Tuesday, 19 October 2021

उल्टा पांसा : भाग 5

कुछ ही देर में सूरज आ गया था और मुनीमजी ने उसे कुछ रुपए दे भी दिए थे. मुनीमजी समझ गए थे कि अब वो सेठजी के यहां नौकरी नहीं कर पाएंगे. सुमन ने उन के साथ जो व्यवहार किया है, उस से वे नाराज होंगे. साथ ही, जब उन्हें पता चलेगा कि उस ने सूरज को पैसे दिए हैं, तो बहुत ही ज्यादा नाराज होंगे. वैसे वह खुद भी उन के यहां नौकरी नहीं करना चाह रहा था. उन्होंने भी तो उसे पुलिस की धमकी दी थी.

वैसे, मुनीमजी सेठजी का सारा राज जानते थे, इतने वर्षों से काम जो कर रहे थे और सेठजी के कहने पर वे ही तो सारा कालापीला करते थे. ‘‘सुमन, अब सेठजी मुझे तो काम पर रखने से रहे. तो हम सेठजी के पैसों से जैसे हम ने सूरज को पैसे दिए हैं, वैसे ही उन सभी कर्मचारियों का भुगतान भी कर देते हैं, जिन्हें सेठजी से पैसे लेने हैं… लौकडाउन में उन्हें भी तो पैसों की जरूरत होगी, सेठजी तो उन्हें देने से रहे. पिछली बार भी उन्होंने कर्मचारियों को पैसा नहीं दिया था. कहते थे, ‘‘लौकडाउन के कारण मुझे भारी नुकसान हो गया है, इसलिए मैं किसी को पैसे नहीं दूंगा. बाकी जो होगा देखा जाएगा.”

सुमन को बात जमीं, ‘‘हां, ऐसा करने से वे हमारे साथ मिल जाएंगे और हमारा गुट मजबूत हो जाएगा…’’ सुमन के मुरझाए चेहरे पर आस की नई किरण जगमगाने लगी.मुनीमजी के मोबाइल में सारे कर्मचारियों के फोन नंबर थे ही. उसे तो सभी कर्मचारियों से बात करनी होती थी. एकएक कर उस ने सभी कर्मचारियों को फोन कर बता दिया कि वो उस के पास पैसे लेने आ जाएं. सभी इकट्ठे न आ जाएं, ऐसा सोच कर उस ने सभी को अलगअलग समय दिया और साथ में यह भी समझा दिया, ‘‘देखो भाई, लौकडाउन लगा है, इसलिए पुलिस से बचतेबचाते अपनी जिम्मेदारी पर ही आना.’’

मुनीमजी का मन भी हलका हो गया था. जातेजाते कम से कम वे कुछ भला तो कर रहे थे.अब सेठजी अपने सारे कर्मचारियों को तो नौकरी से निकालने से रहे. अगर सभी को निकाल भी दिया तो उन की दुकान ही बैठ जाएगी.मुनीमजी ने लगभग सभी कर्मचारियों को रुपए दे दिए थे. साथ में यह भी बोल दिया था, ‘‘देखो भाई, मैं सेठजी से पूछे बगैर पैसे दे रहा हूं… कल को वे यदि नाराज हुए तो आप लोगों को मेरा साथ देना पड़ेगा.’’

कर्मचारी तो वैसे भी सेठजी से नाराज थे तो उन्होंने खुल कर बोल दिया, ‘‘मुनीमजी, बच्चों की सौं आप पर आंच नहीं आने देंगे.’’मुनीमजी को लगने लगा था कि उन की ताकत बढ़ ग है. उन्होंने अपने हिसाब के पैसे भी सेठजी के पैसों से निकाल लिए और सारा हिसाब बना कर शेष बचे पैसों के साथ रख दिया.

सेठजी को पता चल गया था कि मुनीमजी ने उन के पैसों से सारे कर्मचारियों का भुगतान कर दिया है. वे गुस्से से आगबबूला हो गए.उन्होंने मुनीमजी को फोन लगाया, पर फोन सुमन ने ही उठाया, ‘‘कहिए सेठजी, थाने में रिपोर्ट कर दी,’’ उस की आवाज में व्यंग्य था.‘‘अभी तक तो नहीं की, पर आज कर ही देता हूं. मेरे पैसों से दानवीर कर्ण बन रहे हैं मुनीमजी.’’

