Sunday, 3 May 2020

मदर्स डे स्पेशल: मैं लौट आया मां- भाग 3

‘यह बात सच है बेटा.’ ‘नहीं, यह नहीं हो सकता,’ कह कर उस ने छवि की तरफ देखा. छवि की नजरें मिलीं और झुक गईं. ‘इस का मतलब मेरे मातापिता आप दोनों नहीं बल्कि चाचाचाची हैं और आप मेरे ताऊताई हैं.’ ‘नहीं बेटा, हम ही तेरे मातापिता हैं,’ छवि की आवाज भर्रा गई. उस ने रुद्र को अपने से लिपटाना चाहा पर रुद्र उसे झटका दे कर अपने कमरे में चला गया. नीरज और छवि अपनी जगह पर जड़वत खड़े रह गए. ‘अब क्या होगा…’ कहते हुए छवि रो पड़ी और आगे कहा, ‘इसीलिए मैं ने मना किया था.’ वह उस के कमरे की तरफ जाने को तत्पर हो गई. पर नीरज ने रोक लिया. ‘कब तक छवि, एक दिन यह तो होना ही था. उसे थोड़ा सोचनेसमझने का वक्त दो, थोड़ा स्थिर हो जाएगा तब समझाएंगे उसे. अपने जीवन का इतना बड़ा सच जानने के बाद उसे थोड़ा झटका तो लगेगा ही, पर मुझे विश्वास है, सब ठीक हो जाएगा.’ रुद्र्र रात तक कमरे से बाहर नहीं निकला तो रात को छवि उसे खाने के लिए बुलाने गई. रुद्र चुपचाप अपनी स्टडी टेबल पर बैठा हुआ था.

‘चलो बेटा, खाना खा लो,’ वह उस के सिर में हाथ फेरते हुए बोली.

‘मुझे नहीं खाना है,’ कह कर उस ने उस का हाथ झटक दिया. ‘रुद्र, इतना नाराज होना ठीक नहीं बेटा, आखिर ताऊताई या मातापिता में क्या फर्क है. हो तो तुम इसी परिवार के न, हमें तुम कितने प्रिय हो, तुम जानते हो रुद्र…’ ‘जब कोई फर्क नहीं तो आप ने मुझे ताऊताई बन कर ही प्यार क्यों नहीं किया, अपने स्वार्थ के लिए आप ने आज मेरे जीवन में इतना बड़ा भूचाल ला दिया और इतने सालों तक मुझ से इतना बड़ा सच छिपाया,’ कह कर वह एक झटके से उठ कर कमरे से बाहर निकल गया. छवि का हृदय तारतार हो गया. बारबार नियति उस का सबकुछ छीन लेती है. कई दिन गुजर गए. छवि और नीरज ने बहुत कोशिश की पर रुद्र का अबोला न टूटा. तीनों के बीच संवादहीनता की स्थिति आ गई थी. धीरेधीरे नीरज और छवि के सब्र का बांध भी टूटने लगा. एक दिन नीरज ने रुद्र से सीधे ही पूछ लिया, ‘आखिर तुम चाहते क्या हो रुद्र, ऐसा कब तक चलेगा, तुम्हारी पढ़ाई का भी नुकसान हो रहा है ऐसे में.’ ‘मुझे मुंबई जाना है अपने मातापिता के पास, वहीं रह कर पढ़ूंगा.’

‘क्या…?’ नीरज और छवि जैसे आसमान से गिर गए.

