Tuesday, 25 August 2020

सुषमा-भाग 3: हर्ष ने बाबा को क्या बताया?

मेरा चिड़चिड़ापन बढ़ता गया था. बच्चों पर गुस्सा निकालती थी. नौकर की जरा सी लापरवाही पर उसे फटकार देती. हर्ष देर से आते तो तकरार करने लग जाती. एक दिन मैं ने कितने अविश्वास से उन से बात की थी. आज सोचती हूं तो लज्जित हो उठती हूं. कितनी नीचता थी मेरे शब्दों में. शायद उस दिन हर्षजी को कुछ ज्यादा देर हो गई थी. मैं ने उन से कहा था, ‘आज नई कंप्यूटर औपरेटर के साथ कोई प्रोग्राम था?’

‘क्या कहना चाहती हो?’ वे कठोरता से बोले थे.

‘यही कि इतनी देर फिर तुम्हें कहां हो जाती है?’

‘मैं नहीं समझता था, तुम इतनी नीच भी हो सकती हो. देर क्यों होती है. सब सुनना चाहती हो? इस घर में आने की बात दूर, इस घर की याद भी जाए, अब यह भी मुझ से बरदाश्त नहीं होता. मैं ने क्या सोचा था, क्या हो गया. मेरे सपनों को तुम ने चूरचूर कर दिया है,’ वे तड़प कर बोले थे.

कभीकभी मुझे अपने व्यवहार पर बहुत पछतावा होता. मैं सोचती, ‘ये सब लोग क्या कहते होंगे? आखिर है तो छोटे घर की. स्वभाव कैसे बदलेगी,’ लेकिन यह विचार बहुत थोड़ी देर रहता.

बच्चों को हर्ष ने होस्टल में डाल दिया था. अब वे मेरी ओर से और भी लापरवाह हो गए थे. मैं अब कितना अकेलापन महसूस करने लगी थी. एक दिन मैं ने उन से कहा था, ‘तुम दिनभर औफिस में रहते हो. बच्चों को तुम ने होस्टल में डाल दिया है. दिनभर अकेली मैं बोर होती रहती हूं. इस तरह मैं पागल हो जाऊंगी.’

‘बच्चों को इस उम्र में अपने घर से दूर रहना पड़ा है, इस की वजह भी तो तुम्हीं हो. पहले अपनेआप को बदलो, बच्चे फिर घर आ जाएंगे. जिंदगी में कितने काम होते हैं, आदमी करने लगे तो यह जिंदगी छोटी पड़ जाए उन कामों के लिए, और एक तुम हो जो यह सोचे बैठी हो, कितना काम करूं,’ वे तलखी से बोले थे.

हर्ष की मां की तबीयत खराब रहने लग गई थी. मैं तो अपनी बीमारी का कंबल ओढ़े पड़ी रहती थी. किसी को क्या तकलीफ है, मुझे इस से कोई मतलब नहीं था. घर में एक औरत रखी गई, जो माताजी की दिनरात सेवा करती थी. उस का नाम था सुषमा. मैं देखती, कुढ़ती, मां के लिए हर्ष कितना चिंतित हैं, मेरी कोई परवा नहीं, लेकिन मैं यह देख कर भी हैरान होती कि यह सुषमा किस माटी की बनी है. सुबह से ले कर देर रात तक यह कितनी फुरती से काम करती है. थकती तक नहीं. मुंह पर शिकन तक नहीं आती. हमेशा  हंसती रहती.

एक दिन मैं लौन में बैठी थी तो सुषमा भी मेरे पास आ कर बैठ गई. बड़े प्यार और हमदर्दी से बोली थी, ‘आप को क्या तकलीफ है, मैडम?’

‘कुछ समझ में नहीं आता,’ मैं ने थके स्वर में कहा था.

‘डाक्टर क्या बताते हैं?’

‘किसी की समझ में कुछ आए तो कोई बताए. किसी काम में मन नहीं लगता, किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता. हर समय घबराहट घेरे रहती है.’

‘मेरी बात का बुरा मत मानना, मैडम, एक बात कहूं?’ सुषमा ने डरतेडरते पूछा था.

‘कहो.’

‘आप अपने को व्यस्त रखा करिए. कई बार इंसान के सामने कोई काम नहीं होता तो वह इसी तरह अनमना सा बना रहता है. बच्चों को भी आप ने होस्टल में भेज दिया, वरना तो उन्हीं का कितना काम हो जाता. आप अपने घर की देखभाल खुद क्यों नहीं करतीं?’

