Tuesday, 24 March 2020

सब से बड़ा सुख: भाग 3

दिल्ली में देर रात तक टीवी देखने की आदत थी उन्हें, पर यहां तो मृदुल को स्कूल जाना था दूसरे दिन अगर वह भी उन के साथ बैठा रहा तो दूसरे दिन उठ नहीं पाएगा.

दूसरे दिन सुबहसुबह उन्हें रसोई से खटरपटर की आवाज सुनाई दी. शायद बहू होगी चौके में, सोच कर करवट बदल ली थी उन्होंने. पर नहीं, बात कुछ और ही थी. उठ कर देखा तो बिल्ली दूध का भगौना चाट रही थी. शायद बहू दूध फ्रिज में रखना भूल गई थी. अब चाय कैसे बनेगी? पति सुबह सैर को जा ही रहे थे. उन्होंने दूध की 2 थैलियां उन्हें लाने को कह दिया था.

राजेश उठा और जब उसे सारा माजरा समझ में आया तो बीबी को आड़े हाथों लिया था. उस ने न जाने कितने पुराने किस्से बीवी की लापरवाही के बखान कर दिए उन के सामने. नेहा अपमान का घूंट पी कर रह गई थी.

बरसों पुराना वह दृश्य अब तक उन के मानसपटल पर अंकित था, जब रीतेश ने अम्माजी के सामने दाल में नमक ज्यादा पड़ने पर उन्हें कैसे अपमानित किया था, और अम्मा नेता के समान खड़ी हो कर तमाशा देख रही थीं. अब अगर बीचबचाव करूं और यह आधुनिक परिवेश में पलीबढ़ी नेहा न बरदाश्त कर पाए तो उन के हस्तक्षेप का फिर क्या होगा?

चुपचाप अपने कमरे में लौट आई थीं वे और सोच रही थीं, ‘ये पुरुष हमेशा अपनी मां को देख कर शेर क्यों बन जाते हैं?’ उस दिन पितापुत्र के दफ्तर जाने के बाद उन्होंने घर की माई से पूछ कर कुछ दुकानों का पता किया और फल, सब्जी, दूध, बिस्कुट ले आई थीं. किसी भी मेहमान के घर आने पर खर्चा बढ़ता है, यह वे जानती थीं. फिर सब कुछ इन्हीं बच्चों का ही है, तो क्यों न इन्हें थोड़ा सहारा दिया जाए.

शाम को राजेश घर लौटा तो उन्होंने उस से बात नहीं की. दोएक दिन के लिए अबोला सा ठहर गया था मांबेटे में. नेहा भी मां को देख रही थी पर चुप्पी का कारण नहीं जान पा रही थी. ऐसा नहीं था कि उन्होंने बेटे की अवहेलना की हो. रसोई में जाती तो उन्हें लगता, बहू के हाथ सधे हुए नहीं हैं. बेचारी से कभी रोटी टेढ़ी हो जाती तो कभी सब्जी काटते समय हाथ कट जाता. अकेले रहते होंगे तो काम कुछ कम होता होगा. बराबर वह रसोई में उस के साथ लगी रहतीं.

राजेश मां के खाने की प्रशंसा करता तो वे उसे ऐसे घूरतीं जैसे कोई अपराध किया हो उस ने. आंखों के इशारों से उन्होंने समझाया था उसे कि पत्नी के सामने मां की प्रशंसा करने की जरूरत नहीं है. और न ही मां के सामने पत्नी का अपमान करने की. ऐसे में अनजाने ही ईर्ष्या की नागफनी फैल जाएगी गृहस्थी के इर्दगिर्द.

यहां आए उन्हें एक सप्ताह बीत गया था. इस बीच कम से कम 4 बार क्षितिजा आ चुकी थी. अगर नहीं आती तो फोन पर बात करती. उन्हें लगा, यों ननद का रोजरोज चले आना बहू को अच्छा लगे या न लगे.

फिर बेटी का अपना भी तो परिवार है. मां आ गईं तो क्या रोज चल पडे़गी मायके? फोन पर भी बेटी खोदखोद कर घर की बातें पूछती तो उन्हें लगता, उन की शिक्षा में कहीं कुछ कसर रह गई है. इसीलिए तो वह शाम को इस इमारत के लौन में नहीं जाती थीं. बड़ीबूढि़यां बहुओं के बुराई पुराण ले कर बैठतीं तो उन का दम घुटता था. परोक्ष रूप से बेटी को समझा दिया था अपना मंतव्य उन्होंने.

