Wednesday, 25 August 2021

जिंदगी के रंग हजार : भाग 4

वह भी मां को सांत्वना देते हुए कहती, “ईजा, तू बिलकुल भी फिक्र मत कर. इस बार मेरा सिलेक्शन पक्का है. मैं ने बहुत मेहनत की है, इसलिए तेरे घर के कामकाज में भी हाथ नहीं बंटा पाती हूं.”

फिर चहक कर वह बोली, “तू भाई की पढ़ाई का भी टेंशन मत करना. वह खुद ही बहुत समझदार है. इस बार उस का सिलेक्शन किसी अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में होना पक्का है.” कभी बाबा कहते, “मेरी बेटी नहीं, सविता. तू तो मेरा बेटा है.”

कितनी आस थी मेरे परिवार वालों को मुझ से. अगर मुझे कुछ हो गया तो वे लोग तो रोरो कर मर जाएंगे. अपने भविष्य को ले कर जो सपने सविता ने देखे थे, वे सब उस की आंखों के आगे घूमने लगे थे. उसे लग रहा था कि यह आखिरी समय की छटपटाहट है. अब जीवन में कुछ नहीं बचा है. चारों ओर कोहराम मचा था और मौत ही मौत नजर आ रही थी.

यों तो सविता काफी हिम्मती थी, लेकिन ऐसे समय में तो बड़े से बड़ा हिम्मत वाला भी घबरा ही जाता है. उसे याद आया कि उस की बूआ बारबार ग्रेजुएशन के बाद उस की शादी कर देने की बात करती. परंतु बाबा कहते, “दीदी, इतनी जल्दी क्या है, अपनी सविता खूब पढ़ेगी. अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी. फिर लड़के ही लड़के मिल जाएंगे.”

उस की मां भी यही कहती, “कमी तो लड़कियों की है आज के समय में, क्योंकि हम उन्हें पैदा होने से ही पहले मार जो देते हैं. लड़कों की कमी कहां है..?” “दीदी, आप ही सविता के लिए अच्छा सा लड़का ढूंढ़ोगी. देख लेना.”

“क्यों नहीं, क्यों नहीं. अपनी लाडो के लिए मैं ही लड़का ढूंढ कर लाऊंगी,” हल्द्वानी शहर में रहने वाली बूआ जब यह कहतीं, तो फिर सभी लोग जोर से ठहाका लगा कर हंसते. सचाई यह थी कि मातापिता भी काफी आश्वस्त हो जाते. सविता थोड़ा लजा जाती. ये सारी बातें सविता के जेहन में घूम रही थीं. उस का तो सपना था कि कोरोना का संकट थोड़ा सा कम हो जाए तो फिर किसी शहर में जा कर कुछ महीने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर के आ जाए.

सविता को अपने हाथपैरों में सुन्नता महसूस हो रही थी. कभी उसे भ्रम होता कि कहीं उस का हाथ या पैर टूट तो नहीं गया. अगर ऐसा होगा तो वह कैसे चलेगी, कैसे लिखेगी. मातापिता को जब इस दुर्घटना का पता चलेगा, तो उन का क्या हाल होगा…?

ये कई सारी बातें सोचसोच कर सविता परेशान हुए जा रही थी. उसे लगने लगा कि मां ने सुबह जो माथे पर तिलक लगाया था, वह सब भी अंधविश्वास था और शुभ यात्रा कहते हुए दही और बताशा खिलाया था, उस ने भी रक्षा नहीं की. इस बात पर उसे संदेह होने लगा था.

आसमान में फिर से बादल छाने लगे थे और सविता के दिलोदिमाग में भी विचारों के अंधेरे बादल उमड़ने लगे थे. इसी उमड़घुमड़ में उस ने सहसा किसी का हाथ अपने गाल पर महसूस किया. देखने की कोशिश की तो पाया कि यह वही लड़की थी, जो उस लड़के के साथ बस में सवार हुई थी.

यों तो सविता अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी. इसलिए उस ने इस प्रेमी युगल की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, परंतु इन्हें ले कर लोगों की खुसरफुसर वह बस में चढ़ने के बाद से ही महसूस कर रही थी. सविता ने आंखें खोलने की कोशिश की, तो उस लड़की ने बड़े ही प्यार से पूछा, “ज्यादा चोट तो नहीं लगी…? कैसा महसूस कर रही हो तुम…?”

