Monday, 3 January 2022

एक साथी की तलाश: भाग 4- क्या श्यामला अपने पति मधुप के पास लौट पाई?

वे जानते थे. बहू जानबूझ कर इस समय चली गई घर से. लेकिन अब वे क्या करें. श्यामला तो बाहर  भी नहीं आ रही. बात भी करें तो कैसे. इतने वर्षों बाद अकेले घर में उन का दिल श्यामला की उपस्थिति में अजीब से कुतूहल से धड़क रहा था. थोड़ी देर वे वैसे ही बैठे रहे. अपनी घबराहट पर काबू पाने का प्रयत्न करते रहे. फिर उठे और अंदर चले गए. अंदर एक कमरे में श्यामला चुपचाप खिड़की के सामने बैठी बाहर की ओर देख रही थी.

‘‘श्यामला…’’ उसे ऐसे बैठे देख कर उन्होंने धीरे से पुकारा. सुन कर श्यामला ने पलट कर देखा. इतने वर्षों बाद मधुुप को अपने सामने देख श्यामला जैसे जड़ हो गई. समय जैसे पलभर के लिए स्थिर हो गया. आंखों में प्रश्न सलीब की तरह टंगा हुआ था, ‘क्या करने आए हो अब…?’

‘‘आप…’’ वह प्रत्यक्ष बोली.

.‘‘हां श्यामला, मैं…’’ इतने वर्षों बाद उसे देख कर वे एकाएक कातर हो गए थे.

‘‘तुम्हें लेने आया हूं,’’ वे बिना किसी भूमिका के बोले, ‘‘वापस चलो. मुझ से जो गलती हुई है, उस के लिए मुझे क्षमा कर दो. मैं समझ नहीं पाया तुम्हें, तुम्हारी परेशानियों को, तुम्हारे अंतर्द्वंद्व को…’’

श्यामला अपलक उन्हें निहारती रह गई. शब्द मानो चुक गए थे. बहुतकुछ कहना चाहती थी वह, पर समझ नहीं पा रही थी कि कहां से शुरू करे. किसी तरह खुद को संयत किया.

थोड़ी देर बाद वह बोली, ‘‘इतने वर्षों के बाद गलती महसूस हुई आप को. जब खुद को जरूरत हुई पत्नी की, लेकिन जब तक पत्नी को जरूरत थी? आखिर मैं सही थी न, कि आप ने हमेशा खुद से प्यार किया. लेकिन मेरे अंदर अब आप के लिए कुछ नहीं बचा. अब मेरे दिल को किसी साथी की तलाश नहीं है. जिन भावनाओं को, जिन संवेदनाओं को जीने की इतनी जद्दोजहद थी मेरे अंदर, वह सब तो कब की मर चुकी है. फिर अब क्यों आऊं, आप के बाकी के जीवन जीने का साधन बन कर? मुझे अब आप की जरूरत नहीं है. मैं अब नहीं आऊंगी.’’

‘‘नहीं श्यामला,’’ मधुप ने आगे बढ़ कर श्यामला की दोनों हथेलियां अपने हाथों में थाम ली, ‘‘ऐसा मत कहो, साथी की तलाश कभी खत्म नहीं होती. हर उम्र, हर मोड़ पर साथी के लिए तनमन तरसता है, पशुपक्षी भी अपने लिए साथी ढूंढ़ते हैं, यही प्रकृति का नियम है, मुझ से गलती हुई है, इस के लिए मैं तुम से तहेदिल से क्षमा मांग रहा हूं.

“इस बार तुम नहीं, मैं आऊंगा तुम्हारे पास. इस बार तुम मेरे सांचे में नहीं, बल्कि मैं तुम्हारे सांचे में ढलूंगा. संवेदनाएं और भावनाएं कभी मरती नहीं हैं श्यामला, बल्कि हमारी गलतियों व उपेक्षाओं से सुप्तावस्था में चली जाती हैं, उन्हें तो बस जगाने की जरूरत है. अपने हृदय से पूछो, क्या तुम सचमुच मेरा साथ नहीं चाहती, सचमुच चाहती हो कि मैं चला जाऊं.’’

श्यामला चुपचाप डबडबाई आंखों से उन्हें देखती रह गई. कितने बदल गए थे मधुप. समय ने, अकेलेपन ने उन्हें उन की गलतियों का एहसास करा दिया था. पतिपत्नी में से अगर एक अपनी मरजी से जीता है तो दूसरा दूसरे की मरजी से मरता है.

