Tuesday, 4 August 2020

अंतिम फैसला- भाग 3 : सुकेश ने रमा को क्या मना किया था?

लेखक- आशीष दलाल

“चलिए….मैं चल कर देखता हूं. डाक्टर तो शायद इस वक्त यहां जल्दी से पहुंच न सकें,” कहते हुए मि. शाह ने बाहर निकलने के लिए जैसे ही अपना पैर उठाया तभी उन के पीछे खड़ी उन की पत्नी ने उन का हाथ पकड़ कर आंखों के इशारे से घर से बाहर जाने से मना किया.

इस मंजिल पर केवल 3 परिवार ही रहते थे। उन में से केवल मि. शाह का ही यह खुद का फ्लैट था बाकि के दोनों परिवार किराए पर रहते थे और रमा से उन का ज्यादा परिचय न था.

“बस 2 मिनट में जा कर आ जाऊंगा. कुछ नहीं होगा,” मि. शाह ने अपनी पत्नी से कहा और उस के उत्तर की परवाह किए बिना वे रमा के पीछे तेज कदमों से सीढियां चढ़ने लगे.

रमा हांफते हुए अंदर बैडरूम में दाखिल हुई और उन के पीछे मि. शाह झिझकते हुए अंदर आए. वह सुकेश के नजदीक गए और उस की कलाई अपने हाथ में ले कर उस की नब्ज देखने लगे. फिर उन्होंने उस की नाक के आगे अपनी उंगली रख कर उस की सांस की गति जानने की कोशिश की लेकिन फिर उस के शरीर में कोई हलचल न पा कर उन्होंने अपने मोबाइल से एक नंबर डायल किया. किसी से संक्षेप में बात कर वे रमा को सांत्वना देने लगे.

“भाभीजी, यहां और कोई रहता है आपका? सुकेश को शायद हार्ट अटैक आया हो. कोई उम्मीद तो जान नहीं पड़ रही, फिर भी मेरे एक परिचित डाक्टर आ रहे हैं।”

मि. शाह की बात सुन कर रमा बिस्तर पर सिर पकड़ कर बैठ गई. तभी उस का मोबाइल फिर से बजने लगा. रमा ने कोई सुध न ली तो मि. शाह ने मोबाइल लिया और बात करनी शुरू की…

“मैं सुकेश का पड़ोसी बोल रहा हूं. रमाजी इस वक्त बात करने की हालत में नहीं हैं।”

“मैं सुकेश का पिता बोल रहा हूं. कैसा है सुकेश अब?”

मि. शाह सुकेश के पिता की बात सुन कर दो पल को ठिठक गए फिर कुछ स्वस्थ हो कर वह बोले, “अंकल, डाक्टर को बुलाया है लेकिन कोई उम्मीद जान नहीं पड़ रही है. सुकेश की सांस नहीं चल रही है.”

“नहीं नहीं… डाक्टर के कहे बिना आप किसी नतीजे पर कैसे पहुंच सकते हैं? आप मेरी बहू को फोन दीजिए,” सुकेश के पिता का स्वर कांप रहा था.

“मैं इस वक्त सुकेश के घर पर ही हूं. भाभीजी कुछ भी बोल नहीं पा रही हैं,” मि. शाह ने रमा को फोन देने की कोशिश की लेकिन रमा अपने में ही खोई हुई थी.

“ओह, मैं अभी शहर आने के लिए निकलता हूं,” सुकेश के पिता बोले.

“अंकल, शहर में कोरोना की वजह से कल ही एक मौत हुई है. इसी से लौकडाउन की वजह से बहुत ही कठोरता से अमल किया जा रहा है. शहर से बाहर तो क्या हरएक कालोनी से बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा है. न तो हम सुकेश को वहां ले कर आ सकते हैं और न ही आप यहां आ सकते हैं. हम सभी को खतरा है.”

तभी रमा अचानक से अपनी जगह से खड़ी हुई और मि. शाह के हाथ से मोबाइल ले लिया.

“पापाजी, आप जल्दी आ जाइए. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है क्या करूं,” कहते हुए रमा रोने लगी.

‘बहू, धीरज रखो। मैं कुछ करता हूं,” कह कर सुकेश के पिता ने फोन रख दिया.

