पंचम के पापा ने कल्याणी की बातों को हवा में उड़ा दिया. उन्होंने भी आसान रास्ता अपनाया है. ऐसी स्थिति में बड़बड़ाते हुए वे घर से बाहर चले जाते हैं. रात का समय था. इस तानाकशी से बचने के लिए बाहर भी नहीं जा सकते थे. बिस्तर पर पड़ी पंचम उन की बातों का आनंद लेते मन ही मन में बड़बड़ा रही थी, ‘कोट की बात करती हो मां, नाप तो अपना ही दिया था. कपड़ा, रंग और स्टाइल भी खुद ही चुना था. सब से कहती हैं पंचम के लिए बनवाया है.’ यही सोचतेसोचते उस की आंख लग गई. सुबह होते ही हितेश साहब का टैलीफोन आया. आज रियाज नहीं होगा. आज पंचम को सुकून था. उस का मन शांत था. कितना हलकापन था दिल पर. वह खुश थी.
अपने तथा अरमान के लिए वह यह मनाती कि प्रकृति कुछ ऐसा हो जाए कि मंच से छुट्टी मिल जाए. एक इतवार की छुट्टी है तो क्या? सप्ताह के सभी दिनों से जल्दी आ टपकता है यह इतवार. शनिवार की रात होते ही वह तिलतिल मरने लगती थी. घर के सभी सदस्य चैन से सोए थे. मां खुश थीं. इतवार की तैयारी में लगी थीं. चुपके से मां ने पंचम के सिरहाने घड़ी रख दी. उस ने जरा सी आंख खोली, और सोचने लगी, फिर सुबह 4 बजे उठना पड़ेगा. हितेश साहब के घर जाने से पहले रियाज भी करना था. वह उलझन में थी क्योंकि कुछ दिन से मां मुझ पर बहुत स्नेह उड़ेल रही थीं. हितेश साहब ने मेरे साथ मां को भी बुलाया है. शायद किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर करने होंगे. मां खुश तो ऐसे थीं जैसे स्वयं ही पार्श्व गायिका बन गई हों.
सुबह नाश्ते के बाद पंचम और कल्याणी हितेश साहब के घर पहुंचे. वही हुआ जिस का संदेह था. अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाने के बाद हितेश साहब बोले, ‘सगाई का उत्सव है. गीत प्रेमभाव से गाना. तगड़ी आसामी है. बलैया भी खूब लेंगे. शायद अगला कौन्ट्रैक्ट भी मिल जाए. नोट लुटाएंगे.’ पंचम हितेश साहब की ओर देखती रही, जिन के बच्चे पंचम से उम्र में कहीं बड़े हैं. वह खूंटे से बंधी रंभाती गाय थी जो खूंटे को तोड़ कर भागना चाहती थी. रियाज के बाद कल्याणीजी मुसकराती हुई बोलीं, ‘चलो पंचम, मुंबई जाने की तैयारी भी करनी है.’
‘मुंबई, कब?’ पंचम ने विस्मय और कुतूहल से पूछा.
घर पहुंचते ही कल्याणीजी तैयारियों में जुट गईं. पापा सिर्फ रेलवे स्टेशन तक ही छोड़ने गए. सगाई के उत्सव में जानेमाने लोगों के साथसाथ संगीत जगत की जानीमानी हस्तियां भी पधारीं. कल्याणी मन ही मन सोचती रही कि किसी संगीत डायरैक्टर की नजर पंचम की आवाज पर पड़ जाए तो लौटरी निकल जाएगी. बधाई के गीतों के बाद फरमाइशी गीतों का दौर चला. कुछ सभ्य और कुछ असभ्य. कुछ शील, कुछ अश्लील. सुबह के 5 बज गए. अतिथियों के बीच बिजनैस कार्डों का आदानप्रदान तथा बातचीत का सिलसिला चलता रहा. व्यापार जो ठहरा. कल्याणी बड़ेबड़े लोगों से मिल कर खुशी के साथ उन्हीं के स्तर पर झूमने लगीं. ‘वाह खूब गाया हितेश साहब, क्या खोज है आप की? कहां से ढूंढ़ी यह लाजबाव बाला?’
‘हमारे यहां भी कभी दर्शन दीजिएगा,’ दूसरे महाशय ने बड़े मसखरे लहजे में कहा.
‘क्यों नहीं, जनाब, आप बुलाएं और हम न आएं. आवाज तो दे कर देखिए,’ हितेश साहब ने उल्लास से कहा.