‘‘दानवीर नहीं बन रहे हैं, वे तो अपना काम कर रहे हैं. मुनीम का काम कर्मचारियों को भगुतान करने का ही तो होता है… वे दुकान पर बैठ कर करें या घर पर… काम तो आप का ही कर रहे हैं न.’’‘‘मुझ से बगैर पूछे ही. मेरे सारे पैसे उड़ा रहे हैं… पाईपाई का हिसाब लूंगा…’’

‘‘हां… हां, ले लेना. वो तो बना रखा है… और वो थाने में भी रिपोर्ट लिखानी है आप को,’’ सुमन को मजा आने लगा था. वह सेठजी की हालत का अंदाजा कर रही थी.‘‘वह भी करूंगा…’’

‘‘इतना समझ लेना कि मुनीमजी को आप की सारी कमजोरियां पता हैं,’’ कह कर सुमन ने फोन रख दिया. आज सुमन के माथे पर चिंता की कोई लकीर नहीं थी और न ही मुनीमजी चिंतित थे.सेठजी शाम को अपनी पत्नी के साथ मुनीम के घर आए. सुमन को इस की उम्मीद नहीं थी. सेठानी को देख सुमन ने घर के दरवाजे खोले और उन्हें अंदर बुला लिया.ऐसा देख सेठजी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. पहले जैसी हेकड़ी नजर नहीं आ रही थी. वे शायद पहले से ही सोच कर आए थे, इसलिए बातों का सिलसिला सेठानी ने शुरू किया, ‘‘आप मुनीमजी को बुला देंगी क्या…’’

सुमन कुछ देर तक असमंजस में रही, फिर आवाज दे कर मुनीमजी को बुला ही लिया.मुनीमजी भी बाहर आने को उत्सुक थे. वे सेठानी को जानते थे. वे बहुत भली महिला थीं. मुनीम को आया देख सेठजी के चेहरे पर कई किस्म के भाव आए और गए, पर वे बोले कुछ नहीं.सेठानी ने ही बात आगे बढ़ाई, ‘‘देखिए मुनीमजी, आप हमारे यहां वर्षों से काम कर रहे हैं. हमें आप पर पूरा भरोसा है, पर सेठजी को तो आप जानते ही हैं, इसलिए वे पैसों के

मामले में परेशान हो जाते हैं… ये मुझे साथ ले कर इसलिए आए हैं कि आप इन के पैसे इन्हें दे दें…’’मुनीमजी ने अपनी पत्नी सुमन की ओर देखा. उस का इशारा मिलते ही वे अलमारी से पैसों का बेग और तिजोरी की चाबी ले कर आ गए.‘‘पैसों के बेग में पैसों का सारा हिसाब भी रखा है. आप उसे देख लें.’’पैसों से भरा बेग देख कर सेठजी के चेहरे की रौनक लौट आई.‘‘इस में सारे पैसे हैं न… वह भी, जो तुम ने कर्मचारियों को मुझ से पूछे बगैर दे दिए हैं.’’

‘‘नहीं, वह तो मैं दे ही चुका हूं, तो उतने पैसे इस में कम हैं. उस के हिसाब की परची है इस में.’’‘‘मुझे तो पूरे पैसे चाहिए… तुम होते कौन हो उन को पैसे देने वाले?’’बहुत कोशिश करने के बाद भी सेठजी को गुस्सा आखिर आ ही गया.‘‘तो ठीक है, जब मैं उन से पैसे वापस ले लूंगा तब आप पैसे ले जाना.’’मुनीम ने बेग वापस उठा लिया.‘‘नहीं, ये तो मैं ले ही जाता हूं. पर, मुझे वो पैसे भी दो,’’ सेठजी ने बेग अपनी ओर खींच लिया.