अपने पति को काफी देर तक वापस आया न देख मिसेज शाह रमा के यहां आ गई. सारी परिस्थिति देख कर वे अपना भय दूर रख कर रमा के पास आकर बैठ गईं और उसे सांत्वना देने लगीं.

कुछ ही देर में डाक्टर ने आ कर हार्ट अटैक से सुकेश की मौत होने की पुष्टि कर दी. रमा अब तक कुछ संभल चुकी थी. वह बैडरूम से बाहर आ गई। तभी उस के मोबाइल की रिंग बजी. स्क्रीन पर झलकते नंबर को देख कर उस ने तेजी से फोन रिसीव किया, “भैया… भैया… आप जल्दी से यहां आ जाओ. मुझे समझ नहीं आ रहा क्या करूं. अब तो डाक्टर ने भी कह दिया,” अपने भाई से बात करते हुए रमा एक बार फिर से धीरज खो कर रोने लगी.

“रमा, धीरज रखो बहन, तुम्हारे ससुरजी का फोन आया था अभी. मैं कुछ करता हूं। हिम्मत रखो,” भाई का स्वर सुन कर रमा और जोरजोर से रोने लगी.

तभी उस ने जोर से छींक दी। उसे इस तरह छींकते देख मिसेज शाह घबरा गईं और अपने पति के कान में कुछ कहने लगी.

“इस हालत में कैसे अकेला छोड़ दें इन्हें. हमें ही कुछ करना होगा. यहां सुकेश का कोई नहीं है,” मि. शाह ने धीरे से अपनी पत्नी की बात का जवाब देते हुए कहा.

“आप सरकारी अस्पताल वालों को फोन कर दो. वे लाश को निकाल देंगे.”

“क्या बकवास कर रही हो तुम? मानवता भी कोई चीज होती है. रमा को एक सामान्य सी छींक आने से डर कर उसे इस कठिन परिस्थिति में अकेला नहीं छोड़ सकते. कुछ नहीं होगा,” मि. शाह का स्वर गुस्से से तेज हो गया.

अपने घर बात करते हुए रमा का ध्यान उन की तरफ गया लेकिन तभी फोन पर उस की मां आने पर उस की सिसकियां और ज्यादा बढ़ गईं.

“मम्मी…” रमा रोने लगी.

“रमा, हिम्मत से काम ले बेटी. इस वक्त तू हिम्मत खो कर बैठ गई तो क्या होगा… हम सब प्रयास कर रहे वहां आने के लिए,” रमा की मम्मी उसे सांत्वना देने लगी.

तभी मि. शाह अपने मोबाइल से किसी से बात करने लगे. बारीबारी से कुछ लोगों से बात कर जब उन्होंने अपना मोबाइल जेब में रखा तब तक रमा अपनी बात कर चुपचाप एक कोने में बैठ गई थी.

“भाभीजी, मैं ने पुलिस, डाक्टर और टैक्सी वालों से बात की है. पुलिस का कहना है कि वे श्मशान तक जाने की व्यवस्था करवा देंगे लेकिन शहर के बाहर से किसी का किसी भी वजह से आना और यहां से बाहर जाना नामुमकिन है,”  मि. शाह ने रमा के सामने खड़े हो कर अब तक अपनी हुई बातों का सार बताते हुए कहा.

“मेरे ससुर की काफी पहुंच है। वे कुछ न कुछ कर जरूर आ जाएंगे और मैं सुकेश को ले कर गांव जाऊंगी,” रमा की आंखों में विश्वास झलक रहा था.

मि. शाह कुछ कहने ही जा रहे थे कि तभी रमा का मोबाइल फिर से बजने लगा.

“पापाजी, सब हो गया न? आप कब तक आ रहे है?”

“बहू, बहुत प्रयास किए… पर…”

“नहीं, आप आ कर लेकर जाइए मुझे और सुकेश को,” अपने ससुर की बात सुन कर रमा दुखी हो गई.

