‘‘आप ने शराब पी है?’’
‘‘हां, पी है तो क्या हुआ? हमारी क्लास में इसे बुरा नहीं समझा जाता. आइंदा इस बारे में कुछ नहीं कहना, न पूछताछ करना.’’
मुझे उस से ऐसे जवाब व लहजे की उम्मीद नहीं थी, पर मैं चुप रही. दूसरे दिन सुबह मेरा भाई, मेरी बहन और मोहल्ले की एक लड़की मेरे लिए नाश्ता ले कर आए. बहनभाई घर देख कर दंग रह गए. हम सब ने मिल कर नाश्ता किया. फिर मेरी बहन ने पूछा, ‘‘शाहनवाज भाई, अगर आप इजाजत दें तो बाजी को हम साथ ले जाएं?’’
शाहनवाज ने खुशी से इजाजत दे दी. मैं घर पहुंची तो औरतों की भीड़ लग गई. कोई कपड़े देखती तो कोई जेवर देखती. सब तारीफ करती रहीं, अम्मा खुश होती रही.
शाम को शाहनवाज को लेने आना था. अम्मा ने रात के खाने का अच्छा इंतजाम किया. रशीद ने सामान लाने का जिम्मा खुद उठा लिया. वह 3-4 आइटम खुद ही बाजार से ले कर आ गया. उस ने मुझ से कोई बात नहीं की, नजरें झुका कर देखता रहा.
जब शाहनवाज आया तो मोहल्ले के बच्चे उस की गाड़ी घेर कर शोर मचाने लगे. उन के लिए यह बड़ी चीज थी. यह देख कर शाहनवाज को गुस्सा आ गया. वह चीख कर बोला, ‘‘अब कभी इस चिडि़याखाने में नहीं आऊंगा. बडे़ बेहूदा बच्चे हैं, इस मोहल्ले के.’’
उसी वक्त रशीद भी आ गया. उस ने रशीद से हाथ मिलाने के बजाय उस का हाथ झटक दिया. शाहनवाज ने अब्बा से पूछा, ‘‘ये साहब कौन हैं?’’
अब्बा ने कहा, ‘‘बेटा ही समझो, बचपन से घर आताजाता है.’’
‘‘अच्छा, तुम वही हो जो महताब की शादी में हुस्ना को छोड़ने आए थे. उस दिन किस की गाड़ी चुरा कर लाए थे?’’
‘‘साहब, हम गरीब जरूर हैं पर शरीफ हैं. चोरी नहीं करते. आप बेवजह मुझ पर इलजाम लगा रहे हैं. चोर वो होते हैं जो गरीबों की दौलत समेट कर अमीर बनते हैं.’’
वह तन कर खड़ा हो गया और गुस्से में बोला, ‘‘अब मैं यहां एक मिनट नहीं रुक सकता, जहां बाहर के लोग मेरी बेइज्जती करें, चलो.’’
ऐसा लग रहा था जैसे वह पहले से ही यह सब सोच कर आया था. सब रोकते रह गए. शाहनवाज मेरा हाथ पकड़ कर मुझे घर ले कर आ गया. घर पहुंच कर मैं ने कहा, ‘‘ये आप को क्या हो गया था? आप ने सब की बेइज्जती कर दी.’’
‘‘बेइज्जती होती है इज्जत वालों की. तुम तो कह रही थीं, रशीद तुम्हारा भाई है.’’
‘‘हां, हम उसे अपना भाई ही समझते हैं.’’
‘‘खैर, आज के बाद तुम घर वालों से और रशीद से कोई ताल्लुक नहीं रखोगी. न तुम वहां जाओगी, न वहां से यहां कोई आएगा.’’
यह छोटी बात नहीं थी. मैं शाहनवाज से खूब लड़ी. बड़ी मुश्किल से वह इस बात पर राजी हुआ कि कभीकभी वह खुद मुझे मां से मिला कर ले आएगा. लेकिन अकेले नहीं जाने देगा.
शाहनवाज मुझे प्यार दे रहा था. इतने नाज उठा रहा था कि मैं ने उस की यह शर्त भी मंजूर कर ली. 2 महीने बड़े आराम से गुजरे. वह मुझे एक बार अम्मा से मिला कर ले आया. फिर एक दिन बोला, ‘‘हमें ये कोठी छोड़ कर फ्लैट में जाना है.’’
मुझे पहली बार मालूम हुआ कि ये कोठी किराए की थी. मुझे इतना अच्छा घर छोड़ने का दुख तो हुआ पर फ्लैट भी बहुत शानदार था. वह भी किराए का था. फ्लैट में आ कर मुझे शाहनवाज ज्यादा मुतमइन दिख रहा था. वह सारा दिन बाहर मसरूफ रहता था. मैं ने एक दिन पूछ लिया, ‘‘आप तो कहते थे, आप कोई काम नहीं करते. फिर सारा दिन कहां गायब रहते हो?’’
