जब तनीषा को ये सब बातें पता चलीं तो उस ने विवाह करने से ही मना कर दिया. उस ने परख से कहा, ‘‘यदि इस विवाह से तुम्हारी जान को खतरा है तो मैं तुम्हें आजाद करती हूं, क्योंकि मुझे तुम्हारे साथ अपना पूरा जीवन बिताना है न केवल तुम्हें पाना. यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं तुम्हारे बिना क्या करूंगी?’’
परख को बड़ा ही आश्चर्य हुआ. उस ने कहा, ‘‘अब जब हम दोनों ही एकदूसरे को प्यार करते हैं तो फिर इन रूढि़वादी रिवाजों के डर से तुम अपने कदम पीछे क्यों कर रही हो? क्या तुम्हें तुम्हारी शिक्षा इन्हीं सब अंधविश्वासों को मानने के लिए ही मिली है? बी लौजिकल.’’
लेकिन तनीषा अपनी बात पर अडिग रही. उस ने परख को कोई उत्तर नहीं दिया. किंतु परख ने उस की बाएं हाथ की उंगली में अपने नाम की हीरों जड़ी अंगूठी पहना ही दी.
‘‘यह अंगूठी मेरी ओर से हमारी सगाई का प्रतीक है. मैं तुम्हारी हां की प्रतीक्षा करूंगा,’’ कह कर परख वहां से चला गया.
तनीषा ने अब परख से मिलनाजुलना भी कम कर दिया था. डरती थी कि कहीं वह कमजोर न पड़ जाए और परख की बात मान ले. परख भी अब चुपचाप उस समय की प्रतीक्षा कर रहा था जब उस की तनु विवाह के लिए हां कर दे. इस बीच तनु को एक स्थानीय कालेज में लैक्चररशिप मिल गई और उस ने खुद को अध्यापन कार्य में ही व्यस्त कर लिया.
इधर परख भी एक फैलोशिप पा कर कनाडा चला गया था 2 वर्षों के लिए. फिर कुछ
ऐसा इत्तेफाक हुआ कि उस के कनाडा प्रवास की अवधि बढ़ती ही चली गई. दोनों की फोन पर या व्हाट्सऐप पर ही बातें होती थीं. लेकिन धीरेधीरे वह भी कम होता चला गया और फिर एक दिन उस की सहेली शुभ्रा ने जोकि परख के मामा की ही बेटी थी, परख के ब्याह की खबर दे कर उसे अचंभित कर दिया.
उस ने यह भी बताया कि दादी मृत्यु शैय्या पर पड़ी थीं और परख का विवाह देखना चाहती थीं. उस ने दादी की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी रजामंदी दे दी थी. तनीषा ने अपनी आंखों में भर आए आंसुओं को जबरन रोका और परख के नाम की अंगूठी को, जिसे पहन कर वह खुद को उस की वाग्दत्ता समझने लगी थी, अपने दूसरे हाथ से कस कर भींच लिया.
‘‘नहीं, मैं उस की हूं और वह मेरा है. भले ही उस का ब्याह किसी से हो जाए. मेरी उंगली में तो उसी के प्यार की निशानी है,’’ और इस प्रकार उस ने खुद को अकेले रहने को बाध्य कर लिया.
कुछ दिनों बाद उस के विवाह न करने के फैसले को देखते हुए उस के मातापिता ने उस के भाई का विवाह कर दिया. उन की मृत्यु के उपरांत वह भाईभाभी तथा उन के बच्चों के साथ रहने लगी. किंतु भाभी को अब उस का वहां रहना अखरने लगा था. जबतब वे उसे ताने सुना ही देती थीं, ‘‘भई अकेले की जिंदगी भी कोई जिंदगी होती है. अपने घरपरिवार की जरूरत तो सभी को होती है.’’
तनीषा भलीभांति समझती थी कि वे ऐसा क्यों कहती थीं. पिछली बार जब वह 2 माह टायफाइड से पीडि़त रही तब भाभी को उस की सेवा करनी पड़ी थी. इसीलिए वे ये सब बातें सुना देती थीं. लेकिन शायद वे भूल जाती थीं कि उन की 3-3 जचगी में उस ने किस प्रकार उन की सेवा की थी. वे सो सकें इसलिए वह रातरात भर जाग कर बच्चों को संभालती थी और सवेरे घर का सारा काम निबटा कर क्लासेज लेने के लिए कालेज भी जाती थी. घरखर्च के रूप में वह भाभी के हाथ पर अपने वेतन का एक हिस्सा रख ही देती थी. जबकि भाभी बनावटी आंसू बहाते हुए कहती थीं, ‘‘अरे मेरा हाथ कट कर गिर जाए, अपनी बेटी सरीखी ननद से घरखर्च में मदद लेते हुए. लेकिन क्या करें महंगाई भी तो बढ़ती ही जा रही है.’’
