Tuesday, 24 November 2020

मुझे एतराज नहीं-भाग 3 : पड़ोस मेें रहने वाली महिला इतनी शांत क्यों रहती थी

इस बीच, सोमू आ गया. बातों में हम ने ध्यान नहीं दिया. वह हमारे लिए कौफी बना कर ले आया. वह भी हमारे बीच बैठ गया. मैं संकोचवश उठने लगी. ‘‘अरे, बैठो रमा, मेरे बेटे को कोई फर्क नहीं पड़ता. वह पहले जैसा तो है नहीं.’’

मैं बोली, ‘‘बच्चों के बिना रहना तो बहुत मुश्किल है.’‘‘हां रे, तू सही कह रही है. पर कुदरत ने मु झे बच्चा दे कर भी मु झ से छीन लिया था. किसी के बच्चे होते ही नहीं हैं. मेरे होने के बावजूद नहीं जैसे हो गया. मैं ने काम में मन लगाया और तरक्की पाती चली गई. एक बार सोमू की बहुत याद आने पर मैं एक हफ्ते की छुट्टी ले कर गई. तो पता चला वे बच्चे को ले कर विदेश चले गए. मैं ने सोचा, वे वापस आ जाएंगे, पर वे फिर नहीं आए.

‘‘मु झे पता ही नहीं चला कि वे कहां गए. बहुत कोशिश की, पर कोई सुराग नहीं मिला‘‘मेरे मम्मीपापा मेरे पास आ गए और मैं अपनी नौकरी के साथसाथ उन का भी ध्यान रखने लगी. समय बीतता गया और एक दिन अचानक पापा को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. मम्मी उन के पीछे उन की याद में

2 साल भी नहीं रहीं. सेवानिवृत्ति के बाद यह मकान खरीद व बना कर तुम्हारे पड़ोस में आ गई. मैं ने किसी से रिश्ता नहीं रखा. मन बहुत ही विरक्त था. मम्मीपापा 2 साल में आगेपीछे जा चुके थे. मैं अकेली हो चुकी थी. यहां आ कर रहने लगी.

‘‘अचानक एक दिन मेरी एक पुरानी सहेली का फोन आया, ‘मेरा बेटा मु झे ढूंढ़ रहा है’ और उस के थोड़ी देर बाद ही मु झे मेरे सोमू का फोन आया, ‘मैं आप का बेटा सोमसुंदरम बोल रहा हूं. मैं आप के पास आना चाहता हूं.’ मेरे आश्चर्य की सीमा न रही.

‘‘जैसा तुम कह रही थीं न, वैसे ही मु झे भी लगा कि कहीं कोई धोखा तो नहीं दे रहा है. मैं ने उसे घर न बुला कर एक होटल में बुलवाया. वहां बात की. तब सारी परतें एकएक कर खुल गईं.’‘‘आंटी, अब मैं घर जाऊंगी, हालांकि, जाने की इच्छा बिलकुल नहीं है. कल धारावाहिक जारी रहेगा,’’ कह कर मैं चल दी.

घर आ कर मैं ने सारा काम किया. वह तो करना ही था. परंतु मेरा मन आंटी की कहानी में ही लगा रहा. यह तो बौलीवुड की कहानी से भी ज्यादा मजेदार थी. आंटी के साथ क्या हुआ, यह जानने के लिए उत्सुक थी और सोमू के बारे में जानने के लिए भी, या दोनों के लिए, यह तो आप डिसाइड करो. फिल्म, कहानी और उपन्यास यह सब भी मानव जीवन के ही तो प्रतिबिंब हैं. दूसरे दिन जल्दीजल्दी काम निबटा कर आंटी के घर पहुंच गई. अब सोमू घर पर है, इस की उत्सुकता ज्यादा थी. मु झे लगा, यह आग एक तरफ की नहीं है. वह भी मु झ से बात करने का मौका तलाशता है. अपनी आग को जब्त करने की मैं कोशिश करती कि इस उम्र में यह ठीक नहीं है. लेकिन मन है कि मानता ही नहीं.

‘‘आओ रमा, आओ. मैं ने अपने बेटे सोमू से कहा कि मैं अपनी कहानी रमा को सुना रही हूं. सोमू ने कहा है, ‘मम्मी, जरूर सुनाओ. लोगों को हमारी कहानी सुन कर कोई शिक्षा मिले, तो बहुत अच्छी बात है, मु झे कोई एतराज नहीं.‘‘अभी अंत बाकी है,’’ आंटी बोलीं‘‘मम्मी, आप आराम से कहानी पूरी कर लो. मैं और अंकल वौलीबौल मैच देखने जा रहे हैं. हम खाना खा कर आएंगे.’’

