हमारी पहली मुलाकात मेरी 14वीं सालगिरह के समारोह में हमारे घर में हुई थी. मेरे मनपसंद गुलाबी रंग में वे एक खूबसूरत ड्रैस मेरे लिए उपहार में लाई थीं. मीना आंटी को धन्यवाद देते हुए मैं ने प्रसन्नता व्यक्त की और कहा, ‘‘बड़े दिनों से ऐसी ड्रैस पहनने की इच्छा थी मेरी. आप को किस ने बताया कि गुलाबी रंग मेरा पसंदीदा रंग है?’’
‘‘तुम्हारे पापा ने. तुम्हें उपहार पसंद आया, इस बात की मुझे खुशी है, कविता,’’ एक बार मेरा गाल प्यार से थपथपा कर वे दूसरे मेहमानों से बातें करने लगी थीं.
मैं ने ही नहीं, मुझ से 3 साल छोटे मेरे भाई सुमित ने भी उस पहली मुलाकात में मीना आंटी को पसंद कर लिया था. वे सुमित के लिए स्केट्स का जोड़ा ले कर आई थीं. अब वह घरबाहर दिनरात स्केटिंग करते हुए मीना आंटी के गुण गाता रहता.
मीना आंटी पापा के औफिस में काम करती थीं. उन की उम्र हमारी पहली मुलाकात के वक्त करीब 35 वर्ष की रही होगी. उन का रंग गेहुआं और नैननक्श साधारण थे. आंखों में एक चमक हर वक्त मौजूद रहती थी.
उन के साधारण रंगरूप को अत्यधिक प्रभावशाली उन का धीरगंभीर व्यक्तित्व बनाता था. साधारण औरतों की तरह मैं ने उन्हें ज्यादा बोलते कभी नहीं देखा. वे कम बोलती थीं और काम की बातें करती थीं. उन के हावभाव और बोलचाल में भरपूर आत्मविश्वास झलकता था. हलके रंगों की सूती साडि़यां उन के सुगठित शरीर पर बहुत जमती थीं. खूबसूरत न होते हुए भी मीना आंटी के प्रभावशाली व्यक्तित्व से सामने वाला बहुत प्रभावित होता था.
जन्मदिन समारोह में कुछ देर हमारी अकेले में बातें हुई थीं.
‘अभी तुम 8वीं कक्षा में पढ़ रही हो न कविता?’ अपनी बगल वाली कुरसी पर बैठा कर उन्होंने मुझ से परिचय बढ़ाने की खातिर पूछा था.
‘जी आंटी,’ मैं ने मुसकराते हुए जवाब दिया.
‘बड़ी हो कर क्या बनना चाहती हो?’
‘मैं डाक्टर बनूंगी, आंटी,’ मैं ने जोशीले अंदाज में जवाब दिया.
‘क्यों बनना चाहती हो डाक्टर तुम?’ उन्होंने दिलचस्पी दिखाई.
‘मेरी मां चाहती थीं कि मैं डाक्टर बनूं. आंटी, उन के इस सपने को मैं जरूर पूरा करूंगी.’
‘यह तो बड़ी अच्छी बात होगी, कविता. खूब दिल लगा कर पढ़ रही
हो न?’
‘जी, हां आंटी.’
‘7वीं में कितने नंबर आए थे तुम्हारे?’
‘72 प्रतिशत,’ मैं ने सकुचाते स्वर में बताया.
‘इतने नंबर लाने से तो बात नहीं बनेगी, कविता,’ उन का स्वर गंभीर हो उठा, ‘मैडिकल में प्रवेश पाने के लिए बड़ा तगड़ा कंपीटिशन है आजकल. सिर्फ सोच भर लेने से जिंदगी के मकसद पूरे नहीं होते. और दिल लगा कर पढ़ाई में मेहनत नहीं करोगी तो डाक्टर नहीं बन सकोगी.’
साफसच्ची बात मुंह पर कह देने का उन का रूखा सा अंदाज मुझे पलभर को अखरा था. फिर मैं ने उन से मिले खूबसूरत उपहार के बारे में सोचा और मन की नाराजगी को भुला कर, ‘मैं और ज्यादा मेहनत करूंगी, आंटी,’ ऐसा वादा कर के मैं अपनी सहेलियों के पास चली गई थी.
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जन्मदिन समारोह के बाद से लगभग हर शनिवारइतवार मीना आंटी हमारे यहां कभी पापा के साथ तो कभी अकेली आ जाती थीं. सुमित और मेरा वक्त उन के साथ अच्छा गुजरता था. बातों से ज्यादा वे कुछ न कुछ करते रहने में दिलचस्पी रखती थीं.
मेरे साथ वे बैडमिंटन खेलतीं तो सुमित उन्हें शतरंज की बाजी में उलझा कर खूब खुश होता. क्रिकेट पर उन दोनों के बीच गरमागरम बहस अकसर हो जाती. गणित और विज्ञान में ही नहीं, चित्रकला व कढ़ाईबुनाई में भी मेरी सहायता करने की उन में काबिलीयत थी.
2 महीने की जानपहचान के बाद हमारे आपसी संबंध बड़े अच्छे हो गए थे. भरपूर प्यार और सम्मान था उन के प्रति मेरे दिल में. फिर एक शाम मेरी सीमा चाची ने जो कुछ मुझ से कहा, उस ने मेरे दिलोदिमाग में जबरदस्त हलचल मचा दी थी.
चाची ने मुझे पास बैठा कर पूछा, ‘कविता, तू अपनी इस मीना आंटी
की चालाकी को समझ भी पा रही है
या नहीं?’
‘वे क्या चालाकी कर रही हैं, चाची?’ मैं ने फौरन माथे पर बल डाले.
‘तुम बच्चों से दोस्ती बढ़ा कर वह तुम्हारी मां की जगह आना चाहती है इस घर में.’
‘ऐसी कोई बात नहीं है, चाची.’ मैं ने चाची से ऐसा कहा जरूर, पर भीतर ही भीतर मैं बेचैन हो उठी थी.
‘यही सच है, कविता. तुम्हारी ताईजी का आज दोपहर में मुझे फोन आया था. कल तुम्हारे पापा अपने बड़े भाई से मिलने गए थे. वे तुम्हारी इस चालाक मीना आंटी से शादी करना चाहते हैं. मुझे तो यह तलाकशुदा औरत कभी अच्छी नहीं लगी. जब सौतेली मां बन कर घर में आ जाएगी तब दिखाएगी अपना असली रंग. तुम्हारे पिताजी को तुम से दूर कर के देखना कैसा सुलूक करेगी तुम भाईबहनों के साथ.’
चाची मेरी भावानाओं को भड़का कर मेरे दिल में मीना आंटी के प्रति नफरत पैदा करना चाह रही थीं. चाची का व्यक्तित्व मीना आंटी के व्यक्तित्व से बिलकुल अलग है और उन दोनों की कभी पट नहीं सकती, यह बात चाची अपने व्यवहार व बातों से पहले ही कई बार जाहिर कर चुकी थीं. उन के भड़काने का मुझ पर खास प्रभाव नहीं होने वाला था. फिर भी मीना आंटी को ले कर उस वक्त मेरे मन में चिढ़, नाराजगी और नफरत के भाव पैदा हुए थे.
जब मेरी मां की मौत हुई तब मेरी उम्र 10 वर्ष से कुछ कम थी. उन के गुरदे खराब हो गए थे. सुमित और मुझे कच्ची उम्र में बेसहारा छोड़ कर दुनिया से जाने का सख्त अफसोस उन्हें आखिरी सांस तक रहा था.