‘लेकिन रुद्र्र…’

‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं…’ वह दृढ़ता से बोला, ‘अगर आप ताऊताई बन कर ही प्यार करते, बेटा समझते तो क्या बिगड़ जाता? मैं अपने मातापिता से अलग नहीं होता, और मेरी जिंदगी में भी भूचाल नहीं आता.’ नीरज और छवि ने उसे बहुत समझाया और आखिर में उस के तर्कों के आगे नीरज ने हथियार डाल दिए. छवि को समझाया. ‘जाने दो उसे, छवि. रोके न रुकेगा वह. अगर हमें औलाद का सुख नहीं है तो वह नहीं मिलेगा. जबरदस्ती का भ्रम मत पालो, मैं उस के जाने का प्रबंध करता हूं और समर को सबकुछ बता देता हूं.’ छवि ने मौन स्वीकृति दे दी. नीरज ने रुद्र की फ्लाइट की टिकट बुक कर दी और समर को सबकुछ बता दिया. सबकुछ सुन कर समर और प्रिया भी दुखी हो गए. ‘ठीक है भैया, आप उसे भेज दीजिए. हम उसे समझाएंगे. मुझे विश्वास है सब ठीक हो जाएगा.’ रुद्र मुंबई चला गया. नीरज और छवि लुटेपिटे से रह गए. 2 महीने हो गए थे रुद्र को गए हुए. इस बीच न मुंबई से कोई फोन आया था न उन्होंने ही कोई संपर्क करने की कोशिश की थी. दोनों ने खुद को नियति के हाथों सौंप दिया था. जो भी होगा अब. यों तो रुद्र ने अब घर से पढ़ाई के लिए जाना ही था पर उस जाने में और इस जाने में फर्क था. हरसिंगार के पेड़ के नीचे बैठी छवि को बाहर का मौसम भी नहीं लुभा पा रहा था. 4 दिन बाद दीवाली थी पर उस ने कुछ भी तैयारी नहीं की थी और करे भी तो किस के लिए. तभी उसे नीरज अपनी तरफ आते हुए दिखे.

‘‘छवि, तुम यहां बैठी हो और मैं तुम्हें सब जगह ढूंढ़ रहा हूं.’’ नीरज का स्वर सुन कर छवि की तंद्रा भंग हुई.

‘‘किसलिए?’’ छवि रिक्त भाव से बोली.

‘‘समर का फोन आया है कि वह परिवार सहित घर आ रहा है दीवाली पर.’’ ‘‘अच्छा,’’ छवि की आंखों की ज्योति पलभर के लिए प्रदीप्त हुई, फिर बुझ गई, ‘‘तो क्या करूं, क्या करने आ रहा है यहां, वहीं दीवाली मनाए अपने परिवार के साथ. उस का परिवार तो पूरा हो गया न.’’ ‘‘तुम भी न छवि, क्याक्या सोचती रहती हो, इस में उस की क्या गलती है. उठो, कुछ तैयारी करो, बहुत समय बाद दीवाली के मौके पर घर आ रहा है. घर में चलहपहल रहेगी, फिर रुद्र भी तो आएगा.’’

‘‘क्या फर्क पड़ता है अब,’’ छवि निर्विकार भाव से बोली.

‘‘छवि, प्लीज, तुम सिर्फ रुद्र की नहीं समर और मनु की भी मां समान हो, बाहर निकलो अपनी इस उदासी से.’’ आखिर छवि हलकीफुलकी तैयारी करने लगी. तैयारी करतेकरते सबकुछ अच्छे से ही कर लिया. दीवाली आई, समर परिवार सहित आया और साथ में रुद्र भी. छवि सब से बाहरी दिल से ही सही पर ठीक से मिली. रुद्र की तरफ उस ने देखा भी नहीं. मनु और रुद्र अब युवा थे. 2 सुदर्शन युवा बेटे हैं समर और प्रिया के. कितना सुदृढ़ सहारा है उन का. उस का हृदय कसक गया. क्या होगा उन का. कैसे काटेंगे बाकी की जिंदगी. सब के आने से घर में चहलपहल हो गई. अगले दिन दीवाली थी. सब अपनेअपने हिसाब से दीवाली की तैयारी कर रहे थे. मनु और रुद्र थे तो जाहिर है खूब पटाखे भी फूटने थे. प्रिया ने किचन की जिम्मेदारी ले ली. कई तरह के पकवान तैयार करा लिए. एकदो बार रुद्र सामने अकेले पड़ा पर वह निर्विकार रही. रुद्र के चेहरे को देख कर लग रहा था कि शायद वह कुछ कहना चाहता है पर छवि ने उसे मौका नहीं दिया. उस का दिल अब पूरी तरह से टूट चुका था. उस ने खुद को मजबूत कर लिया था. जो सुख उसे नियति नहीं देना चाहती उस के पीछे क्यों भागे. दीवाली के दिन सुबह से ही गहमागहमी थी. नीरज सबकुछ बिसरा कर परिवार के साथ मगन हो गए थे. लेकिन छवि खुद को सहज नहीं कर पा रही थी.