‘‘बोलो श्यामला,’’ मधुप ने श्यामला को कंधों से पकड़ कर धीरे से हिलाया, ‘‘मैं अब तुम्हारे पास आ गया हूं और अब लौट कर नहीं जाऊंगा,’’ मधुरे पूरे विश्वास व अधिकार से बोले. लेकिन श्यामला ने धीरे से उन के हाथ कंधों से अलग कर दिए.

‘‘अब मुझ से न आया जाएगा मधुप. मेरे जीवन की धारा अब एक अलग मोड़ मुड़ चुकी है. कितनी बार जीवन में टूटूं, बिखरूं और फिर जुडूं, मुझ में अब ताकत नहीं बची. मैं ने अपने जीवन को एक अलग ही सांचे में ढाल लिया है, जिस में अब आप के लिए कोई जगह नहीं. मैं अब नहीं आ पाऊंगी, मुझे माफ कर दो,’’ कह कर श्यामला दूसरे कमरे में चली गई.

स्पष्ट संकेत था उन के लिए कि वे अब जा सकते हैं. मधुप भौंचक्के खड़े, पलभर में हुए अपनी उम्मीदों के टुकड़ों को बिखरते महसूस करते रहे. फिर अपना बैग उठा कर वे बाहर निकल गए वापस जाने के लिए. बेटे के आने का भी इंतजार नहीं किया उन्होंने.

जयपुर से वापसी का सफर बेहद बोझिल भरा था, सबकुछ तो उन्होंने पहले ही खो दिया था. अब एक उम्मीद बची थी. आज वे उसे भी खो कर आ गए थे.

घर पहुंचे तो उन्हें अकेले व हताश देख बिरूवा सबकुछ समझ गया. कुछ न पूछा. चुपचाप हाथ से बैग ले कर वह अंदर रख आया और किचन में चाय बनाने चला गया.

उधर श्यामला खिड़की के परदे के पीछे से थके कदमों से जाते मधुप को करुण निगाहों से देखती रही, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए. दिल कर रहा था कि दौड़ कर वह मधुप को रोक ले, लेकिन कदम न बढ़ पा रहे थे. जो गुजर गया वह सबकुछ याद आ रहा था.

मधुप चले गए, लेकिन श्यामला के दिल का नासूर फिर से बहने लगा. रात देर तक बिस्तर पर करवट बदलते हुए वह सोचती रही कि जिंदगी मधुप के साथ अगर बोझिल भरी थी तो उन के बिना भी क्या थी. क्या एक दिन भी ऐसा गुजरा, जब उस ने मधुप को याद न किया हो. उस के मधुप से अलग होने के निर्णय का दर्द बच्चों ने भी भुगता था. बच्चों ने भी तब कितना चाहा था कि वे दोनों साथ रहें. अपने विवाह के बाद ही बच्चे चुप हुए थे. पर पता नहीं कैसी जिद भर गई थी उस के खुद के अंदर, और मधुप ने भी कभी आगे बढ़ कर अपनी गलती मानने की कोशिश नहीं की और वउन दोनों का सारा जीवन यों वीरान सा गुजर गया. जो मधुप आज महसूस कर रहे हैं. काश, यही बात तब समझ पाते, तो उन की जिंदगी की कहानी कुछ और ही होती.

लेकिन, अब जो तार टूट चुके हैं, क्या फिर से वे जुड़ सकते हैं और जुड़ कर क्या उतने मजबूत हो सकते हैं?

एक कोशिश मधुप ने की, एक कदम उन्होंने बढ़ाया, तो क्या एक कोशिश उसे भी करनी चाहिए. एक कदम उसे भी बढ़ाना चाहिए. कहीं आज निर्णय लेने में उस से कोई गलती तो नहीं हो गई. इसी उहापोह में करवटें बदलते सुबह हो गई. पूरी रात वह सोचती रही थी, फिर अनायास ही अपना बैग तैयार करने लगी. उस को तैयारी करते देख बेटेबहू आश्चर्यचकित थे, पर उन्होंने कुछ न पूछना ही उचित समझा. मन ही मन सब समझ रहे थे. खुशी का अनुभव कर रहे थे. श्यामला जब जाने को हुई तो बेटे ने साथ में जाने की पेशकश की, पर श्यामला ने मना कर दिया.