‘मेरे बाद अपने पापा का, अपने छोटे भाई का ध्यान रखना मेरी गुडि़या…मेरी जगह तुझे संभालना होगा घर’, अपनी पलकें हमेशा के लिए मूंद लेने से पहले मां ने मुझे अपने सीने से लगा कर इस तरह की बात सैकड़ों बार कही होगी.
मां को मैं भूली नहीं थी. उन को याद करते हुए कभी भी मेरी आंखों में आंसू आ जाया करते थे. वे हमारे बीच नहीं थीं, पर घर के चप्पेचप्पे से उन की यादें जुड़ी हुई थीं. उन की जगह कोई दूसरी औरत लेने की कोशिश करे, यह बात मेरे लिए असहनीय होती, मां की जगह मीना आंटी को देखने की कल्पना जब मैं ने की, तो चिढ़ व गुस्से के कारण मेरा दिमाग भन्ना उठा और आंखों में भावुकतावश आंसू छलक आए.
उस रात मैं ने पापा से बात ही नहीं की और मुंह फुलाए रखा. आधाअधूरा खाना अनमने से अंदाज में खा कर मैं अपने कमरे में जा घुसी थी.
कुछ देर बाद पापा मेरे पास पलंग पर आ कर बैठ गए. पर मैं खामोश लेटी छत पर नजरें जमाए रही.
‘मेरी गुडि़या किसी बात से परेशान है क्या? किसी बात से नाराज है क्या?’
उन के बारबार ऐसा सवाल करने पर मैं एकाएक फट पड़ी थी, ‘पापा, क्या यह सच है कि आप मीना आंटी से शादी कर रहे हैं? उन्हें मां की जगह घर में ला रहे हैं?’
कुछ पल खामोशी से मेरा चेहरा निहारने के बाद उन्होंने गंभीर स्वर में जवाब दिया, ‘तुम्हारी मीना आंटी एक अच्छी और समझदार औरत है, कविता. वह सुमित और तुम्हें बहुत पसंद करती है. तुम दोनों को बहुत प्यार करती है. वह खुद भी अकेली है. एकदूसरे के सुखदुख के भागीदार बनने को हम सब मिल कर साथ रहें, इसीलिए मैं उस से शादी कर रहा हूं, बेटी.’
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‘ऐसा मत करो, पापा,’ मैं एकाएक रोने लगी थी, ‘मां की जगह किसी को घर में मत लाओ. कह दो कि आप मीना आंटी से शादी नहीं करोगे, मेरी खुशियों की खातिर…’
मेरे सिर पर स्नेहभरा हाथ रख कर उन्होंने कहा, ‘अभी तू आराम से सो जा, कविता. इस बारे में कल शांत मन से बात करेंगे हम दोनों.’
‘मुझे कुछ बात नहीं करनी है, पापा. अपनी प्यारी बेटी की बात मान कर शादी न करने का वादा आप को इसी वक्त करना होगा मुझ से,’ उन का हाथ अपने दोनों हाथों में पकड़ कर मैं ने जिदभरे अंदाज में कहा.
अपना हाथ धीरे से छुड़ा कर वे
उठ खड़े हुए तो मेरे दिल को गहरा सदमा लगा.
‘मीना आंटी ने तो अभी से…शादी होने से पहले ही आप को मुझ से दूर कर दिया है, पापा,’ मैं ने रोतेरोते कहा, ‘मुझे नफरत है उन से. चाहे कुछ भी हो जाए, मैं उन्हें मां की जगह कभी नहीं लेने दूंगी इस घर में, कभी नहीं लेने दूंगी.’
मैं करवट बदल कर तकिए में मुंह छिपा कर सुबकने लगी थी. मन के किसी कोने में यह उम्मीद बनी हुई थी कि पापा मेरी बात मान कर मुझे सीने से लगा लेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ.
वे कई मिनट खामोश खड़े रहे और फिर एक बार मेरे सिर पर हाथ फेरने के बाद कमरे की बत्ती बुझा कर चले गए थे.
मेरा रोनासुबकना देररात तक जारी रहा था. उस रात सुमित को पापा ने अपने पास सुला लिया था. वह होता तो मैं उस से बात कर के अपना मन हलका कर लेती. अकेली पलंग पर लेटी मैं मां को याद कर रही थी.
अगले दिन मेरी पापा से नहीं, बल्कि मीना आंटी से बात हुई. मैं स्कूल से बाहर आई तो उन्हें गेट के पास अपना इंतजार करते पाया.
‘चलो, कुछ देर सामने वाले पार्क में बैठेंगे, कविता,’ उन्होंने बिना हिचकिचाए बड़े अधिकार से मेरा हाथ थामा और पार्क की दिशा में चल पड़ीं.
मुझे उन का स्पर्श अच्छा नहीं लगा था, पर किसी तरह का विरोध प्रकट कर के मैं अपनी सहेलियों के मनोरंजन के लिए वहां तमाशा खड़ा नहीं करना चाहती थी. उन से कैसी भी बातचीत करने की इच्छा न होते हुए भी मैं चुपचाप उन के साथ चलती गई.
पार्क में हम दोनों एकांत में पड़ी बैंच पर बैठ गए. कुछ पल खामोश रह कर उन्होंने मुझ से सीधा सवाल किया, ‘तुम अपने पापा की और मेरी शादी के क्यों खिलाफ हो, कविता? क्या मैं बहुत बुरी हूं?’
मैं ने उत्तेजित स्वर में जवाब दिया, ‘आंटी, बात आप के अच्छे या बुरे होने की नहीं है. अपने घर में मैं मां
की जगह किसी दूसरी औरत को
देखना सहन नहीं कर सकती हूं. मेरी और सुमित की खुशियों की खातिर आप को पापा से शादी करने का इरादा त्यागना पड़ेगा.’
‘और मेरी खुशियों का क्या होगा कविता?’
‘क्या मतलब?’ उन की बात मेरी समझ में नहीं आई.
‘मैं तुम्हारे पापा से प्रेम करती हूं, कविता. उन का साथ व सहारा चाहती हूं अपनी बाकी बची जिंदगी के लिए. और ऐसी ही भावनाएं तुम्हारे पापा भी मेरे प्रति अपने दिल में रखते हैं. क्या हमारी इन भावनाओं का तुम्हारी नजरों में कोई महत्त्व नहीं है?’
‘मैं आप से कैसी भी बहस में नहीं उलझना चाहती, आंटी. कैसी भी दलीलों के आधार पर आप मेरी सोच बदलवाने में कामयाब नहीं हो पाएंगी. आप को मेरी मां का स्थान कभी नहीं मिलेगा मेरी नजरों में.’
‘वह स्थान तो बहुत पवित्र, बहुत महत्त्वपूर्ण है, कविता, और उसे पाने की इच्छा भी नहीं रखती हूं मैं.’
‘तब क्यों शादी कर रही हैं आप पापा से?’ मैं ने उलझनभरे स्वर में पूछा.
‘मैं तुम्हारे पापा की दूसरी पत्नी तो बनना चाहती हूं पर तुम्हारी मां की जगह नहीं लेना चाहती, कविता. मैं वह स्थान ले ही नहीं सकती. अपने पिता की दूसरी पत्नी, जो तुम्हारी भलाई चाहती है, तुम्हें प्यार करती है, के रूप में तुम्हें मुझे स्वीकार करना ही होगा, कविता, क्योंकि तुम्हारे पिता की जीवनसंगिनी बनने का इरादा मैं नहीं छोड़ सकती हूं,’ उन्होंने ऐसे गंभीर व दृढ़ स्वर में अपनी बात कही कि मैं तर्कवितर्क करने का इरादा त्याग चिढ़ी सी उठ कर खड़ी हो गई.
