धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-1
धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-2
धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-3
अब आगे पढ़ें-
अपने घर पहुंच कर निकहत सीधी अपने कमरे में पहुंची. दरवाजा बन्द करते-करते वह फूट-फूट कर रो पड़ी. संजीव से उसे ऐसे धोखे, ऐसी बेरुखी और ऐसी बेशर्मी की उम्मीद नहीं थी. उसको तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह वही संजीव है, जिसने उससे बेइंतहा मोहब्बत की थी. यह वही संजीव है जो उससे मिलने के लिए हर दिन भागा चला आता था. यह वही संजीव है जिसको इबादत की हद तक उसने चाहा था. कोई ज्यादा वक्त तो नहीं हुआ है. महज तीन महीने में ही वह क्या से क्या हो गया? निकहत की आंखों के सामने से संजीव के संग बिताया वक्त और प्यार का एक-एक पल चलचित्र की तरह घूम रहा था. वह बिस्तर पर पड़ी ज़ार-ज़ार रोये जा रही थी. रात गुजरती जा रही थी और उसके आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे. इतना तो वह अपने अब्बा के मरने पर भी न रोयी थी. आज तो जैसे वह सारी जिन्दगी का रोना रो लेना चाहती हो. चाहती थी कि आज उसके सारे आंसू बह जाएं… हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएं. सारी रात रो लेने के बाद सुबह तक उसका मन काफी हल्का हो गया था. दिमाग कुछ सोचने के काबिल हुआ तो उसने उठकर हाथ-मुंह धोया. कपड़े बदल कर कमरे से बाहर आयी, तो देखा अम्मी लाठी के सहारे खड़ी होकर चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा रही थीं.
‘क्या बात है बेटा…? कल रात तो तूने खाना भी नहीं खाया. मैं तो दरवाजा पीटते-पीटते थक गयी. बड़ी जल्दी सो गयी थी…?’ अम्मी ने उसे रसोई में देखा तो बोलीं.
‘हां अम्मी, तबियत नहीं ठीक थी…’ उसने संक्षिप्त सा जवाब दिया और पतीले में चीनी-पत्ती डालने लगी.
‘बुखार तो नहीं है…? डौक्टर को दिखा ले…’ अम्मी चिन्तित हो गयीं.
‘नहीं अम्मी, अब ठीक है, बस सिरदर्द था…’ वह चाय की पतीली चूल्हे से उतारने लगी.
नाश्ता करके वह सीधी प्रेमभाई के स्टूडियो पहुंची. उसका दिमाग बड़ी तेजी से काम कर रहा था. उसके कानों में रह-रह कर संजीव के शब्द गूंज रहे थे, ‘मैं तुम्हारे प्यार की कीमत चुकाने को तैयार हूं…’
प्रेमभाई ने निकहत को अपने सामने देखा, तो राहत की सांस ली, ‘आओ निकहत… बैठो…’ वह कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बोले.
‘प्रेमभाई, मुझे कुछ पैसे चाहिए… आप मेरा पुराना सारा बैलेंस क्लियर कर दीजिए…’ वह बैठते हुए बोली.
‘क्या बात है…? अचानक इतने पैसे की क्या जरूरत आ पड़ी…?’
‘कुछ नहीं… बस अब इस शहर से दिल हट गया है, वैसे भी इस छोटे से शहर में मेरा करियर चौपट हो रहा है… जिंगल्स गा-गाकर मैं थक गयी हूं… मैं अब अपने गीत गाना चाहती हूं….’ उसने मुस्कुराने की असफल चेष्टा की.
‘वो तो ठीक है, मगर तुम जाओगी कहां…? कोई औफर मिला है क्या…?’ प्रेमभाई ने उत्सुकता से पूछा.
‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं है प्रेमभाई, दुनिया बहुत बड़ी है, मैं भी कोई दूसरा ठौर ढूंढ लूंगी… आप बस मेरा हिसाब बना दीजिए…’ उसने बात को खत्म करना चाहा.