‘‘नहीं, अब आप रहने दो. मैं तो पूरा पैसा ही दूंगा…’’ सेठजी की समझ में नहीं आ रहा था कि वे इतने ही पैसे ले लें कि पूरे पैसों के लिए दबाव बनाएं. उन्होंने सेठानी की ओर देखा. वे नाराजगी भरे भाव से उन की ओर देख रही थीं.‘‘रुकिए सेठजी… आप के ही कर्मचारियों का भुगतान था… वे आप करते या मुनीमजी करते… करते तो न… तो जो हो गया वह हगया, बाकी बचे पैसे आप ले लें.’’सेठानी हालात को भांप चुकी थीं. उन के पास इस समस्या का केवल यही एक हल था.

पर, सेठजी अभी भी तैयार नहीं थे. वे जानते थे कि वे अपने कर्मचारियों को तो पैसे देते ही नहीं थे. ऐसे में उन का यह पैसा तो बेकार के दान में चला गया न. पर वे कुछ नहीं बोले.मुनीमजी ने कातर निगाहों से अपनी पत्नी सुमन की ओर देखा. वह शांत भाव से मुनीमजी की ओर देख रही थी.मुनीमजी ने बेग सेठानी की ओर बढ़ा दिया.‘‘सेठजी, मैं ने अपने हिसाब के बाकी बचे पैसे भी ले लिए हैं. मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी.’’सेठजी को तो जैसे सांप सूंघ गया. गुस्से के कारण उन के गाल लाल हो चुके थे. सेठानी ने उन का हाथ दबा कर उन्हें शांत किया.

‘‘मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ सुमन ने माहौल को बेहतर करने का प्रयास किया.‘‘नहीं. अब हम चलते हैं. हिसाब मिला लेंगे… कुछ समझ में नहीं आया तो आप से फोन पर बात कर लेंगे,’’ सेठानी ने कहा और दोनों उठ कर जाने को खड़े हो गए.सेठ और सेठानी के जाने के बाद मुनीमजी और सुमन ने राहत की सांस ली. दोनों बहुत देर तक आवाक से सारे घटनाक्रम पर चिन्तन करते रहे. इस बार का लाकडाउन हमेशा याद रहने वाला था.

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कुछ ही देर में सूरज आ गया था और मुनीमजी ने उसे कुछ रुपए दे भी दिए थे. मुनीमजी समझ गए थे कि अब वो सेठजी के यहां नौकरी नहीं कर पाएंगे. सुमन ने उन के साथ जो व्यवहार किया है, उस से वे नाराज होंगे. साथ ही, जब उन्हें पता चलेगा कि उस ने सूरज को पैसे दिए हैं, तो बहुत ही ज्यादा नाराज होंगे. वैसे वह खुद भी उन के यहां नौकरी नहीं करना चाह रहा था. उन्होंने भी तो उसे पुलिस की धमकी दी थी.

वैसे, मुनीमजी सेठजी का सारा राज जानते थे, इतने वर्षों से काम जो कर रहे थे और सेठजी के कहने पर वे ही तो सारा कालापीला करते थे. ‘‘सुमन, अब सेठजी मुझे तो काम पर रखने से रहे. तो हम सेठजी के पैसों से जैसे हम ने सूरज को पैसे दिए हैं, वैसे ही उन सभी कर्मचारियों का भुगतान भी कर देते हैं, जिन्हें सेठजी से पैसे लेने हैं… लौकडाउन में उन्हें भी तो पैसों की जरूरत होगी, सेठजी तो उन्हें देने से रहे. पिछली बार भी उन्होंने कर्मचारियों को पैसा नहीं दिया था. कहते थे, ‘‘लौकडाउन के कारण मुझे भारी नुकसान हो गया है, इसलिए मैं किसी को पैसे नहीं दूंगा. बाकी जो होगा देखा जाएगा.”