पूरा दिन काटे नहीं कटता था. अपने घर में तो काम होते थे उन के पास, नहीं होते तो ढूंढ़ लेती थीं. अनुशासनहीनता और अकर्मण्यता का उन के जीवन में कोई स्थान न था. कभीकभी रीतेश के साथ अपने फ्लैट पर चली जातीं, लकड़ी का काम हो रहा था वहां.

कभीकभी उन्हें लगता, यहां भी बहुत कुछ है करने को. परदे के हुक यों ही लटके पड़े थे. गमलों के पौधे सूखे हुए थे. पीतल के शोपीस काले हो रहे थे. नेहा हर काम माई से करवाती थी. खराब होता तो मियांबीवी की नोकझोंक शुरू हो जाती. बैठेबैठे उन्होंने राजेश का बिखरा घर समेट दिया था. फिर आशंका जागी थी मन में. पड़ोस की शीला की बहू इसीलिए घर छोड़ कर भाग गई थी क्योंकि शीला हर काम बहू से अधिक सलीके से करती थी. कहीं नेहा को बुरा लगा तो? शाम को राजेश ने ज्यों ही प्रशंसा के दो बोल बोलने चाहे, उन्होंने नेहा को सामने कर दिया था. मालूम नहीं, उसे कैसा लगा लेकिन उस के बाद से उसे इन कामों में दिलचस्पी सी होने लगी थी.

अब चुप रहने वाली अंतर्मुखी नेहा उन के पास आ कर बैठती थी. कभीकभी अपनी समस्याएं भी उन्हें सुनाती जिस में अधिक परेशानी आर्थिक थी, ऐसा उन्हें लगा था. राजेश जैसा स्वाभिमानी युवक मातापिता से कोई सहायता कभी नहीं लेगा, यह वे भलीभांति जानती थीं, बहू ने विश्वास में ले कर उन्हें अपनी समस्या सुनाई थी तो उन्होंने भी उसे समझाया, ‘‘नेहा, तुम पढ़ीलिखी हो. घर में बैठ कर ट्यूशन शुरू कर दो. तुम तो मृदुल को भी ट्यूशन पढ़ने भेजती हो, चार पैसे भी हाथ में आएंगे और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा.’’

The post सब से बड़ा सुख: भाग 3 appeared first on Sarita Magazine.



from कहानी – Sarita Magazine https://ift.tt/39jdcrw

दिल्ली में देर रात तक टीवी देखने की आदत थी उन्हें, पर यहां तो मृदुल को स्कूल जाना था दूसरे दिन अगर वह भी उन के साथ बैठा रहा तो दूसरे दिन उठ नहीं पाएगा.

दूसरे दिन सुबहसुबह उन्हें रसोई से खटरपटर की आवाज सुनाई दी. शायद बहू होगी चौके में, सोच कर करवट बदल ली थी उन्होंने. पर नहीं, बात कुछ और ही थी. उठ कर देखा तो बिल्ली दूध का भगौना चाट रही थी. शायद बहू दूध फ्रिज में रखना भूल गई थी. अब चाय कैसे बनेगी? पति सुबह सैर को जा ही रहे थे. उन्होंने दूध की 2 थैलियां उन्हें लाने को कह दिया था.

राजेश उठा और जब उसे सारा माजरा समझ में आया तो बीबी को आड़े हाथों लिया था. उस ने न जाने कितने पुराने किस्से बीवी की लापरवाही के बखान कर दिए उन के सामने. नेहा अपमान का घूंट पी कर रह गई थी.

बरसों पुराना वह दृश्य अब तक उन के मानसपटल पर अंकित था, जब रीतेश ने अम्माजी के सामने दाल में नमक ज्यादा पड़ने पर उन्हें कैसे अपमानित किया था, और अम्मा नेता के समान खड़ी हो कर तमाशा देख रही थीं. अब अगर बीचबचाव करूं और यह आधुनिक परिवेश में पलीबढ़ी नेहा न बरदाश्त कर पाए तो उन के हस्तक्षेप का फिर क्या होगा?

चुपचाप अपने कमरे में लौट आई थीं वे और सोच रही थीं, ‘ये पुरुष हमेशा अपनी मां को देख कर शेर क्यों बन जाते हैं?’ उस दिन पितापुत्र के दफ्तर जाने के बाद उन्होंने घर की माई से पूछ कर कुछ दुकानों का पता किया और फल, सब्जी, दूध, बिस्कुट ले आई थीं. किसी भी मेहमान के घर आने पर खर्चा बढ़ता है, यह वे जानती थीं. फिर सब कुछ इन्हीं बच्चों का ही है, तो क्यों न इन्हें थोड़ा सहारा दिया जाए.