‘ठीक है, मैं भी तुम्हें नहीं रोकना चाहता, कुछ दिनों के लिए कहीं घूम-फिर आओ… दिल बहल जाएगा…’ कहकर उन्होंने अपनी डायरी निकला ली और उसका हिसाब देखने लगे.
‘निकहत… मैं शाम तक तुम्हें रुपया भिजवा दूंगा… बैंक जाना पड़ेगा…’ उन्होंने जवाब दिया.
‘ठीक है प्रेमभाई… मैं घर पर ही मिलूंगी… अच्छा आदाब…’ वह घर लौट आयी.
प्रेमभाई ने उसे रोका नहीं. वह उसके दिल का हाल समझ रहे थे. अधूरे पड़े जिंगल का जिक्र भी उन्होंने नहीं किया. सोचा कुछ दिन बाहर घूम कर जब वह लौट आएगी, तब पूरा कर लेंगे.
प्रेमभाई के स्टूडियो से घर पहुंचते ही निकहत ने घोषणा की, ‘अम्मी… अब हम इस शहर में नहीं रहेंगे…’
‘क्या…?’ अम्मी ने चौंकते हुए उसकी तरफ देखा, ‘फिर कहां रहेंगे…?’ अम्मी उसकी बात नहीं समझीं थीं. जाहिद भी अपनी किताबों से सिर उठाकर बहन की ओर ताकने लगा.
‘हां अम्मी… अब हम किसी दूसरे शहर में रहेंगे… किसी बड़े शहर में…’ वह अपनी बड़ी-बड़ी आंखें नचाते हुए बोली.
‘पागल हो गयी है क्या…? अच्छा भला तो शहर है…’ अम्मी भुनभुनायी. वह उसकी बातों को मजाक समझ रही थीं.
‘अम्मी, तुम समझती क्यों नहीं? यहां मेरे लिए तरक्की का कोई चान्स नहीं है… क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारी बेटी बस इन छोटे-मोटे कार्यक्रमों के पीछे भागती रहे? नहीं, अम्मी नहीं… मुझे आगे बढ़ना है… बहुत आगे जाना है… बोलो, मेरा साथ दोगी?’ वो अपनी अम्मी के घुटनों के पास जमीन पर बैठ गयी.
अम्मी प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘वो तो ठीक है बेटा, मैं तेरे रास्ते में रुकावट क्यों बनने लगी? तेरी ही मेहनत से तो घर चल रहा है. हां, मगर पता भी तो चले, कहां जाना है?’
‘मुम्बई…’ उसने जवाब दिया.
‘मुम्बई!’ जाहिद खुशी से चहकते हुए बोला, ‘अप्पी, क्या सचमुच… हमलोग मुम्बई में रहेंगे…? वहां तो बड़े-बड़े हीरो भी मिलेंगे, है न…?’ जाहिद उत्साहित हो गया.
‘हां जाहिद, हम सब मुम्बई चलेंगे… वहां बड़े स्टूडियो हैं… बड़े-बड़े हीरो हैं…. बड़ा काम है… वहां अम्मी के पैरों का इलाज भी बड़े अस्पताल में करवाएंगे… बस, दो-तीन दिनों में मैं पैसों का सारा इंतजाम कर लूंगी… बस अगले हफ्ते चलते हैं…’ निकहत बोली.
अम्मी अपनी बेटी की बातों पर हैरान थी. इतनी जल्दी? ऐसे कैसे सबकुछ छोड़ कर चल देंगे? इसे अचानक क्या हो गया? अम्मी चिन्तित हो उठीं.
‘और वह संजीव लौटेगा तो…?’ उन्होंने उसे याद दिलाना चाहा.
‘अरे… मारो गोली संजीव को…’ निकहत लापरवाही से कहते हुए उठ खड़ी हुई, ‘संजीव जैसे तेरी बेटी को हजारों मिल जाएंगे अम्मी… बस पैसे आने दो… पैसे से दुनिया खरीदी जा सकती है… संजीव जैसों की तो लाइन लग जाएगी… अब इतनी घटिया किस्मत भी नहीं है तेरी निकहत की…’ उसने हंसते हुए जवाब दिया और अपने कमरे की ओर बढ़ गयी. जाहिद अपने सवालों और जिज्ञासाओं की पोटली लिए उसके पीछे-पीछे उसके कमरे में पहुंच गया.
