Thursday, 25 July 2019

चटोरी जीभ का रहस्य

मां की मृत्यु के बाद पिता जी बिल्कुल अकेले पड़ गये थे. कमरे में बैठे घर के एक कोने में बने मंदिर की ओर निहारते रहते थे. हालांकि पूरे जीवन नास्तिक रहे. कभी मंदिर नहीं गये. कभी कोई व्रत-त्योहार नहीं किया. मगर मां के जाने के बाद अपने पलंग पर बैठे मंदिर को ही निहारते रहते थे. अब पता नहीं मंदिर को निहारते थे या उसके सामने रोज सुबह घंटा भर बैठ कर पूजा करने वाली मां की छवि तलाशते थे.

पिता जी और मां के बीच कई बातें बिल्कुल जुदा थीं. मां जहां पूरी तरह आस्तिक थी, पिता जी बिल्कुल नास्तिक. मां जहां नहाए-धोए बगैर पानी भी मुंह में नहीं डालती थीं, वहीं पिता जी को बासी मुंह ही चाय चाहिए होती थी. लेकिन फिर भी दोनों में बड़ा दोस्ताना सा रिश्ता रहा. कभी झगड़ा, कभी प्यार. वे मां के साथ ही बोलते-बतियाते और कभी-कभी उन्हें गरियाने भी लगते थे कि बुढ़िया अब तुझसे कुछ नहीं होता. मां समझ जातीं कि बुड्ढे का फिर कुछ चटपटा खाने का मन हो आया है. अब जब तक कुछ न मिलेगा ऐसे ही भूखे शेर की तरह आंगन में चक्कर काटते रहेंगे और किसी न किसी बात पर गाली-गलौच करते रहेंगे. सीधे बोलना तो आता ही नहीं इन्हें. भुनभुनाती हुई मां छड़ी उठा कर धीरे-धीरे किचेन की ओर चल पड़तीं थीं. मां को किचेन की ओर जाता देख पिताजी की बेचैनी और बढ़ जाती. उनकी हरकतों को देखकर तब मैं सोचता था कि शायद उनको यह अच्छा नहीं लगता था कि इस बुढ़ापे में वो मां को इतना कष्ट दें, मगर चटोरी जीभ का क्या करें? मानती ही न थी. इसीलिए इतना तमाशा करते थे.

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थोड़ी देर में मां थाली में पकौड़े तल के ले आती, या भुने हुए लइया-चना में प्याज, टमाटर, मिर्ची, नींबू डाल कर बढ़िया चटपटी चाट तैयार कर लातीं. लाकर धर देतीं सामने. पिता जी कुछ देर देखते फिर धीरे से हाथ बढ़ा कर प्लेट उठा लेते और देखते ही देखते पूरी प्लेट चट कर लंबी तान कर लेट जाते. मां बड़बड़ाती, ‘बच्चों की तरह हो गये हैं बिल्कुल. पेट न भरे तो जुबान गज भर लंबी निकलने लगती है. अब देखो कैसे खर्राटे बज रहे हैं. बताया तक नहीं कि कैसा बना था.’

फिर उठ कर प्लेट किचेन में रखतीं और अपने लिए चाय बना कर आंगन में खाट पर आ बैठती थीं.

मैं कभी कहता कि बाहर रेहड़ी वाले से चाट-पकौड़े ले आऊं तो पिता जी फट मना कर देते थे. मां भी मुझे रोक देती थीं. कहतीं अरे, बाहर कहां जाएगा लेने, मैं अभी झट से बना देती हूं. इनकी फरमाइशें तो दिन भर चलती रहती हैं.

मैं उन दिनों बनारस में पोस्टेड था. हमारा कस्बा ज्यादा दूर नहीं था. शनिवार और इतवार मैं घर पर मां पिताजी के साथ ही रहता था. तब यह सारा तमाशा देखता था. मां काफी बूढ़ी हो गयी थीं. आंखों से भी अब कम दिखने लगा था. काम अब ज्यादा नहीं होता था. जल्दी ही थक जाती थीं. इसलिए मैं चाहता था कि मेरी जल्दी शादी हो जाए तो आने वाली लड़की मां पिताजी का भोजन पानी और सेवा टहल कर लिया करेगी. फिर एक जगह बात पक्की हो गयी और मेरी शादी मीनाक्षी से हो गयी. मीनाक्षी ने आते ही घर संभाल लिया. मां को भी आराम हो गया. मैं नोटिस करता था कि पिता जी मीनाक्षी से खाने की कोई फरमाइश नहीं करते थे. मां ही कुछ-कुछ बना कर उन्हें परोसती रहती थीं. मीनाक्षी कहती भी, कि मुझे बोल दिया करें, मगर मां हंस कर उसकी बात टाल जाती थी.