‘अगर मेरी चली तो पापा आप से कभी शादी करेंगे ही नहीं,’ मैं ने रूखे स्वर में कहा, ‘और अगर यह शादी हुई तो आप को मैं पापा की दूसरी पत्नी मान कर ही सहन कर सकूंगी. लाड़प्यार जता कर कभी मेरी मां बनने की कोशिश मत करना आप. और अब मैं घर जा रही हूं. अकेली,’ अपनी बात समाप्त कर मैं झटके से उठी और बस्ता उठा पार्क के गेट की तरफ बढ़ गई थी.
पापा ने मीना आंटी से शादी करने का अपना फैसला नहीं बदला. मुझे घर के बड़ों ने भी समझाया कि मैं अपने पापा की इच्छा को ध्यान में रखते हुए शादी की राह में रुकावटें न खड़ी करूं.
मैं तब अपने में सिमटती चली गई थी. पापा से अपने दुखसुख की बात कहनी बंद कर दी मैं ने. अकेले में आंसू बहाती. सुमित छोटा था और मीना आंटी का फैन भी था, सो उस से इस शादी के खिलाफ बात कर के मन हलका नहीं कर सकती थी. मैं अंदर ही अंदर घुटती और दुखी होती रही और उन की शादी का दिन आ पहुंचा.
पापा ने मीना आंटी से अदालत में जा कर शादी की थी. शाम को हमारे घर में गिनेचुने मेहमानों व दोनों तरफ के रिश्तेदारों की छोटी सी पार्टी हुई.
पापा की दूसरी पत्नी का स्वागत करने के लिए कोई एक क्षण को भी मुझे पार्टी में शामिल होने को मजबूर नहीं कर सका था.
पापा रात को मुझ से मिलने आए तो मैं नींद में होने का बहाना कर के पलंग पर खामोश पड़ी रही थी.
पापा और मीना आंटी सप्ताहभर के लिए शिमला घूमने गए थे. वहां से लौट कर मीना आंटी ने सब घरेलू कामों का बोझ संभाल लिया था.
पापा के कहने पर सुमित उन्हें मम्मी कह कर पुकारने लगा था लेकिन मेरे लिए ऐसा कहने की कल्पना तक करना अरुचिकर था. पापा की दूसरी पत्नी के अलावा अपने दिल में मैं उन की कोई और पहचान नहीं बनने दे सकती थी. उन से बात करते हुए मैं उन्हें संबोधित करने को कुछ नहीं बुलाती थी.
उन से बहुत कम और केवल काम की बात करती थी मैं. इस के ठीक विपरीत वे सामान्य नजर आतीं. हर वक्त कविता, कविता करती रहतीं. मैं उन के कहे किसी कार्य को अनसुना कर देती तो भी वे खामोशी से स्वयं उसे कर लेतीं.
सुमित और पापा का मन वे जरूर जीत गईं पर मुझे उन की कार्यकुशलता व आत्मीयताभरे व्यवहार से चिढ़ थी.
‘मेरे पीछे न पड़ी रहा करो आप, मेरी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है आप को,’ एक दिन मैं ने कठोर स्वर में अपनी नाराजगी जताते हुए उन से कहा.
‘कविता, मैं अपने कर्तव्यों को भली प्रकार समझती हूं. जब तुम अपने भलेबुरे का ज्ञान करने में पूरी तरह सक्षम हो जाओगी, तब मैं तुम्हें कैसा भी निर्देश देना बंद कर दूंगी,’ उन का ऐसा जवाब सुन कर मैं आगे कुछ नहीं बोल पाती थी.
मैं पापा या सुमित से बातें करती हूं और मीना आंटी अगर बीच में बोल पड़तीं, तो मैं या तो खामोश हो जाती या उठ कर दूसरी जगह चली जाती.
मेरे ऐसे रूखे व्यवहार से सुमित अकसर परेशान हो उठता. पापा की आंखें भी उदासी से भरी नजर आने लगतीं, लेकिन मीना आंटी पर मेरी नाराजगी और चिढ़ का कोई प्रभाव नहीं होता और वे पहले की तरह बातचीत करती जातीं. उन का इस तरह सामान्य बने रहना मुझे कई बार मन ही मन खिझा जाता था.
मेरा बस चलता तो मैं किसी होस्टल में रह कर पढ़ने लगती, लेकिन ऐसा होना संभव नहीं था. और अगर 2 व्यक्ति घर में साथ रह रहे हों तो आपस में बात किए बगैर काम भी नहीं चल सकता. पापा की दूसरी शादी के 6 महीने बाद मैं मीना आंटी से आमनेसामने बैठ कर थोड़ीबहुत बातें करने लगी थी. कभी खुल कर अपने मन की बात नहीं कही मैं ने उन से, पर उन की घर में उपस्थिति मात्र से मुझे शिकायत होनी बंद हो गई थी.
बारिश के मौसम में मुझे बुखार हो गया. तेज बुखार में बदन बुरी तरह से टूट रहा था. भूख लगनी बंद हो गई और कमजोरी के कारण बैठते ही चक्कर आते थे.
तब मीना आंटी ने दफ्तर से सप्ताहभर की छुट्टी ले कर मेरी देखभाल की थी. मुझे प्यार से या डांटफटकार कर जबरदस्ती कुछ न कुछ खिलाती रहीं. बुखार उतारने के लिए डाक्टर की हिदायत के अनुसार घंटाघंटाभर लगातार माथे पर गीली पट्टी रखती थीं. मेरे पास बैठ कर अखबार की खबरें मुझे सुनातीं, मेरे मनपसंद टीवी धारावाहिकों में जो घटा, वह मुझे बतातीं और मैं चाह कर भी उन्हें मना नहीं कर पाती.
बुखार की गरमी ने मेरे मन में कुछ पिघला दिया था. ठीक होने के बाद मैं ने पाया कि मैं उन से ज्यादा खुल कर बातें करने लगी हूं. पापा और सुमित मुझ में आए बदलाव के कारण बहुत खुश रहने लगे थे. मीना आंटी (अब ‘आंटी’ शब्द मुझे बेचैन करने लगा था) पहले की तरह सामान्य व्यवहार करती रहीं, मानो मैं हमेशा से ही उन से ठीक तरह से बातें करती थी.
उन दिनों मैं उलझन, बेचैनी और तनाव का जबरदस्त शिकार बनी रहती थी. शायद इसीलिए चिड़चिड़ी भी बहुत हो गई थी. ऐसे में मेरी पढ़ाई पर बुरा असर पड़ना ही था.
10वीं की बोर्ड की परीक्षाओं में मैं मात्र 68 प्रतिशत नंबर ही ला पाई. सभी रिश्तेदार और परिचित मेरी डाक्टर बनने की इच्छा से वाकिफ थे. मेरा परिणाम सुन कर हर व्यक्ति यही राय जाहिर करता कि अब मेरा डाक्टर बनना असंभव था.
उन लोगों की ऐसी बातें सुन कर मेरा आत्मविश्वास पूरी तरह से डगमगा गया. मैं मां की इच्छा पूरी नहीं कर सकूंगी, इस बात का मुझे गहरा सदमा लगा. हीनभावना और उदासी की शिकार हो कर मैं अपने कमरे में बंद रहने लगी. कुछ दिन मीना आंटी मुझे यों उदास और गुमसुम पड़ा खामोशी से देखती रहीं, फिर एक दिन सुबह 5 बजे उन्होंने मुझे जगा दिया.
‘आज से, इसी क्षण से सुस्ती और उदासी को तुम सदा के लिए छोड़ रही हो, कविता. अब कमर कस के तैयार हो जाओ,’ उन की आवाज में भरपूर जोश समाया था.
