Friday, 21 February 2020

हवा का झोंका: भाग-3

भाभी के ऊंचे स्वर ने मुझे भी सहमा कर रख दिया. दूध को बोतल में डाल कर मैं शीघ्रता से निकल आई. मुझे मांपिताजी, भैयाभाभी किसी की बातों में दिलचस्पी नहीं थी. इसलिए मैं नूरी को ले कर दूसरे कमरे की ओर बढ़ गई.

यह पल्लवी व तरुण का शयनकक्ष था, साफसुथरा, कीमती सजावट से भरपूर. बढि़या लकड़ी के बने हुए खूबसूरत, नक्काशीदार पलंग के गुदगुदे गद्दों व रेशमी चादर पर लेटते ही मन का रोआंरोआं मीठी सिहरन से भर उठा.

पल्लवी की अनिंद्य सुंदरता बीच में न आई होती तो शायद यह सब मेरा ही होता. पल्लवी से पहले तरुण मेरा ही तो होने वाला था.

मन 2 वर्ष का फासला पार कर अतीत में जा पहुंचा, जब तरुण से मेरे रिश्ते की बात चली थी.

तरुण के मांबाप मुझे देखने मेरे घर आए हुए थे. मेरे घर वालों ने मुझे ब्यूटीपार्लर में सजवा कर गुडि़या सी बना कर उन के सामने बैठा दिया था.

परंतु सौंदर्य प्रसाधनों की ढेरसारी लीपापोती व बिजली की चकाचौंध भी मेरे सांवले रंग को नहीं छिपा पाई थी.

श्वेता नाम होने से ही कोई दूध जैसा गोरा तो हो नहीं जाता. पता नहीं, क्या सोच कर मेरे घर वालों ने मेरा नाम श्वेता रखा था.

मेरा रंग मेरे नाम के बिलकुल विपरीत था. नयननक्श आकर्षक होने से क्या होता है? मेरे घर वालों को विश्वास था कि तरुण के मांबाप मेरी उच्च शिक्षा, गुणों, मधुर व्यवहार, शहद जैसी मीठी व सुरीली आवाज से प्रभावित हो कर मुझे अपने घर की बहू बना लेंगे.

लेकिन उन दोनों ने स्पष्ट इनकार कर दिया. मुझे देख कर कड़वा सा मुंह बना कर दोनों ने मेरे घर वालों को खूब लताड़ा, कहा, ‘नाहक ही अपने घर बुला कर तुम लोगों ने हमारा कीमती वक्त बरबाद किया, जबकि हम पहले ही कह चुके हैं कि हमें अपने इकलौते बेटे के लिए, गोरीचिट्टी लड़की चाहिए, कौए जैसे कालीकलूटी नहीं.’

अपमान का जहरीला घूंट जैसेतैसे निगल कर मैं अपराधी भाव से सिर झुका कर जाने के लिए उठ कर खड़ी हो गई. आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. जमीन में समा जाने को जी चाह रहा था.

तभी अपने कालेज की बैडमिंटन टीम के साथ खेल कर, उछलतीकूदती, हाथ में रैकेट नचाती हुई पल्लवी ने घर में प्रवेश किया तो तरुण के मांबाप उस की बेबाक चंचलता, चुस्तीफुर्ती, केसर घुला दूध जैसा रंग देख कर अवाक् रह गए.

तरुण की मां थोड़ी नम्र हो कर बोलीं, ‘हमें अपने घर की बहू बनाने के लिए जैसी लड़की की आवश्यकता है, वे गुण तुम्हारी इस छोटी बेटी में मौजूद हैं. चाहो तो रिश्ते के लिए हां कर दो. इस के लिए हमें दहेज की आवश्यकता भी नहीं है.’

अंधा क्या चाहे दो आंख. मेरे घर वाले बिना दहेज के मनचाहे रिश्ते को हाथ से निकालने वाले नहीं थे. मेरी भावनाओं की चिंता किए बगैर पल्लवी का विवाह तरुण के साथ संपन्न कर दिया गया.  मैं बगैर कोई शृंगार किए सादी साड़ी पहने हुए सूनी निगाहों से पल्लवी को दुलहन बनते देखती रही. वह विदा हो कर गई तो लगा, जैसे मेरा संपूर्ण अस्तित्व भी उस के साथ जा चुका है. घर में मन ही नहीं लग पाया.

फिर घर वालों के तीव्र प्रतिरोध के बावजूद मैं ने कानपुर के एक पब्लिक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी कर ली और छात्रावास के एक कमरे में रहने लगी.

मां पिताजी के पत्र आते. लिखते रहते, ‘हम तुम्हारे लिए लड़का देख रहे हैं. बेटी का विवाह किए बगैर मर जाएंगे तो छाती पर पड़ा बोझ हमें मरने के बाद भी चैन नहीं लेने देगा.’