वह गुस्से से बोला, ‘‘ये सब बातें तुम्हें जानने की जरूरत नहीं है कि मैं क्या करता हूं?’’
‘‘मैं तो सिर्फ पूछ रही हूं, रोक नहीं रही.’’
‘‘मैं तुम पर बहुत पैसे खर्च कर चुका हूं. उसे वसूल करने के जुगाड़ में लगा हूं.’’
उस की बात मेरी समझ में नहीं आई पर मैं चुप रही, ज्यादा पूछो तो चिढ़ जाता था.
एक दिन उस ने मुझे तैयार होने को कहा और एक शानदार पार्टी में ले कर आ गया. शादी के बाद वह मुझे पहली बार कहीं ले कर निकला था. इस पार्टी में बड़ी बेशर्मी व बेहूदगी थी. सब शराब पी रहे थे. डांस कर रहे थे. मुझे कुछ ठीक नहीं लगा. मैं ने शाहनवाज से कहा, ‘‘यहां से चलिए, मेरा दिल घबरा रहा है.’’
‘‘थोड़ी देर में सब ठीक लगेगा. मेरे साथ रहना है तो ऐसी पार्टियों की आदत डाल लो.’’
मैं डर कर चुप हो गई. मैं रशीद को मनमाना सुना सकती थी, शाहनवाज को नहीं. मैं ने पहले कभी शराब नहीं पी थी, पर उस रात शाहनवाज ने मुझे जिद कर के शराब पिला दी. मेरी हालत खराब हो गई. जब मुझे होश आया तो एक अजनबी मेरे साथ था. घर खाली पड़ा था, मैं घबरा कर उठी और उस से पूछा, ‘‘शाहनवाज कहां है?’’
‘‘अभी आता ही होगा. पहले तुम फ्रैश हो लो.’’ अजनबी ने बेफिक्री से जवाब दिया.
मैं अपनी तकदीर पर आंसू बहाने लगी. मेरा मुहाफिज ही मेरा लुटेरा बन गया. शाहनवाज आया तो मैं दौड़ कर उस से लिपट गई. ये मेरा भोलापन था, मैं अभी भी उसे अपना मुहाफिज समझ रही थी.
‘‘शाबाश, वेलडन. आओ, चलो घर चलें.’’
अपने फ्लैट पर पहुंच कर मैं अपनी बेबसी पर फूटफूट कर रो पड़ी. वह मेरे पास आ कर बोला, ‘‘रोती क्यों हो, इसे हमारी क्लास में बुरा नहीं समझते.’’
‘‘ये गलत है.’’
‘‘इस से ताल्लुकात बनते हैं और काम निकाले जाते हैं.’’
मैं ने गुस्से से कहा, ‘‘मैं अपने घर जा रही हूं.’’
‘‘उस घर में जहां रशीद होता है. बेकरार क्यों होती हो, मैं यहीं तुम्हें कई रशीद ला दूंगा.’’
‘‘मैं देखती हूं, तुम मुझे जाने से कैसे रोकते हो?’’
उस ने मुझे चंद तसवीरें दिखाईं, जिन में मैं उस अजनबी के साथ गंदी हालत में थी.
‘‘अगर तुम ने कदम बाहर निकाला तो सब तसवीरें अखबारों में आ जाएंगी. फिर तुम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी और तुम्हारे मांबाप बेमौत मर जाएंगे. बहन घर बैठी रह जाएगी.’’
‘‘बस करो शाहनवाज, रहम करो मुझ पर.’’
‘‘ठीक है, मैं जो कहता हूं, चुपचाप करती रहो.’’
बदनामी के डर ने मुझे खामोश कर दिया. इस का कारोबार अब मेरी समझ में आया वह गरीब लड़कियों से शादी करता था और उन से दौलत कमाता था. वह अकेला नहीं था, पूरा एक गिरोह था. शाहनवाज उस का एक मेंबर था. ये सब मुझे उस वक्त पता चला, जब वह मुझे इस फ्लैट से दूसरे फ्लैट ले कर गया. वहां मेरे जैसी खूबसूरत 4 लड़कियां और थीं.
यहां पहुंच कर मालूम हुआ कि उस का ये धंधा बड़े पैमाने पर चलता है. कितने ही बड़े व नामवर लोग उस के यहां आते थे. लड़कियां उन के पास जातीं, इन बड़े व सरकारी लोगों की उस पर मेहरबानी थी, जिन की वजह से उस का कुछ नहीं होता था.
