Monday, 3 August 2020

कल्पवृक्ष-भाग 4 : विवाह के समय सभी व्यंग क्यों कर रहे थे?

लेखिका- छाया श्रीवास्तव

‘‘तो ठहरिए साहब, हम बाजार से दूसरे ले कर आते हैं, तब तक ठहरना होगा,’’ मुकेश उठता हुआ बोला.

‘‘नहीं, भाईसाहब. आप बैठिए, अंदर से तो आ रहे हैं थाल.’’

‘‘अरे, ये सब तो शगुन के थाल आदि लड़की वाले के यहां से ही आते हैं, थोड़ा रुक लेते हैं.’’

‘‘नहीं भैया, मैं यह सब अब न ले सकूंगा. जो लिस्ट आप लोगों ने बना कर भेजी थी और जो ये लोग देने वाले हैं. आप जानते ही हैं कि लड़कियों को अपने मायके की एकएक चीज कितनी प्यारी होती है, परंतु जिस घर में ऐसी उदारमना स्त्री हो जो खुशी से अपना सारा दहेज खुद दान कर रही हो उसे ले कर मैं उस उदार स्त्री से छोटा नहीं बन सकता. इस से मैं इन कपड़ों आदि के अलावा अब कोई कोई चीज स्वीकार नहीं करूंगा. मैं अब इस के अलावा आगे कुछ नहीं लूंगा. बिना दहेज के ही उस घर की बेटी ब्याह कर लाऊंगा.

‘‘मैं तो पहले ही भैया, जीजाजी से अनुरोध कर रहा था कि इतना लंबाचौड़ा दहेज मांग कर कन्यापक्ष को आफत में न डालें. अब जो हुआ सो हुआ, आगे कोई मु झे विवश न करे. बस, ये लोग साथ गए बरातियों का अच्छा स्वागत कर दें, वही काफी होगा.’’ पिताजी, बड़े भाई और बहनोई ने यह सुना तो सन्न रह गए. परिवार के अन्य सदस्य भी दौड़े आए. हर प्रकार सम झाया, परंतु संजय अपनी प्रतिज्ञा से नहीं डिगा. घर वालों को कोपभाजन बनने पर उस ने धमकी दे दी कि वे यदि तंग करेंगे तो वह कोर्टमैरिज कर सब की छुट्टी कर देगा. विवशता में उन सब को पीछे हट कर अपनी स्वीकृति देनी पड़ी.

‘‘क्यों निखिल भैया, आप की कोई साली कुंआरी है,’’ संजय के इस प्रश्न पर निखिल सहित सब चौंक गए. निखिल हंस कर बोला, ‘‘भई, क्या इरादे हैं?’’

‘‘इरादे तो नेक हैं, यदि हो तो मेरी बूआ के एकमात्र बेटे हैं ये, सुधीर, सबइंजीनियर, इन के लिए मधु भाभी सी लड़की चाहिए,’’ निखिल का चेहरा खुशी से दमक उठा.

‘‘है तो पर सगी नहीं, चचेरी है.’’

‘‘चचेरी. पता नहीं कैसी हो.’’

‘‘मधु से बढ़ कर. मधु अपनी मां से अधिक चाची को मानती है. संयुक्त परिवार होते हुए भी सब एक थाल में खाने वाले हैं. दोनों परिवारों में बहू व दामाद आ गए हैं, परंतु जैसे उस चोखे रंग में रंग कर एकाकार हो गए हैं. पता नहीं कौन सी ममता और अपनेपन की बूटी खाते हैं उस घर के लोग और वही मधु के साथ अपनेपन की बूटी हमारे घर चली आई है,’’ वह हंस कर बोला.

‘‘ठीक है. यदि लड़की पसंद आ गई तो वह अपनेपन की बूटी हमारी बूआ के घर भी आ जाएगी, शादी में तो आएगी ही वह.’’

‘‘हां, क्यों नहीं? पूरा परिवार आएगा. लड़की स्नातक, गोरीचिट्टी, सुंदर है. नापसंद का तो सवाल ही नहीं उठता.’’

‘‘तब सब से पहली पसंद मेरी होगी वह, है न सुधीर.’’