उस के हृदय में समर के प्रति भी हलकीफुलकी नफरत जन्म ले रही थी. उसे लग रहा था कि वे दोनों भी नियति के इस फैसले से खुश हैं. उन्हें उन का बेटा वापस मिल गया था. खुद के काम से निबट कर समर घर के नौकरोंचाकरों को उपहार देने लगा. सब को कुछ न कुछ देने के बाद समर और प्रिया उस के पास आए.

‘‘भाभी, इस दीवाली पर भी हम आप के लिए कुछ खास उपहार लाए हैं.’’ ‘‘मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा खास उपहार, पहले भी दीवाली पर तुम ने एक बार खास उपहार दिया था,’’ कह कर उस ने मुंह फेर लिया. ‘‘पर देखो तो भाभी, एक बार इधर तो देखो…’’ कह कर उस ने जबरदस्ती छवि का चेहरा अपनी तरफ करने की कोशिश की. ‘‘नहीं, अब मुझ में ताकत नहीं बची है समर, अब मुझे कोई धोखा नहीं चाहिए. मैं ऐसे ही ठीक हैं,’’ कह कर छवि फूटफूट कर रो पड़ी. तभी किन्हीं मजबूत बांहों ने उसे पीछे से लिपटा लिया. ‘‘मैं लौट आया, मां, हमेशा के लिए, मुझे माफ कर दो.’’

‘‘रुद्र…’’ छवि ने पलट कर देखा. रुद्र की आंखें नम थीं. उस की आंखों में आश्चर्य तैर गया. ‘‘हां मां, मैं ने यह नहीं सोचा कि अगर आप ने मुझे ताऊताई न कह कर मातापिता के रूप में पालापोसा और प्यार दिया तो क्या फर्क पड़ गया. चाचाचाची मुझ से दूर थोड़े ही न हो गए. मेरा विश्वास करो मां, मैं अब आप दोनों को छोड़ कर कभी नहीं जाऊंगा, पापा का सपना पूरा करूंगा.’’ ‘‘लेकिन…’’ उस ने उसी अविश्वासभरी नजरों से समर की तरफ देखा, जैसा उस ने तब देखा था जब समर और प्रिया ने पहली बार रुद्र को सौंपा था. ‘‘हां भाभी, मैं ने रुद्र को सबकुछ बताया और समझाया, इस बार मैं उसे आप को नहीं दे रहा हूं. बल्कि वह खुद अपने ममापापा के पास लौट आया है. वह आप दोनों को ही प्यार करता है मातापिता के रूप में. हमें नहीं, आप दोनों के लिए ही रोया है इन 2 महीनों में.’’

‘‘सच,’’ उस ने नीरज की तरफ देखा. नीरज ने उसे कंधे से थाम लिया. ‘‘अब गले लगाओ बेटे को छवि, अब सही माने में हम मातापिता बने हैं.’’ छवि ने रुद्र को कस कर गले लगा लिया और नीरज ने उन दोनों को, और समर ने तीनों की फोटो खींच ली. प्रिया ने गहरी सांस ली, ‘बस, अब यह परिवार कभी न बिखरे.’ इस दीवाली में सही माने में उन के घर दीये जगमगाए थे. बिना किसी अनजाने भय के खुशियां बिखरी थीं उन के घर में.