तनीषा इन सब बातों का मतलब समझती थी और जब भाई ने अपना अलग फ्लैट लिया तब उसे यह समझने में देर न लगी कि अब वे लोग उस के साथ और नहीं रहना चाहते. बिना यह सोचे की वह अकेली रह जाएगी, उस का भाई अपने परिवार को ले कर चला गया और वह अब एकदम अकेली ही रह गई थी.
डौरबैल की आवाज से वह वर्तमान में लौटी और दरवाजे पर जा कर देखा अनुज ही था. बहन के विवाह का निमंत्रण ले कर आया था. ‘नीरजा परिणय प्रतीक’ उस ने कार्ड को उलटपलट कर देखा. वर के पिता का नाम परख जालान पढ़ कर वह चिहुंक सी गई.
‘तो क्या प्रतीक मेरे परख का ही बेटा है? नहींनहीं यह कोई और परख भी तो हो सकता है,’ उस ने अपने को आश्वस्त किया.
‘आंटी, आप को जरूर आना है,’ कह कर अनुज चला गया.
न जाने क्यों आज वह आईने में खुद को गौर से निहार रही थी. क्या सच में उसे वार्धक्य की आहट सुनाई दे रही है. वह सोचने लगी, ‘‘हां, समय ने उस पर अपना भरपूर प्रहार जो किया था. काश कि बीता समय लौट पाता तो वह परख को अपनी बांहों में कस कर जकड़ लेती,’’
‘आ जाओ परख, तुम्हारी तनु आज भी तुम्हारा इंतजार कर रही है,’ उस के मुंह से एक निश्वास निकल गया.
आज 25 तारीख है. शाम को नीरजा की बरात आने वाली है. उस ने अपनी कोई भी तैयारी नहीं की थी. जाऊं या न जाऊं, वह उलझन में पड़ी हुई थी. अभी तो उस के लिए कोई गिफ्ट भी नहीं खरीदा था. आखिर कुछ न कुछ देना तो होगा ही. खैर कैश ही दे देगी उस ने सोचा.
बैंडबाजे की आवाज से उस की तंद्रा भंग हो गई. लगता है बरात आ गई है. वह जल्दी से तैयार होने लगी. बालों को फ्रैंच बुफे स्टाइल में कानों के ऊपर से उठा कर प्यारा सा जूड़ा बनाया. हलके नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी, सफेद मोतियों का सैट पहना, उंगली में अंगूठी पहनने की जरूरत ही नहीं थी, क्योंकि वहां तो परख का प्यार पहले से ही अपना अधिकार जमाए हुए था.
पूरी कोठी दुलहन की तरह सजी हुई थी. बरात दरवाजे पर आ गई थी. तभी उस की नजर दुल्हे के पिता पर पड़ी. परख ही था. अपने समधी के किसी मजाक पर हंसहंस कर दुहरा हुआ जा रहा था. तनीषा की नजरें अपने परख को ढूंढ़ रहीं थीं जो कहीं खो सा गया था. उस के सिर के खिचड़ी हो गए बाल, कलमों के पास थोड़ीथोड़ी सफेदी उस की बढ़ती उम्र का परिचय दे रहे थे. तनिक निकली हुई छोटी सी तोंद उस की सुख तथा समृद्धि का प्रतीक थी. नहीं, यह मेरा परख नहीं हो सकता है. सोचते हुए वह घर के अंदर जाने के लिए मुड़ी कि तभी उस ने देखा सामने से नीरजा दुलहन बनी हुई अपनी सहेलियों के साथ जयमाला ले कर आ रही थी. उस ने तत्काल ही एक निर्णय लिया और आगे बढ़ कर नीरजा की उंगली में परख के नाम की अंगूठी पहना दी. जब तक नीरजा कुछ समझ पाती वह वहां से वापस लौट पड़ी. अब उस का वहां कोई काम नहीं था.
‘‘जब भी परख अपनी बहू की उंगली में यह अंगूठी देखेगा तो क्या उसे मेरी याद आएगी?’’ सोचते हुए वह नींद के आगोश में चली गई, क्योंकि अब उसे परख के लौटने की कोई उम्मीद जो नहीं थी. उसे एक पुराना गीत याद आ रहा था ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं…’ और अब उस का मन शांत हो गया था.