लड़कियां इस गोरखधंधे में मकड़ी के जाले में मक्खी की तरह फंसी हुई थीं. हम लोगों के कुछ खास फोन नंबर थे, जो हर एक को नहीं बताए जाते थे. कोई कस्टमर फोन करता, किसी खास नाम का हवाला देता, जो शाहनवाज तय करता था. फिर दूसरे फोन से काल कन्फर्म की जाती थी. इस बारे में इलाके के थानेदार को बताया जाता कि लड़की कहां भेजी जा रही है. बहुत ही सावधानी से सारा इंतजाम किया जाता था.
इस काम के लिए पुलिस वालों की रकम तय थी. मैं ने ऐसेऐसे लोगों को वहां देखा कि नाम ले देती तो जिंदा भी नहीं बचती. इतने असरदार लोगों के पास से भाग निकलना मेरे पूरे घर को मौत की दावत देना था.
मैं ने इस जिंदगी को नसीब समझ कर कबूल कर लिया. कभीकभी घर चली जाती. मेरे गरीब मांबाप मेरे कपड़े व गाड़ी देख कर खूब खुश थे. दिल चाहता पैसों से उन की मदद करूं, मगर ये हराम की कमाई देने को दिल नहीं मानता था.
रशीद को देख कर अफसोस होता. वह उदास अकेला उसी तरह मेरे मांबाप की मदद करता रहा. काश! मैं ने रशीद से शादी कर ली होती तो आज कितनी सुखी होती. वह सच कहता था कि हर चमकती चीज सोना नहीं होती.
अब तो अपने आप से शर्म आने लगी थी. मुझे मांबाप को न आने की वजह बताने में मुश्किल होने लगी थी. कभीकभी लगता कि सच कह दूं लेकिन हिम्मत नहीं होती. आखिरकार मैं ने घर में मशहूर कर दिया कि मैं अमेरिका जा रही हूं. इस तरह अपने घर वालों की नजरों में हमेशा के लिए अमेरिका चली गई.
कुछ दिनों से शाहनवाज बहुत परेशान नजर आ रहा था. कई बार फोन पर उसे धमकियां मिलती थीं. गिरोह के लोगों का आनाजाना और मीटिंग बहुत बढ़ गई थी. बड़े लोगों से अकेले में खूब बहस होती. इन बातों से मुझे मालूम हो गया कि मामला बहुत गंभीर है.
आखिर एक दिन सच्चाई सामने आ गई. पता चला कि दूसरे शहर से एक असरदार आदमी ने उस इलाके में आ कर यही धंधा शुरू कर दिया था. जिन्हें शाहनवाज पैसे भरता था, उन से यह मुहायदा था कि यहां कोई दूसरा यह कारोबार नहीं करेगा. अब जब उस रसूखदार ने धंधा शुरू कर दिया, पैसे खाने वालों ने हाथ खड़े कर दिए, क्योंकि उस आदमी का दबदबा और दहशत बहुत ज्यादा थी. उस का गिरोह भी शातिर था.
मैं 4 सालों से शाहनवाज के साथ थी. इतना तो जानती थी कि गैंगवार के नतीजे क्या हो सकते हैं. एक दिन विरोधी गुट ने हमारे फ्लैट पर हमला कर दिया. यहां भी सब तैयार बैठे थे. दोनों तरफ से खूब गोलियां चलीं. शुक्र है कोई मरा नहीं. केवल 1-2 लोग घायल हुए.
‘‘ये तो केवल एक ट्रेलर था, असल जंग तो बाद में शुरू होगी.’’ शाहनवाज के एक साथी ने कहा.
शाहनवाज ने चिंता से कहा, ‘‘फैसला हमारे हक में नहीं होगा. क्योंकि पुलिस और बड़े लोग अब हमारे साथ नहीं हैं.’’
‘‘तो क्या हम मैदान छोड़ देंगे बौस?’’
‘‘अक्लमंदी इसी में है, कोई दूसरा मजबूत सहारा मिलने के बाद फिर नए जोश से खड़े होंगे.’’
शाहनवाज का इरादा वह जगह छोड़ देने का था, पर उसी रात को पुलिस का छापा पड़ गया. शाहनवाज और उस के साथी भाग निकले. हम 4 लड़कियां पुलिस के हत्थे चढ़ गईं. अखबार व मीडिया को एक रंगीन कहानी मिल गई. हमारी तसवीरें अखबार व टीवी का मसाला बन गईं.
हमें थाने ले जाया गया. फिर जेल में डाल दिया गया. वहां भी वही अफसर थे, जो हमारे यहां आते थे. हमें ठीक से रखा गया था. मैं रोरो कर बेहाल थी. ये खबर मेरे घर तक पहुंच गई थी. उन का क्या हाल होगा.