सविता कुछ ना बोल पाई. उस की आंखों में आंसू थे. उस लड़की ने बड़े ही प्यार से उस के आंसू पोंछे और बोली, “घबराने की कोई बात नहीं है. यहां पर डाक्टर मौजूद हैं. एक गंभीर पेशेंट को देख रहे हैं. उन्हें एंबुलेंस से अस्पताल भेजते ही डाक्टर तुरंत तुम्हारे पास आएंगे. तब तक तुम खुद को संभालो. मैं तुम्हारे पास ही हूं.”उस ने सविता को पानी पिलाया और उस का सिर अपनी गोद में रख प्यार से सहलाने लगी, जैसे कोई मां या बड़ी बहन करती है.

थोड़ी ही देर में सीएससी के डाक्टर भी वहां पर आ गए. उन्होंने आला लगा कर सविता को चेक किया और देखा कि कहीं कोई ज्यादा चोट तो नहीं है. शुक्र था कि सविता को मलबे में दबने के बावजूद हलकी सी खरोंच आई थी. कोई अंदरूनी चोट नहीं थी. एहतियात के तौर पर उसे भी एंबुलेंस से अस्पताल ले जाया गया.देवदूत बना वह नवयुवक और उस की पत्नी दोनों ही अपना हनीमून अधूरा छोड़ सविता के साथ अस्पताल गए. उस के परिवार वालों को इत्तिला दी और उन्हें फिक्र ना करने को कहा.

अब सविता को दुनिया में उम्मीद की किरण फिर से नजर आने लगी थी. उस ने महसूस किया कि मां का लगाया अक्षत तिलक, दहीबताशा और बस में सवार यह प्रेमी युगल ऊपर वाले की मेहरबानी ही तो है. उसे हमेशा से बड़े भाई की चाह थी और इस बार रक्षाबंधन के मौके पर उसे एक नया भाई और भाभी मिल गए थे. मां के आशीर्वाद में बहुत ही असर होता है. यह मां का ही आशीर्वाद तो था कि इतना भयंकर एक्सीडेंट होने के बाद भी उस की जान बच गई. भले ही वह कल की परीक्षा ना दे पाए, लेकिन अपने देखे हुए सपनों को साकार करने की उम्मीद एक बार फिर से उस के मन में आकार लेने लगी थी.

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वह भी मां को सांत्वना देते हुए कहती, “ईजा, तू बिलकुल भी फिक्र मत कर. इस बार मेरा सिलेक्शन पक्का है. मैं ने बहुत मेहनत की है, इसलिए तेरे घर के कामकाज में भी हाथ नहीं बंटा पाती हूं.”

फिर चहक कर वह बोली, “तू भाई की पढ़ाई का भी टेंशन मत करना. वह खुद ही बहुत समझदार है. इस बार उस का सिलेक्शन किसी अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में होना पक्का है.” कभी बाबा कहते, “मेरी बेटी नहीं, सविता. तू तो मेरा बेटा है.”

कितनी आस थी मेरे परिवार वालों को मुझ से. अगर मुझे कुछ हो गया तो वे लोग तो रोरो कर मर जाएंगे. अपने भविष्य को ले कर जो सपने सविता ने देखे थे, वे सब उस की आंखों के आगे घूमने लगे थे. उसे लग रहा था कि यह आखिरी समय की छटपटाहट है. अब जीवन में कुछ नहीं बचा है. चारों ओर कोहराम मचा था और मौत ही मौत नजर आ रही थी.

यों तो सविता काफी हिम्मती थी, लेकिन ऐसे समय में तो बड़े से बड़ा हिम्मत वाला भी घबरा ही जाता है. उसे याद आया कि उस की बूआ बारबार ग्रेजुएशन के बाद उस की शादी कर देने की बात करती. परंतु बाबा कहते, “दीदी, इतनी जल्दी क्या है, अपनी सविता खूब पढ़ेगी. अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी. फिर लड़के ही लड़के मिल जाएंगे.”

उस की मां भी यही कहती, “कमी तो लड़कियों की है आज के समय में, क्योंकि हम उन्हें पैदा होने से ही पहले मार जो देते हैं. लड़कों की कमी कहां है..?” “दीदी, आप ही सविता के लिए अच्छा सा लड़का ढूंढ़ोगी. देख लेना.”