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जब तनीषा को ये सब बातें पता चलीं तो उस ने विवाह करने से ही मना कर दिया. उस ने परख से कहा, ‘‘यदि इस विवाह से तुम्हारी जान को खतरा है तो मैं तुम्हें आजाद करती हूं, क्योंकि मुझे तुम्हारे साथ अपना पूरा जीवन बिताना है न केवल तुम्हें पाना. यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं तुम्हारे बिना क्या करूंगी?’’
परख को बड़ा ही आश्चर्य हुआ. उस ने कहा, ‘‘अब जब हम दोनों ही एकदूसरे को प्यार करते हैं तो फिर इन रूढि़वादी रिवाजों के डर से तुम अपने कदम पीछे क्यों कर रही हो? क्या तुम्हें तुम्हारी शिक्षा इन्हीं सब अंधविश्वासों को मानने के लिए ही मिली है? बी लौजिकल.’’
लेकिन तनीषा अपनी बात पर अडिग रही. उस ने परख को कोई उत्तर नहीं दिया. किंतु परख ने उस की बाएं हाथ की उंगली में अपने नाम की हीरों जड़ी अंगूठी पहना ही दी.
‘‘यह अंगूठी मेरी ओर से हमारी सगाई का प्रतीक है. मैं तुम्हारी हां की प्रतीक्षा करूंगा,’’ कह कर परख वहां से चला गया.
तनीषा ने अब परख से मिलनाजुलना भी कम कर दिया था. डरती थी कि कहीं वह कमजोर न पड़ जाए और परख की बात मान ले. परख भी अब चुपचाप उस समय की प्रतीक्षा कर रहा था जब उस की तनु विवाह के लिए हां कर दे. इस बीच तनु को एक स्थानीय कालेज में लैक्चररशिप मिल गई और उस ने खुद को अध्यापन कार्य में ही व्यस्त कर लिया.
इधर परख भी एक फैलोशिप पा कर कनाडा चला गया था 2 वर्षों के लिए. फिर कुछ
ऐसा इत्तेफाक हुआ कि उस के कनाडा प्रवास की अवधि बढ़ती ही चली गई. दोनों की फोन पर या व्हाट्सऐप पर ही बातें होती थीं. लेकिन धीरेधीरे वह भी कम होता चला गया और फिर एक दिन उस की सहेली शुभ्रा ने जोकि परख के मामा की ही बेटी थी, परख के ब्याह की खबर दे कर उसे अचंभित कर दिया.
उस ने यह भी बताया कि दादी मृत्यु शैय्या पर पड़ी थीं और परख का विवाह देखना चाहती थीं. उस ने दादी की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी रजामंदी दे दी थी. तनीषा ने अपनी आंखों में भर आए आंसुओं को जबरन रोका और परख के नाम की अंगूठी को, जिसे पहन कर वह खुद को उस की वाग्दत्ता समझने लगी थी, अपने दूसरे हाथ से कस कर भींच लिया.
‘‘नहीं, मैं उस की हूं और वह मेरा है. भले ही उस का ब्याह किसी से हो जाए. मेरी उंगली में तो उसी के प्यार की निशानी है,’’ और इस प्रकार उस ने खुद को अकेले रहने को बाध्य कर लिया.
कुछ दिनों बाद उस के विवाह न करने के फैसले को देखते हुए उस के मातापिता ने उस के भाई का विवाह कर दिया. उन की मृत्यु के उपरांत वह भाईभाभी तथा उन के बच्चों के साथ रहने लगी. किंतु भाभी को अब उस का वहां रहना अखरने लगा था. जबतब वे उसे ताने सुना ही देती थीं, ‘‘भई अकेले की जिंदगी भी कोई जिंदगी होती है. अपने घरपरिवार की जरूरत तो सभी को होती है.’’
तनीषा भलीभांति समझती थी कि वे ऐसा क्यों कहती थीं. पिछली बार जब वह 2 माह टायफाइड से पीडि़त रही तब भाभी को उस की सेवा करनी पड़ी थी. इसीलिए वे ये सब बातें सुना देती थीं. लेकिन शायद वे भूल जाती थीं कि उन की 3-3 जचगी में उस ने किस प्रकार उन की सेवा की थी. वे सो सकें इसलिए वह रातरात भर जाग कर बच्चों को संभालती थी और सवेरे घर का सारा काम निबटा कर क्लासेज लेने के लिए कालेज भी जाती थी. घरखर्च के रूप में वह भाभी के हाथ पर अपने वेतन का एक हिस्सा रख ही देती थी. जबकि भाभी बनावटी आंसू बहाते हुए कहती थीं, ‘‘अरे मेरा हाथ कट कर गिर जाए, अपनी बेटी सरीखी ननद से घरखर्च में मदद लेते हुए. लेकिन क्या करें महंगाई भी तो बढ़ती ही जा रही है.’’
