Friday, 21 February 2020

हवा का झोंका: भाग-4

पल्लवी के रोमरोम में अल्हड़ता व नासमझी विद्यमान थी. उस के रैकेट थामने वाले हाथ गृहस्थी की बागडोर नहीं संभाल पाए. उस की रुचि रसोईघर में बैठ कर व्यंजन बनाने में नहीं बल्कि बनठन कर बाजारों, क्लबों में घूमने व अपने रूप की प्रशंसा सुन कर गर्वित होने में थी.

उसे तरुण से भी लगाव नहीं था. वह तरुण की ओर से लापरवा बनी गृहस्थी को बंधन मान कर कुड़मुड़ाती रहती कि उस की इच्छा तो सफल खिलाड़ी बनने की थी, सेठानी बनने की नहीं. मांबाप ने नाहक ही विवाह के बंधन में बांध दिया.

जब कभी नौकर, नौकरानी छुट्टी कर लेते तो पल्लवी को एक वक्त का भोजन बनाना भी भारी पड़ जाता. सब्जी काटती तो चाकू से उंगलियों में जख्म हो जाते. उबलती सब्जियों के भगौने हाथों से छूट पड़ते. खौलती चाय हाथपैरों पर आ पड़ती. 2 बार उस की लापरवाही से गैस सिलैंडर में आग लगतेलगते बची थी.

पल्लवी की नासमझी के लिए मेरे मांबाप अधिक दोषी थे, जिन्होंने उसे गृहस्थी का काम सिखलाए बगैर उस का विवाह कर डाला था. उस की मौत का कारण उसी की नासमझी से लगी आग थी. पर मेरे मांबाप को यह सब कौन समझा सकता था, जो बदले की भावना से अंधे हुए बैठे थे.

हवालात में बंद तरुण, उस के मांबाप, भोजन बनाने वाली महाराजिन को पुलिस वालों ने कचहरी में जज के सामने पेश किया तो तरुण के ननिहाल वाले बौखला उठे.

तरुण की मां के दोनों भाई ऊंचे पद पर नौकरी करने वाले संपन्न, सम्मानित अफसर थे. बहन को अपराधियों के कठघरे में खड़ी देख कर उन के चेहरों पर कालिमा छा गई थी. दोनों भाई बहनबहनोई की जमानत कराने हेतु हाईकोर्ट के चक्कर लगा रहे थे, पर सफलता कोसों दूर थी.

जनआक्रोश के भय से पुलिस वाले भी उन तीनों को अपराधी सिद्ध करने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाए हुए थे. यह देख कर दोनों भाई मेरे मांबाप के सामने गिड़गिड़ा उठे.

‘‘देखिए साहब, आप की बेटी की मौत आप के लिए बहुत बड़ा हादसा है लेकिन हम भी कम दुखी नहीं हैं. होनी को कौन टाल सकता है? यह जानते हुए भी कि पल्लवी की मौत अपनी खुद की गलती से हुई है, आप खामखां हमारे बहनबहनोई को नीचा दिखला रहे हैं.’’

भैया बिगड़ उठे, ‘‘हम कोई गैरकानूनी काम नहीं कर रहे हैं. कौन दोषी है, इस का फैसला अदालत ही करेगी.’’

उन दोनों ने मेरे मांबाप, भैयाभाभी को काफी ऊंचनीच समझाई, पर कोई टस से मस नहीं हुआ. सभी को कानून के फैसले की प्रतीक्षा थी परंतु कोई फैसला न हो सका.

कचहरी के शोरगुल, पुलिस वालों, वकीलों की भीड़ से बचने के लिए मैं एक कोने में सिमट कर नूरी को छाती से चिपकाए, उसे संभालने के लिए प्रयासरत थी. अकस्मात किसी ने आ कर कुछ कहा तो मैं चौंक कर आगंतुक की तरफ ताकने लगी.

आगंतुक कुछ दूरी पर पुलिस से घिरे तरुण की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘वे साहब आप को बुला रहे हैं.’’

सशंकित मन से मैं तरुण की ओर बढ़ गई. वह आत्मीयताभरी निगाहों से मेरी ओर ताक रहा था. बोला, ‘‘तुम्हें बच्चे खिलाने की आदत नहीं है, इसे घर में नौकर के पास छोड़ आतीं.’’

‘‘इतनी छोटी बच्ची बिना मां के कैसे रह सकती है,’’ मैं जल्दीबाजी में कह गई. फिर अपनी बात पर खुद ही झेंप कर बोली, ‘‘मैं मां तो नहीं बन सकती, पर मौसी बन कर थोड़ी सी ममता तो दे ही सकती हूं.’’