‘किसलिए तैयार हो जाऊं?’ मैं ने उलझनभरे स्वर में पूछा.
‘अपनी मां का सपना पूरा करने के लिए, डाक्टर बनने के लिए.’
‘अब वह सपना अधूरा…’
‘बिलकुल नहीं रहेगा,’ उन्होंने मेरे मुंह पर हाथ रख कर आत्मविश्वासभरे स्वर में कहा, ‘मेहनत और लगन हो तो इंसान के लिए कुछ भी करना असंभव नहीं है. हर कदम पर मैं तुम्हारे साथ हूं. तुम डाक्टर जरूर बनोगी.’
मीना आंटी को उस क्षण से पहले मैं ने कभी भावुक अवस्था में नहीं देखा था. गंभीर रह कर अपना काम करते रहना उन के व्यक्तित्व की पहचान बन गया था. इस क्षण भावावेश से कांप रही उन की आवाज सुन कर मैं मन ही मन कुछ ऐसी हैरान हुई कि उन्होंने जो कहा, वह मैं करती चली गई.
आगामी कुछ दिनों में मेरी पूरी दिनचर्या ही बदलवा दी थी उन्होंने. सुबह 5 बजे उठ कर मैं 20 मिनट व्यायाम करती, तो मीना आंटी मेरा साथ देतीं. फिर एक घंटा कोई मुश्किल सबक याद करती, क्योंकि उन के अनुसार सुबह याददाश्त अच्छी तरह कार्य करती है.
स्कूल जाने से पहले वे रोज मेरे साथ मेरी मां की तसवीर के सामने आ खड़ी होतीं. मैं हाथ जोड़ कर खड़ी होती और वे कहतीं, ‘दीदी, अपनी बेटी को इतनी शक्ति दो कि यह मेहनत और लगन से पढ़ते हुए आप का सपना
पूरा कर दिखाए. इस का हौसला
कभी न टूटे. इस का आत्मविश्वास कभी न डगमगाए.’
स्कूल से लौट कर आने के बाद मेरे पढ़ने का समय उन्होंने तय कर दिया था. हमारे यहां टीवी का चलना एकदम कम हो गया. वे खुद बीएससी तक पढ़ी थीं और मुझ से याद किया गया पाठ अकसर सुन लेती थीं.
मैं जब तक जागती, उन्हें अपने इर्दगिर्द घूमते पाती. मेरी हर जरूरत को वे समझती थीं और मेरे कुछ कहने से पहले ही उसे पूरा कर देती थीं. उन के हावभाव से यह जाहिर होता कि उन्हें मेरे कैरियर की बहुत परवा थी.
11वीं की परीक्षाओं में मैं ने 84 प्रतिशत अंक प्राप्त किए और इस कारण मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा.
12वीं के पूरे साल मैं ने विज्ञान और गणित की ट्यूशन लगाई. इस के लिए पापा को मीना आंटी ने ही तैयार किया था. 7 हजार रुपए हर महीने का ट्यूशनों का खर्चा उठाना कोई आसान काम नहीं था, पर मीना आंटी के कारण मैं ट्यूशनों का लाभ उठा सकी.
मीना आंटी ने मेरा मनोबल ऊंचा बनाए रखने में जबरदस्त योगदान दिया था. मुझे अपना डाक्टर बनने का लक्ष्य एक दिन भी भूलने नहीं दिया. आलस्य व उदासीनता का शिकार न कभी खुद बनीं, न मुझे बनने दिया.
मेरी जिंदगी में उन का स्थान महत्त्वपूर्ण होता चला गया था. दिनोंदिन वे जो सब मेरे हित के लिए कर रही थीं, उस के कारण मैं उन का बहुत आदरसम्मान करने लगी थी. जब उन से मेरा व्यवहार बहुत खराब हुआ करता था उस वक्त को अपनी याददाश्त से बाहर निकाल फेंकना चाहती थी मैं.
हम दोनों की मेहनत आखिरकार रंग लाई और 12वीं की परीक्षा में मैंने 88 प्रतिशत अंक प्राप्त किए तथा सीबीएससी की परीक्षा में मैरिट लिस्ट में आई और मैं ने कानपुर मैडिकल कालेज में प्रवेश प्राप्त करने में सफलता भी पा ली थी.
जिस दिन मैडिकल कालेज में प्रवेश मिलने वाली खबर मुझे मिली, वह दिन मेरी जिंदगी का सब से खुशी वाला दिन था. मुझे यह खबर सुनाने मेरी स्कूल की सहेली वंदना अपने मातापिता के साथ आई थी. उस को भी कानपुर मैडिकल कालेज में दाखिला मिला था.
वंदना और मैं खुशी के मारे फूली नहीं समा रही थीं. हमारी ऊंची, उत्तेजित आवाजें सुन कर पापा, सुमित और मीना आंटी लगभग भागते से बैठक में आए.
‘पापा, मुझे कानपुर मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल गया है,’ कह कर मैं उन की छाती से जा लगी.
पहले मैं ने पापा का परिचय वंदना के मम्मीपापा से कराया और फिर आरती आंटी का हाथ अपने हाथों में ले कर भावुक स्वर में बोली, ‘अंकलआंटी, मेरी सफलता का श्रेय सब से पहले और सब से ज्यादा इन्हें जाता है. आप मिलिए मेरी मम्मी से.’
पापा मेरी बात सुन कर पहले चौंके, और फिर उन की आंखों में उसी पल खुशी के आंसू झलक उठे.
सुमित पहले मुंहबाए मेरा मुंह देखता रहा और फिर अजीब सी उत्तेजना का शिकार हो तालियां बजाता नाचने लगा.
मेरी अपनी पलकें भीग गई थीं. मैं कुछ और भी कहती पर मेरा गला रुंध गया, अपनी मीना आंटी…नहीं, अपनी मम्मी के सीने से लग कर एकाएक सुबकने लगी थी.
‘बहुत भावुक है मेरी बेटी,’ मेरे सिर पर स्नेहभरा हाथ फिरातीं मेरी मम्मी ने कहा, ‘यह इस की कमजोरी भी है. और इस की ताकत भी. आप बैठिए. इस खुशी के मौके पर मैं सब का मुंह मीठा कराती हूं.’
वे मेरा हाथ थाम कर मुझे बैठक से बाहर ले आईं और हम दोनों मेरी मां की तसवीर के सामने जा खड़ी हुईं.
इस बार अपनी मम्मी के कुछ बोलने से पहले ही मैं मां की तसवीर से बोल पड़ी, ‘मां, देखो मम्मी के सहयोग से मुझे मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया है. मम्मी के मार्गदर्शन, इन के मन की दया व ममता और निस्वार्थ प्रेम करने की क्षमता मेरी जिंदगी में यह खुशी का दिन लाई है. आप दोनों के लिए मेरे दिल में प्यार और सम्मान एकसाथ मौजूद रह सकता है. इस तथ्य को जब से मैं ने समझा है, मेरे दिल की सारी उलझनें दूर हो गई हैं. आप के दुनिया से असमय चले जाने के कारण हमारे दिलों में हुए जख्मों ने मम्मी के प्यार के मलहम के कारण टीसना बंद कर दिया है, मां.’
उस दिन पापा की दूसरी पत्नी को मैं ने अपनी पहली मां के समकक्ष ला कर मम्मी मान लिया था.
मम्मी ने भावविभोर हो मुझे अपने गले से लगा लिया. हम दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे. निसंदेह ये आंसू हमारे मन के सुख, संतोष और खुशियों को दिखा रहे थे.
