Wednesday, 3 February 2021

मन की पीड़ा -भाग 2: पंचम को हर इतवार कांटे की तरह क्यों चुभता था

उस दिन रियाज के बाद जब हितेश साहब पंचम को घर छोड़ने आए तो उन्होंने मां से हिचकिचाते हुए पूछा, ‘कल्याणीजी, आप को पंचम को दिल्ली से बाहर भेजने में कोई आपत्ति तो नहीं?’ बात समाप्त करने से पहले उन्होंने अनुबंध उन के सामने रख दिया. कल्याणीजी ने बिजली की कौंध की तरह झट से अनुबंध  पर हस्ताक्षर कर दिए. दिल्ली से बाहर फरीदकोट में पंचम का यह पहला समारोह था. नाम तक न सुना था कभी. बस, सांत्वना यही थी कि वहां किसी परिचित व्यक्ति के मिलने की संभावना नहीं थी. सालाना परीक्षा के कारण कुछ दिन स्कूल में छुट्टी थी. किंतु पंचम का हितेश साहब के यहां रियाज का सिलसिला जारी रहा. अब सप्ताह में 2 बार. मां की इन हरकतों पर गुस्सा आने पर अकसर पंचम कह देती, ‘मां, वहां हितेश साहब की लड़की बैठ कर परीक्षा की तैयारी करती है और मैं उस के पापा के साथ रियाज करती हूं, प्रेम गीत गाती हूं, मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता?’

‘बेटा पंचम, तुझ में जो हुनर है वह उस में थोड़े ही है. इस में तेरा भी भला है. पंचम सोचने लगी, मां नहीं जानती थीं कि उन के इस जनून में मेरा और अरमान का हरेक इतवार बरबाद होता है. मेरे वहां जाने से वह भी इतवार को परीक्षा की तैयारी नहीं कर सकता. मां यह अच्छी तरह जानती हैं कि अरमान की खिड़की से हितेश अंकल का घर साफसाफ दिखाई देता है. फिर क्यों? बचपन से अरमान और पंचम एक अटूट अनकहे प्रेमबंधन में बंधे थे. अरमान के घर वाले बहुत पुराने विचारों के थे, उन्हें पंचम के गानेबजाने से सख्त नफरत थी. पंचम का ‘स’ लगते ही अरमान जोर से खिड़की बंद कर देता. वह अकसर अपनी मां की जलीकटी बातों से बचने के लिए लोधी गार्डन के उस पेड़ के नीचे जा बैठता जहां वे दोनों जंगलजलेबियां बीनबीन कर खाते और घंटों बातें करते रहते थे. अरमान के कुछ न कहने पर भी पंचम उस की कहीअनकही बातें उस की आंखों में साफ पढ़ लेती.

कल्याणीजी के लिए नाम और प्रसिद्धि एक चुनौती बन चुकी थी. उसे वे किसी भी तरह पाना चाहती थीं. उस रात कल्याणी ने पंचम के पापा से फरीदकोट का जिक्र किया. पापा भड़क उठे, ‘मैं हरगिज नहीं चाहता, लड़की शहर से बाहर जाए. मना कर दो उस मरासी को. क्यों बरबाद करने पर तुली हो मेरी बेटी के भविष्य को.’ ‘यह कैसे हो सकता है? अब तो नामुमकिन है,’ मां ने दृढ़ता से कहा. मां के लिए पापा के विरोध की कोई महत्ता नहीं थी. ‘कल्याणी, कान खोल कर सुन लो, मुझ से पैसों की आशा कतई मत करना.’ ‘मांग कौन रहा है. वैसे भी आप के पास पैसे हैं ही कहां? आप की समस्या मेरी समझ से बाहर है. लोग मेरी तारीफ करने का कोई मौका नहीं चूकते, कहते हैं, हिम्मत वाली हैं कल्याणीजी आप. जितनी मेहनत, आप करती हैं बच्ची पर अभी तक तो कोई मां ऐसी नहीं देखी. और एक आप हैं, तारीफ तो क्या, साथ तक नहीं देते. मांबाप की कुर्बानियों से ही बच्चे बनते हैं. पैदा करना ही काफी नहीं है. अगर बेटी ने चार पैसे भी कमा लिए तो भला तो हमारा ही होगा. घर की स्थिति सुधर जाएगी. ऐसी बातें आप की समझ से बाहर हैं. हमारी पंचम में तो गुण कूटकूट कर भरे हुए हैं. अगर कहीं मेरी मां ने मेरे सपने अपने समझे होते, बापूजी के झगड़ों को नजरअंदाज कर मेरे साथ खड़ी होतीं, तो आज मेरे सपने यथार्थ में बदल जाते. फिर मैं आप की नहीं, किसी बड़े स्टार की ब्याहता होती. धन, मान, सम्मान सभी होते, करोड़ों में खेलती, कोठियों में रहती.’