उधर उस दिन दोपहर को सोए हुए मधुप की जब शाम को नींद खुली, तो वह शाम और दूसरी शाम की तरह ही थी. पर, पता नहीं मधुप आज अपने अंदर हलकी सी तरंग क्यों महसूस कर रहे थे. तभी बिरूवा चाय बना कर ले आया. उन्होंने चाय का पहला घूंट भरा ही था कि डोरबेल बज उठी.

‘‘देखना बिरूवा कौन आया है?’’ मधुप ने आवाज दी.

‘‘अखबर वाला होगा. पैसे लेने आया होगा, शाम को वही आता है,’’ कह कर बिरूवा बाहर चला गया. लेकिन पलभर में ही खुशी से उमगता हाथ में बैग उठाए अंदर आ गया. मधुप आश्चर्य से उसे देखने लगे.

‘‘कौन है बिरूवा? कौन आया है और यह बैग किस का है?’’

‘‘बाहर जा कर देखिए साब. समझ लीजिए, पूरे संसार की खुशियां चल कर आ गई हैं आज दरवाजे पर,’’ कह कर बिरूवा घर में कहीं गुम हो गया. वे जल्दी से बाहर गए. देखा, दरवाजे पर श्यामला खड़ी थी. वे आश्चर्यचकित, किंकर्तव्यविमूढ़ से उसे देखते रह गए.

‘‘श्यामला तुम,’’ उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था.

‘‘हां मैं…’’ वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘अंदर आने के लिए नहीं कहोगे.’’

‘‘श्यामला…’’ खुशी के अतिरेक में उन्होंने आगे बढ़ कर श्यामला को गले लगा लिया, ‘‘मुझे माफ कर दो.’’

‘‘बस, अब कुछ मत कहो… आप भी मुझे माफ कर दो. जो कुछ हुआ वह सब भूल कर आई हूं.’’

दोनों थोड़ी देर ऐसे ही खड़े रहे. तभी पीछे कुछ आवाज सुन कर दोनों अलग हुए. मुड़ कर देखा तो बिरूवा आरती का थाल लिए खड़ा था. मधुर और श्यामला दोनों हंस पड़े.

‘‘आज तो बहुत ही खुशी का दिन है साब.’’

‘‘हां बिरूवा क्यों नहीं. आज मैं तुम्हें किसी बात के लिए नहीं रोकूंगा,’’ कह कर मधुप श्यामला की बगल में खड़े हो गए और बिरूवा उन दोनों की आरती उतारने लगा.

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वे जानते थे. बहू जानबूझ कर इस समय चली गई घर से. लेकिन अब वे क्या करें. श्यामला तो बाहर  भी नहीं आ रही. बात भी करें तो कैसे. इतने वर्षों बाद अकेले घर में उन का दिल श्यामला की उपस्थिति में अजीब से कुतूहल से धड़क रहा था. थोड़ी देर वे वैसे ही बैठे रहे. अपनी घबराहट पर काबू पाने का प्रयत्न करते रहे. फिर उठे और अंदर चले गए. अंदर एक कमरे में श्यामला चुपचाप खिड़की के सामने बैठी बाहर की ओर देख रही थी.

‘‘श्यामला…’’ उसे ऐसे बैठे देख कर उन्होंने धीरे से पुकारा. सुन कर श्यामला ने पलट कर देखा. इतने वर्षों बाद मधुुप को अपने सामने देख श्यामला जैसे जड़ हो गई. समय जैसे पलभर के लिए स्थिर हो गया. आंखों में प्रश्न सलीब की तरह टंगा हुआ था, ‘क्या करने आए हो अब…?’

‘‘आप…’’ वह प्रत्यक्ष बोली.

.‘‘हां श्यामला, मैं…’’ इतने वर्षों बाद उसे देख कर वे एकाएक कातर हो गए थे.

‘‘तुम्हें लेने आया हूं,’’ वे बिना किसी भूमिका के बोले, ‘‘वापस चलो. मुझ से जो गलती हुई है, उस के लिए मुझे क्षमा कर दो. मैं समझ नहीं पाया तुम्हें, तुम्हारी परेशानियों को, तुम्हारे अंतर्द्वंद्व को…’’

श्यामला अपलक उन्हें निहारती रह गई. शब्द मानो चुक गए थे. बहुतकुछ कहना चाहती थी वह, पर समझ नहीं पा रही थी कि कहां से शुरू करे. किसी तरह खुद को संयत किया.