बेचारी अम्मी अपनी जगह सन्न बैठी रह गयी, ‘क्या यह वही निकहत है?’ उन्हें यकीन नहीं हो रहा था, ‘अचानक इसे हुआ क्या है…? कल तक तो यह संजीव के लिए जान देने पर तुल जाती थी और आज ऐसी बातें कर रही है? लगता है उससे झगड़ा करके आयी है. चलो अच्छा ही है, उससे नाता तोड़ ले तो बिरादरी में अपनी इज़्ज़त बच जाएगी. इसे अक्ल आ जाए तो अपने वहां लड़कों की कमी थोड़ी न है… एक से एक पड़े हैं… मगर ये तो संजीव के पीछे दीवानी है…’ सोचते हुए वह अपने काम में लग गयीं.
एक हफ्ते में निकहत ने पूरे घर का जरूरी सामान समेट कर पैक कर लिया. प्रेमभाई के अधूरे पड़े जिंगल्स भी पूरे कर दिये और उनसे मुम्बई की कुछ बड़ी म्यूजिक कम्पनियों और म्यूजिक डायरेक्टर्स के नाम-पते भी इकट्ठा कर लिये. अम्मी उसके इस फैसले और जल्दबाजी से परेशान भी थीं और खुश भी. परेशाान इसलिए कि मुम्बई जैसे बड़े और नये शहर में, नये लोगों के बीच कहां और कैसे रहेंगे और खुश इसलिए कि चलो, इस बहाने संजीव का कांटा तो निकल गया. उन्होंने गांव में अपनी बड़ी बहन के वहां संदेशा भिजवाया कि उनके पीछे वह अपने बड़े बेटे के परिवार को इस घर में रहने के लिए भेज दें. घर को खाली छोड़ कर कैसे चली जातीं? पति की आखिरी निशानी है, बेचने की तो सोच भी नहीं सकतीं. इसलिए किसी का यहां रहना जरूरी है… कहीं खाली पड़ा देखकर किसी ने कब्जा कर लिया तो…?
निकहत ने प्रेमभाई से उनके एक पुराने मित्र के घर का पता लिया था, जो मुम्बई में काफी अरसे से रह रहे थे. यूं कहें कि प्रेमभाई ने खुद ही निकहत को उनका पता दिया था और कहा था, ‘नया शहर होगा, मैं बलजीत को फोन कर दूंगा. तुम जब तक चाहो उसके वहां रह सकती हो, मियां-बीवी दोनों बहुत ही नेक हैं, वह भी दो-तीन लोगों से तुम्हें इन्ट्रोड्यूस करा देगा… काम मिलने में आसानी हो जाएगी…’ प्रेमभाई अपनी तरफ से निकहत की काफी मदद कर रहे थे. निकहत प्रेमभाई की अहसानमंद थी. इस मामले में उन्होंने सचमुच बड़े भाई की तरह उसकी मदद की थी.
समय बीतता गया. निकहत को गये करीब-करीब तीन साल होने को आये. इस बीच उसकी कोई खबर नहीं मिली. वह कहां है, किस हाल में है, कोई नहीं जानता. प्रेमभाई ने बलजीत को फोन भी किया था. पता चला कि वह लोग उसके वहां बस एक महीना ही रहे, फिर उनको अंधेरी की किसी चाल में जगह मिल गयी और तीनों उधर ही शिफ्ट हो गये. कुछ दिन फोन करके निकहत हालचाल देती रही थी, फिर उसके फोन आने बंद हो गये… आजकल वह लोग कहां हैं, ये बलजीत को भी नहीं पता.