‘‘मौसी भी तो मां होती है. तुम्हें मां बनने से कोई नहीं रोक सकता, श्वेता.’’

तरुण के शब्दों ने मुझे फिर से सिहरा दिया. मुझे लगा तरुण की निगाहें कह रही हैं, तुम अपना अधिकार ले सकती हो, श्वेता.

पुलिस वालों से घिरे तरुण के मांबाप मेरे नजदीक आ कर कहने लगे, ‘‘हम ने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया था, बेटी. हमें अपनी गलती की सजा मिल गई.’’

पुलिस वाले अपनी गाड़ी में उन सब को बैठा कर चले गए. उन सब के दयनीय चेहरे देख कर मेरा मन दुख से भर उठा था. मैं देर तक सोचती रह गई.

हम सब घर लौटे तो तरुण के दोनों मामा भी हमारे साथ चले आए. उन दोनों का उद्देश्य मेरे मांबाप, भैयाभाभी को समझाबुझा कर मुकदमा समाप्त कराना था.

देर तक गरमागरमी होती रही. पिताजी, भैया मुकदमा वापस लेने को तैयार नहीं हो पाए तो वे दोनों तैश में भर कर देख लेने की धमकी देने लगे.

तरुण के बड़े मामा रविमोहन आस्तीनें चढ़ा कर गरजने लगे, ‘‘तुम लोग अंधे कानून पर घमंड किए बैठे हो पर सारा कानून तुम्हारे ही पक्ष में नहीं बोलेगा. थोड़ाबहुत हम भी कानून जानते हैं. हमारे वकील तुम से अधिक जानदार हैं. हम तुम्हें उलटा फंसाएंगे, सुबूत मौजूद हैं. तुम ने अपनी नाबालिग बेटी बालिग बतला कर मेरे भांजे के गले से मढ़ दी थी. उस अपराध में तुम सब जेल की हवा खाओगे…’’

‘‘कौन कहता है मेरी बेटी नाबालिग थी.’’

‘‘यह सुबूत देखो,’’ रविमोहन ने, पल्लवी की कालेज की पढ़ाई के प्रमाणपत्रों की फोटोस्टेट कापियां सब के सम्मुख पटक दीं.

हम सब भौचक्के से एकदूसरे का मुंह ताकते रह गए. पिताजी को पछतावा हुआ, नाहक ही उन्हें पल्लवी की आयु स्कूल में दाखिले के वक्त डेढ़ वर्ष कम लिखवाई थी. पर यह तो खानदान का रिवाज ठहरा, पिताजी के पिताजी ने भी उन के साथ यही किया था. पिताजी तो अपने पिता के पदचिह्नों पर ही चल रहे थे.

तरुण के दोनों मामा सब की ओर व्यंग्य से घूरते हुए विजयी मुद्रा में अकड़ते हुए चले गए. भैया की हालत हारे हुए जुआरी की भांति हो गई.

पिताजी खिसिया कर कह उठे, ‘‘कालेज के प्रमाणपत्रों से क्या होता है? सुबूत के तौर पर मेरे पास पल्लवी की जन्मपत्री मौजूद है.’’

‘‘अदालत में जन्मपत्रियां नहीं, जन्म के प्रमाणपत्र चलते हैं,’’ भैया ने बात काट दी, ‘‘पर अब वर्षों बाद प्रमाणपत्र भी नहीं बन पाएगा, वे भी लिखित सुबूत मांगेंगे.’’

‘‘तब क्या मेरी बेटी के हत्यारों को कुछ नहीं हो पाएगा?’’ मां ने निराशाभरी सांस ली.

‘‘होगा क्यों नहीं, मैं किसलिए हूं?’’ भैया ने ताव में भर कर सीना ठोंका, ‘‘अगर वे अदालत से छूट भी गए, तो मैं इस घर में आग लगवा दूंगा. आजकल किसी ट्रक वाले को 15-20 हजार रुपए दे कर ऐक्सिडैंट करा देना मामूली बात है.’’

मैं भय से कांप उठी. आंखों के सामने तरुण का पिचका हुआ स्कूटर, लहू से लथपथ बेजान जिस्म साकार हो उठा.

लगा, बदले की भावनाएं दोनों परिवारों का सत्यानाश कर डालेंगी. भैया तरुण की जान के दुश्मन बनेंगे और तरुण के मामा भैया की जान के. इस पारिवारिक दुश्मनी का अंत न मालूम कहां, कब व कैसे होगा.