सुमन को बात जमीं, ‘‘हां, ऐसा करने से वे हमारे साथ मिल जाएंगे और हमारा गुट मजबूत हो जाएगा…’’ सुमन के मुरझाए चेहरे पर आस की नई किरण जगमगाने लगी.मुनीमजी के मोबाइल में सारे कर्मचारियों के फोन नंबर थे ही. उसे तो सभी कर्मचारियों से बात करनी होती थी. एकएक कर उस ने सभी कर्मचारियों को फोन कर बता दिया कि वो उस के पास पैसे लेने आ जाएं. सभी इकट्ठे न आ जाएं, ऐसा सोच कर उस ने सभी को अलगअलग समय दिया और साथ में यह भी समझा दिया, ‘‘देखो भाई, लौकडाउन लगा है, इसलिए पुलिस से बचतेबचाते अपनी जिम्मेदारी पर ही आना.’’

मुनीमजी का मन भी हलका हो गया था. जातेजाते कम से कम वे कुछ भला तो कर रहे थे.अब सेठजी अपने सारे कर्मचारियों को तो नौकरी से निकालने से रहे. अगर सभी को निकाल भी दिया तो उन की दुकान ही बैठ जाएगी.मुनीमजी ने लगभग सभी कर्मचारियों को रुपए दे दिए थे. साथ में यह भी बोल दिया था, ‘‘देखो भाई, मैं सेठजी से पूछे बगैर पैसे दे रहा हूं… कल को वे यदि नाराज हुए तो आप लोगों को मेरा साथ देना पड़ेगा.’’

कर्मचारी तो वैसे भी सेठजी से नाराज थे तो उन्होंने खुल कर बोल दिया, ‘‘मुनीमजी, बच्चों की सौं आप पर आंच नहीं आने देंगे.’’मुनीमजी को लगने लगा था कि उन की ताकत बढ़ ग है. उन्होंने अपने हिसाब के पैसे भी सेठजी के पैसों से निकाल लिए और सारा हिसाब बना कर शेष बचे पैसों के साथ रख दिया.

सेठजी को पता चल गया था कि मुनीमजी ने उन के पैसों से सारे कर्मचारियों का भुगतान कर दिया है. वे गुस्से से आगबबूला हो गए.उन्होंने मुनीमजी को फोन लगाया, पर फोन सुमन ने ही उठाया, ‘‘कहिए सेठजी, थाने में रिपोर्ट कर दी,’’ उस की आवाज में व्यंग्य था.‘‘अभी तक तो नहीं की, पर आज कर ही देता हूं. मेरे पैसों से दानवीर कर्ण बन रहे हैं मुनीमजी.’’

‘‘दानवीर नहीं बन रहे हैं, वे तो अपना काम कर रहे हैं. मुनीम का काम कर्मचारियों को भगुतान करने का ही तो होता है… वे दुकान पर बैठ कर करें या घर पर… काम तो आप का ही कर रहे हैं न.’’‘‘मुझ से बगैर पूछे ही. मेरे सारे पैसे उड़ा रहे हैं… पाईपाई का हिसाब लूंगा…’’

‘‘हां… हां, ले लेना. वो तो बना रखा है… और वो थाने में भी रिपोर्ट लिखानी है आप को,’’ सुमन को मजा आने लगा था. वह सेठजी की हालत का अंदाजा कर रही थी.‘‘वह भी करूंगा…’’

‘‘इतना समझ लेना कि मुनीमजी को आप की सारी कमजोरियां पता हैं,’’ कह कर सुमन ने फोन रख दिया. आज सुमन के माथे पर चिंता की कोई लकीर नहीं थी और न ही मुनीमजी चिंतित थे.सेठजी शाम को अपनी पत्नी के साथ मुनीम के घर आए. सुमन को इस की उम्मीद नहीं थी. सेठानी को देख सुमन ने घर के दरवाजे खोले और उन्हें अंदर बुला लिया.ऐसा देख सेठजी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. पहले जैसी हेकड़ी नजर नहीं आ रही थी. वे शायद पहले से ही सोच कर आए थे, इसलिए बातों का सिलसिला सेठानी ने शुरू किया, ‘‘आप मुनीमजी को बुला देंगी क्या…’’

