उस की दुखभरी गाथा सुन कर सरिता और विनय की पलकें भीग गईं. बहुत सोच कर सरिता ने पति से कहा, ‘‘क्यों न हम मिनी को अपने साथ ले चलें. हमारा भी तो वहां कोई नहीं है. एक बेटा है जो परिवार सहित दूसरे देश में बस गया है. शायद नियति ने हमें इसी कार्य के लिए यहां भेजा हो.’’ जवाब में विनय कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, ‘‘पूछ लो इस लड़की से हमारे साथ चलती है तो चले. इसे भी आसरा मिल जाएगा और हमें भी इस का सहारा.’’
विनय का इतना कहना था कि वह व्यक्ति उन के पैरों से लिपट गया, ‘‘ले जाइए, बाबूजी, बड़ी अच्छी लड़की है. आप दोनों की बड़ी सेवा करेगी. जायदाद बेच कर इस का हिस्सा मैं आप को भेज दूंगा. कहीं कोई सुपात्र मिले, तो इस का ब्याह कर दीजिएगा.’’
‘‘नहींनहीं, कुछ भेजने की आवश्यकता नहीं है. हमारे पास सभी कुछ है. हम इसे ही ले जा कर खुश हो लेंगे.’’ अपने घर का पता और उस व्यक्ति का पता लेते हुए सरिता और विनय लौट आए.
उन के घर पहुंचते ही वसुंधरा अपार्टमैंट में हलचल सी मच गई.
मिनी के लिए सभी की आंखों में उभर आए प्रश्नों को देख कर सरिता खुद को रोक न सकीं, बोलीं, ‘‘हम मथुरा से मिनी को लाए हैं प्यारी सी बेटी के रूप में.’’
कुछ न कहने पर भी सभी समझ ही गए. सब ने मिनी को प्यार से क्या निहारा, कि उसी पल से वह उन की चहेती बन गई.
अब मिनी को समय कहां था कि अपने गुजरे समय को याद कर के आंसू बहाए. पूरी बिल्डिंग की वह दुलारी बन गई थी. किसी की बेटी, तो किसी की ननद. बड़ों की बहन तो छोटों की दीदी. किसी के घर मिनी पकौड़े बना रही है तो कहीं भाजी. किसी का बटन टांक रही है तो किसी के बच्चे को थामे घूम रही है.
हर उम्र की दहलीज पर मिनी ने अपने निस्वार्थ प्रेम का मायाजाल फैला रखा था. जिसे देखो वह मिनी को पुकारे जा रहा था. बच्चों की तो जान उस में बसती थी.
शाम होते ही सभी बच्चे उसे छत पर ले जाते. वहां कभी वह बौलिंग कर रही होती तो कभी अपांयर बन कर फैसला दे रही होती. मजाल कि कोई उस की अवमानना कर जाए. नियति की कैसी माया थी कि किसी घर की दुत्कारी, कहीं और की दुलारी बन गई थी. कल तक जिस का कोई नहीं था, आज इतने सारे उस के अपने थे.
उषा ने सरिता की सहमति से सब से प्रसिद्ध ब्यूटीपार्लर काया में मिनी को काम सीखने के लिए भेजा. मात्र 4 महीने में ही वह इतनी काबिल हो गई कि एक जानेमाने ब्यूटीपार्लर वालों ने उसे अपने यहां काम पर रख लेना चाहा. पर सरिता ने मना कर दिया यह कहते हुए कि हुनर सीख लिया, यही बहुत है. कमी क्या है कि मिनी पार्लर में नौकरी करेगी.
उस दिन मिनी सरिता के पैरों पर सिर रख कर बोली, ‘‘अम्मा, अगर उस दिन आप नहीं मिली होतीं तो कह नहीं सकती कि मेरा क्या हाल हुआ होता. या तो मैं मर गई होती या मेरे शरीर को नोच रहे होते लोग,’’ कहते हुए मिनी बहुत दिनों के बाद फूटफूट रो पड़ी.
उस के सिर को सहलाते हुए सरिता ने बड़े लाड़दुलार से कहा, ‘‘अरे, कैसे नहीं मिलती मैं. तुझे लाने के लिए ही तो जैसे मैं वहां गई थी. नहीं जाती तो इतना प्यार करने वाली बेटी कहां से मिलती मुझे. यहां तो तू ही हमारे लिए सबकुछ है.’’
सरिता के हृदय परिवर्तन पर पूरी बिल्ंिडग हैरान थी और खुश थी. प्यार के इस लहराते समंदर को इतने दिनों तक पता नहीं उन्होंने कहां छिपा कर रखा था. इधर मिनी के ब्यूटीपार्लर के अनुभव से बिल्ंिडग की सारी महिलाएं लाभान्वित हो रही थीं. किसी की भौंहें बन रही हैं तो किसी की गरदन की मसाज हो रही है. किसी के बाल स्टैप्स में काटे जा रहे हैं तो कोई फेशियल करवा रहा था, वह भी मुफ्त. किसी ने देने की जबरदस्ती की तो मिनी की आंखें छलक उठीं. अब भला किस की शामत आईर् थी कि मिनी की आंखों में आंसू छलका सके. इस बात से सरिता भी नाराज हो गईं.