‘‘अरे वाह, आंटी, आज हम सैलिब्रेट करेंगे,’’ मैं तो चहक उठी, पर ऊपरी तौर से. सोमू के जाने की मु झे खुशी नहीं हो रही थी‘‘रमा, आज हमें भी खाना बनाने की जरूरत नहीं. मेरे बेटे ने हम दोनों के लिए बाहर से ही खाना और्डर कर दिया है.’प्यार और खुशी से मैं ने आंटी को गले लगा लिया.

बढि़या फिल्टर कौफी पी कर हम दोनों आराम से  झूले में बैठ गए. आंटी ने पूछा, ‘‘हम कहां पर थे?’‘‘आंटी, आप ने, धारावाहिक जैसे ही, बड़े रोचक मोड़ पर छोड़ दिया था कि होटल में आप सोमू से मिलीं.’‘‘बिलकुल, रमा. अब मेरी नहीं, बेटे की कहानी शुरू होती है. बेटा वहीं पढ़ कर एक अच्छे पद पर काम करने लगा. अच्छी सैलरी थी. देखने में सोमू बहुत सुंदर था ही, परिवार की कोई रोकटोक नहीं थी. इन बातों से आकर्षित हो कर भारत से आए और वहीं बसे एक परिवार की लड़की नीला ने इस से बात की. सोमू अपने को बहुत अकेला और बिना परिवार का महसूस तो कर ही रहा था. उस के पिता बहुत ड्रिंक करते थे, वे भी चल बसे. उस ने मेरे बारे में जानने की कोशिश की थी. पर उसे कामयाबी नहीं मिली.

‘‘नीला के प्रस्ताव ने तो उसे उस की ओर मोड़ लिया. थोड़े दिन दोनों बहुत खुश रहे. 2 प्यारेप्यारे बच्चे भी हुए. एक बेटा और एक बेटी. पर गृहस्थी की गाड़ी जैसे चलनी चाहिए वैसे न चली और नीला को दूसरे लड़के से प्यार हो गया. उस ने तलाक का निर्णय लिया. केस चला और दोनों बच्चे नीला को मिल गए. यह मेरे जैसे ही अपने जीवन में असफल हो गया. उस के बचाए रुपए भी सब नीला को देने पड़े. बहुत ही निराश हो गया.’’

‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ आंटी.’‘‘हां.’‘‘मेरे बेटे ने मु झे ढूंढ़ने की बहुत कोशिश की. इस तलाक के कारण मु झे ढूंढ़ना बीच में छोड़ दिया था. जब तलाक का काम पूरा हुआ, तब बड़े मनोयोग से उस ने फिर से मु झे ढूंढ़ने का काम जारी रखा.‘‘बहुत मुश्किल था आंटी?’’

‘‘सही कहा. बहुत कोशिश करने के बाद किसी से उस को मेरा मोबाइल नंबर मिला. मु झे तब उस ने फोन किया. वह दिन मेरे लिए अविस्मरणीय है. मु झे तो लगा था,  मेरा कोई नहीं है. किस से मैं अपनी इस खुशी को बांटूं‘‘रमा, दुख को तो फिर भी अकेले सह सकते हैं पर खुशी को जब तक न बांटो, तो खुशी, खुशी नहीं होती. उस समय मैं ने अपनेआप को बहुत अकेला पाया.’’

‘‘मुझ से क्यों नहीं कहा आंटी?’‘‘कैसे कहती? मैं ने तो अपनी कोई बात तुम्हें नहीं बताई थी. तुम्हें ही क्या, किसी को भी नहीं बताई. मैं ने अपनी कहानी अपने मन में ही दफन कर ली थी. अब मेरे बेटे के आने पर जैसे सब बदल गया. मेरी जिंदगी बदल गई.’‘‘वाकई, यह अजूबा से कोई कम नहीं आंटी?’’