“बहू, तू बहादुर है और देशभक्त भी. देखो, इस वक्त भावनाओं में बह कर कोई भी ऐसा फैसला लेने का नहीं है जिस से पूरा मानव समुदाय खतरे में पड़ जाए. हिम्मत से काम लो. वहां समय के हिसाब से फैसला ले कर सुकेश की अंतिम क्रिया करवा दो।”

रमा ने महसूस किया कि उसे हिम्मत बंधाते हुए उस के ससुर बड़ी ही मुश्किल से बात कर पा रहे थे.

‘पर पापाजी, उन के अंतिम दर्शन…” रमा ने मायूसी भरे शब्दों में पूछा.

“उस की चिंता मत करो तुम। रानू फोन से वीडियो पर बात करेगी. बस, फोन से देख कर ही अपना मन मना लेंगे. जाने वाला तो चला गया लेकिन उसे छोड़ने जाने के पीछे दूसरे लोगों की जान खतरे में नहीं डाल सकता मैं,” रमा के ससुर ने कहा और जानबूझ कर फोन बंद कर दिया.

रमा कुछ देर चुपचाप बैठी रही फिर मि. शाह की ओर देख कर हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई.

“भाई साहब, इस घड़ी आप ही मेरे सगे हैं. उन्हें श्मसान तक पहुंचाने की व्यवस्था करवा दीजिए. मेरा परिवार देश की सुरक्षा को ध्यान में रख कर नहीं पहुंच पाएगा,” रमा ने बड़ी मुश्किल से कहा और अपने मोबाइल से एक काल की।

“मम्मी, भैया से कहना कि अपनी और किसी और की जान जोखम में न डालें. मैं देशभक्त परिवार की बहू हूं और देश की सुरक्षा की खातिर आप से विनती करती हूं. मुझे इस वक्त अकेला ही रहने दो. उन के पापा से बात हो गई है. मैं अंतिम क्रिया की तैयारी करवा रही हूं. आप को वीडियो काल करूंगी, अपने जमाई के अंतिम दर्शन कर लेना,” रमा ने आगे किसी की बात सुने बिना फोन बंद कर दिया.

मि. शाह ने हाथ जोड़ कर रमा के निर्णय का सम्मान किया और फोन पर बात करते हुए सुकेश की अंतिम क्रिया की तैयारियों करने में जुट गए.

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लेखक- आशीष दलाल

“चलिए….मैं चल कर देखता हूं. डाक्टर तो शायद इस वक्त यहां जल्दी से पहुंच न सकें,” कहते हुए मि. शाह ने बाहर निकलने के लिए जैसे ही अपना पैर उठाया तभी उन के पीछे खड़ी उन की पत्नी ने उन का हाथ पकड़ कर आंखों के इशारे से घर से बाहर जाने से मना किया.

इस मंजिल पर केवल 3 परिवार ही रहते थे। उन में से केवल मि. शाह का ही यह खुद का फ्लैट था बाकि के दोनों परिवार किराए पर रहते थे और रमा से उन का ज्यादा परिचय न था.

“बस 2 मिनट में जा कर आ जाऊंगा. कुछ नहीं होगा,” मि. शाह ने अपनी पत्नी से कहा और उस के उत्तर की परवाह किए बिना वे रमा के पीछे तेज कदमों से सीढियां चढ़ने लगे.

रमा हांफते हुए अंदर बैडरूम में दाखिल हुई और उन के पीछे मि. शाह झिझकते हुए अंदर आए. वह सुकेश के नजदीक गए और उस की कलाई अपने हाथ में ले कर उस की नब्ज देखने लगे. फिर उन्होंने उस की नाक के आगे अपनी उंगली रख कर उस की सांस की गति जानने की कोशिश की लेकिन फिर उस के शरीर में कोई हलचल न पा कर उन्होंने अपने मोबाइल से एक नंबर डायल किया. किसी से संक्षेप में बात कर वे रमा को सांत्वना देने लगे.

“भाभीजी, यहां और कोई रहता है आपका? सुकेश को शायद हार्ट अटैक आया हो. कोई उम्मीद तो जान नहीं पड़ रही, फिर भी मेरे एक परिचित डाक्टर आ रहे हैं।”

मि. शाह की बात सुन कर रमा बिस्तर पर सिर पकड़ कर बैठ गई. तभी उस का मोबाइल फिर से बजने लगा. रमा ने कोई सुध न ली तो मि. शाह ने मोबाइल लिया और बात करनी शुरू की…

“मैं सुकेश का पड़ोसी बोल रहा हूं. रमाजी इस वक्त बात करने की हालत में नहीं हैं।”

“मैं सुकेश का पिता बोल रहा हूं. कैसा है सुकेश अब?”