सुधीर  झेंप कर मुसकरा दिया.पहले निखिल मधु की अक्ल पर मन ही मन भरा बैठा था, परंतु उसे अब लग रहा था कि कब वह उड़ कर अपने घर पहुंचे और मधु को बांहों में भर कर नचा डाले और कहे कि बता तो, कौन सी बूटी की घुट्टी पी कर आई है कि सब को इतनी सरलता से उंगलियों पर नचा देती है. यदि वह कल्पवृक्ष उस के मायके के आंगन में लगा है तो वह उसे तोड़ कर पूरे परिवार को घोट कर पिला दे.

उस ने अपने भाइयों और पिताजी की ओर निहार कर देखा जो सभी प्रशंसक नजरों से उसे देख कर मुसकरा रहे थे. उस ने शरम से मुंह घुमा लिया.

दूसरे दिन जब वे गृहनगर पहुंचे तो सुबह हो गई थी. पूरा घर जाग उठा था. सब उन के आसपास एकत्र हो गए. सभी यह जानने को आतुर थे कि तिलक समारोह कैसा रहा.

‘‘मधु कहां है?’’ पिताजी ने उसे न देख कर पूछा.

‘‘होगी कहां, चायनाश्ते की तैयारी में जुटी होगी,’’ मांजी बोलीं. अभी बात भी पूरी नहीं कर पाईं कि वह चाय की ट्रे ले कर बैठक में चली आई. ट्रे मेज पर रख कर उस ने सब के चरण छुए, फिर उन के शब्द सुन कर मूर्ति की तरह खड़ी हो गई.

‘‘बाबूजी, मु झ से कुछ बड़ी गलती हो गई क्या. क्या हुआ मेरे कारण? कृपया बतलाइए न?’’

‘‘हां, बहुत बड़ी गलती हो गई रे. तू ने जो अपने मायके के थाल दिए थे न उन के कारण. ले उठा यहां से अपने थाल और रख आ उन्हें जहां से उठा लाई थी.’’

‘‘हे दाता, क्या उन्हें ये थाल पसंद नहीं आए थे?’’ वह भय से बोली.

‘‘नहीं लिए, क्योंकि तुम उन में विराजी जो थीं,’’ पिताजी गंभीरता से बोले.

‘‘मैं विराजी थी. क्या कह रहे हैं आप?’’ वह आंखें फाड़ कर बोली.

‘‘यह देख, तेरे हर थाल में यह रही मधु, है न?’’

‘‘ओह, मैं तो डर ही गई. तो क्या हुआ, नाम ही तो है, इस से क्या.’’

‘‘इसी से तो नहीं लिए, और वह सब भी नहीं लेंगे जिस में तेरा नाम है.’’

‘‘सब में नाम थोड़े लिखा है,’’ वह रोंआसी हो गई.

‘‘अब क्या होगा? क्या शादी रद्द हो गई?’’

‘‘अरे पगली, अब वे दहेज लेंगे ही नहीं. तेरा गुणगान सुन कर संजय ने दहेज न लेने की सौगंध खाई है. कह रहा था जिस घर में ऐसी ममतामयी बहू हो, उस घर से दानदहेज लेना पाप है. हम ने तेरी सब बातें बतलाईं, तो लड़का द्रवित होता चला गया.’’

‘‘आप बना रहे हैं, बाबूजी,’’ उस की आंखें भर आईं.

‘‘बैठ बेटी. तुम सब भी बैठो,’’ फिर उन्होंने शुरू से अंत तक सारा हाल बता दिया और मधु के सिर पर हाथ रख कर बोले, ‘‘मधु, तु झे पा कर हम धन्य हुए. तेरी चचेरी बहन की शादी भी संजय की बूआ के लड़के से तय कर आए हैं. ऐसे परिवार की लड़की कौन पसंद नहीं करेगा जिस परिवार की हमारी मधु जैसी बहू हो. तेरे दोनों जेठ तेरी बड़ाई करते आए हैं, और निखिल तो वहां थालों के विवाद पर तमतमाया मुंह लिए खार खाए बैठा था. अब अपनेआप पानीपानी हो गया है. जा, वह कमरे में तेरी प्रतीक्षा कर रहा है.’’

मधु शरम से दोनों हाथों से मुंह छिपाए कमरे की ओर दौड़ती चली गई. सब ने उसे प्यारभरी नजरों से देख कर मुसकान बिखेर दी, मां तो जैसे धन्य हो गईं. मधु पास होती तो अवश्य उसे छाती से लगा कर रो पड़तीं.