परंतु मेरी दिलचस्पी अब विवाह में नहीं रह गई थी. फिर मेरे जैसी कालीकलूटी लड़की को अच्छा लड़का मिलता भी कहां से?

‘‘क्या सो गईं, दीदी?’’ भाभी के स्वर ने मुझे चौंकाया तो मैं ने खयालों की दुनिया से निकल कर आंखें खोल दीं.

‘‘वे सब तो बैठक में ही सोफों पर पसर कर सोने लगे, मैं तुम्हारे पास चली आई, यहां आराम तो मिलेगा,’’ भाभी ने सिरहाने की ओर रखा तकिया अपनी ओर घसीटा.

भाभी बतलाती रहीं, ‘‘सब ने योजना तैयार कर ली है कि अगर हम पल्लवी की मौत को सुबूतों के अभाव में हत्या सिद्ध नहीं कर पाए तो आत्महत्या अवश्य सिद्ध कर देंगे. फिर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने वाले सासससुर और पति के लिए कठोर सजा अवश्य मिल जाएगी.’’

मैं दुखी मन से देर तक सोचती रही, ‘मांपिताजी, भैयाभाभी नाहक ही लोगों के मन में अपनी धाक जमाने के लिए निर्दोष तरुण और उस के मांबाप को अपराधी सिद्ध करने में लगे हुए हैं.’

फिर मन की बात पचा न पाने के कारण मैं सुबह नाश्ते की मेज पर कह ही बैठी, ‘‘आप लोग पल्लवी की मौत को साधारण दुर्घटना मान कर खामोश हो कर क्यों नहीं बैठ जाते. अकारण बतंगड़ बना कर मामले को उलझा क्यों रहे हैं?’’

सब हैरानी से मेरा मुंह ताकते रह गए. भैया की आंखों में क्रोध उतर आया, ‘‘तुम्हारा मतलब है, हम कायरों की भांति मुंह छिपा कर भाग जाएं. तुम्हारे मन में अपनी बहन के प्रति क्या जरा सी भी हमदर्दी नहीं है? अगर इसे दुर्घटना भी मान लिया जाए तो सोचने की बात है कि नौकरों से भरेपूरे संपन्न घर में यह जानलेवा दुर्घटना कैसे हो गई? क्या इस दुर्घटना के लिए तरुण व उस के मातापिता दोषी नहीं हैं? बहू की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की तो थी.’’

लज्जित हो कर मैं चुप बैठ गई. अपनी बहन पल्लवी को मैं कम थोड़े ही चाहती थी पर क्रोध से उमड़ते घर वालों को मैं किस प्रकार समझा सकती थी. उन की नजरों में निर्दोष तरुण व उस के निर्दोष मांबाप को सजा दिलवाना ही पल्लवी के प्रति सच्ची सहानुभूति व आत्मीयता थी.

मुझे अपने ऊपर हैरानी थी. मैं तरुण व इस घर के प्रति मोह से क्यों बंधती जा रही हूं? मेरे मन में तरुण व इस घर के प्रति आत्मीयता क्यों पनप रही है? क्या इसीलिए कि यह सब कभी मेरा होने वाला था?

मेरे मन में तरुण के वे शब्द भी घूम रहे थे जो वह जानेअनजाने में जबतब कह बैठा था. मेरे अविवाहित रह जाने व एकाकीपन के लिए वह खुद को जिम्मेदार समझ कर पश्चात्तापभरे स्वर में कह बैठता था, ‘क्या गोरा रंग ही सबकुछ हुआ करता है? मेरे मांबाप ने तुम्हें ठुकरा कर तुम्हारे साथ जो अन्याय किया है उस के लिए मैं दोषी हूं. काश, मैं हिम्मत से काम लेता.’

‘अब रहने दो तरुण, कहने से कोई लाभ नहीं. तुम पल्लवी के हो, सिर्फ पल्लवी के.’ मैं सिहर कर कह बैठती और तरुण के शब्द अंदर ही अंदर घुट कर रह जाते. उस की आंखों से झांकती आत्मीयता मेरा हृदय चीर देती. एकांत मिलते ही मैं फूटफूट कर रो उठती. तब मेरे मन के कोने में पल्लवी के प्रति ईर्ष्या के भाव जाग जाते. सोचने लगती,

‘काश, मैं तरुण को उस से छीन लेने में सफल हो पाती.’

इसी मानसिक अशांति, ईर्ष्या व ऊहापोह से बचने के लिए मैं पल्लवी से दूर, बहुत दूर होती चली गई थी. मैं तरुण से भी बचने के प्रयास करती.