प्यार से सने बोल में वे गर्जना कर उठीं, ‘‘मिनी मेरी ही नहीं, आप सभी की बहनबेटी है. क्यों उसे पैसे दे रही हैं. ऐसा कर आप सभी ने उसे अपने से दूर कर दिया है. हुनर सीखा भी इसलिए है कि आप सभी को सजाधजा सके.’’
‘‘नहींनहीं सरिता, इस से मिनी कोई दूसरी थोड़े हो जाएगी. हम सब उसे पुरस्कृत करना चाहते थे. माफ कीजिएगा, अगर बुरा लगा हो तो.’’ उषा की बातों से सरिता के होंठों पर मुसकान छिटक आई. कभीकभी मिनी अपने सारे तजरबे को सरिताजी पर ही आजमा लिया करती थी. वे दिल से तो प्रसन्न होती थीं, पर बाहर से गुस्सा दिखाती थीं.
दिन खुशी से गुजर रहे थे. इतना प्यार और सम्मान पा कर मिनी खिल गई थी. सुंदर तो थी ही. मिनी को आए 2 साल हो चुके थे. सरिता और विनय के साथ पूरी बिल्डिंग की अब यही इच्छा थी कि मिनी का ब्याह किसी सुपात्र से हो जाए.
यह भी संयोग रहा कि नीतू की भाभी की मृत्यु प्रसव के दौरान हो गई. नवजात बच्चे के साथ उस की मां बड़ी परेशान थीं. उस की मां की यही इच्छा थी कि उस के भाई की शादी जल्द से जल्द हो जाए ताकि इस उम्र में बच्चे की देखभाल करने से छुटकारा मिले.
नीतू के जेहन में अचानक मिनी का भोलाभाला रूप नाच उठा. मिनी से बढ़ कर कोई उस के भाई के बच्चे को प्यार नहीं दे सकेगा. तत्काल वह उषा के पास गई और सारी बातें उन्हें बताते हुए राय मांगी. उषा भी सहमत हो गईं. सरिता को मनाने के लिए दोनों उन के पास पहुंचीं.
सारी बातों को सुन कर सरिता ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि पहले की बात और थी. शादी होते ही एक बच्चे की देखभाल करने की जिम्मेदारी मिनी के नाजुक कंधे पर आ जाए, इस में मेरी जरा सी भी रजामंदी नहीं है. जब मैं ही तैयार नहीं, तो उस के बाबूजी और भैया कभी राजी नहीं होंगे. उसी दिन समीर कह रहा था, ‘‘लेनदेन की चिंता मत करना. बस, ऐसा घर ढूंढ़ना जहां मिनी सुखी रहे.’’
उषा ने दुनियादारी की बताते हुए कहा, ‘‘मिनी के प्यार में आप इस सचाई को भूल चुकी हैं कि मिनी अनाथ और विधवा है. उस के लिए नीतू के भाई से अच्छा रिश्ता शायद ही मिले.’’ कहते हुए वे दोनों बुझे मन से लौट गईं.
परंतु दूसरे दिन ही सरिताजी ने इस रिश्ते की स्वीकृति पर अपनी रजामंदी की मुहर लगा दी, क्योंकि उषा की बातों ने उन की आंखें खोल दी थीं. फिर मिनी को भी कोई एतराज नहीं था सिवा इस के कि उस के जाने के बाद उन दोनों की देखभाल उस की तरह कौन करेगा.
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मिनी की शादी की धूम पूरी बिल्डिंग में मची हुईर् थी. तैयारियां जोरों पर थीं. आखिर सब की चहेती मिनी की शादी थी. सरिता ने मिनी की ससुराल में भी शादी का निमंत्रणपत्र भेज दिया था. पर अच्छा ही हुआ कि वहां से कोई नहीं आया. वे नहीं चाहती थीं कि बीते दिनों की दुखद यादों को ले कर मिनी के नए जीवन की शुरुआत हो.
बच्चे, युवा, बूढ़े सभी उत्साहित थे. बरात आई, शहनाइयां बजीं, आंसूभरी आंखों से सरिता और विनय ने सारे रस्मरिवाजों को निभाया. सभी ने जी खोल कर मिनी को उपहार दिए. समीर ने अपने मम्मीपापा के साथ मिनी, उस के होने वाले पति और बच्चे को गरमी में अमेरिका घूमने के लिए बुलाया. बस, पासपोर्ट और वीजा के मिलते ही टिकट भेज देने का आश्वासन दिया था.
जितना मिला, उस के लिए मिनी का आंचल छोटा पड़ गया था. उस की आंखें विदाई तक बरसती ही रहीं. सब के प्यारदुलार को समेट, सब को रुलाते हुए मिनी अपने जीवनसाभी की बांहें थाम नए जीवन की डगर की ओर चल पड़ी. उस की विदाई पर सभी बिलख रहे थे पर खुशी के आंसुओं के साथ. अपने पीछे मिनी पूरी बिल्ंिडग में एक सन्नाटा और उदासी छोड़ गई थी.