(धारावाहिक के पांचवे भाग में पढ़िये कि मुम्बई पहुंच कर निकहत ने ऐसा क्या किया कि वह संजीव के लिए पहेली बन गयी…)
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अपने घर पहुंच कर निकहत सीधी अपने कमरे में पहुंची. दरवाजा बन्द करते-करते वह फूट-फूट कर रो पड़ी. संजीव से उसे ऐसे धोखे, ऐसी बेरुखी और ऐसी बेशर्मी की उम्मीद नहीं थी. उसको तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह वही संजीव है, जिसने उससे बेइंतहा मोहब्बत की थी. यह वही संजीव है जो उससे मिलने के लिए हर दिन भागा चला आता था. यह वही संजीव है जिसको इबादत की हद तक उसने चाहा था. कोई ज्यादा वक्त तो नहीं हुआ है. महज तीन महीने में ही वह क्या से क्या हो गया? निकहत की आंखों के सामने से संजीव के संग बिताया वक्त और प्यार का एक-एक पल चलचित्र की तरह घूम रहा था. वह बिस्तर पर पड़ी ज़ार-ज़ार रोये जा रही थी. रात गुजरती जा रही थी और उसके आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे. इतना तो वह अपने अब्बा के मरने पर भी न रोयी थी. आज तो जैसे वह सारी जिन्दगी का रोना रो लेना चाहती हो. चाहती थी कि आज उसके सारे आंसू बह जाएं… हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएं. सारी रात रो लेने के बाद सुबह तक उसका मन काफी हल्का हो गया था. दिमाग कुछ सोचने के काबिल हुआ तो उसने उठकर हाथ-मुंह धोया. कपड़े बदल कर कमरे से बाहर आयी, तो देखा अम्मी लाठी के सहारे खड़ी होकर चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा रही थीं.
‘क्या बात है बेटा…? कल रात तो तूने खाना भी नहीं खाया. मैं तो दरवाजा पीटते-पीटते थक गयी. बड़ी जल्दी सो गयी थी…?’ अम्मी ने उसे रसोई में देखा तो बोलीं.
‘हां अम्मी, तबियत नहीं ठीक थी…’ उसने संक्षिप्त सा जवाब दिया और पतीले में चीनी-पत्ती डालने लगी.
‘बुखार तो नहीं है…? डौक्टर को दिखा ले…’ अम्मी चिन्तित हो गयीं.
‘नहीं अम्मी, अब ठीक है, बस सिरदर्द था…’ वह चाय की पतीली चूल्हे से उतारने लगी.
नाश्ता करके वह सीधी प्रेमभाई के स्टूडियो पहुंची. उसका दिमाग बड़ी तेजी से काम कर रहा था. उसके कानों में रह-रह कर संजीव के शब्द गूंज रहे थे, ‘मैं तुम्हारे प्यार की कीमत चुकाने को तैयार हूं…’
प्रेमभाई ने निकहत को अपने सामने देखा, तो राहत की सांस ली, ‘आओ निकहत… बैठो…’ वह कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बोले.
‘प्रेमभाई, मुझे कुछ पैसे चाहिए… आप मेरा पुराना सारा बैलेंस क्लियर कर दीजिए…’ वह बैठते हुए बोली.
‘क्या बात है…? अचानक इतने पैसे की क्या जरूरत आ पड़ी…?’
‘कुछ नहीं… बस अब इस शहर से दिल हट गया है, वैसे भी इस छोटे से शहर में मेरा करियर चौपट हो रहा है… जिंगल्स गा-गाकर मैं थक गयी हूं… मैं अब अपने गीत गाना चाहती हूं….’ उसने मुस्कुराने की असफल चेष्टा की.
‘वो तो ठीक है, मगर तुम जाओगी कहां…? कोई औफर मिला है क्या…?’ प्रेमभाई ने उत्सुकता से पूछा.
‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं है प्रेमभाई, दुनिया बहुत बड़ी है, मैं भी कोई दूसरा ठौर ढूंढ लूंगी… आप बस मेरा हिसाब बना दीजिए…’ उसने बात को खत्म करना चाहा.
