महाराज गाड़ी ले कर दीवार के पास पहुंचे, जहां इंस्पेक्टर जड़ेजा गिरे थे उस जगह बैरिकेड लगे हुए थे और बगल में एक कांस्टेबल कुरसी डाले बैठा हुआ था.इंद्रपुरी महाराज यहां जब आते थे, तब बावरिया देवी के मंदिर में शहर में कोई अनुष्ठानपूजा हो तो वहीं जा कर सीधा निकल जाते थे.
इस बस्ती में वह कब आए, उन्हें खुद भी याद नहीं आ रहा था. उन का जो मठ था, वहीं आते थे. इसीलिए ऐसी विचित्र परिस्थितियों में इस बस्ती में आते हुए उन के दिल पर एक बड़ा बोझ आ गया था. वह दीवार पार कर पगडंडी पर चलते हुए बस्ती में घुस गए. शुरू में एकदो मंजिल के मकान थे. बस्ती के बाकी मकानों की अपेक्षा यह थोड़ा ठीकठाक बनावट का लग रहा था.
घर के अंदर से गिटार बजाने की आवाज आ रही थी. बावरा लोग और गीतसंगीत, यह चोलीदामन का जोड़, फिर भी इन सुरों में अलग मजा था, उस से वह दो पल के लिए सब भूल गए. दरवाजे पर खटखटाहट सुन कर एक औरत चिल्लाते हुए बाहर आई, लेकिन महाराज को सामने खड़ा देख उस ने अपना पल्लू सिर पर ओढ़ लिया.
“बापू आप… आइए, अंदर आइए,” वह बोली. महाराज अंदर गए. उस कमरे में एक बड़ा सा सीएफएल बल्ब लगा हुआ था. भड़कीले रंग का एक सोफा सेट और उस के बगल में एक बड़ी चारपाई. उस पर बैठ कर 2 लड़के गिटार और ड्रम बजा रहे थे. “मालिक तो काम पर गए हैं, बापू. वह कालूपुर में चोखा बाजार में काम करते हैं,” उस औरत ने कहा.
महाराज सोफे पर बैठ गए. वैसे, उस ने बच्चों को उन के पैर छूने का इशारा किया और खुद भी झुक कर महाराज के पैर छुए. उन्हें आशीर्वाद दे कर महाराज बोले, “दोनों तुम्हारे ही बेटे हैं?” “जी हां बापू. यह बड़ा बेटा जिगर और छोटा बेटा भावेश. जाओ, तुम लोग अंदर जा कर बजाओ.”
बच्चों के नाम सुन कर महाराज सोचने लगे कि यह लोग समाज की मुख्यधारा में समाहित होने की कितनी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन के सिर पर जो गुनाहगारी का अभिशाप लगा है, वह कब जाएगा? दोनों बच्चे तुरंत उठ कर अंदर चले गए. “उम्र के हिसाब से बच्चे बहुत अच्छा बजा लेते हैं,” महाराज बोले.
“जी हां. यहां रात को कुछ भले घर के लोग उन के लिए स्कूल चलाते हैं. उस में जिस को जो अच्छा लगे, वह हुनर सिखाते हैं. काफी वक्त कहीं बाहर भी ले जाते हैं. यह गिटार भी उन्हीं लोगों ने दी है. वैसे, बावरा और गानाबजाना यह कुछ जुदा नहीं,” वह औरत बोली.
“सही बात है,” महाराज बोल कर थोड़ा सोचने लगे. फिर खांस कर वह बोले, “यहां सुबह क्या हुआ, तुम्हें पता ही होगा. अगर चौबीस घंटे में गुनाहगार को पकड़ कर हाजिर नहीं किया गया, तो सरकार यह बस्ती खाली करवाने की धमकी दे रही है.”
“हम तो जन्म से ही गुनाहगार पैदा होते हैं, बापू. सरकार ने आप को यह बताने के लिए भेजा है? आप तो हमारे महंत हो, गोर हो. आप हमें बेघर करोगे?” वह गुस्से से लाल होते हुए बोली. “नहीं बेटा, मैं तो ऐसा न होने दूंगा, इस की कोशिश कर रहा हूं,” वह शांति से बोले. दिनभर की थकान से महाराज त्रस्त हो गए थे. उस औरत के चिल्लाने से उन्हें और भी थकावट महसूस होने लगी. लेकिन शायद उस ने स्थिति को समझा और एक कटोरी में थोड़ा सा गुड़ और लोटे में पानी भर कर महाराज के सामने रख दिया.