‘अभी कौन सी देर हुई है. मैं ने रोका है क्या?’

पंचम बिस्तर पर पड़ी उन की नोंकझोक सुन रही थी. वह दिन भी आ गया. गाड़ी नई दिल्ली स्टेशन से सुबह 5 बजे चलती थी. समारोह रात को था. फरीदकोट पहुंचते ही बड़ी आवभगत हुई. सफेद चमचमाती हुई कार लेने आई. फाइवस्टार होटल में ठहराया गया. होटल तो पंचम को स्वप्नमहल सा लग रहा था. सफेदसफेद उजली चादरें, टीवी, डनलप के गद्दे वाले पलंग, शीशे सा चमकता बाथरूम, बड़ीबड़ी खिड़कियां, बिस्तर से मैचिंग परदे. उत्साह के स्थान पर पंचम को कमरे में लगे आईने में बारबार अरमान का उदास चेहरा दिखाई दे रहा था. प्रोग्राम प्राइवेट नहीं, राजनीतिक था. पहले देशभक्ति, उस के बाद पार्टीबाजी के व्याख्यान होने थे. बाद में संगीत. तालियों की गड़गड़ाहट बता रही थी कि लोगों को संगीत भाया था. लोगों ने बहुत पैसा लुटाया उस पर. जिस से पंचम को बहुत नफरत थी. समारोह के बाद विशेष अतिथियों के लिए खाने की व्यवस्था थी.

‘बहनजी, क्या गला पाया है आप की बेटी ने, बहुत दूर तक जाएगी. स्वरमयी गला और खूबसूरत दोनों ही विरासत में पाए हैं. आप तो और भी सुरीला गाती होंगी’, एक महाशय ने व्यंग्यपूर्वक कहा. ‘शुक्रिया’, कह कर कल्याणीजी पंखहीन सातवें आसमान पर उड़ने लगीं. वे यह बताने से कभी न चूकती थीं कि बच्चों की सफलता में मांबाप का पहला हाथ होता है. वहां भिन्नभिन्न प्रकार के पकवानों की भरमार थी. लोग खाने पर ऐसे टूटे जैसे 6 महीने से भूखे हों. भोजन के बाद पान वाला मंडराने लगा.

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उस दिन रियाज के बाद जब हितेश साहब पंचम को घर छोड़ने आए तो उन्होंने मां से हिचकिचाते हुए पूछा, ‘कल्याणीजी, आप को पंचम को दिल्ली से बाहर भेजने में कोई आपत्ति तो नहीं?’ बात समाप्त करने से पहले उन्होंने अनुबंध उन के सामने रख दिया. कल्याणीजी ने बिजली की कौंध की तरह झट से अनुबंध  पर हस्ताक्षर कर दिए. दिल्ली से बाहर फरीदकोट में पंचम का यह पहला समारोह था. नाम तक न सुना था कभी. बस, सांत्वना यही थी कि वहां किसी परिचित व्यक्ति के मिलने की संभावना नहीं थी. सालाना परीक्षा के कारण कुछ दिन स्कूल में छुट्टी थी. किंतु पंचम का हितेश साहब के यहां रियाज का सिलसिला जारी रहा. अब सप्ताह में 2 बार. मां की इन हरकतों पर गुस्सा आने पर अकसर पंचम कह देती, ‘मां, वहां हितेश साहब की लड़की बैठ कर परीक्षा की तैयारी करती है और मैं उस के पापा के साथ रियाज करती हूं, प्रेम गीत गाती हूं, मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता?’

‘बेटा पंचम, तुझ में जो हुनर है वह उस में थोड़े ही है. इस में तेरा भी भला है. पंचम सोचने लगी, मां नहीं जानती थीं कि उन के इस जनून में मेरा और अरमान का हरेक इतवार बरबाद होता है. मेरे वहां जाने से वह भी इतवार को परीक्षा की तैयारी नहीं कर सकता. मां यह अच्छी तरह जानती हैं कि अरमान की खिड़की से हितेश अंकल का घर साफसाफ दिखाई देता है. फिर क्यों? बचपन से अरमान और पंचम एक अटूट अनकहे प्रेमबंधन में बंधे थे. अरमान के घर वाले बहुत पुराने विचारों के थे, उन्हें पंचम के गानेबजाने से सख्त नफरत थी. पंचम का ‘स’ लगते ही अरमान जोर से खिड़की बंद कर देता. वह अकसर अपनी मां की जलीकटी बातों से बचने के लिए लोधी गार्डन के उस पेड़ के नीचे जा बैठता जहां वे दोनों जंगलजलेबियां बीनबीन कर खाते और घंटों बातें करते रहते थे. अरमान के कुछ न कहने पर भी पंचम उस की कहीअनकही बातें उस की आंखों में साफ पढ़ लेती.