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The post दूसरी पत्नी appeared first on Sarita Magazine.
from कहानी – Sarita Magazine http://bit.ly/2ZLq2ug
हमारी पहली मुलाकात मेरी 14वीं सालगिरह के समारोह में हमारे घर में हुई थी. मेरे मनपसंद गुलाबी रंग में वे एक खूबसूरत ड्रैस मेरे लिए उपहार में लाई थीं. मीना आंटी को धन्यवाद देते हुए मैं ने प्रसन्नता व्यक्त की और कहा, ‘‘बड़े दिनों से ऐसी ड्रैस पहनने की इच्छा थी मेरी. आप को किस ने बताया कि गुलाबी रंग मेरा पसंदीदा रंग है?’’
‘‘तुम्हारे पापा ने. तुम्हें उपहार पसंद आया, इस बात की मुझे खुशी है, कविता,’’ एक बार मेरा गाल प्यार से थपथपा कर वे दूसरे मेहमानों से बातें करने लगी थीं.
मैं ने ही नहीं, मुझ से 3 साल छोटे मेरे भाई सुमित ने भी उस पहली मुलाकात में मीना आंटी को पसंद कर लिया था. वे सुमित के लिए स्केट्स का जोड़ा ले कर आई थीं. अब वह घरबाहर दिनरात स्केटिंग करते हुए मीना आंटी के गुण गाता रहता.
मीना आंटी पापा के औफिस में काम करती थीं. उन की उम्र हमारी पहली मुलाकात के वक्त करीब 35 वर्ष की रही होगी. उन का रंग गेहुआं और नैननक्श साधारण थे. आंखों में एक चमक हर वक्त मौजूद रहती थी.
उन के साधारण रंगरूप को अत्यधिक प्रभावशाली उन का धीरगंभीर व्यक्तित्व बनाता था. साधारण औरतों की तरह मैं ने उन्हें ज्यादा बोलते कभी नहीं देखा. वे कम बोलती थीं और काम की बातें करती थीं. उन के हावभाव और बोलचाल में भरपूर आत्मविश्वास झलकता था. हलके रंगों की सूती साडि़यां उन के सुगठित शरीर पर बहुत जमती थीं. खूबसूरत न होते हुए भी मीना आंटी के प्रभावशाली व्यक्तित्व से सामने वाला बहुत प्रभावित होता था.
जन्मदिन समारोह में कुछ देर हमारी अकेले में बातें हुई थीं.
‘अभी तुम 8वीं कक्षा में पढ़ रही हो न कविता?’ अपनी बगल वाली कुरसी पर बैठा कर उन्होंने मुझ से परिचय बढ़ाने की खातिर पूछा था.
‘जी आंटी,’ मैं ने मुसकराते हुए जवाब दिया.
‘बड़ी हो कर क्या बनना चाहती हो?’
‘मैं डाक्टर बनूंगी, आंटी,’ मैं ने जोशीले अंदाज में जवाब दिया.
‘क्यों बनना चाहती हो डाक्टर तुम?’ उन्होंने दिलचस्पी दिखाई.
‘मेरी मां चाहती थीं कि मैं डाक्टर बनूं. आंटी, उन के इस सपने को मैं जरूर पूरा करूंगी.’
‘यह तो बड़ी अच्छी बात होगी, कविता. खूब दिल लगा कर पढ़ रही
हो न?’
‘जी, हां आंटी.’
‘7वीं में कितने नंबर आए थे तुम्हारे?’
‘72 प्रतिशत,’ मैं ने सकुचाते स्वर में बताया.
‘इतने नंबर लाने से तो बात नहीं बनेगी, कविता,’ उन का स्वर गंभीर हो उठा, ‘मैडिकल में प्रवेश पाने के लिए बड़ा तगड़ा कंपीटिशन है आजकल. सिर्फ सोच भर लेने से जिंदगी के मकसद पूरे नहीं होते. और दिल लगा कर पढ़ाई में मेहनत नहीं करोगी तो डाक्टर नहीं बन सकोगी.’
साफसच्ची बात मुंह पर कह देने का उन का रूखा सा अंदाज मुझे पलभर को अखरा था. फिर मैं ने उन से मिले खूबसूरत उपहार के बारे में सोचा और मन की नाराजगी को भुला कर, ‘मैं और ज्यादा मेहनत करूंगी, आंटी,’ ऐसा वादा कर के मैं अपनी सहेलियों के पास चली गई थी.
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जन्मदिन समारोह के बाद से लगभग हर शनिवारइतवार मीना आंटी हमारे यहां कभी पापा के साथ तो कभी अकेली आ जाती थीं. सुमित और मेरा वक्त उन के साथ अच्छा गुजरता था. बातों से ज्यादा वे कुछ न कुछ करते रहने में दिलचस्पी रखती थीं.
मेरे साथ वे बैडमिंटन खेलतीं तो सुमित उन्हें शतरंज की बाजी में उलझा कर खूब खुश होता. क्रिकेट पर उन दोनों के बीच गरमागरम बहस अकसर हो जाती. गणित और विज्ञान में ही नहीं, चित्रकला व कढ़ाईबुनाई में भी मेरी सहायता करने की उन में काबिलीयत थी.
2 महीने की जानपहचान के बाद हमारे आपसी संबंध बड़े अच्छे हो गए थे. भरपूर प्यार और सम्मान था उन के प्रति मेरे दिल में. फिर एक शाम मेरी सीमा चाची ने जो कुछ मुझ से कहा, उस ने मेरे दिलोदिमाग में जबरदस्त हलचल मचा दी थी.
चाची ने मुझे पास बैठा कर पूछा, ‘कविता, तू अपनी इस मीना आंटी
की चालाकी को समझ भी पा रही है
या नहीं?’
‘वे क्या चालाकी कर रही हैं, चाची?’ मैं ने फौरन माथे पर बल डाले.
‘तुम बच्चों से दोस्ती बढ़ा कर वह तुम्हारी मां की जगह आना चाहती है इस घर में.’
‘ऐसी कोई बात नहीं है, चाची.’ मैं ने चाची से ऐसा कहा जरूर, पर भीतर ही भीतर मैं बेचैन हो उठी थी.
‘यही सच है, कविता. तुम्हारी ताईजी का आज दोपहर में मुझे फोन आया था. कल तुम्हारे पापा अपने बड़े भाई से मिलने गए थे. वे तुम्हारी इस चालाक मीना आंटी से शादी करना चाहते हैं. मुझे तो यह तलाकशुदा औरत कभी अच्छी नहीं लगी. जब सौतेली मां बन कर घर में आ जाएगी तब दिखाएगी अपना असली रंग. तुम्हारे पिताजी को तुम से दूर कर के देखना कैसा सुलूक करेगी तुम भाईबहनों के साथ.’
चाची मेरी भावानाओं को भड़का कर मेरे दिल में मीना आंटी के प्रति नफरत पैदा करना चाह रही थीं. चाची का व्यक्तित्व मीना आंटी के व्यक्तित्व से बिलकुल अलग है और उन दोनों की कभी पट नहीं सकती, यह बात चाची अपने व्यवहार व बातों से पहले ही कई बार जाहिर कर चुकी थीं. उन के भड़काने का मुझ पर खास प्रभाव नहीं होने वाला था. फिर भी मीना आंटी को ले कर उस वक्त मेरे मन में चिढ़, नाराजगी और नफरत के भाव पैदा हुए थे.
जब मेरी मां की मौत हुई तब मेरी उम्र 10 वर्ष से कुछ कम थी. उन के गुरदे खराब हो गए थे. सुमित और मुझे कच्ची उम्र में बेसहारा छोड़ कर दुनिया से जाने का सख्त अफसोस उन्हें आखिरी सांस तक रहा था.