‘ठीक है, मैं भी तुम्हें नहीं रोकना चाहता, कुछ दिनों के लिए कहीं घूम-फिर आओ… दिल बहल जाएगा…’ कहकर उन्होंने अपनी डायरी निकला ली और उसका हिसाब देखने लगे.
‘निकहत… मैं शाम तक तुम्हें रुपया भिजवा दूंगा… बैंक जाना पड़ेगा…’ उन्होंने जवाब दिया.
‘ठीक है प्रेमभाई… मैं घर पर ही मिलूंगी… अच्छा आदाब…’ वह घर लौट आयी.
प्रेमभाई ने उसे रोका नहीं. वह उसके दिल का हाल समझ रहे थे. अधूरे पड़े जिंगल का जिक्र भी उन्होंने नहीं किया. सोचा कुछ दिन बाहर घूम कर जब वह लौट आएगी, तब पूरा कर लेंगे.
प्रेमभाई के स्टूडियो से घर पहुंचते ही निकहत ने घोषणा की, ‘अम्मी… अब हम इस शहर में नहीं रहेंगे…’
‘क्या…?’ अम्मी ने चौंकते हुए उसकी तरफ देखा, ‘फिर कहां रहेंगे…?’ अम्मी उसकी बात नहीं समझीं थीं. जाहिद भी अपनी किताबों से सिर उठाकर बहन की ओर ताकने लगा.
‘हां अम्मी… अब हम किसी दूसरे शहर में रहेंगे… किसी बड़े शहर में…’ वह अपनी बड़ी-बड़ी आंखें नचाते हुए बोली.
‘पागल हो गयी है क्या…? अच्छा भला तो शहर है…’ अम्मी भुनभुनायी. वह उसकी बातों को मजाक समझ रही थीं.
‘अम्मी, तुम समझती क्यों नहीं? यहां मेरे लिए तरक्की का कोई चान्स नहीं है… क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारी बेटी बस इन छोटे-मोटे कार्यक्रमों के पीछे भागती रहे? नहीं, अम्मी नहीं… मुझे आगे बढ़ना है… बहुत आगे जाना है… बोलो, मेरा साथ दोगी?’ वो अपनी अम्मी के घुटनों के पास जमीन पर बैठ गयी.
अम्मी प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘वो तो ठीक है बेटा, मैं तेरे रास्ते में रुकावट क्यों बनने लगी? तेरी ही मेहनत से तो घर चल रहा है. हां, मगर पता भी तो चले, कहां जाना है?’
‘मुम्बई…’ उसने जवाब दिया.
‘मुम्बई!’ जाहिद खुशी से चहकते हुए बोला, ‘अप्पी, क्या सचमुच… हमलोग मुम्बई में रहेंगे…? वहां तो बड़े-बड़े हीरो भी मिलेंगे, है न…?’ जाहिद उत्साहित हो गया.
‘हां जाहिद, हम सब मुम्बई चलेंगे… वहां बड़े स्टूडियो हैं… बड़े-बड़े हीरो हैं…. बड़ा काम है… वहां अम्मी के पैरों का इलाज भी बड़े अस्पताल में करवाएंगे… बस, दो-तीन दिनों में मैं पैसों का सारा इंतजाम कर लूंगी… बस अगले हफ्ते चलते हैं…’ निकहत बोली.
अम्मी अपनी बेटी की बातों पर हैरान थी. इतनी जल्दी? ऐसे कैसे सबकुछ छोड़ कर चल देंगे? इसे अचानक क्या हो गया? अम्मी चिन्तित हो उठीं.
‘और वह संजीव लौटेगा तो…?’ उन्होंने उसे याद दिलाना चाहा.
‘अरे… मारो गोली संजीव को…’ निकहत लापरवाही से कहते हुए उठ खड़ी हुई, ‘संजीव जैसे तेरी बेटी को हजारों मिल जाएंगे अम्मी… बस पैसे आने दो… पैसे से दुनिया खरीदी जा सकती है… संजीव जैसों की तो लाइन लग जाएगी… अब इतनी घटिया किस्मत भी नहीं है तेरी निकहत की…’ उसने हंसते हुए जवाब दिया और अपने कमरे की ओर बढ़ गयी. जाहिद अपने सवालों और जिज्ञासाओं की पोटली लिए उसके पीछे-पीछे उसके कमरे में पहुंच गया.