थोड़ी देर बाद वह बोली, ‘‘इतने वर्षों के बाद गलती महसूस हुई आप को. जब खुद को जरूरत हुई पत्नी की, लेकिन जब तक पत्नी को जरूरत थी? आखिर मैं सही थी न, कि आप ने हमेशा खुद से प्यार किया. लेकिन मेरे अंदर अब आप के लिए कुछ नहीं बचा. अब मेरे दिल को किसी साथी की तलाश नहीं है. जिन भावनाओं को, जिन संवेदनाओं को जीने की इतनी जद्दोजहद थी मेरे अंदर, वह सब तो कब की मर चुकी है. फिर अब क्यों आऊं, आप के बाकी के जीवन जीने का साधन बन कर? मुझे अब आप की जरूरत नहीं है. मैं अब नहीं आऊंगी.’’

‘‘नहीं श्यामला,’’ मधुप ने आगे बढ़ कर श्यामला की दोनों हथेलियां अपने हाथों में थाम ली, ‘‘ऐसा मत कहो, साथी की तलाश कभी खत्म नहीं होती. हर उम्र, हर मोड़ पर साथी के लिए तनमन तरसता है, पशुपक्षी भी अपने लिए साथी ढूंढ़ते हैं, यही प्रकृति का नियम है, मुझ से गलती हुई है, इस के लिए मैं तुम से तहेदिल से क्षमा मांग रहा हूं.

“इस बार तुम नहीं, मैं आऊंगा तुम्हारे पास. इस बार तुम मेरे सांचे में नहीं, बल्कि मैं तुम्हारे सांचे में ढलूंगा. संवेदनाएं और भावनाएं कभी मरती नहीं हैं श्यामला, बल्कि हमारी गलतियों व उपेक्षाओं से सुप्तावस्था में चली जाती हैं, उन्हें तो बस जगाने की जरूरत है. अपने हृदय से पूछो, क्या तुम सचमुच मेरा साथ नहीं चाहती, सचमुच चाहती हो कि मैं चला जाऊं.’’

श्यामला चुपचाप डबडबाई आंखों से उन्हें देखती रह गई. कितने बदल गए थे मधुप. समय ने, अकेलेपन ने उन्हें उन की गलतियों का एहसास करा दिया था. पतिपत्नी में से अगर एक अपनी मरजी से जीता है तो दूसरा दूसरे की मरजी से मरता है.

‘‘बोलो श्यामला,’’ मधुप ने श्यामला को कंधों से पकड़ कर धीरे से हिलाया, ‘‘मैं अब तुम्हारे पास आ गया हूं और अब लौट कर नहीं जाऊंगा,’’ मधुरे पूरे विश्वास व अधिकार से बोले. लेकिन श्यामला ने धीरे से उन के हाथ कंधों से अलग कर दिए.

‘‘अब मुझ से न आया जाएगा मधुप. मेरे जीवन की धारा अब एक अलग मोड़ मुड़ चुकी है. कितनी बार जीवन में टूटूं, बिखरूं और फिर जुडूं, मुझ में अब ताकत नहीं बची. मैं ने अपने जीवन को एक अलग ही सांचे में ढाल लिया है, जिस में अब आप के लिए कोई जगह नहीं. मैं अब नहीं आ पाऊंगी, मुझे माफ कर दो,’’ कह कर श्यामला दूसरे कमरे में चली गई.

स्पष्ट संकेत था उन के लिए कि वे अब जा सकते हैं. मधुप भौंचक्के खड़े, पलभर में हुए अपनी उम्मीदों के टुकड़ों को बिखरते महसूस करते रहे. फिर अपना बैग उठा कर वे बाहर निकल गए वापस जाने के लिए. बेटे के आने का भी इंतजार नहीं किया उन्होंने.

जयपुर से वापसी का सफर बेहद बोझिल भरा था, सबकुछ तो उन्होंने पहले ही खो दिया था. अब एक उम्मीद बची थी. आज वे उसे भी खो कर आ गए थे.

घर पहुंचे तो उन्हें अकेले व हताश देख बिरूवा सबकुछ समझ गया. कुछ न पूछा. चुपचाप हाथ से बैग ले कर वह अंदर रख आया और किचन में चाय बनाने चला गया.

उधर श्यामला खिड़की के परदे के पीछे से थके कदमों से जाते मधुप को करुण निगाहों से देखती रही, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए. दिल कर रहा था कि दौड़ कर वह मधुप को रोक ले, लेकिन कदम न बढ़ पा रहे थे. जो गुजर गया वह सबकुछ याद आ रहा था.