‘मेरे बाद अपने पापा का, अपने छोटे भाई का ध्यान रखना मेरी गुडि़या…मेरी जगह तुझे संभालना होगा घर’, अपनी पलकें हमेशा के लिए मूंद लेने से पहले मां ने मुझे अपने सीने से लगा कर इस तरह की बात सैकड़ों बार कही होगी.
मां को मैं भूली नहीं थी. उन को याद करते हुए कभी भी मेरी आंखों में आंसू आ जाया करते थे. वे हमारे बीच नहीं थीं, पर घर के चप्पेचप्पे से उन की यादें जुड़ी हुई थीं. उन की जगह कोई दूसरी औरत लेने की कोशिश करे, यह बात मेरे लिए असहनीय होती, मां की जगह मीना आंटी को देखने की कल्पना जब मैं ने की, तो चिढ़ व गुस्से के कारण मेरा दिमाग भन्ना उठा और आंखों में भावुकतावश आंसू छलक आए.
उस रात मैं ने पापा से बात ही नहीं की और मुंह फुलाए रखा. आधाअधूरा खाना अनमने से अंदाज में खा कर मैं अपने कमरे में जा घुसी थी.
कुछ देर बाद पापा मेरे पास पलंग पर आ कर बैठ गए. पर मैं खामोश लेटी छत पर नजरें जमाए रही.
‘मेरी गुडि़या किसी बात से परेशान है क्या? किसी बात से नाराज है क्या?’
उन के बारबार ऐसा सवाल करने पर मैं एकाएक फट पड़ी थी, ‘पापा, क्या यह सच है कि आप मीना आंटी से शादी कर रहे हैं? उन्हें मां की जगह घर में ला रहे हैं?’
कुछ पल खामोशी से मेरा चेहरा निहारने के बाद उन्होंने गंभीर स्वर में जवाब दिया, ‘तुम्हारी मीना आंटी एक अच्छी और समझदार औरत है, कविता. वह सुमित और तुम्हें बहुत पसंद करती है. तुम दोनों को बहुत प्यार करती है. वह खुद भी अकेली है. एकदूसरे के सुखदुख के भागीदार बनने को हम सब मिल कर साथ रहें, इसीलिए मैं उस से शादी कर रहा हूं, बेटी.’
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‘ऐसा मत करो, पापा,’ मैं एकाएक रोने लगी थी, ‘मां की जगह किसी को घर में मत लाओ. कह दो कि आप मीना आंटी से शादी नहीं करोगे, मेरी खुशियों की खातिर…’
मेरे सिर पर स्नेहभरा हाथ रख कर उन्होंने कहा, ‘अभी तू आराम से सो जा, कविता. इस बारे में कल शांत मन से बात करेंगे हम दोनों.’
‘मुझे कुछ बात नहीं करनी है, पापा. अपनी प्यारी बेटी की बात मान कर शादी न करने का वादा आप को इसी वक्त करना होगा मुझ से,’ उन का हाथ अपने दोनों हाथों में पकड़ कर मैं ने जिदभरे अंदाज में कहा.
अपना हाथ धीरे से छुड़ा कर वे
उठ खड़े हुए तो मेरे दिल को गहरा सदमा लगा.
‘मीना आंटी ने तो अभी से…शादी होने से पहले ही आप को मुझ से दूर कर दिया है, पापा,’ मैं ने रोतेरोते कहा, ‘मुझे नफरत है उन से. चाहे कुछ भी हो जाए, मैं उन्हें मां की जगह कभी नहीं लेने दूंगी इस घर में, कभी नहीं लेने दूंगी.’
मैं करवट बदल कर तकिए में मुंह छिपा कर सुबकने लगी थी. मन के किसी कोने में यह उम्मीद बनी हुई थी कि पापा मेरी बात मान कर मुझे सीने से लगा लेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ.
वे कई मिनट खामोश खड़े रहे और फिर एक बार मेरे सिर पर हाथ फेरने के बाद कमरे की बत्ती बुझा कर चले गए थे.
मेरा रोनासुबकना देररात तक जारी रहा था. उस रात सुमित को पापा ने अपने पास सुला लिया था. वह होता तो मैं उस से बात कर के अपना मन हलका कर लेती. अकेली पलंग पर लेटी मैं मां को याद कर रही थी.
अगले दिन मेरी पापा से नहीं, बल्कि मीना आंटी से बात हुई. मैं स्कूल से बाहर आई तो उन्हें गेट के पास अपना इंतजार करते पाया.
‘चलो, कुछ देर सामने वाले पार्क में बैठेंगे, कविता,’ उन्होंने बिना हिचकिचाए बड़े अधिकार से मेरा हाथ थामा और पार्क की दिशा में चल पड़ीं.
मुझे उन का स्पर्श अच्छा नहीं लगा था, पर किसी तरह का विरोध प्रकट कर के मैं अपनी सहेलियों के मनोरंजन के लिए वहां तमाशा खड़ा नहीं करना चाहती थी. उन से कैसी भी बातचीत करने की इच्छा न होते हुए भी मैं चुपचाप उन के साथ चलती गई.
पार्क में हम दोनों एकांत में पड़ी बैंच पर बैठ गए. कुछ पल खामोश रह कर उन्होंने मुझ से सीधा सवाल किया, ‘तुम अपने पापा की और मेरी शादी के क्यों खिलाफ हो, कविता? क्या मैं बहुत बुरी हूं?’
मैं ने उत्तेजित स्वर में जवाब दिया, ‘आंटी, बात आप के अच्छे या बुरे होने की नहीं है. अपने घर में मैं मां
की जगह किसी दूसरी औरत को
देखना सहन नहीं कर सकती हूं. मेरी और सुमित की खुशियों की खातिर आप को पापा से शादी करने का इरादा त्यागना पड़ेगा.’
‘और मेरी खुशियों का क्या होगा कविता?’
‘क्या मतलब?’ उन की बात मेरी समझ में नहीं आई.
‘मैं तुम्हारे पापा से प्रेम करती हूं, कविता. उन का साथ व सहारा चाहती हूं अपनी बाकी बची जिंदगी के लिए. और ऐसी ही भावनाएं तुम्हारे पापा भी मेरे प्रति अपने दिल में रखते हैं. क्या हमारी इन भावनाओं का तुम्हारी नजरों में कोई महत्त्व नहीं है?’
‘मैं आप से कैसी भी बहस में नहीं उलझना चाहती, आंटी. कैसी भी दलीलों के आधार पर आप मेरी सोच बदलवाने में कामयाब नहीं हो पाएंगी. आप को मेरी मां का स्थान कभी नहीं मिलेगा मेरी नजरों में.’
‘वह स्थान तो बहुत पवित्र, बहुत महत्त्वपूर्ण है, कविता, और उसे पाने की इच्छा भी नहीं रखती हूं मैं.’
‘तब क्यों शादी कर रही हैं आप पापा से?’ मैं ने उलझनभरे स्वर में पूछा.
‘मैं तुम्हारे पापा की दूसरी पत्नी तो बनना चाहती हूं पर तुम्हारी मां की जगह नहीं लेना चाहती, कविता. मैं वह स्थान ले ही नहीं सकती. अपने पिता की दूसरी पत्नी, जो तुम्हारी भलाई चाहती है, तुम्हें प्यार करती है, के रूप में तुम्हें मुझे स्वीकार करना ही होगा, कविता, क्योंकि तुम्हारे पिता की जीवनसंगिनी बनने का इरादा मैं नहीं छोड़ सकती हूं,’ उन्होंने ऐसे गंभीर व दृढ़ स्वर में अपनी बात कही कि मैं तर्कवितर्क करने का इरादा त्याग चिढ़ी सी उठ कर खड़ी हो गई.