आगे पढ़ें- घर वालों को नन्ही सी नूरी की भी चिंता नहीं. जी में आया…

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पल्लवी के रोमरोम में अल्हड़ता व नासमझी विद्यमान थी. उस के रैकेट थामने वाले हाथ गृहस्थी की बागडोर नहीं संभाल पाए. उस की रुचि रसोईघर में बैठ कर व्यंजन बनाने में नहीं बल्कि बनठन कर बाजारों, क्लबों में घूमने व अपने रूप की प्रशंसा सुन कर गर्वित होने में थी.

उसे तरुण से भी लगाव नहीं था. वह तरुण की ओर से लापरवा बनी गृहस्थी को बंधन मान कर कुड़मुड़ाती रहती कि उस की इच्छा तो सफल खिलाड़ी बनने की थी, सेठानी बनने की नहीं. मांबाप ने नाहक ही विवाह के बंधन में बांध दिया.

जब कभी नौकर, नौकरानी छुट्टी कर लेते तो पल्लवी को एक वक्त का भोजन बनाना भी भारी पड़ जाता. सब्जी काटती तो चाकू से उंगलियों में जख्म हो जाते. उबलती सब्जियों के भगौने हाथों से छूट पड़ते. खौलती चाय हाथपैरों पर आ पड़ती. 2 बार उस की लापरवाही से गैस सिलैंडर में आग लगतेलगते बची थी.

पल्लवी की नासमझी के लिए मेरे मांबाप अधिक दोषी थे, जिन्होंने उसे गृहस्थी का काम सिखलाए बगैर उस का विवाह कर डाला था. उस की मौत का कारण उसी की नासमझी से लगी आग थी. पर मेरे मांबाप को यह सब कौन समझा सकता था, जो बदले की भावना से अंधे हुए बैठे थे.

हवालात में बंद तरुण, उस के मांबाप, भोजन बनाने वाली महाराजिन को पुलिस वालों ने कचहरी में जज के सामने पेश किया तो तरुण के ननिहाल वाले बौखला उठे.

तरुण की मां के दोनों भाई ऊंचे पद पर नौकरी करने वाले संपन्न, सम्मानित अफसर थे. बहन को अपराधियों के कठघरे में खड़ी देख कर उन के चेहरों पर कालिमा छा गई थी. दोनों भाई बहनबहनोई की जमानत कराने हेतु हाईकोर्ट के चक्कर लगा रहे थे, पर सफलता कोसों दूर थी.

जनआक्रोश के भय से पुलिस वाले भी उन तीनों को अपराधी सिद्ध करने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाए हुए थे. यह देख कर दोनों भाई मेरे मांबाप के सामने गिड़गिड़ा उठे.

‘‘देखिए साहब, आप की बेटी की मौत आप के लिए बहुत बड़ा हादसा है लेकिन हम भी कम दुखी नहीं हैं. होनी को कौन टाल सकता है? यह जानते हुए भी कि पल्लवी की मौत अपनी खुद की गलती से हुई है, आप खामखां हमारे बहनबहनोई को नीचा दिखला रहे हैं.’’

भैया बिगड़ उठे, ‘‘हम कोई गैरकानूनी काम नहीं कर रहे हैं. कौन दोषी है, इस का फैसला अदालत ही करेगी.’’

उन दोनों ने मेरे मांबाप, भैयाभाभी को काफी ऊंचनीच समझाई, पर कोई टस से मस नहीं हुआ. सभी को कानून के फैसले की प्रतीक्षा थी परंतु कोई फैसला न हो सका.

कचहरी के शोरगुल, पुलिस वालों, वकीलों की भीड़ से बचने के लिए मैं एक कोने में सिमट कर नूरी को छाती से चिपकाए, उसे संभालने के लिए प्रयासरत थी. अकस्मात किसी ने आ कर कुछ कहा तो मैं चौंक कर आगंतुक की तरफ ताकने लगी.

आगंतुक कुछ दूरी पर पुलिस से घिरे तरुण की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘वे साहब आप को बुला रहे हैं.’’

सशंकित मन से मैं तरुण की ओर बढ़ गई. वह आत्मीयताभरी निगाहों से मेरी ओर ताक रहा था. बोला, ‘‘तुम्हें बच्चे खिलाने की आदत नहीं है, इसे घर में नौकर के पास छोड़ आतीं.’’

‘‘इतनी छोटी बच्ची बिना मां के कैसे रह सकती है,’’ मैं जल्दीबाजी में कह गई. फिर अपनी बात पर खुद ही झेंप कर बोली, ‘‘मैं मां तो नहीं बन सकती, पर मौसी बन कर थोड़ी सी ममता तो दे ही सकती हूं.’’