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लेखिका- छाया श्रीवास्तव

‘‘तो ठहरिए साहब, हम बाजार से दूसरे ले कर आते हैं, तब तक ठहरना होगा,’’ मुकेश उठता हुआ बोला.

‘‘नहीं, भाईसाहब. आप बैठिए, अंदर से तो आ रहे हैं थाल.’’

‘‘अरे, ये सब तो शगुन के थाल आदि लड़की वाले के यहां से ही आते हैं, थोड़ा रुक लेते हैं.’’

‘‘नहीं भैया, मैं यह सब अब न ले सकूंगा. जो लिस्ट आप लोगों ने बना कर भेजी थी और जो ये लोग देने वाले हैं. आप जानते ही हैं कि लड़कियों को अपने मायके की एकएक चीज कितनी प्यारी होती है, परंतु जिस घर में ऐसी उदारमना स्त्री हो जो खुशी से अपना सारा दहेज खुद दान कर रही हो उसे ले कर मैं उस उदार स्त्री से छोटा नहीं बन सकता. इस से मैं इन कपड़ों आदि के अलावा अब कोई कोई चीज स्वीकार नहीं करूंगा. मैं अब इस के अलावा आगे कुछ नहीं लूंगा. बिना दहेज के ही उस घर की बेटी ब्याह कर लाऊंगा.

‘‘मैं तो पहले ही भैया, जीजाजी से अनुरोध कर रहा था कि इतना लंबाचौड़ा दहेज मांग कर कन्यापक्ष को आफत में न डालें. अब जो हुआ सो हुआ, आगे कोई मु झे विवश न करे. बस, ये लोग साथ गए बरातियों का अच्छा स्वागत कर दें, वही काफी होगा.’’ पिताजी, बड़े भाई और बहनोई ने यह सुना तो सन्न रह गए. परिवार के अन्य सदस्य भी दौड़े आए. हर प्रकार सम झाया, परंतु संजय अपनी प्रतिज्ञा से नहीं डिगा. घर वालों को कोपभाजन बनने पर उस ने धमकी दे दी कि वे यदि तंग करेंगे तो वह कोर्टमैरिज कर सब की छुट्टी कर देगा. विवशता में उन सब को पीछे हट कर अपनी स्वीकृति देनी पड़ी.

‘‘क्यों निखिल भैया, आप की कोई साली कुंआरी है,’’ संजय के इस प्रश्न पर निखिल सहित सब चौंक गए. निखिल हंस कर बोला, ‘‘भई, क्या इरादे हैं?’’

‘‘इरादे तो नेक हैं, यदि हो तो मेरी बूआ के एकमात्र बेटे हैं ये, सुधीर, सबइंजीनियर, इन के लिए मधु भाभी सी लड़की चाहिए,’’ निखिल का चेहरा खुशी से दमक उठा.

‘‘है तो पर सगी नहीं, चचेरी है.’’

‘‘चचेरी. पता नहीं कैसी हो.’’

‘‘मधु से बढ़ कर. मधु अपनी मां से अधिक चाची को मानती है. संयुक्त परिवार होते हुए भी सब एक थाल में खाने वाले हैं. दोनों परिवारों में बहू व दामाद आ गए हैं, परंतु जैसे उस चोखे रंग में रंग कर एकाकार हो गए हैं. पता नहीं कौन सी ममता और अपनेपन की बूटी खाते हैं उस घर के लोग और वही मधु के साथ अपनेपन की बूटी हमारे घर चली आई है,’’ वह हंस कर बोला.

‘‘ठीक है. यदि लड़की पसंद आ गई तो वह अपनेपन की बूटी हमारी बूआ के घर भी आ जाएगी, शादी में तो आएगी ही वह.’’

‘‘हां, क्यों नहीं? पूरा परिवार आएगा. लड़की स्नातक, गोरीचिट्टी, सुंदर है. नापसंद का तो सवाल ही नहीं उठता.’’

‘‘तब सब से पहली पसंद मेरी होगी वह, है न सुधीर.’’