शाम को राजेश घर लौटा तो उन्होंने उस से बात नहीं की. दोएक दिन के लिए अबोला सा ठहर गया था मांबेटे में. नेहा भी मां को देख रही थी पर चुप्पी का कारण नहीं जान पा रही थी. ऐसा नहीं था कि उन्होंने बेटे की अवहेलना की हो. रसोई में जाती तो उन्हें लगता, बहू के हाथ सधे हुए नहीं हैं. बेचारी से कभी रोटी टेढ़ी हो जाती तो कभी सब्जी काटते समय हाथ कट जाता. अकेले रहते होंगे तो काम कुछ कम होता होगा. बराबर वह रसोई में उस के साथ लगी रहतीं.

राजेश मां के खाने की प्रशंसा करता तो वे उसे ऐसे घूरतीं जैसे कोई अपराध किया हो उस ने. आंखों के इशारों से उन्होंने समझाया था उसे कि पत्नी के सामने मां की प्रशंसा करने की जरूरत नहीं है. और न ही मां के सामने पत्नी का अपमान करने की. ऐसे में अनजाने ही ईर्ष्या की नागफनी फैल जाएगी गृहस्थी के इर्दगिर्द.

यहां आए उन्हें एक सप्ताह बीत गया था. इस बीच कम से कम 4 बार क्षितिजा आ चुकी थी. अगर नहीं आती तो फोन पर बात करती. उन्हें लगा, यों ननद का रोजरोज चले आना बहू को अच्छा लगे या न लगे.

फिर बेटी का अपना भी तो परिवार है. मां आ गईं तो क्या रोज चल पडे़गी मायके? फोन पर भी बेटी खोदखोद कर घर की बातें पूछती तो उन्हें लगता, उन की शिक्षा में कहीं कुछ कसर रह गई है. इसीलिए तो वह शाम को इस इमारत के लौन में नहीं जाती थीं. बड़ीबूढि़यां बहुओं के बुराई पुराण ले कर बैठतीं तो उन का दम घुटता था. परोक्ष रूप से बेटी को समझा दिया था अपना मंतव्य उन्होंने.

पूरा दिन काटे नहीं कटता था. अपने घर में तो काम होते थे उन के पास, नहीं होते तो ढूंढ़ लेती थीं. अनुशासनहीनता और अकर्मण्यता का उन के जीवन में कोई स्थान न था. कभीकभी रीतेश के साथ अपने फ्लैट पर चली जातीं, लकड़ी का काम हो रहा था वहां.

कभीकभी उन्हें लगता, यहां भी बहुत कुछ है करने को. परदे के हुक यों ही लटके पड़े थे. गमलों के पौधे सूखे हुए थे. पीतल के शोपीस काले हो रहे थे. नेहा हर काम माई से करवाती थी. खराब होता तो मियांबीवी की नोकझोंक शुरू हो जाती. बैठेबैठे उन्होंने राजेश का बिखरा घर समेट दिया था. फिर आशंका जागी थी मन में. पड़ोस की शीला की बहू इसीलिए घर छोड़ कर भाग गई थी क्योंकि शीला हर काम बहू से अधिक सलीके से करती थी. कहीं नेहा को बुरा लगा तो? शाम को राजेश ने ज्यों ही प्रशंसा के दो बोल बोलने चाहे, उन्होंने नेहा को सामने कर दिया था. मालूम नहीं, उसे कैसा लगा लेकिन उस के बाद से उसे इन कामों में दिलचस्पी सी होने लगी थी.

अब चुप रहने वाली अंतर्मुखी नेहा उन के पास आ कर बैठती थी. कभीकभी अपनी समस्याएं भी उन्हें सुनाती जिस में अधिक परेशानी आर्थिक थी, ऐसा उन्हें लगा था. राजेश जैसा स्वाभिमानी युवक मातापिता से कोई सहायता कभी नहीं लेगा, यह वे भलीभांति जानती थीं, बहू ने विश्वास में ले कर उन्हें अपनी समस्या सुनाई थी तो उन्होंने भी उसे समझाया, ‘‘नेहा, तुम पढ़ीलिखी हो. घर में बैठ कर ट्यूशन शुरू कर दो. तुम तो मृदुल को भी ट्यूशन पढ़ने भेजती हो, चार पैसे भी हाथ में आएंगे और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा.’’

The post सब से बड़ा सुख: भाग 3 appeared first on Sarita Magazine.

March 25, 2020 at 10:00AM

No comments:

Post a Comment