Wednesday, 24 June 2020

जीत-भाग 3 : रमा को लेकर गंगा क्यों चिंतित थी?

और फिर दोनों पहले की तरह एकदूसरे से मिलते रहे. एक दिन रजत ने रमा से कहा, ‘‘रमा, जो बात तुम ने मुझ से कही है, वही अगर मां से कह दो तो उन का दुख कम हो जाएगा और वह शादी के लिए राजी हो सकती.’’

रमा थोड़ी देर के लिए चुप हो गईर् थी. फिर बोली, ‘‘अगर मां मुझे प्रेम से बुलाएं तो मैं जाऊं. सौ बार माफी मांगूं, लेकिन इस तरह मैं क्यों जाऊं? फिर मेरी बेइज्जती कर दें तो…?’’

‘‘ऐसा नहीं होगा, मेरा दिल कहता है.’’ और रजत के दिल की बात मान कर रमा फिर गंगा से मिलने गईर् थी. लेकिन गंगा ने फिर उस की बेइज्जती कर दी थी. पूरी तरह बेइज्जत हो कर वापस हुई थी वह. रजत ने उसे तो समझाया था, लेकिन अपनी मां से एक भी शब्द नहीं कह सका था. अगर कहा होता तो आज रमा की यह हालत न हुईर् होती.

उस के दिल में रजत के लिए जहां प्यार था वहां नफरत पैदा होने लगी. अच्छा हुआ कि रजत उस समय वहां नहीं था, नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता.

4 दिन बीत गए. लेकिन इन 4 दिनों में एकसाथ बहुतकुछ घट गया. रमा ने अपना तबादला लखनऊ करवा लिया, जहां उस का अपना घर था.

5 वर्षों पहले एमए करने के बाद उस की नौकरी इलाहाबाद में लगी थी. वह चाहती तो अपने शहर में भी रह सकती थी. लेकिन यहां इस शहर में रह कर वह नौकरी के साथसाथ आईएएस की तैयारी भी करना चाहती थी. इसलिए इलाहाबाद में ही अपने मामा के साथ रहने लगी थी. जब वह अपने शहर लौटी तो उस के मांबाप ने उस के चेहरे पर छाई उदासी देख कर पूछा था कि क्या बात है, तुम इतनी उदास क्यों हो? लेकिन रमा ने सिर्फ इतना कहा था, ‘वहां अच्छा नहीं लगा. अब मुझे लगने लगा है कि मेरा दाखिला आईएएस में नहीं होगा, इसलिए उदास हो कर लौट आई हूं.’ शहर छोड़ने से पहले वह शाम को औफिस के पीछे रजत से मिली थी.

रमा उदास चेहरे से चुपचाप रजत को देखती रही. रजत ऊबने सा लगा. चुप्पी उसे बहुत अखर रही थी. उस ने बहुत धीरे से, उदास स्वर में कहा था, ‘रमा, अभी थोड़े दिन और धीरज रखो.’

तब रमा हंसी थी, ‘तुम्हारी इस सीख के लिए बहुतबहुत धन्यवाद.’

रजत ने सिर झुकाए हुए कहा, ‘फिर क्या कहूं मैं?’

‘कुछ नहीं, जो कुछ कहना है मुझे कहना है, मुझे करना है. मैं तुम से इसलिए मिलने आई हूं कि अपने प्रेम के लिए, सुख के लिए तुम्हारी जो शर्तें हैं, वे मुझे मंजूर नहीं हैं.’

‘मेरी शर्तें? मेरी कोई शर्त नहीं है.’

‘तुम्हारी मां को मनाने की. तुम चाह कर भी यह काम नहीं कर सकते.’

रजत जमीन की ओर ही ताकता रहा.

‘और मुझे विश्वास हो गया है कि…’

रजत ने बात काटते हुए कहा, ‘यही कि मैं तुम से प्रेम नहीं करता?’

‘नहीं.’

‘तो?’

‘तुम डरपोक हो. तुम किसी से प्यार करने लायक नहीं हो.’