मधुप चले गए, लेकिन श्यामला के दिल का नासूर फिर से बहने लगा. रात देर तक बिस्तर पर करवट बदलते हुए वह सोचती रही कि जिंदगी मधुप के साथ अगर बोझिल भरी थी तो उन के बिना भी क्या थी. क्या एक दिन भी ऐसा गुजरा, जब उस ने मधुप को याद न किया हो. उस के मधुप से अलग होने के निर्णय का दर्द बच्चों ने भी भुगता था. बच्चों ने भी तब कितना चाहा था कि वे दोनों साथ रहें. अपने विवाह के बाद ही बच्चे चुप हुए थे. पर पता नहीं कैसी जिद भर गई थी उस के खुद के अंदर, और मधुप ने भी कभी आगे बढ़ कर अपनी गलती मानने की कोशिश नहीं की और वउन दोनों का सारा जीवन यों वीरान सा गुजर गया. जो मधुप आज महसूस कर रहे हैं. काश, यही बात तब समझ पाते, तो उन की जिंदगी की कहानी कुछ और ही होती.

लेकिन, अब जो तार टूट चुके हैं, क्या फिर से वे जुड़ सकते हैं और जुड़ कर क्या उतने मजबूत हो सकते हैं?

एक कोशिश मधुप ने की, एक कदम उन्होंने बढ़ाया, तो क्या एक कोशिश उसे भी करनी चाहिए. एक कदम उसे भी बढ़ाना चाहिए. कहीं आज निर्णय लेने में उस से कोई गलती तो नहीं हो गई. इसी उहापोह में करवटें बदलते सुबह हो गई. पूरी रात वह सोचती रही थी, फिर अनायास ही अपना बैग तैयार करने लगी. उस को तैयारी करते देख बेटेबहू आश्चर्यचकित थे, पर उन्होंने कुछ न पूछना ही उचित समझा. मन ही मन सब समझ रहे थे. खुशी का अनुभव कर रहे थे. श्यामला जब जाने को हुई तो बेटे ने साथ में जाने की पेशकश की, पर श्यामला ने मना कर दिया.

उधर उस दिन दोपहर को सोए हुए मधुप की जब शाम को नींद खुली, तो वह शाम और दूसरी शाम की तरह ही थी. पर, पता नहीं मधुप आज अपने अंदर हलकी सी तरंग क्यों महसूस कर रहे थे. तभी बिरूवा चाय बना कर ले आया. उन्होंने चाय का पहला घूंट भरा ही था कि डोरबेल बज उठी.

‘‘देखना बिरूवा कौन आया है?’’ मधुप ने आवाज दी.

‘‘अखबर वाला होगा. पैसे लेने आया होगा, शाम को वही आता है,’’ कह कर बिरूवा बाहर चला गया. लेकिन पलभर में ही खुशी से उमगता हाथ में बैग उठाए अंदर आ गया. मधुप आश्चर्य से उसे देखने लगे.

‘‘कौन है बिरूवा? कौन आया है और यह बैग किस का है?’’

‘‘बाहर जा कर देखिए साब. समझ लीजिए, पूरे संसार की खुशियां चल कर आ गई हैं आज दरवाजे पर,’’ कह कर बिरूवा घर में कहीं गुम हो गया. वे जल्दी से बाहर गए. देखा, दरवाजे पर श्यामला खड़ी थी. वे आश्चर्यचकित, किंकर्तव्यविमूढ़ से उसे देखते रह गए.

‘‘श्यामला तुम,’’ उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था.

‘‘हां मैं…’’ वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘अंदर आने के लिए नहीं कहोगे.’’

‘‘श्यामला…’’ खुशी के अतिरेक में उन्होंने आगे बढ़ कर श्यामला को गले लगा लिया, ‘‘मुझे माफ कर दो.’’

‘‘बस, अब कुछ मत कहो… आप भी मुझे माफ कर दो. जो कुछ हुआ वह सब भूल कर आई हूं.’’

दोनों थोड़ी देर ऐसे ही खड़े रहे. तभी पीछे कुछ आवाज सुन कर दोनों अलग हुए. मुड़ कर देखा तो बिरूवा आरती का थाल लिए खड़ा था. मधुर और श्यामला दोनों हंस पड़े.

‘‘आज तो बहुत ही खुशी का दिन है साब.’’

‘‘हां बिरूवा क्यों नहीं. आज मैं तुम्हें किसी बात के लिए नहीं रोकूंगा,’’ कह कर मधुप श्यामला की बगल में खड़े हो गए और बिरूवा उन दोनों की आरती उतारने लगा.

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December 31, 2021 at 10:21AM

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