सुधीर  झेंप कर मुसकरा दिया.पहले निखिल मधु की अक्ल पर मन ही मन भरा बैठा था, परंतु उसे अब लग रहा था कि कब वह उड़ कर अपने घर पहुंचे और मधु को बांहों में भर कर नचा डाले और कहे कि बता तो, कौन सी बूटी की घुट्टी पी कर आई है कि सब को इतनी सरलता से उंगलियों पर नचा देती है. यदि वह कल्पवृक्ष उस के मायके के आंगन में लगा है तो वह उसे तोड़ कर पूरे परिवार को घोट कर पिला दे.

उस ने अपने भाइयों और पिताजी की ओर निहार कर देखा जो सभी प्रशंसक नजरों से उसे देख कर मुसकरा रहे थे. उस ने शरम से मुंह घुमा लिया.

दूसरे दिन जब वे गृहनगर पहुंचे तो सुबह हो गई थी. पूरा घर जाग उठा था. सब उन के आसपास एकत्र हो गए. सभी यह जानने को आतुर थे कि तिलक समारोह कैसा रहा.

‘‘मधु कहां है?’’ पिताजी ने उसे न देख कर पूछा.

‘‘होगी कहां, चायनाश्ते की तैयारी में जुटी होगी,’’ मांजी बोलीं. अभी बात भी पूरी नहीं कर पाईं कि वह चाय की ट्रे ले कर बैठक में चली आई. ट्रे मेज पर रख कर उस ने सब के चरण छुए, फिर उन के शब्द सुन कर मूर्ति की तरह खड़ी हो गई.

‘‘बाबूजी, मु झ से कुछ बड़ी गलती हो गई क्या. क्या हुआ मेरे कारण? कृपया बतलाइए न?’’

‘‘हां, बहुत बड़ी गलती हो गई रे. तू ने जो अपने मायके के थाल दिए थे न उन के कारण. ले उठा यहां से अपने थाल और रख आ उन्हें जहां से उठा लाई थी.’’

‘‘हे दाता, क्या उन्हें ये थाल पसंद नहीं आए थे?’’ वह भय से बोली.

‘‘नहीं लिए, क्योंकि तुम उन में विराजी जो थीं,’’ पिताजी गंभीरता से बोले.

‘‘मैं विराजी थी. क्या कह रहे हैं आप?’’ वह आंखें फाड़ कर बोली.

‘‘यह देख, तेरे हर थाल में यह रही मधु, है न?’’

‘‘ओह, मैं तो डर ही गई. तो क्या हुआ, नाम ही तो है, इस से क्या.’’

‘‘इसी से तो नहीं लिए, और वह सब भी नहीं लेंगे जिस में तेरा नाम है.’’

‘‘सब में नाम थोड़े लिखा है,’’ वह रोंआसी हो गई.

‘‘अब क्या होगा? क्या शादी रद्द हो गई?’’

‘‘अरे पगली, अब वे दहेज लेंगे ही नहीं. तेरा गुणगान सुन कर संजय ने दहेज न लेने की सौगंध खाई है. कह रहा था जिस घर में ऐसी ममतामयी बहू हो, उस घर से दानदहेज लेना पाप है. हम ने तेरी सब बातें बतलाईं, तो लड़का द्रवित होता चला गया.’’

‘‘आप बना रहे हैं, बाबूजी,’’ उस की आंखें भर आईं.

‘‘बैठ बेटी. तुम सब भी बैठो,’’ फिर उन्होंने शुरू से अंत तक सारा हाल बता दिया और मधु के सिर पर हाथ रख कर बोले, ‘‘मधु, तु झे पा कर हम धन्य हुए. तेरी चचेरी बहन की शादी भी संजय की बूआ के लड़के से तय कर आए हैं. ऐसे परिवार की लड़की कौन पसंद नहीं करेगा जिस परिवार की हमारी मधु जैसी बहू हो. तेरे दोनों जेठ तेरी बड़ाई करते आए हैं, और निखिल तो वहां थालों के विवाद पर तमतमाया मुंह लिए खार खाए बैठा था. अब अपनेआप पानीपानी हो गया है. जा, वह कमरे में तेरी प्रतीक्षा कर रहा है.’’

मधु शरम से दोनों हाथों से मुंह छिपाए कमरे की ओर दौड़ती चली गई. सब ने उसे प्यारभरी नजरों से देख कर मुसकान बिखेर दी, मां तो जैसे धन्य हो गईं. मधु पास होती तो अवश्य उसे छाती से लगा कर रो पड़तीं.

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August 04, 2020 at 10:00AM

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