‘हां, इस फुलझड़ी को लाना मत भूलिएगा.’
पंचम दूर खड़ी यह सब देख और सुन रही थी. ‘नमस्ते कल्याणीजी, हार्दिक बधाई हो. क्या गला पाया है आप की बेटी ने. क्या कोमल गंधार लगाए. वाह, ऐसे ही गाती रही तो एक दिन बहुत ऊंचाइयों तक पहुंचेगी,’ एक भद्र महिला इतना कह कर चली गई. कल्याणीजी को आसमान करीब दिखने लगा. सामने खड़ी 3 महिलाओं के झुंड में से एक बोली, ‘लानत है ऐसी मां पर, बेटी है उस की? कैसे गवा रही है कोठेवालियों की तरह. इतनी सुंदर लड़की है, ऐसे ही गाती रही तो बस मंच के लिए ही रह जाएगी.’
दूसरी बोली, ‘उम्र की छोटी है तो क्या? देखो न गला कितना सुरीला और सधा है.’ दूसरी ओर पुरुषों की टोली में से एक सज्जन बोले, ‘देखो तो सही, बूढ़ा कहां से ले आया फुलझड़ी को. इस का तो जैकपौट ही निकल आया है. मैं तो उस से कहने वाला हूं, जब जी भर जाए तो इधर भेज देना,’ उस ने लचीली मुसकराहट से कहा. दूर खड़ी पंचम पर ऐसी बातें हथौड़े सी बौछार कर रही थीं. उस ने सोच लिया था, ऐसी बकवास, घटिया सोच अब और नहीं बरदाश्त कर सकती. दूसरे दिन दिल्ली की वापसी थी. कल्याणी भी बहुत खुश थीं. बेटी अच्छा कमाने लगी थी. घर पहुंचते ही दूसरे दिन उसे अरमान से मिलना था. आज अरमान का चेहरा बहुत उतरा था. उल्लास जाने कहां गुम हो गया था. वह बेसुध अपना सिर घुटनों पर टिकाए, जमीन को कुरेद रहा था. उसे पंचम के आने का एहसास तक न हुआ. पंचम ने स्नेह से उसे छू कर अपनी उपस्थिति का एहसास दिलाया.
‘पंचम, तुम!’ वह चौंक कर बोला. अरमान के भीतर की पीड़ा की प्रतिच्छाया उस की आंखों में झलक रही थी. स्थिति की नजाकत को देखते वह कुछ क्षण चुप रही. कुछ देर बाद उस ने गहरी सांस ले कर मुंबई के उत्सव का प्रसंग छेड़ा. अरमान की नजरें न उठीं. वह जमीन कुरेदता रहा. मिट्टी पर गिरते आंसू देख पंचम का मन रेशारेशा हो गया. पंचम के आग्रह करने पर वह प्यार से उदासीन स्वर से बोला, ‘पंचम, मेरी पंचू, तुम्हें दोष नहीं देता, मुझे ही मांबाप को समझाना नहीं आया. इतना बेबस, लाचार मैं ने स्वयं को कभी नहीं पाया. तुम चिंता मत करो. प्रेम करता हूं तुम्हें, तुम तो मेरे खून में बसी हो. तुम्हारी तो कल्पनामात्र से ही अभिभूत हो जाता हूं. अकसर भावनाओं को काबू में रखने के लिए अपनेआप से लड़ता हूं. पलपल, क्षणक्षण तुम्हें प्रेम करता हूं चाहे ठिठुरा देने वाली निष्ठुर सर्दी हो या गरमी की तेज ऊष्मा. जब तुम से मिलता हूं तो मेरी खुशी का ओरछोर नहीं दिखता. मैं दमकने लगता हूं. खुशी से उड़ताउड़ता बादलों तक पहुंच जाता हूं. मांबाप के तीखे बाणों की बौछार तनमन को घायल करती है, तब कल्पना से यथार्थ में आ जाता हूं. थक गया हूं पैरवी करतेकरते. बाऊजी डाक्टरी छुड़ाने की धमकी देते हैं. मैं जानता हूं, गरीबी में डाक्टरी पढ़ाना कितना कठिन है. और बहनभाई भी तो हैं. मेरी मां सुबहशाम एक ही राग अलापती रहती हैं-इक बूटा लाया सी, सोचया सी, छांवे बैठांगे, पुतर तां कंजरी दिल दे बैठा. घर आ के और ऐसे घर नूं बी कंजरखाना बना देवेगी.