मेरी शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे कि एक दिन अचानक हार्ट अटैक से मां चल बसी. शायद इसी इंतजार में बैठी थी कि घर को संभालने के लिए कोई औरत आ जाए तो मैं चलूं. मां का इस तरह अचानक चले जाने का बड़ा धक्का पिता जी को लगा. वे बड़े गुमसुम से हो गये हैं. मीनाक्षी यूं तो पिता जी के खाने पीने का पूरा ख्याल रखती थी, मगर मैं देख रहा हूं कि अब पिता जी की चटपटी चीजों की ख्वाहिश बिल्कुल खत्म हो चुकी है. न तो वो कभी पकौड़ियों की फरमाइश करते हैं न चाट या दही बड़े की. बेहद सादा खाना खाने लगे हैं. कभी-कभी तो सिर्फ खिचड़ी या दूध ब्रेड ही खाकर ही सो रहते हैं. मीनाक्षी को बताऊं तो शायद यकीन न करे कि इनकी जुबान कितनी चटोरी थी. अभी दिन ही कितने हुए हैं उसे इस घर में आये. उसने उनका वह रूप नहीं देखा था, जब वह गाली-गलौच करते पूरे आंगन में शेर की तरह तब तक चहल-कदमी करते थे जब तक मां उनके लिए किचेन से कुछ चटपटी चीज बना कर नहीं ले आती थीं. मगर उनकी लंबी जुबान भी मां के साथ ही चली गयी शायद. उनके जाने के बाद मैंने पिताजी को जोर से बात करते भी नहीं सुना. चुपचाप बैठे रहते हैं और मंदिर की ओर निहारते रहते हैं. बिल्कुल शांत.

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पहले मैं नहीं समझा था इस खामोशी का राज, मगर अब सबकुछ समझ में आ रहा है. दरअसल पिता जी चटोरे नहीं थे, उनका हर वक्त कुछ न कुछ खाने को मांगना मां के प्रति उनका प्यार था. मां के हाथों की बनी चीजों में ही उनको स्वाद आता था. फिर चाहे वे कुछ भी बना कर उनके सामने धर दें. मां को खाली बैठा देख उनको उलझन होती थी. वह चाहते थे कि मां उनके सामने चलती फिरती ही नजर आएं. उन्हें चलता फिरता देख उनके स्वस्थ होने को प्रमाणित करता था इसलिए. जब मां जिंदा थीं और पिताजी उनको बात-बात पर परेशान करते थे तो मुझे बड़ी कोफ्त होती थी, मगर आज पिता जी का मां के प्रति प्यार देखकर आंखें छलक आती हैं. पिता जी के गुस्से और गाली गलौच के पीछे छिपे इस प्यार को मां महसूस तो करती ही होंगी, तभी तो फटाफट छड़ी उठा कर किचेन की ओर चल पड़ती थीं कि कुछ चटपटा बना दूं इस बुड्ढे के लिए, वरना चुप ही नहीं होगा….

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मां की मृत्यु के बाद पिता जी बिल्कुल अकेले पड़ गये थे. कमरे में बैठे घर के एक कोने में बने मंदिर की ओर निहारते रहते थे. हालांकि पूरे जीवन नास्तिक रहे. कभी मंदिर नहीं गये. कभी कोई व्रत-त्योहार नहीं किया. मगर मां के जाने के बाद अपने पलंग पर बैठे मंदिर को ही निहारते रहते थे. अब पता नहीं मंदिर को निहारते थे या उसके सामने रोज सुबह घंटा भर बैठ कर पूजा करने वाली मां की छवि तलाशते थे.

पिता जी और मां के बीच कई बातें बिल्कुल जुदा थीं. मां जहां पूरी तरह आस्तिक थी, पिता जी बिल्कुल नास्तिक. मां जहां नहाए-धोए बगैर पानी भी मुंह में नहीं डालती थीं, वहीं पिता जी को बासी मुंह ही चाय चाहिए होती थी. लेकिन फिर भी दोनों में बड़ा दोस्ताना सा रिश्ता रहा. कभी झगड़ा, कभी प्यार. वे मां के साथ ही बोलते-बतियाते और कभी-कभी उन्हें गरियाने भी लगते थे कि बुढ़िया अब तुझसे कुछ नहीं होता. मां समझ जातीं कि बुड्ढे का फिर कुछ चटपटा खाने का मन हो आया है. अब जब तक कुछ न मिलेगा ऐसे ही भूखे शेर की तरह आंगन में चक्कर काटते रहेंगे और किसी न किसी बात पर गाली-गलौच करते रहेंगे. सीधे बोलना तो आता ही नहीं इन्हें. भुनभुनाती हुई मां छड़ी उठा कर धीरे-धीरे किचेन की ओर चल पड़तीं थीं. मां को किचेन की ओर जाता देख पिताजी की बेचैनी और बढ़ जाती. उनकी हरकतों को देखकर तब मैं सोचता था कि शायद उनको यह अच्छा नहीं लगता था कि इस बुढ़ापे में वो मां को इतना कष्ट दें, मगर चटोरी जीभ का क्या करें? मानती ही न थी. इसीलिए इतना तमाशा करते थे.

