लेखिका- रेणु खत्री
‘‘उन्होंने मुझे घर में रखने से इनकार कर दिया. मैं मायके आ गई. मेरा दुख मां से सहन नहीं हुआ और वे बीमार पड़ गईं व 2 माह के भीतर ही वे भी मुझे छोड़ गईं.
‘‘पापा के किसी मित्र ने मेरे लिए दूसरा रिश्ता खोजा. पर मुझ में अब समय से लड़ने की और ताकत न थी. मैं ने दूसरे विवाह से मना कर दिया. पापा भी मेरी तरफ से परेशान रहने लगे. सो, मैं ने खुद को व्यस्त रखना शुरू किया. पहलेपहल तो मैं किताबों में उलझी रहती थी, उन्हें ही पढ़ती थी. फिर एक दिन किसी ने मुझे समाजसेवी संस्था से जुड़ने का सुझाव दिया. मुझे यह बहुत पसंद आया. अगले ही दिन मैं उस संस्था से जुड़ गई और मेरे जीवन को एक नई दिशा मिल गई. पापा अपने पैतृक गांव चले गए. वहीं चाचाजी, ताऊजी के परिवार के साथ उन का वक्त भी आसानी से कट जाता है और मुझे खुश देख कर उन्हें संतुष्टि भी होती है,’’ यह कह कर वह मुसकरा दी.
अब मेरे नयन बरसने लगे. मैं ने अपने हाथ जोड़ उस से क्षमा मांगी अपने उन शब्दों के लिए जो मैं ने 20 वर्षों पहले गुस्से में उस से कहे थे. पर वह तो मानो विनम्रता, सहनशीलता और प्रेम की साक्षात रूप थी. मुझे गले से लगा कर बोली, ‘‘याद है तुम्हें, दादी ने क्या कहा था? सब समय से मिलता है. मेरा समय मुझे मिल गया. जो हुआ, अच्छा हुआ. अब तो मेरी अपनी पहचान है.’’ वह फिर मुसकरा दी.
मेरी आंखें पोंछ कर उस ने मुझे पानी पिलाया और बड़ी ही फुरती से उठी. दौड़ कर मेरे मनपसंद समोसे ले कर आई, ‘‘इन्हें खाओ, मैं ने खुद बनाए हैं,’’ कह कर प्लेट मेरे हाथ में दी. फिर हंसते हुए बोली, ‘‘आया न मां के हाथ के बने समोसे वाला स्वाद. उन्हीं से सीखे थे मैं ने.’’ मेरी आंखें फिर बरसने लगीं. माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए वह जोर से हंसी और बोली, ‘‘अरे यार, इतनी मिर्च तो नहीं है इस में जो तुम्हारी आंखों में पानी आ रहा है.’’ कह कर उस ने बर्फी का एक बड़ा टुकड़ा मेरे मुंह में ठूंस दिया और मैं खिलखिला कर हंस पड़ी.
बहुत देर तक हम बातें करते रहे. इस बीच, उस की संस्था से उस के पास कई फोन आए. सभी प्रश्नों के वह संतोषजनक उत्तर देती और फिर हम वापस पुरानी यादों में खो जाते.
वहां से वापस लौटते समय बड़े ही भय के साथ मैं ने वो उपहार उसे देने चाहे, पर साहस ही नहीं जुटा पा रही थी. शायद उस ने मेरा मन पढ़ लिया था, तभी वह चहक कर बोली, ‘‘तुम इतने सालों में मिली हो, मेरे लिए कोई तोहफा तो जरूर लाई होगी. इसे दो न मुझे.’’ बच्चों की तरह मुझे झकझोर कर कहने लगी, ‘‘तुम से तोहफा लिए बिना तो तुम्हें यहां से जाने ही नहीं दूंगी,’’ वह फिर मुसकराई.