सुमन कुछ देर तक असमंजस में रही, फिर आवाज दे कर मुनीमजी को बुला ही लिया.मुनीमजी भी बाहर आने को उत्सुक थे. वे सेठानी को जानते थे. वे बहुत भली महिला थीं. मुनीम को आया देख सेठजी के चेहरे पर कई किस्म के भाव आए और गए, पर वे बोले कुछ नहीं.सेठानी ने ही बात आगे बढ़ाई, ‘‘देखिए मुनीमजी, आप हमारे यहां वर्षों से काम कर रहे हैं. हमें आप पर पूरा भरोसा है, पर सेठजी को तो आप जानते ही हैं, इसलिए वे पैसों के

मामले में परेशान हो जाते हैं… ये मुझे साथ ले कर इसलिए आए हैं कि आप इन के पैसे इन्हें दे दें…’’मुनीमजी ने अपनी पत्नी सुमन की ओर देखा. उस का इशारा मिलते ही वे अलमारी से पैसों का बेग और तिजोरी की चाबी ले कर आ गए.‘‘पैसों के बेग में पैसों का सारा हिसाब भी रखा है. आप उसे देख लें.’’पैसों से भरा बेग देख कर सेठजी के चेहरे की रौनक लौट आई.‘‘इस में सारे पैसे हैं न… वह भी, जो तुम ने कर्मचारियों को मुझ से पूछे बगैर दे दिए हैं.’’

‘‘नहीं, वह तो मैं दे ही चुका हूं, तो उतने पैसे इस में कम हैं. उस के हिसाब की परची है इस में.’’‘‘मुझे तो पूरे पैसे चाहिए… तुम होते कौन हो उन को पैसे देने वाले?’’बहुत कोशिश करने के बाद भी सेठजी को गुस्सा आखिर आ ही गया.‘‘तो ठीक है, जब मैं उन से पैसे वापस ले लूंगा तब आप पैसे ले जाना.’’मुनीम ने बेग वापस उठा लिया.‘‘नहीं, ये तो मैं ले ही जाता हूं. पर, मुझे वो पैसे भी दो,’’ सेठजी ने बेग अपनी ओर खींच लिया.

‘‘नहीं, अब आप रहने दो. मैं तो पूरा पैसा ही दूंगा…’’ सेठजी की समझ में नहीं आ रहा था कि वे इतने ही पैसे ले लें कि पूरे पैसों के लिए दबाव बनाएं. उन्होंने सेठानी की ओर देखा. वे नाराजगी भरे भाव से उन की ओर देख रही थीं.‘‘रुकिए सेठजी… आप के ही कर्मचारियों का भुगतान था… वे आप करते या मुनीमजी करते… करते तो न… तो जो हो गया वह हगया, बाकी बचे पैसे आप ले लें.’’सेठानी हालात को भांप चुकी थीं. उन के पास इस समस्या का केवल यही एक हल था.

पर, सेठजी अभी भी तैयार नहीं थे. वे जानते थे कि वे अपने कर्मचारियों को तो पैसे देते ही नहीं थे. ऐसे में उन का यह पैसा तो बेकार के दान में चला गया न. पर वे कुछ नहीं बोले.मुनीमजी ने कातर निगाहों से अपनी पत्नी सुमन की ओर देखा. वह शांत भाव से मुनीमजी की ओर देख रही थी.मुनीमजी ने बेग सेठानी की ओर बढ़ा दिया.‘‘सेठजी, मैं ने अपने हिसाब के बाकी बचे पैसे भी ले लिए हैं. मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी.’’सेठजी को तो जैसे सांप सूंघ गया. गुस्से के कारण उन के गाल लाल हो चुके थे. सेठानी ने उन का हाथ दबा कर उन्हें शांत किया.

‘‘मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ सुमन ने माहौल को बेहतर करने का प्रयास किया.‘‘नहीं. अब हम चलते हैं. हिसाब मिला लेंगे… कुछ समझ में नहीं आया तो आप से फोन पर बात कर लेंगे,’’ सेठानी ने कहा और दोनों उठ कर जाने को खड़े हो गए.सेठ और सेठानी के जाने के बाद मुनीमजी और सुमन ने राहत की सांस ली. दोनों बहुत देर तक आवाक से सारे घटनाक्रम पर चिन्तन करते रहे. इस बार का लाकडाउन हमेशा याद रहने वाला था.

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October 15, 2021 at 10:00AM

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