‘इंतजार है डाक्टर बनने का. बस, एक बार डाक्टर बन जाऊं. सब ठीक हो जाएगा. डाक्टर तो हर हाल में बनना है. कैसे तोड़ दूं बाऊजी के बचपन का सपना? जो वे पिछले 45 वर्षों से देखते आए हैं. बाऊजी की कुर्बानियों के ऋण में दबा हूं.’
दोनों एकदूसरे की विवशता पर रोते रहे. पंचम स्वयं को संभालती बोली, ‘अरमान, हम दोनों एकदूसरे के पलपल, क्षणक्षण के खाते के एकएक पन्ने के विराम, अर्द्धविराम, चंद्रबिंदु तथा पंक्ति से वाकिफ हैं, हमारा तो सबकुछ सांझा है. कैसे बताऊं तुम्हें अरमान? तिलतिल मरती हूं जब हर इतवार को हितेश साहब के यहां रियाज के लिए जाना पड़ता है. मन में ऐसा ज्वालामुखी उठता है, लगता है मानो क्षण में भस्म हो जाऊंगी. तुम तो समझते हो कैसे तोड़ दूं अपनी मां का सपना एक पार्श्वगायिका बनने का? जो वे बचपन से संजोती आई हैं. तुम तो जानते हो, मेरी मां के सामने पापा भी आवाज नहीं उठा सकते. मैं चुपचाप भावनाओं, इच्छाओं का आंसुओं से दमन कर देती हूं.’
कुछ देर के लिए दोनों में मौन संवाद चलता रहा.
‘पंचम, अंधेरा होने लगा है. मैं नहीं चाहता तुम अंधेरे में अकेली घर जाओ. चलते हैं,’ अरमान ने मौन को भंग करते हुए कहा. दोनों अपनेअपने कंधों पर एकदूसरे के आंसुओं का बोझ लिए भारी कदमों से घर की ओर चल दिए. निरंतर पंचम को एक ही प्रश्न कोचता रहा. आज ऐसा क्या हो गया है? पहले तो जब वह अरमान से मिल कर आती थी तो खुद को चांद के चारों ओर घूमती चांदनी महसूस करती थी. एकांत में सदा वह साथ होता था. अरमान उसे देख कर जब प्रेम की बातें करता तो वह आलोक के गंध में घिरती चली जाती जिस का पूरा वजूद पगली, मनचली पवन में बदल जाता. पांव धरती से बेदखल होन लगते और ब्रह्मांड में उड़ने लगती. इतना बेबस तो उस ने खुद को कभी नहीं पाया. आज की रात बहुत भारी थी. पंचम के मस्तिष्क का द्वंद्व बढ़ता जा रहा था.
आज पंचम का मन विद्रोह कर बैठा था. आज उस ने इन बंधनों को तोड़ कर स्वयं मुक्त होने का निर्णय लिया. कितनी बार सोचा, काश, वह किसी और की बेटी होती? कई बार सोचा, घर छोड़ दूं. संबंध कभी टूट पाते हैं क्या? कैसी शक्तिशाली प्रवृत्ति होती है मानव की. जैसी भी हो, मानव उस में जी लेता है. जीवनरूपी रेल चलती रहती है. उस ने ठान लिया था, अगर आज कुछ नहीं कर पाई तो कभी नहीं कर पाएगी. घर पहुंचते ही वह अपने कमरे का दरवाजा बंद कर खुद को कोसने लगी, ‘अपना दर्द तो जैसेतैसे सह लेती हूं पर अरमान का दर्द नहीं सहा जाता. आज मैं किस मोड़ पर खड़ी हूं. मेरे जिस मधुर गले को मेरी खूबी समझा जाता है आज वही मेरे लिए मुसीबत बन गया है. मैं इस अनमोल धरोहर को संभाल नहीं पाऊंगी.’ पंचम अपने तानपूरे से लिपट कर खूब रोई. रोतेरोते उस ने तानपूरे के तारों को तोड़ डाला. आज पंचम के अंदर की पीड़ा की प्रतिच्छाया उस की आंखों में थरथराने लगी. उस के स्वर में घिरता हुआ शाम का अंधेरा उतर आया. पर्स में रखा पान मुंह में डाल हाथ जोड़ कर बोली, ‘माफ करना मां, आप का सपना पूरा न कर पाई और हमेशा के लिए मैं गीतसंगीत की दुनिया को अलविदा कह रही हूं.’