अब मैं ने उस की बात मानते हुए उन उपहारों को उसे भेंट किया. मेरे नयन अभी भी सजल थे. उपहार लेते समय वह खुशी से मानो उछल पड़ी हो. ‘‘मेरे तो बहुत सारे बच्चे हैं. ये उपहार पा कर वे बहुत खुश होेंगे. इसे तो मैं ड्राइंगरूम में सजाऊंगी,’’ ऐसा कह कर उस ने मेरा और मेरे लाए हुए उपहारों का बहुत मान रखा.
यों ही सुकून का एहसास दिलाती, सधी हुई बातों से, वर्तमान लमहों को पूरे मन से जीने का कौशल सिखलाती, उत्साह से भरपूर वह मुझे बाहर तक विदा करने आई इस वादे के साथ कि कल रविवार को शशांक के साथ फिर मिलने आना है.
मैं वहां से चल दी. गाड़ी में बैठे पूरे रास्ते मेरे मन में एक अजीब सी उलझन हिचकोले खाती रही. अपनी जिंदगी, अपने सपने, मात्र अपना ही भला चाहने के स्वार्थ में मैं ने उस बेकुसूर को न जाने क्याक्या कह दिया था. फिर भी, उस के नयनों में स्नेह, हृदय में प्यार और अपनापन देख कर मैं स्वयं को बहुत बड़ी अपराधिन महसूस कर रही थी.
दादी की जिस सीख को मैं ने अपनाना तो दूर, कभी उसे तवज्जुह भी नहीं दी, आज फिर याद आई. वही दादी, जो कहती थीं, ‘सबकुछ नियति तय करती है. हम सभी उस नियति के मोहरे मात्र हैं. कभी भी किसी से आहत करने वाले शब्द मत बोलो कि उस के घाव कभी भर न पाएं और वे नासूर बन जाएं.’
अब लगता है शायद नियति ने ही ऐसा तय कर रखा था कि मेरे स्थान पर शैली आ गई. उस ने भी मित्रता का क्या खूब फर्ज निभाया, मेरे जीवन में आने वाले बुरे समय को उस ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. वह भले ही सबकुछ भुला कर मुझे माफ कर दे, पर मैं अपनी ही नजरों में ताउम्र उस की अपराधिनी रहूंगी.
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लेखिका- रेणु खत्री
‘‘उन्होंने मुझे घर में रखने से इनकार कर दिया. मैं मायके आ गई. मेरा दुख मां से सहन नहीं हुआ और वे बीमार पड़ गईं व 2 माह के भीतर ही वे भी मुझे छोड़ गईं.
‘‘पापा के किसी मित्र ने मेरे लिए दूसरा रिश्ता खोजा. पर मुझ में अब समय से लड़ने की और ताकत न थी. मैं ने दूसरे विवाह से मना कर दिया. पापा भी मेरी तरफ से परेशान रहने लगे. सो, मैं ने खुद को व्यस्त रखना शुरू किया. पहलेपहल तो मैं किताबों में उलझी रहती थी, उन्हें ही पढ़ती थी. फिर एक दिन किसी ने मुझे समाजसेवी संस्था से जुड़ने का सुझाव दिया. मुझे यह बहुत पसंद आया. अगले ही दिन मैं उस संस्था से जुड़ गई और मेरे जीवन को एक नई दिशा मिल गई. पापा अपने पैतृक गांव चले गए. वहीं चाचाजी, ताऊजी के परिवार के साथ उन का वक्त भी आसानी से कट जाता है और मुझे खुश देख कर उन्हें संतुष्टि भी होती है,’’ यह कह कर वह मुसकरा दी.
अब मेरे नयन बरसने लगे. मैं ने अपने हाथ जोड़ उस से क्षमा मांगी अपने उन शब्दों के लिए जो मैं ने 20 वर्षों पहले गुस्से में उस से कहे थे. पर वह तो मानो विनम्रता, सहनशीलता और प्रेम की साक्षात रूप थी. मुझे गले से लगा कर बोली, ‘‘याद है तुम्हें, दादी ने क्या कहा था? सब समय से मिलता है. मेरा समय मुझे मिल गया. जो हुआ, अच्छा हुआ. अब तो मेरी अपनी पहचान है.’’ वह फिर मुसकरा दी.