उस की दुखभरी गाथा सुन कर सरिता और विनय की पलकें भीग गईं. बहुत सोच कर सरिता ने पति से कहा, ‘‘क्यों न हम मिनी को अपने साथ ले चलें. हमारा भी तो वहां कोई नहीं है. एक बेटा है जो परिवार सहित दूसरे देश में बस गया है. शायद नियति ने हमें इसी कार्य के लिए यहां भेजा हो.’’ जवाब में विनय कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, ‘‘पूछ लो इस लड़की से हमारे साथ चलती है तो चले. इसे भी आसरा मिल जाएगा और हमें भी इस का सहारा.’’
विनय का इतना कहना था कि वह व्यक्ति उन के पैरों से लिपट गया, ‘‘ले जाइए, बाबूजी, बड़ी अच्छी लड़की है. आप दोनों की बड़ी सेवा करेगी. जायदाद बेच कर इस का हिस्सा मैं आप को भेज दूंगा. कहीं कोई सुपात्र मिले, तो इस का ब्याह कर दीजिएगा.’’
‘‘नहींनहीं, कुछ भेजने की आवश्यकता नहीं है. हमारे पास सभी कुछ है. हम इसे ही ले जा कर खुश हो लेंगे.’’ अपने घर का पता और उस व्यक्ति का पता लेते हुए सरिता और विनय लौट आए.
उन के घर पहुंचते ही वसुंधरा अपार्टमैंट में हलचल सी मच गई.
मिनी के लिए सभी की आंखों में उभर आए प्रश्नों को देख कर सरिता खुद को रोक न सकीं, बोलीं, ‘‘हम मथुरा से मिनी को लाए हैं प्यारी सी बेटी के रूप में.’’
कुछ न कहने पर भी सभी समझ ही गए. सब ने मिनी को प्यार से क्या निहारा, कि उसी पल से वह उन की चहेती बन गई.
अब मिनी को समय कहां था कि अपने गुजरे समय को याद कर के आंसू बहाए. पूरी बिल्डिंग की वह दुलारी बन गई थी. किसी की बेटी, तो किसी की ननद. बड़ों की बहन तो छोटों की दीदी. किसी के घर मिनी पकौड़े बना रही है तो कहीं भाजी. किसी का बटन टांक रही है तो किसी के बच्चे को थामे घूम रही है.
हर उम्र की दहलीज पर मिनी ने अपने निस्वार्थ प्रेम का मायाजाल फैला रखा था. जिसे देखो वह मिनी को पुकारे जा रहा था. बच्चों की तो जान उस में बसती थी.
शाम होते ही सभी बच्चे उसे छत पर ले जाते. वहां कभी वह बौलिंग कर रही होती तो कभी अपांयर बन कर फैसला दे रही होती. मजाल कि कोई उस की अवमानना कर जाए. नियति की कैसी माया थी कि किसी घर की दुत्कारी, कहीं और की दुलारी बन गई थी. कल तक जिस का कोई नहीं था, आज इतने सारे उस के अपने थे.
उषा ने सरिता की सहमति से सब से प्रसिद्ध ब्यूटीपार्लर काया में मिनी को काम सीखने के लिए भेजा. मात्र 4 महीने में ही वह इतनी काबिल हो गई कि एक जानेमाने ब्यूटीपार्लर वालों ने उसे अपने यहां काम पर रख लेना चाहा. पर सरिता ने मना कर दिया यह कहते हुए कि हुनर सीख लिया, यही बहुत है. कमी क्या है कि मिनी पार्लर में नौकरी करेगी.
उस दिन मिनी सरिता के पैरों पर सिर रख कर बोली, ‘‘अम्मा, अगर उस दिन आप नहीं मिली होतीं तो कह नहीं सकती कि मेरा क्या हाल हुआ होता. या तो मैं मर गई होती या मेरे शरीर को नोच रहे होते लोग,’’ कहते हुए मिनी बहुत दिनों के बाद फूटफूट रो पड़ी.
उस के सिर को सहलाते हुए सरिता ने बड़े लाड़दुलार से कहा, ‘‘अरे, कैसे नहीं मिलती मैं. तुझे लाने के लिए ही तो जैसे मैं वहां गई थी. नहीं जाती तो इतना प्यार करने वाली बेटी कहां से मिलती मुझे. यहां तो तू ही हमारे लिए सबकुछ है.’’
सरिता के हृदय परिवर्तन पर पूरी बिल्ंिडग हैरान थी और खुश थी. प्यार के इस लहराते समंदर को इतने दिनों तक पता नहीं उन्होंने कहां छिपा कर रखा था. इधर मिनी के ब्यूटीपार्लर के अनुभव से बिल्ंिडग की सारी महिलाएं लाभान्वित हो रही थीं. किसी की भौंहें बन रही हैं तो किसी की गरदन की मसाज हो रही है. किसी के बाल स्टैप्स में काटे जा रहे हैं तो कोई फेशियल करवा रहा था, वह भी मुफ्त. किसी ने देने की जबरदस्ती की तो मिनी की आंखें छलक उठीं. अब भला किस की शामत आईर् थी कि मिनी की आंखों में आंसू छलका सके. इस बात से सरिता भी नाराज हो गईं.