 

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‘यह बात सच है बेटा.’ ‘नहीं, यह नहीं हो सकता,’ कह कर उस ने छवि की तरफ देखा. छवि की नजरें मिलीं और झुक गईं. ‘इस का मतलब मेरे मातापिता आप दोनों नहीं बल्कि चाचाचाची हैं और आप मेरे ताऊताई हैं.’ ‘नहीं बेटा, हम ही तेरे मातापिता हैं,’ छवि की आवाज भर्रा गई. उस ने रुद्र को अपने से लिपटाना चाहा पर रुद्र उसे झटका दे कर अपने कमरे में चला गया. नीरज और छवि अपनी जगह पर जड़वत खड़े रह गए. ‘अब क्या होगा…’ कहते हुए छवि रो पड़ी और आगे कहा, ‘इसीलिए मैं ने मना किया था.’ वह उस के कमरे की तरफ जाने को तत्पर हो गई. पर नीरज ने रोक लिया. ‘कब तक छवि, एक दिन यह तो होना ही था. उसे थोड़ा सोचनेसमझने का वक्त दो, थोड़ा स्थिर हो जाएगा तब समझाएंगे उसे. अपने जीवन का इतना बड़ा सच जानने के बाद उसे थोड़ा झटका तो लगेगा ही, पर मुझे विश्वास है, सब ठीक हो जाएगा.’ रुद्र्र रात तक कमरे से बाहर नहीं निकला तो रात को छवि उसे खाने के लिए बुलाने गई. रुद्र चुपचाप अपनी स्टडी टेबल पर बैठा हुआ था.

‘चलो बेटा, खाना खा लो,’ वह उस के सिर में हाथ फेरते हुए बोली.

‘मुझे नहीं खाना है,’ कह कर उस ने उस का हाथ झटक दिया. ‘रुद्र, इतना नाराज होना ठीक नहीं बेटा, आखिर ताऊताई या मातापिता में क्या फर्क है. हो तो तुम इसी परिवार के न, हमें तुम कितने प्रिय हो, तुम जानते हो रुद्र…’ ‘जब कोई फर्क नहीं तो आप ने मुझे ताऊताई बन कर ही प्यार क्यों नहीं किया, अपने स्वार्थ के लिए आप ने आज मेरे जीवन में इतना बड़ा भूचाल ला दिया और इतने सालों तक मुझ से इतना बड़ा सच छिपाया,’ कह कर वह एक झटके से उठ कर कमरे से बाहर निकल गया. छवि का हृदय तारतार हो गया. बारबार नियति उस का सबकुछ छीन लेती है. कई दिन गुजर गए. छवि और नीरज ने बहुत कोशिश की पर रुद्र का अबोला न टूटा. तीनों के बीच संवादहीनता की स्थिति आ गई थी. धीरेधीरे नीरज और छवि के सब्र का बांध भी टूटने लगा. एक दिन नीरज ने रुद्र से सीधे ही पूछ लिया, ‘आखिर तुम चाहते क्या हो रुद्र, ऐसा कब तक चलेगा, तुम्हारी पढ़ाई का भी नुकसान हो रहा है ऐसे में.’ ‘मुझे मुंबई जाना है अपने मातापिता के पास, वहीं रह कर पढ़ूंगा.’

‘क्या…?’ नीरज और छवि जैसे आसमान से गिर गए.