मि. शाह सुकेश के पिता की बात सुन कर दो पल को ठिठक गए फिर कुछ स्वस्थ हो कर वह बोले, “अंकल, डाक्टर को बुलाया है लेकिन कोई उम्मीद जान नहीं पड़ रही है. सुकेश की सांस नहीं चल रही है.”

“नहीं नहीं… डाक्टर के कहे बिना आप किसी नतीजे पर कैसे पहुंच सकते हैं? आप मेरी बहू को फोन दीजिए,” सुकेश के पिता का स्वर कांप रहा था.

“मैं इस वक्त सुकेश के घर पर ही हूं. भाभीजी कुछ भी बोल नहीं पा रही हैं,” मि. शाह ने रमा को फोन देने की कोशिश की लेकिन रमा अपने में ही खोई हुई थी.

“ओह, मैं अभी शहर आने के लिए निकलता हूं,” सुकेश के पिता बोले.

“अंकल, शहर में कोरोना की वजह से कल ही एक मौत हुई है. इसी से लौकडाउन की वजह से बहुत ही कठोरता से अमल किया जा रहा है. शहर से बाहर तो क्या हरएक कालोनी से बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा है. न तो हम सुकेश को वहां ले कर आ सकते हैं और न ही आप यहां आ सकते हैं. हम सभी को खतरा है.”

तभी रमा अचानक से अपनी जगह से खड़ी हुई और मि. शाह के हाथ से मोबाइल ले लिया.

“पापाजी, आप जल्दी आ जाइए. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है क्या करूं,” कहते हुए रमा रोने लगी.

‘बहू, धीरज रखो। मैं कुछ करता हूं,” कह कर सुकेश के पिता ने फोन रख दिया.

अपने पति को काफी देर तक वापस आया न देख मिसेज शाह रमा के यहां आ गई. सारी परिस्थिति देख कर वे अपना भय दूर रख कर रमा के पास आकर बैठ गईं और उसे सांत्वना देने लगीं.

कुछ ही देर में डाक्टर ने आ कर हार्ट अटैक से सुकेश की मौत होने की पुष्टि कर दी. रमा अब तक कुछ संभल चुकी थी. वह बैडरूम से बाहर आ गई। तभी उस के मोबाइल की रिंग बजी. स्क्रीन पर झलकते नंबर को देख कर उस ने तेजी से फोन रिसीव किया, “भैया… भैया… आप जल्दी से यहां आ जाओ. मुझे समझ नहीं आ रहा क्या करूं. अब तो डाक्टर ने भी कह दिया,” अपने भाई से बात करते हुए रमा एक बार फिर से धीरज खो कर रोने लगी.

“रमा, धीरज रखो बहन, तुम्हारे ससुरजी का फोन आया था अभी. मैं कुछ करता हूं। हिम्मत रखो,” भाई का स्वर सुन कर रमा और जोरजोर से रोने लगी.

तभी उस ने जोर से छींक दी। उसे इस तरह छींकते देख मिसेज शाह घबरा गईं और अपने पति के कान में कुछ कहने लगी.

“इस हालत में कैसे अकेला छोड़ दें इन्हें. हमें ही कुछ करना होगा. यहां सुकेश का कोई नहीं है,” मि. शाह ने धीरे से अपनी पत्नी की बात का जवाब देते हुए कहा.

“आप सरकारी अस्पताल वालों को फोन कर दो. वे लाश को निकाल देंगे.”

“क्या बकवास कर रही हो तुम? मानवता भी कोई चीज होती है. रमा को एक सामान्य सी छींक आने से डर कर उसे इस कठिन परिस्थिति में अकेला नहीं छोड़ सकते. कुछ नहीं होगा,” मि. शाह का स्वर गुस्से से तेज हो गया.