प्यार से सने बोल में वे गर्जना कर उठीं, ‘‘मिनी मेरी ही नहीं, आप सभी की बहनबेटी है. क्यों उसे पैसे दे रही हैं. ऐसा कर आप सभी ने उसे अपने से दूर कर दिया है. हुनर सीखा भी इसलिए है कि आप सभी को सजाधजा सके.’’
‘‘नहींनहीं सरिता, इस से मिनी कोई दूसरी थोड़े हो जाएगी. हम सब उसे पुरस्कृत करना चाहते थे. माफ कीजिएगा, अगर बुरा लगा हो तो.’’ उषा की बातों से सरिता के होंठों पर मुसकान छिटक आई. कभीकभी मिनी अपने सारे तजरबे को सरिताजी पर ही आजमा लिया करती थी. वे दिल से तो प्रसन्न होती थीं, पर बाहर से गुस्सा दिखाती थीं.
दिन खुशी से गुजर रहे थे. इतना प्यार और सम्मान पा कर मिनी खिल गई थी. सुंदर तो थी ही. मिनी को आए 2 साल हो चुके थे. सरिता और विनय के साथ पूरी बिल्डिंग की अब यही इच्छा थी कि मिनी का ब्याह किसी सुपात्र से हो जाए.
यह भी संयोग रहा कि नीतू की भाभी की मृत्यु प्रसव के दौरान हो गई. नवजात बच्चे के साथ उस की मां बड़ी परेशान थीं. उस की मां की यही इच्छा थी कि उस के भाई की शादी जल्द से जल्द हो जाए ताकि इस उम्र में बच्चे की देखभाल करने से छुटकारा मिले.
नीतू के जेहन में अचानक मिनी का भोलाभाला रूप नाच उठा. मिनी से बढ़ कर कोई उस के भाई के बच्चे को प्यार नहीं दे सकेगा. तत्काल वह उषा के पास गई और सारी बातें उन्हें बताते हुए राय मांगी. उषा भी सहमत हो गईं. सरिता को मनाने के लिए दोनों उन के पास पहुंचीं.
सारी बातों को सुन कर सरिता ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि पहले की बात और थी. शादी होते ही एक बच्चे की देखभाल करने की जिम्मेदारी मिनी के नाजुक कंधे पर आ जाए, इस में मेरी जरा सी भी रजामंदी नहीं है. जब मैं ही तैयार नहीं, तो उस के बाबूजी और भैया कभी राजी नहीं होंगे. उसी दिन समीर कह रहा था, ‘‘लेनदेन की चिंता मत करना. बस, ऐसा घर ढूंढ़ना जहां मिनी सुखी रहे.’’
उषा ने दुनियादारी की बताते हुए कहा, ‘‘मिनी के प्यार में आप इस सचाई को भूल चुकी हैं कि मिनी अनाथ और विधवा है. उस के लिए नीतू के भाई से अच्छा रिश्ता शायद ही मिले.’’ कहते हुए वे दोनों बुझे मन से लौट गईं.
परंतु दूसरे दिन ही सरिताजी ने इस रिश्ते की स्वीकृति पर अपनी रजामंदी की मुहर लगा दी, क्योंकि उषा की बातों ने उन की आंखें खोल दी थीं. फिर मिनी को भी कोई एतराज नहीं था सिवा इस के कि उस के जाने के बाद उन दोनों की देखभाल उस की तरह कौन करेगा.
ये भी पढ़ें- हैप्पीनैस हार्मोन
मिनी की शादी की धूम पूरी बिल्डिंग में मची हुईर् थी. तैयारियां जोरों पर थीं. आखिर सब की चहेती मिनी की शादी थी. सरिता ने मिनी की ससुराल में भी शादी का निमंत्रणपत्र भेज दिया था. पर अच्छा ही हुआ कि वहां से कोई नहीं आया. वे नहीं चाहती थीं कि बीते दिनों की दुखद यादों को ले कर मिनी के नए जीवन की शुरुआत हो.
बच्चे, युवा, बूढ़े सभी उत्साहित थे. बरात आई, शहनाइयां बजीं, आंसूभरी आंखों से सरिता और विनय ने सारे रस्मरिवाजों को निभाया. सभी ने जी खोल कर मिनी को उपहार दिए. समीर ने अपने मम्मीपापा के साथ मिनी, उस के होने वाले पति और बच्चे को गरमी में अमेरिका घूमने के लिए बुलाया. बस, पासपोर्ट और वीजा के मिलते ही टिकट भेज देने का आश्वासन दिया था.
जितना मिला, उस के लिए मिनी का आंचल छोटा पड़ गया था. उस की आंखें विदाई तक बरसती ही रहीं. सब के प्यारदुलार को समेट, सब को रुलाते हुए मिनी अपने जीवनसाभी की बांहें थाम नए जीवन की डगर की ओर चल पड़ी. उस की विदाई पर सभी बिलख रहे थे पर खुशी के आंसुओं के साथ. अपने पीछे मिनी पूरी बिल्ंिडग में एक सन्नाटा और उदासी छोड़ गई थी.