और आगे बिना कुछ बोले, बिना कुछ सुने उस ने एक झटके के साथ गरदन घुमाई और रजत को वहीं छोड़ कर चली गई. दूसरे दिन वह लखनऊ चली गई थी.

रमा के चले जाने के बाद रजत कुछ दिनों तक उदास रहा. लेकिन गंगा बहुत खुश थी. लड़का अभी जवान है,

इस की उदासी 2-4 दिनों में चली जाएगी, यह उस को विश्वास था. दिन बीतने लगे.

एक दिन सुबह पोस्टमैन ने आवाज दी और एक लिफाफा फेंक कर चला गया. रजत औफिस जाने के लिए तैयार हो चुका था. लिफाफा उस ने उठाया. ऊपर रमा की लिखावट देख कर उस का चेहरा खिल उठा.

‘‘किस की चिट्ठी है?’’ गंगा ने पूछा.

रजत ने कुछ नहीं कहा. लिफाफा खोल कर देखा, उस में सिर्फ एक फोटो था. एक दिन रमा और रजत ने साथसाथ फोटो खिंचवाई थी. वही फोटो थी. उस की कौपी रजत के पास भी थी. रमा ने वही भेजी थी. फोटो में रजत रमा को हंसते हुए देख रहा था, और उसे अपनी बांहों में भरे हुए था.

फोटो देख कर रजत का चेहरा

खिल उठा.

गंगा रजत के पास आ गई और उस के हाथ से फोटो छीन लिया. वह थोड़ी देर तक उसे देखती रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘छिनाल.’’

लेकिन फोटो के पीछे जो लिखा था, उसे पढ़ कर भड़क उठी. फोटो के पीछे लिखा था, ‘माताजी, मैं आप के बेटे के साथ ही शादी करूंगी.’

लिखावट पढ़ कर गंगा कांपने लगी. फोटो रजत के ऊपर फेंक दी, ‘‘देख लिया न,’’ चीखती हुई गंगा बोली, ‘‘जैसी थी, वैसी करामात कर गई? मैं तो पहले ही कह रही थी कि…’’

रजत ने चेहरा घुमा कर कहा, ‘‘इस तरह की तो नहीं थी…’’

‘‘क्या कहा?’’

लेकिन रजत ने आगे कुछ नहीं कहा और औफिस चला गया.

गंगा ने नीचे पड़े फोटो को उठाया और ले जा कर अलमारी में नीचे डाल दिया.

वह काम में मन लगाने की कोशिश करने लगी. पर काम में उस का मन नहीं लगा और एक बार फोटो निकाल कर उस ने फिर से देखा. काफी देर तक  वह फोटो को देखती रही. फिर वापस काम में लग गई.

रात में गंगा को नींद नहीं आ रही थी. उस की आंखों के सामने वही फोटो नाचती रही. 2 दिनों बाद फिर उसी तरह का एक लिफाफा आया. इस दिन लिफाफा गंगा को ही मिला. लिफाफे में उसी तरह का फोटो और उसी तरह की बात लिखी थी, जो पहले फोटो में लिखी थी.

औफिस जाने के लिए रजत कपड़े पहन रहा था. गंगा ने फोटो उस के ऊपर फेंकी, ‘‘ले जा, अपनी फोटो.’’

पता नहीं क्यों रजत को हंसी आ गई.

इस पर गंगा को गुस्सा आ गया, लेकिन बिना कुछ बोले ही वह आंगन में चली गई.

रजत के चले जाने के बाद वह बाहर आई. फोटो देखे बिना उसे चैन नहीं आया. फोटो के पीछे जो लिखा था, उसे फिर से पढ़ना चाहती थी. खीझते हुए उस ने फोटो को उठाया और ले जा कर अलमारी में रख दिया.

अगले दिन पोस्टमैन ने फिर एक लिफाफा फेंका. गंगा उस के ऊपर नाराज हो गई, ‘‘इस के अलावा और कोई चिट्ठी नहीं आती है, क्या?’’