‘एक बात बता, सुषमा, तू रोज दोपहर को 2-3 घंटे के लिए कहां जाती है?’ मैं ने उत्सुकता से पूछा था.

‘कहीं भी चली जाती हूं, मालकिन. कमला को बच्चा हुआ, उस की मालिश करनी होती है. 28 नंबर वाले जगदीशजी की मां बीमार है, उस की मदद करने चली जाती हूं. निम्मी भाभी हैं न…’

‘यह निम्मी भाभी कौन हैं?’

‘जहां मैं पहले काम करती थी. उन के पास नौकरानी है तो सही, लेकिन उन्हें मुझ से बड़ा प्रेम है. उन के छोटेछोटे बालबच्चे हैं. शाम को स्कूल से आते हैं तो निम्मी भाभी की जा कर मदद कर देती हूं. वे खुद भी पढ़ाने जाती हैं, थकीहारी आती हैं.’

‘फिर ये रुपए किस के लिए ले जाती है तू?’ मैं हैरान थी.

‘कितने ही जरूरतमंद ऐसे हैं जिन्हें सेवा और पैसे की जरूरत होती है. मेरे पीछे कौन खाने वाला है जिस के लिए इकट्ठा करूं? सोचती हूं, चार पैसे किसी जरूरतमंद के काम आ जाएं तो अच्छा ही है.’

‘तुम्हें पता रहता है किसे पैसे की या सेवा की जरूरत है?’

‘दुनिया बहुत बड़ी है, मैडम. बाहर निकल कर आप देखेंगी तो जान पाएंगी कि किस को क्या चाहिए. कौन दुख का मारा रास्ता देख रहा है कि कोई आए और उस के दुख बांट ले,’ सुषमा कितने उत्साह से बोल रही थी, ‘मैडम, बड़ा फायदा है दूसरों का दुख बांटने में. मन को कितना संतोष मिलता है, सुख मिलता है. जब हम बाहर निकल कर दूसरों की तकलीफों को देखते हैं तो सच मानिए, अपनी तकलीफ अपनेआप ठीक हो जाती है.’

‘तू थकती नहीं, सुषमा?’

‘नहीं, मैम. यह काम ही तो है जिस ने मुझे इस उम्र में भी तंदुरुस्त रखा हुआ है. फिर इस शरीर को इतना भी क्या संभाल कर रखें, यह हमारे किस काम आएगा? जानवरों का तो चाम भी काम आ जाता है. अपनी चमड़ी तो उस काम भी नहीं आती. फिर क्यों न इस से जीभर के मेहनत की जाए? संभाल कर रखने से तो इसे जंग खा जाएगा, जैसे मशीन बंद पड़ी रहे तो उस में जंग लग जाता है.’

‘सच, सुषमा?’ जैसे मैं सपने से जगी थी.

‘हां, मालकिन, दूसरों का दुख बांट लो तो अपना खुद ही कम हो जाएगा. फिर कैसी सुस्ती, कैसी उदासी और कैसी बीमारी? मैं तो अपने शरीर को हरामखोरी नहीं करने देती, मैडम,’ सुषमा कितने विश्वास से यह बात कह गई थी.

सुषमा उठ कर चली गई थी मेरे लिए प्रश्नचिह्न छोड़ कर. बिहार के उस लगभग अनपढ़ गांव की औरत ने कितने बड़े राज की बात कह दी थी. उस की बातें मुझे कहीं भीतर तक चीरती हुई निकल गई थीं. यह सुषमा, जिस के पास मुट्ठीभर पूंजी है, उसे बांट कर कितने सुखसंतोष का अनुभव करती है. दूसरों की सेवा में कितना इसे आनंद मिलता है, और मैं अपने शरीर को लिए ही चिंतित हूं. मैं क्या किसी के लिए कुछ नहीं कर सकती? अब मैं किसी निश्चय पर पहुंच चुकी थी.

हर्ष को सुबह उठते ही एक कप कौफी लेने की आदत थी. मेरी तबीयत खराब होने से यह काम नौकर करने लगा था, क्योंकि मैं तो देर तक बिस्तर पर पड़ी रहती थी. यह मेरा काम था जिसे मैं भूल गई थी. जब उस रोज सुबह में कौफी ले कर पहुंची तो हर्ष बड़ी हैरानी से मुझे देखते रह गए, ‘तुम, मनसुख कहां गया?’