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उस की दुखभरी गाथा सुन कर सरिता और विनय की पलकें भीग गईं. बहुत सोच कर सरिता ने पति से कहा, ‘‘क्यों न हम मिनी को अपने साथ ले चलें. हमारा भी तो वहां कोई नहीं है. एक बेटा है जो परिवार सहित दूसरे देश में बस गया है. शायद नियति ने हमें इसी कार्य के लिए यहां भेजा हो.’’ जवाब में विनय कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, ‘‘पूछ लो इस लड़की से हमारे साथ चलती है तो चले. इसे भी आसरा मिल जाएगा और हमें भी इस का सहारा.’’
विनय का इतना कहना था कि वह व्यक्ति उन के पैरों से लिपट गया, ‘‘ले जाइए, बाबूजी, बड़ी अच्छी लड़की है. आप दोनों की बड़ी सेवा करेगी. जायदाद बेच कर इस का हिस्सा मैं आप को भेज दूंगा. कहीं कोई सुपात्र मिले, तो इस का ब्याह कर दीजिएगा.’’
‘‘नहींनहीं, कुछ भेजने की आवश्यकता नहीं है. हमारे पास सभी कुछ है. हम इसे ही ले जा कर खुश हो लेंगे.’’ अपने घर का पता और उस व्यक्ति का पता लेते हुए सरिता और विनय लौट आए.
उन के घर पहुंचते ही वसुंधरा अपार्टमैंट में हलचल सी मच गई.
मिनी के लिए सभी की आंखों में उभर आए प्रश्नों को देख कर सरिता खुद को रोक न सकीं, बोलीं, ‘‘हम मथुरा से मिनी को लाए हैं प्यारी सी बेटी के रूप में.’’
कुछ न कहने पर भी सभी समझ ही गए. सब ने मिनी को प्यार से क्या निहारा, कि उसी पल से वह उन की चहेती बन गई.
अब मिनी को समय कहां था कि अपने गुजरे समय को याद कर के आंसू बहाए. पूरी बिल्डिंग की वह दुलारी बन गई थी. किसी की बेटी, तो किसी की ननद. बड़ों की बहन तो छोटों की दीदी. किसी के घर मिनी पकौड़े बना रही है तो कहीं भाजी. किसी का बटन टांक रही है तो किसी के बच्चे को थामे घूम रही है.
हर उम्र की दहलीज पर मिनी ने अपने निस्वार्थ प्रेम का मायाजाल फैला रखा था. जिसे देखो वह मिनी को पुकारे जा रहा था. बच्चों की तो जान उस में बसती थी.
शाम होते ही सभी बच्चे उसे छत पर ले जाते. वहां कभी वह बौलिंग कर रही होती तो कभी अपांयर बन कर फैसला दे रही होती. मजाल कि कोई उस की अवमानना कर जाए. नियति की कैसी माया थी कि किसी घर की दुत्कारी, कहीं और की दुलारी बन गई थी. कल तक जिस का कोई नहीं था, आज इतने सारे उस के अपने थे.
उषा ने सरिता की सहमति से सब से प्रसिद्ध ब्यूटीपार्लर काया में मिनी को काम सीखने के लिए भेजा. मात्र 4 महीने में ही वह इतनी काबिल हो गई कि एक जानेमाने ब्यूटीपार्लर वालों ने उसे अपने यहां काम पर रख लेना चाहा. पर सरिता ने मना कर दिया यह कहते हुए कि हुनर सीख लिया, यही बहुत है. कमी क्या है कि मिनी पार्लर में नौकरी करेगी.
उस दिन मिनी सरिता के पैरों पर सिर रख कर बोली, ‘‘अम्मा, अगर उस दिन आप नहीं मिली होतीं तो कह नहीं सकती कि मेरा क्या हाल हुआ होता. या तो मैं मर गई होती या मेरे शरीर को नोच रहे होते लोग,’’ कहते हुए मिनी बहुत दिनों के बाद फूटफूट रो पड़ी.
उस के सिर को सहलाते हुए सरिता ने बड़े लाड़दुलार से कहा, ‘‘अरे, कैसे नहीं मिलती मैं. तुझे लाने के लिए ही तो जैसे मैं वहां गई थी. नहीं जाती तो इतना प्यार करने वाली बेटी कहां से मिलती मुझे. यहां तो तू ही हमारे लिए सबकुछ है.’’
सरिता के हृदय परिवर्तन पर पूरी बिल्ंिडग हैरान थी और खुश थी. प्यार के इस लहराते समंदर को इतने दिनों तक पता नहीं उन्होंने कहां छिपा कर रखा था. इधर मिनी के ब्यूटीपार्लर के अनुभव से बिल्ंिडग की सारी महिलाएं लाभान्वित हो रही थीं. किसी की भौंहें बन रही हैं तो किसी की गरदन की मसाज हो रही है. किसी के बाल स्टैप्स में काटे जा रहे हैं तो कोई फेशियल करवा रहा था, वह भी मुफ्त. किसी ने देने की जबरदस्ती की तो मिनी की आंखें छलक उठीं. अब भला किस की शामत आईर् थी कि मिनी की आंखों में आंसू छलका सके. इस बात से सरिता भी नाराज हो गईं.