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थोड़ी देर में मां थाली में पकौड़े तल के ले आती, या भुने हुए लइया-चना में प्याज, टमाटर, मिर्ची, नींबू डाल कर बढ़िया चटपटी चाट तैयार कर लातीं. लाकर धर देतीं सामने. पिता जी कुछ देर देखते फिर धीरे से हाथ बढ़ा कर प्लेट उठा लेते और देखते ही देखते पूरी प्लेट चट कर लंबी तान कर लेट जाते. मां बड़बड़ाती, ‘बच्चों की तरह हो गये हैं बिल्कुल. पेट न भरे तो जुबान गज भर लंबी निकलने लगती है. अब देखो कैसे खर्राटे बज रहे हैं. बताया तक नहीं कि कैसा बना था.’

फिर उठ कर प्लेट किचेन में रखतीं और अपने लिए चाय बना कर आंगन में खाट पर आ बैठती थीं.

मैं कभी कहता कि बाहर रेहड़ी वाले से चाट-पकौड़े ले आऊं तो पिता जी फट मना कर देते थे. मां भी मुझे रोक देती थीं. कहतीं अरे, बाहर कहां जाएगा लेने, मैं अभी झट से बना देती हूं. इनकी फरमाइशें तो दिन भर चलती रहती हैं.

मैं उन दिनों बनारस में पोस्टेड था. हमारा कस्बा ज्यादा दूर नहीं था. शनिवार और इतवार मैं घर पर मां पिताजी के साथ ही रहता था. तब यह सारा तमाशा देखता था. मां काफी बूढ़ी हो गयी थीं. आंखों से भी अब कम दिखने लगा था. काम अब ज्यादा नहीं होता था. जल्दी ही थक जाती थीं. इसलिए मैं चाहता था कि मेरी जल्दी शादी हो जाए तो आने वाली लड़की मां पिताजी का भोजन पानी और सेवा टहल कर लिया करेगी. फिर एक जगह बात पक्की हो गयी और मेरी शादी मीनाक्षी से हो गयी. मीनाक्षी ने आते ही घर संभाल लिया. मां को भी आराम हो गया. मैं नोटिस करता था कि पिता जी मीनाक्षी से खाने की कोई फरमाइश नहीं करते थे. मां ही कुछ-कुछ बना कर उन्हें परोसती रहती थीं. मीनाक्षी कहती भी, कि मुझे बोल दिया करें, मगर मां हंस कर उसकी बात टाल जाती थी.

मेरी शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे कि एक दिन अचानक हार्ट अटैक से मां चल बसी. शायद इसी इंतजार में बैठी थी कि घर को संभालने के लिए कोई औरत आ जाए तो मैं चलूं. मां का इस तरह अचानक चले जाने का बड़ा धक्का पिता जी को लगा. वे बड़े गुमसुम से हो गये हैं. मीनाक्षी यूं तो पिता जी के खाने पीने का पूरा ख्याल रखती थी, मगर मैं देख रहा हूं कि अब पिता जी की चटपटी चीजों की ख्वाहिश बिल्कुल खत्म हो चुकी है. न तो वो कभी पकौड़ियों की फरमाइश करते हैं न चाट या दही बड़े की. बेहद सादा खाना खाने लगे हैं. कभी-कभी तो सिर्फ खिचड़ी या दूध ब्रेड ही खाकर ही सो रहते हैं. मीनाक्षी को बताऊं तो शायद यकीन न करे कि इनकी जुबान कितनी चटोरी थी. अभी दिन ही कितने हुए हैं उसे इस घर में आये. उसने उनका वह रूप नहीं देखा था, जब वह गाली-गलौच करते पूरे आंगन में शेर की तरह तब तक चहल-कदमी करते थे जब तक मां उनके लिए किचेन से कुछ चटपटी चीज बना कर नहीं ले आती थीं. मगर उनकी लंबी जुबान भी मां के साथ ही चली गयी शायद. उनके जाने के बाद मैंने पिताजी को जोर से बात करते भी नहीं सुना. चुपचाप बैठे रहते हैं और मंदिर की ओर निहारते रहते हैं. बिल्कुल शांत.

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पहले मैं नहीं समझा था इस खामोशी का राज, मगर अब सबकुछ समझ में आ रहा है. दरअसल पिता जी चटोरे नहीं थे, उनका हर वक्त कुछ न कुछ खाने को मांगना मां के प्रति उनका प्यार था. मां के हाथों की बनी चीजों में ही उनको स्वाद आता था. फिर चाहे वे कुछ भी बना कर उनके सामने धर दें. मां को खाली बैठा देख उनको उलझन होती थी. वह चाहते थे कि मां उनके सामने चलती फिरती ही नजर आएं. उन्हें चलता फिरता देख उनके स्वस्थ होने को प्रमाणित करता था इसलिए. जब मां जिंदा थीं और पिताजी उनको बात-बात पर परेशान करते थे तो मुझे बड़ी कोफ्त होती थी, मगर आज पिता जी का मां के प्रति प्यार देखकर आंखें छलक आती हैं. पिता जी के गुस्से और गाली गलौच के पीछे छिपे इस प्यार को मां महसूस तो करती ही होंगी, तभी तो फटाफट छड़ी उठा कर किचेन की ओर चल पड़ती थीं कि कुछ चटपटा बना दूं इस बुड्ढे के लिए, वरना चुप ही नहीं होगा….

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July 26, 2019 at 10:15AM

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