गुड़ और पानी लेने के बाद महाराज बोले, “ऊपर की मंजिल पर कौन रहता है? किराए से दिया है क्या किसी को?””नहीं बापू, बच्चे ही कुछ करते रहते हैं,” वह औरत बोली, “यहां नजदीक हमारे बच्चों के लिए कोई स्कूल नहीं है. दूर एक स्कूल में पहले जाते थे, लेकिन बाकी बच्चे तंग करने लगे तो इन्होंने स्कूल जाना ही बंद कर दिया. लेकिन कुछ लोग रात को पास में ही एक खुली जगह पर इन्हें गानाबजाना, नाटक और कुछ अंगरेजी वगैरह पढ़ाते हैं. रास्ते पर भटकने से तो ये दिनभर बजाते हैं, वही ठीक है,” महाराज को ऊपर ले जाते हुए वह बोली.
उस बस्ती की तुलना में वह घर काफी अच्छा लग रहा था. ऊपर एक बड़ा कमरा और बालकनी थे. “मकान काफी अच्छा बनवाया है आप लोगों ने,” महाराज ने कहा. “मालिक काम करते हैं. वह सब कड़िया काम के माल की ही दुकान है. उन का सेठ खुद कौंट्रैक्टर है. हमें काफी सामान मुफ्त में मिल गया. इसलिए थोड़ी मेहनत कर के हम ने घर बना लिया,” वह बोली.
“यहां पुलिस तंग करती है?” उन्होंने पूछा. “हम बावराओं को तो पुलिस जन्म से ही पकड़ती रही है, बापू. लेकिन मालिक कहते हैं, जंगल में जैसे खरगोश शेर से बचते हुए रहते हैं, वैसे बावरा के बेटे को पुलिस से बच के जीना सीखना पड़ता है.” “कितने लोगों की बस्ती है यहां?” महाराज ने पूछ लिया, लेकिन वह इन लोगों के महंत होने के बावजूद इन की जिंदगी से कितने अलिप्त और अज्ञात है, यह सोच के वह मन में ही शर्मसार हो गए. लेकिन शायद वो बावराओं के गोर या महंत थे, इसीलिए इन मुश्किलों से परे थे. ऐसी सोच में वह थे, तभी दीवार की उस ओर से रास्ते पर बजता हुआ लाउडस्पीकर उन्हें सुनाई दिया. पहले हिंदी में, फिर गुजराती में एक बंदा सरकारी फरमान सुना रहा था कि अगर गुनाहगार पकड़ा नहीं गया, तो यह बस्ती खाली करा दी जाएगी. ऐसा ही वह कह रहा था.
दीवार जहां से शुरू हो रही थी, वहां अब कुछ लोग इकट्ठा हो कर चिल्ला रहे थे. “मैं जरा उन से बात करता हूं,” महाराज नीचे उतरते हुए बोले. सुबह उन्हें जो युवती नजर आई थी, वह अब खड़ी हो कर लोगों से शांति की अपील कर रही थी. एक आदमी शराब के नशे में लग रहा था, चिल्ला रहा था, “तुम लोग मुझे घर से निकालोगे, तो मैं तुम्हें दुनिया से निकाल दूंगा.”
उस शराबी के हाथ में एक छुरा था, जो दिखा कर वह चिल्ला रहा था.महाराज को आते देख कुछ लोगों ने उसे घेर कर थोड़ा दूर कर दिया.महाराज उस युवती के पास गए. उन के पीछे आई हुई उस मकान मालकिन ने उन के बारे में उस युवती को बताया.यह सुन कर उस युवती ने महाराज को नमस्कार किया और शुद्ध गुजराती में बोली, “अच्छा हुआ, बापू आप आ गए. अब इन लोगों को संभालने की और समझाने की जरूरत है. वैसे भी पुलिस तो इन्हें मारने पर तुली है.