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पंचम के पापा ने कल्याणी की बातों को हवा में उड़ा दिया. उन्होंने भी आसान रास्ता अपनाया है. ऐसी स्थिति में बड़बड़ाते हुए वे घर से बाहर चले जाते हैं. रात का समय था. इस तानाकशी से बचने के लिए बाहर भी नहीं जा सकते थे. बिस्तर पर पड़ी पंचम उन की बातों का आनंद लेते मन ही मन में बड़बड़ा रही थी, ‘कोट की बात करती हो मां, नाप तो अपना ही दिया था. कपड़ा, रंग और स्टाइल भी खुद ही चुना था. सब से कहती हैं पंचम के लिए बनवाया है.’ यही सोचतेसोचते उस की आंख लग गई. सुबह होते ही हितेश साहब का टैलीफोन आया. आज रियाज नहीं होगा. आज पंचम को सुकून था. उस का मन शांत था. कितना हलकापन था दिल पर. वह खुश थी.
अपने तथा अरमान के लिए वह यह मनाती कि प्रकृति कुछ ऐसा हो जाए कि मंच से छुट्टी मिल जाए. एक इतवार की छुट्टी है तो क्या? सप्ताह के सभी दिनों से जल्दी आ टपकता है यह इतवार. शनिवार की रात होते ही वह तिलतिल मरने लगती थी. घर के सभी सदस्य चैन से सोए थे. मां खुश थीं. इतवार की तैयारी में लगी थीं. चुपके से मां ने पंचम के सिरहाने घड़ी रख दी. उस ने जरा सी आंख खोली, और सोचने लगी, फिर सुबह 4 बजे उठना पड़ेगा. हितेश साहब के घर जाने से पहले रियाज भी करना था. वह उलझन में थी क्योंकि कुछ दिन से मां मुझ पर बहुत स्नेह उड़ेल रही थीं. हितेश साहब ने मेरे साथ मां को भी बुलाया है. शायद किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर करने होंगे. मां खुश तो ऐसे थीं जैसे स्वयं ही पार्श्व गायिका बन गई हों.
सुबह नाश्ते के बाद पंचम और कल्याणी हितेश साहब के घर पहुंचे. वही हुआ जिस का संदेह था. अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाने के बाद हितेश साहब बोले, ‘सगाई का उत्सव है. गीत प्रेमभाव से गाना. तगड़ी आसामी है. बलैया भी खूब लेंगे. शायद अगला कौन्ट्रैक्ट भी मिल जाए. नोट लुटाएंगे.’ पंचम हितेश साहब की ओर देखती रही, जिन के बच्चे पंचम से उम्र में कहीं बड़े हैं. वह खूंटे से बंधी रंभाती गाय थी जो खूंटे को तोड़ कर भागना चाहती थी. रियाज के बाद कल्याणीजी मुसकराती हुई बोलीं, ‘चलो पंचम, मुंबई जाने की तैयारी भी करनी है.’
‘मुंबई, कब?’ पंचम ने विस्मय और कुतूहल से पूछा.
घर पहुंचते ही कल्याणीजी तैयारियों में जुट गईं. पापा सिर्फ रेलवे स्टेशन तक ही छोड़ने गए. सगाई के उत्सव में जानेमाने लोगों के साथसाथ संगीत जगत की जानीमानी हस्तियां भी पधारीं. कल्याणी मन ही मन सोचती रही कि किसी संगीत डायरैक्टर की नजर पंचम की आवाज पर पड़ जाए तो लौटरी निकल जाएगी. बधाई के गीतों के बाद फरमाइशी गीतों का दौर चला. कुछ सभ्य और कुछ असभ्य. कुछ शील, कुछ अश्लील. सुबह के 5 बज गए. अतिथियों के बीच बिजनैस कार्डों का आदानप्रदान तथा बातचीत का सिलसिला चलता रहा. व्यापार जो ठहरा. कल्याणी बड़ेबड़े लोगों से मिल कर खुशी के साथ उन्हीं के स्तर पर झूमने लगीं. ‘वाह खूब गाया हितेश साहब, क्या खोज है आप की? कहां से ढूंढ़ी यह लाजबाव बाला?’
‘हमारे यहां भी कभी दर्शन दीजिएगा,’ दूसरे महाशय ने बड़े मसखरे लहजे में कहा.
‘क्यों नहीं, जनाब, आप बुलाएं और हम न आएं. आवाज तो दे कर देखिए,’ हितेश साहब ने उल्लास से कहा.