मैं यहां से निकल कर कैसे मुंह दिखाऊंगी. खुदकुशी कर लूं तो रुसवाई कम नहीं होगी. हम जैसी लड़कियों से मिलने कौन आता है? लेकिन मुझे हैरत हुई, रशीद मुझ से मिलने आया. मैं ने कहा, ‘‘तुम यहां क्यों आए हो? मैं तुम्हें मुंह दिखाने के काबिल नहीं रही.’’
‘‘नहीं, ऐसा न कहो, यह तो एक हादसा है जो किसी के भी साथ हो सकता है. तुम परेशान न हो.’’
‘‘सब घर वाले क्या कहते हैं, मेरे बारे में?’’
‘‘कुछ नहीं, बस तुम जल्दी से घर आ जाओ.’’
‘‘मैं यहां से निकल कर घर नहीं आ सकती.’’
‘‘पागल मत बनो, जब मैं हूं तो फिक्र न करो.’’
‘‘तुम नहीं जानते, ये लोग कितने खतरनाक हैं. शाहनवाज मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा.’’
‘‘वह सब बाद में देखा जाएगा. अगर यह मुकदमा अदालत में गया तो अच्छा वकील कर के मैं तुम्हारा केस लड़ूंगा.’’
वकील करने की नौबत नहीं आई. एक महीने बाद हमें बिना कोई मुकदमा चलाए छोड़ दिया गया. उन लोगों में कुछ सांठगांठ हुई थी. मैं जेल से बाहर निकली तो शाहनवाज किसी बहुत इज्जतदार शहरी की तरह हमें लेने आया. मालूम हुआ इस की कोशिशों से रिहा हुई थी.
मैं सोचती रही कि कब शाहनवाज जैसे मुलजिम सजा पाएंगे. वह एक दिन भी जेल में नहीं रहा. उस के आकाओं ने उसे बचा लिया था. हम चारों को वह फिर अपने फ्लैट की तरफ ले जा रहा था. अभी हम ने क्लिफ्टन का पुल पार किया ही था कि चारों तरफ से गाड़ी पर गोलियों की बौछार होने लगी.
मैं होश में आई तो अस्पताल में एडमिट थी. वहां मालूम पड़ा शाहनवाज और 2 लड़कियों ने अस्पताल पहुंचने से पहले दम तोड़ दिया था. एक गोली मेरे बाजू में लगी थी पर हड्डी सलामत थी. एक बार खबरों व टीवी पर हमारी तसवीरें आने लगीं. दुनिया का कानून तो मुझे रिहाई न दिला सका, पर कुदरत ने मुझे आजादी दे दी.
रशीद मुझे अस्पताल में देखने आया. एक बार फिर पुलिस मेरा बयान लेने आ गई. मेरा बयान व फोटो फिर चर्चा का विषय बन गया. मैं काफी ठीक थी फिर भी पुलिस डिस्चार्ज करवाने में देर कर रही थी. रशीद की कोशिशों से मैं डिस्चार्ज हो गई.
यह मेरी खुशकिस्मती थी कि मेरे घर वालों ने मुझे धिक्कारा नहीं, बल्कि मुझे कबूल कर लिया. नहीं तो मेरे पास खुदकुशी के अलावा कोई रास्ता नहीं था. मैं ने अपनी इद्दत के दिन मांबाप के प्यार के साए में गुजारे. उस के बाद फिर मेरे घर में रशीद से मेरी शादी का जिक्र छिड़ गया.
मेरे मांबाप की मजबूरी मेरी हालत और अपनी मोहब्बत की खातिर रशीद मुझे सहारा देने को तैयार हो गया. लेकिन अब मैं अपने आप को उस महान आदमी के लायक नहीं समझती थी. कहां वह सीधासच्चा इंसान और कहां मैं गुनाहों के कीचड़ में लिथड़ी हुई एक बदनाम औरत.
मैं ने इनकार कर दिया. उस के सामने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘रशीद तुम मुझे अपनी ही नजरों में मत गिराओ. मैं कीचड़ में पड़ा मुरझाया, नोचाखसोटा हुआ फूल हूं. मुझे हाथ लगाओगे तो तुम खुद गंदे हो जाओगे. मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूं. मैं तुम्हारी नौकरानी बनने के लायक भी नहीं, तुम शायद मेरे नसीब में न थे, तभी तो मैं ने हीरा ठुकरा कर पत्थर चुना था. अब मैं ठुकराए जाने के लायक हूं.’’
आज भी रशीद मेरे घर की चौखट पकड़े बैठा है. वह जब भी आता है, मैं उस की नौकरानी की तरह खिदमत करती हूं. उस के आगेपीछे घूमती हूं. दुआ करिए, मैं जिंदगी में उसे वह खुशी दे सकूं, जो उस की दिली तमन्ना है.
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‘‘आप ने शराब पी है?’’