पोस्टमैन हंसा, ‘‘दूसरी आएगी तो दूंगा ही माताजी,’’ और हंसते हुए चला गया.

गंगा को लगा, रजत भी उस पर हंस रहा है. उस का मजाक उड़ा रहा है. लिफाफा ले कर वह रजत के पास गई और बोली. ‘‘ले, और हंस ले.’’

रजत सहम सा गया.

गंगा मारे गुस्से के कांप उठी. फिर बिना कुछ बोले चली गई.

फिर तो रोजाना ही डाक से एक लिफाफा आने का सिलसिला चल पड़ा. उस में रमा और रजत का वही फोटोग्राफ होता और वही लिखा होता. गंगा का गुस्सा अब कम होने लगा था. वह खीझती भी नहीं थी. लिफाफा आता तो पोस्टमैन के हाथ से खुद ही जा कर ले आती. लिफाफा खोलती, फोटो देखती और जो लिखा होता उसे प्यार से पढ़ती. मुसकराते हुए फोटो ले जा कर अलमारी में रख देती. अब वह दिन में कई बार फोटो देखती.

एक दिन रजत ने पोस्टमैन से कहा, ‘‘लिफाफा तुम मुझे दे दिया करो. मेरी मां को नहीं.’’

‘‘लेकिन पता तो उस पर गंगा मां का ही लिखा रहता है और चिट्ठी भी उन्हीं के नाम आती है,’’ पोस्टमैन ने कहा.

इतनी देर में गंगा आ गई. बोली, ‘‘मेरा लिफाफा मुझे ही देना. मेरी बहू का फोटो मुझे देना, किसी दूसरे को नहीं.’’

पोस्टमैन चला गया तो गंगा ने रजत की ओर रुख किया, ‘‘डरपोक कहीं का. जब तुझ में इतना दम नहीं था तो प्यार ही क्यों किया था? तुझ से बहादुर तो मेरी बहू ही है, जिस ने मुझे हरा दिया.’’

रजत मंदमंद मुसकराता हुआ घर से बाहर निकल गया.

 

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और फिर दोनों पहले की तरह एकदूसरे से मिलते रहे. एक दिन रजत ने रमा से कहा, ‘‘रमा, जो बात तुम ने मुझ से कही है, वही अगर मां से कह दो तो उन का दुख कम हो जाएगा और वह शादी के लिए राजी हो सकती.’’

रमा थोड़ी देर के लिए चुप हो गईर् थी. फिर बोली, ‘‘अगर मां मुझे प्रेम से बुलाएं तो मैं जाऊं. सौ बार माफी मांगूं, लेकिन इस तरह मैं क्यों जाऊं? फिर मेरी बेइज्जती कर दें तो…?’’

‘‘ऐसा नहीं होगा, मेरा दिल कहता है.’’ और रजत के दिल की बात मान कर रमा फिर गंगा से मिलने गईर् थी. लेकिन गंगा ने फिर उस की बेइज्जती कर दी थी. पूरी तरह बेइज्जत हो कर वापस हुई थी वह. रजत ने उसे तो समझाया था, लेकिन अपनी मां से एक भी शब्द नहीं कह सका था. अगर कहा होता तो आज रमा की यह हालत न हुईर् होती.

उस के दिल में रजत के लिए जहां प्यार था वहां नफरत पैदा होने लगी. अच्छा हुआ कि रजत उस समय वहां नहीं था, नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता.

4 दिन बीत गए. लेकिन इन 4 दिनों में एकसाथ बहुतकुछ घट गया. रमा ने अपना तबादला लखनऊ करवा लिया, जहां उस का अपना घर था.