‘हां, इस फुलझड़ी को लाना मत भूलिएगा.’
पंचम दूर खड़ी यह सब देख और सुन रही थी. ‘नमस्ते कल्याणीजी, हार्दिक बधाई हो. क्या गला पाया है आप की बेटी ने. क्या कोमल गंधार लगाए. वाह, ऐसे ही गाती रही तो एक दिन बहुत ऊंचाइयों तक पहुंचेगी,’ एक भद्र महिला इतना कह कर चली गई. कल्याणीजी को आसमान करीब दिखने लगा. सामने खड़ी 3 महिलाओं के झुंड में से एक बोली, ‘लानत है ऐसी मां पर, बेटी है उस की? कैसे गवा रही है कोठेवालियों की तरह. इतनी सुंदर लड़की है, ऐसे ही गाती रही तो बस मंच के लिए ही रह जाएगी.’
दूसरी बोली, ‘उम्र की छोटी है तो क्या? देखो न गला कितना सुरीला और सधा है.’ दूसरी ओर पुरुषों की टोली में से एक सज्जन बोले, ‘देखो तो सही, बूढ़ा कहां से ले आया फुलझड़ी को. इस का तो जैकपौट ही निकल आया है. मैं तो उस से कहने वाला हूं, जब जी भर जाए तो इधर भेज देना,’ उस ने लचीली मुसकराहट से कहा. दूर खड़ी पंचम पर ऐसी बातें हथौड़े सी बौछार कर रही थीं. उस ने सोच लिया था, ऐसी बकवास, घटिया सोच अब और नहीं बरदाश्त कर सकती. दूसरे दिन दिल्ली की वापसी थी. कल्याणी भी बहुत खुश थीं. बेटी अच्छा कमाने लगी थी. घर पहुंचते ही दूसरे दिन उसे अरमान से मिलना था. आज अरमान का चेहरा बहुत उतरा था. उल्लास जाने कहां गुम हो गया था. वह बेसुध अपना सिर घुटनों पर टिकाए, जमीन को कुरेद रहा था. उसे पंचम के आने का एहसास तक न हुआ. पंचम ने स्नेह से उसे छू कर अपनी उपस्थिति का एहसास दिलाया.
‘पंचम, तुम!’ वह चौंक कर बोला. अरमान के भीतर की पीड़ा की प्रतिच्छाया उस की आंखों में झलक रही थी. स्थिति की नजाकत को देखते वह कुछ क्षण चुप रही. कुछ देर बाद उस ने गहरी सांस ले कर मुंबई के उत्सव का प्रसंग छेड़ा. अरमान की नजरें न उठीं. वह जमीन कुरेदता रहा. मिट्टी पर गिरते आंसू देख पंचम का मन रेशारेशा हो गया. पंचम के आग्रह करने पर वह प्यार से उदासीन स्वर से बोला, ‘पंचम, मेरी पंचू, तुम्हें दोष नहीं देता, मुझे ही मांबाप को समझाना नहीं आया. इतना बेबस, लाचार मैं ने स्वयं को कभी नहीं पाया. तुम चिंता मत करो. प्रेम करता हूं तुम्हें, तुम तो मेरे खून में बसी हो. तुम्हारी तो कल्पनामात्र से ही अभिभूत हो जाता हूं. अकसर भावनाओं को काबू में रखने के लिए अपनेआप से लड़ता हूं. पलपल, क्षणक्षण तुम्हें प्रेम करता हूं चाहे ठिठुरा देने वाली निष्ठुर सर्दी हो या गरमी की तेज ऊष्मा. जब तुम से मिलता हूं तो मेरी खुशी का ओरछोर नहीं दिखता. मैं दमकने लगता हूं. खुशी से उड़ताउड़ता बादलों तक पहुंच जाता हूं. मांबाप के तीखे बाणों की बौछार तनमन को घायल करती है, तब कल्पना से यथार्थ में आ जाता हूं. थक गया हूं पैरवी करतेकरते. बाऊजी डाक्टरी छुड़ाने की धमकी देते हैं. मैं जानता हूं, गरीबी में डाक्टरी पढ़ाना कितना कठिन है. और बहनभाई भी तो हैं. मेरी मां सुबहशाम एक ही राग अलापती रहती हैं-इक बूटा लाया सी, सोचया सी, छांवे बैठांगे, पुतर तां कंजरी दिल दे बैठा. घर आ के और ऐसे घर नूं बी कंजरखाना बना देवेगी.