प्यार से सने बोल में वे गर्जना कर उठीं, ‘‘मिनी मेरी ही नहीं, आप सभी की बहनबेटी है. क्यों उसे पैसे दे रही हैं. ऐसा कर आप सभी ने उसे अपने से दूर कर दिया है. हुनर सीखा भी इसलिए है कि आप सभी को सजाधजा सके.’’
‘‘नहींनहीं सरिता, इस से मिनी कोई दूसरी थोड़े हो जाएगी. हम सब उसे पुरस्कृत करना चाहते थे. माफ कीजिएगा, अगर बुरा लगा हो तो.’’ उषा की बातों से सरिता के होंठों पर मुसकान छिटक आई. कभीकभी मिनी अपने सारे तजरबे को सरिताजी पर ही आजमा लिया करती थी. वे दिल से तो प्रसन्न होती थीं, पर बाहर से गुस्सा दिखाती थीं.
दिन खुशी से गुजर रहे थे. इतना प्यार और सम्मान पा कर मिनी खिल गई थी. सुंदर तो थी ही. मिनी को आए 2 साल हो चुके थे. सरिता और विनय के साथ पूरी बिल्डिंग की अब यही इच्छा थी कि मिनी का ब्याह किसी सुपात्र से हो जाए.
यह भी संयोग रहा कि नीतू की भाभी की मृत्यु प्रसव के दौरान हो गई. नवजात बच्चे के साथ उस की मां बड़ी परेशान थीं. उस की मां की यही इच्छा थी कि उस के भाई की शादी जल्द से जल्द हो जाए ताकि इस उम्र में बच्चे की देखभाल करने से छुटकारा मिले.
नीतू के जेहन में अचानक मिनी का भोलाभाला रूप नाच उठा. मिनी से बढ़ कर कोई उस के भाई के बच्चे को प्यार नहीं दे सकेगा. तत्काल वह उषा के पास गई और सारी बातें उन्हें बताते हुए राय मांगी. उषा भी सहमत हो गईं. सरिता को मनाने के लिए दोनों उन के पास पहुंचीं.
सारी बातों को सुन कर सरिता ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि पहले की बात और थी. शादी होते ही एक बच्चे की देखभाल करने की जिम्मेदारी मिनी के नाजुक कंधे पर आ जाए, इस में मेरी जरा सी भी रजामंदी नहीं है. जब मैं ही तैयार नहीं, तो उस के बाबूजी और भैया कभी राजी नहीं होंगे. उसी दिन समीर कह रहा था, ‘‘लेनदेन की चिंता मत करना. बस, ऐसा घर ढूंढ़ना जहां मिनी सुखी रहे.’’
उषा ने दुनियादारी की बताते हुए कहा, ‘‘मिनी के प्यार में आप इस सचाई को भूल चुकी हैं कि मिनी अनाथ और विधवा है. उस के लिए नीतू के भाई से अच्छा रिश्ता शायद ही मिले.’’ कहते हुए वे दोनों बुझे मन से लौट गईं.
परंतु दूसरे दिन ही सरिताजी ने इस रिश्ते की स्वीकृति पर अपनी रजामंदी की मुहर लगा दी, क्योंकि उषा की बातों ने उन की आंखें खोल दी थीं. फिर मिनी को भी कोई एतराज नहीं था सिवा इस के कि उस के जाने के बाद उन दोनों की देखभाल उस की तरह कौन करेगा.
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मिनी की शादी की धूम पूरी बिल्डिंग में मची हुईर् थी. तैयारियां जोरों पर थीं. आखिर सब की चहेती मिनी की शादी थी. सरिता ने मिनी की ससुराल में भी शादी का निमंत्रणपत्र भेज दिया था. पर अच्छा ही हुआ कि वहां से कोई नहीं आया. वे नहीं चाहती थीं कि बीते दिनों की दुखद यादों को ले कर मिनी के नए जीवन की शुरुआत हो.
बच्चे, युवा, बूढ़े सभी उत्साहित थे. बरात आई, शहनाइयां बजीं, आंसूभरी आंखों से सरिता और विनय ने सारे रस्मरिवाजों को निभाया. सभी ने जी खोल कर मिनी को उपहार दिए. समीर ने अपने मम्मीपापा के साथ मिनी, उस के होने वाले पति और बच्चे को गरमी में अमेरिका घूमने के लिए बुलाया. बस, पासपोर्ट और वीजा के मिलते ही टिकट भेज देने का आश्वासन दिया था.
जितना मिला, उस के लिए मिनी का आंचल छोटा पड़ गया था. उस की आंखें विदाई तक बरसती ही रहीं. सब के प्यारदुलार को समेट, सब को रुलाते हुए मिनी अपने जीवनसाभी की बांहें थाम नए जीवन की डगर की ओर चल पड़ी. उस की विदाई पर सभी बिलख रहे थे पर खुशी के आंसुओं के साथ. अपने पीछे मिनी पूरी बिल्ंिडग में एक सन्नाटा और उदासी छोड़ गई थी.