5 वर्षों पहले एमए करने के बाद उस की नौकरी इलाहाबाद में लगी थी. वह चाहती तो अपने शहर में भी रह सकती थी. लेकिन यहां इस शहर में रह कर वह नौकरी के साथसाथ आईएएस की तैयारी भी करना चाहती थी. इसलिए इलाहाबाद में ही अपने मामा के साथ रहने लगी थी. जब वह अपने शहर लौटी तो उस के मांबाप ने उस के चेहरे पर छाई उदासी देख कर पूछा था कि क्या बात है, तुम इतनी उदास क्यों हो? लेकिन रमा ने सिर्फ इतना कहा था, ‘वहां अच्छा नहीं लगा. अब मुझे लगने लगा है कि मेरा दाखिला आईएएस में नहीं होगा, इसलिए उदास हो कर लौट आई हूं.’ शहर छोड़ने से पहले वह शाम को औफिस के पीछे रजत से मिली थी.

रमा उदास चेहरे से चुपचाप रजत को देखती रही. रजत ऊबने सा लगा. चुप्पी उसे बहुत अखर रही थी. उस ने बहुत धीरे से, उदास स्वर में कहा था, ‘रमा, अभी थोड़े दिन और धीरज रखो.’

तब रमा हंसी थी, ‘तुम्हारी इस सीख के लिए बहुतबहुत धन्यवाद.’

रजत ने सिर झुकाए हुए कहा, ‘फिर क्या कहूं मैं?’

‘कुछ नहीं, जो कुछ कहना है मुझे कहना है, मुझे करना है. मैं तुम से इसलिए मिलने आई हूं कि अपने प्रेम के लिए, सुख के लिए तुम्हारी जो शर्तें हैं, वे मुझे मंजूर नहीं हैं.’

‘मेरी शर्तें? मेरी कोई शर्त नहीं है.’

‘तुम्हारी मां को मनाने की. तुम चाह कर भी यह काम नहीं कर सकते.’

रजत जमीन की ओर ही ताकता रहा.

‘और मुझे विश्वास हो गया है कि…’

रजत ने बात काटते हुए कहा, ‘यही कि मैं तुम से प्रेम नहीं करता?’

‘नहीं.’

‘तो?’

‘तुम डरपोक हो. तुम किसी से प्यार करने लायक नहीं हो.’

और आगे बिना कुछ बोले, बिना कुछ सुने उस ने एक झटके के साथ गरदन घुमाई और रजत को वहीं छोड़ कर चली गई. दूसरे दिन वह लखनऊ चली गई थी.

रमा के चले जाने के बाद रजत कुछ दिनों तक उदास रहा. लेकिन गंगा बहुत खुश थी. लड़का अभी जवान है,

इस की उदासी 2-4 दिनों में चली जाएगी, यह उस को विश्वास था. दिन बीतने लगे.

एक दिन सुबह पोस्टमैन ने आवाज दी और एक लिफाफा फेंक कर चला गया. रजत औफिस जाने के लिए तैयार हो चुका था. लिफाफा उस ने उठाया. ऊपर रमा की लिखावट देख कर उस का चेहरा खिल उठा.

‘‘किस की चिट्ठी है?’’ गंगा ने पूछा.

रजत ने कुछ नहीं कहा. लिफाफा खोल कर देखा, उस में सिर्फ एक फोटो था. एक दिन रमा और रजत ने साथसाथ फोटो खिंचवाई थी. वही फोटो थी. उस की कौपी रजत के पास भी थी. रमा ने वही भेजी थी. फोटो में रजत रमा को हंसते हुए देख रहा था, और उसे अपनी बांहों में भरे हुए था.

फोटो देख कर रजत का चेहरा

खिल उठा.

गंगा रजत के पास आ गई और उस के हाथ से फोटो छीन लिया. वह थोड़ी देर तक उसे देखती रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘छिनाल.’’

लेकिन फोटो के पीछे जो लिखा था, उसे पढ़ कर भड़क उठी. फोटो के पीछे लिखा था, ‘माताजी, मैं आप के बेटे के साथ ही शादी करूंगी.’

लिखावट पढ़ कर गंगा कांपने लगी. फोटो रजत के ऊपर फेंक दी, ‘‘देख लिया न,’’ चीखती हुई गंगा बोली, ‘‘जैसी थी, वैसी करामात कर गई? मैं तो पहले ही कह रही थी कि…’’

रजत ने चेहरा घुमा कर कहा, ‘‘इस तरह की तो नहीं थी…’’

‘‘क्या कहा?’’