‘लेकिन रुद्र्र…’

‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं…’ वह दृढ़ता से बोला, ‘अगर आप ताऊताई बन कर ही प्यार करते, बेटा समझते तो क्या बिगड़ जाता? मैं अपने मातापिता से अलग नहीं होता, और मेरी जिंदगी में भी भूचाल नहीं आता.’ नीरज और छवि ने उसे बहुत समझाया और आखिर में उस के तर्कों के आगे नीरज ने हथियार डाल दिए. छवि को समझाया. ‘जाने दो उसे, छवि. रोके न रुकेगा वह. अगर हमें औलाद का सुख नहीं है तो वह नहीं मिलेगा. जबरदस्ती का भ्रम मत पालो, मैं उस के जाने का प्रबंध करता हूं और समर को सबकुछ बता देता हूं.’ छवि ने मौन स्वीकृति दे दी. नीरज ने रुद्र की फ्लाइट की टिकट बुक कर दी और समर को सबकुछ बता दिया. सबकुछ सुन कर समर और प्रिया भी दुखी हो गए. ‘ठीक है भैया, आप उसे भेज दीजिए. हम उसे समझाएंगे. मुझे विश्वास है सब ठीक हो जाएगा.’ रुद्र मुंबई चला गया. नीरज और छवि लुटेपिटे से रह गए. 2 महीने हो गए थे रुद्र को गए हुए. इस बीच न मुंबई से कोई फोन आया था न उन्होंने ही कोई संपर्क करने की कोशिश की थी. दोनों ने खुद को नियति के हाथों सौंप दिया था. जो भी होगा अब. यों तो रुद्र ने अब घर से पढ़ाई के लिए जाना ही था पर उस जाने में और इस जाने में फर्क था. हरसिंगार के पेड़ के नीचे बैठी छवि को बाहर का मौसम भी नहीं लुभा पा रहा था. 4 दिन बाद दीवाली थी पर उस ने कुछ भी तैयारी नहीं की थी और करे भी तो किस के लिए. तभी उसे नीरज अपनी तरफ आते हुए दिखे.

‘‘छवि, तुम यहां बैठी हो और मैं तुम्हें सब जगह ढूंढ़ रहा हूं.’’ नीरज का स्वर सुन कर छवि की तंद्रा भंग हुई.

‘‘किसलिए?’’ छवि रिक्त भाव से बोली.

‘‘समर का फोन आया है कि वह परिवार सहित घर आ रहा है दीवाली पर.’’ ‘‘अच्छा,’’ छवि की आंखों की ज्योति पलभर के लिए प्रदीप्त हुई, फिर बुझ गई, ‘‘तो क्या करूं, क्या करने आ रहा है यहां, वहीं दीवाली मनाए अपने परिवार के साथ. उस का परिवार तो पूरा हो गया न.’’ ‘‘तुम भी न छवि, क्याक्या सोचती रहती हो, इस में उस की क्या गलती है. उठो, कुछ तैयारी करो, बहुत समय बाद दीवाली के मौके पर घर आ रहा है. घर में चलहपहल रहेगी, फिर रुद्र भी तो आएगा.’’

‘‘क्या फर्क पड़ता है अब,’’ छवि निर्विकार भाव से बोली.

‘‘छवि, प्लीज, तुम सिर्फ रुद्र की नहीं समर और मनु की भी मां समान हो, बाहर निकलो अपनी इस उदासी से.’’ आखिर छवि हलकीफुलकी तैयारी करने लगी. तैयारी करतेकरते सबकुछ अच्छे से ही कर लिया. दीवाली आई, समर परिवार सहित आया और साथ में रुद्र भी. छवि सब से बाहरी दिल से ही सही पर ठीक से मिली. रुद्र की तरफ उस ने देखा भी नहीं. मनु और रुद्र अब युवा थे. 2 सुदर्शन युवा बेटे हैं समर और प्रिया के. कितना सुदृढ़ सहारा है उन का. उस का हृदय कसक गया. क्या होगा उन का. कैसे काटेंगे बाकी की जिंदगी. सब के आने से घर में चहलपहल हो गई. अगले दिन दीवाली थी. सब अपनेअपने हिसाब से दीवाली की तैयारी कर रहे थे. मनु और रुद्र थे तो जाहिर है खूब पटाखे भी फूटने थे. प्रिया ने किचन की जिम्मेदारी ले ली. कई तरह के पकवान तैयार करा लिए. एकदो बार रुद्र सामने अकेले पड़ा पर वह निर्विकार रही. रुद्र के चेहरे को देख कर लग रहा था कि शायद वह कुछ कहना चाहता है पर छवि ने उसे मौका नहीं दिया. उस का दिल अब पूरी तरह से टूट चुका था. उस ने खुद को मजबूत कर लिया था. जो सुख उसे नियति नहीं देना चाहती उस के पीछे क्यों भागे. दीवाली के दिन सुबह से ही गहमागहमी थी. नीरज सबकुछ बिसरा कर परिवार के साथ मगन हो गए थे. लेकिन छवि खुद को सहज नहीं कर पा रही थी.