The post दीवार – भाग 3 : इंस्पेक्टर जड़ेजा का क्या मकसद था appeared first on Sarita Magazine.
from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/3jo0dfO
महाराज गाड़ी ले कर दीवार के पास पहुंचे, जहां इंस्पेक्टर जड़ेजा गिरे थे उस जगह बैरिकेड लगे हुए थे और बगल में एक कांस्टेबल कुरसी डाले बैठा हुआ था.इंद्रपुरी महाराज यहां जब आते थे, तब बावरिया देवी के मंदिर में शहर में कोई अनुष्ठानपूजा हो तो वहीं जा कर सीधा निकल जाते थे.
इस बस्ती में वह कब आए, उन्हें खुद भी याद नहीं आ रहा था. उन का जो मठ था, वहीं आते थे. इसीलिए ऐसी विचित्र परिस्थितियों में इस बस्ती में आते हुए उन के दिल पर एक बड़ा बोझ आ गया था. वह दीवार पार कर पगडंडी पर चलते हुए बस्ती में घुस गए. शुरू में एकदो मंजिल के मकान थे. बस्ती के बाकी मकानों की अपेक्षा यह थोड़ा ठीकठाक बनावट का लग रहा था.
घर के अंदर से गिटार बजाने की आवाज आ रही थी. बावरा लोग और गीतसंगीत, यह चोलीदामन का जोड़, फिर भी इन सुरों में अलग मजा था, उस से वह दो पल के लिए सब भूल गए. दरवाजे पर खटखटाहट सुन कर एक औरत चिल्लाते हुए बाहर आई, लेकिन महाराज को सामने खड़ा देख उस ने अपना पल्लू सिर पर ओढ़ लिया.
“बापू आप… आइए, अंदर आइए,” वह बोली. महाराज अंदर गए. उस कमरे में एक बड़ा सा सीएफएल बल्ब लगा हुआ था. भड़कीले रंग का एक सोफा सेट और उस के बगल में एक बड़ी चारपाई. उस पर बैठ कर 2 लड़के गिटार और ड्रम बजा रहे थे. “मालिक तो काम पर गए हैं, बापू. वह कालूपुर में चोखा बाजार में काम करते हैं,” उस औरत ने कहा.
महाराज सोफे पर बैठ गए. वैसे, उस ने बच्चों को उन के पैर छूने का इशारा किया और खुद भी झुक कर महाराज के पैर छुए. उन्हें आशीर्वाद दे कर महाराज बोले, “दोनों तुम्हारे ही बेटे हैं?” “जी हां बापू. यह बड़ा बेटा जिगर और छोटा बेटा भावेश. जाओ, तुम लोग अंदर जा कर बजाओ.”
बच्चों के नाम सुन कर महाराज सोचने लगे कि यह लोग समाज की मुख्यधारा में समाहित होने की कितनी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन के सिर पर जो गुनाहगारी का अभिशाप लगा है, वह कब जाएगा? दोनों बच्चे तुरंत उठ कर अंदर चले गए. “उम्र के हिसाब से बच्चे बहुत अच्छा बजा लेते हैं,” महाराज बोले.
“जी हां. यहां रात को कुछ भले घर के लोग उन के लिए स्कूल चलाते हैं. उस में जिस को जो अच्छा लगे, वह हुनर सिखाते हैं. काफी वक्त कहीं बाहर भी ले जाते हैं. यह गिटार भी उन्हीं लोगों ने दी है. वैसे, बावरा और गानाबजाना यह कुछ जुदा नहीं,” वह औरत बोली.
“सही बात है,” महाराज बोल कर थोड़ा सोचने लगे. फिर खांस कर वह बोले, “यहां सुबह क्या हुआ, तुम्हें पता ही होगा. अगर चौबीस घंटे में गुनाहगार को पकड़ कर हाजिर नहीं किया गया, तो सरकार यह बस्ती खाली करवाने की धमकी दे रही है.”
“हम तो जन्म से ही गुनाहगार पैदा होते हैं, बापू. सरकार ने आप को यह बताने के लिए भेजा है? आप तो हमारे महंत हो, गोर हो. आप हमें बेघर करोगे?” वह गुस्से से लाल होते हुए बोली. “नहीं बेटा, मैं तो ऐसा न होने दूंगा, इस की कोशिश कर रहा हूं,” वह शांति से बोले. दिनभर की थकान से महाराज त्रस्त हो गए थे. उस औरत के चिल्लाने से उन्हें और भी थकावट महसूस होने लगी. लेकिन शायद उस ने स्थिति को समझा और एक कटोरी में थोड़ा सा गुड़ और लोटे में पानी भर कर महाराज के सामने रख दिया.