बेचारी अम्मी अपनी जगह सन्न बैठी रह गयी, ‘क्या यह वही निकहत है?’ उन्हें यकीन नहीं हो रहा था, ‘अचानक इसे हुआ क्या है…? कल तक तो यह संजीव के लिए जान देने पर तुल जाती थी और आज ऐसी बातें कर रही है? लगता है उससे झगड़ा करके आयी है. चलो अच्छा ही है, उससे नाता तोड़ ले तो बिरादरी में अपनी इज़्ज़त बच जाएगी. इसे अक्ल आ जाए तो अपने वहां लड़कों की कमी थोड़ी न है… एक से एक पड़े हैं… मगर ये तो संजीव के पीछे दीवानी है…’ सोचते हुए वह अपने काम में लग गयीं.
एक हफ्ते में निकहत ने पूरे घर का जरूरी सामान समेट कर पैक कर लिया. प्रेमभाई के अधूरे पड़े जिंगल्स भी पूरे कर दिये और उनसे मुम्बई की कुछ बड़ी म्यूजिक कम्पनियों और म्यूजिक डायरेक्टर्स के नाम-पते भी इकट्ठा कर लिये. अम्मी उसके इस फैसले और जल्दबाजी से परेशान भी थीं और खुश भी. परेशाान इसलिए कि मुम्बई जैसे बड़े और नये शहर में, नये लोगों के बीच कहां और कैसे रहेंगे और खुश इसलिए कि चलो, इस बहाने संजीव का कांटा तो निकल गया. उन्होंने गांव में अपनी बड़ी बहन के वहां संदेशा भिजवाया कि उनके पीछे वह अपने बड़े बेटे के परिवार को इस घर में रहने के लिए भेज दें. घर को खाली छोड़ कर कैसे चली जातीं? पति की आखिरी निशानी है, बेचने की तो सोच भी नहीं सकतीं. इसलिए किसी का यहां रहना जरूरी है… कहीं खाली पड़ा देखकर किसी ने कब्जा कर लिया तो…?
निकहत ने प्रेमभाई से उनके एक पुराने मित्र के घर का पता लिया था, जो मुम्बई में काफी अरसे से रह रहे थे. यूं कहें कि प्रेमभाई ने खुद ही निकहत को उनका पता दिया था और कहा था, ‘नया शहर होगा, मैं बलजीत को फोन कर दूंगा. तुम जब तक चाहो उसके वहां रह सकती हो, मियां-बीवी दोनों बहुत ही नेक हैं, वह भी दो-तीन लोगों से तुम्हें इन्ट्रोड्यूस करा देगा… काम मिलने में आसानी हो जाएगी…’ प्रेमभाई अपनी तरफ से निकहत की काफी मदद कर रहे थे. निकहत प्रेमभाई की अहसानमंद थी. इस मामले में उन्होंने सचमुच बड़े भाई की तरह उसकी मदद की थी.
समय बीतता गया. निकहत को गये करीब-करीब तीन साल होने को आये. इस बीच उसकी कोई खबर नहीं मिली. वह कहां है, किस हाल में है, कोई नहीं जानता. प्रेमभाई ने बलजीत को फोन भी किया था. पता चला कि वह लोग उसके वहां बस एक महीना ही रहे, फिर उनको अंधेरी की किसी चाल में जगह मिल गयी और तीनों उधर ही शिफ्ट हो गये. कुछ दिन फोन करके निकहत हालचाल देती रही थी, फिर उसके फोन आने बंद हो गये… आजकल वह लोग कहां हैं, ये बलजीत को भी नहीं पता.
(धारावाहिक के पांचवे भाग में पढ़िये कि मुम्बई पहुंच कर निकहत ने ऐसा क्या किया कि वह संजीव के लिए पहेली बन गयी…)
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September 02, 2019 at 10:28AM
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