‘यह मेरा काम था. मैं भूल गई थी,’ मैं ने निगाह नीची किए कहा था.

‘लेकिन तुम्हारी तबीयत?’ वे हैरान थे.

‘वह अब ठीक हो जाएगी. मुझे पता लग गया है, मुझे क्या बीमारी थी,’ मैं शरारत से मुसकरा दी थी.

‘क्या थी?’

‘मेरी बीमारी का नाम हरामखोरी था. मेरे डाक्टर ने मुझे समझा दिया है.’

‘कौन सा डाक्टर?’ वे जानने को उत्सुक थे.

‘सुषमा…सच, मैं तो यह भूल ही गई थी कि दूसरों को भी मेरी जरूरत है. मैं इतनी स्वार्थी हो गई थी कि बस यही चाहती थी सब मेरी चिंता करें. सब का दुखदर्द समझती तो न खुद मैं परेशान रहती, न ही इतनी बोरियत सताती. सुषमा ने मुझे सोते से जगा दिया है.

‘इस के बाद वह मेरी आदर्श बन गई, मेरी गुरु, जिस ने मुझे जीने की राह बताई है, मेरी झोली में खुशियां भर दी हैं, मुझे मेरा परिवार लौटा दिया है,’ मेरी आंखों में कितनी ही खुशी के आंसू आ गए थे. मेरे बच्चे मेरे पास वापस आ गए. कहने लगे होस्टल में मन नहीं लगता. हर्ष और मां खुश हैं. मैं कितनी खुश हूं सुषमा को पा कर जिस ने मेरा इतना काम बढ़ा दिया है. लगता है, दिन खत्म हो गया पर काम तो पूरा हुआ नहीं. वह भी तो जुटी रहती है सब के दुख बांटने में. मैं ने सोच लिया है कि अब सुषमा को अपने से दूर नहीं करूंगी. कहीं मैं फिर न भटक जाऊं. उसे देख कर हमेशा यही खयाल आता है कि जो सुख दूसरों के दुख मिटाने में है वह अपने को सहेज कर रखने में कहां है. हम दूसरों का दुख कम करेंगे तो हमारा दुख अपनेआप कम हो जाएगा.

The post सुषमा-भाग 3: हर्ष ने बाबा को क्या बताया? appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/3gv3Wnu

मेरा चिड़चिड़ापन बढ़ता गया था. बच्चों पर गुस्सा निकालती थी. नौकर की जरा सी लापरवाही पर उसे फटकार देती. हर्ष देर से आते तो तकरार करने लग जाती. एक दिन मैं ने कितने अविश्वास से उन से बात की थी. आज सोचती हूं तो लज्जित हो उठती हूं. कितनी नीचता थी मेरे शब्दों में. शायद उस दिन हर्षजी को कुछ ज्यादा देर हो गई थी. मैं ने उन से कहा था, ‘आज नई कंप्यूटर औपरेटर के साथ कोई प्रोग्राम था?’

‘क्या कहना चाहती हो?’ वे कठोरता से बोले थे.

‘यही कि इतनी देर फिर तुम्हें कहां हो जाती है?’

‘मैं नहीं समझता था, तुम इतनी नीच भी हो सकती हो. देर क्यों होती है. सब सुनना चाहती हो? इस घर में आने की बात दूर, इस घर की याद भी जाए, अब यह भी मुझ से बरदाश्त नहीं होता. मैं ने क्या सोचा था, क्या हो गया. मेरे सपनों को तुम ने चूरचूर कर दिया है,’ वे तड़प कर बोले थे.

कभीकभी मुझे अपने व्यवहार पर बहुत पछतावा होता. मैं सोचती, ‘ये सब लोग क्या कहते होंगे? आखिर है तो छोटे घर की. स्वभाव कैसे बदलेगी,’ लेकिन यह विचार बहुत थोड़ी देर रहता.

बच्चों को हर्ष ने होस्टल में डाल दिया था. अब वे मेरी ओर से और भी लापरवाह हो गए थे. मैं अब कितना अकेलापन महसूस करने लगी थी. एक दिन मैं ने उन से कहा था, ‘तुम दिनभर औफिस में रहते हो. बच्चों को तुम ने होस्टल में डाल दिया है. दिनभर अकेली मैं बोर होती रहती हूं. इस तरह मैं पागल हो जाऊंगी.’