आगे पढ़ें- पल्लवी के रोमरोम में अल्हड़ता व नासमझी विद्यमान थी. उस के…

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भाभी के ऊंचे स्वर ने मुझे भी सहमा कर रख दिया. दूध को बोतल में डाल कर मैं शीघ्रता से निकल आई. मुझे मांपिताजी, भैयाभाभी किसी की बातों में दिलचस्पी नहीं थी. इसलिए मैं नूरी को ले कर दूसरे कमरे की ओर बढ़ गई.

यह पल्लवी व तरुण का शयनकक्ष था, साफसुथरा, कीमती सजावट से भरपूर. बढि़या लकड़ी के बने हुए खूबसूरत, नक्काशीदार पलंग के गुदगुदे गद्दों व रेशमी चादर पर लेटते ही मन का रोआंरोआं मीठी सिहरन से भर उठा.

पल्लवी की अनिंद्य सुंदरता बीच में न आई होती तो शायद यह सब मेरा ही होता. पल्लवी से पहले तरुण मेरा ही तो होने वाला था.

मन 2 वर्ष का फासला पार कर अतीत में जा पहुंचा, जब तरुण से मेरे रिश्ते की बात चली थी.

तरुण के मांबाप मुझे देखने मेरे घर आए हुए थे. मेरे घर वालों ने मुझे ब्यूटीपार्लर में सजवा कर गुडि़या सी बना कर उन के सामने बैठा दिया था.

परंतु सौंदर्य प्रसाधनों की ढेरसारी लीपापोती व बिजली की चकाचौंध भी मेरे सांवले रंग को नहीं छिपा पाई थी.

श्वेता नाम होने से ही कोई दूध जैसा गोरा तो हो नहीं जाता. पता नहीं, क्या सोच कर मेरे घर वालों ने मेरा नाम श्वेता रखा था.

मेरा रंग मेरे नाम के बिलकुल विपरीत था. नयननक्श आकर्षक होने से क्या होता है? मेरे घर वालों को विश्वास था कि तरुण के मांबाप मेरी उच्च शिक्षा, गुणों, मधुर व्यवहार, शहद जैसी मीठी व सुरीली आवाज से प्रभावित हो कर मुझे अपने घर की बहू बना लेंगे.

लेकिन उन दोनों ने स्पष्ट इनकार कर दिया. मुझे देख कर कड़वा सा मुंह बना कर दोनों ने मेरे घर वालों को खूब लताड़ा, कहा, ‘नाहक ही अपने घर बुला कर तुम लोगों ने हमारा कीमती वक्त बरबाद किया, जबकि हम पहले ही कह चुके हैं कि हमें अपने इकलौते बेटे के लिए, गोरीचिट्टी लड़की चाहिए, कौए जैसे कालीकलूटी नहीं.’

अपमान का जहरीला घूंट जैसेतैसे निगल कर मैं अपराधी भाव से सिर झुका कर जाने के लिए उठ कर खड़ी हो गई. आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. जमीन में समा जाने को जी चाह रहा था.

तभी अपने कालेज की बैडमिंटन टीम के साथ खेल कर, उछलतीकूदती, हाथ में रैकेट नचाती हुई पल्लवी ने घर में प्रवेश किया तो तरुण के मांबाप उस की बेबाक चंचलता, चुस्तीफुर्ती, केसर घुला दूध जैसा रंग देख कर अवाक् रह गए.

तरुण की मां थोड़ी नम्र हो कर बोलीं, ‘हमें अपने घर की बहू बनाने के लिए जैसी लड़की की आवश्यकता है, वे गुण तुम्हारी इस छोटी बेटी में मौजूद हैं. चाहो तो रिश्ते के लिए हां कर दो. इस के लिए हमें दहेज की आवश्यकता भी नहीं है.’

अंधा क्या चाहे दो आंख. मेरे घर वाले बिना दहेज के मनचाहे रिश्ते को हाथ से निकालने वाले नहीं थे. मेरी भावनाओं की चिंता किए बगैर पल्लवी का विवाह तरुण के साथ संपन्न कर दिया गया.  मैं बगैर कोई शृंगार किए सादी साड़ी पहने हुए सूनी निगाहों से पल्लवी को दुलहन बनते देखती रही. वह विदा हो कर गई तो लगा, जैसे मेरा संपूर्ण अस्तित्व भी उस के साथ जा चुका है. घर में मन ही नहीं लग पाया.

फिर घर वालों के तीव्र प्रतिरोध के बावजूद मैं ने कानपुर के एक पब्लिक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी कर ली और छात्रावास के एक कमरे में रहने लगी.

मां पिताजी के पत्र आते. लिखते रहते, ‘हम तुम्हारे लिए लड़का देख रहे हैं. बेटी का विवाह किए बगैर मर जाएंगे तो छाती पर पड़ा बोझ हमें मरने के बाद भी चैन नहीं लेने देगा.’