लेकिन रजत ने आगे कुछ नहीं कहा और औफिस चला गया.

गंगा ने नीचे पड़े फोटो को उठाया और ले जा कर अलमारी में नीचे डाल दिया.

वह काम में मन लगाने की कोशिश करने लगी. पर काम में उस का मन नहीं लगा और एक बार फोटो निकाल कर उस ने फिर से देखा. काफी देर तक  वह फोटो को देखती रही. फिर वापस काम में लग गई.

रात में गंगा को नींद नहीं आ रही थी. उस की आंखों के सामने वही फोटो नाचती रही. 2 दिनों बाद फिर उसी तरह का एक लिफाफा आया. इस दिन लिफाफा गंगा को ही मिला. लिफाफे में उसी तरह का फोटो और उसी तरह की बात लिखी थी, जो पहले फोटो में लिखी थी.

औफिस जाने के लिए रजत कपड़े पहन रहा था. गंगा ने फोटो उस के ऊपर फेंकी, ‘‘ले जा, अपनी फोटो.’’

पता नहीं क्यों रजत को हंसी आ गई.

इस पर गंगा को गुस्सा आ गया, लेकिन बिना कुछ बोले ही वह आंगन में चली गई.

रजत के चले जाने के बाद वह बाहर आई. फोटो देखे बिना उसे चैन नहीं आया. फोटो के पीछे जो लिखा था, उसे फिर से पढ़ना चाहती थी. खीझते हुए उस ने फोटो को उठाया और ले जा कर अलमारी में रख दिया.

अगले दिन पोस्टमैन ने फिर एक लिफाफा फेंका. गंगा उस के ऊपर नाराज हो गई, ‘‘इस के अलावा और कोई चिट्ठी नहीं आती है, क्या?’’

पोस्टमैन हंसा, ‘‘दूसरी आएगी तो दूंगा ही माताजी,’’ और हंसते हुए चला गया.

गंगा को लगा, रजत भी उस पर हंस रहा है. उस का मजाक उड़ा रहा है. लिफाफा ले कर वह रजत के पास गई और बोली. ‘‘ले, और हंस ले.’’

रजत सहम सा गया.

गंगा मारे गुस्से के कांप उठी. फिर बिना कुछ बोले चली गई.

फिर तो रोजाना ही डाक से एक लिफाफा आने का सिलसिला चल पड़ा. उस में रमा और रजत का वही फोटोग्राफ होता और वही लिखा होता. गंगा का गुस्सा अब कम होने लगा था. वह खीझती भी नहीं थी. लिफाफा आता तो पोस्टमैन के हाथ से खुद ही जा कर ले आती. लिफाफा खोलती, फोटो देखती और जो लिखा होता उसे प्यार से पढ़ती. मुसकराते हुए फोटो ले जा कर अलमारी में रख देती. अब वह दिन में कई बार फोटो देखती.

एक दिन रजत ने पोस्टमैन से कहा, ‘‘लिफाफा तुम मुझे दे दिया करो. मेरी मां को नहीं.’’

‘‘लेकिन पता तो उस पर गंगा मां का ही लिखा रहता है और चिट्ठी भी उन्हीं के नाम आती है,’’ पोस्टमैन ने कहा.

इतनी देर में गंगा आ गई. बोली, ‘‘मेरा लिफाफा मुझे ही देना. मेरी बहू का फोटो मुझे देना, किसी दूसरे को नहीं.’’

पोस्टमैन चला गया तो गंगा ने रजत की ओर रुख किया, ‘‘डरपोक कहीं का. जब तुझ में इतना दम नहीं था तो प्यार ही क्यों किया था? तुझ से बहादुर तो मेरी बहू ही है, जिस ने मुझे हरा दिया.’’

रजत मंदमंद मुसकराता हुआ घर से बाहर निकल गया.

 

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June 25, 2020 at 10:00AM

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