‘‘मेरा बेटा विदेश को छोड़ कर आ गया. अब यहीं रहेगा. अपना देश अपना ही होता है. दूर के ढोल सुहाने होते हैं. यही बात सही है. यह बात अब सोमू की सम झ में आ गई. उस के बच्चे जब उस की मां के कहने पर उस से नफरत करने लगे तब ही उस को यह बात सम झ में आई कि मेरी मां के साथ भी यही हुआ होगा और उसे पश्चात्ताप हुआ. ‘अब क्या होत, जब चिडि़या चुग गई खेत’ ऐसा सोचा. पर अब मेरे समय में बेटे का सुख लिखा था. मेरी कोई गलती नहीं थी. कुदरत ने मु झे ये दिन दिखाए. कुछ दिनों पहले भी मैं ने कई बार आत्महत्या करने की सोची. यदि मैं अपनी मंशा में कामयाब हो गई होती तो बेटे का प्रेम, स्नेह कैसे पाती.

‘‘जब जो होना है, किसी न किसी रूप में हो कर रहता है. हमें कर्म करते रहना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए. क्यों रमा, तुम मेरी कहानी सुन कर कुछ सोचने को मजबूर तो हुई होगी?’‘‘हां आंटी, मु झे इसे आत्मसात करने में समय लगेगा. क्या मैं आप की कहानी लिख सकती हूं?’’

‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं रमा, जरूर लिखो. मैं जानती हूं कि तुम एक लेखिका हो. लेखक जो कहता है वह सब कल्पना नहीं होती. वह जो अपने चारों ओर देखता है, सुनता है, महसूस करता है, वह तो लिखता है‘‘रमा, तुम्हें मेरा बेटा कैसा लगा?’मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया‘‘अरे रमा, तुम तो छोटी लड़की जैसी शरमा गईं.’’‘‘मम्मी, अंकल आए हैं, उन्हें आप से कुछ कहना है?’’

‘‘कहिए?’‘‘मैं जो कहने आया था, घर के दरवाजे पर आते ही वह बात आप के मुंह से ही सुन ली. अब मु झे क्या कहना.’‘‘मियांबीवी राजी, तो क्या करेगा काजी,’’ आंटी बोल कर हंस दींसब लोग ठहाका लगा कर हंसने लगे.सोमू बड़े प्रेम से मु झे देखने लगा. मैं बोल पड़ी, ‘‘आज बाहर चलते हैं, आज का डिनर बाहर.’’‘‘व्हाय नौट, श्योर,’’ सोमसुंदरम बोला.

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इस बीच, सोमू आ गया. बातों में हम ने ध्यान नहीं दिया. वह हमारे लिए कौफी बना कर ले आया. वह भी हमारे बीच बैठ गया. मैं संकोचवश उठने लगी. ‘‘अरे, बैठो रमा, मेरे बेटे को कोई फर्क नहीं पड़ता. वह पहले जैसा तो है नहीं.’’

मैं बोली, ‘‘बच्चों के बिना रहना तो बहुत मुश्किल है.’‘‘हां रे, तू सही कह रही है. पर कुदरत ने मु झे बच्चा दे कर भी मु झ से छीन लिया था. किसी के बच्चे होते ही नहीं हैं. मेरे होने के बावजूद नहीं जैसे हो गया. मैं ने काम में मन लगाया और तरक्की पाती चली गई. एक बार सोमू की बहुत याद आने पर मैं एक हफ्ते की छुट्टी ले कर गई. तो पता चला वे बच्चे को ले कर विदेश चले गए. मैं ने सोचा, वे वापस आ जाएंगे, पर वे फिर नहीं आए.

‘‘मु झे पता ही नहीं चला कि वे कहां गए. बहुत कोशिश की, पर कोई सुराग नहीं मिला‘‘मेरे मम्मीपापा मेरे पास आ गए और मैं अपनी नौकरी के साथसाथ उन का भी ध्यान रखने लगी. समय बीतता गया और एक दिन अचानक पापा को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. मम्मी उन के पीछे उन की याद में

2 साल भी नहीं रहीं. सेवानिवृत्ति के बाद यह मकान खरीद व बना कर तुम्हारे पड़ोस में आ गई. मैं ने किसी से रिश्ता नहीं रखा. मन बहुत ही विरक्त था. मम्मीपापा 2 साल में आगेपीछे जा चुके थे. मैं अकेली हो चुकी थी. यहां आ कर रहने लगी.

‘‘अचानक एक दिन मेरी एक पुरानी सहेली का फोन आया, ‘मेरा बेटा मु झे ढूंढ़ रहा है’ और उस के थोड़ी देर बाद ही मु झे मेरे सोमू का फोन आया, ‘मैं आप का बेटा सोमसुंदरम बोल रहा हूं. मैं आप के पास आना चाहता हूं.’ मेरे आश्चर्य की सीमा न रही.