‘बच्चों को इस उम्र में अपने घर से दूर रहना पड़ा है, इस की वजह भी तो तुम्हीं हो. पहले अपनेआप को बदलो, बच्चे फिर घर आ जाएंगे. जिंदगी में कितने काम होते हैं, आदमी करने लगे तो यह जिंदगी छोटी पड़ जाए उन कामों के लिए, और एक तुम हो जो यह सोचे बैठी हो, कितना काम करूं,’ वे तलखी से बोले थे.

हर्ष की मां की तबीयत खराब रहने लग गई थी. मैं तो अपनी बीमारी का कंबल ओढ़े पड़ी रहती थी. किसी को क्या तकलीफ है, मुझे इस से कोई मतलब नहीं था. घर में एक औरत रखी गई, जो माताजी की दिनरात सेवा करती थी. उस का नाम था सुषमा. मैं देखती, कुढ़ती, मां के लिए हर्ष कितना चिंतित हैं, मेरी कोई परवा नहीं, लेकिन मैं यह देख कर भी हैरान होती कि यह सुषमा किस माटी की बनी है. सुबह से ले कर देर रात तक यह कितनी फुरती से काम करती है. थकती तक नहीं. मुंह पर शिकन तक नहीं आती. हमेशा  हंसती रहती.

एक दिन मैं लौन में बैठी थी तो सुषमा भी मेरे पास आ कर बैठ गई. बड़े प्यार और हमदर्दी से बोली थी, ‘आप को क्या तकलीफ है, मैडम?’

‘कुछ समझ में नहीं आता,’ मैं ने थके स्वर में कहा था.

‘डाक्टर क्या बताते हैं?’

‘किसी की समझ में कुछ आए तो कोई बताए. किसी काम में मन नहीं लगता, किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता. हर समय घबराहट घेरे रहती है.’

‘मेरी बात का बुरा मत मानना, मैडम, एक बात कहूं?’ सुषमा ने डरतेडरते पूछा था.

‘कहो.’

‘आप अपने को व्यस्त रखा करिए. कई बार इंसान के सामने कोई काम नहीं होता तो वह इसी तरह अनमना सा बना रहता है. बच्चों को भी आप ने होस्टल में भेज दिया, वरना तो उन्हीं का कितना काम हो जाता. आप अपने घर की देखभाल खुद क्यों नहीं करतीं?’

‘एक बात बता, सुषमा, तू रोज दोपहर को 2-3 घंटे के लिए कहां जाती है?’ मैं ने उत्सुकता से पूछा था.

‘कहीं भी चली जाती हूं, मालकिन. कमला को बच्चा हुआ, उस की मालिश करनी होती है. 28 नंबर वाले जगदीशजी की मां बीमार है, उस की मदद करने चली जाती हूं. निम्मी भाभी हैं न…’

‘यह निम्मी भाभी कौन हैं?’

‘जहां मैं पहले काम करती थी. उन के पास नौकरानी है तो सही, लेकिन उन्हें मुझ से बड़ा प्रेम है. उन के छोटेछोटे बालबच्चे हैं. शाम को स्कूल से आते हैं तो निम्मी भाभी की जा कर मदद कर देती हूं. वे खुद भी पढ़ाने जाती हैं, थकीहारी आती हैं.’

‘फिर ये रुपए किस के लिए ले जाती है तू?’ मैं हैरान थी.

‘कितने ही जरूरतमंद ऐसे हैं जिन्हें सेवा और पैसे की जरूरत होती है. मेरे पीछे कौन खाने वाला है जिस के लिए इकट्ठा करूं? सोचती हूं, चार पैसे किसी जरूरतमंद के काम आ जाएं तो अच्छा ही है.’

‘तुम्हें पता रहता है किसे पैसे की या सेवा की जरूरत है?’

‘दुनिया बहुत बड़ी है, मैडम. बाहर निकल कर आप देखेंगी तो जान पाएंगी कि किस को क्या चाहिए. कौन दुख का मारा रास्ता देख रहा है कि कोई आए और उस के दुख बांट ले,’ सुषमा कितने उत्साह से बोल रही थी, ‘मैडम, बड़ा फायदा है दूसरों का दुख बांटने में. मन को कितना संतोष मिलता है, सुख मिलता है. जब हम बाहर निकल कर दूसरों की तकलीफों को देखते हैं तो सच मानिए, अपनी तकलीफ अपनेआप ठीक हो जाती है.’

‘तू थकती नहीं, सुषमा?’