उस की दुखभरी गाथा सुन कर सरिता और विनय की पलकें भीग गईं. बहुत सोच कर सरिता ने पति से कहा, ‘‘क्यों न हम मिनी को अपने साथ ले चलें. हमारा भी तो वहां कोई नहीं है. एक बेटा है जो परिवार सहित दूसरे देश में बस गया है. शायद नियति ने हमें इसी कार्य के लिए यहां भेजा हो.’’ जवाब में विनय कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, ‘‘पूछ लो इस लड़की से हमारे साथ चलती है तो चले. इसे भी आसरा मिल जाएगा और हमें भी इस का सहारा.’’
विनय का इतना कहना था कि वह व्यक्ति उन के पैरों से लिपट गया, ‘‘ले जाइए, बाबूजी, बड़ी अच्छी लड़की है. आप दोनों की बड़ी सेवा करेगी. जायदाद बेच कर इस का हिस्सा मैं आप को भेज दूंगा. कहीं कोई सुपात्र मिले, तो इस का ब्याह कर दीजिएगा.’’
‘‘नहींनहीं, कुछ भेजने की आवश्यकता नहीं है. हमारे पास सभी कुछ है. हम इसे ही ले जा कर खुश हो लेंगे.’’ अपने घर का पता और उस व्यक्ति का पता लेते हुए सरिता और विनय लौट आए.
उन के घर पहुंचते ही वसुंधरा अपार्टमैंट में हलचल सी मच गई.
मिनी के लिए सभी की आंखों में उभर आए प्रश्नों को देख कर सरिता खुद को रोक न सकीं, बोलीं, ‘‘हम मथुरा से मिनी को लाए हैं प्यारी सी बेटी के रूप में.’’
कुछ न कहने पर भी सभी समझ ही गए. सब ने मिनी को प्यार से क्या निहारा, कि उसी पल से वह उन की चहेती बन गई.
अब मिनी को समय कहां था कि अपने गुजरे समय को याद कर के आंसू बहाए. पूरी बिल्डिंग की वह दुलारी बन गई थी. किसी की बेटी, तो किसी की ननद. बड़ों की बहन तो छोटों की दीदी. किसी के घर मिनी पकौड़े बना रही है तो कहीं भाजी. किसी का बटन टांक रही है तो किसी के बच्चे को थामे घूम रही है.
हर उम्र की दहलीज पर मिनी ने अपने निस्वार्थ प्रेम का मायाजाल फैला रखा था. जिसे देखो वह मिनी को पुकारे जा रहा था. बच्चों की तो जान उस में बसती थी.
शाम होते ही सभी बच्चे उसे छत पर ले जाते. वहां कभी वह बौलिंग कर रही होती तो कभी अपांयर बन कर फैसला दे रही होती. मजाल कि कोई उस की अवमानना कर जाए. नियति की कैसी माया थी कि किसी घर की दुत्कारी, कहीं और की दुलारी बन गई थी. कल तक जिस का कोई नहीं था, आज इतने सारे उस के अपने थे.
उषा ने सरिता की सहमति से सब से प्रसिद्ध ब्यूटीपार्लर काया में मिनी को काम सीखने के लिए भेजा. मात्र 4 महीने में ही वह इतनी काबिल हो गई कि एक जानेमाने ब्यूटीपार्लर वालों ने उसे अपने यहां काम पर रख लेना चाहा. पर सरिता ने मना कर दिया यह कहते हुए कि हुनर सीख लिया, यही बहुत है. कमी क्या है कि मिनी पार्लर में नौकरी करेगी.
उस दिन मिनी सरिता के पैरों पर सिर रख कर बोली, ‘‘अम्मा, अगर उस दिन आप नहीं मिली होतीं तो कह नहीं सकती कि मेरा क्या हाल हुआ होता. या तो मैं मर गई होती या मेरे शरीर को नोच रहे होते लोग,’’ कहते हुए मिनी बहुत दिनों के बाद फूटफूट रो पड़ी.
उस के सिर को सहलाते हुए सरिता ने बड़े लाड़दुलार से कहा, ‘‘अरे, कैसे नहीं मिलती मैं. तुझे लाने के लिए ही तो जैसे मैं वहां गई थी. नहीं जाती तो इतना प्यार करने वाली बेटी कहां से मिलती मुझे. यहां तो तू ही हमारे लिए सबकुछ है.’’
सरिता के हृदय परिवर्तन पर पूरी बिल्ंिडग हैरान थी और खुश थी. प्यार के इस लहराते समंदर को इतने दिनों तक पता नहीं उन्होंने कहां छिपा कर रखा था. इधर मिनी के ब्यूटीपार्लर के अनुभव से बिल्ंिडग की सारी महिलाएं लाभान्वित हो रही थीं. किसी की भौंहें बन रही हैं तो किसी की गरदन की मसाज हो रही है. किसी के बाल स्टैप्स में काटे जा रहे हैं तो कोई फेशियल करवा रहा था, वह भी मुफ्त. किसी ने देने की जबरदस्ती की तो मिनी की आंखें छलक उठीं. अब भला किस की शामत आईर् थी कि मिनी की आंखों में आंसू छलका सके. इस बात से सरिता भी नाराज हो गईं.