‘‘हां, पी है तो क्या हुआ? हमारी क्लास में इसे बुरा नहीं समझा जाता. आइंदा इस बारे में कुछ नहीं कहना, न पूछताछ करना.’’
मुझे उस से ऐसे जवाब व लहजे की उम्मीद नहीं थी, पर मैं चुप रही. दूसरे दिन सुबह मेरा भाई, मेरी बहन और मोहल्ले की एक लड़की मेरे लिए नाश्ता ले कर आए. बहनभाई घर देख कर दंग रह गए. हम सब ने मिल कर नाश्ता किया. फिर मेरी बहन ने पूछा, ‘‘शाहनवाज भाई, अगर आप इजाजत दें तो बाजी को हम साथ ले जाएं?’’
शाहनवाज ने खुशी से इजाजत दे दी. मैं घर पहुंची तो औरतों की भीड़ लग गई. कोई कपड़े देखती तो कोई जेवर देखती. सब तारीफ करती रहीं, अम्मा खुश होती रही.
शाम को शाहनवाज को लेने आना था. अम्मा ने रात के खाने का अच्छा इंतजाम किया. रशीद ने सामान लाने का जिम्मा खुद उठा लिया. वह 3-4 आइटम खुद ही बाजार से ले कर आ गया. उस ने मुझ से कोई बात नहीं की, नजरें झुका कर देखता रहा.
जब शाहनवाज आया तो मोहल्ले के बच्चे उस की गाड़ी घेर कर शोर मचाने लगे. उन के लिए यह बड़ी चीज थी. यह देख कर शाहनवाज को गुस्सा आ गया. वह चीख कर बोला, ‘‘अब कभी इस चिडि़याखाने में नहीं आऊंगा. बडे़ बेहूदा बच्चे हैं, इस मोहल्ले के.’’
उसी वक्त रशीद भी आ गया. उस ने रशीद से हाथ मिलाने के बजाय उस का हाथ झटक दिया. शाहनवाज ने अब्बा से पूछा, ‘‘ये साहब कौन हैं?’’
अब्बा ने कहा, ‘‘बेटा ही समझो, बचपन से घर आताजाता है.’’
‘‘अच्छा, तुम वही हो जो महताब की शादी में हुस्ना को छोड़ने आए थे. उस दिन किस की गाड़ी चुरा कर लाए थे?’’
‘‘साहब, हम गरीब जरूर हैं पर शरीफ हैं. चोरी नहीं करते. आप बेवजह मुझ पर इलजाम लगा रहे हैं. चोर वो होते हैं जो गरीबों की दौलत समेट कर अमीर बनते हैं.’’
वह तन कर खड़ा हो गया और गुस्से में बोला, ‘‘अब मैं यहां एक मिनट नहीं रुक सकता, जहां बाहर के लोग मेरी बेइज्जती करें, चलो.’’
ऐसा लग रहा था जैसे वह पहले से ही यह सब सोच कर आया था. सब रोकते रह गए. शाहनवाज मेरा हाथ पकड़ कर मुझे घर ले कर आ गया. घर पहुंच कर मैं ने कहा, ‘‘ये आप को क्या हो गया था? आप ने सब की बेइज्जती कर दी.’’
‘‘बेइज्जती होती है इज्जत वालों की. तुम तो कह रही थीं, रशीद तुम्हारा भाई है.’’
‘‘हां, हम उसे अपना भाई ही समझते हैं.’’
‘‘खैर, आज के बाद तुम घर वालों से और रशीद से कोई ताल्लुक नहीं रखोगी. न तुम वहां जाओगी, न वहां से यहां कोई आएगा.’’
यह छोटी बात नहीं थी. मैं शाहनवाज से खूब लड़ी. बड़ी मुश्किल से वह इस बात पर राजी हुआ कि कभीकभी वह खुद मुझे मां से मिला कर ले आएगा. लेकिन अकेले नहीं जाने देगा.
शाहनवाज मुझे प्यार दे रहा था. इतने नाज उठा रहा था कि मैं ने उस की यह शर्त भी मंजूर कर ली. 2 महीने बड़े आराम से गुजरे. वह मुझे एक बार अम्मा से मिला कर ले आया. फिर एक दिन बोला, ‘‘हमें ये कोठी छोड़ कर फ्लैट में जाना है.’’
मुझे पहली बार मालूम हुआ कि ये कोठी किराए की थी. मुझे इतना अच्छा घर छोड़ने का दुख तो हुआ पर फ्लैट भी बहुत शानदार था. वह भी किराए का था. फ्लैट में आ कर मुझे शाहनवाज ज्यादा मुतमइन दिख रहा था. वह सारा दिन बाहर मसरूफ रहता था. मैं ने एक दिन पूछ लिया, ‘‘आप तो कहते थे, आप कोई काम नहीं करते. फिर सारा दिन कहां गायब रहते हो?’’