‘‘जैसा तुम कह रही थीं न, वैसे ही मु झे भी लगा कि कहीं कोई धोखा तो नहीं दे रहा है. मैं ने उसे घर न बुला कर एक होटल में बुलवाया. वहां बात की. तब सारी परतें एकएक कर खुल गईं.’‘‘आंटी, अब मैं घर जाऊंगी, हालांकि, जाने की इच्छा बिलकुल नहीं है. कल धारावाहिक जारी रहेगा,’’ कह कर मैं चल दी.

घर आ कर मैं ने सारा काम किया. वह तो करना ही था. परंतु मेरा मन आंटी की कहानी में ही लगा रहा. यह तो बौलीवुड की कहानी से भी ज्यादा मजेदार थी. आंटी के साथ क्या हुआ, यह जानने के लिए उत्सुक थी और सोमू के बारे में जानने के लिए भी, या दोनों के लिए, यह तो आप डिसाइड करो. फिल्म, कहानी और उपन्यास यह सब भी मानव जीवन के ही तो प्रतिबिंब हैं. दूसरे दिन जल्दीजल्दी काम निबटा कर आंटी के घर पहुंच गई. अब सोमू घर पर है, इस की उत्सुकता ज्यादा थी. मु झे लगा, यह आग एक तरफ की नहीं है. वह भी मु झ से बात करने का मौका तलाशता है. अपनी आग को जब्त करने की मैं कोशिश करती कि इस उम्र में यह ठीक नहीं है. लेकिन मन है कि मानता ही नहीं.

‘‘आओ रमा, आओ. मैं ने अपने बेटे सोमू से कहा कि मैं अपनी कहानी रमा को सुना रही हूं. सोमू ने कहा है, ‘मम्मी, जरूर सुनाओ. लोगों को हमारी कहानी सुन कर कोई शिक्षा मिले, तो बहुत अच्छी बात है, मु झे कोई एतराज नहीं.‘‘अभी अंत बाकी है,’’ आंटी बोलीं‘‘मम्मी, आप आराम से कहानी पूरी कर लो. मैं और अंकल वौलीबौल मैच देखने जा रहे हैं. हम खाना खा कर आएंगे.’’

‘‘अरे वाह, आंटी, आज हम सैलिब्रेट करेंगे,’’ मैं तो चहक उठी, पर ऊपरी तौर से. सोमू के जाने की मु झे खुशी नहीं हो रही थी‘‘रमा, आज हमें भी खाना बनाने की जरूरत नहीं. मेरे बेटे ने हम दोनों के लिए बाहर से ही खाना और्डर कर दिया है.’प्यार और खुशी से मैं ने आंटी को गले लगा लिया.

बढि़या फिल्टर कौफी पी कर हम दोनों आराम से  झूले में बैठ गए. आंटी ने पूछा, ‘‘हम कहां पर थे?’‘‘आंटी, आप ने, धारावाहिक जैसे ही, बड़े रोचक मोड़ पर छोड़ दिया था कि होटल में आप सोमू से मिलीं.’‘‘बिलकुल, रमा. अब मेरी नहीं, बेटे की कहानी शुरू होती है. बेटा वहीं पढ़ कर एक अच्छे पद पर काम करने लगा. अच्छी सैलरी थी. देखने में सोमू बहुत सुंदर था ही, परिवार की कोई रोकटोक नहीं थी. इन बातों से आकर्षित हो कर भारत से आए और वहीं बसे एक परिवार की लड़की नीला ने इस से बात की. सोमू अपने को बहुत अकेला और बिना परिवार का महसूस तो कर ही रहा था. उस के पिता बहुत ड्रिंक करते थे, वे भी चल बसे. उस ने मेरे बारे में जानने की कोशिश की थी. पर उसे कामयाबी नहीं मिली.

‘‘नीला के प्रस्ताव ने तो उसे उस की ओर मोड़ लिया. थोड़े दिन दोनों बहुत खुश रहे. 2 प्यारेप्यारे बच्चे भी हुए. एक बेटा और एक बेटी. पर गृहस्थी की गाड़ी जैसे चलनी चाहिए वैसे न चली और नीला को दूसरे लड़के से प्यार हो गया. उस ने तलाक का निर्णय लिया. केस चला और दोनों बच्चे नीला को मिल गए. यह मेरे जैसे ही अपने जीवन में असफल हो गया. उस के बचाए रुपए भी सब नीला को देने पड़े. बहुत ही निराश हो गया.’’

‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ आंटी.’‘‘हां.’‘‘मेरे बेटे ने मु झे ढूंढ़ने की बहुत कोशिश की. इस तलाक के कारण मु झे ढूंढ़ना बीच में छोड़ दिया था. जब तलाक का काम पूरा हुआ, तब बड़े मनोयोग से उस ने फिर से मु झे ढूंढ़ने का काम जारी रखा.‘‘बहुत मुश्किल था आंटी?’’

‘‘सही कहा. बहुत कोशिश करने के बाद किसी से उस को मेरा मोबाइल नंबर मिला. मु झे तब उस ने फोन किया. वह दिन मेरे लिए अविस्मरणीय है. मु झे तो लगा था,  मेरा कोई नहीं है. किस से मैं अपनी इस खुशी को बांटूं‘‘रमा, दुख को तो फिर भी अकेले सह सकते हैं पर खुशी को जब तक न बांटो, तो खुशी, खुशी नहीं होती. उस समय मैं ने अपनेआप को बहुत अकेला पाया.’’

‘‘मुझ से क्यों नहीं कहा आंटी?’‘‘कैसे कहती? मैं ने तो अपनी कोई बात तुम्हें नहीं बताई थी. तुम्हें ही क्या, किसी को भी नहीं बताई. मैं ने अपनी कहानी अपने मन में ही दफन कर ली थी. अब मेरे बेटे के आने पर जैसे सब बदल गया. मेरी जिंदगी बदल गई.’‘‘वाकई, यह अजूबा से कोई कम नहीं आंटी?’’

‘‘मेरा बेटा विदेश को छोड़ कर आ गया. अब यहीं रहेगा. अपना देश अपना ही होता है. दूर के ढोल सुहाने होते हैं. यही बात सही है. यह बात अब सोमू की सम झ में आ गई. उस के बच्चे जब उस की मां के कहने पर उस से नफरत करने लगे तब ही उस को यह बात सम झ में आई कि मेरी मां के साथ भी यही हुआ होगा और उसे पश्चात्ताप हुआ. ‘अब क्या होत, जब चिडि़या चुग गई खेत’ ऐसा सोचा. पर अब मेरे समय में बेटे का सुख लिखा था. मेरी कोई गलती नहीं थी. कुदरत ने मु झे ये दिन दिखाए. कुछ दिनों पहले भी मैं ने कई बार आत्महत्या करने की सोची. यदि मैं अपनी मंशा में कामयाब हो गई होती तो बेटे का प्रेम, स्नेह कैसे पाती.

‘‘जब जो होना है, किसी न किसी रूप में हो कर रहता है. हमें कर्म करते रहना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए. क्यों रमा, तुम मेरी कहानी सुन कर कुछ सोचने को मजबूर तो हुई होगी?’‘‘हां आंटी, मु झे इसे आत्मसात करने में समय लगेगा. क्या मैं आप की कहानी लिख सकती हूं?’’

‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं रमा, जरूर लिखो. मैं जानती हूं कि तुम एक लेखिका हो. लेखक जो कहता है वह सब कल्पना नहीं होती. वह जो अपने चारों ओर देखता है, सुनता है, महसूस करता है, वह तो लिखता है‘‘रमा, तुम्हें मेरा बेटा कैसा लगा?’मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया‘‘अरे रमा, तुम तो छोटी लड़की जैसी शरमा गईं.’’‘‘मम्मी, अंकल आए हैं, उन्हें आप से कुछ कहना है?’’

‘‘कहिए?’‘‘मैं जो कहने आया था, घर के दरवाजे पर आते ही वह बात आप के मुंह से ही सुन ली. अब मु झे क्या कहना.’‘‘मियांबीवी राजी, तो क्या करेगा काजी,’’ आंटी बोल कर हंस दींसब लोग ठहाका लगा कर हंसने लगे.सोमू बड़े प्रेम से मु झे देखने लगा. मैं बोल पड़ी, ‘‘आज बाहर चलते हैं, आज का डिनर बाहर.’’‘‘व्हाय नौट, श्योर,’’ सोमसुंदरम बोला.

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November 25, 2020 at 10:00AM

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