“क्यों नहीं, क्यों नहीं. अपनी लाडो के लिए मैं ही लड़का ढूंढ कर लाऊंगी,” हल्द्वानी शहर में रहने वाली बूआ जब यह कहतीं, तो फिर सभी लोग जोर से ठहाका लगा कर हंसते. सचाई यह थी कि मातापिता भी काफी आश्वस्त हो जाते. सविता थोड़ा लजा जाती. ये सारी बातें सविता के जेहन में घूम रही थीं. उस का तो सपना था कि कोरोना का संकट थोड़ा सा कम हो जाए तो फिर किसी शहर में जा कर कुछ महीने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर के आ जाए.

सविता को अपने हाथपैरों में सुन्नता महसूस हो रही थी. कभी उसे भ्रम होता कि कहीं उस का हाथ या पैर टूट तो नहीं गया. अगर ऐसा होगा तो वह कैसे चलेगी, कैसे लिखेगी. मातापिता को जब इस दुर्घटना का पता चलेगा, तो उन का क्या हाल होगा…?

ये कई सारी बातें सोचसोच कर सविता परेशान हुए जा रही थी. उसे लगने लगा कि मां ने सुबह जो माथे पर तिलक लगाया था, वह सब भी अंधविश्वास था और शुभ यात्रा कहते हुए दही और बताशा खिलाया था, उस ने भी रक्षा नहीं की. इस बात पर उसे संदेह होने लगा था.

आसमान में फिर से बादल छाने लगे थे और सविता के दिलोदिमाग में भी विचारों के अंधेरे बादल उमड़ने लगे थे. इसी उमड़घुमड़ में उस ने सहसा किसी का हाथ अपने गाल पर महसूस किया. देखने की कोशिश की तो पाया कि यह वही लड़की थी, जो उस लड़के के साथ बस में सवार हुई थी.

यों तो सविता अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी. इसलिए उस ने इस प्रेमी युगल की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, परंतु इन्हें ले कर लोगों की खुसरफुसर वह बस में चढ़ने के बाद से ही महसूस कर रही थी. सविता ने आंखें खोलने की कोशिश की, तो उस लड़की ने बड़े ही प्यार से पूछा, “ज्यादा चोट तो नहीं लगी…? कैसा महसूस कर रही हो तुम…?”

सविता कुछ ना बोल पाई. उस की आंखों में आंसू थे. उस लड़की ने बड़े ही प्यार से उस के आंसू पोंछे और बोली, “घबराने की कोई बात नहीं है. यहां पर डाक्टर मौजूद हैं. एक गंभीर पेशेंट को देख रहे हैं. उन्हें एंबुलेंस से अस्पताल भेजते ही डाक्टर तुरंत तुम्हारे पास आएंगे. तब तक तुम खुद को संभालो. मैं तुम्हारे पास ही हूं.”उस ने सविता को पानी पिलाया और उस का सिर अपनी गोद में रख प्यार से सहलाने लगी, जैसे कोई मां या बड़ी बहन करती है.

थोड़ी ही देर में सीएससी के डाक्टर भी वहां पर आ गए. उन्होंने आला लगा कर सविता को चेक किया और देखा कि कहीं कोई ज्यादा चोट तो नहीं है. शुक्र था कि सविता को मलबे में दबने के बावजूद हलकी सी खरोंच आई थी. कोई अंदरूनी चोट नहीं थी. एहतियात के तौर पर उसे भी एंबुलेंस से अस्पताल ले जाया गया.देवदूत बना वह नवयुवक और उस की पत्नी दोनों ही अपना हनीमून अधूरा छोड़ सविता के साथ अस्पताल गए. उस के परिवार वालों को इत्तिला दी और उन्हें फिक्र ना करने को कहा.

अब सविता को दुनिया में उम्मीद की किरण फिर से नजर आने लगी थी. उस ने महसूस किया कि मां का लगाया अक्षत तिलक, दहीबताशा और बस में सवार यह प्रेमी युगल ऊपर वाले की मेहरबानी ही तो है. उसे हमेशा से बड़े भाई की चाह थी और इस बार रक्षाबंधन के मौके पर उसे एक नया भाई और भाभी मिल गए थे. मां के आशीर्वाद में बहुत ही असर होता है. यह मां का ही आशीर्वाद तो था कि इतना भयंकर एक्सीडेंट होने के बाद भी उस की जान बच गई. भले ही वह कल की परीक्षा ना दे पाए, लेकिन अपने देखे हुए सपनों को साकार करने की उम्मीद एक बार फिर से उस के मन में आकार लेने लगी थी.

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August 20, 2021 at 10:00AM

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