वह गुस्से से बोला, ‘‘ये सब बातें तुम्हें जानने की जरूरत नहीं है कि मैं क्या करता हूं?’’
‘‘मैं तो सिर्फ पूछ रही हूं, रोक नहीं रही.’’
‘‘मैं तुम पर बहुत पैसे खर्च कर चुका हूं. उसे वसूल करने के जुगाड़ में लगा हूं.’’
उस की बात मेरी समझ में नहीं आई पर मैं चुप रही, ज्यादा पूछो तो चिढ़ जाता था.
एक दिन उस ने मुझे तैयार होने को कहा और एक शानदार पार्टी में ले कर आ गया. शादी के बाद वह मुझे पहली बार कहीं ले कर निकला था. इस पार्टी में बड़ी बेशर्मी व बेहूदगी थी. सब शराब पी रहे थे. डांस कर रहे थे. मुझे कुछ ठीक नहीं लगा. मैं ने शाहनवाज से कहा, ‘‘यहां से चलिए, मेरा दिल घबरा रहा है.’’
‘‘थोड़ी देर में सब ठीक लगेगा. मेरे साथ रहना है तो ऐसी पार्टियों की आदत डाल लो.’’
मैं डर कर चुप हो गई. मैं रशीद को मनमाना सुना सकती थी, शाहनवाज को नहीं. मैं ने पहले कभी शराब नहीं पी थी, पर उस रात शाहनवाज ने मुझे जिद कर के शराब पिला दी. मेरी हालत खराब हो गई. जब मुझे होश आया तो एक अजनबी मेरे साथ था. घर खाली पड़ा था, मैं घबरा कर उठी और उस से पूछा, ‘‘शाहनवाज कहां है?’’
‘‘अभी आता ही होगा. पहले तुम फ्रैश हो लो.’’ अजनबी ने बेफिक्री से जवाब दिया.
मैं अपनी तकदीर पर आंसू बहाने लगी. मेरा मुहाफिज ही मेरा लुटेरा बन गया. शाहनवाज आया तो मैं दौड़ कर उस से लिपट गई. ये मेरा भोलापन था, मैं अभी भी उसे अपना मुहाफिज समझ रही थी.
‘‘शाबाश, वेलडन. आओ, चलो घर चलें.’’
अपने फ्लैट पर पहुंच कर मैं अपनी बेबसी पर फूटफूट कर रो पड़ी. वह मेरे पास आ कर बोला, ‘‘रोती क्यों हो, इसे हमारी क्लास में बुरा नहीं समझते.’’
‘‘ये गलत है.’’
‘‘इस से ताल्लुकात बनते हैं और काम निकाले जाते हैं.’’
मैं ने गुस्से से कहा, ‘‘मैं अपने घर जा रही हूं.’’
‘‘उस घर में जहां रशीद होता है. बेकरार क्यों होती हो, मैं यहीं तुम्हें कई रशीद ला दूंगा.’’
‘‘मैं देखती हूं, तुम मुझे जाने से कैसे रोकते हो?’’
उस ने मुझे चंद तसवीरें दिखाईं, जिन में मैं उस अजनबी के साथ गंदी हालत में थी.
‘‘अगर तुम ने कदम बाहर निकाला तो सब तसवीरें अखबारों में आ जाएंगी. फिर तुम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी और तुम्हारे मांबाप बेमौत मर जाएंगे. बहन घर बैठी रह जाएगी.’’
‘‘बस करो शाहनवाज, रहम करो मुझ पर.’’
‘‘ठीक है, मैं जो कहता हूं, चुपचाप करती रहो.’’
बदनामी के डर ने मुझे खामोश कर दिया. इस का कारोबार अब मेरी समझ में आया वह गरीब लड़कियों से शादी करता था और उन से दौलत कमाता था. वह अकेला नहीं था, पूरा एक गिरोह था. शाहनवाज उस का एक मेंबर था. ये सब मुझे उस वक्त पता चला, जब वह मुझे इस फ्लैट से दूसरे फ्लैट ले कर गया. वहां मेरे जैसी खूबसूरत 4 लड़कियां और थीं.
यहां पहुंच कर मालूम हुआ कि उस का ये धंधा बड़े पैमाने पर चलता है. कितने ही बड़े व नामवर लोग उस के यहां आते थे. लड़कियां उन के पास जातीं, इन बड़े व सरकारी लोगों की उस पर मेहरबानी थी, जिन की वजह से उस का कुछ नहीं होता था.