‘इंतजार है डाक्टर बनने का. बस, एक बार डाक्टर बन जाऊं. सब ठीक हो जाएगा. डाक्टर तो हर हाल में बनना है. कैसे तोड़ दूं बाऊजी के बचपन का सपना? जो वे पिछले 45 वर्षों से देखते आए हैं. बाऊजी की कुर्बानियों के ऋण में दबा हूं.’
दोनों एकदूसरे की विवशता पर रोते रहे. पंचम स्वयं को संभालती बोली, ‘अरमान, हम दोनों एकदूसरे के पलपल, क्षणक्षण के खाते के एकएक पन्ने के विराम, अर्द्धविराम, चंद्रबिंदु तथा पंक्ति से वाकिफ हैं, हमारा तो सबकुछ सांझा है. कैसे बताऊं तुम्हें अरमान? तिलतिल मरती हूं जब हर इतवार को हितेश साहब के यहां रियाज के लिए जाना पड़ता है. मन में ऐसा ज्वालामुखी उठता है, लगता है मानो क्षण में भस्म हो जाऊंगी. तुम तो समझते हो कैसे तोड़ दूं अपनी मां का सपना एक पार्श्वगायिका बनने का? जो वे बचपन से संजोती आई हैं. तुम तो जानते हो, मेरी मां के सामने पापा भी आवाज नहीं उठा सकते. मैं चुपचाप भावनाओं, इच्छाओं का आंसुओं से दमन कर देती हूं.’
कुछ देर के लिए दोनों में मौन संवाद चलता रहा.
‘पंचम, अंधेरा होने लगा है. मैं नहीं चाहता तुम अंधेरे में अकेली घर जाओ. चलते हैं,’ अरमान ने मौन को भंग करते हुए कहा. दोनों अपनेअपने कंधों पर एकदूसरे के आंसुओं का बोझ लिए भारी कदमों से घर की ओर चल दिए. निरंतर पंचम को एक ही प्रश्न कोचता रहा. आज ऐसा क्या हो गया है? पहले तो जब वह अरमान से मिल कर आती थी तो खुद को चांद के चारों ओर घूमती चांदनी महसूस करती थी. एकांत में सदा वह साथ होता था. अरमान उसे देख कर जब प्रेम की बातें करता तो वह आलोक के गंध में घिरती चली जाती जिस का पूरा वजूद पगली, मनचली पवन में बदल जाता. पांव धरती से बेदखल होन लगते और ब्रह्मांड में उड़ने लगती. इतना बेबस तो उस ने खुद को कभी नहीं पाया. आज की रात बहुत भारी थी. पंचम के मस्तिष्क का द्वंद्व बढ़ता जा रहा था.
आज पंचम का मन विद्रोह कर बैठा था. आज उस ने इन बंधनों को तोड़ कर स्वयं मुक्त होने का निर्णय लिया. कितनी बार सोचा, काश, वह किसी और की बेटी होती? कई बार सोचा, घर छोड़ दूं. संबंध कभी टूट पाते हैं क्या? कैसी शक्तिशाली प्रवृत्ति होती है मानव की. जैसी भी हो, मानव उस में जी लेता है. जीवनरूपी रेल चलती रहती है. उस ने ठान लिया था, अगर आज कुछ नहीं कर पाई तो कभी नहीं कर पाएगी. घर पहुंचते ही वह अपने कमरे का दरवाजा बंद कर खुद को कोसने लगी, ‘अपना दर्द तो जैसेतैसे सह लेती हूं पर अरमान का दर्द नहीं सहा जाता. आज मैं किस मोड़ पर खड़ी हूं. मेरे जिस मधुर गले को मेरी खूबी समझा जाता है आज वही मेरे लिए मुसीबत बन गया है. मैं इस अनमोल धरोहर को संभाल नहीं पाऊंगी.’ पंचम अपने तानपूरे से लिपट कर खूब रोई. रोतेरोते उस ने तानपूरे के तारों को तोड़ डाला. आज पंचम के अंदर की पीड़ा की प्रतिच्छाया उस की आंखों में थरथराने लगी. उस के स्वर में घिरता हुआ शाम का अंधेरा उतर आया. पर्स में रखा पान मुंह में डाल हाथ जोड़ कर बोली, ‘माफ करना मां, आप का सपना पूरा न कर पाई और हमेशा के लिए मैं गीतसंगीत की दुनिया को अलविदा कह रही हूं.’
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February 04, 2021 at 10:00AM
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