मेरी आंखें पोंछ कर उस ने मुझे पानी पिलाया और बड़ी ही फुरती से उठी. दौड़ कर मेरे मनपसंद समोसे ले कर आई, ‘‘इन्हें खाओ, मैं ने खुद बनाए हैं,’’ कह कर प्लेट मेरे हाथ में दी. फिर हंसते हुए बोली, ‘‘आया न मां के हाथ के बने समोसे वाला स्वाद. उन्हीं से सीखे थे मैं ने.’’ मेरी आंखें फिर बरसने लगीं. माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए वह जोर से हंसी और बोली, ‘‘अरे यार, इतनी मिर्च तो नहीं है इस में जो तुम्हारी आंखों में पानी आ रहा है.’’ कह कर उस ने बर्फी का एक बड़ा टुकड़ा मेरे मुंह में ठूंस दिया और मैं खिलखिला कर हंस पड़ी.
बहुत देर तक हम बातें करते रहे. इस बीच, उस की संस्था से उस के पास कई फोन आए. सभी प्रश्नों के वह संतोषजनक उत्तर देती और फिर हम वापस पुरानी यादों में खो जाते.
वहां से वापस लौटते समय बड़े ही भय के साथ मैं ने वो उपहार उसे देने चाहे, पर साहस ही नहीं जुटा पा रही थी. शायद उस ने मेरा मन पढ़ लिया था, तभी वह चहक कर बोली, ‘‘तुम इतने सालों में मिली हो, मेरे लिए कोई तोहफा तो जरूर लाई होगी. इसे दो न मुझे.’’ बच्चों की तरह मुझे झकझोर कर कहने लगी, ‘‘तुम से तोहफा लिए बिना तो तुम्हें यहां से जाने ही नहीं दूंगी,’’ वह फिर मुसकराई.
अब मैं ने उस की बात मानते हुए उन उपहारों को उसे भेंट किया. मेरे नयन अभी भी सजल थे. उपहार लेते समय वह खुशी से मानो उछल पड़ी हो. ‘‘मेरे तो बहुत सारे बच्चे हैं. ये उपहार पा कर वे बहुत खुश होेंगे. इसे तो मैं ड्राइंगरूम में सजाऊंगी,’’ ऐसा कह कर उस ने मेरा और मेरे लाए हुए उपहारों का बहुत मान रखा.
यों ही सुकून का एहसास दिलाती, सधी हुई बातों से, वर्तमान लमहों को पूरे मन से जीने का कौशल सिखलाती, उत्साह से भरपूर वह मुझे बाहर तक विदा करने आई इस वादे के साथ कि कल रविवार को शशांक के साथ फिर मिलने आना है.
मैं वहां से चल दी. गाड़ी में बैठे पूरे रास्ते मेरे मन में एक अजीब सी उलझन हिचकोले खाती रही. अपनी जिंदगी, अपने सपने, मात्र अपना ही भला चाहने के स्वार्थ में मैं ने उस बेकुसूर को न जाने क्याक्या कह दिया था. फिर भी, उस के नयनों में स्नेह, हृदय में प्यार और अपनापन देख कर मैं स्वयं को बहुत बड़ी अपराधिन महसूस कर रही थी.
दादी की जिस सीख को मैं ने अपनाना तो दूर, कभी उसे तवज्जुह भी नहीं दी, आज फिर याद आई. वही दादी, जो कहती थीं, ‘सबकुछ नियति तय करती है. हम सभी उस नियति के मोहरे मात्र हैं. कभी भी किसी से आहत करने वाले शब्द मत बोलो कि उस के घाव कभी भर न पाएं और वे नासूर बन जाएं.’
अब लगता है शायद नियति ने ही ऐसा तय कर रखा था कि मेरे स्थान पर शैली आ गई. उस ने भी मित्रता का क्या खूब फर्ज निभाया, मेरे जीवन में आने वाले बुरे समय को उस ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. वह भले ही सबकुछ भुला कर मुझे माफ कर दे, पर मैं अपनी ही नजरों में ताउम्र उस की अपराधिनी रहूंगी.
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February 03, 2020 at 10:29AM
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