लड़कियां इस गोरखधंधे में मकड़ी के जाले में मक्खी की तरह फंसी हुई थीं. हम लोगों के कुछ खास फोन नंबर थे, जो हर एक को नहीं बताए जाते थे. कोई कस्टमर फोन करता, किसी खास नाम का हवाला देता, जो शाहनवाज तय करता था. फिर दूसरे फोन से काल कन्फर्म की जाती थी. इस बारे में इलाके के थानेदार को बताया जाता कि लड़की कहां भेजी जा रही है. बहुत ही सावधानी से सारा इंतजाम किया जाता था.
इस काम के लिए पुलिस वालों की रकम तय थी. मैं ने ऐसेऐसे लोगों को वहां देखा कि नाम ले देती तो जिंदा भी नहीं बचती. इतने असरदार लोगों के पास से भाग निकलना मेरे पूरे घर को मौत की दावत देना था.
मैं ने इस जिंदगी को नसीब समझ कर कबूल कर लिया. कभीकभी घर चली जाती. मेरे गरीब मांबाप मेरे कपड़े व गाड़ी देख कर खूब खुश थे. दिल चाहता पैसों से उन की मदद करूं, मगर ये हराम की कमाई देने को दिल नहीं मानता था.
रशीद को देख कर अफसोस होता. वह उदास अकेला उसी तरह मेरे मांबाप की मदद करता रहा. काश! मैं ने रशीद से शादी कर ली होती तो आज कितनी सुखी होती. वह सच कहता था कि हर चमकती चीज सोना नहीं होती.
अब तो अपने आप से शर्म आने लगी थी. मुझे मांबाप को न आने की वजह बताने में मुश्किल होने लगी थी. कभीकभी लगता कि सच कह दूं लेकिन हिम्मत नहीं होती. आखिरकार मैं ने घर में मशहूर कर दिया कि मैं अमेरिका जा रही हूं. इस तरह अपने घर वालों की नजरों में हमेशा के लिए अमेरिका चली गई.
कुछ दिनों से शाहनवाज बहुत परेशान नजर आ रहा था. कई बार फोन पर उसे धमकियां मिलती थीं. गिरोह के लोगों का आनाजाना और मीटिंग बहुत बढ़ गई थी. बड़े लोगों से अकेले में खूब बहस होती. इन बातों से मुझे मालूम हो गया कि मामला बहुत गंभीर है.
आखिर एक दिन सच्चाई सामने आ गई. पता चला कि दूसरे शहर से एक असरदार आदमी ने उस इलाके में आ कर यही धंधा शुरू कर दिया था. जिन्हें शाहनवाज पैसे भरता था, उन से यह मुहायदा था कि यहां कोई दूसरा यह कारोबार नहीं करेगा. अब जब उस रसूखदार ने धंधा शुरू कर दिया, पैसे खाने वालों ने हाथ खड़े कर दिए, क्योंकि उस आदमी का दबदबा और दहशत बहुत ज्यादा थी. उस का गिरोह भी शातिर था.
मैं 4 सालों से शाहनवाज के साथ थी. इतना तो जानती थी कि गैंगवार के नतीजे क्या हो सकते हैं. एक दिन विरोधी गुट ने हमारे फ्लैट पर हमला कर दिया. यहां भी सब तैयार बैठे थे. दोनों तरफ से खूब गोलियां चलीं. शुक्र है कोई मरा नहीं. केवल 1-2 लोग घायल हुए.
‘‘ये तो केवल एक ट्रेलर था, असल जंग तो बाद में शुरू होगी.’’ शाहनवाज के एक साथी ने कहा.
शाहनवाज ने चिंता से कहा, ‘‘फैसला हमारे हक में नहीं होगा. क्योंकि पुलिस और बड़े लोग अब हमारे साथ नहीं हैं.’’
‘‘तो क्या हम मैदान छोड़ देंगे बौस?’’
‘‘अक्लमंदी इसी में है, कोई दूसरा मजबूत सहारा मिलने के बाद फिर नए जोश से खड़े होंगे.’’
शाहनवाज का इरादा वह जगह छोड़ देने का था, पर उसी रात को पुलिस का छापा पड़ गया. शाहनवाज और उस के साथी भाग निकले. हम 4 लड़कियां पुलिस के हत्थे चढ़ गईं. अखबार व मीडिया को एक रंगीन कहानी मिल गई. हमारी तसवीरें अखबार व टीवी का मसाला बन गईं.
हमें थाने ले जाया गया. फिर जेल में डाल दिया गया. वहां भी वही अफसर थे, जो हमारे यहां आते थे. हमें ठीक से रखा गया था. मैं रोरो कर बेहाल थी. ये खबर मेरे घर तक पहुंच गई थी. उन का क्या हाल होगा.
मैं यहां से निकल कर कैसे मुंह दिखाऊंगी. खुदकुशी कर लूं तो रुसवाई कम नहीं होगी. हम जैसी लड़कियों से मिलने कौन आता है? लेकिन मुझे हैरत हुई, रशीद मुझ से मिलने आया. मैं ने कहा, ‘‘तुम यहां क्यों आए हो? मैं तुम्हें मुंह दिखाने के काबिल नहीं रही.’’