‘अगर मेरी चली तो पापा आप से कभी शादी करेंगे ही नहीं,’ मैं ने रूखे स्वर में कहा, ‘और अगर यह शादी हुई तो आप को मैं पापा की दूसरी पत्नी मान कर ही सहन कर सकूंगी. लाड़प्यार जता कर कभी मेरी मां बनने की कोशिश मत करना आप. और अब मैं घर जा रही हूं. अकेली,’ अपनी बात समाप्त कर मैं झटके से उठी और बस्ता उठा पार्क के गेट की तरफ बढ़ गई थी.
पापा ने मीना आंटी से शादी करने का अपना फैसला नहीं बदला. मुझे घर के बड़ों ने भी समझाया कि मैं अपने पापा की इच्छा को ध्यान में रखते हुए शादी की राह में रुकावटें न खड़ी करूं.
मैं तब अपने में सिमटती चली गई थी. पापा से अपने दुखसुख की बात कहनी बंद कर दी मैं ने. अकेले में आंसू बहाती. सुमित छोटा था और मीना आंटी का फैन भी था, सो उस से इस शादी के खिलाफ बात कर के मन हलका नहीं कर सकती थी. मैं अंदर ही अंदर घुटती और दुखी होती रही और उन की शादी का दिन आ पहुंचा.
पापा ने मीना आंटी से अदालत में जा कर शादी की थी. शाम को हमारे घर में गिनेचुने मेहमानों व दोनों तरफ के रिश्तेदारों की छोटी सी पार्टी हुई.
पापा की दूसरी पत्नी का स्वागत करने के लिए कोई एक क्षण को भी मुझे पार्टी में शामिल होने को मजबूर नहीं कर सका था.
पापा रात को मुझ से मिलने आए तो मैं नींद में होने का बहाना कर के पलंग पर खामोश पड़ी रही थी.
पापा और मीना आंटी सप्ताहभर के लिए शिमला घूमने गए थे. वहां से लौट कर मीना आंटी ने सब घरेलू कामों का बोझ संभाल लिया था.
पापा के कहने पर सुमित उन्हें मम्मी कह कर पुकारने लगा था लेकिन मेरे लिए ऐसा कहने की कल्पना तक करना अरुचिकर था. पापा की दूसरी पत्नी के अलावा अपने दिल में मैं उन की कोई और पहचान नहीं बनने दे सकती थी. उन से बात करते हुए मैं उन्हें संबोधित करने को कुछ नहीं बुलाती थी.
उन से बहुत कम और केवल काम की बात करती थी मैं. इस के ठीक विपरीत वे सामान्य नजर आतीं. हर वक्त कविता, कविता करती रहतीं. मैं उन के कहे किसी कार्य को अनसुना कर देती तो भी वे खामोशी से स्वयं उसे कर लेतीं.
सुमित और पापा का मन वे जरूर जीत गईं पर मुझे उन की कार्यकुशलता व आत्मीयताभरे व्यवहार से चिढ़ थी.
‘मेरे पीछे न पड़ी रहा करो आप, मेरी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है आप को,’ एक दिन मैं ने कठोर स्वर में अपनी नाराजगी जताते हुए उन से कहा.
‘कविता, मैं अपने कर्तव्यों को भली प्रकार समझती हूं. जब तुम अपने भलेबुरे का ज्ञान करने में पूरी तरह सक्षम हो जाओगी, तब मैं तुम्हें कैसा भी निर्देश देना बंद कर दूंगी,’ उन का ऐसा जवाब सुन कर मैं आगे कुछ नहीं बोल पाती थी.
मैं पापा या सुमित से बातें करती हूं और मीना आंटी अगर बीच में बोल पड़तीं, तो मैं या तो खामोश हो जाती या उठ कर दूसरी जगह चली जाती.
मेरे ऐसे रूखे व्यवहार से सुमित अकसर परेशान हो उठता. पापा की आंखें भी उदासी से भरी नजर आने लगतीं, लेकिन मीना आंटी पर मेरी नाराजगी और चिढ़ का कोई प्रभाव नहीं होता और वे पहले की तरह बातचीत करती जातीं. उन का इस तरह सामान्य बने रहना मुझे कई बार मन ही मन खिझा जाता था.
मेरा बस चलता तो मैं किसी होस्टल में रह कर पढ़ने लगती, लेकिन ऐसा होना संभव नहीं था. और अगर 2 व्यक्ति घर में साथ रह रहे हों तो आपस में बात किए बगैर काम भी नहीं चल सकता. पापा की दूसरी शादी के 6 महीने बाद मैं मीना आंटी से आमनेसामने बैठ कर थोड़ीबहुत बातें करने लगी थी. कभी खुल कर अपने मन की बात नहीं कही मैं ने उन से, पर उन की घर में उपस्थिति मात्र से मुझे शिकायत होनी बंद हो गई थी.
बारिश के मौसम में मुझे बुखार हो गया. तेज बुखार में बदन बुरी तरह से टूट रहा था. भूख लगनी बंद हो गई और कमजोरी के कारण बैठते ही चक्कर आते थे.
तब मीना आंटी ने दफ्तर से सप्ताहभर की छुट्टी ले कर मेरी देखभाल की थी. मुझे प्यार से या डांटफटकार कर जबरदस्ती कुछ न कुछ खिलाती रहीं. बुखार उतारने के लिए डाक्टर की हिदायत के अनुसार घंटाघंटाभर लगातार माथे पर गीली पट्टी रखती थीं. मेरे पास बैठ कर अखबार की खबरें मुझे सुनातीं, मेरे मनपसंद टीवी धारावाहिकों में जो घटा, वह मुझे बतातीं और मैं चाह कर भी उन्हें मना नहीं कर पाती.
बुखार की गरमी ने मेरे मन में कुछ पिघला दिया था. ठीक होने के बाद मैं ने पाया कि मैं उन से ज्यादा खुल कर बातें करने लगी हूं. पापा और सुमित मुझ में आए बदलाव के कारण बहुत खुश रहने लगे थे. मीना आंटी (अब ‘आंटी’ शब्द मुझे बेचैन करने लगा था) पहले की तरह सामान्य व्यवहार करती रहीं, मानो मैं हमेशा से ही उन से ठीक तरह से बातें करती थी.
उन दिनों मैं उलझन, बेचैनी और तनाव का जबरदस्त शिकार बनी रहती थी. शायद इसीलिए चिड़चिड़ी भी बहुत हो गई थी. ऐसे में मेरी पढ़ाई पर बुरा असर पड़ना ही था.
10वीं की बोर्ड की परीक्षाओं में मैं मात्र 68 प्रतिशत नंबर ही ला पाई. सभी रिश्तेदार और परिचित मेरी डाक्टर बनने की इच्छा से वाकिफ थे. मेरा परिणाम सुन कर हर व्यक्ति यही राय जाहिर करता कि अब मेरा डाक्टर बनना असंभव था.
उन लोगों की ऐसी बातें सुन कर मेरा आत्मविश्वास पूरी तरह से डगमगा गया. मैं मां की इच्छा पूरी नहीं कर सकूंगी, इस बात का मुझे गहरा सदमा लगा. हीनभावना और उदासी की शिकार हो कर मैं अपने कमरे में बंद रहने लगी. कुछ दिन मीना आंटी मुझे यों उदास और गुमसुम पड़ा खामोशी से देखती रहीं, फिर एक दिन सुबह 5 बजे उन्होंने मुझे जगा दिया.
‘आज से, इसी क्षण से सुस्ती और उदासी को तुम सदा के लिए छोड़ रही हो, कविता. अब कमर कस के तैयार हो जाओ,’ उन की आवाज में भरपूर जोश समाया था.