अपने घर बात करते हुए रमा का ध्यान उन की तरफ गया लेकिन तभी फोन पर उस की मां आने पर उस की सिसकियां और ज्यादा बढ़ गईं.

“मम्मी…” रमा रोने लगी.

“रमा, हिम्मत से काम ले बेटी. इस वक्त तू हिम्मत खो कर बैठ गई तो क्या होगा… हम सब प्रयास कर रहे वहां आने के लिए,” रमा की मम्मी उसे सांत्वना देने लगी.

तभी मि. शाह अपने मोबाइल से किसी से बात करने लगे. बारीबारी से कुछ लोगों से बात कर जब उन्होंने अपना मोबाइल जेब में रखा तब तक रमा अपनी बात कर चुपचाप एक कोने में बैठ गई थी.

“भाभीजी, मैं ने पुलिस, डाक्टर और टैक्सी वालों से बात की है. पुलिस का कहना है कि वे श्मशान तक जाने की व्यवस्था करवा देंगे लेकिन शहर के बाहर से किसी का किसी भी वजह से आना और यहां से बाहर जाना नामुमकिन है,”  मि. शाह ने रमा के सामने खड़े हो कर अब तक अपनी हुई बातों का सार बताते हुए कहा.

“मेरे ससुर की काफी पहुंच है। वे कुछ न कुछ कर जरूर आ जाएंगे और मैं सुकेश को ले कर गांव जाऊंगी,” रमा की आंखों में विश्वास झलक रहा था.

मि. शाह कुछ कहने ही जा रहे थे कि तभी रमा का मोबाइल फिर से बजने लगा.

“पापाजी, सब हो गया न? आप कब तक आ रहे है?”

“बहू, बहुत प्रयास किए… पर…”

“नहीं, आप आ कर लेकर जाइए मुझे और सुकेश को,” अपने ससुर की बात सुन कर रमा दुखी हो गई.

“बहू, तू बहादुर है और देशभक्त भी. देखो, इस वक्त भावनाओं में बह कर कोई भी ऐसा फैसला लेने का नहीं है जिस से पूरा मानव समुदाय खतरे में पड़ जाए. हिम्मत से काम लो. वहां समय के हिसाब से फैसला ले कर सुकेश की अंतिम क्रिया करवा दो।”

रमा ने महसूस किया कि उसे हिम्मत बंधाते हुए उस के ससुर बड़ी ही मुश्किल से बात कर पा रहे थे.

‘पर पापाजी, उन के अंतिम दर्शन…” रमा ने मायूसी भरे शब्दों में पूछा.

“उस की चिंता मत करो तुम। रानू फोन से वीडियो पर बात करेगी. बस, फोन से देख कर ही अपना मन मना लेंगे. जाने वाला तो चला गया लेकिन उसे छोड़ने जाने के पीछे दूसरे लोगों की जान खतरे में नहीं डाल सकता मैं,” रमा के ससुर ने कहा और जानबूझ कर फोन बंद कर दिया.

रमा कुछ देर चुपचाप बैठी रही फिर मि. शाह की ओर देख कर हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई.

“भाई साहब, इस घड़ी आप ही मेरे सगे हैं. उन्हें श्मसान तक पहुंचाने की व्यवस्था करवा दीजिए. मेरा परिवार देश की सुरक्षा को ध्यान में रख कर नहीं पहुंच पाएगा,” रमा ने बड़ी मुश्किल से कहा और अपने मोबाइल से एक काल की।

“मम्मी, भैया से कहना कि अपनी और किसी और की जान जोखम में न डालें. मैं देशभक्त परिवार की बहू हूं और देश की सुरक्षा की खातिर आप से विनती करती हूं. मुझे इस वक्त अकेला ही रहने दो. उन के पापा से बात हो गई है. मैं अंतिम क्रिया की तैयारी करवा रही हूं. आप को वीडियो काल करूंगी, अपने जमाई के अंतिम दर्शन कर लेना,” रमा ने आगे किसी की बात सुने बिना फोन बंद कर दिया.

मि. शाह ने हाथ जोड़ कर रमा के निर्णय का सम्मान किया और फोन पर बात करते हुए सुकेश की अंतिम क्रिया की तैयारियों करने में जुट गए.

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August 05, 2020 at 10:00AM

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