‘‘नहीं, ऐसा न कहो, यह तो एक हादसा है जो किसी के भी साथ हो सकता है. तुम परेशान न हो.’’
‘‘सब घर वाले क्या कहते हैं, मेरे बारे में?’’
‘‘कुछ नहीं, बस तुम जल्दी से घर आ जाओ.’’
‘‘मैं यहां से निकल कर घर नहीं आ सकती.’’
‘‘पागल मत बनो, जब मैं हूं तो फिक्र न करो.’’
‘‘तुम नहीं जानते, ये लोग कितने खतरनाक हैं. शाहनवाज मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा.’’
‘‘वह सब बाद में देखा जाएगा. अगर यह मुकदमा अदालत में गया तो अच्छा वकील कर के मैं तुम्हारा केस लड़ूंगा.’’
वकील करने की नौबत नहीं आई. एक महीने बाद हमें बिना कोई मुकदमा चलाए छोड़ दिया गया. उन लोगों में कुछ सांठगांठ हुई थी. मैं जेल से बाहर निकली तो शाहनवाज किसी बहुत इज्जतदार शहरी की तरह हमें लेने आया. मालूम हुआ इस की कोशिशों से रिहा हुई थी.
मैं सोचती रही कि कब शाहनवाज जैसे मुलजिम सजा पाएंगे. वह एक दिन भी जेल में नहीं रहा. उस के आकाओं ने उसे बचा लिया था. हम चारों को वह फिर अपने फ्लैट की तरफ ले जा रहा था. अभी हम ने क्लिफ्टन का पुल पार किया ही था कि चारों तरफ से गाड़ी पर गोलियों की बौछार होने लगी.
मैं होश में आई तो अस्पताल में एडमिट थी. वहां मालूम पड़ा शाहनवाज और 2 लड़कियों ने अस्पताल पहुंचने से पहले दम तोड़ दिया था. एक गोली मेरे बाजू में लगी थी पर हड्डी सलामत थी. एक बार खबरों व टीवी पर हमारी तसवीरें आने लगीं. दुनिया का कानून तो मुझे रिहाई न दिला सका, पर कुदरत ने मुझे आजादी दे दी.
रशीद मुझे अस्पताल में देखने आया. एक बार फिर पुलिस मेरा बयान लेने आ गई. मेरा बयान व फोटो फिर चर्चा का विषय बन गया. मैं काफी ठीक थी फिर भी पुलिस डिस्चार्ज करवाने में देर कर रही थी. रशीद की कोशिशों से मैं डिस्चार्ज हो गई.
यह मेरी खुशकिस्मती थी कि मेरे घर वालों ने मुझे धिक्कारा नहीं, बल्कि मुझे कबूल कर लिया. नहीं तो मेरे पास खुदकुशी के अलावा कोई रास्ता नहीं था. मैं ने अपनी इद्दत के दिन मांबाप के प्यार के साए में गुजारे. उस के बाद फिर मेरे घर में रशीद से मेरी शादी का जिक्र छिड़ गया.
मेरे मांबाप की मजबूरी मेरी हालत और अपनी मोहब्बत की खातिर रशीद मुझे सहारा देने को तैयार हो गया. लेकिन अब मैं अपने आप को उस महान आदमी के लायक नहीं समझती थी. कहां वह सीधासच्चा इंसान और कहां मैं गुनाहों के कीचड़ में लिथड़ी हुई एक बदनाम औरत.
मैं ने इनकार कर दिया. उस के सामने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘रशीद तुम मुझे अपनी ही नजरों में मत गिराओ. मैं कीचड़ में पड़ा मुरझाया, नोचाखसोटा हुआ फूल हूं. मुझे हाथ लगाओगे तो तुम खुद गंदे हो जाओगे. मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूं. मैं तुम्हारी नौकरानी बनने के लायक भी नहीं, तुम शायद मेरे नसीब में न थे, तभी तो मैं ने हीरा ठुकरा कर पत्थर चुना था. अब मैं ठुकराए जाने के लायक हूं.’’
आज भी रशीद मेरे घर की चौखट पकड़े बैठा है. वह जब भी आता है, मैं उस की नौकरानी की तरह खिदमत करती हूं. उस के आगेपीछे घूमती हूं. दुआ करिए, मैं जिंदगी में उसे वह खुशी दे सकूं, जो उस की दिली तमन्ना है.
The post पश्चाताप के आंसू-भाग 4 : शाहनवाज ने हुस्ना के साथ क्या किया appeared first on Sarita Magazine.
October 22, 2020 at 10:00AM
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