तनीषा इन सब बातों का मतलब समझती थी और जब भाई ने अपना अलग फ्लैट लिया तब उसे यह समझने में देर न लगी कि अब वे लोग उस के साथ और नहीं रहना चाहते. बिना यह सोचे की वह अकेली रह जाएगी, उस का भाई अपने परिवार को ले कर चला गया और वह अब एकदम अकेली ही रह गई थी.
डौरबैल की आवाज से वह वर्तमान में लौटी और दरवाजे पर जा कर देखा अनुज ही था. बहन के विवाह का निमंत्रण ले कर आया था. ‘नीरजा परिणय प्रतीक’ उस ने कार्ड को उलटपलट कर देखा. वर के पिता का नाम परख जालान पढ़ कर वह चिहुंक सी गई.
‘तो क्या प्रतीक मेरे परख का ही बेटा है? नहींनहीं यह कोई और परख भी तो हो सकता है,’ उस ने अपने को आश्वस्त किया.
‘आंटी, आप को जरूर आना है,’ कह कर अनुज चला गया.
न जाने क्यों आज वह आईने में खुद को गौर से निहार रही थी. क्या सच में उसे वार्धक्य की आहट सुनाई दे रही है. वह सोचने लगी, ‘‘हां, समय ने उस पर अपना भरपूर प्रहार जो किया था. काश कि बीता समय लौट पाता तो वह परख को अपनी बांहों में कस कर जकड़ लेती,’’
‘आ जाओ परख, तुम्हारी तनु आज भी तुम्हारा इंतजार कर रही है,’ उस के मुंह से एक निश्वास निकल गया.
आज 25 तारीख है. शाम को नीरजा की बरात आने वाली है. उस ने अपनी कोई भी तैयारी नहीं की थी. जाऊं या न जाऊं, वह उलझन में पड़ी हुई थी. अभी तो उस के लिए कोई गिफ्ट भी नहीं खरीदा था. आखिर कुछ न कुछ देना तो होगा ही. खैर कैश ही दे देगी उस ने सोचा.
बैंडबाजे की आवाज से उस की तंद्रा भंग हो गई. लगता है बरात आ गई है. वह जल्दी से तैयार होने लगी. बालों को फ्रैंच बुफे स्टाइल में कानों के ऊपर से उठा कर प्यारा सा जूड़ा बनाया. हलके नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी, सफेद मोतियों का सैट पहना, उंगली में अंगूठी पहनने की जरूरत ही नहीं थी, क्योंकि वहां तो परख का प्यार पहले से ही अपना अधिकार जमाए हुए था.
पूरी कोठी दुलहन की तरह सजी हुई थी. बरात दरवाजे पर आ गई थी. तभी उस की नजर दुल्हे के पिता पर पड़ी. परख ही था. अपने समधी के किसी मजाक पर हंसहंस कर दुहरा हुआ जा रहा था. तनीषा की नजरें अपने परख को ढूंढ़ रहीं थीं जो कहीं खो सा गया था. उस के सिर के खिचड़ी हो गए बाल, कलमों के पास थोड़ीथोड़ी सफेदी उस की बढ़ती उम्र का परिचय दे रहे थे. तनिक निकली हुई छोटी सी तोंद उस की सुख तथा समृद्धि का प्रतीक थी. नहीं, यह मेरा परख नहीं हो सकता है. सोचते हुए वह घर के अंदर जाने के लिए मुड़ी कि तभी उस ने देखा सामने से नीरजा दुलहन बनी हुई अपनी सहेलियों के साथ जयमाला ले कर आ रही थी. उस ने तत्काल ही एक निर्णय लिया और आगे बढ़ कर नीरजा की उंगली में परख के नाम की अंगूठी पहना दी. जब तक नीरजा कुछ समझ पाती वह वहां से वापस लौट पड़ी. अब उस का वहां कोई काम नहीं था.
‘‘जब भी परख अपनी बहू की उंगली में यह अंगूठी देखेगा तो क्या उसे मेरी याद आएगी?’’ सोचते हुए वह नींद के आगोश में चली गई, क्योंकि अब उसे परख के लौटने की कोई उम्मीद जो नहीं थी. उसे एक पुराना गीत याद आ रहा था ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं…’ और अब उस का मन शांत हो गया था.
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December 04, 2021 at 10:00AM
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