‘नहीं, मैम. यह काम ही तो है जिस ने मुझे इस उम्र में भी तंदुरुस्त रखा हुआ है. फिर इस शरीर को इतना भी क्या संभाल कर रखें, यह हमारे किस काम आएगा? जानवरों का तो चाम भी काम आ जाता है. अपनी चमड़ी तो उस काम भी नहीं आती. फिर क्यों न इस से जीभर के मेहनत की जाए? संभाल कर रखने से तो इसे जंग खा जाएगा, जैसे मशीन बंद पड़ी रहे तो उस में जंग लग जाता है.’

‘सच, सुषमा?’ जैसे मैं सपने से जगी थी.

‘हां, मालकिन, दूसरों का दुख बांट लो तो अपना खुद ही कम हो जाएगा. फिर कैसी सुस्ती, कैसी उदासी और कैसी बीमारी? मैं तो अपने शरीर को हरामखोरी नहीं करने देती, मैडम,’ सुषमा कितने विश्वास से यह बात कह गई थी.

सुषमा उठ कर चली गई थी मेरे लिए प्रश्नचिह्न छोड़ कर. बिहार के उस लगभग अनपढ़ गांव की औरत ने कितने बड़े राज की बात कह दी थी. उस की बातें मुझे कहीं भीतर तक चीरती हुई निकल गई थीं. यह सुषमा, जिस के पास मुट्ठीभर पूंजी है, उसे बांट कर कितने सुखसंतोष का अनुभव करती है. दूसरों की सेवा में कितना इसे आनंद मिलता है, और मैं अपने शरीर को लिए ही चिंतित हूं. मैं क्या किसी के लिए कुछ नहीं कर सकती? अब मैं किसी निश्चय पर पहुंच चुकी थी.

हर्ष को सुबह उठते ही एक कप कौफी लेने की आदत थी. मेरी तबीयत खराब होने से यह काम नौकर करने लगा था, क्योंकि मैं तो देर तक बिस्तर पर पड़ी रहती थी. यह मेरा काम था जिसे मैं भूल गई थी. जब उस रोज सुबह में कौफी ले कर पहुंची तो हर्ष बड़ी हैरानी से मुझे देखते रह गए, ‘तुम, मनसुख कहां गया?’

‘यह मेरा काम था. मैं भूल गई थी,’ मैं ने निगाह नीची किए कहा था.

‘लेकिन तुम्हारी तबीयत?’ वे हैरान थे.

‘वह अब ठीक हो जाएगी. मुझे पता लग गया है, मुझे क्या बीमारी थी,’ मैं शरारत से मुसकरा दी थी.

‘क्या थी?’

‘मेरी बीमारी का नाम हरामखोरी था. मेरे डाक्टर ने मुझे समझा दिया है.’

‘कौन सा डाक्टर?’ वे जानने को उत्सुक थे.

‘सुषमा…सच, मैं तो यह भूल ही गई थी कि दूसरों को भी मेरी जरूरत है. मैं इतनी स्वार्थी हो गई थी कि बस यही चाहती थी सब मेरी चिंता करें. सब का दुखदर्द समझती तो न खुद मैं परेशान रहती, न ही इतनी बोरियत सताती. सुषमा ने मुझे सोते से जगा दिया है.

‘इस के बाद वह मेरी आदर्श बन गई, मेरी गुरु, जिस ने मुझे जीने की राह बताई है, मेरी झोली में खुशियां भर दी हैं, मुझे मेरा परिवार लौटा दिया है,’ मेरी आंखों में कितनी ही खुशी के आंसू आ गए थे. मेरे बच्चे मेरे पास वापस आ गए. कहने लगे होस्टल में मन नहीं लगता. हर्ष और मां खुश हैं. मैं कितनी खुश हूं सुषमा को पा कर जिस ने मेरा इतना काम बढ़ा दिया है. लगता है, दिन खत्म हो गया पर काम तो पूरा हुआ नहीं. वह भी तो जुटी रहती है सब के दुख बांटने में. मैं ने सोच लिया है कि अब सुषमा को अपने से दूर नहीं करूंगी. कहीं मैं फिर न भटक जाऊं. उसे देख कर हमेशा यही खयाल आता है कि जो सुख दूसरों के दुख मिटाने में है वह अपने को सहेज कर रखने में कहां है. हम दूसरों का दुख कम करेंगे तो हमारा दुख अपनेआप कम हो जाएगा.

The post सुषमा-भाग 3: हर्ष ने बाबा को क्या बताया? appeared first on Sarita Magazine.

August 26, 2020 at 10:00AM

No comments:

Post a Comment