्नेहिल स्वरों में पूछा.

‘जी कुछ नहीं… आप कुछ कह रहे थे…?’ निकहत उनकी तरफ देखने लगी.

‘हां… वो पिछले महीने डिटर्जेंट पाउडर के लिए जो जिंगल तैयार किया था, उसकी धुन थोड़ी बदलनी है, वो फिर से रिकॉर्ड होना होगा… मास्टर जी को भी बुलाया है… आते ही होंगे…’ प्रेमभाई ने संगीतकार के बारे में बताया, ‘तुम्हारे पास तो लिखा होगा वो गाना…?’ उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि निकहत पर डाली.

‘जी लिखा तो है, मगर वह डायरी तो घर पर पड़ी है…’

‘घर पर…! अच्छा तुम यहां किसी डायरी में देखो, कहीं न कहीं लिखा रखा होगा. मैं जब तक उधर रिकॉर्डिंग रूम सेट करवाता हूं…’ प्रेमभाई कहते हुए कमरे से निकल गये.

निकहत मेज पर रखी डायरियों के पन्ने पलट कर देखने लगी. ‘यहां तो किसी में भी नहीं है…’ वह बड़बड़ायी, ‘शायद दराज के अन्दर रखी डायरियों में मिले…’ सोचते हुए उसने प्रेमभाई की मेज वाली दराज बाहर खींची. पहली डायरी खोलते ही एक कार्ड जमीन पर गिरा. निकहत ने झुककर उसे उठाया, मेज पर डालने ही वाली थी कि उस पर संजीव का नाम पढ़ते ही चौंक पड़ी. उसने जल्दी से कार्ड खोला.

संजीव वेड्स मोनिका’ पढ़ते ही उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. कार्ड पर संजीव के घर का पता लिखा था और शादी की तारीख पिछले महीने की थी. उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया… खड़ा न रहा गया… वह धड़ाम से कुर्सी पर गिर पड़ी. उसे लगा जैसे सारे जिस्म की ताकत किसी ने निचोड़ ली हो. न जाने कितनी देर तक वह सन्नाटे में बैठी रही. एकाएक दरवाजा खुला…

‘निकहत… गाना मिल गया…?’ पूछते हुए प्रेमभाई अन्दर आये तो निकहत की हालत देखकर उनके होश उड़ गये.

‘निकहत…!’ वह उसकी ओर बढ़े और उसके कंपकपाते हाथों में संजीव की शादी का कार्ड देखकर पलक झपकते ही सब कुछ समझ गये. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वो उससे क्या कहें.

संजीव ने उन्हें निकहत को कुछ न बताने की कसम दी थी. उन्हें स्वयं संजीव की यह हरकत बड़ी नागवार गुजरी थी मगर वह कुछ भी नहीं कर पाये. संजीव ने अपनी दोस्ती का वास्ता देकर उन्हें अपनी मजबूरी कुछ इस ढंग से समझा दी थी कि वह खामोश होकर रह गये थे. उसका कार्ड लेकर उन्होंने चुपचाप अपनी दराज में रखी एक पुरानी डायरी में डाल दिया था, और आज… निकहत के हाथ वह कार्ड लग गया. उन्हें समझ में नहीं आया कि वह निकहत को किस तरह सांत्वना दें. उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे और वह सूनी-सूनी नजरों से प्रेमभाई को ताक रही थी.

प्रेमभाई ने आगे बढ़कर अपना हाथ उसके कंधों पर टिका दिया, ‘निकहत… मैं तुम्हें सबकुछ…’ वह हकलाते हुए बोले, और बस… निकहत फट पड़ी. वह दहाड़े मार-मार कर रोने लगी. प्रेमभाई बौखला उठे, ‘निकहत… अपने आपको संभालो निकहत…’ वह बौखलाए हुए स्वरों में बोले.

‘आपने मुझे बताया क्यों नहीं, प्रेमभाई…?’ उसने बुरी तरह रोते हुए पूछा, ‘आपको तो मैं अपने बड़े भाई की जगह समझती थी, मगर… मगर आपने भी… आपको सबकुछ पता था… है न…?’ वह फफक रही थी.

‘निकहत…’ उन्होंने उसका कंधा थपथपाते हुए उसे चुप कराने की कोशिश की, ‘निकहत… तुम नहीं जानती, मैंने उसे समझाने की कितनी कोशिश की, मगर उस पर तो दौलत का नशा सवार था. अगर उसे तुम्हारे प्यार की जरा भी कद्र होती तो वह यह काम हरगिज नहीं करता, वह तो सिर्फ तुमसे अपना दिल बहला रहा था… व्यापार कर रहा था… प्यार का व्यापार…’ प्रेमभाई की आवाज कर्कश हो गयी.

‘प्रेमभाई…’

‘देखो निकहत… अब जो हुआ है उसे भूल जाओ… वो तुम्हारे काबिल नहीं था…’ प्रेमभाई ने समझाने की कोशिश की.

‘कैसे भूल जाऊं, प्रेमभाई…?’ निकहत रोते-रोते लगभग चीखने के अन्दाज में बोली, ‘कितना आसान है आपके लिए यह बात कह देना, भूल जाओ… कैसे भूल जाऊं? आप ही बताइये… कैसे भूल जाऊं?’ निकहत की हालत पागलों जैसी हो गयी.

पे्रमभाई निरुत्तर हो गये. वह आगे बढ़े और मेज पर रखे गिलास में पानी उंडेल कर उसकी ओर बढ़ाया. निकहत ने कंपकंपाते हाथों से गिलास लेकर अपने होंठों से लगा लिया, मगर अभी भी वह बुरी तरह सिसक रही थी. उसके प्रेम की बगिया को उसका ही माली उजाड़ गया था. गिलास वापस मेज पर रख कर वह आंसू पोछते उठ खड़ी हुई.

‘निकहत…’ प्रेमभाई ने उसे टोका, ‘चलो मैं तुम्हें घर छोड़ आऊं… रिकॉर्डिंग कल करेंगे…’ वह उसके साथ दरवाजे की ओर बढ़े. उन्हें डर था कि दु:ख के आवेश में कहीं वह कुछ उल्टा-सीधा न कर बैठे.

‘नहीं, प्रेमभाई…’ निकहत ने उन्हें रोक दिया, ‘मैं अकेली जाऊंगी… रिकौर्डिंग कल की रख लीजिए…’ कह कर वह तेजी के साथ दरवाजे से निकल गयी.

ये भी पढ़ें- मां का घर

उसके दिलो-दिमाग में एक सन्नाटा सा छाया हुआ था. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका संजीव उसके साथ ऐसा कर सकता है. टैक्सी लेकर वह सीधे उसके घर की ओर चल दी.

(धारावाहिक के तीसरे भाग में पढ़िये कि संजीव के नये आलीशान बंगले पर पहुंच कर निकहत को क्या पता चला और संजीव ने उसके साथ क्या किया.)

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August 30, 2019 at 08:43AM