‘‘मौसी भी तो मां होती है. तुम्हें मां बनने से कोई नहीं रोक सकता, श्वेता.’’

तरुण के शब्दों ने मुझे फिर से सिहरा दिया. मुझे लगा तरुण की निगाहें कह रही हैं, तुम अपना अधिकार ले सकती हो, श्वेता.

पुलिस वालों से घिरे तरुण के मांबाप मेरे नजदीक आ कर कहने लगे, ‘‘हम ने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया था, बेटी. हमें अपनी गलती की सजा मिल गई.’’

पुलिस वाले अपनी गाड़ी में उन सब को बैठा कर चले गए. उन सब के दयनीय चेहरे देख कर मेरा मन दुख से भर उठा था. मैं देर तक सोचती रह गई.

हम सब घर लौटे तो तरुण के दोनों मामा भी हमारे साथ चले आए. उन दोनों का उद्देश्य मेरे मांबाप, भैयाभाभी को समझाबुझा कर मुकदमा समाप्त कराना था.

देर तक गरमागरमी होती रही. पिताजी, भैया मुकदमा वापस लेने को तैयार नहीं हो पाए तो वे दोनों तैश में भर कर देख लेने की धमकी देने लगे.

तरुण के बड़े मामा रविमोहन आस्तीनें चढ़ा कर गरजने लगे, ‘‘तुम लोग अंधे कानून पर घमंड किए बैठे हो पर सारा कानून तुम्हारे ही पक्ष में नहीं बोलेगा. थोड़ाबहुत हम भी कानून जानते हैं. हमारे वकील तुम से अधिक जानदार हैं. हम तुम्हें उलटा फंसाएंगे, सुबूत मौजूद हैं. तुम ने अपनी नाबालिग बेटी बालिग बतला कर मेरे भांजे के गले से मढ़ दी थी. उस अपराध में तुम सब जेल की हवा खाओगे…’’

‘‘कौन कहता है मेरी बेटी नाबालिग थी.’’

‘‘यह सुबूत देखो,’’ रविमोहन ने, पल्लवी की कालेज की पढ़ाई के प्रमाणपत्रों की फोटोस्टेट कापियां सब के सम्मुख पटक दीं.

हम सब भौचक्के से एकदूसरे का मुंह ताकते रह गए. पिताजी को पछतावा हुआ, नाहक ही उन्हें पल्लवी की आयु स्कूल में दाखिले के वक्त डेढ़ वर्ष कम लिखवाई थी. पर यह तो खानदान का रिवाज ठहरा, पिताजी के पिताजी ने भी उन के साथ यही किया था. पिताजी तो अपने पिता के पदचिह्नों पर ही चल रहे थे.

तरुण के दोनों मामा सब की ओर व्यंग्य से घूरते हुए विजयी मुद्रा में अकड़ते हुए चले गए. भैया की हालत हारे हुए जुआरी की भांति हो गई.

पिताजी खिसिया कर कह उठे, ‘‘कालेज के प्रमाणपत्रों से क्या होता है? सुबूत के तौर पर मेरे पास पल्लवी की जन्मपत्री मौजूद है.’’

‘‘अदालत में जन्मपत्रियां नहीं, जन्म के प्रमाणपत्र चलते हैं,’’ भैया ने बात काट दी, ‘‘पर अब वर्षों बाद प्रमाणपत्र भी नहीं बन पाएगा, वे भी लिखित सुबूत मांगेंगे.’’

‘‘तब क्या मेरी बेटी के हत्यारों को कुछ नहीं हो पाएगा?’’ मां ने निराशाभरी सांस ली.

‘‘होगा क्यों नहीं, मैं किसलिए हूं?’’ भैया ने ताव में भर कर सीना ठोंका, ‘‘अगर वे अदालत से छूट भी गए, तो मैं इस घर में आग लगवा दूंगा. आजकल किसी ट्रक वाले को 15-20 हजार रुपए दे कर ऐक्सिडैंट करा देना मामूली बात है.’’

मैं भय से कांप उठी. आंखों के सामने तरुण का पिचका हुआ स्कूटर, लहू से लथपथ बेजान जिस्म साकार हो उठा.

लगा, बदले की भावनाएं दोनों परिवारों का सत्यानाश कर डालेंगी. भैया तरुण की जान के दुश्मन बनेंगे और तरुण के मामा भैया की जान के. इस पारिवारिक दुश्मनी का अंत न मालूम कहां, कब व कैसे होगा.

आगे पढ़ें- घर वालों को नन्ही सी नूरी की भी चिंता नहीं. जी में आया…

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February 22, 2020 at 09:50AM

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