उस के हृदय में समर के प्रति भी हलकीफुलकी नफरत जन्म ले रही थी. उसे लग रहा था कि वे दोनों भी नियति के इस फैसले से खुश हैं. उन्हें उन का बेटा वापस मिल गया था. खुद के काम से निबट कर समर घर के नौकरोंचाकरों को उपहार देने लगा. सब को कुछ न कुछ देने के बाद समर और प्रिया उस के पास आए.

‘‘भाभी, इस दीवाली पर भी हम आप के लिए कुछ खास उपहार लाए हैं.’’ ‘‘मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा खास उपहार, पहले भी दीवाली पर तुम ने एक बार खास उपहार दिया था,’’ कह कर उस ने मुंह फेर लिया. ‘‘पर देखो तो भाभी, एक बार इधर तो देखो…’’ कह कर उस ने जबरदस्ती छवि का चेहरा अपनी तरफ करने की कोशिश की. ‘‘नहीं, अब मुझ में ताकत नहीं बची है समर, अब मुझे कोई धोखा नहीं चाहिए. मैं ऐसे ही ठीक हैं,’’ कह कर छवि फूटफूट कर रो पड़ी. तभी किन्हीं मजबूत बांहों ने उसे पीछे से लिपटा लिया. ‘‘मैं लौट आया, मां, हमेशा के लिए, मुझे माफ कर दो.’’

‘‘रुद्र…’’ छवि ने पलट कर देखा. रुद्र की आंखें नम थीं. उस की आंखों में आश्चर्य तैर गया. ‘‘हां मां, मैं ने यह नहीं सोचा कि अगर आप ने मुझे ताऊताई न कह कर मातापिता के रूप में पालापोसा और प्यार दिया तो क्या फर्क पड़ गया. चाचाचाची मुझ से दूर थोड़े ही न हो गए. मेरा विश्वास करो मां, मैं अब आप दोनों को छोड़ कर कभी नहीं जाऊंगा, पापा का सपना पूरा करूंगा.’’ ‘‘लेकिन…’’ उस ने उसी अविश्वासभरी नजरों से समर की तरफ देखा, जैसा उस ने तब देखा था जब समर और प्रिया ने पहली बार रुद्र को सौंपा था. ‘‘हां भाभी, मैं ने रुद्र को सबकुछ बताया और समझाया, इस बार मैं उसे आप को नहीं दे रहा हूं. बल्कि वह खुद अपने ममापापा के पास लौट आया है. वह आप दोनों को ही प्यार करता है मातापिता के रूप में. हमें नहीं, आप दोनों के लिए ही रोया है इन 2 महीनों में.’’

‘‘सच,’’ उस ने नीरज की तरफ देखा. नीरज ने उसे कंधे से थाम लिया. ‘‘अब गले लगाओ बेटे को छवि, अब सही माने में हम मातापिता बने हैं.’’ छवि ने रुद्र को कस कर गले लगा लिया और नीरज ने उन दोनों को, और समर ने तीनों की फोटो खींच ली. प्रिया ने गहरी सांस ली, ‘बस, अब यह परिवार कभी न बिखरे.’ इस दीवाली में सही माने में उन के घर दीये जगमगाए थे. बिना किसी अनजाने भय के खुशियां बिखरी थीं उन के घर में.

 

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May 04, 2020 at 10:00AM

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