‘किसलिए तैयार हो जाऊं?’ मैं ने उलझनभरे स्वर में पूछा.
‘अपनी मां का सपना पूरा करने के लिए, डाक्टर बनने के लिए.’
‘अब वह सपना अधूरा…’
‘बिलकुल नहीं रहेगा,’ उन्होंने मेरे मुंह पर हाथ रख कर आत्मविश्वासभरे स्वर में कहा, ‘मेहनत और लगन हो तो इंसान के लिए कुछ भी करना असंभव नहीं है. हर कदम पर मैं तुम्हारे साथ हूं. तुम डाक्टर जरूर बनोगी.’
मीना आंटी को उस क्षण से पहले मैं ने कभी भावुक अवस्था में नहीं देखा था. गंभीर रह कर अपना काम करते रहना उन के व्यक्तित्व की पहचान बन गया था. इस क्षण भावावेश से कांप रही उन की आवाज सुन कर मैं मन ही मन कुछ ऐसी हैरान हुई कि उन्होंने जो कहा, वह मैं करती चली गई.
आगामी कुछ दिनों में मेरी पूरी दिनचर्या ही बदलवा दी थी उन्होंने. सुबह 5 बजे उठ कर मैं 20 मिनट व्यायाम करती, तो मीना आंटी मेरा साथ देतीं. फिर एक घंटा कोई मुश्किल सबक याद करती, क्योंकि उन के अनुसार सुबह याददाश्त अच्छी तरह कार्य करती है.
स्कूल जाने से पहले वे रोज मेरे साथ मेरी मां की तसवीर के सामने आ खड़ी होतीं. मैं हाथ जोड़ कर खड़ी होती और वे कहतीं, ‘दीदी, अपनी बेटी को इतनी शक्ति दो कि यह मेहनत और लगन से पढ़ते हुए आप का सपना
पूरा कर दिखाए. इस का हौसला
कभी न टूटे. इस का आत्मविश्वास कभी न डगमगाए.’
स्कूल से लौट कर आने के बाद मेरे पढ़ने का समय उन्होंने तय कर दिया था. हमारे यहां टीवी का चलना एकदम कम हो गया. वे खुद बीएससी तक पढ़ी थीं और मुझ से याद किया गया पाठ अकसर सुन लेती थीं.
मैं जब तक जागती, उन्हें अपने इर्दगिर्द घूमते पाती. मेरी हर जरूरत को वे समझती थीं और मेरे कुछ कहने से पहले ही उसे पूरा कर देती थीं. उन के हावभाव से यह जाहिर होता कि उन्हें मेरे कैरियर की बहुत परवा थी.
11वीं की परीक्षाओं में मैं ने 84 प्रतिशत अंक प्राप्त किए और इस कारण मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा.
12वीं के पूरे साल मैं ने विज्ञान और गणित की ट्यूशन लगाई. इस के लिए पापा को मीना आंटी ने ही तैयार किया था. 7 हजार रुपए हर महीने का ट्यूशनों का खर्चा उठाना कोई आसान काम नहीं था, पर मीना आंटी के कारण मैं ट्यूशनों का लाभ उठा सकी.
मीना आंटी ने मेरा मनोबल ऊंचा बनाए रखने में जबरदस्त योगदान दिया था. मुझे अपना डाक्टर बनने का लक्ष्य एक दिन भी भूलने नहीं दिया. आलस्य व उदासीनता का शिकार न कभी खुद बनीं, न मुझे बनने दिया.
मेरी जिंदगी में उन का स्थान महत्त्वपूर्ण होता चला गया था. दिनोंदिन वे जो सब मेरे हित के लिए कर रही थीं, उस के कारण मैं उन का बहुत आदरसम्मान करने लगी थी. जब उन से मेरा व्यवहार बहुत खराब हुआ करता था उस वक्त को अपनी याददाश्त से बाहर निकाल फेंकना चाहती थी मैं.
हम दोनों की मेहनत आखिरकार रंग लाई और 12वीं की परीक्षा में मैंने 88 प्रतिशत अंक प्राप्त किए तथा सीबीएससी की परीक्षा में मैरिट लिस्ट में आई और मैं ने कानपुर मैडिकल कालेज में प्रवेश प्राप्त करने में सफलता भी पा ली थी.
जिस दिन मैडिकल कालेज में प्रवेश मिलने वाली खबर मुझे मिली, वह दिन मेरी जिंदगी का सब से खुशी वाला दिन था. मुझे यह खबर सुनाने मेरी स्कूल की सहेली वंदना अपने मातापिता के साथ आई थी. उस को भी कानपुर मैडिकल कालेज में दाखिला मिला था.
वंदना और मैं खुशी के मारे फूली नहीं समा रही थीं. हमारी ऊंची, उत्तेजित आवाजें सुन कर पापा, सुमित और मीना आंटी लगभग भागते से बैठक में आए.
‘पापा, मुझे कानपुर मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल गया है,’ कह कर मैं उन की छाती से जा लगी.
पहले मैं ने पापा का परिचय वंदना के मम्मीपापा से कराया और फिर आरती आंटी का हाथ अपने हाथों में ले कर भावुक स्वर में बोली, ‘अंकलआंटी, मेरी सफलता का श्रेय सब से पहले और सब से ज्यादा इन्हें जाता है. आप मिलिए मेरी मम्मी से.’
पापा मेरी बात सुन कर पहले चौंके, और फिर उन की आंखों में उसी पल खुशी के आंसू झलक उठे.
सुमित पहले मुंहबाए मेरा मुंह देखता रहा और फिर अजीब सी उत्तेजना का शिकार हो तालियां बजाता नाचने लगा.
मेरी अपनी पलकें भीग गई थीं. मैं कुछ और भी कहती पर मेरा गला रुंध गया, अपनी मीना आंटी…नहीं, अपनी मम्मी के सीने से लग कर एकाएक सुबकने लगी थी.
‘बहुत भावुक है मेरी बेटी,’ मेरे सिर पर स्नेहभरा हाथ फिरातीं मेरी मम्मी ने कहा, ‘यह इस की कमजोरी भी है. और इस की ताकत भी. आप बैठिए. इस खुशी के मौके पर मैं सब का मुंह मीठा कराती हूं.’
वे मेरा हाथ थाम कर मुझे बैठक से बाहर ले आईं और हम दोनों मेरी मां की तसवीर के सामने जा खड़ी हुईं.
इस बार अपनी मम्मी के कुछ बोलने से पहले ही मैं मां की तसवीर से बोल पड़ी, ‘मां, देखो मम्मी के सहयोग से मुझे मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया है. मम्मी के मार्गदर्शन, इन के मन की दया व ममता और निस्वार्थ प्रेम करने की क्षमता मेरी जिंदगी में यह खुशी का दिन लाई है. आप दोनों के लिए मेरे दिल में प्यार और सम्मान एकसाथ मौजूद रह सकता है. इस तथ्य को जब से मैं ने समझा है, मेरे दिल की सारी उलझनें दूर हो गई हैं. आप के दुनिया से असमय चले जाने के कारण हमारे दिलों में हुए जख्मों ने मम्मी के प्यार के मलहम के कारण टीसना बंद कर दिया है, मां.’
उस दिन पापा की दूसरी पत्नी को मैं ने अपनी पहली मां के समकक्ष ला कर मम्मी मान लिया था.
मम्मी ने भावविभोर हो मुझे अपने गले से लगा लिया. हम दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे. निसंदेह ये आंसू हमारे मन के सुख, संतोष और खुशियों को दिखा रहे थे.
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June 25, 2019 at 10:18AM
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