कल्याणीजी के लिए नाम और प्रसिद्धि एक चुनौती बन चुकी थी. उसे वे किसी भी तरह पाना चाहती थीं. उस रात कल्याणी ने पंचम के पापा से फरीदकोट का जिक्र किया. पापा भड़क उठे, ‘मैं हरगिज नहीं चाहता, लड़की शहर से बाहर जाए. मना कर दो उस मरासी को. क्यों बरबाद करने पर तुली हो मेरी बेटी के भविष्य को.’ ‘यह कैसे हो सकता है? अब तो नामुमकिन है,’ मां ने दृढ़ता से कहा. मां के लिए पापा के विरोध की कोई महत्ता नहीं थी. ‘कल्याणी, कान खोल कर सुन लो, मुझ से पैसों की आशा कतई मत करना.’ ‘मांग कौन रहा है. वैसे भी आप के पास पैसे हैं ही कहां? आप की समस्या मेरी समझ से बाहर है. लोग मेरी तारीफ करने का कोई मौका नहीं चूकते, कहते हैं, हिम्मत वाली हैं कल्याणीजी आप. जितनी मेहनत, आप करती हैं बच्ची पर अभी तक तो कोई मां ऐसी नहीं देखी. और एक आप हैं, तारीफ तो क्या, साथ तक नहीं देते. मांबाप की कुर्बानियों से ही बच्चे बनते हैं. पैदा करना ही काफी नहीं है. अगर बेटी ने चार पैसे भी कमा लिए तो भला तो हमारा ही होगा. घर की स्थिति सुधर जाएगी. ऐसी बातें आप की समझ से बाहर हैं. हमारी पंचम में तो गुण कूटकूट कर भरे हुए हैं. अगर कहीं मेरी मां ने मेरे सपने अपने समझे होते, बापूजी के झगड़ों को नजरअंदाज कर मेरे साथ खड़ी होतीं, तो आज मेरे सपने यथार्थ में बदल जाते. फिर मैं आप की नहीं, किसी बड़े स्टार की ब्याहता होती. धन, मान, सम्मान सभी होते, करोड़ों में खेलती, कोठियों में रहती.’

‘अभी कौन सी देर हुई है. मैं ने रोका है क्या?’

पंचम बिस्तर पर पड़ी उन की नोंकझोक सुन रही थी. वह दिन भी आ गया. गाड़ी नई दिल्ली स्टेशन से सुबह 5 बजे चलती थी. समारोह रात को था. फरीदकोट पहुंचते ही बड़ी आवभगत हुई. सफेद चमचमाती हुई कार लेने आई. फाइवस्टार होटल में ठहराया गया. होटल तो पंचम को स्वप्नमहल सा लग रहा था. सफेदसफेद उजली चादरें, टीवी, डनलप के गद्दे वाले पलंग, शीशे सा चमकता बाथरूम, बड़ीबड़ी खिड़कियां, बिस्तर से मैचिंग परदे. उत्साह के स्थान पर पंचम को कमरे में लगे आईने में बारबार अरमान का उदास चेहरा दिखाई दे रहा था. प्रोग्राम प्राइवेट नहीं, राजनीतिक था. पहले देशभक्ति, उस के बाद पार्टीबाजी के व्याख्यान होने थे. बाद में संगीत. तालियों की गड़गड़ाहट बता रही थी कि लोगों को संगीत भाया था. लोगों ने बहुत पैसा लुटाया उस पर. जिस से पंचम को बहुत नफरत थी. समारोह के बाद विशेष अतिथियों के लिए खाने की व्यवस्था थी.

‘बहनजी, क्या गला पाया है आप की बेटी ने, बहुत दूर तक जाएगी. स्वरमयी गला और खूबसूरत दोनों ही विरासत में पाए हैं. आप तो और भी सुरीला गाती होंगी’, एक महाशय ने व्यंग्यपूर्वक कहा. ‘शुक्रिया’, कह कर कल्याणीजी पंखहीन सातवें आसमान पर उड़ने लगीं. वे यह बताने से कभी न चूकती थीं कि बच्चों की सफलता में मांबाप का पहला हाथ होता है. वहां भिन्नभिन्न प्रकार के पकवानों की भरमार थी. लोग खाने पर ऐसे टूटे जैसे 6 महीने से भूखे हों. भोजन के बाद पान वाला मंडराने लगा.

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February 04, 2021 at 10:00AM

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