प्यार से सने बोल में वे गर्जना कर उठीं, ‘‘मिनी मेरी ही नहीं, आप सभी की बहनबेटी है. क्यों उसे पैसे दे रही हैं. ऐसा कर आप सभी ने उसे अपने से दूर कर दिया है. हुनर सीखा भी इसलिए है कि आप सभी को सजाधजा सके.’’
‘‘नहींनहीं सरिता, इस से मिनी कोई दूसरी थोड़े हो जाएगी. हम सब उसे पुरस्कृत करना चाहते थे. माफ कीजिएगा, अगर बुरा लगा हो तो.’’ उषा की बातों से सरिता के होंठों पर मुसकान छिटक आई. कभीकभी मिनी अपने सारे तजरबे को सरिताजी पर ही आजमा लिया करती थी. वे दिल से तो प्रसन्न होती थीं, पर बाहर से गुस्सा दिखाती थीं.
दिन खुशी से गुजर रहे थे. इतना प्यार और सम्मान पा कर मिनी खिल गई थी. सुंदर तो थी ही. मिनी को आए 2 साल हो चुके थे. सरिता और विनय के साथ पूरी बिल्डिंग की अब यही इच्छा थी कि मिनी का ब्याह किसी सुपात्र से हो जाए.
यह भी संयोग रहा कि नीतू की भाभी की मृत्यु प्रसव के दौरान हो गई. नवजात बच्चे के साथ उस की मां बड़ी परेशान थीं. उस की मां की यही इच्छा थी कि उस के भाई की शादी जल्द से जल्द हो जाए ताकि इस उम्र में बच्चे की देखभाल करने से छुटकारा मिले.
नीतू के जेहन में अचानक मिनी का भोलाभाला रूप नाच उठा. मिनी से बढ़ कर कोई उस के भाई के बच्चे को प्यार नहीं दे सकेगा. तत्काल वह उषा के पास गई और सारी बातें उन्हें बताते हुए राय मांगी. उषा भी सहमत हो गईं. सरिता को मनाने के लिए दोनों उन के पास पहुंचीं.
सारी बातों को सुन कर सरिता ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि पहले की बात और थी. शादी होते ही एक बच्चे की देखभाल करने की जिम्मेदारी मिनी के नाजुक कंधे पर आ जाए, इस में मेरी जरा सी भी रजामंदी नहीं है. जब मैं ही तैयार नहीं, तो उस के बाबूजी और भैया कभी राजी नहीं होंगे. उसी दिन समीर कह रहा था, ‘‘लेनदेन की चिंता मत करना. बस, ऐसा घर ढूंढ़ना जहां मिनी सुखी रहे.’’
उषा ने दुनियादारी की बताते हुए कहा, ‘‘मिनी के प्यार में आप इस सचाई को भूल चुकी हैं कि मिनी अनाथ और विधवा है. उस के लिए नीतू के भाई से अच्छा रिश्ता शायद ही मिले.’’ कहते हुए वे दोनों बुझे मन से लौट गईं.
परंतु दूसरे दिन ही सरिताजी ने इस रिश्ते की स्वीकृति पर अपनी रजामंदी की मुहर लगा दी, क्योंकि उषा की बातों ने उन की आंखें खोल दी थीं. फिर मिनी को भी कोई एतराज नहीं था सिवा इस के कि उस के जाने के बाद उन दोनों की देखभाल उस की तरह कौन करेगा.
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मिनी की शादी की धूम पूरी बिल्डिंग में मची हुईर् थी. तैयारियां जोरों पर थीं. आखिर सब की चहेती मिनी की शादी थी. सरिता ने मिनी की ससुराल में भी शादी का निमंत्रणपत्र भेज दिया था. पर अच्छा ही हुआ कि वहां से कोई नहीं आया. वे नहीं चाहती थीं कि बीते दिनों की दुखद यादों को ले कर मिनी के नए जीवन की शुरुआत हो.
बच्चे, युवा, बूढ़े सभी उत्साहित थे. बरात आई, शहनाइयां बजीं, आंसूभरी आंखों से सरिता और विनय ने सारे रस्मरिवाजों को निभाया. सभी ने जी खोल कर मिनी को उपहार दिए. समीर ने अपने मम्मीपापा के साथ मिनी, उस के होने वाले पति और बच्चे को गरमी में अमेरिका घूमने के लिए बुलाया. बस, पासपोर्ट और वीजा के मिलते ही टिकट भेज देने का आश्वासन दिया था.
जितना मिला, उस के लिए मिनी का आंचल छोटा पड़ गया था. उस की आंखें विदाई तक बरसती ही रहीं. सब के प्यारदुलार को समेट, सब को रुलाते हुए मिनी अपने जीवनसाभी की बांहें थाम नए जीवन की डगर की ओर चल पड़ी. उस की विदाई पर सभी बिलख रहे थे पर खुशी के आंसुओं के साथ. अपने पीछे मिनी पूरी बिल्ंिडग में एक सन्नाटा और उदासी छोड़ गई थी.
The post हृदय परिवर्तन -भाग 3 : वसुंधरा अपार्टमैंट में सरिता की चर्चा क्यों हो रही थी appeared first on Sarita Magazine.
February 22, 2021 at 10:00AM
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