परंतु मेरी दिलचस्पी अब विवाह में नहीं रह गई थी. फिर मेरे जैसी कालीकलूटी लड़की को अच्छा लड़का मिलता भी कहां से?

‘‘क्या सो गईं, दीदी?’’ भाभी के स्वर ने मुझे चौंकाया तो मैं ने खयालों की दुनिया से निकल कर आंखें खोल दीं.

‘‘वे सब तो बैठक में ही सोफों पर पसर कर सोने लगे, मैं तुम्हारे पास चली आई, यहां आराम तो मिलेगा,’’ भाभी ने सिरहाने की ओर रखा तकिया अपनी ओर घसीटा.

भाभी बतलाती रहीं, ‘‘सब ने योजना तैयार कर ली है कि अगर हम पल्लवी की मौत को सुबूतों के अभाव में हत्या सिद्ध नहीं कर पाए तो आत्महत्या अवश्य सिद्ध कर देंगे. फिर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने वाले सासससुर और पति के लिए कठोर सजा अवश्य मिल जाएगी.’’

मैं दुखी मन से देर तक सोचती रही, ‘मांपिताजी, भैयाभाभी नाहक ही लोगों के मन में अपनी धाक जमाने के लिए निर्दोष तरुण और उस के मांबाप को अपराधी सिद्ध करने में लगे हुए हैं.’

फिर मन की बात पचा न पाने के कारण मैं सुबह नाश्ते की मेज पर कह ही बैठी, ‘‘आप लोग पल्लवी की मौत को साधारण दुर्घटना मान कर खामोश हो कर क्यों नहीं बैठ जाते. अकारण बतंगड़ बना कर मामले को उलझा क्यों रहे हैं?’’

सब हैरानी से मेरा मुंह ताकते रह गए. भैया की आंखों में क्रोध उतर आया, ‘‘तुम्हारा मतलब है, हम कायरों की भांति मुंह छिपा कर भाग जाएं. तुम्हारे मन में अपनी बहन के प्रति क्या जरा सी भी हमदर्दी नहीं है? अगर इसे दुर्घटना भी मान लिया जाए तो सोचने की बात है कि नौकरों से भरेपूरे संपन्न घर में यह जानलेवा दुर्घटना कैसे हो गई? क्या इस दुर्घटना के लिए तरुण व उस के मातापिता दोषी नहीं हैं? बहू की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की तो थी.’’

लज्जित हो कर मैं चुप बैठ गई. अपनी बहन पल्लवी को मैं कम थोड़े ही चाहती थी पर क्रोध से उमड़ते घर वालों को मैं किस प्रकार समझा सकती थी. उन की नजरों में निर्दोष तरुण व उस के निर्दोष मांबाप को सजा दिलवाना ही पल्लवी के प्रति सच्ची सहानुभूति व आत्मीयता थी.

मुझे अपने ऊपर हैरानी थी. मैं तरुण व इस घर के प्रति मोह से क्यों बंधती जा रही हूं? मेरे मन में तरुण व इस घर के प्रति आत्मीयता क्यों पनप रही है? क्या इसीलिए कि यह सब कभी मेरा होने वाला था?

मेरे मन में तरुण के वे शब्द भी घूम रहे थे जो वह जानेअनजाने में जबतब कह बैठा था. मेरे अविवाहित रह जाने व एकाकीपन के लिए वह खुद को जिम्मेदार समझ कर पश्चात्तापभरे स्वर में कह बैठता था, ‘क्या गोरा रंग ही सबकुछ हुआ करता है? मेरे मांबाप ने तुम्हें ठुकरा कर तुम्हारे साथ जो अन्याय किया है उस के लिए मैं दोषी हूं. काश, मैं हिम्मत से काम लेता.’

‘अब रहने दो तरुण, कहने से कोई लाभ नहीं. तुम पल्लवी के हो, सिर्फ पल्लवी के.’ मैं सिहर कर कह बैठती और तरुण के शब्द अंदर ही अंदर घुट कर रह जाते. उस की आंखों से झांकती आत्मीयता मेरा हृदय चीर देती. एकांत मिलते ही मैं फूटफूट कर रो उठती. तब मेरे मन के कोने में पल्लवी के प्रति ईर्ष्या के भाव जाग जाते. सोचने लगती,

‘काश, मैं तरुण को उस से छीन लेने में सफल हो पाती.’

इसी मानसिक अशांति, ईर्ष्या व ऊहापोह से बचने के लिए मैं पल्लवी से दूर, बहुत दूर होती चली गई थी. मैं तरुण से भी बचने के प्रयास करती.

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February 22, 2020 at 09:50AM

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