गुड़ और पानी लेने के बाद महाराज बोले, “ऊपर की मंजिल पर कौन रहता है? किराए से दिया है क्या किसी को?””नहीं बापू, बच्चे ही कुछ करते रहते हैं,” वह औरत बोली, “यहां नजदीक हमारे बच्चों के लिए कोई स्कूल नहीं है. दूर एक स्कूल में पहले जाते थे, लेकिन बाकी बच्चे तंग करने लगे तो इन्होंने स्कूल जाना ही बंद कर दिया. लेकिन कुछ लोग रात को पास में ही एक खुली जगह पर इन्हें गानाबजाना, नाटक और कुछ अंगरेजी वगैरह पढ़ाते हैं. रास्ते पर भटकने से तो ये दिनभर बजाते हैं, वही ठीक है,” महाराज को ऊपर ले जाते हुए वह बोली.
उस बस्ती की तुलना में वह घर काफी अच्छा लग रहा था. ऊपर एक बड़ा कमरा और बालकनी थे. “मकान काफी अच्छा बनवाया है आप लोगों ने,” महाराज ने कहा. “मालिक काम करते हैं. वह सब कड़िया काम के माल की ही दुकान है. उन का सेठ खुद कौंट्रैक्टर है. हमें काफी सामान मुफ्त में मिल गया. इसलिए थोड़ी मेहनत कर के हम ने घर बना लिया,” वह बोली.
“यहां पुलिस तंग करती है?” उन्होंने पूछा. “हम बावराओं को तो पुलिस जन्म से ही पकड़ती रही है, बापू. लेकिन मालिक कहते हैं, जंगल में जैसे खरगोश शेर से बचते हुए रहते हैं, वैसे बावरा के बेटे को पुलिस से बच के जीना सीखना पड़ता है.” “कितने लोगों की बस्ती है यहां?” महाराज ने पूछ लिया, लेकिन वह इन लोगों के महंत होने के बावजूद इन की जिंदगी से कितने अलिप्त और अज्ञात है, यह सोच के वह मन में ही शर्मसार हो गए. लेकिन शायद वो बावराओं के गोर या महंत थे, इसीलिए इन मुश्किलों से परे थे. ऐसी सोच में वह थे, तभी दीवार की उस ओर से रास्ते पर बजता हुआ लाउडस्पीकर उन्हें सुनाई दिया. पहले हिंदी में, फिर गुजराती में एक बंदा सरकारी फरमान सुना रहा था कि अगर गुनाहगार पकड़ा नहीं गया, तो यह बस्ती खाली करा दी जाएगी. ऐसा ही वह कह रहा था.
दीवार जहां से शुरू हो रही थी, वहां अब कुछ लोग इकट्ठा हो कर चिल्ला रहे थे. “मैं जरा उन से बात करता हूं,” महाराज नीचे उतरते हुए बोले. सुबह उन्हें जो युवती नजर आई थी, वह अब खड़ी हो कर लोगों से शांति की अपील कर रही थी. एक आदमी शराब के नशे में लग रहा था, चिल्ला रहा था, “तुम लोग मुझे घर से निकालोगे, तो मैं तुम्हें दुनिया से निकाल दूंगा.”
उस शराबी के हाथ में एक छुरा था, जो दिखा कर वह चिल्ला रहा था.महाराज को आते देख कुछ लोगों ने उसे घेर कर थोड़ा दूर कर दिया.महाराज उस युवती के पास गए. उन के पीछे आई हुई उस मकान मालकिन ने उन के बारे में उस युवती को बताया.यह सुन कर उस युवती ने महाराज को नमस्कार किया और शुद्ध गुजराती में बोली, “अच्छा हुआ, बापू आप आ गए. अब इन लोगों को संभालने की और समझाने की जरूरत है. वैसे भी पुलिस तो इन्हें मारने पर तुली है.
The post दीवार – भाग 3 : इंस्पेक्टर जड़ेजा का क्या मकसद था appeared first on Sarita Magazine.
October 17, 2021 at 10:00AM
No comments:
Post a Comment