Thursday, 27 September 2018

अतृप्त पिपासा

अनबूझ पहेली सी

तुम्हारे अधरों की

अतृप्त पिपासा.

कभी शांत सरिता से सकुचाते

अधखिली कली से

कभी इठलाते

सुधियों की नैया पर

पताका से फहराते.

अकेली कथा सा मन

नहीं कर पाता

इन की परिभाषा

तुम्हारे अधरों की

ये अतृप्त पिपासा.

मौनव्रती रहते नहीं

फिरफिर खोल रहे

पंख पखेरू

लमहालमहा उड़ान

हो रही

कपोलों की अभिलाषा

भी तो डोल रही

इसीलिए

अनबूझ पहेली सी

तुम्हारे अधरों की

अतृप्त पिपासा.

– प्रमोद सिंघल

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अनबूझ पहेली सी

तुम्हारे अधरों की

अतृप्त पिपासा.

कभी शांत सरिता से सकुचाते

अधखिली कली से

कभी इठलाते

सुधियों की नैया पर

पताका से फहराते.

अकेली कथा सा मन

नहीं कर पाता

इन की परिभाषा

तुम्हारे अधरों की

ये अतृप्त पिपासा.

मौनव्रती रहते नहीं

फिरफिर खोल रहे

पंख पखेरू

लमहालमहा उड़ान

हो रही

कपोलों की अभिलाषा

भी तो डोल रही

इसीलिए

अनबूझ पहेली सी

तुम्हारे अधरों की

अतृप्त पिपासा.

– प्रमोद सिंघल

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September 28, 2018 at 09:11AM

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